बुधवार, 17 जून 2026

अपने-अपने राम : लोकविश्वास से आत्मसाक्षात्कार तक ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

अपने-अपने राम : लोकविश्वास से आत्मसाक्षात्कार तक

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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मन-मंदिर में दीप जले, हर श्वास बने श्रीराम,
भक्ति-पथिक के प्रेम-सुरों में गूँजे पावन नाम।
वेदों की गंभीर ऋचाओं में जिनका दिव्य धाम,
संतों की निष्कलुष वाणी में बसते नित्य श्रीराम।


वन-पथ की नीरव छाया में मर्यादा-अभिराम,
करुणा, सत्य, धर्म-सुधा के अनुपम दिव्य ललाम।
कण-कण में चेतन ज्योति बन करते जग अभिराम,
निर्बल के संबल, दुःखहरण, जन-मन के विश्राम।


जिसने जैसा भाव सँजोया, वैसा पाया राम,
ज्ञान-दीप में ब्रह्म प्रकाशित, भक्ति में घनश्याम।
अपने-अपने भावलोक में एक सनातन धाम,
अंतस की अयोध्या में ही विराजित अपने-अपने राम॥

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राम : एक व्यक्तित्व नहीं, भारतीय चेतना का सामूहिक मानस -

भारतीय संस्कृति में राम केवल एक ऐतिहासिक, धार्मिक अथवा पौराणिक पात्र नहीं हैं; वे भारतीय मानस की सामूहिक चेतना के सबसे उज्ज्वल प्रतीक हैं। राम वह नाम हैं जो एक साथ इतिहास, दर्शन, मनोविज्ञान, संस्कृति, राजनीति, नैतिकता, अध्यात्म और लोकजीवन के केंद्र में उपस्थित दिखाई देता है। यही कारण है कि भारत में जितने व्यक्ति हैं, उतने ही राम भी हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुभवों, संस्कारों, संघर्षों और आकांक्षाओं के अनुसार राम को देखता और समझता है।

किसी के लिए राम मर्यादा हैं, किसी के लिए करुणा। किसी के लिए आदर्श पुत्र हैं, किसी के लिए आदर्श राजा। कोई उन्हें धर्म की स्थापना का प्रतीक मानता है, तो कोई मानवता की सर्वोच्च अभिव्यक्ति। एक साधक के लिए राम ध्यान का केंद्र हैं, एक भक्त के लिए प्रेम का आधार और एक दार्शनिक के लिए ब्रह्म के साकार स्वरूप।

मनोविश्लेषण की दृष्टि से देखें तो मनुष्य अपने आदर्शों को किसी प्रतीक में मूर्त रूप देता है। भारतीय समाज ने अपने सर्वोच्च नैतिक और आध्यात्मिक आदर्शों को राम के रूप में प्रतिष्ठित किया। इसीलिए राम प्रत्येक व्यक्ति के अंतर्मन में उसकी आवश्यकताओं के अनुसार रूपांतरित होते रहते हैं। किसान का राम खेत की हरियाली में है, सैनिक का राम कर्तव्यपालन में, साधु का राम वैराग्य में, गृहस्थ का राम परिवार की मर्यादा में और पीड़ित का राम आशा के अंतिम दीपक में।

राम की यही बहुआयामी उपस्थिति उन्हें सार्वकालिक बनाती है। वे किसी एक ग्रंथ, एक सम्प्रदाय या एक युग की संपत्ति नहीं हैं। वे भारतीय आत्मा के उस विराट वृक्ष की जड़ हैं जिसकी शाखाओं पर असंख्य अनुभव, विचार और आस्थाएँ फलती-फूलती हैं।


रामकाव्य की विविध धाराएँ और अपने-अपने राम की अवधारणा -

भारतीय साहित्य में राम की कथा जितनी बार कही गई, उतनी बार राम का एक नया स्वरूप भी सामने आया। यही रामकाव्य की सबसे बड़ी विशेषता है कि उसने राम को स्थिर नहीं रहने दिया, बल्कि प्रत्येक युग की आवश्यकताओं के अनुरूप पुनः व्याख्यायित किया।

वाल्मीकि के राम संघर्षशील मानव हैं। वे दुःख अनुभव करते हैं, रोते हैं, चिंतित होते हैं, निर्णयों से जूझते हैं। यहाँ राम आदर्श की ओर अग्रसर मनुष्य हैं।

तुलसीदास के राम ईश्वर हैं। वे भक्तों के दुःख हरने वाले, करुणा के सागर और धर्म की रक्षा करने वाले अवतार हैं। तुलसी के लिए राम केवल राजा नहीं, समस्त सृष्टि के पालनकर्ता हैं।

भवभूति के राम करुणा के शिखर हैं। उनके भीतर राजधर्म और व्यक्तिगत प्रेम का गहन द्वंद्व दिखाई देता है। मैथिलीशरण गुप्त के राम राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक बन जाते हैं। आधुनिक कवियों के यहाँ राम सामाजिक न्याय, मानवीय संवेदना और सांस्कृतिक अस्मिता के प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित होते हैं।

यहीं से “अपने-अपने राम” की अवधारणा जन्म लेती है। प्रत्येक कवि ने अपने युग, अपने समाज और अपने अंतःकरण के अनुरूप राम की व्याख्या की। किसी ने राम में ईश्वर देखा, किसी ने मनुष्य, किसी ने आदर्श शासक, किसी ने त्याग की मूर्ति और किसी ने लोकमंगल का आधार।

वास्तव में राम की महानता इसी में है कि वे सीमित नहीं होते। वे अपने भक्त के हृदय में उसी रूप में प्रकट होते हैं, जिस रूप की उसे आवश्यकता होती है। यही कारण है कि रामकथा बदलती रही, लेकिन राम की लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई।


ज्ञानमार्ग और भक्तिमार्ग के मध्य श्रीराम सेतु -

भारतीय अध्यात्म में ईश्वर प्राप्ति के दो प्रमुख मार्ग माने गए हैं—ज्ञानमार्ग और भक्तिमार्ग। आश्चर्य की बात यह है कि राम दोनों मार्गों को समान रूप से आलोकित करते हैं।

ज्ञानमार्गी के लिए राम ब्रह्म हैं। वे सत्य, चेतना और आनंद के प्रतीक हैं। वेदांत के साधक राम को उस परम तत्व के रूप में देखते हैं जो समस्त सृष्टि में व्याप्त है। उनके लिए राम कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि सार्वभौमिक चेतना हैं।

दूसरी ओर भक्तिमार्गी के लिए राम प्रेम हैं। वह तर्क नहीं करता, वह समर्पण करता है। वह शास्त्रों की जटिलताओं में नहीं उलझता, बल्कि राम नाम का स्मरण करके अपने हृदय को निर्मल बनाता है।

कबीर ने कहा—

“कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूंढे वन माहि।”

उनका राम किसी मंदिर या मूर्ति में सीमित नहीं था। वह अंतर्मन में स्थित चेतना का नाम था। कबीर के राम निर्गुण थे, फिर भी वे राम थे।

तुलसीदास ने राम नाम को स्वयं राम से भी बड़ा बताया। उनके लिए नाम वह सेतु था जो साधारण मनुष्य को परमात्मा से जोड़ता है। वाल्मीकि का उदाहरण भारतीय अध्यात्म की सबसे अद्भुत घटनाओं में से एक है। “मरा-मरा” का निरंतर उच्चारण “राम-राम” में परिवर्तित हो गया और एक डाकू महर्षि बन गया। यह कथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक सत्य भी है कि निरंतर सकारात्मक चिंतन मनुष्य के व्यक्तित्व का पुनर्निर्माण कर सकता है।

इस प्रकार ज्ञानी का राम और भक्त का राम भिन्न प्रतीत होते हुए भी अंततः एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं। मार्ग अलग-अलग हैं, लेकिन गंतव्य एक ही है।


