शनिवार, 16 अगस्त 2025

शहर का मकान (कहानी) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी (उत्तराखंड प्रांत)

 शहर का मकान (कहानी)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी (उत्तराखंड प्रांत)

जनवरी का महीना था। बलुवाकोट के ऊंँचे पहाड़ों पर मुनस्यारी से लेकर छिपला केदार और गुंजी तक बर्फ की तीखी चमक और मोटी परत जमी थी। पहाड़ की ठंडी हवा हड्डियों को चबा रही थी। मोहन दाज्यू सुबह-सुबह अंगीठी के पास बैठकर अपने हाथ सेंक रहे थे। कुछ चीड़ के पेड़ों के बीच से उतरती धुंँध मानो आकाश और धरती का रिश्ता जोड़ रही हो। सामने की ऊंँची पहाड़ी पर बर्फ जमी थी, घाटी में कोहरा छाया हुआ था। जैसे प्रकृति ने सफ़ेद रजाई ओढ़ रखी हो। काली नदी की आवाज़ बलुवाकोट और नेपाल की सीमारेखा को रेखांकित कर रही थी।

कुछ चीड़ के पेड़ बर्फ की बूँदों को झटकते हुए ‘छपाछप’ करते थे, मानो कोई गाँव की औरतें पानी भरते वक्त लोटे से गिरा रही हों। पहाड़ के खेत ठंड से सिहर रहे थे, जैसे पूछ रहे हों—अबकी बार कौन हमें जोतेगा? आलू खोदने के लिए खेत में आदमी नहीं, भालू उतर आया था। प्याज़ के खेतों में बंदर धमा-चौकड़ी मचा रहे थे। गांँव में बच्चे बूढ़े-बुजुर्ग यह तमाशा देख रहे थे और सोच रहे थे कि अब पहाड़ की खेती जानवरों की दया पर ही बची है। बच्चे स्कूल में हैं, जहांँ उन्हें शिक्षा और मिड-डे मील की पानी जैसी दाल ज्यादा मिल रही है। वह दाल इतनी पतली कि उसमें चेहरा तक नज़र आ जाए। भात इतना गीला कि बिना दूध-चीनी की खीर समझ लो। बच्चे किताबों के लिए कम, थाली के उस दाल-भात के लिए ज्यादा स्कूल जा रहे थे।

इधर बलुवाकोट का मोहन दाज्यू अपनी पत्नी हेमा से कह रहा था—“हेमा, सुना है हल्द्वानी में एक कमरा मिल रहा है। छोटा ही सही, पर शहर में है। बच्चे की वहांँ अच्छी स्कूलिंग होगी, और अस्पताल भी पास रहेंगे।” हेमा ने खिड़की से झांँकते बादलों को देखा, जो मानो सुन रहे थे और हंँस रहे थे। बोली—“यहांँ तो सूरज रोज देखने को मिलता है, तारों की गिनती कर लो, पर वहांँ? वहांँ धुआंँ मिलेगा, ऑटो के हॉर्न, गाड़ियों का जाम और एंबुलेंस की आवाज़। बच्चे को नींद नहीं आएगी।” मोहन हंँसा—“बच्चा सो लेगा, अरे चिंता मत कर। हमें तो शहर में मकान बनाना ही पड़ेगा, चाहे आधा कमरा ही क्यों न हो।”

उधर पौड़ी गढ़वाल के थलीसैंण का गणेश भैजी भी अपनी पत्नी दीपा से यही चर्चा कर रहा था। दीपा बोली—“सुनो, गांँव के स्कूल में तो बस राम के भरोसे पढ़ाई है। मास्टरजी हफ्ते में दो दिन आते हैं, और तीन दिन शादी-ब्याह या चुनाव प्रचार में जाते हैं। बच्चों को भविष्य चाहिए। सुना है देहरादून में बड़े-बड़े स्कूल हैं, वहांँ बच्चे टिफिन लेकर जाते हैं। ब्रेड, ऑमलेट, फ्रूट्स! चाहें खाएंँ या न खाएंँ, पर टिफिन स्टाइलिश होना चाहिए।” गणेश ने सिर खुजाते हुए कहा—“दीपा, टिफिन का स्टाइल दिखाना है या बच्चों को पढ़ाना है?” दीपा ने तुरंत पलटकर कहा—“गांँव में तो बच्चे दाल-भात के लिए स्कूल जाते हैं, यहांँ टिफिन के लिए जाएंगे, यही तो फर्क है!”

गांँव की जिंदगी कितनी भी सुंदर क्यों न हो—आसमान बड़ा, तारे चमकीले, हवा शुद्ध, पानी के नौले से मीठा झरना बहता हो—पर वहांँ चिकित्सा यमराज के भरोसे और शिक्षा राम भरोसे है। गांँव में जब बच्चा बीमार पड़ता है तो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की एएनएम दीदी आती हैं और कीड़े मारने वाली गोलियांँ पकड़ा जाती हैं। विटामिन-डी, आयरन की गोलियांँ बांँट दी जाती हैं, और कहती हैं—“बच्चों को धूप में खिलाओ, सब ठीक हो जाएगा।” गांँव वाले भी मान जाते हैं, जैसे धूप ही सारी बीमारियों की दवा हो।

शहर की तरफ देखो, तो अस्पतालों में अलग तमाशा है। हल्द्वानी के अस्पताल में एक बार एक मरीज को मुर्दा समझकर श्मशान तक ले जाया गया। जब चिता तैयार हुई, तो वह उठ बैठा। लोग भागे, फिर हंँसे। गांँव के लोग यह किस्सा सुनते तो कहते—“शहर की दवा इतनी जोरदार है कि मुर्दे भी उठ जाते हैं।” और शहर के लोग कहते—“शहर का अस्पताल है, यहांँ तो मुर्दा और मरीज का फर्क भी समझ नहीं आता।”

इधर गांँव से जब रोडवेज बसें शहर की ओर निकलती हैं, तो दृश्य ही अलग होता है। थलीसैंण से देहरादून और बलुवाकोट से हल्द्वानी जाने वाली बसें इतनी भरी रहती हैं कि बस की छत तक पर लोग बैठे होते हैं। कुछ लोग दरवाजे पर लटकते हैं, मानो बस नहीं, कोई झूला हो। बच्चे गोद में, बकरियांँ पैरों तले, और ट्रंक छत पर। ड्राइवर हॉर्न बजाता हुआ पहाड़ की संकरी सड़कों पर बस दौड़ाता है और हर यात्री भगवान को याद करता है। पहाड़ भी तो डायनासोर जितने बड़े विशाल हैं। शहर पहुंँचते-पहुंँचते यही बसें थकी घोड़ियों की तरह हांँफने लगती हैं।

मोहन दाज्यू जब पहली बार हल्द्वानी पहुंँचे, तो उन्हें लगा कि वह किसी अलग ही दुनिया में आ गए हैं। गाड़ियों का धुआंँ ऐसा कि आंँखों से आंँसू आने लगे। हॉर्नों का शोर ऐसा कि पहाड़ के भोटिया कुत्ते भी फेल। कोई एक चिड़िया देखी तो अपने गांँव की चिड़ियों की चहचहाहट याद आ गई। पर यहांँ एक छोटा सा कमरा ढूंढा, जिसमें मुश्किल से बिस्तर और एक स्टोव समा सके। पर मोहन की आंँखों में सपने थे—“बच्चा यहीं पढ़ेगा, यहीं डॉक्टर बनेगा, यहीं से IAS बनेगा।” हेमा चुपचाप सोच रही थी—“गांँव में खुला आकाश, हवा, पानी सब छोड़ आए, और यहांँ चार दीवारों में घुटन के लिए आ गए।”

गणेश भैजी भी देहरादून में कमरे की तलाश में थे। उन्हें एक कॉलोनी में एक कमरा मिला, जिसके बगल में नाली बह रही थी। लेकिन उन्होंने सोचा—“ठीक है, नाली है तो क्या हुआ, स्कूल पास है, बाजार पास है, नौकरी का भी चांस है।” दीपा हंँसते हुए बोली—“हम तो पहाड़ से आए हैं, यहांँ नाली का पानी भी गंगाजल समझ लो।” दोनों हंँस दिए, मगर भीतर कहीं पहाड़ की याद खटकती रही।

गांँव के खेत अब बंजर होते जा रहे थे। गाय, भैंस, बकरियांँ उदास घूमती थीं, क्योंकि उन्हें चराने वाले बच्चे अब शहर के छोटे कमरों में किताबों और टिफिन के बोझ तले दबे थे। गांँव की नदियांँ पागल होकर चट्टानों से टकरातीं, मुंँह से पानी फेंकतीं, पर उन्हें देखने वाला कौन? अब गांँव में बस बूढ़े और जानवर रह गए थे। खेतों की मेड़ों पर उगती घास, जंगली झाड़ियांँ मानो कहती हों—“तुम्हारे शहर के मकान हमें रास नहीं आएंगे, हम तो यहीं रहेंगे।”

शहर के स्कूलों का भी हाल कम मजेदार नहीं था। बच्चों को ब्रेड, ऑमलेट, फ्रूट्स टिफिन में दिए जाते। मांँ-बाप सोचते—“बच्चा पढ़ाई करेगा।” लेकिन बच्चे तो टिफिन स्कूल पहुंँचते ही दोस्तों से अदला-बदली कर लेते। ब्रेड गया, बिस्किट आया। ऑमलेट गया, मैगी आई। पढ़ाई से ज्यादा टिफिन की राजनीति चलती। गांँव के बच्चे दाल-भात की प्लेट के लिए स्कूल जाते, वही शिक्षा का प्रसाद था और शहर के बच्चे टिफिन के आदान-प्रदान के लिए। फर्क बस इतना था कि गांँव में भूख पढ़ाई से बड़ी थी, शहर में दिखावा भूख से बड़ा था।

धीरे-धीरे मोहन दाज्यू और गणेश भैजी दोनों का परिवार शहर में रम गए। पर हर बार जब सर्दी आती और धुंँध छाती, तो उन्हें पहाड़ की याद सताती। मोहन दाज्यू सोचते—“वहांँ तो सुबह सूरज की किरणें सीढ़ीनुमा खेतों पर सुनहरी झालर डालती थीं। यहांँ सूरज दिनभर धुएंँ में लुका-छिपी खेलता है।” गणेश भैजी सोचते—“वहांँ तारों से भरा आकाश होता था, यहांँ रात में बस स्ट्रीट लाइट की टिमटिमाहट।”

पर बच्चों की पढ़ाई, मेडिकल सुविधाएं, और नौकरी का सपना इतना बड़ा था कि इन सब बातों पर हंसी-ठिठोली कर आगे बढ़ जाते। कभी गांँव फोन करते तो वहांँ के रिश्तेदार कहते—“खेत बंजर हो गए हैं, आलू अब भालू खोद रहे हैं, और प्याज़ टमाटर बंदर खा रहे हैं।” इस पर मोहन और गणेश दोनों हंँसते और कहते—“ठीक है, खेती जानवरों को ही सौंप दो, हम शहर में मकान बना रहे हैं।”

