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शनिवार, 30 मई 2026
पहाड़ का दर्द - ( हिंदी कविता : पहाड़, शहर और बदलते समय का तुलनात्मक आख्यान)©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
शुक्रवार, 29 मई 2026
किस्से किस्तों में... ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
तेरी बेरुख़ी ने भी क्या कमाल कर दिया,
हम हँसते रहे और दिल बेहाल कर दिया।
वो इश्क ही क्या जिसमें तड़प बाकी न रहे,
आँखें सूख जाएँ मगर नमी बाकी न रहे।
तू छोड़ गया यूँ जैसे कभी था ही नहीं,
और हम आज तक तुझे खोया मानते रहे।
तेरे बाद ख़ामोशी भी चीख़ती रही,
हम रोते रहे और दुनिया देखती रही।
मोहब्बत में हारकर भी तुझी को चाहा,
ये कैसा ज़हर था जो मुस्कुरा के पिया।
दिल टूटा तो आवाज़ तक न आई,
जैसे टूटकर तारा कहीं खो गया हो।
वो कहकर गया था “ख़ुश रहना”,
और सारी ख़ुशियाँ साथ ले गया।
तेरे इश्क में खुद को मिटा बैठे,
अब आईना भी हमें पहचानता नहीं।
तू मिला भी अधूरा, तू गया भी अधूरा,
हमारा हर सपना रह गया अधूरा।
तेरी यादों का धुआँ आज भी उठता है,
दिल का शहर अब भी धीरे-धीरे जलता है।
हमने चाहा तुझे सजदे की तरह,
और तूने छोड़ा हमें गुनाह की तरह।
तेरी चुप्पी ने सबसे ज़्यादा मारा,
लफ़्ज़ कम थे मगर दर्द बहुत सारा।
तू किसी और की बाहों में हँसता रहा,
और मेरा दिल रातभर मरता रहा।
मोहब्बत की किताब में बस इतना पढ़ा,
जिसे टूटकर चाहो वही छोड़ जाता है।
वो इश्क भी क्या इश्क था साहिब,
जिसमें आँसू न हों और रातें न जागें।
तेरे बिना अब कोई शिकायत भी नहीं,
तू मेरा था ही नहीं — ये यक़ीन अब हुआ।
हमने दिल दिया था रोशनी समझकर,
वो अँधेरा देकर चला गया।
तूने पूछा भी नहीं हाल मेरे दिल का,
और हम तेरे हर दर्द की दुआ करते रहे।
कुछ रिश्ते टूटकर भी खत्म नहीं होते,
बस लोग चुप हो जाते हैं।
अब मोहब्बत से डर लगता है,
क्योंकि दिल आज भी तेरा नाम सुनकर धड़कता है।
किस्से किस्तों में... ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
घर की किस्तों में उम्र यूँ ही उतरती रही,
छत तो मिल गई मगर नींद किराये पर रही।
रोटी की जंग में कितने रिश्ते थक गए,
कुछ लोग भूखे रहे, कुछ लोग अहंकार से भर गए।
नौकरी मिली तो बचपन कहीं गुम हो गया,
वक्त कमाने निकले थे, सुकून कम हो गया।
बीवी की आँखों में शिकायत भी दुआ जैसी थी,
घर की तंगी में भी उसकी वफ़ा अमीरों जैसी थी।
बेटे बड़े हुए तो मकाँ बाँटने लगे,
माँ-बाप उम्र भर बस घर बनाने लगे।
हर आदमी यहाँ किसी चिंता का मरीज़ है,
कोई तन से परेशान, कोई दिल से गरीब है।
भागती दुनिया ने इतना थका दिया मुझे,
अब सुकून मिलता है चुप रहकर चाँद देखने में।