मनोवैज्ञानिक दृष्टि से राम : मानव व्यक्तित्व के आदर्श प्रतिरूप -

मनोविज्ञान के क्षेत्र में कार्ल युंग ने ‘आर्केटाइप’ अर्थात् आद्य-प्रतिरूप की अवधारणा प्रस्तुत की थी। कुछ प्रतीक मानव जाति के सामूहिक अवचेतन में स्थायी रूप से निवास करते हैं। भारतीय समाज में राम ऐसा ही एक आद्य-प्रतिरूप हैं।

राम मनुष्य के भीतर स्थित श्रेष्ठतम संभावनाओं के प्रतिनिधि हैं। जब कोई व्यक्ति सत्य बोलता है, तो वह अपने भीतर के राम को सक्रिय करता है। जब कोई कठिन परिस्थितियों में भी कर्तव्य का पालन करता है, तब वह राम के मार्ग पर चलता है।

राम का वनवास वस्तुतः मानव जीवन के संघर्षों का प्रतीक है। रावण बाहरी शत्रु नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर उपस्थित अहंकार, लोभ, क्रोध और वासना का प्रतीक है। सीता आत्मा की पवित्रता हैं और लक्ष्मण विवेक के प्रतीक।

यदि इस दृष्टि से रामायण को पढ़ा जाए तो यह केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं रहती; यह मानव मन का विस्तृत मनोवैज्ञानिक मानचित्र बन जाती है।

प्रत्येक व्यक्ति के भीतर अयोध्या भी है और लंका भी। उसके भीतर राम भी हैं और रावण भी। जीवन का संघर्ष इसी बात का है कि अंततः विजय किसकी होगी।

यही कारण है कि श्रीराम केवल पूजा का विषय नहीं हैं; वे आत्मविश्लेषण का विषय भी हैं। वे हमें अपने भीतर झाँकने की प्रेरणा देते हैं। वे सिखाते हैं कि महानता शक्ति से नहीं, बल्कि चरित्र से प्राप्त होती है।


लोकजीवन, संस्कृति और सामाजिक चेतना में अपने-अपने राम -

भारतीय समाज का शायद ही कोई क्षेत्र हो जहाँ राम किसी न किसी रूप में उपस्थित न हों। गाँवों की चौपालों से लेकर महानगरों की व्यस्त सड़कों तक, लोकगीतों से लेकर शास्त्रीय साहित्य तक, मंदिरों से लेकर जनआंदोलनों तक—राम सर्वत्र दिखाई देते हैं।

एक माँ अपने पुत्र में राम जैसा संस्कार देखना चाहती है। एक भाई भरत और लक्ष्मण जैसे संबंधों की कामना करता है। एक पत्नी सीता की निष्ठा और एक पति राम की जिम्मेदारी को आदर्श मानता है।

लोकगीतों में राम परिवार के सदस्य की तरह उपस्थित हैं। जनमानस में वे किसी दूरस्थ देवता की तरह नहीं, बल्कि अपने घर के व्यक्ति की तरह स्वीकार किए जाते हैं।

इसीलिए भारत में राम का स्मरण केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं है। “राम-राम” अभिवादन है, “राम नाम सत्य है” जीवन की अंतिम यात्रा का सत्य है और “हे राम” संकट की घड़ी में निकली हुई आत्मा की पुकार।

सांस्कृतिक दृष्टि से राम भारतीय एकता के सबसे महत्वपूर्ण सूत्रों में से एक हैं। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक रामकथा के स्वरूप बदलते हैं, लेकिन राम के प्रति श्रद्धा बनी रहती है। यह विविधता में एकता का अद्भुत उदाहरण है।

यही “अपने-अपने राम” की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है। भाषा बदलती है, क्षेत्र बदलते हैं, परंतु राम के प्रति प्रेम नहीं बदलता।


अपने-अपने राम : आस्था की स्वतंत्रता और आत्मा की निजी यात्रा -

राम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे किसी पर अपनी उपासना की पद्धति नहीं थोपते। भारतीय परंपरा ने सदैव स्वीकार किया है कि सत्य तक पहुँचने के अनेक मार्ग हो सकते हैं।

कोई व्यक्ति वेदों का अध्ययन करके श्री राम तक पहुँचता है, कोई रामचरितमानस का पाठ करके। कोई ध्यान में राम को खोजता है, कोई सेवा में। कोई मंदिर में उन्हें पाता है, कोई अपने अंतःकरण की निस्तब्धता में।

यही सनातन संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति है कि यहाँ एक ही सत्य को अनेक दृष्टियों से देखने की स्वतंत्रता है। श्री राम इस स्वतंत्रता के सर्वश्रेष्ठ प्रतीक हैं। वे किसी एक मत, एक पंथ या एक विचारधारा में बंधे हुए नहीं हैं।

किसी के राम निर्गुण हैं, किसी के सगुण। किसी के राम राजा हैं, किसी के राम मित्र। किसी के राम न्याय हैं, किसी के राम प्रेम। किसी के राम धर्म हैं, किसी के राम करुणा।

वास्तव में “अपने-अपने राम” का अर्थ राम का विभाजन नहीं, बल्कि राम की विराटता का स्वीकार है। सूर्य एक है, पर उसकी किरणें असंख्य हैं। समुद्र एक है, पर उसकी लहरें अनंत हैं। उसी प्रकार राम एक हैं, लेकिन उन्हें अनुभव करने के मार्ग असंख्य हैं।

इसलिए प्रत्येक साधक का राम उसका निजी आध्यात्मिक अनुभव है। प्रत्येक भक्त का राम उसके हृदय का सबसे पवित्र भाव है। प्रत्येक भारतीय का राम उसकी सांस्कृतिक स्मृति का सबसे उज्ज्वल प्रकाश है।

श्री राम को समझना केवल रामायण या श्रीरामचरितमानस पढ़ना नहीं है; श्री राम को समझना अपने भीतर के सत्य, करुणा, मर्यादा, प्रेम और कर्तव्य को पहचानना है। जब मनुष्य अपने भीतर इन गुणों को जागृत कर लेता है, तब वह पाता है कि उसके श्री राम किसी मंदिर, किसी ग्रंथ या किसी प्रतिमा में नहीं, बल्कि उसके अपने अंतर्मन में सदैव से विराजमान थे।

मंगलवार, 16 जून 2026

प्रभु श्रीराम और भक्त-हृदय हनुमान : आधुनिक युग में आदर्श, आस्था और आत्मिक संबंध की प्रासंगिकता ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

प्रभु श्रीराम और भक्त-हृदय हनुमान : आधुनिक युग में आदर्श, आस्था और आत्मिक संबंध की प्रासंगिकता

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

श्रीराम और हनुमान : केवल धार्मिक पात्र नहीं, भारतीय चेतना के शाश्वत आदर्श

भारतीय संस्कृति में प्रभु श्रीराम और भक्त-हृदय हनुमान केवल पूजा के विषय नहीं हैं, बल्कि वे जीवन-दर्शन के दो ऐसे स्तंभ हैं जिन पर भारतीय समाज की नैतिक और आध्यात्मिक चेतना खड़ी है। श्रीराम मर्यादा, सत्य, न्याय और उत्तरदायित्व के प्रतीक हैं, जबकि हनुमान समर्पण, सेवा, निष्ठा और निष्काम भक्ति के सर्वोच्च उदाहरण हैं। इन दोनों के संबंध को केवल भगवान और भक्त के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है; यह आदर्श नेतृत्व और आदर्श अनुयायी, आदर्श मित्र और आदर्श सेवक, आदर्श गुरु और आदर्श शिष्य के संबंध का भी अद्वितीय प्रतिमान है।

आज का युग विज्ञान, तकनीक और भौतिक उपलब्धियों का युग है। मनुष्य चंद्रमा तक पहुँच गया है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकसित कर चुका है, लेकिन अपने भीतर की शांति, विश्वास और नैतिक संतुलन को खोता जा रहा है। ऐसे समय में श्रीराम और हनुमान की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है। आज समाज में अधिकारों की चर्चा अधिक है, कर्तव्यों की कम; सफलता की दौड़ अधिक है, मूल्यों की कम। ऐसे वातावरण में श्रीराम हमें मर्यादा का महत्व सिखाते हैं और हनुमान हमें समर्पण की शक्ति का बोध कराते हैं।

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में हनुमान को केवल बल और पराक्रम का प्रतीक नहीं माना, बल्कि उन्हें भक्ति के सर्वोच्च स्वरूप के रूप में प्रस्तुत किया। तुलसीदास की दृष्टि में हनुमान वह भक्त हैं जिनके लिए प्रभु से बड़ा कुछ भी नहीं है। यही कारण है कि मानस में बार-बार यह भाव उभरता है कि भक्ति का सर्वोच्च रूप वही है जिसमें अहंकार का पूर्ण लोप हो जाए और जीवन का प्रत्येक कर्म ईश्वर को समर्पित हो जाए।

आज जब मनुष्य स्वयं को केंद्र में रखकर जीवन जी रहा है, तब हनुमान का चरित्र हमें सिखाता है कि महानता अधिकार प्राप्त करने में नहीं, बल्कि किसी उच्च उद्देश्य के लिए स्वयं को समर्पित करने में है।


आज के युग में हनुमान जैसे भक्त और राम जैसे आदर्श क्यों दुर्लभ होते जा रहे हैं?

