Daman
सोमवार, 10 अगस्त 2026
मौन शिखर के महायोगी (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
रविवार, 9 अगस्त 2026
दीप अभी जलना बाकी है (एक प्रेरणागीत) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
दीप अभी जलना बाकी है (एक प्रेरणागीत)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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"कि जीवन में परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन, अँधेरी या निराशाजनक क्यों न हों, मनुष्य को अपने भीतर की आशा, साहस और कर्म की अग्नि को कभी बुझने नहीं देना चाहिए। गिरना, असफल होना और संघर्ष करना जीवन का अंत नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की प्रक्रिया है। मनुष्य अपने श्रम, आत्मविश्वास और सतत प्रयास से अपनी राह स्वयं बना सकता है। जीवन की वास्तविक सफलता केवल नाम, धन या यश पाने में नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को सार्थक बनाने और किसी दूसरे के अँधेरे में प्रकाश बनने में है। अर्थात्—परिस्थितियों के सामने झुकना नहीं, अपने भीतर के दीप को जलाए रखना ही जीवन का सबसे बड़ा संदेश है।"
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रात भले ही गहरी हो,
दीप अभी जलना बाकी है।
टूटी राहों की धूल तले,
पाँव अभी चलना बाकी है।
हार नहीं जीवन की भाषा,
स्वप्न अभी पलना बाकी है—
रात भले ही गहरी हो,
दीप अभी जलना बाकी है।
जिसने काँटों से सीखा है,
वही गुलाब समझ पाएगा,
जो पत्थर से टकराएगा,
वही नदी बनकर जाएगा।
सूनी आँखों के आँगन में
एक प्रभात उतरना है,
अपने भीतर सोई ज्वाला को
फिर से आज सँवरना है।
मुट्ठी में यदि राख मिली तो
अग्नि अभी बची है भाई,
श्वासों के इस छोटे वन में
ऋतु अभी बदली है भाई।
थका हुआ सूरज भी देखो,
फिर आकाश चढ़ता है—
जिसके भीतर स्वप्न जगे हों,
वह कब सच में मरता है!
रात भले ही गहरी हो,
दीप अभी जलना बाकी है।
टूटी राहों की धूल तले,
पाँव अभी चलना बाकी है।
माटी ने कब राज बताया
बीज के भीतर वन होगा,
एक नन्हा-सा जल का कण ही
कब सोचा था सागर होगा।
छोटे-छोटे हाथों में ही
कल की रेखा पलती है,
एक कदम जब सत्य दिशा में
सदियों की राहें ढलती हैं।
मत पूछो आकाश कहाँ है,
पहले धरती थामो तुम,
अपने श्रम की अक्षर-माला से
अपना भाग्य स्वयं लिखो तुम।
समय किसी के द्वार खड़ा हो
ऐसा अवसर कम आता है,
जो क्षण हाथ से निकल गया हो
वह फिर लौट नहीं पाता है।
चलते रहना ही उत्तर है,
रुकना सबसे बड़ा प्रश्न है,
जिसने अपने कर्म जगा लिए
उसके आगे कैसा दंश है!
अँधियारे को दोष न देना,
अपनी लौ पहचानो तुम—
दुनिया बदले या न बदले,
पहले खुद को जानो तुम।
जब अपने ही लोग कहें कि
“तुमसे कुछ भी हो न सकेगा”,
जब हर दरवाज़ा बंद मिले और
मन भीतर से टूटने लगेगा,
तब चुपचाप उठाकर अपने
विश्वासों का टूटा दर्पण,
उसमें अपना चेहरा देखो—
अब भी जीवित है वह स्पंदन।
जिस दिन तुमने भय को अपनी
छाया मान लिया होगा,
उस दिन सूरज सिर पर होकर
भी तुमने तम पाया होगा।
भय तो केवल धुंध है मन की,
छँटते ही सब साफ़ मिलेगा,
जिसको तुमने दूर समझा था
वह भी तुममें पास मिलेगा।
तुम पत्थर हो तो राह बनो,
तुम जल हो तो प्यास बुझाओ,
तुम शब्द हो तो सत्य कहो,
तुम दीप हो तो रात जलाओ।
जीवन केवल साँस नहीं है,
जीवन देना भी होता है—
जो अपने हिस्से का सूरज दे,
वही सचमुच जीता है।
ऊँचे पर्वत पूछ रहे हैं—
“कितनी ऊँचाई चाहोगे?”
नदियाँ कहती हैं—
“कितनी दूर स्वयं से जाओगे?”