जिसे दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती,
उसी के घर में अक्सर सबसे ज़्यादा हँसी होती।
ज़िंदगी ने हर मोड़ पर हिसाब माँगा मुझसे,
मैं मुस्कुराता रहा और कर्ज़ बढ़ता गया।
कितनी अजीब है ये शहरों की रौनक भी,
भीड़ लाखों की है मगर आदमी तन्हा है।
बेटियाँ घर की इज़्ज़त भी हैं और रौनक भी,
फिर भी लोग उन्हें बोझ कहने से नहीं डरते।
पति-पत्नी के झगड़ों में अक्सर यही देखा,
दोनों सही होते हैं मगर वक्त ग़लत होता है।
उम्र भर कमाते रहे मकान, गाड़ी और दौलत,
मरते वक्त बस एक गिलास पानी की प्यास रही।
जिसने जितना दर्द सहा, उतना ख़ामोश हुआ,
शहर का सबसे गहरा आदमी कम बोलता है।
आजकल लोग रिश्तों में वक़्त नहीं देते,
और उम्मीद करते हैं कि मोहब्बत ज़िंदा रहे।
बेरोज़गारी ने बच्चों से बचपन छीन लिया,
अब खिलौनों की जगह फ़ॉर्म भरे जाते हैं।
कुछ लोग थाली में नमक तक गिनते हैं,
और कुछ लोग दुख में भी शुक्र अदा करते हैं।
ज़िंदगी ने मुझे मिट्टी की तरह बरता है,
तभी हर ठोकर के बाद मैं और मज़बूत हुआ हूँ।
घर छोटा हो तो भी चल जाता है साहब,
बस दिलों में दरारें बड़ी नहीं होनी चाहिए।
हमने सीखा है फ़क़त इतना इस ज़माने से,
खुश वही लोग हैं जो कम में भी शुक्रगुज़ार हैं।
गुरुवार, 28 मई 2026
हनुमान गीत - ®डॉ. चंद्रकांत तिवारी
हनुमान गीत
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
श्रीगुरु-चरन सरोज प्रणामी,
वंदौं पवनकुमार बलधामी।
रामदूत रुद्रावतारी,
संकट-मोचन मंगलकारी।
जय कपीश्वर महाबलशाली,
त्रिभुवन-वंदित कृपानिधि लाली।
भक्त-विपद हरने वाले,
दीन-दुखी उर में बसने वाले।
अंजनि-गर्भ दिवाकर-ज्योति,
प्रकटे बनकर शिव-प्रभु-शक्ति।
केसरी-गृह आनंद समाया,
देवगणों ने पुष्प बरसाया।
मंत्रोच्चार गगन में गूँजे,
ऋषि-मुनि सब चरणन पूजे।
वेदध्वनि जब नभ में छाई,
धरती पर शुभ बेला आई।
बाल-रवि को फल समझ धाए,
नभ-मंडल में शीघ्र समाए।
देवसभा विस्मित हो बोली,
“यह लीला अति अद्भुत भोली।”
इंद्र-वज्र जब शीश पे गिरा,
क्षणभर को त्रिभुवन था डरा।
पवनदेव क्रोधित हो आए,
प्राण-वायु जग से रुक जाए।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश पुकारे,
देवसमूह चरणन पर डारे।
“अजर-अमर बलवान कहाओ,
भक्ति-शक्ति के दीप जलाओ।”
सूर्यदेव गुरु रूप में आए,
ज्ञान-सुधा के स्रोत बहाए।
वेद, व्याकरण, शास्त्र निराले,
उर में उतरे दिव्य उजाले।
विनय-शीलता संग बल भारी,
तेजपुंज छवि अति सुखकारी।
ऋषि-वचन का मान बढ़ाया,
सत्य-धर्म को हृदय बसाया।
ऋष्यमूक गिरि सुंदर छाया,
राम-लखन का दर्शन पाया।
ब्राह्मण-वेष धरे मुस्काए,
मधुर-वचन से मन हर लाए।
“कोमल चरण वनस्थलि धारे,
कौन वीर वन-पंथ तुम्हारे?”
