Daman
बुधवार, 8 जुलाई 2026
अर्थों का निर्वासन ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
रविवार, 5 जुलाई 2026
नवगीत - पलायन ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
नवगीत - पलायन
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
सूना आँगन, बंद किवाड़ें,
चीड़ अकेला जागे।
चूल्हे की ठंडी राखों में
दिन के टूटे धागे।
गौरैया हर भोर पुरानी
देहरी पर आ जाती,
खाली घर की चुप दीवारें
बुलबुल बात बनाती।
पगडंडी की धूल पूछती—
"पाँव कहाँ खो आए?"
नदी किनारे बैठे पत्थर
किसको आज बुलाएँ?
खेत अभी भी बीज सँजोए,
बादल राह न भूले,
गाँव किसी नक़्शे का टुकड़ा
नहीं, साँस के झूले।
घर केवल छत का नाम नहीं,
स्मृतियों का वन है;
जो जड़ों से रिश्ता तोड़े,
वह भीतर से निर्धन है।
फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
ज़िंदगी ने मुझे हर मोड़ पे इतना पढ़ाया,
अब किसी हादसे से इम्तिहान नहीं होता।
जो पेड़ धूप में बरसों खड़ा रहा तनहा,
उसी की छाँव में हर कारवाँ ठहरता है।
समंदरों से बड़ा हौसला तो आँखों का है,
डूबती हैं मगर ख़्वाब बहने नहीं देतीं।
मैंने देखा है चराग़ों को आँधियों के क़रीब,
रौशनी ख़ौफ़ से समझौता नहीं करती।
हवा के साथ सभी लोग उड़ नहीं सकते,
परों से पहले इरादों का आसमाँ होता है।
जो अपने दर्द को तहज़ीब में बदलते हैं,
उन्हीं के लफ़्ज़ ज़माने का दिल बदलते हैं।
मकानों से कभी आबादियाँ नहीं बनतीं,
घर वहीं है जहाँ रिश्ते साँस लेते हों।
अना की धूप में रिश्ते पिघल ही जाते हैं,
मोहब्बतों को हमेशा दरख़्त होना है।
वक़्त सबसे बड़ा उस्ताद है जहाँ भर का,
बिना किताब के जीना सिखा दिया उसने।
मैंने मिट्टी से यही एक सबक़ सीखा है,
जो झुक गया वही फ़सल बनकर उगता है।
सफ़र में सिर्फ़ मुसाफ़िर नहीं बदलते हैं,
कई दफ़ा तो मुक़द्दर भी रास्ते बदलते हैं।
जिसे यक़ीन है अपने हुनर की ख़ुश्बू पर,
वो फूल मौसमों का मोहताज कब हुआ है।
बहुत क़रीब से देखा है जीत को मैंने,
हर एक फ़त्ह के पीछे शिकस्त रहती है।
ज़ुबाँ से मीठे बहुत लोग मिल ही जाते हैं,
मगर किरदार की ख़ुश्बू कमाल होती है।
चराग़ बनने की क़ीमत भी कम नहीं होती,
तमाम उम्र ख़ुद अपना वजूद जलता है।
जो आदमी को बड़ा आदमी बनाती है,
वो दौलतें नहीं, तजुर्बों की मुफ़लिसी है।
मैं आज भी उसी मिट्टी का एहतराम करूँ,
जिसने गिराकर मुझे फिर खड़ा किया हर बार।
उड़ान भरने से पहले ये याद रख ऐ दिल,
हवा से पहले परिंदे का हौसला उड़ता है।
किसी की हार पे हँसना बहुत आसान मगर,
गिरे हुए को उठाना कमाल होता है।
ज़िंदगी रोज़ नया फ़लसफ़ा सुनाती है,
जो सुन सके वही सचमुच जवान रहता है।
मैं अपने आप से सदियों से गुफ़्तगू में रहा,
जहाँ भी लोग मिले, बस तआरुफ़ों में रहे।
किसी ने रूह का दरिया कभी नहीं देखा,
सभी ने जिस्म की सतह पे फ़ैसले लिखे।
हम अपने दर्द की नीलामी भी न कर पाए,
वो एक आह थी, जिसे लोग शायरी समझे।
मैं एक ख़ामोश किताबों-सा आदमी ठहरा,
मुझे वही पढ़ सका, जो ख़ुद भी टूटा था।
तमाम उम्र यही सोचकर गुज़र गई,