पेड़ों ने शाखों पर लिखकर
एक पुराना सत्य बताया—
जितना झुको फल के कारण,
उतना ही आकाश को पाया।
नाम मिले तो ठीक, न मिले तो
कर्म अमर हो जाने दो,
तालियों की चाह छोड़कर
मन में स्वर भर जाने दो।
जो कल के इतिहास लिखेंगे,
उनमें अपना रंग भरो,
पर सबसे पहले आज किसी के
अँधेरे में दीपक बनो।
जीवन की सबसे बड़ी विजय है
किसी हृदय में आशा होना,
अपने बाद भी किसी अधूरे
सपने का विश्वास होना।
धन, पद, यश सब धूल हो जाएँ,
शेष रहे बस इतना धन—
तुम्हारे कारण किसी मनुष्य ने
फिर से मान लिया हो जीवन।
और अगर कभी ऐसा आए
जब सब कुछ बिखरा-बिखरा हो,
आँखों में बादल हों लेकिन
अंदर कोई दीप न ठहरा हो,
तब धरती पर माथा रखकर
थोड़ी देर ठहर जाना तुम,
अपने भीतर की धड़कन से
एक बार फिर मिल जाना तुम।
जीवन कोई सीधी रेखा
नहीं—घुमावों का उत्सव है,
गिरना भी निर्माण का पहला
अक्षर है, संघर्ष महोत्सव है।
जिसने गिरकर उठना सीखा,
उससे बड़ा विजेता कौन?
जिसने आँसू पीकर हँसना सीखा,
उससे बड़ा देवता कौन?
चल, अपने भीतर लौट चलें,
फिर अपना आकाश गढ़ें,
जहाँ अँधेरे हार मान लें,
ऐसा एक प्रकाश गढ़ें।
कल की चिंता कल पर छोड़ें,
आज नया इतिहास लिखें—
एक मनुष्य के जागने से
सौ सोए विश्वास लिखें।
रात भले ही गहरी हो,
दीप अभी जलना बाकी है।
सूखी धरती के सीने में
मेघ अभी पलना बाकी है।
टूटी नाव किनारे बैठी—
सागर अभी बुलाता है,
थका हुआ यह मन भी सुन ले—
जीवन गीत सुनाता है।
हार नहीं अंतिम सच है,
जीत अभी मिलना बाकी है।
मुट्ठी भर इस जीवन में
युग को बदलना बाकी है।
तू बस अपने पथ पर चल,
इतना ही संकल्प रख—
रात भले ही गहरी हो,
दीप अभी जलना बाकी है।
दीप अभी जलना बाकी है…
बुधवार, 5 अगस्त 2026
मंगल गीत (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
मंगल गीत (कविता)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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"मंगल गीत" प्रकृति के विविध रूपों में निहित जीवन-दर्शन का सहज, सरस और प्रेरणादायी काव्य है। इसमें सूर्य, नदी, वृक्ष, पवन, पंछी, धरती और चाँद जैसे प्राकृतिक तत्वों के माध्यम से साहस, निरंतरता, विनम्रता, प्रेम, विश्वास, सेवा, करुणा और मानवता जैसे शाश्वत जीवन-मूल्यों का संदेश दिया गया है। यह कविता केवल प्रकृति का वर्णन नहीं करती, बल्कि मनुष्य को श्रेष्ठ जीवन जीने की दिशा दिखाती है और उसे स्वयं के साथ-साथ समस्त सृष्टि के कल्याण का पथ अपनाने की प्रेरणा देती है।
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सूरज कहता रोज़ निकलकर,
तम से कभी न घबराना।
दीपक बनकर स्वयं जलो तुम,
औरों का पथ भी चमकाना।
नदियाँ कहतीं बहते रहना,
रुकना जीवन की रीति नहीं।
चट्टानों से हँसकर मिलना,
संघर्षों से प्रीति सही।
वृक्ष सिखाते फल से झुकना,
छाया देना जीवन भर।
पत्थर खाकर भी मुस्काना,
यही मनुज का सच्चा स्वर।
पवन कहता मुक्त विचरना,
मन में निर्मल गंध बसाओ।
जहाँ पहुँचो वहाँ प्रेम की,
मधुर सुवास सदा फैलाओ।
पंछी कहते नभ छोटा है,
यदि विश्वास तुम्हारे संग।
साहस के दो पंख लगाओ,
जीत सुनिश्चित हर एक जंग।
धरती कहती बीज बनो तुम,
जिससे हरियाली मुस्काए।
प्रेम, दया, सेवा के अंकुर,
हर मानव के मन उपजाए।
चाँद सिखाता शीतल रहना,
तपते मन को शांति देना।
अपने सुख से पहले सीखो,
दुखियों को भी हँसी देना।
प्रकृति पुकारे एक स्वर में—
मानव! अपना धर्म निभाओ।
स्वार्थ छोड़कर प्रेम जगाओ,
धरती को स्वर्ग स्वयं बनाओ।
सोमवार, 3 अगस्त 2026
तुम्हारे घर के पास (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
तुम्हारे घर के पास (कविता)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
तुम्हारे घर के पास
एक सड़क है—
जो किसी नक़्शे में
सिर्फ़ सड़क है,
पर मेरी स्मृतियों में
वह आज भी धड़कती हुई नस है।
उस पर चलते हुए
मैंने कई बार
अपने कदमों की आहट से अधिक
अपने मौन को सुना है।
तुम्हारे घर के पास
एक गुलमोहर है।
वह हर साल
लाल हो जाता है,
पर किसी ने कभी नहीं पूछा—
फूल खिलते हैं,
या पेड़
अपना रक्त धीरे-धीरे
धरती को सौंप देता है?