यदि हम आधुनिक समाज को देखें तो एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से मन में उठता है—क्या आज हनुमान जैसे भक्त हैं? क्या आज राम जैसे मित्र, नेता, पुत्र और शासक हैं? यह प्रश्न केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक प्रश्न भी है।

हनुमान की सबसे बड़ी विशेषता उनकी निष्ठा थी। उन्होंने कभी स्वयं को केंद्र में नहीं रखा। उनकी प्रत्येक उपलब्धि राम को समर्पित थी। आज का समय इसके विपरीत आत्म-प्रदर्शन का समय बनता जा रहा है। सेवा भी प्रायः प्रसिद्धि के लिए होती है, मित्रता भी लाभ के लिए और संबंध भी स्वार्थ की कसौटी पर परखे जाने लगे हैं। ऐसे युग में हनुमान का निष्काम समर्पण दुर्लभ प्रतीत होता है।

इसी प्रकार श्रीराम का जीवन त्याग और मर्यादा का जीवन था। उन्होंने सत्ता के लिए संघर्ष नहीं किया, बल्कि सत्य की रक्षा के लिए वनवास स्वीकार किया। आज राजनीति से लेकर सामाजिक जीवन तक, अधिकार प्राप्त करने की होड़ दिखाई देती है, लेकिन कर्तव्य निभाने का साहस कम दिखाई देता है। राम का आदर्श हमें बताता है कि नेतृत्व का अर्थ शासन करना नहीं, बल्कि सबसे पहले स्वयं पर शासन करना है।

आज मित्रता की परिभाषा भी बदलती जा रही है। सामाजिक मीडिया के युग में हजारों संपर्क हो सकते हैं, किंतु संकट के समय साथ खड़े होने वाले मित्र बहुत कम मिलते हैं। हनुमान ऐसे मित्र थे जिन्होंने राम के दुःख को अपना दुःख समझा। उन्होंने केवल सलाह नहीं दी, बल्कि संघर्ष में साथ खड़े होकर समाधान प्रस्तुत किया। आधुनिक जीवन में हनुमान जैसे मित्रों की कमी इसलिए महसूस होती है क्योंकि निष्ठा की जगह सुविधा ने ले ली है।

तुलसीदास ने हनुमान को "रामदूत" कहा है। यह केवल एक पद नहीं, बल्कि जीवन का आदर्श है। दूत वह होता है जो स्वयं को भूलकर अपने आराध्य के संदेश को आगे बढ़ाए। आज का मनुष्य स्वयं को स्थापित करने में इतना व्यस्त है कि किसी बड़े आदर्श का वाहक बनने की प्रेरणा दुर्लभ होती जा रही है।

यही कारण है कि राम और हनुमान आज केवल धार्मिक स्मृतियाँ नहीं, बल्कि सामाजिक आवश्यकता बन गए हैं। समाज को राम की मर्यादा और हनुमान की निष्ठा दोनों की आवश्यकता है।


आधुनिक समाज, साहित्य और जीवन-दर्शन में राम-हनुमान की प्रासंगिकता

आधुनिक संदर्भ में राम और हनुमान की सबसे बड़ी प्रासंगिकता यह है कि वे मनुष्य को बाहरी सफलता के साथ आंतरिक उत्कृष्टता का मार्ग भी दिखाते हैं। आज शिक्षा ज्ञान दे सकती है, तकनीक सुविधा दे सकती है, लेकिन चरित्र निर्माण का कार्य अभी भी आदर्शों से ही संभव है।

साहित्य के क्षेत्र में राम और हनुमान केवल पात्र नहीं हैं; वे प्रतीक हैं। राम न्यायपूर्ण व्यवस्था, मानवीय संवेदना और नैतिक संतुलन के प्रतीक हैं। हनुमान समर्पित कर्म, निर्भीक साहस और निष्काम सेवा के प्रतीक हैं। इसलिए भारतीय साहित्य में उनकी उपस्थिति केवल धार्मिक आख्यान के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों के प्रतिनिधि के रूप में दिखाई देती है।

व्यावहारिक जीवन में भी यदि किसी संस्था, परिवार, समाज या राष्ट्र को सुदृढ़ बनाना है, तो वहाँ राम और हनुमान दोनों की आवश्यकता है। राम जैसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो न्यायपूर्ण और उत्तरदायी हो; हनुमान जैसे सहयोगियों की आवश्यकता है जो निष्ठावान और कर्मशील हों। केवल नेतृत्व पर्याप्त नहीं और केवल अनुयायी भी पर्याप्त नहीं। दोनों का संतुलन ही समाज को आगे बढ़ाता है।

आज के युवा के लिए हनुमान यह संदेश देते हैं कि आत्मविश्वास का आधार केवल शक्ति नहीं, बल्कि चरित्र होना चाहिए। वहीं राम यह संदेश देते हैं कि सफलता का मूल्य तभी है जब वह मर्यादा और नैतिकता के साथ प्राप्त हो।

गोस्वामी तुलसीदास ने भक्ति को पलायन नहीं माना, बल्कि जीवन को श्रेष्ठ बनाने का साधन माना। उनकी भक्ति भावना में राम केवल मंदिर के देवता नहीं हैं, बल्कि जीवन के आदर्श हैं; और हनुमान केवल पूजनीय वीर नहीं, बल्कि कर्मयोग और समर्पण के जीवंत उदाहरण हैं। इसलिए तुलसीदास की दृष्टि में भक्ति का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए आदर्शों का पालन करना है।

आज जब समाज विश्वास के संकट, संबंधों की कमजोरी, नैतिक द्वंद्व और मानसिक अशांति से जूझ रहा है, तब राम और हनुमान का संबंध एक प्रकाशस्तंभ की तरह दिखाई देता है। यह संबंध हमें सिखाता है कि शक्ति का आधार विनम्रता हो, नेतृत्व का आधार मर्यादा हो और संबंधों का आधार निष्ठा हो।

वास्तव में, आधुनिक युग की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं कि राम और हनुमान हमारे बीच नहीं हैं; बल्कि यह है कि हमने अपने भीतर के राम को मर्यादाओं से और अपने भीतर के हनुमान को समर्पण से दूर कर दिया है। जिस दिन मनुष्य अपने भीतर इन दोनों आदर्शों को पुनः जागृत कर लेगा, उसी दिन जीवन, समाज और संस्कृति में एक नई संतुलित चेतना का उदय होगा।