मैं किसका था, कोई आख़िर मेरा भी था कि नहीं।
वो मेरी हार का क़िस्सा सुनाकर ख़ुश था,
उसे ख़बर न थी, मैं इम्तिहान छोड़ आया।
अजीब लोग हैं, चेहरे बदलते रहते हैं,
मगर ज़मीर बदलने में देर लगती है।
मैंने हर एक रिश्ते को रूह से सींचा था,
वो अपने मतलबों की धूप लेकर आए।
ये और बात कि तन्हा दिखाई देता हूँ,
मेरे भीतर कई मौसम ठहरे बैठे हैं।
जो मेरे सच से कभी आँख मिला न सके,
वही मेरे लिए इल्ज़ाम लिखते रहते हैं।
मैं अपने हिस्से की वीरानियाँ भी जी आया,
अब कोई शहर मुझे बेघर नहीं करता।
बड़ी अजीब है इस दिल की सल्तनत यारो,
यहीं बग़ावत भी होती है, यहीं सज्दा भी।
मैं अपनी ख़ाक से ऊँचा ज़रूर उठ जाऊँगा,
हवा के ज़ोर से पर्वत नहीं झुका करते।
मेरे वजूद का हासिल यही रहा आख़िर,
मैं ख़ुद को ढूँढ़ता रहा, ख़ुद ही नहीं मिला।
जिसे भी चाहा, उसी ने यही सिखाया है,
मोहब्बतें कभी आसान रास्ता नहीं होतीं।
मैं अपने ज़ख़्म छुपाता रहा हँसी बनकर,
लोग वाह-वाह में मेरा इलाज ढूँढ़ते रहे।
सवाल इतना नहीं कौन छोड़कर गया,
कमाल ये है कि मैं फिर भी टूटकर न बिखरा।
मैंने ख़ुद अपने मुक़द्दर पे ख़ाक डाली है,
किसी को दोष दूँ, इतना भी बेअदब नहीं।
हर एक शख़्स यहाँ आईना लिए बैठा है,
मगर किसी को अपना चेहरा नहीं दिखता।
मेरे ख़िलाफ़ हवाओं ने फ़ैसले लिखे,
मैं फिर भी अपने चराग़ों के साथ चलता रहा।
शुक्रवार, 3 जुलाई 2026
फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
हर एक चेहरे पे मत जाना, सभी सच्चे नहीं होते,
जो दरिया शोर करते हैं, वही गहरे नहीं होते।
अदावत पालने वालों से बस इतना ही सीखा है,
दिलों के फ़ासले अक्सर सफ़र से कम नहीं होते।
वक़्त जब आईना लेकर मुक़ाबिल आ खड़ा होता,
कई किरदार फिर अपनी नज़र में भी बड़े नहीं होते।
गुरूर-ए-हुस्न हो या फिर गुरूर-ए-दौलत-ओ-मंसब,
ये ऐसे ख़्वाब हैं जो उम्र भर ठहरे नहीं होते।
जो अपने दर्द को चुपचाप सीने में छुपा लेते,
वही अक्सर ज़माने में कभी चर्चा नहीं होते।
किसी के हक़ में बोलो तो अदब से बोलना साहिब,
बुलंद आवाज़ से रिश्ते कभी ऊँचे नहीं होते।
नसीब अपना बदलता है पसीने की इबादत से,
फ़क़त तक़दीर लिख देने से मंज़र ही नहीं होते।
सलीक़ा सीख लो लोगों के ग़म को बाँटने का भी,
हर इक एहसान के क़िस्से ज़ुबाँ पर ही नहीं होते।
नज़र का फ़र्क़ है साहिब, कोई पत्थर, कोई हीरा,
हर इक इंसान दुनिया में बराबर सा नहीं होता।
ज़ुबाँ मीठी भी रखिए और किरदार भी रौशन हो,
फ़क़त लहजे से कोई आदमी अच्छा नहीं होता।
जो अपनी ग़ल्तियों पर ख़ुद ही पर्दा डाल देते हैं,
उन्हें आईना भी अक्सर गवारा-सा नहीं होता।
चराग़ों की हिफ़ाज़त आँधियाँ हरगिज़ नहीं करतीं,
उजालों का सफ़र आसान दुनिया में नहीं होता।
मिज़ाज-ए-वक़्त पढ़ना भी बड़ी फ़नकारी है यारो,
हर इक मौसम हमेशा एक जैसा नहीं होता।
दुआएँ साथ चलती हैं तो रस्ते ख़ुद सँवरते हैं,
फ़क़त तदबीर से हर मसअला हल नहीं होता।
गुरुवार, 2 जुलाई 2026
फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
संभल कर बोलना, लफ़्ज़ों का मोल होता है,
