बची हुई साँस (कविता)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
स्याही ने जब रात पिघलाई, भोर हुई कुछ शेष,
कागज़ की चुप देह पर उतरा, मन का अवशेष।
एक तरफ़ धड़कन थी टूटी, एक तरफ़ परिवेश,
किसने जाना शब्दों में था, किस जीवन का क्लेश।
मुट्ठी भर अक्षर थे केवल, भीतर पूरा गाँव,
एक तरफ़ सूनी चौखट थी, दूजी ओर थी छाँव।
किसे पुकारे बंद खिड़कियाँ, किसे सुनाए घाव,
हवा चली तो पत्ते बोले—किसका छूटा गाँव।
रात बहुत थी गहरी, लेकिन दीप रहा अनजान,
जलते-जलते राख हुआ फिर, फिर भी रहा जवान।
जिसको अपनी लौ का मूल्य न, उसने पूछा मान,
एक पतंगा पढ़ गया शायद, दीपक का अरमान।
कागज़ पर कुछ बूँदें थीं या, वर्षा की बरसात,
शब्दों के बीच ठिठकी बैठी, जाने कितनी रात।
जिसको पढ़कर आँख नम हुई, वह क्या थी सौगात—
शायद कोई अपना चेहरा, शायद अपनी बात।
एक नदी थी भीतर बहती, बाहर सूखा घाट,
रेत सँभाले बैठा सागर, मौन गढ़े दिन-रात।
लहरों ने कुछ कहा नहीं, फिर भी देती सौगात,
किसने पढ़ी नदी की आँखें, किसने जानी बात।
कुछ पत्ते मौसम से पहले, शाखों से झर जाते,
कुछ रिश्ते आवाज़ बिना ही, भीतर टूटे जाते।
कवि ने केवल पत्ते लिखे, अर्थ कहाँ तक जाते—
पाठक अपने घावों से फिर, उनके अर्थ बनाते।
आँगन में तुलसी सूखी थी, दीप अभी भी जलता,
दरवाज़ा चुप, चौखट चुप थी, कोई नहीं निकलता।
कागज़ पर बस धूप उतरती, मन भीतर से गलता,
किस घर का यह मौन था आखिर, कौन वहाँ से चलता?
एक पुरानी गंध अचानक, पन्नों से उठ आई,
जैसे बंद संदूकचों में, माँ की चिट्ठी पाई।
शब्द वही थे, अर्थ नए थे, आँख हुई भर आई,
कविता ने किस नाम पुकारा—बात समझ न आई।
कवि ने कोई नाम न लिखा, फिर भी नाम उभर आए,
कुछ चेहरे धुँधले थे लेकिन, आँखों में ठहर आए।
जिनको भूला समझे थे हम, वे फिर लौटकर आए,
शब्दों के निर्जन वन में वे, चुपचाप घर बनाए।
टूटी वीणा के तारों में, अब भी कंपन बाकी,
मौन अधर पर ठहरी कोई, आधी धुन अनकही।
कवि ने स्वर को छुआ नहीं था, केवल तार सँवारे,
पाठक ने अपनी साँस मिलाई, जाग उठे अंगारे।
एक चिड़िया ने नीड़ बनाया, तिनका-तिनका जोड़,
आँधी आई, रात गिरी तो, टूट गया वह छोर।
सुबह हुई तो धूप ने देखा, चोंच लिए फिर डोर,
जीवन शायद हार नहीं है, बस बदल रहा है ठौर।
पगडंडी पर धूल जमी थी, पदचिह्नों के बीच,
किसके जाने की आहट थी, किसके आने की खींच।
कवि ने केवल धूल उठाई, आँख हुई फिर मींच,
पाठक ने अपने पाँव रखे—राह हुई कुछ सींच।
शब्दों की भी देह होती है, घावों की पहचान,
कहीं करुणा धीमे रोती, कहीं हँसता अरमान।
कहीं प्रतीक्षा दीप जलाती, कहीं बुझाता मान,
कविता अपने अर्थ नहीं कहती—देती केवल जान।
एक पुराना पेड़ खड़ा था, ऋतुओं से अनजान,
उसकी छाया में सोया था, जाने कौन-सा प्राण।
पत्ते झरे, ऋतु बदली, फिर भी बचा निशान,
कवि ने वृक्ष लिखा था केवल—पाठक ने पढ़ा जहान।
शाम उतरती रही नगर पर, खिड़की रही उदास,
दूर कहीं कोई बाँसुरी थी, पास पड़ा था श्वास।
किसके लौटने की आशा थी, किसका था विश्वास—
कविता ने बस शाम लिखी थी, पाठक ने पढ़ी प्यास।
आँखों में जो ठहर गया था, वह आँसू कब था,
होंठों पर जो जम गया था, वह मौन कहाँ था।
कागज़ ने केवल छाया देखी, दर्द कहाँ देखा था—
मन जब अपने भीतर उतरा, वहीं स्वयं से रोया था।
कभी-कभी कोई शब्द अचानक, दरवाज़ा बन जाता,
बीता हुआ कोई मौसम, भीतर फिर आ जाता।
जिसे समय ने दूर किया था, पास वही हो जाता,
एक अधूरा-सा वाक्य पूरा जीवन कह जाता।
स्याही सूखी, पृष्ठ पुराने, फिर भी गंध वही है,
जैसे बंद द्वार के पीछे, कोई आहट रही है।
कवि चला गया, शब्द बचे हैं—कैसी कथा कही है,
मिट्टी ने देह रख ली, शब्दों में साँस बही है।
कविता ने कुछ माँगा कब था—बस मन का द्वार खुला,
जितना भीतर दर्द दबाया, उतना ही वह घुला।
एक पंक्ति पर ठहर गया जो, वह अपना-सा लगा,
शायद कविता लिखी किसी ने, पढ़ने वाला ही था।
कवि और कविता के बीच में, एक अदृश्य डोर,
एक ओर जलता हुआ मन है, एक ओर है भोर।
एक लिखता है रक्त मिलाकर, एक पढ़े चितचोर,
दोनों मिलकर खोज रहे हैं, अपने भीतर छोर।
कवि ने जितना कह न सका था, उतना कहती पीड़ा,
शब्दों के आँगन में बैठी, जाने कैसी क्रीड़ा।
पाठक आया, देर तलक वह, पन्नों पर चुप बैठा,
फिर दोनों की आँखों में था, एक ही सपना ऐंठा।
जब तक कोई दर्द रहेगा, तब तक शब्द रहेंगे,
जब तक कोई स्वप्न बचेगा, तब तक गीत कहेंगे।
जब तक मन में प्रश्न उठेंगे, अक्षर दीप जलेंगे,
जब तक भीतर साँस बचेगी, भाव अमर रहेंगे।
मधुर मिलन है वैभव का, बाकी सुख-दुःख गीत,
कलम स्याह की साँस भरती, श्वेत-श्याम पत्रों के मीत।
कवि अपनी रचना को लिखकर, हुआ हृदय से विनीत,
कौन समझ पाया है जग में, पाठक-मन की प्रीत।