कभी वहीं
हमने भविष्य का एक छोटा-सा घर बनाया था—
ईंटों से नहीं,
उन शब्दों से
जिन्हें बोलते समय
हम दोनों को लगता था
कि भाषा अमर होती है।
फिर समय आया।
उसने कोई शोर नहीं किया।
बस
तुम्हारे नाम के आगे
किसी और का उपनाम जोड़ दिया,
और मेरे भीतर
एक पूरा नगर
बिना भूकम्प के
ढह गया।
अब भी
तुम्हारे घर के पास से गुज़रता हूँ।
वहाँ
न तुम मिलती हो,
न वह लड़का
जो तुम्हें देखकर
अपनी उम्र से बड़ा हो जाता था।
केवल एक कुत्ता
मुझे पहचानकर
क्षणभर ठहर जाता है।
सोचता हूँ—
क्या स्मृतियाँ
मनुष्यों से पहले
जानवरों के पास शरण ले लेती हैं?
तुम्हारे घर की खिड़की
अब भी वहीं है।
पर परदे बदल गए हैं।
अजीब है—
कभी-कभी
जीवन में सबसे पहले
रंग बदलते हैं,
फिर चेहरे,
फिर संबोधन,
और अंत में
हम स्वयं अपने लिए
अजनबी हो जाते हैं।
मोबाइल की स्क्रीन पर
अब प्रेम
हरे बिंदुओं में जलता है,
नीले टिकों में टूटता है,
और आख़िरी बार
'ऑनलाइन' दिखकर
सदैव के लिए
अनुपस्थित हो जाता है।
किसी ने कहा था—
प्रेम मिलन है।
पर मुझे लगता है,
प्रेम शायद वह है
जो बिछड़ जाने के बाद भी
किसी अनजान मोड़ पर
अचानक
तुम्हारे शहर की हवा बनकर
फेफड़ों में उतर आता है।
मैंने कई बार चाहा
कि तुम्हारे घर के पास से
किसी दूसरी सड़क पर मुड़ जाऊँ।
पर कुछ रास्ते
पैर नहीं चुनते,
वे भीतर का कोई अधूरा वाक्य चुनता है।
तुम्हारे घर के पास
अब एक नया कैफ़े खुल गया है।
वहाँ
नए प्रेमी बैठते हैं।
उनकी हँसी में
मैं अपना बीता हुआ कल नहीं खोजता,
केवल यह सोचता हूँ—
क्या हर पीढ़ी
प्रेम को पहली बार जीती है,
या हर बार
उसी प्राचीन घाव पर
एक नया नाम लिख देती है?
मैं लौट आता हूँ।
पर सच कहूँ—
मैं कभी लौट नहीं पाता।
क्योंकि मनुष्य
घर से नहीं,
अपने अनकहे प्रेम से सबसे अधिक निर्वासित होता है।
और तब
रात के सबसे शांत पहर में
एक प्रश्न
दरवाज़े पर दस्तक देता है—
क्या सचमुच
मैं तुम्हारे घर के पास से गुज़रता हूँ...
या आज भी
तुम ही
मेरे भीतर बने उस घर के पास रहती हो,
जिसका पता
समय कभी बदल नहीं पाया?
एक टूटी हुई शाम (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
एक टूटी हुई शाम (कविता)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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"एक टूटी हुई शाम' केवल संध्या का दृश्य नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर धीरे-धीरे फैलती उस अदृश्य दरार का प्रतीक है, जहाँ संबंध, विश्वास, स्मृतियाँ और संवेदनाएँ मौन होकर बिखरने लगती हैं। यह कविता प्रकृति के बिंबों के माध्यम से हमारे समय की आत्मिक विडंबनाओं, अकेलेपन और मानवीय मूल्यों के क्षरण को अभिव्यक्त करती है। कविता किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती; बल्कि एक ऐसा प्रश्न छोड़ जाती है, जिसका उत्तर प्रत्येक पाठक को अपने भीतर खोजना होगा। यही इसकी संवेदना है, यही इसका प्रतीकात्मक सौंदर्य।"
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शाम आज फिर
किसी पुराने आईने की तरह
बिना आवाज़ के चटक गई।
सूरज ने
अपने सुनहरे वस्त्र
क्षितिज की देहरी पर उतार दिए,
और आकाश ने
लालिमा नहीं,
एक मौन शोक पहन लिया।
हवा गुज़री—
पर पेड़ों ने
पत्तों से कोई संवाद नहीं किया।
लगता था
जड़ों तक पहुँच चुकी है
किसी अदृश्य दरार की ख़बर।
नदी बहती रही,
किन्तु उसका जल
जैसे अपने ही प्रतिबिंब से
नज़रें चुरा रहा था।
एक पक्षी लौटा,
पर अपने घोंसले पर नहीं बैठा।
शायद
घोंसले भी कभी-कभी
घर होने से इनकार कर देते हैं।
दीपक जल रहा था,
पर लौ की थरथराहट में
हवा का दोष नहीं था;
कुछ अँधेरे
बाहर से नहीं,
मनुष्य के भीतर से उठते हैं।
मैंने देखा—
शाम केवल आकाश में नहीं टूटती,
वह टूटती है
उन आँखों में
जो अब भी प्रतीक्षा करती हैं।
वह टूटती है
उन रिश्तों में
जहाँ शब्द जीवित हैं,
पर अर्थ मर चुके हैं।
वह टूटती है
उन नगरों में
जहाँ रोशनी बहुत है,
पर किसी चेहरे पर
सवेरा नहीं उतरता।
और तब लगा—
हर टूटी हुई शाम
दरअसल समय की नहीं,
मनुष्य की आत्मा में पड़ी
उस महीन दरार का नाम है
जिसे सभ्यता
विकास कहकर छिपा देती है।
अब प्रश्न शाम का नहीं है...