शुक्रवार, 12 जून 2026

समय-सरिता के उस पार ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

समय-सरिता के उस पार

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


भीड़ में बहुत लोग मिल जाते हैं, सब अपने नहीं होते,

हर उजले दर्पण के भीतर, सत्य के चेहरे नहीं होते।

हाथ मिलाना सहज कला है, साथ निभाना तप होता है,

बंद देहरी पर दीप जले तो, घर आलोकित नहीं होते।


ऋतुओं संग रंग बदल लेना, जग की पुरखिन रीति रही,

हर डाली पर झूम रहे फल, मधुरस वाले नहीं होते।

सुख की धूप में छाया बनकर, कितने जन संग चलते हैं,

दुःख की वर्षा सिर पर बरसे, तब सब अपने नहीं होते।


कुछ शब्दों में चंदन महके, कुछ में नागफनी उग आती,

हर मधुर वाणी के भीतर, निर्मल निर्झर नहीं होते।

समय-सरिता चुपके-चुपके, कितने मुख बहा ले जाती,

हर कागज़ की नाव नियति के, उस पार नहीं होती।


कुछ संबंध हिमशिखरों जैसे, युग-युग अचल खड़े रहते,

कुछ रेतों पर लिखे आख्यान, अगली लहर नहीं होते।

बीज वही वनराज बनें जो, तम की कोख सहन कर लें,

हर मुट्ठी में बिखरे दाने, वट-विस्तार नहीं होते।


कुछ पिघल जाते हैं जीवन की, पहली धूप की आहट से,

हर पत्थर की मौन गुफा में, जागे कुंदन नहीं होते।

घाव सभी के हिस्से आते, आँसू सबकी आँखों में हैं,

पर युग इतिहास बदल दें—सभी आँसू हिमालय नहीं होते।






सोमवार, 8 जून 2026

ईश्वर के करघे पर बुना हुआ आदमी ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

ईश्वर के करघे पर बुना हुआ आदमी

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


जीवन कच्चे धागे-सा, सूत बुनाई ईश्वर ही साथ

जब तक मन सच्चा रहता, तब तक उसका अटल हाथ

काल-करघा दिन-रैन निरंतर, खट-खट गान सुनाता है

भाग्य-तंतु पर बैठा बुनकर, मौन नियति लिख जाता है

साँस-साँस चर्खे की गति है, धड़कन तकली की झंकार

देह कपास, चेतन सूत है, प्राणों का अनुपम विस्तार।


माटी का यह क्षुद्र खिलौना, स्वयं गगन का स्वप्न बने

बूँद-बूँद में सिंधु समाया, कण-कण में अनहद स्वर तने

पीड़ा पनिहारिन बनकर जब, नयनों से निर्झर भरती है

तब अनुभव की स्वर्णिम गंगा, अंतर्मन में उतरती है

आशा नववधू बन आती, केसर-वर्णी भोर लिए

सपनों के माणिक चुनती है, अंबर की चितचोर लिए।


माया स्वर्ण-मृगों की टोली, वन-वन मन को दौड़ाती

सत्य हिमालय-सा अडिग खड़ा, हर भ्रम-रेखा मिटवाती

सुख चंपा की गंध सलोनी, दुःख धधकता पलाश बना

दोनों के संग-संग चलकर ही, जीवन पूर्ण प्रकाश घना

कर्मों के कर से बुनती है, हर दिन नई चदरिया काल

एक सिरा उत्सव में भीगा, दूजा भीगा अश्रु-जाल।


अहंकारों के दुर्ग गिरे सब, तिनकों जैसे आँधी में

प्रेम रहा पीपल-सा अक्षय, जलता हुआ समाधि में

रजनी काली स्याही लेकर, नभ पर ग्रंथ लिखाती है

तारों की अक्षर-माला से, ईश्वर कथा सुनाती है

हार स्वयं जय का द्वार बने, मृत्यु अमरता का उत्सव,

शून्य में सृष्टि दिखाई दे—यह चेतन का शाश्वत वैभव।


देह बाँसुरी, प्राण राग है, जगत् किसी की उँगली तान

जिसके संकेतों पर नाचे, चंद्र, सूर्य, धरती, आसमान

जब अंतिम संध्या उतरेगी, थककर रुक जाएगी हर साँस

तब भी उसके करघे पर ही, चलता रहेगा सृष्टि-विलास

जीवन कच्चे धागे-सा, सूत बुनाई ईश्वर के हाथ

ईश्वर के करघे से बुनता जन्म-मृत्यु जीवन-इतिहास।




अभिव्यक्ति के स्तर.....

मनुष्य का जीवन एक कच्चे धागे के समान है, जिसे ईश्वर समय के करघे पर कर्म, अनुभव, सुख-दुःख और विश्वास के रंगों से बुनता है। सत्य, प्रेम और विनम्रता से सजा जीवन ही सार्थक बनता है। अंततः मनुष्य ईश्वर की सृजन-कला का अद्भुत, चेतन और क्षणभंगुर किंतु दिव्य प्रतिरूप है।

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

रविवार, 7 जून 2026

पार्थ-सारथी ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

पार्थ-सारथी

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


कुरुक्षेत्र की धूल में डूबा था दिवस उदास,

शंखों की गर्जन में काँप रहा था आकाश।

रथ के अग्रभाग में बैठे थे योगेश्वर श्याम,

पीछे गांडीवधारी पार्थ, हृदय में मौन विराम।


जब बीच रणांगन में पहुँचा स्वर्णिम रथ महान,

द्रोण, भीष्म, कृप, अश्वत्थामा—दिखा समस्त विधान।

बंधु-बांधव, गुरुजन, अपने ही रक्त-संबंध,

देख अर्जुन का कंपित हुआ करुणा से अंतर्बंध।


बोले—क्या करूँ विजय का, यदि अपनों का हो क्षय?

रक्त-रंजित इस राज्य में फिर कैसा सुखमय जय?

