Daman
शनिवार, 5 सितंबर 2026
भादों की बरसात ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
बुधवार, 2 सितंबर 2026
सरिता का गीत ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
सरिता का गीत
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
हिम की गोदी से निकलकर, निर्मल धारा आती है,
पत्थर-पत्थर चूमती-चूमती, मधुर गीत गाती है,
वन की छाया साथ लिए वह, घाटी में मुस्काती है,
प्यासे धरती के अधरों पर, जीवन-मधु बरसाती है।
कल-कल करती, छल-छल करती, चट्टानों पर बहती है,
फूलों की सुगंध समेटे, वन-पथ से कुछ कहती है,
चाँद उतरकर तेरी लहरों में, रजनी बन झिलमिलाती है,
भोर-किरण की पहली आभा, जल पर सोना बरसाती है।
काली श्यामल धार लिए, हिम की गाथा गाती है,
गोरी उजली हँसी लिए, पर्वत-मन बहलाती है,
सरयु के शांत किनारे, भोर सुनहरी आती है,
कोसी चंचल पायल बनकर, घाटी में झूम जाती है।
शारदा की धीमी लहरों में, वन की छाया सोती है,
गौला नदी की शांत धार में, संध्या दीप संजोती है,
छोटे गाड़-गधेरे मिलकर जब, जीवन-धारा बनती हैं,
कुमाऊँ की हर घाटी तब, हरियाली से हँसती है।
अलकनंदा नील सलिल-सी, पर्वत-गाथा गाती है,
भागीरथी हिम-शिखरों की, उजली कथा सुनाती है,
मंदाकिनी शिव-ध्यान लिए, शीतल स्वर में बहती है,
पिंडर अपने हिम-आँचल में, श्वेत कहानी कहती है।
पर जब काले मेघ उमड़कर, पर्वत पर छा जाते हैं,
बिजली के तीखे तीरों से, शिखर सभी हिल जाते हैं,
बादल फटते, जल उमड़ता, तट सारे डूब जाते हैं,
कोमल बाँहों वाली नदियों के, रौद्र नेत्र भर आते हैं।
कहीं घरों के दीप बुझते, कहीं द्वार वीरान हुए,
कहीं मलबे में दबकर कितने, सपने भी अनजान हुए।
कहीं करुण क्रंदन गूँजे, पर्वत-वन हैरान हुए,
कहीं नदी की काली लहरों में, आँगन सब मैदान हुए।
चीड़-देवदारों के वन जब, मलबे नीचे दबते हैं,
हरी पहाड़ी के आँचल में, धूसर घाव उभरते हैं।
कल तक जिन राहों पर जीवन, हँसता-गाता चलता था,
आज उन्हीं राहों पर केवल, पत्थर बिखरे मिलते हैं।
वन कटते हैं, पर्वत टूटें, धरती कैसे सह पाए,
जल की राह रोककर मानव, प्रलय स्वयं क्यों बुलाए,
प्रकृति कभी क्रोध नहीं करती, वह तो केवल चेताती है,
जो उसकी मर्यादा समझे, धरती फिर मुस्काती है।
फिर मलबे की दरारों से, दूब हरी हो जाती है,
सूखी धरती की गोदी में, कोंपल नई निकल आती है,
टूटी घाटी में फिर कोई, पंछी गीत सुनाता है,
घोर अँधेरी रात के पीछे, भोर नई आ जाती है।
ओ सरिता! तू जीवन-धारा, तू धरती की साँसें हैं,
तेरी निर्मल लहरों में ही, खेतों की हरियाली है,
तू बहती है तो वन हँसते, तू रुकती है तो सब प्यासें हैं,
तेरी सीमा में ही मानव, अपनी रक्षा पाते हैं।
फिर काली श्यामल मुस्काए, गोरी चाँदी हो जाए,
शारदा के शांत किनारे, स्वर्णिम भोर उतर आए,
अलकनंदा गीत सुनाए, भागीरथी स्वर दोहराए,
मंदाकिनी निर्मल होकर, शिव का ध्यान जगाए।
नदियाँ बहें मर्यादा लेकर, निर्मल उनका नीर रहे,
पर्वत ओढ़ें हरित वसन और, वन का मधुर गंभीर रहे,
मानव प्रकृति का सहचर बन, उसकी भाषा पढ़ता जाए,
तभी सरिता का अमर गीत, युग-युग धरती गाती जाए।
बहती रह तू, गाती रह तू, जीवन की मुस्कान लिए,
पर्वत से मैदानों तक जा, हरियाली की तान लिए,
तेरी लहरें कहती जाएँ—धरती सबकी माता है,
जिसने उसको प्रेम दिया है, उसका जीवन गाता है।
सोमवार, 24 अगस्त 2026
बची हुई साँस (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
बची हुई साँस (कविता)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
स्याही ने जब रात पिघलाई, भोर हुई कुछ शेष,
कागज़ की चुप देह पर उतरा, मन का अवशेष।
एक तरफ़ धड़कन थी टूटी, एक तरफ़ परिवेश,
किसने जाना शब्दों में था, किस जीवन का क्लेश।
मुट्ठी भर अक्षर थे केवल, भीतर पूरा गाँव,
एक तरफ़ सूनी चौखट थी, दूजी ओर थी छाँव।
किसे पुकारे बंद खिड़कियाँ, किसे सुनाए घाव,
हवा चली तो पत्ते बोले—किसका छूटा गाँव।
रात बहुत थी गहरी, लेकिन दीप रहा अनजान,
जलते-जलते राख हुआ फिर, फिर भी रहा जवान।
जिसको अपनी लौ का मूल्य न, उसने पूछा मान,
एक पतंगा पढ़ गया शायद, दीपक का अरमान।
कागज़ पर कुछ बूँदें थीं या, वर्षा की बरसात,
शब्दों के बीच ठिठकी बैठी, जाने कितनी रात।
जिसको पढ़कर आँख नम हुई, वह क्या थी सौगात—
शायद कोई अपना चेहरा, शायद अपनी बात।
एक नदी थी भीतर बहती, बाहर सूखा घाट,
रेत सँभाले बैठा सागर, मौन गढ़े दिन-रात।
लहरों ने कुछ कहा नहीं, फिर भी देती सौगात,
किसने पढ़ी नदी की आँखें, किसने जानी बात।
कुछ पत्ते मौसम से पहले, शाखों से झर जाते,
कुछ रिश्ते आवाज़ बिना ही, भीतर टूटे जाते।
कवि ने केवल पत्ते लिखे, अर्थ कहाँ तक जाते—
पाठक अपने घावों से फिर, उनके अर्थ बनाते।
आँगन में तुलसी सूखी थी, दीप अभी भी जलता,
दरवाज़ा चुप, चौखट चुप थी, कोई नहीं निकलता।
कागज़ पर बस धूप उतरती, मन भीतर से गलता,
किस घर का यह मौन था आखिर, कौन वहाँ से चलता?