हर इक ज़ख़्म का दुनिया में खुला मरहम नहीं होता।
बहुत ऊँचा उड़ोगे तो हवा पहचान लेगी फिर,
परिंदों का हमेशा आसमाँ अपना नहीं होता।
जो चेहरे मुस्कुराते हैं, वही सबसे थके होते,
हर इक हँसते हुए चेहरे में इक दरिया नहीं होता।
कभी हालात इंसाँ को किताबों से बड़ा करते,
हर इक उस्ताद का हर सबक़ किस्सा नहीं होता।
कई रिश्ते तो बस ख़ामोशियों पर साँस लेते हैं,
हर इक झगड़े का मतलब फ़ैसला नहीं होता।
गिरा देता है अक्सर आदमी को उसका ही गुरूर,
हवा से लड़ने वाला पेड़ फिर ज़िंदा नहीं होता।
किसी की जीत पर इतना कभी मत इतराना तुम,
समय के हाथ में कोई मुकद्दर स्थिर नहीं होता।
जो अपने दर्द पर हर रोज़ हँसना सीख जाते हैं,
उन्हें दुनिया का कोई ग़म बहुत भारी नहीं होता।
भरोसा टूट जाए तो सदा आवाज़ रहती है,
मगर टूटा हुआ रिश्ता कभी पहला नहीं होता।
जहाँ मतलब की ख़ातिर लोग चेहरे बदल लेते,
वहाँ हर मुस्कुराता आदमी अपना नहीं होता।
कभी चुप रह के भी इंसाँ बहुत कुछ बोल देता है,
हर इक एहसास का लफ़्ज़ों में तरजुमा नहीं होता।
सफ़र में धूप जितनी हो, वही मंज़िल सिखाती है,
हमेशा छाँव में रहकर कोई दरख़्त बड़ा नहीं होता।
जो आँसू पी गया हँसकर, वही मज़बूत कहलाया,
हर इक रोने वाला कमज़ोर हो ऐसा नहीं होता।
किसी की हार पर खुशियाँ मनाना छोड़ दो यारों,
गिरा कल जो था, वो हर रोज़ गिरे, ऐसा नहीं होता।
मुसीबत जब भी आती है, पता सबका बता देती,
हर इक अपना मुसीबत में दिखाई नहीं होता।
कभी किरदार की ख़ुशबू भी महका कर तो देखो तुम,
महकने के लिए हर बार इत्र ज़रूरी नहीं होता।
,
जो ख़ुद से जीत जाता है, वही दुनिया भी जीतता है,
हर इक मैदान में तलवार, होने से ही नहीं होता।
समंदर भी कभी-कभी किनारों से सीखता होगा,
हमेशा डूब जाने से ही गहराई का पता नहीं होता।
वक़्त की धूप ने हमको बहुत कुछ सिखला डाला है,
हर इक ठोकर का मतलब, सिर्फ़ गिर जाना नहीं होता।
उसी इंसान की बातें सदा दिल में उतरती हैं,
जिसे ख़ुद पर गुरूर-ए-इल्म का पर्दा नहीं होता।
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
बुधवार, 1 जुलाई 2026
बुझी हुई राख © डॉ. चंद्रकांत तिवारी
बुझी हुई राख
© डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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"यह कविता मनुष्य के जीवन का एक गहन सत्य उद्घाटित करती है कि कोई भी पराजय अंतिम नहीं होती और कोई भी बुझी हुई राख पूरी तरह निःजीव नहीं होती। हर टूटन, हर पीड़ा, हर असफलता और हर अँधेरा अपने भीतर एक नई शुरुआत की संभावना छिपाए रहता है। प्रकृति के असंख्य प्रतीकों के माध्यम से कविता यह विश्वास जगाती है कि संघर्ष ही जीवन की सबसे बड़ी ऊर्जा है और आशा वह चिंगारी है जो सबसे बुझी हुई आत्मा को भी फिर से प्रज्वलित कर सकती है। इसका मूल संदेश है कि मनुष्य परिस्थितियों से नहीं, बल्कि अपने धैर्य, साहस, आत्मविश्वास और पुनः उठ खड़े होने की क्षमता से महान बनता है; क्योंकि हर राख के भीतर भविष्य की अग्नि अब भी जीवित रहती है।"