गांडीव झुक गया, जैसे झुकता संध्या में भानु,

धर्म खड़ा था द्वार पर, भीतर रोता था प्राणु।


मुस्काए तब माधव, जैसे नभ में उगे प्रभात,

अंधियारे संशय पर बरसी ज्ञान-ज्योति की बात।

कर्म ही तेरा सत्य है, फल का मत अधिकार,

धर्म हेतु जो युद्ध हो, वही जीवन का सार।


वाणी बनी गीता वहाँ, क्षण बना अनंत प्रकाश,

मोह-तिमिर के बीच जगा आत्मा का विश्वास।

रथ का पहिया घूम उठा, जागा वीरत्व अपार,

कर्तव्य के दीपक ने हर लिया भय का अंधकार।


पार्थ हुआ फिर लक्ष्यवत, संकल्पों का धनुर्धर,

सारथी बने स्वयं हरि, पथ हुआ दिव्य, सुंदर।

जीवन भी कुरुक्षेत्र है, मन ही अर्जुन-दीन,

अंतर्यामी कृष्ण हैं, यदि श्रद्धा रहे प्रवीण।


जब-जब संशय घेर ले, जब टूटे साहस-तार,

स्मरण करो उस रथी को, जो था जग का आधार।

धर्म-पथ पर चलने वाले होते नहीं निराश—

पार्थ जहाँ संकल्प है, वहाँ सारथी है प्रकाश।

शुक्रवार, 5 जून 2026

धूप के हिस्से का आदमी ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

धूप के हिस्से का आदमी

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


हर अच्छे कर्म के बाद मुझे अपराधबोध-सा लगता था,

हिमालय अपना जल देकर प्यासा पथराया-सा जगता था।

जिनके आँगन दीप जलाए, जिनके दुःख को ओढ़ लिया,

वही समय की आँधी बनकर मेरा छप्पर उड़ा गया।


अपनों के शब्दों में अक्सर बर्फ़ की किरचें बोई थीं,

मुस्कानों की थाली में भी चुप विष-बूँदें रोई थीं।

मैंने जिनको वृक्ष समझकर छाया का अधिकार दिया,

उनकी जड़ों ने ही चुपके मेरा ही आधार लिया।


बाज़ीगर के मेले जैसा देखा जग का कारोबार,

बंदर, भालू, मदारी सब कर गए अपना-अपना प्रचार।

जब तक जेब में धूप रही, सबने मुझको घेर लिया,

साँझ ढली तो भीड़ ने मुझसे अपना मुँह फेर लिया।


महलों की खिड़की से झाँके सोने के अंधेरे कई,

फुटपाथों पर मैंने देखे चाँद सँजोते चेहरे कई।

दुनिया के इस रंगमंच पर कैसा विचित्र विधान मिला,

जिसके हिस्से फूल लिखे थे, उसको ही श्मशान मिला।


मैंने जिन नावों को अपने कंधों पर दरिया तक ढोया,

उन नावों ने बीच भँवर में मेरा पतवार ही खोया।

विश्वासों की मिट्टी गूँथी, सपनों का घर-बार रचा,

पहली वर्षा आते ही वह कागज़ जैसा बिखर गया।


लेकिन जब सब द्वार बंद थे, पथ भी मुझसे रूठ गया,

मन का आख़िरी दीपक भी थककर जैसे टूट गया।

तब एक अजनबी मुस्काया बरगद की ठंडी छाँव लिए,

जैसे कोई देवदूत उतरे बादल की नाव लिए।


जिसको मैंने जाना तक न था, वह मरहम बनकर आ गया,

सूखे मन के निर्जन वन में सावन बनकर छा गया।

रिश्तों के स्वर्णिम मुखौटे जब धूल-धूसर हो जाते हैं,

तब अनजाने पथिक अचानक ईश्वर जैसे आते हैं।


जीवन ने यह पाठ पढ़ाया— रक्त नहीं सब अपने हैं,

कुछ चेहरे दर्पण होते हैं, कुछ चेहरे बस सपने हैं।

जो टूटन में साथ निभाए, वही असली संसार मिला,

बाकी तो बस मेला था, पल भर का व्यापार मिला।


अब मैं दुख की राख सँभाले फिर भी उजियारा बुनता हूँ,

पत्थर खाकर भी दरिया-सा अपना रस्ता चुनता हूँ।

क्योंकि अँधियारे के भीतर एक सत्य सदा मुस्काता है,

भगवान कभी-कभी मानव बनकर राहों में आ जाता है।




प्रकृति का मौन ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

प्रकृति का मौन

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


कहा जाता है

कि प्रकृति मौन है।


पर कौन जानता है

कि मौन भी एक भाषा होती है—

जिसकी वर्णमाला में

पत्तों की थरथराहट,

धूप की धीमी चाल

और जल की अनकही स्मृतियाँ लिखी होती हैं।


मैंने देखा है—


एक पहाड़ को

सदियों से खड़े हुए।


उसने कभी अपनी ऊँचाई का परिचय नहीं दिया,

फिर भी बादल

उसके कंधों पर सिर रखकर

विश्राम करते रहे।


शायद स्थिरता

अपना परिचय स्वयं नहीं देती।



और नदी...


वह किसी ग्रंथ की रचयिता नहीं,

फिर भी उसकी देह पर

अनगिनत भूगोल लिखे हुए हैं।


वह जहाँ-जहाँ मुड़ी,

धरती का चेहरा बदलता गया।


मानो गति ही

जल की आत्मकथा हो।


वन के भीतर खड़े वृक्ष

मुझे हमेशा वृद्ध ऋषियों जैसे लगे हैं।


वे बोलते नहीं,

केवल अपनी छाया को

धीरे-धीरे पृथ्वी पर उतारते रहते हैं।


जैसे कोई अनुभवी मन

अपने निष्कर्षों को नहीं,

अपनी करुणा को बाँटता हो।


फूलों के पास

कोई इतिहास नहीं होता।


वे केवल एक सुबह खिलते हैं

और संध्या तक

अपने रंगों को समय के हवाले कर देते हैं।


किन्तु उनकी अल्पायु में भी

एक ऐसा वैभव होता है

जो साम्राज्यों की दीर्घायु को

निस्तेज कर देता है।


इधर शहर हैं।


काँच की दीवारों में कैद

अनगिनत प्रतिबिंब।


हर चेहरा

अपने ही बनाए हुए किसी दर्पण में

लगातार प्रवेश करता हुआ।


संचार के असंख्य माध्यम हैं,

पर संवाद

जाने किस पुराने जंगल में

रास्ता भटक गया है।


लोग जुड़े हुए दिखाई देते हैं,

पर भीतर कहीं

द्वीपों की तरह अलग-अलग पड़े हैं।


उनकी आँखों में

सूचनाओं की चमक है,

किन्तु सपनों की नमी

धीरे-धीरे वाष्पित होती जा रही है।


ऐसे समय में


एक पक्षी का अचानक गाना

मुझे किसी भूली हुई सभ्यता का

अंतिम शिलालेख लगता है।


एक पत्ती का गिरना

किसी ऋतु का नहीं,

अहंकार के एक और भ्रम का अंत प्रतीत होता है।


और आकाश...


वह आज भी उतना ही फैला है।


हमने देशों की रेखाएँ खींचीं,

धर्मों के घेरे बनाए,

पहचानों के दुर्ग खड़े किए,


किन्तु उसके विस्तार में

कहीं कोई सीमा अंकित नहीं हुई।


मानो अनन्तता

हर दिन हमारे ऊपर झुककर

हमारी छोटी-छोटी परिभाषाओं पर

मुस्करा देती हो।


तब लगता है—


प्रकृति का सौंदर्य

उसके रूप में नहीं,

उसकी विरक्ति में है।


वह सब कुछ रचती है,

पर किसी स्वामित्व का दावा नहीं करती।


वह सबको आश्रय देती है,

पर किसी स्मारक की आकांक्षा नहीं रखती।


और शायद यहीं

मनुष्य और प्रकृति के बीच

सबसे गहरा अंतर छिपा है।


मनुष्य अपने होने को सिद्ध करना चाहता है,

प्रकृति केवल होती है।


मनुष्य स्मृति में अमर होना चाहता है,

प्रकृति प्रत्येक क्षण में पूर्ण।


इसीलिए जब कभी

सभ्यता का शोर

बहुत अधिक हो जाता है,


मैं किसी जंगल की ओर नहीं,

अपने भीतर की उस जगह की ओर लौटता हूँ


जहाँ अब भी

एक नदी बह रही है,

एक पहाड़ खड़ा है,

एक वृक्ष छाया दे रहा है,

और एक आकाश

बिना किसी शर्त के फैला हुआ है।


वहीं समझ में 

आता है—


कि जीवन का सबसे गहरा सत्य

किसी उद्घोषणा में नहीं,


बल्कि उन चीज़ों में छिपा है

जो चुप रहकर भी

समय की सबसे लंबी बातचीत करती रहती हैं।





मंगलवार, 2 जून 2026

पर्दा-ए-अदब ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

पर्दा-ए-अदब..

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी ..

इतना भी होशियार न बनिए जनाब,

हम वाक़िफ़-ए-हक़ीक़त होकर भी नादान बने हैं।

आपकी हर चाल, हर इशारा समझते हैं,

मगर अदब में लबों को ख़ामोश किए हैं।


आपको गुमाँ है कि राज़ छिपा लिया आपने,

हम तो परत-दर-परत दास्ताँ पढ़े बैठे हैं।

हम फ़रेब का चेहरा पहचानते हैं मगर,

तअल्लुक़ की ख़ातिर अनजान बने बैठे हैं।


निगाहों की ज़ुबाँ भी समझते हैं हम,

दिल के हर एहसास से वाक़िफ़ बने हैं।

इतना भी होशियार न बनिए हुज़ूर,

हम जानकर भी अंजान बने हैं।


आपकी सियासत का इल्म भी है हमें,

आपकी नीयत का भी अंदाज़ा है।

मगर आपकी रुसवाई न हो महफ़िल में,

इसलिए ख़ुद को बेख़बर दिखाया है।



सोमवार, 1 जून 2026

श्री राम अब भी लौटते हैं..! (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

श्री राम अब भी लौटते हैं..!  (कविता)


©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


कभी

अयोध्या केवल एक नगर नहीं थी,

वह मनुष्य के भीतर जलता हुआ

विश्वास का पहला दीपक थी।


और श्री राम—

केवल एक राजकुमार नहीं थे,

वे उस दीपक की लौ थे

जो आँधियों में झुकती थी, पर बुझती नहीं थी।


आज भी

जब जीवन की सड़कों पर

स्वार्थ के विज्ञापन चमकते हैं,

श्री राम चुपचाप वन की ओर निकल पड़ते हैं।


प्रिय बंधु!