शहर का मकान अब सपना नहीं, मजबूरी था। गांँव की खुली हवा, तारे, सूरज, बारिश, गधेरे और नौले सब पीछे छूट चुके थे। पर इन सबकी कीमत पर शहर का मकान बना, जिसमें सपनों की दीवारें थीं और व्यंग्य की छत। आखिर गांँव से शहर तक का सफर हंँसी और व्यंग्य से भरा हुआ था—जहांँ गांँव में भालू , सूअर और बंदर खेतों के राजा थे, वहीं शहर में हॉर्न और धुआंँ जिंदगी के मालिक। दोनों जगह का सच अलग था, पर दोनों में एक जैसा—जीवन किसी का आसान नहीं, बस दिखावा अलग-अलग है।

मोहन दाज्यू अपनी छत पर बैठे थे। ईंट-पत्थरों से बने उस किराए के घर की दीवारों को देखते हुए मुस्कराए—“ये मकान मेरा है, बस उतना ही जितना बैंक चाहे।” पत्नी ने पूछा, “तो हमारा घर कब होगा?” मोहन दाज्यू ने सिर झुकाकर जवाब दिया, “घर तो गाँव में था, यहाँ तो सिर्फ़ कमरे हैं।” बच्चे नीचे गली में टूटी चप्पल को फुटबॉल बनाकर खेल रहे थे, और बार-बार मासूमियत से पूछते—“पापा, हमारे भी गाँव जैसा आँगन होगा?” मोहन दाज्यू के होंठों पर मुस्कान थी, पर आँखों में वही खामोशी थी, जो हर महीने बैंक की ईएमआई की पर्ची के साथ आती थी। मोहन दाज्यू सोचने लगे कि जितना बड़ा मकान शहर में बनता है, उतना ही छोटा आदमी अपनी ही सोच में हो जाता है। मकान ऊपर उठाने के चक्कर में आंँगन छोटा हो जाता है। रिश्ते और संबंध और भी छोटे।

उधर पौड़ी गढ़वाल के गणेश भैजी थे, जिनकी सरकारी नौकरी ने उन्हें सुरक्षित बना दिया था, लेकिन भीतर का असुरक्षित आदमी हर वक्त चिल्लाता था। पत्नी ने ताना मारा—“इतना तनाव क्यों? तुम्हें तो पेंशन भी मिलेगी।” गणेश भैजी ने गहरी साँस लेकर कहा—ओल्ड पेंशन स्कीम थोड़ी ना है अब ..! अब तो नई पेंशन स्कीम है। वैसे—“तनाव केवल पेंशन का ही नहीं है दीपा , तनाव इस बात का है कि हम बच्चों को गाँव की धूप, अपने खेत, गधेरे, संस्कृति , अपनापन , रिश्ते नहीं दे पाए, सिर्फ़ ट्यूशन फीस , शिक्षा और शहरी स्क्रीन की रोशनी दी।” बच्चे महँगे स्कूल की किताबों में उलझे रहे, लेकिन दादी की कहानियों में कभी नहीं। गणेश भैजी के चेहरे पर व्यंग्य भरी मुस्कान थी—“हमने बच्चों को मकान तो दिया, मगर घर छीन लिया। मिट्टी की गंध की जगह एयर प्यूरीफ़ायर पकड़ा दिया।” गणेश भैजी सोचने लगे कि शहर में मकान आदमी को थामता है, जबकि गाँव में आदमी घर को थामे रहता है।



शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

शिक्षा का ताबीज़ (कहानी) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी (उत्तराखंड प्रांत)

 शिक्षा का ताबीज़ (कहानी)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी  (उत्तराखंड प्रांत)


सुबह के आठ बज रहे थे। पहाड़ी कस्बे के सरकारी महाविद्यालय का बरामदा ठंड में जम-सा गया था। दीवारों पर पुरानी पोस्टरें, आधे छूटे चुनावी नारे और कोने में टंगा बिजली का पंखा—जो वर्षों से घूमना भूल गया था—सब मिलकर मानो बता रहे थे कि यहाँ चीज़ें सिर्फ दिखाने के लिए हैं, चलने के लिए नहीं। बरामदे में शिवांगी खड़ी थी—अंतिम वर्ष की छात्रा, हाथ में फटी डायरी, आँखों में सवाल और चेहरा ऐसा जैसे पिछले साल के अपने रद्द रिज़ल्ट का बोझ अब भी उठाए हुए हो।

चपरासी लालू हाँफते हुए आया, हाथ में मुड़ा-तुड़ा नोटिस..! 

“सुनो-सुनो! आदेश आया है—आज से हर छात्र को मिलेगा शिक्षा का ताबीज़। इसे पहनते ही पढ़ाई में मन लगेगा, रिज़ल्ट सुधरेगा, और जिंदगी बदल जाएगी।”

बरामदे में हल्की हंसी दौड़ गई। मास्टर साहब—जो कभी गणित पढ़ाते थे, अब मीटर रीडिंग और बिजली बिल वसूली में महारत हासिल कर चुके थे—पास आकर बोले,

“बेटी, ये ताबीज़ बिजली कटौती जैसा है—शोर बहुत करता है, लेकिन रोशनी नहीं देता।”

तभी प्रिंसिपल साहब निकले। फटा जूता, सिलेंडर जैसा पेट, हाथ में आधा चाय का गिलास, और मुस्कान—वही जो हर सरकारी मीटिंग में ‘हम सब अच्छा कर रहे हैं’ कहने के लिए लगाई जाती है।

“देखो बेटा,” उन्होंने अपनी भारी आवाज में कहा, “ये ताबीज़ पढ़ाई के लिए नहीं, व्यवस्था के लिए है। जैसे बैल गाड़ी खींचता है—धीरे-धीरे, और कभी-कभी उल्टी दिशा में।”

शिवांगी ने हिम्मत की, “सर, इससे शिक्षा सुधरेगी?”

उन्होंने पेट पर हाथ फेरते हुए कहा, “सुधर जाएगी… जैसे ही नेतागिरी सुधर जाएगी, ठेकेदार ठेका छोड़ देंगे, और बल्ब खुद जलना सीख जाएगा।”

महाविद्यालय की सीढ़ियों पर उस दिन असामान्य भीड़ थी। कम्प्यूटर लैब में मशीनें बार-बार “पेट खराब” का बहाना बनाकर बंद हो रही थीं। स्क्रीन पर वही एरर मैसेज—सिस्टम इज नॉट रिस्पॉन्डिंग—जैसे बेरोजगार युवाओं की जिंदगी का नारा हो: सिस्टम इज नॉट रिस्पॉन्डिंग। किराएदार प्रोफेसर बाथरूम के फर्श पर फिसलकर घर बैठे थे, लेकिन उनके नाम से तीन मीटिंग के मिनट्स पास हो चुके थे।

इसी अफरा-तफरी में मदारी आ गया। कंधे पर बन्दर, हाथ में डुगडुगी—

“भाइयों और बहनों ! यही है असली शिक्षा। मिलेगी सबको दीक्षा..! 

डिग्री लेने से पहले डुगडुगी बजाना ज़रूरी है।”

बन्दर ने ताबीज़ को ओलिंपिक मशाल की तरह उठाया, भीड़ ने ताली बजाई, और शिवांगी ने सोचा—ये मशाल नहीं, बुझा हुआ बल्ब है—जिसे दिखावे के लिए टांगा गया है, रोशनी देने के लिए नहीं।

गाँव के महाविद्यालय में उस दिन चाय के साथ ‘गोबर का गुड़’ पर चर्चा थी।

पहला शिक्षक—“ठंड का फंड इस बार नेताजी के भाषणों में खर्च होगा।”

दूसरा—“और हीटर सिर्फ प्रिंसिपल के कमरे में चलेगा। बच्चों के लिए ताबीज़ काफी है।”

इसी बीच मंच पर एक अनपढ़ नेता का अभिनय हुआ—

“हम शिक्षा हर घर पहुँचाएँगे… बस किताबें बाद में भेजेंगे।” पेपर छुट्टियों में करवाएंगे।

पीछे खड़ा ठेकेदार मुस्कुराया, “और बिल पहले ही बना देंगे।”

शिवांगी को यह दृश्य नदी और कीचड़ के संगम जैसा लगा—जहाँ साफ़ पानी और गंदगी दोनों साथ-साथ बहते हैं, और कोई भी एक-दूसरे से अलग नहीं होता।

पुलिस चौकी के सामने एक आदमी बैठा था—पहले का टॉपर, अब “कामयाब बेरोजगार” की सूची में नाम। गले में ताबीज़, आँखों में थकी हुई उम्मीद का टार्च।

शिवांगी ने पूछा, “भैया, ताबीज़ काम करता है?”

वह हंसा—“पहनते ही दिमाग ऐसा घूमता है जैसे बल्ब में बिजली आकर भी जलने से मना कर दे। नौकरी तो दूर, अब तो अपना नाम भी याद नहीं रहता।”

पास खड़े डाक्टर ने ठहाका लगाया—“ये सामान्य है। हमारे यहाँ पढ़ाई का असर दिमाग पर कम और पेट पर ज्यादा पड़ता है।”

जंगल से लौटते समय पहाड़ी महाविद्यालय के बच्चों ने आसमानी बिजली की गड़गड़ाहट सुनी। मानों जैसे बल्ब फ्यूज हो गया, और बच्चे ताबीज़ की ओर ऐसे देख रहे थे जैसे उससे रोशनी फूट पड़ेगी।

तभी शाम तक आदेश आया—“कल से चुनाव ड्यूटी है, कक्षाएँ बंद।”

मदारी ने डुगडुगी बजाई, “यही है असली शिक्षा—पढ़ाई का वादा, नेतागिरी का फायदा।”

बन्दर ने सिर हिलाया जैसे कह रहा हो, “सिलेबस यही है, इसमें बदलाव नहीं।”

शिवांगी को यह पूरा खेल मनोवैज्ञानिक प्रतीकों का जाल लगा। ताबीज़ मरीज़ के पर्चे जैसा था—दवा का नाम लिखा, लेकिन दवा ही नहीं।

प्रिंसिपल का “बिमारी का पंचनामा” फाइलों में दर्ज था—पेट फूलने से लेकर टाइपिंग स्पीड धीमी होने तक—लेकिन इलाज का कॉलम खाली।

ठंड के दिनों में कम्प्यूटर लैब में बैठना किसी परीक्षा से कम नहीं था—स्क्रीन जम जाती, की-बोर्ड की चाबियाँ कांपतीं, और बिजली कटते ही लैब अंधेरे में डूब जाती।

मदारी ने ताना मारा, “जब ये बन्दर प्रिंसिपल बनेगा और फटा कुर्ता पहनकर मीटर रीडिंग लेने जाएगा, तब कम्प्यूटर भी गणित पढ़ा देगा।”

सब हंसे, लेकिन शिवांगी के होंठ सिले थे—उसे पता था कि इस मजाक में सच का मील का पत्थर गड़ा है।


फिर आया ताबीज़ वितरण का दिन। वह भी रविवार को। मंच पर नेता, ठेकेदार, मदारी, प्रिंसिपल, और बन्दर सब विराजमान थे।

नेता ने ऐलान किया, “ये ताबीज़ पहनते ही ज्ञान अपने आप दिमाग में उतर आएगा।”

शिवांगी ने अपना ताबीज़ खोला—अंदर न किताब, न कलम—बस कीचड़, बिजली का अधूरा बिल, टाइम-टेबल और चुनाव ड्यूटी की सूची।