टूटा कौन है—
क्षितिज,
सूरज,
या वह मनुष्य
जिसने अपने भीतर का उजाला
सबसे पहले खो दिया था?
रविवार, 2 अगस्त 2026
फ़लसफ़ा ऐ ज़िंदगी (एक टुकड़ा लम्हा) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
फ़लसफ़ा ऐ ज़िंदगी
(एक टुकड़ा लम्हा)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
कोई याद रखे न रखे, तुम याद रखना,
अपना हर कदम इंसानियत के साथ रखना।
उठे हाथ तो किसी मूरत को नहीं,
किसी टूटे हुए मन का आसमान थाम लेना।
बहुत नासमझ मिलेंगे राहों में,
उनकी आवाज़ नहीं, उनकी खामोशी पढ़ना।
अपने हिस्से की लड़ाई लड़ना,
पर किसी और की रोटी पर तलवार मत रखना।
जब भी आईना देखो,
चेहरा नहीं, अपने भीतर का मौसम देखना।
हर चमक सोना नहीं होती,
कुछ उजाले कब्रों से भी उठते हैं।
पेड़ बन सको तो छाँव देना,
दीवार बनो तो किसी का रास्ता मत रोकना।
शहर तुम्हें तालियाँ देगा,
गाँव तुम्हें दुआएँ देगा—फ़ैसला तुम्हारा होगा।
समंदर बनने की ज़िद से पहले,
किसी प्यासे की हथेली भर प्यास बनना।
जो लोग बहुत ऊँचा उड़ते हैं,
अक्सर उन्हें ज़मीन की ख़ुशबू याद रहती नहीं।
हर जीत के बाद थोड़ा हार रखना,
अपने ही अहंकार से खुद को पार रखना
कभी किसी रोते हुए चेहरे के पास बैठना,
सलाह से पहले अपना मौन रखना।
रिश्ते धागों से नहीं टूटते,
अनकहे शब्दों के बोझ से बिखरते हैं।
जिस दिन तुम्हारे पास सब कुछ हो,
उस दिन किसी अभावग्रस्त की आँखों में अपना कल देखना।
किताबों से ज्ञान लेना,
पर जीवन का अर्थ किसी मज़दूर की हथेलियों से पढ़ना।
फूल बनो तो ख़ुशबू बाँटना,
काँटे बनो तो अपने ही अहंकार को चुभना।
समय कभी किसी का नहीं हुआ,
फिर भी लोग घड़ियों पर उम्र टाँगते रहे।
जो टूटकर भी मुस्कुराते हैं,
असल में वही दुनिया को सहारा बांटते हैं।
अगर कभी बहुत अकेले पड़ जाओ,
तो किसी बूढ़े बरगद से बातें कर लेना।
हर सवाल का जवाब मत ढूँढना,
कुछ प्रश्न ही मनुष्य को मनुष्य बनाए रखते हैं।
जब दुनिया तुम्हें सफल कहे,
तो अपने भीतर बैठे बच्चे से पूछ लेना—
क्या वह अब भी बेवजह हँसता है?
और अंत में...
यदि कभी तुम्हारे जाने के बाद
लोग तुम्हारा नाम भूल भी जाएँ,
तो इतना भर होना चाहिए—
किसी अनजान की दुआ में
तुम्हारा किया हुआ एक छोटा-सा अच्छा काम
अब भी साँस ले रहा हो।
शुक्रवार, 31 जुलाई 2026
ठोकरों का आत्मविश्वास ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
ठोकरों का आत्मविश्वास
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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यह कविता जीवन के उन अदृश्य सत्यों को उद्घाटित करती है, जहाँ संघर्ष, असफलता और ठोकरें बाधाएँ नहीं, बल्कि व्यक्तित्व के निर्माण की आधारशिलाएँ बन जाती हैं। प्रकृति के गहन प्रतीकों के माध्यम से कविता यह संदेश देती है कि कठिनाइयाँ मनुष्य को तोड़ने नहीं, बल्कि उसे भीतर से अधिक दृढ़, परिपक्व और आत्मविश्वासी बनाने आती हैं। अंततः यही अनुभव जीवन-पथ को सफलता से अधिक सार्थक और आत्मविश्वास से अधिक आलोकित बना देते हैं।
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रास्तों ने
कभी किसी पाँव से क्षमा नहीं माँगी।
वे चुपचाप
पत्थरों की वर्णमाला बिछाते रहे,
और मनुष्य
उसे पीड़ा समझकर पढ़ता रहा।
पहाड़ जानते थे—
ऊँचाइयाँ
सीधी चढ़ाइयों से नहीं मिलतीं।
इसलिए उन्होंने
ढलानों के बीच
कुछ नुकीले पत्थर रख छोड़े,
ताकि पाँव से पहले
अहंकार घायल हो।
बीज भी
धरती का अँधेरा ओढ़े बिना
कभी वृक्ष नहीं होता।
और शिलाएँ...