श्री राम का वनवास चौदह वर्षों का नहीं था,

वह हर उस क्षण का वनवास था

जब सत्य अकेला खड़ा था।

जब सिंहासन सामने था,

और पिता का वचन भी,

श्री राम ने राजमुकुट नहीं चुना,

उन्होंने मनुष्य होने का गौरव चुना।


आज

हम सुविधा के लिए संबंध छोड़ देते हैं,

श्री राम ने संबंधों के लिए

संपूर्ण साम्राज्य छोड़ दिया था।


शहरों में

बहुत से लोग सफल दिखते हैं,

पर श्री राम ने सिखाया—

सफलता से पहले सज्जनता आवश्यक है।

संबंध आवश्यक है..!


वन की पगडंडियाँ

उनके चरणों से नहीं,

उनकी करुणा से प्रकाशित थीं,

जैसे अंधकार स्वयं दीप बन गया हो।


जहाँ-जहाँ वे गए,

वहाँ-वहाँ पेड़ों ने छाया नहीं दी,

मानो प्रकृति स्वयं

मर्यादा के चरण धो रही हो।


शबरी की झोपड़ी में

कोई राजसी वैभव नहीं था,

फिर भी वहाँ प्रेम का वह सिंहासन था

जिस पर स्वयं ईश्वर बैठ गए।


श्री राम ने कभी

भक्ति की जाति नहीं पूछी,

उन्होंने केवल हृदय का स्वाद चखा,

और प्रेम को प्रसाद बना दिया।


आज

लोग चेहरे पढ़ते हैं,

श्री राम ने मन पढ़ा था,

इसीलिए वे सबके अपने हो गए।


केवट की नाव में

केवल नदी पार नहीं हुई थी,

वहाँ मनुष्य और ईश्वर के बीच

एक अनन्त विश्वास पार हुआ था।


हनुमान की आँखों में

श्री राम कोई राजा नहीं थे,

वे वह नाम थे

जिसे स्मरण करते ही भय टूट जाता था।


समुद्र के सामने

जब पूरी सेना रुक गई थी,

श्री राम ने क्रोध से पहले

संवाद का मार्ग चुना था।


यही कारण है कि

उनके धनुष की टंकार से अधिक,

उनके धैर्य की प्रतिध्वनि

युगों तक सुनाई देती है।


रावण केवल लंका में नहीं था,

वह अहंकार बनकर

हर युग के भीतर

अपना स्वर्ण-महल बनाता रहा।


और श्री राम—

हर बार तीर लेकर नहीं आते,

कभी वे विवेक बनकर आते हैं,

कभी वे करुणा बनकर आते हैं।


कभी माँ की सीख में,

कभी पिता की आँखों में,

कभी गुरु के वचनों में,

कभी किसी निर्धन की प्रार्थना में।


आज

मोबाइल की रोशनी बहुत है,

पर मन के भीतर

अंधेरे भी कम नहीं हैं।


जानकारी का समुद्र है,

पर शांति की एक बूँद नहीं,

ऐसे समय में

श्री राम एक प्रार्थना की तरह याद आते हैं।


जब रिश्ते

जायदाद के कागज़ों में बँट जाते हैं,

भरत का त्याग

फिर से आँखों में उतर आता है।


जब भाई भाई से दूर होता है,

तब नंदिग्राम की मिट्टी

धीरे से कहती है—

"प्रेम ही सबसे बड़ा राज्य है।"


जब स्त्री का सम्मान

समाज के शोर में दब जाता है,

तब सीता का धैर्य

आकाश की तरह खड़ा दिखाई देता है।


जब अन्याय शक्तिशाली हो जाता है,

तब श्री राम का धनुष

किसी अस्त्र की तरह नहीं,

न्याय की चेतना की तरह चमकता है।


श्री राम ने

केवल राक्षसों का वध नहीं किया,

उन्होंने मनुष्य के भीतर छिपे

असंख्य अंधकारों को चुनौती दी।


उनका जीवन

एक महाकाव्य कम,

एक खुली हुई दिशा अधिक है,

जिसमें मनुष्य स्वयं को खोज सकता है।


पहाड़ों की नदियों की तरह

वे आज भी बह रहे हैं,

बस हमारे कान

शोर में उलझ गए हैं।


वे आज भी

किसी शबरी की प्रतीक्षा में हैं,

किसी केवट की सरलता में हैं,

किसी हनुमान की निष्ठा में हैं।


वे मंदिरों में हैं,

पर केवल मंदिरों में नहीं हैं,

वे उस आँसू में भी हैं

जो किसी और के दुःख पर गिरता है।


वे आरती में हैं,

पर केवल आरती में नहीं हैं,

वे उस हाथ में भी हैं

जो बिना स्वार्थ किसी को थाम लेता है।


श्री राम कहीं बाहर नहीं हैं,

वे मनुष्य के भीतर बची हुई

आख़िरी करुणा का नाम हैं,

आख़िरी मर्यादा का नाम हैं।


और जब भी

समय का अंधकार

आत्मा पर छाने लगता है,


जब भी

भीड़ के बीच

मनुष्य स्वयं को खोने लगता है,


जब भी

स्वार्थ का रावण

अंदर सिर उठाने लगता है,


तब

मन के किसी शांत कोने से

एक धीमी, स्निग्ध और करुण आवाज़ आती है—


“श्री राम अब भी वन से लौट रहे हैं,

बस उन्हें पहचानने वाली आँखें चाहिए।”


और तब लगता है—

अयोध्या कहीं बाहर नहीं,

वह आज भी

हमारी करुणा,

हमारी सत्यनिष्ठा,

हमारी विनम्रता,

हमारी सहिष्णुता,

और हमारे बचे हुए मनुष्यत्व में

धीरे-धीरे दीपक की तरह जल रही है।


वह दीपक ही श्री राम हैं।

वह प्रकाश ही श्री राम हैं।

वह पथ ही श्री राम हैं।

वह विश्वास ही श्री राम हैं।


जब संसार थक जाता है,

तब जो आशा शेष रहती है,

जब मनुष्य टूट जाता है,

तब जो करुणा शेष रहती है—


वही श्री राम हैं।

वही मर्यादा हैं।

वही जीवन का संगीत हैं।

वही मनुष्य होने का परम सौन्दर्य हैं। 




रविवार, 31 मई 2026

पंख पलायन (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 पंख पलायन (कविता) 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


(प्रथम अंश)

कल की चिंता करने वाले, अपना आज बनाने वाले,

विस्थापन की मिट्टी में, बीज पलायन बोने वाले।

अपने घरों में ताला लगाकर, छोटे-फ्लैट में सोने वाले,

अपनी जड़ों से दूर हुए, पहचान स्वयं की खोने वाले।

कथनी-करनी में भेद जहाँ, फिर जीवन-भर को रोते हैं,

लौट नहीं सकते वह पक्षी, बीच समुद्र पथ खोते हैं।


(द्वितीय अंश)

कंक्रीटों के जंगल में, पीपल की छाया खोने वाले,

सुविधाओं के स्वर्ण-पिंजर में, अपने नभ को गँवाने वाले।

खिड़की भर आकाश बचाकर, उसको ही विस्तार कहने वाले,

स्मृतियों की बुझती राखों में, बीते उत्सव ढोने वाले।

जब मन की सूनी साँझों में, घर के आँगन याद आते हैं,

लौट नहीं सकते वह पक्षी, बीच समुद्र पथ खोते हैं।


(तृतीय अंश)

नदियों से नाता तोड़कर, मरुथल में सपने बोने वाले,

माटी की भाषा भूल गए, बाज़ारों में खोने वाले।

जड़ों से कटकर ऊँचाइयों का, केवल भ्रम संजोने वाले,

अपनी ही परछाईं से, जीवन-भर प्रश्न संजोने वाले।

जब पहचान के दर्पण में, बिखरे चेहरे दिखते हैं,

लौट नहीं सकते वह पक्षी, बीच समुद्र पथ खोते हैं।


(चतुर्थ अंश)