एक पुरानी गंध अचानक, पन्नों से उठ आई,
जैसे बंद संदूकचों में, माँ की चिट्ठी पाई।
शब्द वही थे, अर्थ नए थे, आँख हुई भर आई,
कविता ने किस नाम पुकारा—बात समझ न आई।
कवि ने कोई नाम न लिखा, फिर भी नाम उभर आए,
कुछ चेहरे धुँधले थे लेकिन, आँखों में ठहर आए।
जिनको भूला समझे थे हम, वे फिर लौटकर आए,
शब्दों के निर्जन वन में वे, चुपचाप घर बनाए।
टूटी वीणा के तारों में, अब भी कंपन बाकी,
मौन अधर पर ठहरी कोई, आधी धुन अनकही।
कवि ने स्वर को छुआ नहीं था, केवल तार सँवारे,
पाठक ने अपनी साँस मिलाई, जाग उठे अंगारे।
एक चिड़िया ने नीड़ बनाया, तिनका-तिनका जोड़,
आँधी आई, रात गिरी तो, टूट गया वह छोर।
सुबह हुई तो धूप ने देखा, चोंच लिए फिर डोर,
जीवन शायद हार नहीं है, बस बदल रहा है ठौर।
पगडंडी पर धूल जमी थी, पदचिह्नों के बीच,
किसके जाने की आहट थी, किसके आने की खींच।
कवि ने केवल धूल उठाई, आँख हुई फिर मींच,
पाठक ने अपने पाँव रखे—राह हुई कुछ सींच।
शब्दों की भी देह होती है, घावों की पहचान,
कहीं करुणा धीमे रोती, कहीं हँसता अरमान।
कहीं प्रतीक्षा दीप जलाती, कहीं बुझाता मान,
कविता अपने अर्थ नहीं कहती—देती केवल जान।
एक पुराना पेड़ खड़ा था, ऋतुओं से अनजान,
उसकी छाया में सोया था, जाने कौन-सा प्राण।
पत्ते झरे, ऋतु बदली, फिर भी बचा निशान,
कवि ने वृक्ष लिखा था केवल—पाठक ने पढ़ा जहान।
शाम उतरती रही नगर पर, खिड़की रही उदास,
दूर कहीं कोई बाँसुरी थी, पास पड़ा था श्वास।
किसके लौटने की आशा थी, किसका था विश्वास—
कविता ने बस शाम लिखी थी, पाठक ने पढ़ी प्यास।
आँखों में जो ठहर गया था, वह आँसू कब था,
होंठों पर जो जम गया था, वह मौन कहाँ था।
कागज़ ने केवल छाया देखी, दर्द कहाँ देखा था—
मन जब अपने भीतर उतरा, वहीं स्वयं से रोया था।
कभी-कभी कोई शब्द अचानक, दरवाज़ा बन जाता,
बीता हुआ कोई मौसम, भीतर फिर आ जाता।
जिसे समय ने दूर किया था, पास वही हो जाता,
एक अधूरा-सा वाक्य पूरा जीवन कह जाता।
स्याही सूखी, पृष्ठ पुराने, फिर भी गंध वही है,
जैसे बंद द्वार के पीछे, कोई आहट रही है।
कवि चला गया, शब्द बचे हैं—कैसी कथा कही है,
मिट्टी ने देह रख ली, शब्दों में साँस बही है।
कविता ने कुछ माँगा कब था—बस मन का द्वार खुला,
जितना भीतर दर्द दबाया, उतना ही वह घुला।
एक पंक्ति पर ठहर गया जो, वह अपना-सा लगा,
शायद कविता लिखी किसी ने, पढ़ने वाला ही था।
कवि और कविता के बीच में, एक अदृश्य डोर,
एक ओर जलता हुआ मन है, एक ओर है भोर।
एक लिखता है रक्त मिलाकर, एक पढ़े चितचोर,
दोनों मिलकर खोज रहे हैं, अपने भीतर छोर।
कवि ने जितना कह न सका था, उतना कहती पीड़ा,
शब्दों के आँगन में बैठी, जाने कैसी क्रीड़ा।
पाठक आया, देर तलक वह, पन्नों पर चुप बैठा,
फिर दोनों की आँखों में था, एक ही सपना ऐंठा।
जब तक कोई दर्द रहेगा, तब तक शब्द रहेंगे,
जब तक कोई स्वप्न बचेगा, तब तक गीत कहेंगे।
जब तक मन में प्रश्न उठेंगे, अक्षर दीप जलेंगे,
जब तक भीतर साँस बचेगी, भाव अमर रहेंगे।
मधुर मिलन है वैभव का, बाकी सुख-दुःख गीत,
कलम स्याह की साँस भरती, श्वेत-श्याम पत्रों के मीत।
कवि अपनी रचना को लिखकर, हुआ हृदय से विनीत,
कौन समझ पाया है जग में, पाठक-मन की प्रीत।
गुरुवार, 20 अगस्त 2026
महायोगी शिव (समाधि → ताण्डव → करुणा → अद्वैत) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
महायोगी शिव