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कभी भी
राख को देखकर यह मत मान लेना कि आग मर चुकी है।
आग मरती नहीं,
बस कुछ समय के लिए अपना लाल चेहरा
राख के भीतर छिपा लेती है।
किसी बूढ़े बरगद की तरह जो पतझड़ में भी अपनी जड़ों के भीतर बसंत सँजोए रहता है।
याद रखना—
रात कभी सूरज की हत्या नहीं करती, वह केवल उसे अगले सवेरे के लिए विश्राम देती है।
चाँद अँधेरे का साथी नहीं,
उसके विरुद्ध रात का सबसे शांत प्रतिरोध है।
और एक छोटी-सी किरण—
पूरे आकाश को नहीं,
केवल एक पथिक का चेहरा उजाला देती है,
पर उतना ही काफी होता है दिशा बदलने के लिए।
देखो—
राख के नीचे सोई हुई चिंगारी हवा का इंतज़ार करती है, चमत्कार का नहीं।
सूखे कुएँ में भी पानी की स्मृति मरती नहीं।
बंजर खेत बीज का अपमान नहीं करते,
वे पहली बारिश की भाषा सुन रहे होते हैं।
टूटी हुई नाव समुद्र से नफ़रत नहीं करती,
उसे बस एक किनारे की ज़रूरत होती है।
बिखरे हुए घोंसले पक्षियों की उड़ान नहीं छीनते।
पतंग कटने के बाद भी हवा को दोष नहीं देती।
दीवार की दरार में उगी हुई घास धरती का सबसे धीमा विद्रोह है।
और सूखी नदी—
अपने भीतर समुद्र का पता कभी नहीं भूलती।
सुनो—
जिस स्त्री ने अपना सुहाग राख में बदलते देखा,
उसकी आँखों में भी एक दिन सूर्योदय लौट सकता है।
जिस लड़की ने समाज के पत्थरों से बचने के लिए घर छोड़ा,
वह भी एक दिन अपने भीतर घर बना सकती है।
जिस औरत ने अपमान की रोटियाँ खाईं,
वह भी एक दिन अपने आत्मसम्मान का पहला अन्न उगा सकती है।
जिस माँ ने अपने बच्चे की भूख अपने हिस्से की रोटी में छिपा दी,
उसकी हथेली पर समय एक दिन भाग्य लिखता है।
जिस आदमी ने बार-बार हार का स्वाद चखा,
उसी की मुस्कान सबसे सच्ची होती है।
जिस प्रेमी का पहला प्रेम टूट गया,
उसके भीतर प्रेम नहीं मरता—बस वह चेहरे से हटकर चरित्र में उतर जाता है।
जिस कवि की पहली कविता ठुकरा दी गई,
वही एक दिन लोगों की चुप्पियों का शब्दकोश लिखता है।
देखो—
सीपी हर बार मोती नहीं बनाती,
फिर भी समुद्र छोड़ती नहीं।
बादल हर बार बरसते नहीं,
फिर भी आकाश से रिश्ता नहीं तोड़ते।
नाविक हर लहर पर जीतता नहीं,
फिर भी पतवार फेंकता नहीं।
हवा
हर वृक्ष को एक जैसी धुन नहीं देती।
फिर भी जंगल मौन नहीं होता।
तुम भी—
अपने भीतर जो राख बची है,
उसे हार का प्रमाण मत समझो।
वहीं कहीं एक लाल बिंदु अब भी धड़क रहा है।
वही तुम्हारे भविष्य का पहला सूर्य है।
याद रखना—
आँसू आँख की हार नहीं, हृदय की धुलाई हैं।
घाव शरीर का अंत नहीं, नई त्वचा का प्रारूप हैं।
अकेलापन सज़ा नहीं,
आत्मा का सबसे ईमानदार कमरा है।
मौन शब्दों की मृत्यु नहीं, उनका गर्भकाल है।
और प्रतीक्षा—
वह समय का सबसे सुंदर तप है।
देखो—
अंकुर धरती को धक्का देकर नहीं,
धैर्य देकर ऊपर आता है।
सूर्योदय आकाश पर आक्रमण नहीं करता,
धीरे-धीरे रात का हाथ छुड़ाता है।
तितली उड़ना सीखने से पहले
अपने ही बनाए कारागार में लंबा समय बिताती है।
बाँसुरी
खाली होने के बाद ही संगीत बनती है।
शंख
समुद्र छोड़कर ही मंदिर तक पहुँचता है।
और राख—
वह आग की हार नहीं,