वे मंदिरों में जन्म नहीं लेतीं,
बरसों तक
हथौड़ों की भाषा सहती हैं,
तब कहीं जाकर
मौन का चेहरा पहनती हैं।
किसी नदी से पूछना—
समुद्र का रास्ता
मानचित्र ने नहीं बताया था उसे;
हर चट्टान ने
उसकी धारा का व्याकरण बदला था।
धूप ने
कभी फूलों को नहीं गढ़ा,
वह तो तपती रही;
सुगंध का निर्णय
ऋतुओं ने किया।
कितना विचित्र है—
मनुष्य
हार से बचना चाहता है,
जबकि समय
उसी के भीतर
एक अदृश्य प्रतिमा तराश रहा होता है।
कुछ दरारें
दीवारों में नहीं पड़तीं,
दृष्टि में उतरती हैं।
कुछ ठोकरें
घुटनों पर नहीं लगतीं,
विश्वास की नींद तोड़ती हैं।
और तब...
चलना
सिर्फ़ चलना नहीं रह जाता।
पत्थर
पत्थर नहीं रहते।
रास्ते
रास्ते नहीं रहते।
वे धीरे-धीरे...
आत्मविश्वास का
दूसरा नाम बन जाते हैं।
रविवार, 26 जुलाई 2026
अपने हिस्से की धूप ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
अपने हिस्से की धूप
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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मनुष्य का जीवन केवल समय का नहीं, बल्कि रिश्तों, दायित्वों और अपेक्षाओं का भी एक लंबा सफ़र है। इस यात्रा में वह अपनों के लिए जीते-जीते अक्सर स्वयं से ही दूर हो जाता है। यह कविता उसी मौन पीड़ा और जीवन-सत्य की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति है—जहाँ रिश्तों का सम्मान भी है और अपने अस्तित्व को बचाए रखने की विनम्र पुकार भी। "अपने हिस्से की धूप" हमें स्मरण कराती है कि यदि जीवन में कुछ पल स्वयं के लिए भी बचा लिए जाएँ, तभी रिश्तों की छाँव और जीवन की धूप दोनों का वास्तविक अर्थ समझा जा सकता है।
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अपने हिस्से की धूप
जीवन सब रिश्तों में बाँटा, मेरे हिस्से कुछ बचा नहीं,
दूर क्षितिज को ताक रहा था, पास पड़ा कुछ दिखा नहीं।
आते-जाते हर रिश्ते में, कोई रिश्ता बचा नहीं,
जीवन भर क्या पाया जग में, मेरे हिस्से कुछ बचा नहीं।
सुबह उगी तो स्वप्न बटोरें, साँझ हुई तो थककर सोए,
दिन की धूप पराई निकली, अपने आँगन दीप न रोए।
नदियों-सा बहते ही गुज़रे, सागर बनना याद रहा नहीं,
पत्तों जैसे झरते मौसम, मन का वन फिर हरा नहीं।
सबके आँसू अपनी आँखों में, अपनी पीड़ा कह पाया नहीं,
हर मुस्कान की कीमत दी, अपना चेहरा पढ़ पाया नहीं।
पर्वत-सा दायित्व उठाया, पंछी-सा उन्मुक्त उड़ा नहीं,
भीड़ बहुत थी जीवन-पथ पर, स्वयं से लेकिन मिला नहीं।
थोड़ी देर स्वयं के संग भी, बैठ सकूँ तो बात बने,
मन के सूने आँगन में फिर, कोई चुप-सी भोर तने।
साँस-साँस जग को सौंप दी, अपने लिए जिया नहीं,
भीतर बैठा जो मैं था, उससे कभी मिला नहीं।
रिश्ते जीवन की छाया हैं, उनसे सुंदर जग में क्या,
पर अपने मन का द्वार खुला हो, इससे बढ़कर सुख भी क्या।
जो हर दिन थोड़ा स्वयं से मिले, वही सचमुच जीता है,
वरना जीवन सबको देकर, मन अपना ही रीता है।
गुरुवार, 23 जुलाई 2026
यह हिमगिरि का बहता नीर (गीत) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
यह हिमगिरि का बहता नीर (गीत)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
यह हिमगिरि का बहता नीर,
कितना शीतल, कितना धीर।
शुभ्र शिखर की पावन गोद,
जाग उठी बन जीवन-ओद,
कल-कल, छल-छल मधुर प्रबोध
तन का उज्ज्वल, मन का तीर,
यह हिमगिरि का बहता नीर।
हिम के उर से निकल-निकल,
शैल-शिखर से सँभल-सँभल,
चट्टानों से मिल मचल-मचल,
कंकड़ गाते छम-छम पल-पल,
वन-उपवन हँसते अविरल
धरती का मधुमय गंभीर,
यह हिमगिरि का बहता नीर।
सूखी धरती की प्यास लिए,
हरियाली का विश्वास लिए,
माटी की सौंधी साँस लिए,
जीवन का मधु-उल्लास लिए,
चलता अपना प्रकाश लिए
करुणा की अनुपम जागीर,
यह हिमगिरि का बहता नीर।
भोर सुनहरी दीप जलाए,
साँझ सितारों को पास बुलाए,
चन्दा अपने चरण धुलाए,
सूरज स्वर्णिम हार पहनाए,
नभ धरती का गीत सुनाए