बरगद की बूढ़ी छाया को, स्मृतियों में ढोने वाले,

सूने गांवों की प्रतिध्वनि, अपने भीतर बोने वाले।

धरती से ऊँचे उठकर भी, धरती को ही खोने वाले,

जीवन भर उपलब्धियों के बीच, एक रिक्ति संजोने वाले।

जब जड़हीन समय के झोंके, अस्तित्व-दीप को धोते हैं,

लौट नहीं सकते वह पक्षी, बीच समुद्र पथ खोते हैं।


(पंचम अंश)

रेत-घड़ी के गिरते कण-से, अपने दिन को खोने वाले,

स्मृतियों के जलते वन में, छाया भर को ढोने वाले।

आकाशों की सीमा छूकर, भीतर से बौने होने वाले,

स्वर्णिम द्वारों के आगे भी, मन के द्वार न खोलने वाले।

जब अंतिम संध्या में अपने ही, पदचिह्न अपरिचित होते हैं,

लौट नहीं सकते वह पक्षी, बीच समुद्र पथ खोते हैं।


"पंख पलायन" को और जाने...!

यह कविता केवल घर छोड़ने की कथा नहीं है, बल्कि मनुष्य के भीतर घटित उस अदृश्य विस्थापन की कहानी है, जिसे संसार सफलता कहता है और आत्मा धीरे-धीरे निर्वासन के रूप में जीती है।

यह उन लोगों की गाथा है जो बेहतर भविष्य की खोज में निकलते हैं, पर यात्रा के किसी मोड़ पर पाते हैं कि भविष्य की कीमत उन्होंने अपने अतीत से चुकाई है। उन्होंने शहर तो पा लिया, पर चौखट खो दी; उन्होंने सुविधा तो पा ली, पर अपनापन खो दिया; उन्होंने आकाश छू लिया, पर जड़ों का स्पर्श खो दिया।

कविता का पक्षी केवल पक्षी नहीं है। वह आधुनिक मनुष्य का प्रतीक है—वह मनुष्य जो उड़ना चाहता है, सीमाएँ तोड़ना चाहता है, अपने लिए नए क्षितिज बनाना चाहता है। परंतु हर उड़ान मुक्ति नहीं होती। कुछ उड़ानें ऐसी भी होती हैं जो मनुष्य को उसकी मिट्टी, उसकी भाषा, उसकी स्मृतियों और उसकी पहचान से दूर ले जाती हैं। तब पंख विस्तार का नहीं, पलायन का प्रतीक बन जाते हैं।

विस्थापन केवल भूगोल का परिवर्तन नहीं है। यह स्मृतियों के मानचित्र पर पड़ने वाली दरार है। यह वह क्षण है जब घर एक स्थान नहीं, बल्कि एक अनुपस्थिति बन जाता है। जब गाँव नक्शे में बचा रहता है, पर जीवन से धीरे-धीरे मिटने लगता है। जब बरगद की छाया स्मृति बन जाती है और चौपाल की आवाज़ प्रतिध्वनि।

मनुष्य जब अपनी जड़ों से दूर जाता है तो वह केवल दूरी नहीं तय करता, वह अपने भीतर एक रिक्त स्थान भी निर्मित करता है। यह रिक्तता धन से नहीं भरती, उपलब्धियों से नहीं भरती, प्रतिष्ठा से नहीं भरती। यह वही रिक्तता है जो भीड़ के बीच अकेलापन बनकर, सफलता के बीच अधूरापन बनकर और उत्सवों के बीच एक अनाम उदासी बनकर उपस्थित रहती है।

कविता यह भी संकेत करती है कि आधुनिकता का सबसे बड़ा संकट बाहरी नहीं, आंतरिक है। मनुष्य ने ऊँची इमारतें बना लीं, पर स्मृतियों के लिए जगह छोटी कर दी। उसने संसार को निकट कर लिया, पर अपने लोगों को दूर कर दिया। उसने समय बचाया, पर जीवन खो दिया। उसने गति प्राप्त की, पर दिशा खो दी।

यह काव्य उस मनोवैज्ञानिक विखंडन की भी पड़ताल करता है जिसमें मनुष्य दो हिस्सों में बँट जाता है—एक हिस्सा वर्तमान में जीता है, दूसरा लगातार अतीत की ओर लौटना चाहता है। एक शरीर महानगर में रहता है, पर आत्मा अब भी किसी गाँव की पगडंडी पर भटकती रहती है।

अंततः "पंख पलायन" एक प्रश्न है—क्या हर उड़ान प्रगति है? क्या हर उपलब्धि पूर्णता है? क्या जड़ों से कटकर भी वृक्ष हरा रह सकता है? कविता किसी निष्कर्ष को थोपती नहीं, बल्कि पाठक को उसके अपने जीवन के सामने खड़ा कर देती है।

और तब समझ में आता है कि समुद्र केवल जलराशि नहीं है; वह समय, दूरी, महत्वाकांक्षा और विस्मृति का प्रतीक है। जो पक्षी उसे पार करते हैं, वे अक्सर नए किनारे तो पा लेते हैं, पर लौटने का मार्ग खो बैठते हैं।

इसीलिए यह कविता पलायन का विरोध नहीं करती, बल्कि स्मृति का पक्ष लेती है; उड़ान को नहीं रोकती, पर जड़ों को बचाए रखने की विनती करती है। क्योंकि मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि वह घर छोड़ देता है, बल्कि यह है कि एक दिन घर उसे छोड़ देता है।

और उस दिन, सबसे अधिक अकेला वही होता है जिसके पास सब कुछ होता है—सिवाय अपनी मिट्टी के।


©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


शनिवार, 30 मई 2026

पहाड़ का दर्द - ( हिंदी कविता : पहाड़, शहर और बदलते समय का तुलनात्मक आख्यान)©डॉ. चंद्रकांत तिवारी





पहाड़ का दर्द ..!

सुनो दाज्यू और भैजी....



©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 



पत्थर की छतों पर
अब धूप नहीं उतरती,
सीमेंट की दीवारों ने
आकाश का हिस्सा खरीद लिया है।
जहाँ कभी
काफल की डालियों पर
बचपन झूलता था,
वहाँ अब मोबाइल टावर खड़े हैं
और पक्षियों की जगह
नेटवर्क के सिग्नल चहकते हैं।

यार !
पहाड़ अब भी वहीं है,
पर पहाड़ का मन
कहीं खो गया है।
कभी गाँव की पगडंडी
दादी की कहानी थी,
आज वह सड़क बनकर
शहर की ओर भाग रही है।
पहले घरों के दरवाजे
सुबह की तरह खुले रहते थे,
अब हर चौखट पर
लोहे के ताले हैं
और हर चेहरे पर
अदृश्य पहरेदार।
शहर में
रोशनी बहुत है,
पर उजाला कम।

गाँव में
सुविधाएँ कम थीं,
पर मन के आँगन बड़े थे।
आज महानगर की ऊँची इमारतें
आकाश को छूने का दावा करती हैं,
किन्तु उनमें रहने वाले लोग
एक-दूसरे तक नहीं पहुँच पाते।
लिफ्टें ऊपर चढ़ती हैं,
रिश्ते नीचे उतरते हैं।
सड़कों पर
गाड़ियों का समुद्र बहता है,
पर आदमी
अपने भीतर के रेगिस्तान में
प्यासा खड़ा है।
पहाड़ में
दो सूखी रोटियों के साथ
हँसी परोसी जाती थी,
शहर में
सजे हुए भोजन के बीच
अकेलापन बैठा रहता है।

पहले
दूध के गिलास पर
भाई-बहनों की नोंकझोंक थी,
अब
जायदाद के कागजों पर
अदालतें खड़ी हैं।
पहले
माँ के हाथों की रोटी
घर की धड़कन थी,
अब
ऑनलाइन ऐप से आया भोजन
पेट भरता है,
स्मृतियाँ नहीं।