(समाधि → ताण्डव → करुणा → अद्वैत)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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"शिव केवल किसी देवमूर्ति का नाम नहीं, वे चेतना की उस अखंड अवस्था का प्रतीक हैं जहाँ मौन ही मंत्र बन जाता है, नाद ही सृष्टि का प्रथम स्पंदन, करुणा ही धर्म का सर्वोच्च स्वरूप और आत्मबोध ही मोक्ष का द्वार। इस गीत की यात्रा कैलास की निस्तब्ध समाधि से आरंभ होकर नटराज के विराट ताण्डव, नीलकण्ठ की लोकमंगलमयी करुणा और अंततः 'शिवोऽहम्' के अद्वैत बोध तक पहुँचती है। यह केवल भगवान शिव का स्तवन नहीं, बल्कि प्रत्येक साधक की अंतर्मुखी यात्रा का काव्य है—जहाँ बाह्य शिव धीरे-धीरे अंतःकरण के शिव में रूपांतरित हो जाते हैं।
जब मन का कोलाहल मौन में विलीन होता है, तब समाधि का द्वार खुलता है। जब चेतना जागती है, तब वही मौन ताण्डव बनकर जड़ता को भंग करता है। जब हृदय लोकमंगल के लिए अपने सुख-दुःख से ऊपर उठता है, तब नीलकण्ठ की करुणा प्रकट होती है। और जब 'मैं' का आवरण हट जाता है, तब साधक अनुभव करता है कि जिसकी खोज वह पर्वतों, मंदिरों और तीर्थों में कर रहा था, वह तो उसके अपने ही अंतर में अनादि काल से आलोकित था। यही इस गीत का मर्म है—शिव को केवल पूजना ही पर्याप्त नहीं; उन्हें अपने अंतर्मन में जागृत करना ही साधना की चरम परिणति है।"
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ओम् नमः शिवाय
☘️🙏ॐ 🙏☘️
प्रथम भाग : मौन महायोगी
मौन शिखर पर ध्यान निरंतर, यह तपस्वी भगवान कौन?
शून्य स्वयं जिसके सम्मुख झुके, वह चिरंतन ज्ञान कौन?
हिम की साँसें थम-सी जातीं,
भोर चरण में शीश झुकाती,
जटा-जूट में नभ समेटे, वह असीम विस्तार कौन?
भस्म-अंग पर काल ठिठकता,
क्षण-क्षण युग का रूप बदलता,
बंद नयन से लोक निहारता, वह अद्भुत साक्षात्कार कौन?
गंगा धीमे मंत्र सुनाती,
चंद्रकला मुस्कान सजाती,
नाग बने निज मौन उपासक, वह विरक्त सम्राट कौन?
वायु स्वयं जप करती दिखती,
दिशा-दिशा आरती-सी लिखती,
ध्वनि से पहले जो विद्यमान, वह अनहद ओंकार कौन?
कण भी जिसका नाम जपें जब,
पर्वत भी प्रणत हो जाएँ तब,
अंतरतम में दीप जलाए, वह परम प्रकाश कौन?
नयन मूँदकर जग को देखे,
मौन रहकर वेद सहेजे,
आदि अनादि अनंत विराजे—
वह कैलासाधीश कौन?
द्वितीय भाग : नटराज का ताण्डव
मौन पिघलकर नाद बना तो, डमरू का उद्घोष हुआ,
एक थाप में काल थरथर, एक निनाद में होश हुआ।
डम-डम डमरू गूँज उठे जब,
दिशि-दिशि प्राण प्रफुल्लित हों तब,
पंचमहाभूतों के भीतर, जागा कैसा जोश नया।
पद की गति से पर्वत डोले,
सागर अपने बंधन खोले,
तारक-मंडल लय में झूमें, नभ का बदला वेश नया।
जटा-जूट से बिजली फूटी,
गंगा हँसकर धरा पर छूटी,
लहर-लहर में शिव की लीला, कण-कण में संदेश नया।
त्रिनयन की ज्वाला दहके,
तम के दुर्ग स्वयं ही ढहके,
अज्ञानों के घोर अँधेरों पर, फूट पड़ा परिवेश नया।
भैरव भी मुस्काकर गाएँ,
देव, दनुज सब शीश झुकाएँ,
जिसकी लय में युग बहते हैं, वह अनश्वर आवेश नया।
सृष्टि स्वयं जब नृत्य रचाए,
प्रलय स्वयं उत्सव बन जाए,
सृजन और संहार समेटे, वह चिरनूतन देश नया।
डमरू की हर थाप सुनो तो,
'ॐ' स्वयं स्वर बनकर बोले,
नृत्य नहीं—यह ब्रह्म का स्पंदन, शिव का अमर संदेश नया।
तृतीय भाग : नीलकण्ठ – करुणा का महासागर
जब-जब जग पर घोर विषमता, जब-जब पीड़ा का विस्तार,
तब-तब आगे बढ़कर तुमने, अपने ऊपर लिया प्रहार।
हलाहल की ज्वाला जागी,
काँप उठी भू, काँपा अम्बर,
देवों के सब धैर्य बिखरते, सूना हुआ संसार।
मुस्काए तुम मौन अधर से,
विष को मान लिया प्रसाद,
नीलकण्ठ बन अमृत कर दी, त्यागमयी वह धार।
अपने कंठ में दाह समेटे,
जग को शीतल छाया दी,
दुख की धूप स्वयं सह ली तुम, बाँटी सुख की बयार।
रोता जन जब द्वार तुम्हारे,
खाली कोई लौटे कब?
भोले होकर सुनते सबकी, आँसू का व्यवहार।
भस्म रमाए, व्याघ्राम्बर धारे,
राजमहल का मोह न माना,
दीन, अनाथ, विरक्त, तपस्वी—सबके तुम आधार।
नाम तुम्हारा लेते ही क्यों,
मन का अंधकार पिघल जाता?
कैसी करुणा, कैसी ममता, कैसा निर्मल प्यार!
हे आशुतोष! तुम्हारी महिमा,
शब्दों से कब बँध पाती है?
