पिता के जाने के बाद
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
कुछ रिश्ते समय के साथ समाप्त नहीं होते, वे स्मृतियों की धड़कनों में जीवित रहते हैं। पिता भी ऐसा ही एक विराट सत्य हैं—जो चले जाने के बाद भी जीवन के हर निर्णय, हर संघर्ष और हर सफलता में मौन उपस्थिति बनकर साथ रहते हैं। उनकी अनुपस्थिति केवल एक व्यक्ति का अभाव नहीं, बल्कि उस छाया का खो जाना है जिसके नीचे जीवन निडर होकर खिलता था।
पिता के जाने के बाद, आँगन में धूप तो उतरी, पर उजाला कहीं खो गया।
बरगद खड़ा रहा वहीं, मगर उसकी छाँव का अर्थ बदल गया।
दीवारों ने पहली बार सिसकियों की भाषा पढ़नी सीखी।
चौखट हर आहट पर आज भी उनके कदमों का भ्रम पालती है।
घर अब मकान है—जिसकी हर ईंट स्मृतियों का दीप जलाती है।
उनकी चुप्पियाँ आज जीवन का सबसे गहरा उपदेश बन गई हैं।
सिर पर रखा उनका हाथ हटते ही आकाश कुछ और दूर हो गया।
समय ने मुस्कुराना सिखाया, पर भीतर का बालक अनाथ ही रहा।
रोटियों की खुशबू में अब भी उनके श्रम का पसीना महकता है।
रात के सबसे गहरे सन्नाटे में उनका विश्वास तारे बनकर उतरता है।
मैं जब भी टूटता हूँ, उनकी सीख नदी की धारा-सी मुझे थाम लेती है।
आँसू बहते हैं, पर उनकी मर्यादा पलकों पर पहरा देती रहती है।
उन्होंने जीवन नहीं, संघर्ष को मुस्कुराकर जीने की विरासत छोड़ी।
अब हर कठिन मोड़ पर उनकी अनुपस्थिति ही मेरा साहस बनती है।
पिता कभी जाते नहीं—वे रक्त में धड़कन, संस्कार में प्रकाश बनकर बसते हैं।
उनकी स्मृतियाँ पीपल की जड़ों-सी, हर ऋतु में जीवन को थामे रहती हैं।
मैं हर सफलता में उनका मौन आशीष सुन लेता हूँ।
हर असफलता में उनकी आँखों का धैर्य मुझे फिर खड़ा कर देता है।
पिता के जाने के बाद समझ आया—वृक्ष गिरता नहीं, वन का हृदय खाली हो जाता है।
और पुत्र जीवन भर उसी रिक्त छाँव में, उनके नाम का आकाश ओढ़कर चलता रहता है।