दादी की झुर्रियाँ
कभी जीवन का विश्वविद्यालय थीं,
आज
बुज़ुर्गों के अनुभव
डिजिटल शोर में
म्यूट कर दिए गए हैं।

शहर में
समय घड़ी की सुइयों में दौड़ता है,
गाँव में
वह कभी बैलों की चाल से चलता था।
अब
बच्चे मिट्टी से नहीं खेलते,
स्क्रीन पर उँगलियाँ फेरते हैं।
उनकी आँखों में
तितलियों की जगह
पासवर्ड रहते हैं।

उनके सपनों में
नदी नहीं बहती,
डेटा बहता है।
पहाड़ की नदी
आज भी गा रही है,
पर उसे सुनने वाले कान
हेडफोन में कैद हैं।

वृक्षों की छाया
धीरे-धीरे कट रही है,
और मनुष्यता की छाया भी।
नदियाँ सिकुड़ रही हैं,
जैसे रिश्तों का जलस्तर।

पहाड़ से शहर तक
पलायन की एक लंबी नदी बह रही है,
जिसके किनारे
खाली होते घर
अपने लोगों को पुकारते हैं।

बंद खिड़कियाँ
प्रतीक्षा के स्मारक बन गई हैं।
सूने आँगन में
उग आई घास
समय की चुप्पी लिखती है।

कभी
शंख और घंटियों की ध्वनि
सुबह जगाती थी,
अब
मोबाइल का अलार्म
नींद से अधिक बेचैनी जगाता है।

पहाड़ के देवदार
अब भी खड़े हैं,
पर मनुष्य की जड़ें
ढीली पड़ गई हैं।
हमने
सुविधाओं के लिए
संबंध खो दिए।

गति के लिए
गहराई खो दी।
सूचनाओं के लिए
अनुभूतियाँ खो दीं।
और विकास के लिए
कभी-कभी
अपना ही घर खो दिया।

फिर भी
पहाड़ केवल भूगोल नहीं है,
वह स्मृति है।
वह मनुष्य के भीतर बची हुई
आखिरी हरियाली है।

जब भी
शहर का धुआँ
आत्मा को ढक लेता है,
जब भी
भीड़ के बीच
अकेलापन चीखने लगता है,
जब भी
कंक्रीट के जंगल
साँसों पर बोझ बन जाते हैं,
तब
मन के किसी कोने से
एक पुरानी आवाज आती है—
"यार" !
पहाड़ में दिन कितने अच्छे थे...!

और तब लगता है,
कि पहाड़
कहीं बाहर नहीं,
वह अब भी
हमारी स्मृतियों,
हमारी भाषा,
हमारी करुणा,
और हमारे बचे हुए मनुष्यत्व में
धीरे-धीरे साँस ले रहा है।

शुक्रवार, 29 मई 2026

किस्से किस्तों में... ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 तेरी बेरुख़ी ने भी क्या कमाल कर दिया,

हम हँसते रहे और दिल बेहाल कर दिया।


वो इश्क ही क्या जिसमें तड़प बाकी न रहे,

आँखें सूख जाएँ मगर नमी बाकी न रहे।


तू छोड़ गया यूँ जैसे कभी था ही नहीं,

और हम आज तक तुझे खोया मानते रहे।


तेरे बाद ख़ामोशी भी चीख़ती रही,

हम रोते रहे और दुनिया देखती रही।


मोहब्बत में हारकर भी तुझी को चाहा,

ये कैसा ज़हर था जो मुस्कुरा के पिया।


दिल टूटा तो आवाज़ तक न आई,

जैसे टूटकर तारा कहीं खो गया हो।


वो कहकर गया था “ख़ुश रहना”,

और सारी ख़ुशियाँ साथ ले गया।


तेरे इश्क में खुद को मिटा बैठे,

अब आईना भी हमें पहचानता नहीं।


तू मिला भी अधूरा, तू गया भी अधूरा,

हमारा हर सपना रह गया अधूरा।


तेरी यादों का धुआँ आज भी उठता है,

दिल का शहर अब भी धीरे-धीरे जलता है।


हमने चाहा तुझे सजदे की तरह,

और तूने छोड़ा हमें गुनाह की तरह।


तेरी चुप्पी ने सबसे ज़्यादा मारा,

लफ़्ज़ कम थे मगर दर्द बहुत सारा।


तू किसी और की बाहों में हँसता रहा,

और मेरा दिल रातभर मरता रहा।


मोहब्बत की किताब में बस इतना पढ़ा,

जिसे टूटकर चाहो वही छोड़ जाता है।


वो इश्क भी क्या इश्क था साहिब,

जिसमें आँसू न हों और रातें न जागें।


तेरे बिना अब कोई शिकायत भी नहीं,

तू मेरा था ही नहीं — ये यक़ीन अब हुआ।


हमने दिल दिया था रोशनी समझकर,

वो अँधेरा देकर चला गया।


तूने पूछा भी नहीं हाल मेरे दिल का,

और हम तेरे हर दर्द की दुआ करते रहे।


कुछ रिश्ते टूटकर भी खत्म नहीं होते,

बस लोग चुप हो जाते हैं।


अब मोहब्बत से डर लगता है,

क्योंकि दिल आज भी तेरा नाम सुनकर धड़कता है।


किस्से किस्तों में... ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 

घर की किस्तों में उम्र यूँ ही उतरती रही,

छत तो मिल गई मगर नींद किराये पर रही।


रोटी की जंग में कितने रिश्ते थक गए,

कुछ लोग भूखे रहे, कुछ लोग अहंकार से भर गए।


नौकरी मिली तो बचपन कहीं गुम हो गया,

वक्त कमाने निकले थे, सुकून कम हो गया।


बीवी की आँखों में शिकायत भी दुआ जैसी थी,

घर की तंगी में भी उसकी वफ़ा अमीरों जैसी थी।


बेटे बड़े हुए तो मकाँ बाँटने लगे,

माँ-बाप उम्र भर बस घर बनाने लगे।


हर आदमी यहाँ किसी चिंता का मरीज़ है,

कोई तन से परेशान, कोई दिल से गरीब है।


भागती दुनिया ने इतना थका दिया मुझे,

अब सुकून मिलता है चुप रहकर चाँद देखने में।


जिसे दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती,

उसी के घर में अक्सर सबसे ज़्यादा हँसी होती।


ज़िंदगी ने हर मोड़ पर हिसाब माँगा मुझसे,

मैं मुस्कुराता रहा और कर्ज़ बढ़ता गया।


कितनी अजीब है ये शहरों की रौनक भी,

भीड़ लाखों की है मगर आदमी तन्हा है।


बेटियाँ घर की इज़्ज़त भी हैं और रौनक भी,

फिर भी लोग उन्हें बोझ कहने से नहीं डरते।


पति-पत्नी के झगड़ों में अक्सर यही देखा,

दोनों सही होते हैं मगर वक्त ग़लत होता है।


उम्र भर कमाते रहे मकान, गाड़ी और दौलत,

मरते वक्त बस एक गिलास पानी की प्यास रही।


जिसने जितना दर्द सहा, उतना ख़ामोश हुआ,

शहर का सबसे गहरा आदमी कम बोलता है।


आजकल लोग रिश्तों में वक़्त नहीं देते,

और उम्मीद करते हैं कि मोहब्बत ज़िंदा रहे।


बेरोज़गारी ने बच्चों से बचपन छीन लिया,

अब खिलौनों की जगह फ़ॉर्म भरे जाते हैं।


कुछ लोग थाली में नमक तक गिनते हैं,

और कुछ लोग दुख में भी शुक्र अदा करते हैं।


ज़िंदगी ने मुझे मिट्टी की तरह बरता है,

तभी हर ठोकर के बाद मैं और मज़बूत हुआ हूँ।


घर छोटा हो तो भी चल जाता है साहब,

बस दिलों में दरारें बड़ी नहीं होनी चाहिए।


हमने सीखा है फ़क़त इतना इस ज़माने से,

खुश वही लोग हैं जो कम में भी शुक्रगुज़ार हैं।