दो पदों के बीच (कविता)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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'दो पदों के बीच' केवल चलने की क्रिया का दृश्य नहीं, बल्कि मनुष्य के समूचे अस्तित्व का एक सूक्ष्म रूपक है। यह कविता बताती है कि जीवन की यात्रा आगे और पीछे के संघर्ष से अधिक, उनके बीच उपस्थित उस अदृश्य संतुलन की यात्रा है जहाँ समय, स्मृति, संभावना और परिवर्तन एक साथ साँस लेते हैं। प्रकृति का प्रत्येक तत्व—लहर, वृक्ष, पर्वत, धूल और क्षितिज—इसी मौन विधान का साक्षी है कि कोई भी स्थिति अंतिम नहीं होती। कविता में पदचिह्न केवल पैरों के नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर निरंतर बदलते बोध, अहं, विनम्रता और समय के संवाद के प्रतीक हैं। कविता किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँचती; वह केवल एक प्रश्न पाठक के भीतर रख देती है—क्या यात्रा वास्तव में मनुष्य करता है, या समय उसके भीतर अपने पदचिह्न बदलता चलता है?
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चलते हुए
दो चरणों के बीच
जितनी-सी जगह बची रहती है,
समय अक्सर
वहीं अपना सबसे गुप्त बीज रख देता है।
एक पद
क्षितिज की ओर झुकता है,
दूसरा
मिट्टी की नब्ज़ पर
अपनी धड़कन टटोलता रहता है।
अचरज यह नहीं
कि एक आगे है
और दूसरा पीछे—
अचरज तो यह है
कि हवा
कभी आगे निकलती हुई पत्ती का अभिनंदन नहीं करती,
और न पीछे छूटती हुई पत्ती का अपमान।
समुद्र ने
किसी लहर को
स्थायी शिखर नहीं दिया;
हर उठान के भीतर
एक लौटना पहले से लिखा था।
देखना—
सबसे अधिक फल से भरी डाल
सबसे पहले झुकती है,
और पर्वत की सबसे ऊँची चोटी भी
अपने भीतर
घाटियों का मौन सँजोए रहती है।
शायद इसी कारण
प्रकृति में कहीं
विजय-घोष सुनाई नहीं देता।
केवल मनुष्य है
जो अपने ही पदचिह्नों पर
सिंहासन तराशता रहता है...
जबकि समय
हर अगला कदम रखते ही
पहले कदम को
धूल की वर्णमाला में लिख देता है।
और तब...
रास्ते पर बचे रह जाते हैं
केवल बदलते हुए निशान।
बहुत देर तक सोचता रहता हूँ—
चल कौन
रहा था?
वे दो चरण...
या उनके बीच
धीरे-धीरे सरकती हुई पृथ्वी?