जो भी अपना अहं विसर्जित करे, वही पाए सच्चा द्वार।
नीलकण्ठ! तुम दया के सागर,
शिव! तुम जीवन के उद्धार,
अपने दुख को मौन पी जाने का, तुम ही हो साकार।
चतुर्थ भाग : शिवोऽहम् — आत्मज्योति का उदय
खोजा तुमको गिरि की चोटी, तीर्थों में, मंदिर के द्वार,
अंतर्मन की निस्तब्धी बोली— "यहीं विराजे त्रिपुरारि।"
श्वास-श्वास में मंत्र तुम्हारा,
धड़कन-धड़कन नाम तुम्हारा,
जिसने अपने भीतर झाँका, उसने पाया पारावार।
नयन खुले तो जग बदला था,
मन बदला तो सत्य मिला था,
दूर न थे कैलास-निवासी, अंतर था ही कैलास।
राग मिटे तो योग प्रकट था,
अहं गिरा तो लोक प्रकट था,
'मैं' का अंतिम दीप बुझा तो, जाग उठा विश्वास।
कण-कण में शिव, प्राण-प्राण में,
सूर्य-किरण और गगन-विहान में,
मिट्टी, जल, अग्नि, नभ, समीर में, उनका ही उल्लास।
नाद वही, ओंकार वही है,
ज्योति वही, विस्तार वही है,
जीव और शिव एक तत्त्व हैं, यही सनातन प्रकाश।
ना कोई दूरी, ना कोई सीमा,
ना कोई बंधन, ना अँधियारा,
जो अपने अंतर को जीता, वही हुआ कैलास।
विष भी जीवन, अमृत भी जीवन,
हार भी जीवन, जीत भी जीवन,
समता जिसकी साधना बन जाए, वही सच्चा संन्यास।
मौन जहाँ संगीत बन जाए,
श्वास स्वयं आरती गाए,
वहीं प्रकट होते हैं शम्भु, वहीं अमर निवास।
आदि वही हैं, अंत वही हैं,
शब्द वही, अनहद भी वही हैं,
जग का कण-कण गाकर बोले—
"शिवोऽहम्… शिवोऽहम्… शिवोऽहम्…"
ओम् नमः शिवाय
☘️🙏ॐ 🙏☘️
स्व की तलाश ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
स्व की तलाश
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
आज का मनुष्य बाहर की दुनिया में जितना आगे बढ़ रहा है, भीतर से उतना ही अपने आप से दूर होता जा रहा है। सुविधाएँ बढ़ी हैं, संपर्क बढ़े हैं, अवसर बढ़े हैं, लेकिन मन की शांति, आत्मीय संबंध और अपने होने का बोध कहीं पीछे छूटता जा रहा है। सामाजिक अपेक्षाएँ, प्रतिस्पर्धा, दिखावे की संस्कृति और लगातार बदलते परिवेश ने व्यक्ति को ऐसी दौड़ में खड़ा कर दिया है, जहाँ वह दूसरों से आगे निकलने की कोशिश में स्वयं से ही पीछे रह जाता है। वह अपने निर्णयों से अधिक समाज की स्वीकृति को महत्व देने लगता है और धीरे-धीरे यह भूल जाता है कि वह वास्तव में क्या चाहता है, किस बात से संतुष्ट होता है और उसके जीवन का अपना अर्थ क्या है।
‘स्व की तलाश’ दरअसल स्वयं तक लौटने की वह आंतरिक यात्रा है, जिसमें व्यक्ति अपने अनुभवों, असफलताओं, संबंधों, संघर्षों और अकेलेपन के बीच अपने वास्तविक अस्तित्व को पहचानने का प्रयास करता है। परिवेशगत विषमताएँ—गाँव और शहर का अंतर, आर्थिक असमानता, बदलते पारिवारिक संबंध, रोजगार की अनिश्चितता, सामाजिक दबाव और जीवन-मूल्यों में आ रहा परिवर्तन—मनुष्य के भीतर अनेक प्रश्न पैदा करते हैं। इन प्रश्नों से बचना आसान है, लेकिन उनका सामना करना ही आत्मबोध की शुरुआत है। कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी सीख सफलता से नहीं, बल्कि टूटने, रुकने और स्वयं से संवाद करने के उन क्षणों से मिलती है, जब व्यक्ति दूसरों की आवाज़ों से हटकर पहली बार अपने भीतर की आवाज़ सुनता है।
स्व की तलाश किसी एक उत्तर तक पहुँचने की यात्रा नहीं, बल्कि स्वयं को निरंतर समझने की प्रक्रिया है। यह हमें सिखाती है कि जीवन केवल सामाजिक पहचान, उपलब्धियों और बाहरी प्रतिष्ठा का नाम नहीं है; जीवन अपने भीतर की सच्चाई को स्वीकार करने, अपनी सीमाओं को समझने और अपनी संवेदनाओं के साथ ईमानदार रहने का भी नाम है। जब व्यक्ति यह समझने लगता है कि उसे दुनिया की भीड़ में खोना नहीं, बल्कि उसी भीड़ के बीच अपनी विशिष्ट पहचान बचाए रखनी है, तभी ‘स्व’ केवल एक शब्द नहीं रहता—वह जीवन जीने की एक सजग दृष्टि बन जाता है।
सोमवार, 10 अगस्त 2026
मौन शिखर के महायोगी (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
मौन शिखर के महायोगी (कविता)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
रविवार, 9 अगस्त 2026
दीप अभी जलना बाकी है (एक प्रेरणागीत) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
दीप अभी जलना बाकी है (एक प्रेरणागीत)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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"कि जीवन में परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन, अँधेरी या निराशाजनक क्यों न हों, मनुष्य को अपने भीतर की आशा, साहस और कर्म की अग्नि को कभी बुझने नहीं देना चाहिए। गिरना, असफल होना और संघर्ष करना जीवन का अंत नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की प्रक्रिया है। मनुष्य अपने श्रम, आत्मविश्वास और सतत प्रयास से अपनी राह स्वयं बना सकता है। जीवन की वास्तविक सफलता केवल नाम, धन या यश पाने में नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को सार्थक बनाने और किसी दूसरे के अँधेरे में प्रकाश बनने में है। अर्थात्—परिस्थितियों के सामने झुकना नहीं, अपने भीतर के दीप को जलाए रखना ही जीवन का सबसे बड़ा संदेश है।"
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रात भले ही गहरी हो,
दीप अभी जलना बाकी है।
टूटी राहों की धूल तले,
पाँव अभी चलना बाकी है।
हार नहीं जीवन की भाषा,
स्वप्न अभी पलना बाकी है—
रात भले ही गहरी हो,
दीप अभी जलना बाकी है।
जिसने काँटों से सीखा है,
वही गुलाब समझ पाएगा,
जो पत्थर से टकराएगा,
वही नदी बनकर जाएगा।
सूनी आँखों के आँगन में
एक प्रभात उतरना है,
अपने भीतर सोई ज्वाला को
फिर से आज सँवरना है।
मुट्ठी में यदि राख मिली तो
अग्नि अभी बची है भाई,
श्वासों के इस छोटे वन में
ऋतु अभी बदली है भाई।
थका हुआ सूरज भी देखो,
फिर आकाश चढ़ता है—
जिसके भीतर स्वप्न जगे हों,
वह कब सच में मरता है!