उसकी सबसे विश्वसनीय स्मृति है।
इसलिए—
अगर आज तुम्हारी आँखों में धुआँ है,
तो विश्वास रखना—
कहीं तुम्हारे भीतर अभी भी एक चिंगारी साँस ले रही है।
उसे दुनिया की आँधियों से नहीं,
अपने ही संदेहों से बचाना।
क्योंकि
सबसे पहले मनुष्य बाहर नहीं,
अपने भीतर बुझता है।
और
सबसे पहले वहीं फिर से जलता भी है।
याद रखना—
हर समाप्ति अपने भीतर एक आरंभ की गुप्त राख रखती है।
हर पराजय अपने भीतर एक अदृश्य विजय का बीज छिपाती है।
हर टूटन एक नए आकार की प्रस्तावना होती है।
हर अँधेरा प्रकाश का अधूरा वाक्य है।
हर रात उजाले का गर्भ है।
और
हर बुझी हुई राख में—
एक ऐसी चिंगारी अब भी जीवित रहती है,
जो यदि एक बार विश्वास की हवा पा जाए,
तो
केवल एक दीपक नहीं,
पूरे आकाश को फिर से रोशन कर सकती है।
सोमवार, 29 जून 2026
ये दौर भी बीत जाएगा ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
ये दौर भी बीत जाएगा
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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अपनी भाषा के गीत मधुर ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
अपनी भाषा के गीत मधुर
©डॉ. चंद्रकांत तिवारीअपनी भाषा के गीत
किसी कंठ से नहीं,
पीढ़ियों की धड़कनों से जन्म लेते हैं।
उनमें माँ की उँगलियों पर लगी
आटे और हल्दी की गंध है,
खेतों पर झुकते हुए आकाश की नमी है।
जब कोई अपनी भाषा में मुस्कराता है,
धरती अपने भीतर
एक और ऋतु बचा लेती है।
शब्द तब
सिर्फ़ बोले नहीं जाते—
वे जड़ों में उतरकर
मनुष्य को वृक्ष बना देते हैं।
राष्ट्र
सीमाओं से पहले
अपनी भाषा की स्मृति में बसता है।
और कर्म—
जब अपनी मिट्टी की सुगंध से जुड़ते हैं,
तभी इतिहास
भविष्य की ओर चलना सीखता है।
शुक्रवार, 26 जून 2026
दो उम्र के बीच से गुजरता रास्ता ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
दो उम्र के बीच से गुजरता रास्ता
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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"दो उम्र के बीच से गुजरता रास्ता" केवल दो पीढ़ियों के बीच की दूरी का आख्यान नहीं, बल्कि बदलते समय में मनुष्य की संवेदनाओं, रिश्तों और पारिवारिक मूल्यों के विघटन की गहन व्यथा-कथा है। कविता यह संकेत करती है कि आधुनिक जीवन की अंधी दौड़, निजी स्वतंत्रता की नई व्याख्याएँ, महानगरीय संस्कृति और तकनीकी निकटता ने मनुष्यों के बीच भावनात्मक दूरियाँ बढ़ा दी हैं। कि जब संवाद समाप्त होता है, तब परिवार केवल एक संरचना रह जाता है और संबंध धीरे-धीरे अपने अर्थ खो देते हैं। कविता अंततः इस विश्वास के साथ समाप्त होती है कि यदि दोनों पीढ़ियाँ एक-दूसरे को सुनने, समझने और स्वीकार करने का साहस करें, तो यही दरार फिर से एक जीवंत पुल में बदल सकती है। यह कविता केवल पीढ़ी-अंतराल का चित्रण नहीं, बल्कि हमारे समय के सबसे बड़े मानवीय संकट और उसके संभावित समाधान का संवेदनशील काव्य-दस्तावेज़ है। क्या आप भी ऐसा ही महसूस कर रहे हैं जैसा मैं देख रहा हूं........!!