भीड़ ताली बजा रही थी, मदारी डुगडुगी बजा रहा था, और बन्दर ताबीज़ चबा रहा था।

शिवांगी को लगा यह शिक्षा नहीं, मदारी का खेल है—जहाँ भीड़ को बस व्यस्त रखना असली मकसद है।


रात को आसमान में सितारे ऐसे चमक रहे थे जैसे कोई बिजली मीटर की रीडिंग गिन रहा हो।

शिवांगी ने ताबीज़ नदी में फेंक दिया, जो बहते ही कीचड़ में बदल गया।

उसे लगा, असली शिक्षा ताबीज़ से बाहर है—जहाँ सवाल पूछने पर उत्तर किताब से आता है, डुगडुगी से नहीं।

लेकिन कस्बा, गाँव और शहर सब इस खेल के आदी थे—जैसे बिजली कटने पर भी पंखे को टांगकर रखा जाता है, उम्मीद में कि कभी तो घूमेगा।

गुरुवार, 14 अगस्त 2025

स्कूल की छुट्टी (कहानी) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड

स्कूल की छुट्टी (कहानी)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड 

------------------------------------------------------------------
सुबह के धुंधलके में पहाड़ ऐसे लग रहे थे जैसे किसी ने सफ़ेद रजाई ओढ़ ली हो। बादल, जैसे आलसी सरकारी बाबू, चुपचाप घाटियों में बैठकर चाय पी रहे थे और सोच रहे थे कि आज थोड़ा ज़्यादा बरसें, ताकि काम करने वालों को बहाना मिले और न करने वालों को मौका। हवा में ठंडक थी, लेकिन बादलों में गर्मजोशी। वे धीरे-धीरे सरकते हुए गांँवों के ऊपर इकट्ठा हो गए, जैसे कोई अफसर दफ्तर में देर से पहुंचकर भी बैठक बुला ले। पहली बूँद गिरते ही कच्ची सड़कों ने खुद को नदी घोषित कर दिया। मिट्टी ने अपने सारे रंग छोड़ दिए और पानी में मिलकर बहने लगी। पुलों ने इस्तीफ़ा दे दिया—“हम इतनी जिम्मेदारी नहीं उठा सकते।” पगडंडियां अचानक गायब हो गईं, मानो कह रही हों कि आज हमें भी छुट्टी चाहिए।

गांँव में लोग सुबह की चाय पी ही रहे थे कि मोबाइल पर टन-टन की आवाज़ आई। शिक्षा विभाग का संदेश—“भारी वर्षा के कारण सभी विद्यालय आज बंद रहेंगे।” आदेश उतनी तेज़ी से गांँव-गांँव फैला जितनी तेज़ी से पहाड़ों में बिजली चली जाती है और चाय की केतली की भपक दुकानों में खुशबू फैलाती है। बच्चे, जो रोज़ सुबह उठते ही बस्ता देखकर सुस्त हो जाते थे, आज बिस्तर छोड़कर खिड़की से बारिश का नजारा लेने दौड़ पड़े। राजू, जो किताब खोलते ही जम्हाई लेने का मास्टर था, आज बारिश में नंगे पैर दौड़ रहा था। उसकी कागज की नाव तेज़ बहाव में ऐसे भाग रही थी जैसे सपनों की नौकरी विदेश में मिल गई हो। कमला ने हाथ में छाता लिया, लेकिन वह छाता भी बरसात में ऐसे नाच रहा था जैसे कोई नेता चुनावी रैली में—शोर ज्यादा, काम कम। पहिले तो छाता खुला ही नहीं जब खुला तो पैराशूट बन गया। बच्चों की टोली कूद-फांद करती, पानी में छपाक-छपाक करती, मानो बरसात कोई बड़ा त्योहार हो और वह सब मुख्य अतिथि हों।

गांँव के मास्टर तिवारी जी बरामदे में ऊन का मफलर बुन रहे थे। हर टांका मानो कह रहा हो—“आज पाठ नहीं, पकौड़े होंगे।” उनके चेहरे पर संतोष का भाव था, जैसे प्रकृति ने खुद उन्हें अवकाश पत्र दे दिया हो। उनकी पत्नी ने पूछा, “आज बच्चों को पढ़ाने का मन नहीं?” तिवारी जी ने गंभीर लहजे में कहा, “प्रकृति जब पढ़ा रही है जलचक्र, तो मैं क्यों बीच में दखल दूंँ?” उनका यह दर्शन न केवल व्यावहारिक था बल्कि आलस्य का भी उत्तम उदाहरण था।

बरसात में पहाड़ का भूगोल अपने असली रूप में सामने आता है। झरने बताते हैं कि गुरुत्वाकर्षण किसका बाप है। लुढ़कते पत्थर चेतावनी देते हैं कि स्थिरता सिर्फ किताबों में है। मिट्टी के धसकने से समझ आता है कि आधार कमजोर हो तो इमारत गिरना तय है—चाहे वह घर हो या व्यवस्था। गांँव के ऊपर के रास्ते बहकर गायब हो गए थे और नीचे के रास्ते कीचड़ में ऐसे डूब गए थे जैसे सरकार की योजनाएं फ़ाइलों में।

बारिश थमने पर गांँव की पंचायत में चर्चा छिड़ी। गणेश काका, जो अपने जमाने को इतिहास मानते थे, बोले, “हमारे जमाने में तो बारिश में भी स्कूल जाते थे… बस्ता भीग जाए तो क्या।” पप्पू, जो वर्तमान पीढ़ी का प्रतिनिधि था, तुरंत बोला, “काका, तब शिक्षा पानी में नहीं बहती थी, अब तो बजट से लेकर किताब तक सब बह जाता है।” दीपा की मांँ, जो गांँव के मध्यम वर्ग की आवाज़ थीं, बोलीं, “अब तो बच्चे घर से ऑनलाइन पढ़ते हैं, बरसात में तो और भी आसान।” पप्पू हंसा, “हाँ मौसी, लेकिन नेटवर्क भी तो पहाड़ी है—कभी ऊपर, कभी नीचे।” पकड़ में आ ही नहीं रहा है। एक - दो डंडे से क्या होगा ? इस पर पंचायत में बैठे सब लोग खिलखिला पड़े। हंँसी में छिपी यह सच्चाई सबको चुभ रही थी—बरसात में शिक्षा विभाग से लेकर चाय की दुकान तक, हर कोई ‘सुरक्षा’ के नाम पर आराम चाहता है। जिसका बेटा फौज में है वह छाती चौड़ी कर लेता है।

सोशल मीडिया ने बरसात को और भी रंगीन बना दिया था। हालांकि रंग जिंदगी के अनेक भावों को दर्शाते हैं। गांँव के युवा शिक्षक प्रदीप सर ने छुट्टी मिलते ही इंस्टाग्राम पर फोटो डाल दी—“Rainy day in the hills”। पीछे बहते झरने का वीडियो, जिसमें वे बड़े साहित्यिक अंदाज में खड़े थे। कमेंट आया—“सर, यह स्कूल के पीछे का झरना है ना? तो आप वहीं क्यों नहीं पढ़ा रहे?” सर ने जवाब दिया—“ये जलधारा शिक्षा से भी तेज बह रही है, बेटा।” फेसबुक और व्हाट्सऐप विश्विद्यालय पर बरसात का मेला लगा था। “Rainy Day Vibes” के साथ चाय-पकौड़े की तस्वीरें, बच्चों के कीचड़ में कूदने के वीडियो और शिक्षकों के पोस्ट—“सुरक्षा के लिए छुट्टी जरूरी”, जिनके बैकग्राउंड में गरम भाप उठती कॉफी साफ दिख रही थी।

बरसात में प्रकृति का हर कोना मानो प्रतीक बन जाता है। तेज़ बहाव वाली नालियांँ उस व्यवस्था का रूप ले लेती हैं, जो सबको अपने साथ बहा ले जाती है, चाहे कोई तैयार हो या न हो। पुल, जो बहकर चले जाते हैं, वे कमजोर नीतियों का रूपक हैं, जो पहले मौके पर टूट जाते हैं। और वह ऊंँचे-ऊंँचे पहाड़, जिन पर बादल टिक जाते हैं, वे उस जड़ मानसिकता का प्रतीक हैं, जिसे हिलाना मुश्किल है, चाहे कितनी ही बारिश क्यों न हो।

शाम होते-होते बादल हटे, लेकिन पहाड़ी रास्तों पर सड़कों पर गड्ढों में जमकर कीचड़ और पानी अपलोड हो गया और फिर कीचड़, फिसलन , धुंध और ठंड का साम्राज्य आ गया। बच्चे सोच रहे थे—काश कल भी बारिश हो, ताकि छुट्टी जारी रहे। शिक्षक सोच रहे थे—काश कल बच्चे आधे ही आएं ! और प्रशासन सोच रहा था—काश हर बरसात में हमें ‘तुरंत निर्णय’ लेने का अवसर मिले। यहांँ बरसात सिर्फ पानी नहीं थी, बल्कि एक आईना थी, जिसमें हर कोई अपनी असलियत देख रहा था।

यह दिन गांँव के लिए उत्सव भी था और आलस्य का पर्व भी। बच्चों ने इसे खेल में बदल दिया, शिक्षकों ने आराम में, और प्रशासन ने अपनी ‘सुरक्षा नीति’ में। बरसात ने सबको एक मंच पर ला खड़ा किया, जहांँ हर कोई अपने तरीके से छुट्टी का अर्थ समझा रहा था। अध्यापकगण इस दिन को “अनपेड वर्क-फ्रॉम-होम” मानकर आत्मचिंतन करते हैं—अगले हफ्ते का होमवर्क और भी ज्यादा कैसे दिया जाए।

बरसात में हर पात्र अपने प्रतीकात्मक रूप में था। बच्चे थे ‘स्वतंत्रता की नदियांँ’, जो हर दिशा में बहना चाहती थीं। शिक्षक थे ‘पहाड़ी देवदार’, जो अपनी जगह स्थिर रहकर भी मौसम का आनंद लेते थे। प्रशासन था ‘दूर का बादल’, जो गरजता ज्यादा और बरसता कम था। और गांँव का आम आदमी था ‘पगडंडी’, जिस पर सबका आना-जाना तो होता है, लेकिन उसका हाल पूछने वाला कोई नहीं।

बरसात ने दिखा दिया कि शिक्षा व्यवस्था चाहे कितनी भी आधुनिक हो जाए, इंटरनेट और स्मार्टफोन कितने भी पहुंँच जाएं, पहाड़ में छुट्टी का मतलब अब भी वही है, जो आजादी से पहिले था। कि आराम, पकौड़े, और खिड़की से बाहर बरसते पानी को देखना। यह भी तय है कि बरसात का यह प्रतीकात्मक खेल हर साल दोहराया जाएगा। प्रकृति अपनी भूमिका निभाएगी, और हम सब अपनी-अपनी पुरानी स्क्रिप्ट। फर्क बस इतना होगा कि फोटो अब और ज्यादा हाई-रेज़ॉल्यूशन में आएंगे, और ‘Rainy Day’ का हैशटैग और लंबा होगा।

बरसात यहांँ एक मौसम नहीं, बल्कि एक सामूहिक बहाना है—काम से बचने का, जिम्मेदारी टालने का और बचपन जीने का , और यही उसका सबसे सटीक, सबसे सजीव, और सबसे व्यंग्यात्मक रूप है। हालांकि प्रकृति हम सबकी कल्पनाओं से भी अधिक सुंदर है। बरसात एक उपमान।

मंगलवार, 12 अगस्त 2025

बादल, तुम्हारे फटने से…... ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 बादल, तुम्हारे फटने से…...