रात भले ही गहरी हो,
दीप अभी जलना बाकी है।
टूटी राहों की धूल तले,
पाँव अभी चलना बाकी है।
माटी ने कब राज बताया
बीज के भीतर वन होगा,
एक नन्हा-सा जल का कण ही
कब सोचा था सागर होगा।
छोटे-छोटे हाथों में ही
कल की रेखा पलती है,
एक कदम जब सत्य दिशा में
सदियों की राहें ढलती हैं।
मत पूछो आकाश कहाँ है,
पहले धरती थामो तुम,
अपने श्रम की अक्षर-माला से
अपना भाग्य स्वयं लिखो तुम।
समय किसी के द्वार खड़ा हो
ऐसा अवसर कम आता है,
जो क्षण हाथ से निकल गया हो
वह फिर लौट नहीं पाता है।
चलते रहना ही उत्तर है,
रुकना सबसे बड़ा प्रश्न है,
जिसने अपने कर्म जगा लिए
उसके आगे कैसा दंश है!
अँधियारे को दोष न देना,
अपनी लौ पहचानो तुम—
दुनिया बदले या न बदले,
पहले खुद को जानो तुम।
जब अपने ही लोग कहें कि
“तुमसे कुछ भी हो न सकेगा”,
जब हर दरवाज़ा बंद मिले और
मन भीतर से टूटने लगेगा,
तब चुपचाप उठाकर अपने
विश्वासों का टूटा दर्पण,
उसमें अपना चेहरा देखो—
अब भी जीवित है वह स्पंदन।
जिस दिन तुमने भय को अपनी
छाया मान लिया होगा,
उस दिन सूरज सिर पर होकर
भी तुमने तम पाया होगा।
भय तो केवल धुंध है मन की,
छँटते ही सब साफ़ मिलेगा,
जिसको तुमने दूर समझा था
वह भी तुममें पास मिलेगा।
तुम पत्थर हो तो राह बनो,
तुम जल हो तो प्यास बुझाओ,
तुम शब्द हो तो सत्य कहो,
तुम दीप हो तो रात जलाओ।
जीवन केवल साँस नहीं है,
जीवन देना भी होता है—
जो अपने हिस्से का सूरज दे,
वही सचमुच जीता है।
ऊँचे पर्वत पूछ रहे हैं—
“कितनी ऊँचाई चाहोगे?”
नदियाँ कहती हैं—
“कितनी दूर स्वयं से जाओगे?”
पेड़ों ने शाखों पर लिखकर
एक पुराना सत्य बताया—
जितना झुको फल के कारण,
उतना ही आकाश को पाया।
नाम मिले तो ठीक, न मिले तो
कर्म अमर हो जाने दो,
तालियों की चाह छोड़कर
मन में स्वर भर जाने दो।
जो कल के इतिहास लिखेंगे,
उनमें अपना रंग भरो,
पर सबसे पहले आज किसी के
अँधेरे में दीपक बनो।
जीवन की सबसे बड़ी विजय है
किसी हृदय में आशा होना,
अपने बाद भी किसी अधूरे
सपने का विश्वास होना।
धन, पद, यश सब धूल हो जाएँ,
शेष रहे बस इतना धन—
तुम्हारे कारण किसी मनुष्य ने
फिर से मान लिया हो जीवन।
और अगर कभी ऐसा आए
जब सब कुछ बिखरा-बिखरा हो,
आँखों में बादल हों लेकिन
अंदर कोई दीप न ठहरा हो,
तब धरती पर माथा रखकर
थोड़ी देर ठहर जाना तुम,
अपने भीतर की धड़कन से
एक बार फिर मिल जाना तुम।
जीवन कोई सीधी रेखा
नहीं—घुमावों का उत्सव है,
गिरना भी निर्माण का पहला
अक्षर है, संघर्ष महोत्सव है।
जिसने गिरकर उठना सीखा,
उससे बड़ा विजेता कौन?
जिसने आँसू पीकर हँसना सीखा,
उससे बड़ा देवता कौन?