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दो उम्रों के बीच
कोई सड़क नहीं होती—
एक अदृश्य दरार होती है,
जिसे हर घर
अपने आँगन के बीचों-बीच
चुपचाप पालता है।
एक ओर
मिट्टी की गंध से भीगी हुई हथेलियाँ हैं,
जो रोटी बेलते हुए
वंश की परंपराएँ सेंकती रहीं;
दूसरी ओर
मोबाइल की चमक में
अपना चेहरा खोजती आँखें हैं,
जो भविष्य को
एक स्क्रीन पर स्क्रॉल करती रहती हैं।
बीच में—
एक रास्ता है,
जो हर दिन
थोड़ा और अकेला हो जाता है।
पिता कहते हैं—
"घर, दीवारों से नहीं,
साथ रहने से बनता है।"
बेटा सोचता है—
"घर, वहाँ है
जहाँ मेरी साँसें
किसी की अनुमति नहीं माँगतीं।"
माँ
इन दोनों वाक्यों के बीच
रोज़ एक दीपक रख देती है;
पर अब
रोशनी से अधिक
धुआँ बचता है।
रक्त
पहले नदी था—
जिसमें पीढ़ियाँ
एक-दूसरे की प्यास बुझाती थीं।
अब
वह मेडिकल रिपोर्ट की
एक लाल रेखा भर है,
जिससे संबंध तो सिद्ध हो जाते हैं,
अपनापन नहीं।
मिट्टी
अब भी
दरवाज़े पर पड़ी रहती है,
पर लौटने वाले जूतों की
आहट कम होती जाती है।
बीज
आज भी पेड़ होना चाहता है,
लेकिन गमलों में उगी महत्वाकांक्षाएँ
जड़ों को
आसमान का शत्रु समझ बैठी हैं।
शहर—
एक ऐसा विशाल दर्पण है,
जहाँ हर चेहरा
खुद को बड़ा देखता है,
और धीरे-धीरे
अपने पीछे खड़े लोगों को
भूल जाता है।
गाँव
अब केवल पता है,
जहाँ डाक पहुँचती है,
लोग नहीं।
रिश्ते
अब त्योहारों के संदेश हैं,
जिन्हें
कॉपी-पेस्ट की भाषा में
भेज दिया जाता है।
स्पर्श—
अब
पासवर्ड माँगता है।
विश्वास—
ओटीपी की तरह
कुछ ही क्षणों में
समाप्त हो जाता है।
और प्रेम...
वह
किसी पुराने संदूक में रखा
दादी का ऊनी स्वेटर है,
जिसे
नई अलमारियों में
जगह नहीं मिलती।
दो उम्रों के बीच
जो रास्ता था,
वहाँ अब
सीसीटीवी लगे हैं।
हर कोई
दूसरे पर नज़र रखता है,
कोई
दूसरे को देखता नहीं।
संवाद की जगह
संदेह उग आया है।
आशीर्वाद की जगह
सलाहें हैं।
सलाहों की जगह
निर्णय।
और निर्णयों की जगह
अदालतें।
कितना विचित्र है—
जिस गोद ने
चलना सिखाया,
उसी गोद के विरुद्ध
एक दिन
कानून की धाराएँ खड़ी हो जाती हैं।
जिस हाथ ने
पहली बार उँगली पकड़कर
सड़क पार कराई थी,
उसी हाथ से
बुढ़ापे में
सहारा छूट जाता है।
सभ्यता का सबसे बड़ा शोक
युद्ध नहीं है—
यह है कि
एक ही खाने की थाली से उठे लोग
अब
एक-दूसरे की मृत्यु के समाचार पर भी
केवल
"दुखद" लिखकर
आगे बढ़ जाते हैं।
पेड़
आज भी
अपनी सबसे ऊँची शाखा को
जड़ों से बाँधे रखता है।
नदी
समुद्र तक पहुँचकर भी
अपने उद्गम का अपमान नहीं करती।
पहाड़
बादलों को छू लेने पर भी
धरती से रिश्ता नहीं तोड़ते।
केवल मनुष्य—
अपनी पहली सफलता के बाद
सबसे पहले
अपनी स्मृतियों का पता बदल देता है।
दो उम्रों के बीच से गुजरता रास्ता
दरअसल
समय का नहीं,
संवेदना का रास्ता है।
जहाँ
हर पीढ़ी
अपने सत्य को
अंतिम सत्य मान बैठती है,
और यहीं से
प्रेम का भूगोल
टूटने लगता है।
घर
ईंटों से नहीं टूटते।
वे तब टूटते हैं
जब भोजन से पहले
कोई किसी का इंतज़ार करना छोड़ देता है।
जब माँ की आवाज़
कॉल-लॉग में बदल जाती है।
जब पिता का मौन
अहम् समझ लिया जाता है।
जब बच्चों के सपनों में
परिवार नहीं,
केवल पता बदलता है।
और तब—
दो उम्रों के बीच का रास्ता
सड़क नहीं रहता,
वह