(धराली, उत्तर काशी की स्मृति में)

_________________________________________

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी  (उत्तराखंड प्रांत)


बादल, तुम इस कदर फटे कि मेरी ज़िंदगी के सारे कपड़े बेतहाशा फट गए

अब ऐसा कोई भी नहीं जो इन कपड़ों को फिर सी सके, 

और ऐसा कोई दिल नहीं जो मेरे आंँसुओं के वजन को समझ सके

तुमने पानी के साथ मेरे सपनों की छत भी बहा दी

मेरी हँसी का रंग भी धो डाला।


मैं अब मिट्टी के नीचे दब गया हूँ

एक ऐसी मिट्टी, जो कीचड़ और विशाल पत्थरों से मेरी सांँसों को दबोच चुकी है

क्या तुम देख सकते हो मेरे हिलते हुए हाथ

जो अब सिर्फ मदद की आखिरी पुकार हैं ? 

क्या तुम मेरी बुझती हुई सांँसों को लौटा सकते हो

ताकि मैं फिर से जीवन का आकाश देख सकूंँ ?


अगर तुम्हारे हृदय में करुणा बची है

तो मेरे इशारे को समझो और मुझे उठाओ

मुझे इस मलबे से बाहर निकालो

ताकि मैं फिर से खेत में हल चला सकूंँ

घर के चूल्हे में आग जला सकूंँ

और अपनी मांँ की आंँखों में नमी के बजाय चमक ला सकूंँ

क्योंकि बादल, पानी से जीवन भी बनता है

पर जब तुम फटते हो

तो जीवन का ताना-बाना भी बिखर जाता है

आंँखों से बरसात उतर आती है।


बादल, तुम इस तरह फटे कि मेरी ज़िंदगी का हर टुकड़ा बिखर गया

कपड़े फटे, पर उससे पहले मेरी उम्मीदों का सीवन टूट गया


मांँ की गोद में रखा अनाज बह गया

चूल्हे की आख़िरी आग ठंडी हो गई


मैं मिट्टी के नीचे दबा हूँ, सांँसें रुक-रुक कर रो रही हैं

कीचड़ और पत्थरों ने मेरे सीने का रास्ता बंद कर दिया है


क्या तुम्हें मेरे हिलते हुए हाथ दिख रहे हैं, बादल ?

ये हाथ अब सिर्फ मदद नहीं, आख़िरी विदाई के इशारे हैं


मेरी बुझती हुई सांँसें लौटाओ

ताकि मैं फिर से अपनी धरती को सींच सकूंँ

पानी से, पर मौत से नहीं।

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

शनिवार, 26 जुलाई 2025

विजय दिवस कारगिल - 26 जुलाई - डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 

विजय दिवस - कारगिल - 26 जुलाई 

🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

----------------------------------------------------------------

🇮🇳शहीदों को श्रद्धांजलि -

“जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुर्बानी…!!”


वीर सिपाही तुम्हें नमन

तुम भारतवर्ष के जीवन धन

शौर्य तुम्हारा अमर रहे 

नाम स्मृति में सदा रहे

नायक हो सरताज बनों

तुम भारत का ताज बनों 

अमर शहीद तुम्हें नमन 

गौरवशाली इतिहास तुम्हें नमन।

-----------------------------------------------------------------

🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

🇮🇳वीरता और विवेक - 

कारगिल विजय दिवस भारत में हर साल 26 जुलाई को मनाया जाता है। यह दिन 1999 में कारगिल युद्ध में भारत की विजय को दर्शाता है। इस दिन भारतीय सेना के उन वीर जवानों को श्रद्धांजलि दी जाती है जिन्होंने देश की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी।

🪖 कारगिल विजय दिवस -

कारगिल युद्ध मई 1999 से जुलाई 1999 तक चला था।

पाकिस्तान की सेना और घुसपैठियों ने भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ कर कुछ प्रमुख चोटियों पर कब्जा कर लिया था।

भारतीय सेना ने "ऑपरेशन विजय" चलाया और भारी संघर्ष के बाद 26 जुलाई 1999 को उन सभी इलाकों को पुनः प्राप्त कर लिया। इस संघर्ष में 500 से अधिक भारतीय सैनिक शहीद हुए।

🇮🇳 26 जुलाई का दिन -

शौर्य, पराक्रम और देशभक्ति की प्रतीक यह विजय भारत की सैन्य क्षमता और हौसले को दर्शाती है।

सैनिकों के बलिदान और समर्पण की याद दिलाता है।

स्कूल, कॉलेज, सेना कार्यालयों और शहीद स्मारकों पर झंडारोहण, भाषण, श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

🇮🇳 कारगिल युद्ध की महत्वपूर्ण बातें जो सभी देशवासियों को याद रहनी चाहिये -


1. युद्ध की अवधि -

कारगिल युद्ध मई 1999 से जुलाई 1999 तक चला।

यह युद्ध 26 जुलाई 1999 को भारत की विजय के साथ समाप्त हुआ। इसी दिन को "कारगिल विजय दिवस" के रूप में मनाया जाता है।

2. युद्ध का कारण -

पाकिस्तान के सैनिकों और आतंकवादियों ने भारतीय सीमा के अंदर कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ की थी।

उनका उद्देश्य था श्रीनगर-लेह राजमार्ग (NH1) को काटना और जम्मू-कश्मीर में अशांति फैलाना।

3. ऑपरेशन विजय -

भारतीय सेना ने “ऑपरेशन विजय” शुरू किया, जिसके अंतर्गत भारतीय क्षेत्र को फिर से अपने नियंत्रण में लिया गया।

यह भारत की सैन्य सफलता और शौर्य का प्रतीक बन गया।

4. भौगोलिक और प्राकृतिक कठिनाइयाँ -

यह युद्ध 16,000 से 18,000 फीट की ऊँचाई पर लड़ा गया।

कठोरतम मौसम, बर्फ और ऊँचाई के कारण यह युद्ध बेहद चुनौतीपूर्ण था।

5. बलिदान और क्षति - 

भारत के 527 से अधिक सैनिक शहीद हुए और लगभग 1300 घायल हुए।

पाकिस्तान की भी भारी हानि हुई, जिसे उसने आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया।

6. अंतरराष्ट्रीय समर्थन -

इस युद्ध में भारत को अंतरराष्ट्रीय समुदाय का समर्थन मिला, खासकर अमेरिका, फ्रांस और अन्य शक्तियों का।

पाकिस्तान को युद्ध विराम के लिए वैश्विक दबाव झेलना पड़ा।

7. ऑपरेशन सफ़ेद सागर -

भारतीय वायुसेना ने "ऑपरेशन सफ़ेद सागर" के तहत अहम भूमिका निभाई।

मिराज-2000 जैसे विमान दुश्मन की चौकियों पर हमला करने में उपयोग किए गए, लेकिन एलओसी पार नहीं की गई।

8. कैप्टन विक्रम बत्रा (परमवीर चक्र) -

"ये दिल माँगे मोर !" कैप्टन विक्रम बत्रा का जोश था यह स्लोगन। युद्ध के सबसे बहादुर योद्धाओं में से एक थे। उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

9. कारगिल युद्ध (1999) में 4 भारतीय सैनिकों को परमवीर चक्र, भारत का सर्वोच्च सैन्य सम्मान से सम्मानित किया गया। ये अमर और वीर सैनिक क्रमशः हैं -

1. कैप्टन विक्रम बत्रा (मरणोपरांत) – 13 जम्मू और कश्मीर राइफल्स

2. राइफलमैन संजय कुमार – 13 जम्मू और कश्मीर राइफल्स

3. ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव – 18 ग्रेनेडियर्स

4. लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय (मरणोपरांत) – 1/11 गोरखा राइफल्स

उपर्युक्त सभी ने अदम्य साहस, वीरता और राष्ट्र के प्रति सर्वोच्च बलिदान दिया। इनमें से दो सैनिकों को यह सम्मान मरणोपरांत मिला।

10. युद्ध का परिणाम - 

भारत ने लगभग सभी कब्ज़ा की गई चोटियों को पुनः प्राप्त किया।

यह युद्ध भारतीय सेना की शक्ति और संकल्प, शौर्य और पराक्रम का वैश्विक आधार बना।

11. युद्ध की विरासत - 

यह युद्ध भारत की सैन्य क्षमता, एकता और देशभक्ति का प्रतीक बन गया।

हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।

🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

वंदे मातरम् - जय हिन्द - जय भारत 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

मंगलवार, 8 जुलाई 2025

महात्मा गांँधी : साहित्य, समाज के मध्य शस्त्र-शास्त्र की भूमिका © डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 

महात्मा गांँधी : साहित्य, समाज के मध्य शस्त्र-शास्त्र की भूमिका 

डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


"शस्त्र शास्त्र से बढ़कर है या

शास्त्र शस्त्र से बढ़कर 

द्वंद्व सही है तब जब योद्धा 

अश्व शक्ति पर चढ़कर 

विजित लक्ष्य हासिल करता 

सम्मान राष्ट्र का शेष समर 

हो जाता फिर द्वंद्व अमर ।"


स्वरचित पंक्तियां किस बात की ओर इशारा करती हैं यह हमें समझना है। शस्त्र मानवता की रक्षा और शास्त्र मानवता के कल्याण हेतु आवश्यक है। व्यक्ति शास्त्र विद्या में निपुण है तब तक शस्त्र की क्या आवश्यकता भला । जीवन में शास्त्र शक्ति ही श्रेष्ठ वर्चस्व को स्थापित करने वाली होती है। हालांकि मानवता की रक्षा और सुरक्षा के लिए शस्त्र और शास्त्र दोनों का ही समन्वित समायोजन आवश्यक है। जीवन में हिंसा का कोई स्थान नहीं परंतु हिंसा फिर भी करनी पड़ती है। धर्म की रक्षा और मर्यादा की सुरक्षा के लिए हिंदू महाकाव्य रामायण और महाभारत दोनों का महत्वपूर्ण स्थान है। महाभारत और रामायण दोनों ही धर्म की स्थापना और साम्राज्य स्थापना के प्रबल प्रमाण है। हालांकि आधुनिक जगत शास्त्र विद्या को प्राथमिकता देता है। शस्त्र मानवता की वंशावलियों का विनाश करने वाले हैं। अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र इसका प्रमाण है। ब्रह्म विद्या मानवता का कल्याण करे ना की समग्र विनाश। वैश्विक जगत बड़े विकट समस्याओं से जूझ रहा है। इजरायल ईरान इसके प्रमाण है। भारत पाकिस्तान सर्जिकल स्ट्राइक और आतंकी हमले शांति और गौतम बुद्ध की परंपरा का देश कब तक शांत बैठेगा ? देश की सुरक्षा महत्वपूर्ण है। हिंसा किसको अच्छी लगती है । परंतु मर्यादा की स्थापना के लिए राक्षसों का वध करने के लिए हिंसा भी करना पड़ती है । जानवर को मारने के लिए जानवर बनना पड़ता है। साधारण और सरल भोले वाले गांँव के ग्रामीण को कूटनीतिक नेता बनना पड़ता है। योगी, महंतों , संतों और बाबाओं को देश चलाने के लिए, नेतृत्व देने के लिए आगे आना पड़ता है।