चल, अपने भीतर लौट चलें,
फिर अपना आकाश गढ़ें,
जहाँ अँधेरे हार मान लें,
ऐसा एक प्रकाश गढ़ें।
कल की चिंता कल पर छोड़ें,
आज नया इतिहास लिखें—
एक मनुष्य के जागने से
सौ सोए विश्वास लिखें।
रात भले ही गहरी हो,
दीप अभी जलना बाकी है।
सूखी धरती के सीने में
मेघ अभी पलना बाकी है।
टूटी नाव किनारे बैठी—
सागर अभी बुलाता है,
थका हुआ यह मन भी सुन ले—
जीवन गीत सुनाता है।
हार नहीं अंतिम सच है,
जीत अभी मिलना बाकी है।
मुट्ठी भर इस जीवन में
युग को बदलना बाकी है।
तू बस अपने पथ पर चल,
इतना ही संकल्प रख—
रात भले ही गहरी हो,
दीप अभी जलना बाकी है।
दीप अभी जलना बाकी है…
बुधवार, 5 अगस्त 2026
मंगल गीत (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
मंगल गीत (कविता)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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"मंगल गीत" प्रकृति के विविध रूपों में निहित जीवन-दर्शन का सहज, सरस और प्रेरणादायी काव्य है। इसमें सूर्य, नदी, वृक्ष, पवन, पंछी, धरती और चाँद जैसे प्राकृतिक तत्वों के माध्यम से साहस, निरंतरता, विनम्रता, प्रेम, विश्वास, सेवा, करुणा और मानवता जैसे शाश्वत जीवन-मूल्यों का संदेश दिया गया है। यह कविता केवल प्रकृति का वर्णन नहीं करती, बल्कि मनुष्य को श्रेष्ठ जीवन जीने की दिशा दिखाती है और उसे स्वयं के साथ-साथ समस्त सृष्टि के कल्याण का पथ अपनाने की प्रेरणा देती है।
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सूरज कहता रोज़ निकलकर,
तम से कभी न घबराना।
दीपक बनकर स्वयं जलो तुम,
औरों का पथ भी चमकाना।
नदियाँ कहतीं बहते रहना,
रुकना जीवन की रीति नहीं।
चट्टानों से हँसकर मिलना,
संघर्षों से प्रीति सही।
वृक्ष सिखाते फल से झुकना,
छाया देना जीवन भर।
पत्थर खाकर भी मुस्काना,
यही मनुज का सच्चा स्वर।
पवन कहता मुक्त विचरना,
मन में निर्मल गंध बसाओ।
जहाँ पहुँचो वहाँ प्रेम की,
मधुर सुवास सदा फैलाओ।
पंछी कहते नभ छोटा है,
यदि विश्वास तुम्हारे संग।
साहस के दो पंख लगाओ,
जीत सुनिश्चित हर एक जंग।
धरती कहती बीज बनो तुम,
जिससे हरियाली मुस्काए।
प्रेम, दया, सेवा के अंकुर,
हर मानव के मन उपजाए।
चाँद सिखाता शीतल रहना,
तपते मन को शांति देना।
अपने सुख से पहले सीखो,
दुखियों को भी हँसी देना।
प्रकृति पुकारे एक स्वर में—
मानव! अपना धर्म निभाओ।
स्वार्थ छोड़कर प्रेम जगाओ,
धरती को स्वर्ग स्वयं बनाओ।
सोमवार, 3 अगस्त 2026
तुम्हारे घर के पास (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
तुम्हारे घर के पास (कविता)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
तुम्हारे घर के पास
एक सड़क है—
जो किसी नक़्शे में
सिर्फ़ सड़क है,
पर मेरी स्मृतियों में
वह आज भी धड़कती हुई नस है।
उस पर चलते हुए
मैंने कई बार
अपने कदमों की आहट से अधिक
अपने मौन को सुना है।
तुम्हारे घर के पास
एक गुलमोहर है।
वह हर साल
लाल हो जाता है,
पर किसी ने कभी नहीं पूछा—
फूल खिलते हैं,
या पेड़
अपना रक्त धीरे-धीरे
धरती को सौंप देता है?
कभी वहीं
हमने भविष्य का एक छोटा-सा घर बनाया था—
ईंटों से नहीं,
उन शब्दों से
जिन्हें बोलते समय
हम दोनों को लगता था
कि भाषा अमर होती है।
फिर समय आया।
उसने कोई शोर नहीं किया।
बस
तुम्हारे नाम के आगे
किसी और का उपनाम जोड़ दिया,
और मेरे भीतर
एक पूरा नगर
बिना भूकम्प के
ढह गया।
अब भी
तुम्हारे घर के पास से गुज़रता हूँ।
वहाँ
न तुम मिलती हो,
न वह लड़का
जो तुम्हें देखकर
अपनी उम्र से बड़ा हो जाता था।
केवल एक कुत्ता
मुझे पहचानकर
क्षणभर ठहर जाता है।
सोचता हूँ—
क्या स्मृतियाँ
मनुष्यों से पहले
जानवरों के पास शरण ले लेती हैं?
तुम्हारे घर की खिड़की
अब भी वहीं है।
पर परदे बदल गए हैं।
अजीब है—
कभी-कभी
जीवन में सबसे पहले
रंग बदलते हैं,
फिर चेहरे,
फिर संबोधन,
और अंत में
हम स्वयं अपने लिए
अजनबी हो जाते हैं।
मोबाइल की स्क्रीन पर
अब प्रेम
हरे बिंदुओं में जलता है,
नीले टिकों में टूटता है,
और आख़िरी बार
'ऑनलाइन' दिखकर
सदैव के लिए
अनुपस्थित हो जाता है।
किसी ने कहा था—
प्रेम मिलन है।
पर मुझे लगता है,
प्रेम शायद वह है
जो बिछड़ जाने के बाद भी
किसी अनजान मोड़ पर
अचानक
तुम्हारे शहर की हवा बनकर
फेफड़ों में उतर आता है।
मैंने कई बार चाहा
कि तुम्हारे घर के पास से
किसी दूसरी सड़क पर मुड़ जाऊँ।
पर कुछ रास्ते
पैर नहीं चुनते,
वे भीतर का कोई अधूरा वाक्य चुनता है।
तुम्हारे घर के पास
अब एक नया कैफ़े खुल गया है।
वहाँ
नए प्रेमी बैठते हैं।
उनकी हँसी में
मैं अपना बीता हुआ कल नहीं खोजता,
केवल यह सोचता हूँ—
क्या हर पीढ़ी
प्रेम को पहली बार जीती है,
या हर बार
उसी प्राचीन घाव पर
एक नया नाम लिख देती है?
