कफ़न की जेब (कहानी)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड
शहर की सुबह पहाड़ की सुबह जैसी नहीं होती।
यहाँ हर चीज़ तेज़ तर्रार समाचार बुलेटिन की तरह होती है और पहाड़ मौन साधना में लीन और स्वाभाविक।
शिवनाथ भट्ट उस घोषणा से पहले ही जाग चुका था। उसकी नींद अब वर्षों से प्राकृतिक नहीं रही थी; अलार्म से नहीं, दायित्व से जागता था। खिड़की से बाहर झाँकते हुए उसने नीचे दौड़ती गाड़ियों को देखा, मानो समय खुद फँसा हो और फिर भी भाग रहा हो। शीशे में उसका चेहरा स्थिर था, पर आँखों के भीतर बेचैनी थी, जिसे वह अनुशासन कहकर दबा देता था।
टाई बाँधते हुए उसने मन ही मन कहा—
“भावुकता कमजोरी नहीं, नियंत्रण है।”
यह वाक्य उसका हथियार था।
शिवनाथ भट्ट—एक नाम जो अब फ़ाइलों और आदेशों में दर्ज था। एक निर्णय से गाँव जुड़ता या कटता था। लेकिन यही व्यक्ति कभी अपनी माँ को जूते पहनते देख अपराधबोध से थरथराता था।
पत्नी रसोई में चाय रख रही थी। हल्की खाँसी—एक संकेत। शब्द नहीं, समझ। दोनों के बीच वर्षों की दूरी थी, जो धीरे-धीरे घर के हर कोने में फैल गई थी।
“आज माँ का फोन आया था,” पत्नी ने कहा।
“क्या कहा?” शिवनाथ ने अख़बार उठाते हुए पूछा।
“कुछ नहीं… बस याद कर रही थीं।”
“ठीक है,” उसने कहा।
यह ‘ठीक है’ उसकी सबसे सुरक्षित प्रतिक्रिया थी।
मन ही मन उसने सोचा—मैं उनके लिए ही तो यह सब कर रहा हूँ।
यह आत्म-औचित्य हर बार उसे राहत देता था। कठोर होना दोष नहीं, मजबूरी है—वह स्वयं से यही कहता था।
ऑफिस पहुँचते ही उसका नाम किसी घोषणा की तरह गूँजा। लोग खड़े हो गए। यह दृश्य उसे सुकून देता था। सम्मान नहीं—नियंत्रण।
एक मीटिंग में युवा अधिकारी ने कहा—
“सर, परियोजना से पहाड़ी क्षेत्र के गाँव प्रभावित हो सकते हैं।”
“विकास में बलिदान देना पड़ता है,” शिवनाथ ने कहा।
“लेकिन—”
“लोग आँकड़ों में समायोजित हो जाते हैं।”
उसने बातचीत बीच में ही काट दी।
भीतर कहीं एक आवाज़ फुसफुसाई—तू भी कभी आँकड़ा था।
उसने अनसुना कर दिया।
दोपहर में चपरासी आया। झुका हुआ, डरा हुआ।
“सर, मेरी फ़ाइल—”
“प्रक्रिया से आवेदन दो।”
“सर, मैंने किया पर—”
“मैं नियम नहीं हूँ।”
चपरासी के हाथ काँप रहे थे। उसकी कहानी वहीं दब गई। शिवनाथ ने स्क्रीन पर ऊँचे, चमकदार ग्राफ़ देखे।
शाम को कार्यक्रम था। मंच, माइक, तालियाँ। भाषण—ईमानदारी, सेवा, मूल्य। शब्द उसके थे, अर्थ किसी और के। मंत्री ने पीठ थपथपाई—
“आप जैसे अफसर कम हैं।”
मुस्कान मापी हुई थी—सुरक्षित।
घर लौटते समय ड्राइवर छुट्टी पर था। ऑटो लिया। किराए पर बहस हुई।
“पहाड़ से आया हूँ, किराया यही है।”
“पहाड़ से आने वाले सब एक जैसे,”
शिवनाथ हँस पड़ा।
चुप्पी में अनुभव था, प्रतिवाद नहीं।
पहली बार उसने महसूस किया—चुप्पी भारी हो सकती है।
उस रात सपना आया।
एक लंबा गलियारा। दीवारों पर पद और चेहरे—कठोर।
अंत में एक शव। लोग कफ़न की जेब टटोल रहे थे।
“इसमें क्या है?”