प्रिय सहृदय पाठकों मेरे अभिन्न मित्रों यह ध्यान रहे हमेशा कि अणुबम, हथियार अत्याधुनिक मिसाइलें मानवता की समाधि को निर्मित करने वाले हैं। भारत सामाजिक सद्भाव और मानवतावादी विचारधारा को लेकर चलने वाला देश है। हथियार देश की सुरक्षा और वैश्विक जगत के समक्ष भारतीय वर्चस्व को स्थापित करने के लिए निर्मित करना भी आवश्यक है। देश की प्रगति हथियारों से नहीं बल्कि बौद्धिक व्यक्तियों और व्यक्तित्व से होती है , साथ ही कुशल नेतृत्व से वैश्विक संदर्भ में विदेश नीतियां, कूटनीतियां स्थापित की जाती हैं । सत्य और अहिंसा हमेशा ही ईश्वरी शक्ति के रूप में मानवता की रक्षा करते हैं। भारतीय संस्कृति ज्ञान और परंपरा, चिंतन परंपरा को वैश्विक स्तर पर स्थापित करते हैं। गांधीजी इसी बात के प्रबल समर्थक थे। भारतीय जनमानस को यही बात वह अपने पूरे जीवन काल में समझाते रहे कि सत्य और अहिंसा का महत्व सर्वोपरि है। हालांकि कुछ अपवाद हर स्थान पर दिखते हैं। हर कोई व्यक्ति पूर्ण शत प्रतिशत सही नहीं होता । कुछ कमियां हर व्यक्ति में होती हैं । निर्णय लेने में और निर्णय देने में । फिर भी समग्र अवलोकन किया जाए तो गांधी जी हितकर ही होंगे ऐसा माना जा सकता है। जब हम गांधी जी की प्रशंसा करते हैं तो उनके समकालीन अन्य लोक नेताओं को भुलाया नहीं जा सकता। देश की आजादी और सामाजिक सद्भाव के लिए राष्ट्रीय आंदोलन के प्रत्येक कार्यकर्ता का अपना महत्वपूर्ण और अविष्करणीय योगदान है।


महात्मा गांँधी साहित्यिक दृष्टिकोण -

 गांँधी की साहित्यिक विचारधारा का मूल आधार सत्य, अहिंसा, आत्मशुद्धि, नैतिकता और मानवता रहा है। महात्मा गांँधी ना केवल एक राजनीतिक और आध्यात्मिक विचारक और नेता थे, बल्कि उनकी सोच और विचारों और दर्शन ने भारतीय साहित्यकारों और साहित्य को भी गहरे स्तर पर प्रभावित किया। गांँधी जी साहित्यिक कार्यक्रमों, सहृदयों और साहित्यकारों को नई दृष्टि और नये समसामयिक दृष्टिकोण से जोड़ते भी हैं। साथ ही युगबोध से प्रेरित और सामाजिक एकीकरण, समरूपता से समन्वित होकर स्वयं भी लेखन कार्य किया है और अनेक लेखकों को प्रेरित किया।

1. गांँधी जी का साहित्यिक योगदान

गांँधी जी का प्रमुख साहित्यिक योगदान उनके लेख, पत्र, आत्मकथा और भाषण हैं।

उनकी प्रसिद्ध पुस्तक "सत्य के प्रयोग" (The Story of My Experiments with Truth) एक आत्मकथात्मक कृति है, जो न केवल उनके जीवन की झलक देती है बल्कि उनके विचारों का दर्शन भी कराती है।

उनके संपादित पत्र ‘हरिजन’, ‘नवजीवन’ और ‘यंग इंडिया’ साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत मूल्यवान हैं।

2. गांँधी जी की साहित्यिक विचारधारा के प्रमुख तत्व

1- सत्य और अहिंसा का आदर्श – उनके लिए साहित्य एक साधना था, जो व्यक्ति को सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करे।

2 - सादा जीवन, उच्च विचार – उन्होंने सरल भाषा और शैली को अपनाया, जिससे आमजन तक विचार सरलता से पहुँच सकें।

3- रचनात्मक साहित्य का आग्रह – वे मानते थे कि साहित्य समाज का निर्माण करे, उसका विघटन नहीं।

4- नैतिकता और आत्मानुशासन – उनका साहित्य आत्मशुद्धि और आत्मसंयम पर बल देता है।


3. गांँधी जी और समकालीन साहित्यकार

गांधी जी की विचारधारा से प्रेरित होकर कई साहित्यकारों ने साहित्य सृजन किया, जैसे

मुंशी प्रेमचंद – उनके कई उपन्यासों में गांधीवादी विचारों की झलक मिलती है (जैसे "कर्मभूमि")

विनोबा भावे, जैनेन्द्र कुमार, राममनोहर लोहिया, कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी आदि पर भी गांधी का प्रभाव देखा जा सकता है।

4. गांँधी विचारधारा और हिंदी साहित्य

गांँधी जी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में महत्व दिया और हिंदी लेखन को प्रोत्साहित किया। हिंदी साहित्य में गांँधीवादी साहित्य एक अलग धारा के रूप में विकसित हुआ जिसमें रचनाकारों ने समाज सुधार, अस्पृश्यता निवारण, स्त्री सम्मान, ग्रामीण उत्थान जैसे विषयों को उठाया।

निष्कर्षत: महात्मा गांँधी की साहित्यिक विचारधारा केवल लेखन में नहीं, बल्कि उनके जीवन में भी अभिव्यक्त होती है। उनका साहित्यिक दृष्टिकोण मानवतावादी है जो सत्य, नैतिकता और सेवा पर आधारित है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि साहित्य केवल मनोरंजन या अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का सशक्त साधन हो सकता है।


महात्मा गांँधी और समाजवादी दृष्टिकोण -

महात्मा गांँधी की सामाजिक दृष्टि 'सर्वोदय' पर आधारित थी, अर्थात् सबका कल्याण और उत्थान। गांँधी जी ने अस्पृश्यता को अधर्म और अमानवीय बताया। गांँधी जी का सामाजिक दृष्टिकोण सत्य और अहिंसा पर केंद्रित है ।

शिक्षा-दृष्टि में सामाजिक सद्भावना, सेवा, श्रम, नैतिक शिक्षा , हस्तकला शिक्षा , नई तालीम को प्राथमिकता दी। महिलाओं को राष्ट्रसेवा और समाजसेवा से जोड़ने के लिए ग्राम स्वराज का संकल्प संदेश स्थापित किया। हर गाँव और हर ग्रामीण आत्म-निर्भर हो ऐसी व्यवस्था को मजबूत बनाने में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करना समाजिक धर्म समझा और लोक को समझाया।

निम्नलिखित विविध दृष्टिकोणों से समाजवादी विचारधारा को रेखांकित किया जा सकता है।


1. अस्पृश्यता निवारण और सामाजिक समानता 

2. सत्य और अहिंसा का समन्वित सिद्धांत

3. नारी जीवन सशक्तिकरण पर केंद्रित 

4. स्वदेशी और ग्राम स्वराज का सिद्धांत 

5. शिक्षा धर्म नैतिकतापूर्ण और सेवाकर्म 

6. धर्म और सहिष्णुतावादी दृष्टिकोण 

7. धार्मिक सहिष्णुता, भाई-चारा और सांप्रदायिक सौहार्द

8. सामाजिक समरसता और शांति की स्थापना 

 

कोशिश, प्रयास, संघर्ष और सकारात्मक दृष्टिकोण जीवन के साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और शास्त्र - शास्त्र की भूमिका को रेखांकित करते हुए मानव जीवन के लिए व्यापक फलक प्रदान करते हैं। मनुष्य को सकारात्मक दृष्टि से संघर्ष और प्रयास करते रहना चाहिए। 

"रात कितनी भी अंधेरी क्यों ना हो 

सुबह होना तो तय है 

सफ़र पूरा करना ही होगा हमको 

बेख़ौफ़ आंँखों में फिर किस बात का भय है।


एक घेरे में हम सभी टकराएंगे 

आज के छोटे बच्चे कल को देश चलाएंगे

आज के युवा कल को बूढ़े हो जाएंगे 

अधेड़ और बुजुर्ग दोनों कहांँ मिल पाएंगे 

कुछ सुबह को जाएंगे कुछ रात को जाएंगे

अपने-अपने समय से आएंगे और जाएंगे 

सफ़र पूरा करना ही होगा सबको अकारण भय है 

रात कितनी भी अंधेरी क्यों ना हो 

सुबह होना तो तय है ।"


स्वरचित कविता के साथ पुनः मिलूंगा !! आपके लिए इस आशा से, परंतु वचन दें कि आप विचारियेगा इस आलेख को ! कविता की पक्तियों को...

© डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


रविवार, 15 जून 2025

आज पितृ दिवस, फादर्स डे है 15 जून ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 *छात्र-छात्राओं के लिए आज विशेष रूप से महत्वपूर्ण पल---*

👆👆

*आज पितृ दिवस,  फादर्स डे है 15 जून* 


उस पिता को नमन/ सादर अभिवादन जिसने हमारी पढ़ाई लिखाई में मेहनत परिश्रम करके हमें रूपए पैसे दिए हैं।


उस पिता को नमन /सादर अभिवादन  जिसने फटे पुराने कपड़े पहन कर हमें अच्छे कपड़े और स्कूल, कॉलेज की ड्रेस उपलब्ध कराई है।


वह पिताजी शाम को दिन भर की थकान के बाद घर आता है कुछ ना कुछ अपने बच्चों के लिए हमेशा लेकर आता है ऐसे पिता को सादर अभिवादन 


ऐसे पिता को सादर अभिवादन जो बच्चों के  रात्रि खाने के बाद उनके कल के लिए स्कूल टिफिन भी तैयार करता है।


ऐसा पिता जो अपनी शिकायतों को अपने हृदय में ही रखता है और चुपचाप अपने गृहस्थ जीवन को बनाए रखना है। ऐसे पिता को सादर अभिवादन।


अपने बच्चों की हर जरूरत को पूरा करता है, चाहे उधार लेकर ही क्यों ना करें ! परंतु बच्चों की आंँखों की चमक को कभी कम नहीं होने देता..! ऐसे पिता के लिए जीवन का अंतिम सत्य है सुखी गृहस्थ जीवन को बनाए रखना।  ऐसे पिता को सादर अभिवादन।


ऐसे पिता को भी सादर अभिवादन जिसने मांँ के कर्तव्यों का निर्वहन पिता बनाकर आजीवन किया है।


उस माता-पिता को नमन / सादर अभिवादन जिसने कष्ट सहकर हमें हमारी पढ़ाई में दिन-रात जागकर जीवन भर परिश्रम किया है। उस पिता को नमन / सादर अभिवादन 


जिसने राष्ट्र पर मरना और राष्ट्र के लिए ही जीना सिखाया! 