मैं लौट आता हूँ।
पर सच कहूँ—
मैं कभी लौट नहीं पाता।
क्योंकि मनुष्य
घर से नहीं,
अपने अनकहे प्रेम से सबसे अधिक निर्वासित होता है।
और तब
रात के सबसे शांत पहर में
एक प्रश्न
दरवाज़े पर दस्तक देता है—
क्या सचमुच
मैं तुम्हारे घर के पास से गुज़रता हूँ...
या आज भी
तुम ही
मेरे भीतर बने उस घर के पास रहती हो,
जिसका पता
समय कभी बदल नहीं पाया?
एक टूटी हुई शाम (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
एक टूटी हुई शाम (कविता)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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"एक टूटी हुई शाम' केवल संध्या का दृश्य नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर धीरे-धीरे फैलती उस अदृश्य दरार का प्रतीक है, जहाँ संबंध, विश्वास, स्मृतियाँ और संवेदनाएँ मौन होकर बिखरने लगती हैं। यह कविता प्रकृति के बिंबों के माध्यम से हमारे समय की आत्मिक विडंबनाओं, अकेलेपन और मानवीय मूल्यों के क्षरण को अभिव्यक्त करती है। कविता किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती; बल्कि एक ऐसा प्रश्न छोड़ जाती है, जिसका उत्तर प्रत्येक पाठक को अपने भीतर खोजना होगा। यही इसकी संवेदना है, यही इसका प्रतीकात्मक सौंदर्य।"
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शाम आज फिर
किसी पुराने आईने की तरह
बिना आवाज़ के चटक गई।
सूरज ने
अपने सुनहरे वस्त्र
क्षितिज की देहरी पर उतार दिए,
और आकाश ने
लालिमा नहीं,
एक मौन शोक पहन लिया।
हवा गुज़री—
पर पेड़ों ने
पत्तों से कोई संवाद नहीं किया।
लगता था
जड़ों तक पहुँच चुकी है
किसी अदृश्य दरार की ख़बर।
नदी बहती रही,
किन्तु उसका जल
जैसे अपने ही प्रतिबिंब से
नज़रें चुरा रहा था।
एक पक्षी लौटा,
पर अपने घोंसले पर नहीं बैठा।
शायद
घोंसले भी कभी-कभी
घर होने से इनकार कर देते हैं।
दीपक जल रहा था,
पर लौ की थरथराहट में
हवा का दोष नहीं था;
कुछ अँधेरे
बाहर से नहीं,
मनुष्य के भीतर से उठते हैं।
मैंने देखा—
शाम केवल आकाश में नहीं टूटती,
वह टूटती है
उन आँखों में
जो अब भी प्रतीक्षा करती हैं।
वह टूटती है
उन रिश्तों में
जहाँ शब्द जीवित हैं,
पर अर्थ मर चुके हैं।
वह टूटती है
उन नगरों में
जहाँ रोशनी बहुत है,
पर किसी चेहरे पर
सवेरा नहीं उतरता।
और तब लगा—
हर टूटी हुई शाम
दरअसल समय की नहीं,
मनुष्य की आत्मा में पड़ी
उस महीन दरार का नाम है
जिसे सभ्यता
विकास कहकर छिपा देती है।
अब प्रश्न शाम का नहीं है...
टूटा कौन है—
क्षितिज,
सूरज,
या वह मनुष्य
जिसने अपने भीतर का उजाला
सबसे पहले खो दिया था?
रविवार, 2 अगस्त 2026
फ़लसफ़ा ऐ ज़िंदगी (एक टुकड़ा लम्हा) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
फ़लसफ़ा ऐ ज़िंदगी
(एक टुकड़ा लम्हा)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
कोई याद रखे न रखे, तुम याद रखना,
अपना हर कदम इंसानियत के साथ रखना।
उठे हाथ तो किसी मूरत को नहीं,
किसी टूटे हुए मन का आसमान थाम लेना।
बहुत नासमझ मिलेंगे राहों में,
उनकी आवाज़ नहीं, उनकी खामोशी पढ़ना।
अपने हिस्से की लड़ाई लड़ना,
पर किसी और की रोटी पर तलवार मत रखना।
जब भी आईना देखो,
चेहरा नहीं, अपने भीतर का मौसम देखना।
हर चमक सोना नहीं होती,
कुछ उजाले कब्रों से भी उठते हैं।
पेड़ बन सको तो छाँव देना,
दीवार बनो तो किसी का रास्ता मत रोकना।
शहर तुम्हें तालियाँ देगा,
गाँव तुम्हें दुआएँ देगा—फ़ैसला तुम्हारा होगा।
समंदर बनने की ज़िद से पहले,
किसी प्यासे की हथेली भर प्यास बनना।
जो लोग बहुत ऊँचा उड़ते हैं,
अक्सर उन्हें ज़मीन की ख़ुशबू याद रहती नहीं।
हर जीत के बाद थोड़ा हार रखना,
अपने ही अहंकार से खुद को पार रखना
कभी किसी रोते हुए चेहरे के पास बैठना,
सलाह से पहले अपना मौन रखना।
रिश्ते धागों से नहीं टूटते,
अनकहे शब्दों के बोझ से बिखरते हैं।
जिस दिन तुम्हारे पास सब कुछ हो,
उस दिन किसी अभावग्रस्त की आँखों में अपना कल देखना।
किताबों से ज्ञान लेना,
पर जीवन का अर्थ किसी मज़दूर की हथेलियों से पढ़ना।
फूल बनो तो ख़ुशबू बाँटना,
काँटे बनो तो अपने ही अहंकार को चुभना।
समय कभी किसी का नहीं हुआ,
फिर भी लोग घड़ियों पर उम्र टाँगते रहे।
जो टूटकर भी मुस्कुराते हैं,
असल में वही दुनिया को सहारा बांटते हैं।
अगर कभी बहुत अकेले पड़ जाओ,
तो किसी बूढ़े बरगद से बातें कर लेना।
हर सवाल का जवाब मत ढूँढना,
कुछ प्रश्न ही मनुष्य को मनुष्य बनाए रखते हैं।
जब दुनिया तुम्हें सफल कहे,
तो अपने भीतर बैठे बच्चे से पूछ लेना—
क्या वह अब भी बेवजह हँसता है?