एक अदालत,
एक अस्पताल,
एक वृद्धाश्रम,
एक मनोचिकित्सालय,
या कभी-कभी
एक जेल की ओर जाती हुई
निर्जन पगडंडी बन जाता है।
फिर भी—
यदि कभी
कोई बच्चा
अपने पिता की झुर्रियों में
भविष्य पढ़ ले,
यदि कोई पिता
अपने बेटे की बेचैनी में
विद्रोह नहीं,
डर पहचान ले,
यदि कोई माँ
दो पीढ़ियों के बीच
फिर से रोटी की पहली भाप रख दे,
तो शायद—
दो उम्रों के बीच से गुजरता रास्ता
फिर
दरार नहीं रहेगा।
वह
एक पुल होगा—
जिस पर चलते हुए
रक्त फिर नदी बनेगा,
मिट्टी फिर घर बनेगी,
और मनुष्य
एक बार फिर
मनुष्य कहलाने के योग्य होगा।
गुरुवार, 25 जून 2026
मिट्टी में बचा हुआ मनुष्य ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
मिट्टी में बचा हुआ मनुष्य
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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कविता "मिट्टी में बचा हुआ मनुष्य" का भाव यह है कि राष्ट्र केवल भूगोल, सत्ता या प्रतीकों से नहीं बनता, बल्कि मनुष्य की करुणा, श्रम, स्मृति और नैतिकता से जीवित रहता है। किसान, मजदूर, शिक्षक, माँ और सत्य के लिए खड़ा साधारण व्यक्ति ही देश की वास्तविक आत्मा हैं। आधुनिक बाज़ारवाद और स्वार्थ के बीच भी आशा तब तक जीवित है, जब तक मनुष्य के भीतर संवेदना, त्याग और प्रेम शेष हैं। कविता बताती है कि राष्ट्र का वास्तविक निवास मिट्टी से अधिक मानव-हृदय और विवेक में होता है। करुणा और मानवता का दीप बुझते ही सभ्यताएँ भी खंडहर बन जाती हैं, किंतु जब तक सत्य, आशा और मानवीय संवेदना जीवित हैं, तब तक देश भी जीवित रहेगा।
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देश
किसी मानचित्र पर खिंची हुई रेखा नहीं होता,
न ही किसी ऊँचे स्तंभ पर
लहराता हुआ एकाकी रंग।
वह तो समय की बंद मुट्ठी में दबा
वह बीज है
जो युगों की अंधेरी मिट्टी में
धीरे-धीरे प्रकाश का वृक्ष बनता है।
मैंने उसे देखा है—
एक वृद्ध किसान की हथेली में,
जहाँ दरारें नहीं,
सूख चुकी नदियों की जीवनी लिखी थी।
हर रेखा में
एक मौसम का शव पड़ा था,
और हर मौसम के भीतर
एक अगली हरियाली का सपना।
मैंने उसे देखा है—
शहर के चमकते शीशों के पीछे
अपने ही प्रतिबिंब से भयभीत मनुष्यों में।
वे ऊँची इमारतों में रहते थे,
पर भीतर से ढह चुके थे।
उनकी खिड़कियाँ खुलती थीं आकाश में,
पर आत्माएँ
तहखानों में बंद थीं।
देश उन इमारतों में नहीं था।
वह तो उस मजदूर की पीठ पर था
जो उन्हें उठाकर
स्वयं झोपड़ी में लौट जाता था।
उसकी देह पर चिपकी धूल
सभ्यता की वास्तविक प्रस्तावना थी।
कितना विचित्र है—
धरती का सबसे आवश्यक मनुष्य
इतिहास की सबसे छोटी पंक्ति में लिखा जाता है,
और सबसे अनावश्यक मनुष्य
सबसे बड़े अक्षरों में।
नदियाँ आज भी बह रही हैं,
पर जल से अधिक
वे स्मृतियाँ बहा रही हैं।
हर लहर के भीतर
किसी भूले हुए गाँव की आवाज़ है,
किसी माँ की पुकार,
किसी सैनिक की अंतिम साँस,
किसी बच्चे की अधूरी हँसी।
समय का एक पुराना बरगद
अब भी खड़ा है
सभ्यता के चौराहे पर।
उसकी जड़ों में
पूर्वजों की असंख्य पदचापें सो रही हैं।
जब भी कोई पीढ़ी
अपने अतीत को भूलने लगती है,
बरगद की जड़ें
पत्थरों को चीरकर बाहर आ जाती हैं।
वे पूछती हैं—
“तुम्हारी ऊँचाई किसकी राख पर खड़ी है?”