हमें अपने माता-पिता पर गर्व करना चाहिए और आजीवन उनको अपने हृदय और मन से कभी भी दूर नहीं करना है। माता पिता धरती पर साक्षात ईश्वर हैं।


आज पितृ दिवस है वैसे तो माता-पिता के लिए सारी जिंदगी है। कोई एक दिन क्या भला.!  हम तो उनके ही अंश हैं फिर भी उनका स्मरण और साथ हमेशा रहे। 


अपने माता-पिता को हमेशा सहारा दें। पिता की खामोशी घर की मजबूती का आधार है । आप अपने पिता और माता के मजबूत आधार एवं स्तंभ बनें।

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

🙏🙏🙏

मंगलवार, 20 मई 2025

सहृदय कवि की काव्य यात्रा -©डॉ. चंद्रकांत तिवारी- उत्तराखंड प्रांत

 

सहृदय कवि की काव्य यात्रा -

कविवर श्री सुमित्रानंदन पंत 

*'कविता लिखने की पहली शर्त कवि-सहृदय होना है'!*

*मेरा प्रिय कवि- जिसकी सांसों में प्रकृति और संस्कृति के हजार बिंब उभरे हैं। नदी , झरनें, पोखर, तालाब, फ़ूल, पत्ते, वृक्ष, लताएं एवं प्राकृतिक गतिविधियों की विविध भंगिमाओं एवं नाना प्रकार से सहेजने का भाव साधारण व्यक्ति को भी प्रकृति से जोड़ता है। प्रकृति पुरुष और माँ दोनों रूपों में कवि की सूक्ष्म कल्पना को, जीव-जगत की रहस्यमयी धुंध की ओर नया प्रवेश कराती है। कविता लिखना सहृदय होना है। सहृदय वही होगा जो अपने आस-पास के परिवेश से सृजनात्मकता, सरलता और सहृदयता से जुड़ा हुआ होगा। कविता कवि हृदय से सहृदय तक की भावात्मक अभिव्यक्ति की अनूभूति का साधारणीकृत आधार है। अर्थात साधारणीकरण। एक की अनूभूति सबकी अभिव्यक्ति, सबकी अभिव्यक्ति एक की अनूभूति। अर्थात भावनात्मक स्पर्श और कवि मन की कल्पना, रहस्य और यथार्थ।


------* ऐसे प्रिय प्रकृति के चितेरे कविवर श्री सुमित्रानंदन पंत - प्रकृति के सुकुमार कवि को उनके *जन्मदिन 20 मई पर याद करते हुए.. स्मृति शेष......*


©डॉ. चंद्रकांत तिवारी- उत्तराखंड प्रांत 

'कविता लिखने की पहली शर्त कवि का सहृदय होना है' एक ऐसा कवि जो युग दृष्टा और युग सृष्टा हो। जिसकी कविताओं में जीवन की सच्ची तस्वीर उभरती हो। जिसके अक्षर परस्पर अपने समकक्ष शब्दों से बातें करते हों और एक पूर्ण सार्थक काव्यमय पंक्ति का निर्माण करते हुए सार्थक ध्वनि संकेतों को भी प्रकट करते हों। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि ऐसे कवि की रचना में जीवन का संगीत रस घोलता है और शब्द चित्रों के रेखाचित्र चित्रकाव्य का सृजन कर रहे होते हैं।


'कविता लिखने की पहली शर्त कवि सहृदय होना है' यह उतना ही सार्थक और प्रासंगिक है जितना कवि होने के लिए सहृदय होना। जीवन के यथार्थ दृश्यों को हम किस रूप में देखते हैं, किस रूप में महसूस करते हैं, महसूस करने के बाद क्या हम उन साक्षात दृश्यों/वस्तुओं से अपनेपन का लगाव रख पाते हैं? ऐसा लगाव जो हमें बार-बार अपनी ओर आकर्षित करता हो। हमारे मन की रिक्तता को पूर्ण करता हो। हमारे जीवन के अवकाश को इंद्रधनुषी रंगों से भर देता हो। हमारी विषम और कठिन बनती जा रही जीवनशैली को सरल और सहज बना देता हो। हमारी कम पड़ती श्वांसों के मध्य रक्त का संचार करता हुआ जीवन की लालिमा के नए दृश्यों को उभरता हो। यह संभव है कि हम अंतिम स्पंदन तक स्वयं से ही संघर्ष कर रहे होते हैं परंतु जो प्रकृति हमने अपने लिए निर्मित की है वह एक ऐसी दुनिया है जो दो सगे-संबंधियों के अकेलेपन से भरी हुई है। जैसे जीवन का संगीत रिक्त हो गया है जीवन की तलाश में भटकता हुआ कवि हृदय शून्य की परिधि पर घूम रहा हो। स्वयं के प्रश्नों में ही उत्तर को तलाश कर रहा हो। कवि हृदय कई सौ हृदयों का समुच्चय है। उसकी अभिव्यंजना और अभिव्यक्ति से पहले उसकी देखने की शक्ति स्पर्श और गंध के अनुभवों का साक्षात् बिंम होती है। हवाओं में तैरता हुआ संगीत कवि की सांसों में घुलमिल कर साकार हो जाता है। यह सब एकांत की वीणा से निकला हुआ नादमय संगीत है। जीवन का वास्तविक जयघोष है। यही पर्वतीय जनमानस की लोक संस्कृति का उत्थान मंच है। यही मानवता की जन्मभूमि की विकास यात्रा का अंतिम और प्रारंभिक प्रस्थान बिंदु है। 


अपार रज किरणों को समेटे जीवन की हरियाली और नैसर्गिक सुंदरता की अभीष्ट वन-संपदाओं को लुटाता हुआ यौवन का संगीत प्रकृति के इस अभूतपूर्व क्षणों का अनुकरण करता हुआ, कलम के उतार-चढ़ाव से यथार्थ के अनुभवों को शब्दबद्ध करता हुआ, काव्य के चित्रों को साकार करता है। यह कोई साधारण नहीं असाधारण कवि हृदय ही हो सकता है। ऐसा कभी हृदय जिसके सामने कविता नतमस्तक होकर पूर्ण विनम्रता से आग्रहपूर्वक उसकी कलम की नोंक पर बार-बार स्याही संग भीगती-उतरती और श्वेत पत्रों की सैय्या पर किसी शिल्पी की वास्तुकला को जीवंत कर जाती है। ऐसा कभी हृदय प्रकृति में बीज रूप होता है जहां उसकी दृष्टि पड़ती है वही स्थान नव-अंकुरण से पल्लवित और पुष्पित हो उठता है।


हांँ 'कविता लिखने के लिए कवि हृदय का सहृदय होना पहली शर्त है'। ऐसा कभी हृदय जो प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित कर ले। 


कवि श्री सुमित्रानंदन पंत प्रकृति की गोद में पले-बढ़े और प्रकृति ही जिनकी जीवन भर साहचरी बनी रही। इसकी नैसर्गिक सुंदरता के समक्ष अन्य कोई सुंदरता उन्हें कभी आकर्षित न कर पाई। ऐसा कवि हृदय उत्तराखंड राज्य के कौसानी नामक स्थान में जन्मा । हिंदी साहित्य और संपूर्ण साहित्य प्रेमी इस बात से हमेशा ही गौरवान्वित महसूस करते हैं कि आधुनिक हिंदी कविता के क्षेत्र में छायावादी युग के सशक्त कवि श्री सुमित्रानंदन पंत जी प्रकृति के सुकुमार कवि होते हुए साहित्य की विभिन्न धाराओं के साथ क्रमिक विकास लिए हुए बढ़ते रहे। इन्होंने अपना संपूर्ण जीवन प्रकृति की रहस्यमई दुनिया को खोजने में व्यतीत किया। अपने समकक्ष छायावादी कवियों में प्रसाद, निराला, महादेवी वर्मा के बीच कविवर पंत जी सब के चितेरे बने रहे और उस दौर के अन्य साहित्यकारों के बीच भी अपनी लोकप्रियता बनाए रखने में हमेशा ही सक्रिय बने रहे।


कविवर पंत की कई रचनाएं समय-समय पर प्रकाशित होती रही। परंतु उनकी छायावादी रचनाओं में प्रकृति के साथ जो अपनापन या अपना होने का भाव दिखता है वह एक पर्वतीय अंचल के नवयुवक को इस नैसर्गिक सुंदरता के प्रति आकर्षित करता है। साथ ही पर्यावरण प्रेमी के रूप में भी मुखरित करता है। 


सच्चे अर्थों में कविवर पंत जी पर्यावरण के प्रति कहीं अधिक भावुक व्यक्ति थे। उनका यह नजरिया ही उन्हें प्रकृति के और नजदीक ले गया। उनकी कविताओं का केंद्र भी प्रकृति ही बनी रही। कह सकते हैं कि कविवर पंत जी ने उस असीम सत्ता की तलाश प्रकृति के रहस्यों में खोजने की कोशिश की। कविवर पंत जी का ईश्वर प्रकृति में ही कहीं बसता है। कभी वह प्रथम रश्मि की किरणों के रूप में विचरण करता है, तो कभी मौन निमंत्रण-सा देता हुआ अंजाना-सा मोह पैदा करता हुआ प्रकृति के ताल-तलैयों में नौका-विहार करता है। पंत जी की प्रकृति परिवर्तन की अपार संभावनाओं का केंद्र बिंदु रही है। परंतु उसका स्रोत एक ही है। निस्संदेह परिवर्तन एक क्रमिक विकास है। काव्य की यात्रा के संदर्भ में भी, कवि की यात्रा के संदर्भ में भी, कविता की यात्रा के संदर्भ में भी और मानवता की विकास यात्रा के संदर्भ में भी। इन सभी उपर्युक्त बिंदुओं को कविवर पंत जी ने परिवर्तन कविता में वाणी दी है।


कविवर पंत जी के जन्मदिन को हमें पर्यावरण संरक्षण के रूप में मनाना चाहिए। विश्वविद्यालय स्तर पर, महाविद्यालय स्तर पर और विद्यालय स्तर पर हमें इस दिन अधिक से अधिक वृक्षारोपण करके प्रायोगिक शिक्षण के रूप को साकार करना चाहिए। आज वर्तमान संदर्भों में वृक्षों का कितना महत्व है, यह इस महामारी के बीच हम सबका ध्यान आकर्षित करता है।


जीवन प्रकृति से है। हमें इस बात का ध्यान रखना होगा। हमें प्रकृति को अपने मन के भीतर सहेजने का प्रयास करना चाहिए। अगर प्रकृति हरी-भरी रहेगी तो जीवन खुशहाल रहेगा। प्रकृति के रंग जीवन के रंगों से मिलकर आनंद की विकास यात्रा में सहायक होंगे। हमें पर्यटक बनने से पहले प्रकृति प्रेमी बनना होगा। हमें प्राकृतिक संपदा को संरक्षित रखने के लिए मिशन के रूप में कार्य करना होगा। तभी हम कविवर श्री सुमित्रानंदन पंत जी को सच्चे अर्थों में नमन कर पायेंगे। सच्चे अर्थों में अपनी स्मृति में बसाए रख पायेंगे।

सोमवार, 19 मई 2025

अध्यात्म और अध्ययन - ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 *अध्यात्म और अध्ययन* 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

------------------------------------------------

आकाशे मुखि औंधा कुवाँ, 

पाताले पनिहारी । 

ताका पानी कौउ हँसा पीवै, 

विरला आदि विचारी ।। 


------------------------------------------------

निर्गुणियांँ कबीर साहब की उलटबांसी आध्यात्मिक सत्य ज्ञान का अजस्र स्रोत है।

प्रयोगधर्मी अज्ञेय की असाध्यवीणा के झंकार की तरह भीतर से बाहर की प्रकृति एवं ऊर्जा से तादात्म्य स्थापित करना, मधुमति भूमिका में योगी की आध्यात्मिक महामाया, भक्तिमय शक्ति से स्वयं को परिशोधित एवं साधने की कला में निपुण आकर्षक चरित्र वाला ही , "आकाश में मुख वाला, उलटा कुआँ, पाताल में पानी भरने वाला।" उक्ति की स्थिति को समझ सकता है। प्रतिभावान कवियों की अनुभूति से मिलने वाला जीवन रस सहृदय पाठक को साधारणीकृत तभी कर पता है जब वह योगी की मधुमती भूमिका से संबंधित होता है। साधारणीकरण नैसर्गिक मूल प्रवृत्ति है। यह भीतर से बाहर की आध्यात्मिक शक्ति ही है। यहांँ आध्यात्मिक शक्ति का बहुत गहरा दृष्टांत है कि "आकाशे मुखि औंधा कुआँ, पाताले पनिहारि" ..!