प्रकृति बने संगीत-शरीर,
यह हिमगिरि का बहता नीर।
नहीं किसी से कुछ भी माँगे,
देता जाए हेमल के धागे,
सूखे वन में स्वप्न उगाए,
पत्थर तक में फूल खिलाए,
पीड़ा को भी प्यार सिखाए
त्याग बना जिसकी तक़दीर,
यह हिमगिरि का बहता नीर।
ऋषियों का यह मौन तपोवन,
कृषकों का श्रम, बालक का मन,
माँ की ममता, संतों का धन,
जन-जन का यह जीवन-स्पंदन,
भारत का अमृत-आवर्तन
युग-युग गूँजे इसकी पीर,
यह हिमगिरि का बहता नीर।
जब तक गगन, धरा, वन होंगे,
जब तक ऋतु के मधुवन होंगे,
जब तक मानव-हृदय धरेगा,
प्रेम-दीप अन्तस में जलेगा,
तब तक इसका गीत बहेगा
अमर रहेगा काली-गोरी नदियों का नीर,
हिमगिरि का हेमल-सा बहता नीर।
फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी
(एक टुकड़ा लम्हा)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
कोई रिश्ता अगर ख़ामोश होकर भी महकता है,
यक़ीन मानों वही रिश्ता सबसे हसीन होता है।
हमने चेहरों से ज़्यादा आँखें पढ़ना सीख लिया,
लफ़्ज़ अक्सर झूठ बोलते हैं, ख़ामोशियाँ नहीं।
बहुत ऊँचा था वो अपने ही तकब्बुर की वजह से,
हवा चली तो सबसे पहले वही दरख़्त टूटा।
घर बड़ा होने से तन्हाई नहीं मर जाती,
एक अपना-सा इंसान हो तो झोपड़ी भी काफ़ी है।
उम्र भर आईने बदलने में लगे रहे लोग,
किसी ने ख़ुद को बदलने की ज़हमत न उठाई।
धूप ने मुझसे कहा—चल, मैं तुझे तपाऊँगी,
छाँव ने हँसकर कहा—पहले सफ़र तो कर।
जो अपने दर्द को दुनिया की दुआ कर दे,
वही इंसान ज़माने से बड़ा हो जाता है।
मिट्टी ने हर बार मुझे झुकना सिखाया,
इसीलिए शायद मैं गिरकर भी बिखरा नहीं।
रात भर चाँद से बातें तो बहुत की हमने,
सुबह मालूम हुआ, जवाब अपने भीतर था।
बहुत संभाल के रखिए जनाब अपने लहजे को,
यही एक चीज़ है जो लौटकर नहीं आती।
हर एक जीत का चेहरा चमकता ज़रूर है,
मगर उसके पीछे कई हारें दफ़्न होती हैं।
दुआ देने वाले हाथ कभी ख़ाली नहीं रहते,
ये कारोबार किसी बाज़ार का मोहताज नहीं।
जिस दिन अपने होने का गुरूर उतर जाएगा,
उसी दिन हर आदमी अपना-सा लगने लगेगा।
कुछ लोग किताबों की तरह उम्र भर खुले रहे,
कुछ लोग एक सफ़्हा भी पढ़ने न दिए गए।
वक़्त ने जब भी मुझे आईना दिखलाया है,
मैंने अपने ही सवालों को खड़ा पाया है।
चराग़ बनने की चाहत हो तो जलना सीखो,
उजाले मुफ़्त में किसी के हिस्से नहीं आते।
रिश्ते आवाज़ से नहीं, एहसास से ज़िंदा रहते हैं,
वरना रोज़ मिलने वाले भी अजनबी निकलते हैं।
अपनी ख़ुशबू को हवाओं का सहारा न बनाओ,
फूल बनना है तो ख़ुद अपनी पहचान बनो।
ज़िंदगी ने यही सिखाया है मुसाफ़िर बनकर,
जो बाँटते चले गए, वही सबसे अमीर निकले।
मरने के बाद तस्वीरें ही नहीं बचतीं साहब,
अगर किरदार अच्छा हो तो लोग दुआओँ में भी रखते हैं।
मंगलवार, 21 जुलाई 2026
मेघमन्थन : श्रावण का आत्मगान ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
मेघमन्थन : श्रावण का आत्मगान
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
नील नभ के नीरव उर में घन का गम्भीर निमंत्रण है,
धरती के उन्मीलित लोचन में नवजीवन का स्पन्दन है।
हरित वसन में लिपटी प्रकृति का मौन मधुर अभिनन्दन है,
श्रावण केवल ऋतु नहीं—सृष्टि-हृदय का वन्दन है।
शैल-शिखर की शान्त तपस्या आज सुधा से भीग रही,
निर्झर की निस्सीम सरगम अन्तर-वीणा छेड़ रही।
देवदारु के ध्यान-वृक्ष पर धुंध दिगन्तों से उतरी है,
मानो युग की मौन समाधि नव चेतन से जाग रही।
कदम्बों की कोमल शाखों पर बूँदों का श्रृंगार खिला,
वन-पथ के हर तृण ने जैसे स्वर्णिम जीवन-सार मिला।
पवन प्राचीन ऋषि-सा बहकर कानों में कुछ कह जाता,
मौन शिलाओं के अंतर में भी नव आलोक-विहार मिला।
विद्युत् की चंचल रेखा ने तम का आवरण चीर दिया,
क्षण भर में ही असीम गगन का अन्तर्मन गंभीर किया।
मेघों ने जब करुणा बनकर अपनी पलकों को झुका दिया,
सूखी धरती के अधरों पर जीवन का अमृत नीर दिया।