इन दिनों
बाज़ार बहुत विशाल हो गया है,
और मनुष्य बहुत छोटा।
वस्तुएँ अमर हो रही हैं,
संबंध नश्वर।
लोग घरों में साथ रहते हैं,
पर स्मृतियों में अलग-अलग मरते हैं।
हर आदमी
अपने भीतर एक निर्वासित देश लेकर चलता है।
एक ऐसा देश
जो लौटना चाहता है
अपने ही हृदय में।
पर वहाँ अब
सूचनाओं का शोर है,
विज्ञापनों की धूल है,
और इच्छाओं का ऐसा कुहासा
जिसमें आत्मा का चेहरा दिखाई नहीं देता।
मैंने देखा—
सबसे ऊँची आवाज़ें
अक्सर सबसे रिक्त थीं।
और सबसे गहरा देश
उन लोगों के भीतर था
जो चुपचाप
दूसरों के दुख का भार उठाते थे।
एक स्त्री
जब आधी रोटी खाकर
अपने बच्चे को पूरी रोटी देती है,
वहीं राष्ट्रगान का सबसे सच्चा स्वर जन्म लेता है।
एक शिक्षक
जब अँधेरे गाँव में
ज्ञान का दीप जलाता है,
वहीं संविधान का सबसे सुंदर अनुच्छेद लिखा जाता है।
एक किसान
जब सूखे खेत में भी
अगले वर्ष का बीज डाल देता है,
वहीं लोकतंत्र की सबसे बड़ी आशा अंकुरित होती है।
देश
विजयों से कम,
विश्वासों से अधिक बनता है।
ईंटों से कम,
आँसुओं से अधिक।
शक्तियों से कम,
त्यागों से अधिक।
और मनुष्य?
वह स्वयं एक चलता-फिरता राष्ट्र है।
उसकी करुणा उसकी राजधानी है,
उसकी स्मृति उसका इतिहास,
उसका श्रम उसका संविधान,
और उसका प्रेम
उसकी अंतिम स्वतंत्रता।
यदि कभी पूछो—
देश कहाँ है?
तो पर्वतों से पहले
मनुष्य की आँखों में देखना।
नदियों से पहले
उसके आँसुओं में झाँकना।
ध्वज से पहले
उसकी अंतरात्मा को पढ़ना।
क्योंकि राष्ट्र
मिट्टी में उतना नहीं रहता
जितना मनुष्य के विवेक में।
और जिस दिन
करुणा की अंतिम ज्योति बुझ जाएगी,
उस दिन
सबसे विशाल साम्राज्य भी
खंडहर हो जाएगा।
किन्तु अभी
क्षितिज पर एक दीप जल रहा है।
एक बच्चा
टूटी हुई स्लेट पर
भविष्य लिख रहा है।
एक बीज
पत्थर की दरार में भी
हरा होने का अभ्यास कर रहा है।
एक मनुष्य
अब भी सत्य के पक्ष में
अकेला खड़ा है।
और जब तक
यह बीज,
यह बच्चा,
यह मनुष्य,
और यह करुणा जीवित है—
तब तक
देश किसी नक्शे में नहीं,
मानव-हृदय की धड़कनों में जीवित रहेगा।