राम-नाम जब कानन आया,
भक्ति-सागर उर में छाया।
नेत्र सजल पुलकित तन सारा,
राम-भक्ति बन जीवन-धारा।
चरणों में गिर दास कहाए,
प्रभु ने हर्षित उर से लगाए।
रामकाज को जीवन माना,
सेवा-धर्म अमृत पहचाना।
सुग्रीवहि पुनि मित्र बनाया,
भय का तम सब दूर भगाया।
बाली-दर्प धरा पर टूटा,
सत्य-सूर्य पुनि नभ में फूटा।
धर्मध्वजा फिर ऊँची लहराई,
सुग्रीवहि पुनि राज दिलाई।
सीतापति उर व्याकुल भारी,
माता-वियोग व्यथा अति भारी।
वानर-दल सब सोच में डोले,
जामवंत तब सत्य ही बोले।
“वीर हनूमान! बल तुम माहीं,
त्रिभुवन-मध्य सम कोउ नाहीं।”
सुनतहि जागा तेज अपारा,
गूँजा गिरि और सिंधु किनारा।
महेंद्राचल शिखर चढ़ि धाए,
राम-नाम उर भीतर गाए।
एकहि लाँघ सिंधु जलधारा,
काँपा नभ और जग सारा।
सुरसा आई राह निहारी,
परीक्षा चाही बल की भारी।
बुद्धि-विनय से पंथ निकाला,
भक्ति-बल का दीप उजाला।
सिंहिका तम-रूप विकराला,
क्षण में किया उसे निष्काला।
लंकिनी का मान गिराया,
लंका-द्वार प्रवेश बनाया।
स्वर्णपुरी अति दिव्य सुहानी,
पर अधर्म की छाया काली।
रात्रि-वेष धर नगर निहारा,
रावण-दर्प दिखा अंधियारा।
अशोक-वाटिका शोकमयी थी,
सीता-माता व्यथा भरी थीं।
राम-मुद्रिका जब दिखलाई,
आशा-ज्योति उर में समाई।
“माता! धीर धरो मन माहीं,
प्रभु बिन विलंब करैं अब नाहीं।”
वचन सुनत जनकसुता रोईं,
भक्ति-सुधा नयनों से धोईं।
फल-भक्षण कर वाटिका तोरी,
राक्षस-सेना भय से डोरी।
अक्षयकुमार रण में सोया,
लंका-दर्प धरा पर रोया।
मेघनाद नागपाश ले आया,
किन्तु न कपि-बल तनिक झुकाया।
रावण-दरबार मध्य पुकारा,
“रामदूत मैं सत्य हमारा।”
“त्यजि अभिमान रघुनाथहि मानो,
धर्ममार्ग अब शीघ्र पहचानो।”
रावण क्रोध-अग्नि में डोला,
पूँछ-दहन का आदेश बोला।
ज्वाला बन जब पूँछ प्रज्वलित,
लंका हुई क्षणमात्र दग्धित।
राम-नाम की महिमा भारी,
जल उठी स्वर्णमयी नगरी।
सिंधु लाँघि पुनि लौटे धाए,
सीता-संदेश संग ले आए।
राम-विरह के मेघ हटाए,
प्रभु-नयन आनंद भर आए।
“कपि! तुम सम प्रिय कोउ नाहिं,”
राम-वचन अमृत सम माहीं।
गले लगाकर मान बढ़ाया,
भक्ति-रत्न जग को दिखलाया।
सेतु-बंध जब आरंभाया,
शिला-शिला पर राम लिखाया।
जलनिधि ने शीश नवाया,
भक्ति-बल का मान बढ़ाया।
रणभेरी जब नभ में बाजी,
राक्षस-दल पर विपदा छाई।
वज्रांग बन रणभूमि धाए,
असुर-निकर सब काँप उठाए।
अतिकाय का दर्प मिटाया,
कालनेमि भयभीत बनाया।
जहाँ पड़े कपि-चरण तुम्हारे,
भागे संकट दूर किनारे।
लक्ष्मण मूर्छित भूमि पर सोए,
राम-वियोग नयनन से रोए।
द्रोणगिरि पर शीघ्रहि धाए,
संजीवनि संग पर्वत लाए।
देवगणों ने पुष्प बरसाए,
राम-लखन उर हर्ष समाए।
भक्ति-बल का यह प्रताप था,
राम-कृपा का दिव्य आलाप था।
रावण-वध पश्चात जग गाया,
रामराज्य पुनि धरा पर आया।
अयोध्या मंगलध्वनि छाई,
प्रेम-सुधा घर-घर मुस्काई।
राजसभा में विनय तुम्हारी,
सबसे ऊँची छवि सुखकारी।
सेवा को ही धर्म माना,
राम-नाम उर प्राण ठाना।
जहाँ गूँजता नाम तुम्हारा,
मिटता भय-दुःख-अंधियारा।
भूत-पिशाच निकट न आवैं,
हनुमत-नाम सुनत डर जावैं।