घाटी-घाटी गूँज रहे हैं निर्झर के निर्मल आलाप,
वन-वन में झंकृत हो उठता पत्तों का मृदुल प्रतिताप।
मयूर-पंख पर नाच रही है इन्द्रधनुष की मौन हँसी,
कोयल के भी भीगे स्वर में विरह बना मधुमय जाप।
नदियाँ अपने उद्गम का इतिहास कभी दोहराती नहीं,
त्याग-तरंगों का संगीत लिए क्षण भर भी थक जाती नहीं।
पर्वत के उर का सारा स्नेह समतल तक पहुँचा देतीं,
अपना सब कुछ देकर भी वे प्रतिदान कभी चाहती नहीं।
हल की रेखा धरती के उर पर आशा का अभिलेख बने,
बीजों की निस्तब्ध तपस्या कल का स्वर्णिम लेख बने।
मेघ-कृपा से श्रम का कण-कण अन्नपूर्णा बन मुस्काए,
किसान के श्रम का प्रत्येक श्वास मंगल-अभिषेक बने।
धुंध दुल्हन बन पर्वत के नील कपोलों को चूम रही,
ओस मुकुल की पलकों पर चुप स्वप्निल दीपक झूम रही।
हर पत्ती पर बूँद ठहरकर जैसे मोती बन जाती है,
सृष्टि स्वयं अपने दर्पण में अपना रूप निहार रही।
श्रावण! तुम केवल जलधारा, केवल बादल, केवल मेघ नहीं,
तुम जीवन की मौन प्रार्थना, करुणा का अनुपमेय स्नेह हो।
तुमसे ही सूखे अन्तरवन में फिर हरियाली जन्मे है,
तुमसे ही मानव के उर में फिर विश्वास का सेतु रहे।
जब-जब जीवन धूल भरे पथ पर थककर रुक-सा जाता है,
तब-तब श्रावण बनकर कोई भीगा सपना आता है।
बूँद-बूँद में ब्रह्म का स्पर्श, पात-पात में प्रेम बसा—
प्रकृति नहीं, स्वयं ईश्वर ही हरियाली बन गाता है।
धरती का कण-कण आज अनन्त का अभिनव अर्थ हुआ,
मेघों का प्रत्येक निनाद स्वयं वेदों का स्वर-पार्थ हुआ।
श्रावण आया—और लगा यह सारा जग नवजात हुआ,
जीवन का प्रत्येक श्वास स्वयं परमात्मा का गान हुआ।
शुक्रवार, 17 जुलाई 2026
हरेला की टोकरी ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
हरेला की टोकरी
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
"हरेला की टोकरी" केवल उत्तराखंड के लोकपर्व का काव्यात्मक चित्रण नहीं, बल्कि मनुष्य, प्रकृति, स्मृति और सांस्कृतिक अस्मिता के बीच टूटते-बनते संबंधों का एक गहन प्रतीक है। यह कविता वर्ष में मनाए जाने वाले तीनों हरेलों—चैत (चैत), श्रावण (सौण) और आश्विन (असौज)—को केवल ऋतु-परिवर्तन के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के तीन आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पड़ावों के रूप में देखती है। चैत (चैत) आशा और सृजन का, श्रावण (सौण) संवेदना और जीवन-स्पंदन का, तथा आश्विन (असौज) स्मृति, आत्ममंथन और जड़ों की ओर लौटने का प्रतीक बनकर उभरता है। कविता यह प्रश्न उठाती है कि यदि पलायन के कारण गाँव, लोकभाषा, लोकपर्व और सामुदायिक जीवन निरंतर रिक्त होते जाएँ, तो केवल पर्वों का जीवित रहना पर्याप्त नहीं होगा। इस प्रकार हरेला की टोकरी अंततः बीजों की नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर बची हुई उस अंतिम हरियाली, अपनी मिट्टी से जुड़े रहने की चेतना और उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा को बचाए रखने की सामूहिक जिम्मेदारी का सशक्त रूपक बन जाती है।
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हरेला की टोकरी में
इस बार
केवल बीज नहीं हैं।
वहाँ रखी है
एक बूढ़ी दादी - नानी की हथेली,
जिसकी रेखाओं में अब भी
चैत उगता है।
वहाँ एक बच्चे की हँसी है,
जो शहर की किसी ऊँची इमारत में
अपनी ही कुमाऊं और गढ़वाली बोली भूलकर
धीरे-धीरे मौन हो रही है।
वहाँ
एक अधूरी पगडंडी है—
जो हर बरस
किसी लौटते हुए कदम की प्रतीक्षा में
थोड़ी और घिस जाती है।
कहा जाता है—
सौण आता है
तो धरती भीगती है।
पर किसने देखा
कि सबसे पहले
भीगती हैं स्मृतियाँ।
पहले भीगता है
एक बंद घर का किवाड़,
फिर तुलसी का सूना चौरा,
फिर वह दीपक
जिसे वर्षों से
किसी ने अपने नाम से नहीं पुकारा
और छत के पाथर।
बारिश
पहाड़ पर कभी पानी बनकर नहीं गिरती,
वह उतरती है
पूर्वजों की धीमी आवाज़ की तरह।
और जंगल...