“कुछ नहीं।”
वह हड़बड़ा कर उठा। अपनी जेबें टटोली—मोबाइल, कार्ड, चाबियाँ—सब थे।
पर भीतर कुछ नहीं था।
कुछ दिन बाद खबर आई—गाँव में भूस्खलन हुआ है।
फोन पर आवाज़ थी—
“माँ ठीक हैं, पर घर—”
“मीटिंग में हूँ,”
उसने कहा और फोन काट दिया।
‘बाद में’ हमेशा फ़ाइलों में दब जाता था।
निरीक्षण पर वह पहाड़ पहुँचा। हेलीकॉप्टर से कटे हुए पहाड़, नदियाँ और नीचे कतार में खड़े लोग दिखे। किसी ने कहा—
“हमारा शिवनाथ बाबू।”
गर्व हुआ, पर भीतर कुछ हिला।
एक बूढ़ा सामने आया। आँखों में पहचान थी।
“बेटा, माँ पूछती हैं—तू कब आएगा?”
“काम बहुत है।”
बूढ़े ने सिर हिला दिया—स्वीकृति में नहीं, समझ में।
माँ कमरे से बाहर नहीं आई।
“थकी हैं,” बताया गया।
उसने भावनाओं पर फिर जीत हासिल कर ली।
हेलीकॉप्टर में अचानक झटका लगा।
एक क्षण को चेतना डगमगा गई।
और उसी क्षण, जैसे स्मृतियों का बाँध टूट गया—
बीते हुए दिन, छोड़े हुए लोग और अधूरे उत्तर मन में बहने लगे।
समय बीतता गया।
जौलजीबी के संगम पर काली और गोरी नदियां टकराती हैं और मिलकर सरयू नदी की धारा में आत्मगौरव का अनुभव करती हैं।
हिमालय ने अपनी चमक नहीं खोई। पंचाचुली पर्वतमाला नीले क्षितिज को अपनी नुकीली चोटी से भेद रही थी।
सूरज अपने समय पर निकलता रहा—सूने पड़े घरों और बंद कमरों तक भी उसका प्रकाश पहुँचता रहा। पलायन की पीड़ा अपने साथ शहरीकरण की मौन कंक्रीट बिल्डिंग्स को बनाती गई और गांव में बूढ़े मां-बाप अंधेरे में रोशनी की लौ जलाए बैठे हैं।
शिवनाथ को याद आया—
कैसे वह एक दिन गाँव लौटा था।
कोई स्वागत नहीं था, न शब्दों की भीड़।
बस वही पुरानी मिट्टी—ठंडी और अपनापन से भरी।
घर ढहा हुआ था।
उसने चुपचाप माँ की मिट्टी जेब में रख ली—जिसका कोई मूल्य नहीं था, पर हृदय से जुड़ी अमूल्य थी।
बूढ़े गाँववासी ने कहा था—
“माँ चली गई।”
“मुझे पता है।”
“पता होना और होना अलग होता है।”
उस दिन शिवनाथ ने सिर झुकाया था—औपचारिक नहीं, सचमुच।
उसके बाद वह गाँव के कामों में हाथ बँटाने लगा। बच्चों को पढ़ाया, रास्ते सुधारे। लोग उससे आदेश नहीं माँगते थे—साथ काम करते थे। तभी उसने पहली बार बराबरी को महसूस किया।
एक दिन गाँव के एक गरीब आदमी की मृत्यु हुई। वही जो गाय-भैंस चराता था।
कफ़न पहनाया जा रहा था।
किसी ने कहा—
“इसमें जेब नहीं होती।”
किसी और ने कहा—
“होती भी तो क्या जाता?”
उस क्षण शिवनाथ के भीतर कुछ टूट गया।
उसने अपनी भरी हुई सारी जेबें याद कीं—पद, पैसा, अहंकार।
और समझा—मृत्यु की सिलाई अलग होती है।
उस रात उसे साफ़ दिखा—
जीवन का असली मूल्य बाहर नहीं, भीतर है।
कुछ वर्ष बीते।
शहर में उसका नाम धुंधला पड़ गया।
गाँव में वह केवल आदमी रह गया—साधारण।
एक ठंडी सुबह वह नहीं उठा।
चेहरे पर कठोरता नहीं थी—केवल शांति।
कफ़न पहनाया गया।
कोई जेब नहीं थी।
पत्नी ने माँ की मिट्टी उसके साथ रख दी।
किसी ने पूछा—
“क्यों?”
वह बोली—
“ताकि वह खाली न जाए।”
पर सच यह था—
वह खाली नहीं था।
वह अहंकार से खाली था।
चिता जली।
धुआँ ऊपर उठा—पहाड़ों की ओर।
चीड़ के जलते जंगलों के धुंए में खो गया और हल्की-फुल्की बारिश की बूंदें बरसी जिससे दूर देवदार के वृक्ष और भी ज्यादा हरे भरे हो गए।
जीवन चलता रहता है !
जैसे कुछ लौट रहा हो।
और उस धुएँ में एक सत्य घुला था—
मनुष्य चाहे कितना भी ऊँचा उठ जाए,
अंत में उतरता है।
और उतरते समय उस
के साथ वही जाता है
जो उसने भीतर रखा हो।
कफ़न की जेब
इसीलिए खाली होती है—
क्योंकि जीवन को
भरने के लिए
जेब नहीं,
हृदय चाहिए।
!! समाप्त !!