नोट - जिस प्रकार कक्षा-कक्ष शिक्षण को फ्लिप्ड लर्निंग द्वारा अर्थात पलटकर शिक्षण की पद्धति में नवीनतम अनुप्रयोग स्थापित कर सीखने में मदद एवं सुधार होता है ठीक उसी तरह हमें अपनी सोच को उलटना होगा, अपने भीतर की ओर ध्यान केंद्रित करना होगा और बाहरी दुनिया की मोह, माया, लोभ, स्वार्थ से दूर रहना होगा। कठिन तो है यह सब पर नामुमकिन नहीं। यह भावबोध से आध्यात्मबोध की यात्रा है। इतनी भी सरल नहीं।


मंगलमय जीवन पथ🙏🕉️

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

गुरुवार, 24 अप्रैल 2025

सत्संग और लोकजीवन - ©डॉ.चंद्रकांत तिवारी

 -: सत्संग और लोकजीवन :-

©डॉ.चंद्रकांत तिवारी 


बिनु सत्संग विवेक न होई

राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।

सतसंगत मुद मंगल मूला

सोई फल सिधि सब साधन फूला।


सूक्ति सागर श्रीरामचरितमानस की यह चौपाई बताती है कि सत्संग के बिना विवेक नहीं प्राप्त हो सकता है, और भगवान राम की कृपा के बिना सत्संग की प्राप्ति भी नहीं हो सकती है। अर्थात श्रीराम जी की कृपा के बिना सत्संग सहज में मिलता भी नहीं है।


सत्संग ठीक वैसा ही है कि जैसे जो मंगल और सुख की जड़ है और सभी साधनों की सफलता का फल है। वह सब सत्संग का फल है। यह चौपाई सत्संग के महत्व को दर्शाती है। जो जीवन का मूलाधार है।


जीवन में सदगुरु का मिलना, सच्चे मित्र, मार्गदर्शन देने वाले पथ-प्रदर्शक, ईमानदार चरित्र माता-पिता सभी बालक रूपी मिट्टी को आकार और साकार बनाते हैं।

सत्संग की पहली गति यही है। क्योंकि 

   सत्संग के बिना ना विवेक मिलता है और ना ही विवेक का फल। सभी का मूलाधार चक्र श्री राम की भक्ति में ही संभव है।

मंगलवार, 15 अप्रैल 2025

अंबेडकरवादी विचारों की प्रासंगिकता ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 अंबेडकरवादी विचारों की प्रासंगिकता 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

------------------------------------------------------

 डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर (1891-1956), जिन्हें बाबा साहेब के नाम से भी जाना जाता है। कोई भी शिक्षित और जन सरोकारों से जुड़ा हुआ व्यक्ति बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के विचारों से प्रभावित होगा और आत्मिक रूप से जुड़ जाएगा अगर समाज का सच्चा हितैषी होगा।

एक शिक्षक के रूप में जितना भी हम पढ़ते हैं और सुनते हैं उनके विचारों और लेखन ने जीवन में कई  बार प्रभावित किया है। डॉ. अंबेडकर न केवल अपने समय से आगे थे, बल्कि कई मायनों में वे हमारे समय से भी आगे दिखाई देते हैं। 

आत्ममंथन और विचारें अग्रेषित संदेश तर्कशील प्रश्न --



 1- क्या बाबा साहेब के योगदान को हम आज भूल गए हैं क्या आज ?

2- क्या बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर आज पहले से भी अधिक प्रासंगिक और महत्वपूर्ण नहीं है ?

3- अंबेडकर जी के मौलिक विचार जो समाज में परिवर्तन लाना चाहते थे, क्या हम उनके सहभागी बन पा रहे हैं ?

4- क्या देश उनके योगदान को वैश्विक दौड़ में भूलता जा रहा है  ? या भूल गया है ?  इस पर विचार कौन करेगा ?

5- जीवन जीने के लिए सामाजिक समरसता और सरलता कितनी आवश्यक है ?  यह वर्षों पहले अंबेडकर जी द्वारा भावी जनसमाज को बताया गया था।  जिसका लिखित दस्तावेज संविधान के रूप में हमारे समक्ष है। क्या हम इस तर्क से वाकिफ हैं ?

6 हम बाबासाहेब के किस परिचय को जानते हैं? जो इस देश के डीएनए में उनके योगदान को नहीं समझ सकें या फिर जो उनके जीवन उत्सर्ग को नहीं समझ सके ?


7- क्या आप बासाहेब को दूरदर्शी, भारतीय न्यायविद, समाज सुधारक, अर्थशास्त्री और भारतीय संविधान के मुख्य वास्तुकार के रूप में जानते होंगे ?

8- या फिर क्या वह किन इन सबसे बढ़कर, किसी भी तरह के उत्पीड़न के निडर आलोचक थे ?

9 - या दलित परिवार में जन्में, उन्हें गंभीर सामाजिक भेदभाव और बहिष्कार का सामना करना पड़ा ?

खैर इन चुनौतियों के बावजूद, बाबासाहेब की शैक्षणिक प्रतिभा ने उनके लिए दृढ़ संकल्प के साथ उच्च शिक्षा प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त किया।


शिक्षा और डॉ॰ भीमराव अंबेडकर -- 

डॉ॰ भीमराव अंबेडकर के शिक्षा सिद्धांतों में समावेशी शिक्षा, सामाजिक समरसता और न्याय, और लोकतांत्रिक मूल्यों का पोषणयुक्त जीवन शामिल था। वे शिक्षा को मानव के सर्वांगीण विकास का साधन मानते थे। उनके मुताबिक, शिक्षा के ज़रिए समाज में चरित्रवान और शिक्षित लोग आ सकते हैं। 

समाज को सकारात्मक दिशा देने में डॉ॰ अंबेडकर के शिक्षा सिद्धांतों का सार कुछ इस प्रकार मूल्यांकित किया जा सकता है ---


1- शिक्षा के ज़रिए सामाजिक न्याय समरसता को बढ़ावा देना पहली प्राथमिकता हो।
2- समाज की मुख्यधारा में शामिल करते हुए हाशिये पर पड़े समुदायों को सशक्त बनाना जरूरी है।
3- समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देना ।
4- लोकतांत्रिक मूल्यों का पोषण करना प्रत्येक व्यक्ति का धर्म है।
5- शिक्षा के ज़रिए समग्र विकास करना प्रथम कर्तव्य होना चाहिए।
6 सामाजिक चरित्र को महत्व देना चाहिए 
7- प्रत्येक छात्र को मातृभाषा में शिक्षा देना पहली प्राथमिकता।
8- हर छात्र को कम से कम एक विदेशी भाषा का ज्ञान होना ज़रूरी
9- शिक्षक को छात्र के समग्र विकास के लिए ज़रूरी माना जाए।
10- शिक्षकों की योग्यता और क्षमताओं की जांच करनी चाहिए।
11- प्रत्येक व्यक्ति को पर्यावरण और पर्यावरण संरक्षण के प्रति संवेदनशीलता होनी चाहिए।


निजी जीवन के दिशा-निर्देश ---


सामाजिक हितार्थ एवं सरोकारों के लिए यह अतिरिक्त विषय बन गया कि उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अंबेडकर ने अपना जीवन जाति-आधारित भेदभाव से लड़ने और हाशिए पर पड़े लोगों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए समर्पित कर दिया। उनका मानना था कि भारत की प्रगति के लिए सामाजिक समानता और न्याय आवश्यक है। 

भारतीय संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में, उन्होंने मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित करने वाले कानून बनाने, अस्पृश्यता को समाप्त करने और भारतीय संविधान की आत्मा में समानता, न्याय और मनुष्यों की गरिमा को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अपने कानूनी और राजनीतिक कार्यों के अलावा, अंबेडकर शिक्षा, श्रम अधिकारों और लैंगिक समानता के प्रबल समर्थक थे, उन्होंने विरासत और संपत्ति में महिलाओं के लिए समान अधिकार सुनिश्चित किए। हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था से निराश होकर, उन्होंने 1956 में लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया, जिससे दलित बौद्ध आंदोलन की शुरुआत हुई।

डॉ. अंबेडकर की विरासत भारत और उसके बाहर सामाजिक न्याय और समानता के लिए आंदोलनों को प्रेरित करती रही है। उन्हें न केवल एक प्रतिभाशाली विद्वान और सुधारक के रूप में याद किया जाता है, बल्कि लचीलेपन के प्रतीक और मानवीय गरिमा के लिए एक अथक योद्धा के रूप में भी याद किया जाता है।

पढ़-लिखकर शिक्षा से संपन्न अंबेडकर ने धोती और लंगोट को छोड़ कर कोट पैंट पहन लिया। गांधीजी ने अंग्रेज़ी कपड़ों को छोड़कर समाजसेवी बन धोती और लंगोट पहन लिया। दोनों का अपना-अपना धर्म-कर्म।

वोट के निजी स्वार्थ में अंबेडकर को हमारे स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए कि नहीं विचारें। अंबेडकर गांधी के उतने ही कड़े आलोचक थे जितनी उस दौर की वर्तमान व्यवस्था थी । जिससे गांधी और नेहरू के चाटुकार और धार्मिक पंथी दोनों नाराज थे।

इस बात में कोई शक नहीं रह जाता कि उन्होंने समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के बौद्ध आदर्शों में निहित राष्ट्र का सपना देखा था। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम इस महान व्यक्ति के कार्यों को पढ़ें और महात्मा गांधी के साथ-साथ जाति व्यवस्था के साथ उनके झगड़ों को समझें।

अंबेडकर जी के कुछ जीवन सूक्ति वाक्य जीवन की प्रासंगिकता और जीवन जीने के सामर्थ्य को प्रस्तुत करते हैं।  आज के समय में अंबेडकर के ये शब्द बहुत ईमानदार और विवादास्पद लग सकते हैं। अगर हम ईमानदारी से इन जीवन सूक्तियों और कथन वाक्यों को पढ़ें तो जीवन को एक नई दिशा भी मिल सकती है परन्तु निष्पक्ष और ईमानदार होकर ---