जंगल पेड़ों का समूह नहीं होता,
वह उन लोगों का सामूहिक मौन होता है
जो अपनी जड़ों को
कभी छोड़कर नहीं गए।
फिर
असौज आता है।
धूप की तहों में
ओस अपना अंतिम हस्ताक्षर रखती है।
हवा
सूखी नहीं होती,
वह उन नामों से भर जाती है
जो अब गाँव की जनगणना में नहीं मिलते।
एक घर
जब बंद होता है,
तो केवल एक दरवाज़ा बंद नहीं होता—
एक लोकगीत
अपना श्रोता खो देता है।
एक त्योहार
अपना घर खो देता है।
एक भाषा
अपने उच्चारण का अंतिम वृक्ष खो देती है।
और पहाड़...
पहाड़
कभी अचानक खाली नहीं होते।
वे पहले
अपनी आवाज़ खोते हैं।
फिर धुआँ।
फिर बच्चों की दौड़-धूप।
फिर बाखलियों की साँझ।
और अंत में
हरेला की टोकरी
हल्की हो जाती है।
इतनी हल्की
कि उसमें रखा हुआ
एक अकेला बीज भी
पूरे हिमालय का आदर्श लगता है।
शायद इसीलिए
हरेला
ऋतु का उत्सव नहीं है।
यह मनुष्य से
उसकी मिट्टी का अंतिम संवाद है।
यह उस प्रश्न का उत्तर भी नहीं,
जो हर वर्ष चैत, सौण और असौज पूछते हैं—
यह स्वयं
वही प्रश्न है।
कि...
यदि बीज बच जाएँ
और खेत न बचें,
यदि पर्व बच जाएँ
और लोग न बचें,
यदि घर बच जाएँ
और लौटने वाले कदम न बचें,
तो बताओ—
हरेला किसके लिए उगेगा?
और काटेगा कौन ?
और गोलज्यू, गंगनाथ, भगवती के थानों पर चढ़ाएगा कौन?
और तब
हरेला की टोकरी में
अचानक दिखाई देती है
एक मुट्ठी मिट्टी—
जो किसी खेत की नहीं,
किसी राज्य की नहीं,
बल्कि
मनुष्य के भीतर
अब भी बची हुई
उस अंतिम हरियाली की है,
जिसे बचाए बिना
कोई भी पहाड़
पहाड़ नहीं रहता।
गुरुवार, 16 जुलाई 2026
हरेला : प्रकृति पर्व, संस्कृति और नवजीवन का महापर्व 🌿 ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
हरेला : प्रकृति पर्व, संस्कृति और नवजीवन का महापर्व 🌿
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
हरेला केवल उत्तराखंड का एक लोकपर्व नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के बीच अटूट संबंध का जीवंत उत्सव है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि हमारा जीवन वृक्षों, जल, जंगल, भूमि और जैव-विविधता से जुड़ा हुआ है। सावन के आगमन पर मनाया जाने वाला हरेला हरियाली, समृद्धि, नई आशाओं और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है। इस दिन घरों में हरेला बोया जाता है, उसकी पूजा की जाती है और परिवार के बड़े-बुज़ुर्ग उसे सिर पर रखकर आशीर्वाद देते हैं। यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भारतीय जीवन-दृष्टि का प्रतीक है।
उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में हरेला का विशेष महत्व है। पर्वतीय जीवन सदियों से जल, जंगल और जमीन पर आधारित रहा है, इसलिए हरेला यहाँ की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग बन गया है। यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति का संरक्षण केवल सरकारों का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक कर्तव्य है। आज जब जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, जलस्रोतों का सूखना और पर्यावरणीय संकट पूरी दुनिया के सामने चुनौती बनकर खड़े हैं, तब हरेला का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।
हरेला हमें यह भी प्रेरणा देता है कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। यदि हम प्रत्येक वर्ष एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल करने का संकल्प लें, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित, स्वच्छ और हरित भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। यही कारण है कि आज हरेला केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के जनआंदोलन का स्वरूप ग्रहण कर रहा है।
आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें कि "एक व्यक्ति – एक पौधा, एक परिवार – एक हरित अभियान" को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँगे। यही हरेला का वास्तविक संदेश है और यही प्रकृति के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि भी।
हरेला पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ!
"जी रये, जागि रये, धरती जस आगव,
आकाश जस चाकव होये, दूब जस फलिए-फूलिए,
सदा स्वस्थ, सुखी और समृद्ध रहिए।" 🌿🌱