और अंत में...
यदि कभी तुम्हारे जाने के बाद
लोग तुम्हारा नाम भूल भी जाएँ,
तो इतना भर होना चाहिए—
किसी अनजान की दुआ में
तुम्हारा किया हुआ एक छोटा-सा अच्छा काम
अब भी साँस ले रहा हो।
शुक्रवार, 31 जुलाई 2026
ठोकरों का आत्मविश्वास ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
ठोकरों का आत्मविश्वास
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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यह कविता जीवन के उन अदृश्य सत्यों को उद्घाटित करती है, जहाँ संघर्ष, असफलता और ठोकरें बाधाएँ नहीं, बल्कि व्यक्तित्व के निर्माण की आधारशिलाएँ बन जाती हैं। प्रकृति के गहन प्रतीकों के माध्यम से कविता यह संदेश देती है कि कठिनाइयाँ मनुष्य को तोड़ने नहीं, बल्कि उसे भीतर से अधिक दृढ़, परिपक्व और आत्मविश्वासी बनाने आती हैं। अंततः यही अनुभव जीवन-पथ को सफलता से अधिक सार्थक और आत्मविश्वास से अधिक आलोकित बना देते हैं।
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रास्तों ने
कभी किसी पाँव से क्षमा नहीं माँगी।
वे चुपचाप
पत्थरों की वर्णमाला बिछाते रहे,
और मनुष्य
उसे पीड़ा समझकर पढ़ता रहा।
पहाड़ जानते थे—
ऊँचाइयाँ
सीधी चढ़ाइयों से नहीं मिलतीं।
इसलिए उन्होंने
ढलानों के बीच
कुछ नुकीले पत्थर रख छोड़े,
ताकि पाँव से पहले
अहंकार घायल हो।
बीज भी
धरती का अँधेरा ओढ़े बिना
कभी वृक्ष नहीं होता।
और शिलाएँ...
वे मंदिरों में जन्म नहीं लेतीं,
बरसों तक
हथौड़ों की भाषा सहती हैं,
तब कहीं जाकर
मौन का चेहरा पहनती हैं।
किसी नदी से पूछना—
समुद्र का रास्ता
मानचित्र ने नहीं बताया था उसे;
हर चट्टान ने
उसकी धारा का व्याकरण बदला था।
धूप ने
कभी फूलों को नहीं गढ़ा,
वह तो तपती रही;
सुगंध का निर्णय
ऋतुओं ने किया।
कितना विचित्र है—
मनुष्य
हार से बचना चाहता है,
जबकि समय
उसी के भीतर
एक अदृश्य प्रतिमा तराश रहा होता है।
कुछ दरारें
दीवारों में नहीं पड़तीं,
दृष्टि में उतरती हैं।
कुछ ठोकरें
घुटनों पर नहीं लगतीं,
विश्वास की नींद तोड़ती हैं।
और तब...
चलना
सिर्फ़ चलना नहीं रह जाता।
पत्थर
पत्थर नहीं रहते।
रास्ते
रास्ते नहीं रहते।
वे धीरे-धीरे...
आत्मविश्वास का
दूसरा नाम बन जाते हैं।
रविवार, 26 जुलाई 2026
अपने हिस्से की धूप ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
अपने हिस्से की धूप
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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मनुष्य का जीवन केवल समय का नहीं, बल्कि रिश्तों, दायित्वों और अपेक्षाओं का भी एक लंबा सफ़र है। इस यात्रा में वह अपनों के लिए जीते-जीते अक्सर स्वयं से ही दूर हो जाता है। यह कविता उसी मौन पीड़ा और जीवन-सत्य की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति है—जहाँ रिश्तों का सम्मान भी है और अपने अस्तित्व को बचाए रखने की विनम्र पुकार भी। "अपने हिस्से की धूप" हमें स्मरण कराती है कि यदि जीवन में कुछ पल स्वयं के लिए भी बचा लिए जाएँ, तभी रिश्तों की छाँव और जीवन की धूप दोनों का वास्तविक अर्थ समझा जा सकता है।
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अपने हिस्से की धूप
जीवन सब रिश्तों में बाँटा, मेरे हिस्से कुछ बचा नहीं,
दूर क्षितिज को ताक रहा था, पास पड़ा कुछ दिखा नहीं।
आते-जाते हर रिश्ते में, कोई रिश्ता बचा नहीं,
जीवन भर क्या पाया जग में, मेरे हिस्से कुछ बचा नहीं।
सुबह उगी तो स्वप्न बटोरें, साँझ हुई तो थककर सोए,
दिन की धूप पराई निकली, अपने आँगन दीप न रोए।
नदियों-सा बहते ही गुज़रे, सागर बनना याद रहा नहीं,
पत्तों जैसे झरते मौसम, मन का वन फिर हरा नहीं।
सबके आँसू अपनी आँखों में, अपनी पीड़ा कह पाया नहीं,
हर मुस्कान की कीमत दी, अपना चेहरा पढ़ पाया नहीं।
पर्वत-सा दायित्व उठाया, पंछी-सा उन्मुक्त उड़ा नहीं,
भीड़ बहुत थी जीवन-पथ पर, स्वयं से लेकिन मिला नहीं।
थोड़ी देर स्वयं के संग भी, बैठ सकूँ तो बात बने,
मन के सूने आँगन में फिर, कोई चुप-सी भोर तने।
साँस-साँस जग को सौंप दी, अपने लिए जिया नहीं,
भीतर बैठा जो मैं था, उससे कभी मिला नहीं।
रिश्ते जीवन की छाया हैं, उनसे सुंदर जग में क्या,
पर अपने मन का द्वार खुला हो, इससे बढ़कर सुख भी क्या।
जो हर दिन थोड़ा स्वयं से मिले, वही सचमुच जीता है,
वरना जीवन सबको देकर, मन अपना ही रीता है।