1- गरीबी का मतलब पैसे की कमी नहीं बल्कि ताकत की कमी है।

2- मैं किसी समुदाय की प्रगति को महिलाओं की प्रगति के स्तर से मापता हूँ।

3- मन की खेती मानव अस्तित्व का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए।

4- अगर मुझे संविधान का दुरुपयोग होता हुआ दिखाई दे, तो मैं उसे जलाने वाला पहला व्यक्ति होऊंगा।


©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

शनिवार, 29 मार्च 2025

स्वधर्म साक्षात्कार - ©डॉ.चंद्रकांत तिवारी

 स्वधर्म साक्षात्कार

©डॉ.चंद्रकांत तिवारी 

--------------------------------------------------

ईश्वर ने दुनिया वैसी ही बनाई है जैसी हम सोचते हैं। हर व्यक्ति को उसकी सोच के अनुरूप ही लोग मिलते हैं। व्यक्ति जैसा सोचता है, जैसा महसूस करता है, परिणाम भी सोच के अनुरूप बनते रहते हैं। जिसकी भावना जैसी होती है । ईश्वर भी वही रूप दिखाते हैं। 


इस संसार में हमारा जीवन हमारी सोच के अनुसार ही दिखाई देता है। जैसी दृष्टि वैसी ही सृष्टि दिखाई देगी।


"नज़र कुछ कहती है 

नज़रिया कुछ कहता है 

कभी-कभी चुपचाप रहकर 

अनुभव भी कुछ कहता है।"


परंतु जागरूक, सतर्क, पूर्व अनुभव 

के साथ-साथ समयानुसार चलना भी जरूरी है। लेकिन आत्मविश्वास बनाए रखेंगे तो कोशिश एवं प्रयास सार्थक होंगे।


गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस की चौपाई में कहा भी है कि...

'जाकी रही भावना जैसी,

 प्रभु मूरत देखी तिन तैसी'।'


आत्ममुग्धता से अधिक आत्ममंथन 

व्यक्ति एवं व्यक्तित्व को परिवार एवं समाज को निखारने एवं परखने में सहायक होगा । सकारात्मक सोच के साथ जागरूकता एवं सतर्कता भी मुश्किलों से बचाती है। विश्वास ठीक है। अन्धविश्वास से अधिक आत्मविश्वास अतिआवश्यक है। गलतियांँ ऐसी भी ना हों कि स्व-चरित्र दूषित हो जाए। स्वधर्म, स्वचरित्र और स्व-कर्म नैतिकता का आधार बनें यह प्रयास ही जीवन की गति निर्धारित एवं नियंत्रित करता रहे तो भी ठीक है।


फिर भी विचारणीय विषय यह कि अपनी नज़र और नज़रिया ही लक्ष्य की ओर ले जाता है।


जिसमें ताप लगेगी वह पिघलता है और बहता है। ऊंचे हिमालय के शिखर ताप से तप्त होकर भी जब धारा में परिवर्तित हो जाते हैं तो भी अपनी शीतलता नहीं खोते।

स्वधर्म, स्वचरित्र और स्व-कर्म नैतिकता मर्यादित बना रहे यही संघर्षों का अंतिम संस्कार और परम्पराओं का प्रारंभिक विकास एवं जीवन का दार्शनिक अनुभव है।

नदी की धारा अपना मार्ग तय करती है और स्वधर्म, स्वचरित्र एवं स्व-कर्म चेतना उसकी गति निर्धारित करती चलती है।


पढ़ें, विचारें, अग्रेषित कर अनुभव करें !!


©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

उत्तराखंड प्रांत

शनिवार, 15 मार्च 2025

🌹फूलदेई - लोक पर्व के बहाने🌹 ©डॉ.चंद्रकांत तिवारी

🌹फूलदेई - लोक पर्व के बहाने🌹- १५ मार्च २०२५ (15 March 2025)🌹-

---------------------------------------------------

उत्तराखंड की लोक संस्कृति का प्राकृतिक पर्व - प्राकृतिक रंगों के संग_*


🌹होली के रंगों में प्राकृतिक रंगों को ना भूलें🌹

---------------------------------------------------

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

उत्तराखंड प्रांत 

---------------------------------------------------

फूलदेई पर्व के दिन बच्चों की मित्र-मंडली थाली को सजाकर उसमें फूल, चावल, गुड़, मिठाई रखकर अपनी बिरादरी और आस-पास के घरों में या अपने क्षेत्र के पूरे गांव में, आसपास घरों में जाकर मुख्य दरवाजे की दहलीज़ पर फूलदेई खेलते हैं अर्थात देहली पर अक्षत और फूल फेंकते हैं और घरों की खुशहाली, शुभ मंगलमय की कामना करते हैं । इस पूरी रस्म के दौरान वे लोकगीत गाते हुए आनंद और खुशी से जितना दोगे उतना ही सही कथन वाक्य को दोहराते हैं। बड़ों को प्रणाम कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। आदर्श चरित्र की निर्माण प्रक्रिया में यह महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय पर्व है।


बच्चों की मित्र-मंडली को सभी लोग खुशी-खुशी चावल, मिठाई, फल, टॉफी और गुड़ के साथ भेंट में रुपये भी देते हैं। कहना ना होगा कि अब पहले के मुकाबले इस पर्व के प्रति बच्चों और बड़ों में अपनापन थोड़ा कम होता जा रहा है । लोग अपने लोक पर्वों को भूल रहे हैं या उन्हें अब यह पर्व महत्वहीन लग रहा है। जिस गांव में लोग पहले स्वयं अपने किशोरावस्था में खुशी-खुशी इस पर्व को खेलते थे, वहीं आज उन्हें समय के साथ-साथ महत्वहीन लगने लगा है। 


बहुसंस्कृति और बढ़ती हुई भूमंडलीकरण की प्रतिस्पर्धा की दौड़ में लोग अपनी जड़ों से पलायन कर रहे हैं । अपने लोक पर्वों से पलायन कर रहे हैं । अपनी लोक संस्कृति से पलायन कर रहे हैं। अपने घर-गांव से पलायन कर रहे हैं। अपनी नैतिकता एवं आचरण की मूल्यपरकता से पलायन कर रहे हैं। स्थिति बहुत ठीक नहीं है ऐसा वह भी मानते हैं जों लोक पर्व को विस्मृत एवं भूल बैठे हैं या याद नहीं करना चाहते। हो सकता है इस कार्य के लिए उनके पास समय शेष ना बचा हो। व्यस्तता ने व्यक्ति की नैतिक मर्यादा, आत्मिक चेतना, स्वच्छंदता, हंसी-खुशी एवं अपनापन, सरलता एवं खुलापन, बोलने की कला व्यवहारिक जीवन कौशल, रिश्ते-नाते सभी में बदलाव कर दिया है। साहब यह भूमंडलीकरण की दौड़ है जहां प्रसन्नचित चेहरे के भीतर भी एक चेहरा छुपा हुआ है। जो न हंसता है, न बोलता है। केवल बिंम मात्र है। शीशे के भीतर प्रतिबिंबित दृश्य।



 किसी जमाने में बच्चों को इस दिन का बेसब्री से इंतजार होता था। बच्चे स्कूल में भी एक दूसरे के ऊपर फूलों से खेल लिया करते थे। परंतु आधुनिकता और परंपरा के मध्य का सेतु थोथी नैतिकता की समाजिकता का शिकार बन गया और हमने लोक पर्व को ही नहीं खोया बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत का भी गहरा नुकसान कर दिया। आजकल के बच्चे मोबाइल में गेम खेलने या फिर अपनी पढ़ाई में इतने व्यस्त रहते हैं कि वे लोकपर्वों के महत्व से वंचित हो चुके हैं और ऐसे पर्वों को पिछड़ेपन के प्रतीक के रूप में देखने लगे हैं।



हालांकि बसंत ऋतु के आगमन पर फूलदेई का त्यौहार मनाया जाता है। फूलदेई के लिए बच्चे एक दिन पहले से ही रंग-बिरंगे फूल तोड़कर ले आते थे । उसे टोकरी या फिर थाली में चावल लेकर सभी के घरों में फूलदेई के लिए जाते थे । इसके बाद उन्हें चावल, गुड़, टॉफी या फल रुपये दिए जाते थे । बच्चे जब फूलदेई को आते थे, तो वह फूलदेई का गीत भी गाते थे,  

जैसे - 


‘फूलदेई छम्मा देई, दैणी द्वार भर भकार’।


'फूलदेई छम्मा देई, जतुक देय्ला उतुक सई'।



इस पर्व के प्रति बच्चों में काफी उत्साह देखने को मिलता था पर अब शायद....!!


मैं बचपन से ही फूलदेई मनाता रहा हूंँ । आज किसी बच्चे को अगर फूलदेई मनाते देखाता हूंँ तो स्वयं को पुरानी स्मृति से जोड़ पाता हूंँ। स्मृति पद-चिन्ह लौटते ज़रूर हैं।



इस दिन के आनंद का इंतजार एक वर्ष से करता रहा हूंँ । परंतु अब शायद लोगों के और अपने रिश्तेदारों के घरों में ना जाकर देवी-देवता के मंदिर में पुष्प अर्पित कर मन ही मन अभी भी कहता हूंँ कि.....👇


'फूलदेई छम्मा देई, दैणी द्वार भर भकार’।


'फूलदेई छम्मा देई, जतुक देय्ला उतुक सई'।



आत्म मंथन भी जरूरी है...👇


क्या हमें अपने लोक पर्व को बाजार की संस्कृति और लोगों के हृदय से नहीं जोड़ना चाहिए ?


क्या हमें ऐसे लोक पर्वों के दिन सांस्कृतिक उत्सव और मित्र-मंडली के साथ कुछ पल समय व्यतीत नहीं करना चाहिए ?


क्या हमें इस दिन छोटे बच्चों और किशोरावस्था के नवयुवकों को मिठाई और फल या फिर मार्गदर्शन या आपसी सद्भाव नहीं देना चाहिए ?


यह लोक पर्व रचनात्मकता एवं सृजनात्मकता का प्रतीक है।


लोक की संस्कृति और संस्कृति का लोक भविष्य का उज्ज्वल आलोक है।


भक्ति, श्रद्धा, अपनत्व एवं सहजता सभी सहृदयता के प्रतीक चिन्ह हैं।


नैसर्गिक प्रवृति के लिए कागज के पुष्पों की नहीं अपितु प्रकृति के प्रांगण के पुष्पों की आवश्यकता है। 


प्रकृति उपहार एवं असंख्य आकर्षणों और रंगों से भरी हुई है। प्राकृतिक रंगों को हृदय में धारण करना चाहिए कि कृत्रिम रंगों को ? 


गतिशील समृद्ध विचारशक्ति जगाने की आवश्यकता है कि नहीं विचारें...!


ऐसे कई महत्वपूर्ण बिंदु हैं जिस पर विचार-मंथन की आवश्यकता है। निर्णय परिपक्वता से बनेगा तभी दीर्घ काल तक चलेगा.!


हम अगर अपने लोक पर्वों की रक्षा करेंगे तो लोक पर्व हमारी संस्कृति और धर्म की रक्षा करेंगे। हमारे लोगों की रक्षा करेंगे।

इंसान को इंसान बनाए रखेंगे। 


स्वार्थ की प्रीति कहांँ तक उचित है विचारें ..!!

---------------------------------------------------