निर्बल को तुम बल दे देते,
भटके जन को राह दिखाते।
संकट में जो तुम्हें पुकारे,
कट जाएँ दुख उसके सारे।
विद्या-बुद्धि के तुम दाता,
भवसागर के दृढ़ त्राता।
लोभ-मोह का तम हर लेते,
सत्य-ज्योति उर में भर देते।
कलियुग-मध्य कृपालु दयाला,
भक्त-हृदय के दीप उजाला।
जहाँ स्मरण हनुमत का होता,
भय का बादल दूर ही होता।
तुम शिवशक्ति के अवतारी,
रामभक्ति के रखवाली।
तेज तुम्हारा सूर्य समाना,
करुणा गंगा-जल सम माना।
साधु-संत जब ध्यान लगावें,
हनुमत-नाम जपें सुख पावें।
तुम बिन कौन विपद हर लेता,
दुःख-सागर से पार उतारता।
जो नर सत्य-व्रत अपनाता,
हनुमत-कृपा सहज ही पाता।
कर्म-पथों पर अडिग जो रहता,
जीवन उसका सफल ही रहता।
तुमसे सीखे जग सेवा करना,
पीड़ित उर का भार हरना।
भूखे को अन्न-जल पहुँचाना,
रोते मन को धैर्य बँधाना।
बल केवल बाहु में ना हो,
बल मन का भी जाग्रत हो।
तुमने जग को ज्ञान बताया,
विनय सहित बल को अपनाया।
दंभ-दहन के दिव्य अग्नि हो,
भक्त-हृदय के पूर्ण चंद्र हो।
असत्य जहाँ विस्तार करेगा,
धर्म वहीं हुंकार भरेगा।
अंधकार जब जग में छाता,
मानव साहस खो सा जाता।
तब बजरंगी नाम तुम्हारा,
देता नवजीवन उजियारा।
शास्त्रों का गूढ़ ज्ञान तुम्हारा,
किन्तु सरल व्यवहार तुम्हारा।
महिमा जितनी ऊँची होती,
उतनी विनम्रता भी होती।
नारी-मान के दृढ़ रखवाले,
दीन-दुखी के सदा सहारे।
सीता-माता का दुःख हरने,
तुम लंका-पुर तक थे दौड़े।
जो अन्यायों से टकराए,
सत्य-धर्म की राह निभाए।
तुम उसकी ढाल बन जाते,
हर संकट से पार लगाते।
विद्यार्थी जब शीश नवाते,
हनुमत-चरणों में झुक जाते।
विद्या-बुद्धि सहज मिल जाती,
मन में नई प्रभा जग जाती।
रणभूमि में वीर जो जाए,
हनुमत-नाम हृदय में लाए।
भय का तम क्षणभर मिट जाता,
साहस-सूर्य प्रखर हो जाता।
गृहस्थ यदि श्रद्धा से गावें,
सुख-समृद्धि घर में आवें।
कलह-क्लेश सब दूर भगाते,
प्रेम-सुमन आँगन महकाते।
साधक यदि मन स्थिर कर ले,
हनुमत-ध्यान उर में धर ले।
चंचलता सब शांत हो जाती,
आत्म-ज्योति भीतर जग जाती।
तुमसे सीखे श्रम को मानें,
सत्य-वचन को उर में ठानें।
फल की चिंता दूर भगाकर,
सेवा-पथ पर रहें निरंतर।
जो आलस्य त्याग जगाता,
कर्मयोग का दीप जलाता।
उस पर कृपा तुम्हारी होती,
जीवन में सुख-धारा बहती।
वनवासी से राजमहल तक,
तुम सबके प्रिय निर्मल नितांत।
जाति-पांति का भेद मिटाते,
सबको प्रेम-गले लगाते।
दीनों के तुम दृढ़ आधार हो,
भक्तों के पालनहार हो।
अंधियारे में दीप जलाते,
टूटे मन को राह दिखाते।
रामदूत कहलाना प्यारा,
राजसिंहासन नहीं गंवारा।
सेवा में जो सुख तुमने पाया,
जग ने दुर्लभ उसे बताया।
तुम भारत की अमर धरोहर,
धर्मध्वजा के दृढ़ प्रहरीवर।
युग-युग तक गाथा गाई जाए,
हर जन तुमको शीश नवाए।
जब-जब संकट घोर घनेरा,
नाम तुम्हारा बनता सवेरा।
भक्त पुकारे प्रेम-भरे मन,
तुरत पहुँचते पवननंदन।
भूत-प्रेत बाधा मिट जाती,
हनुमत-कृपा जहाँ बरसाती।
रोग-शोक सब दूर भगाते,
साहस के नव दीप जलाते।
लोभ-मोह का जाल जलाते,
मन में निर्मल भाव जगाते।
क्रोध-द्वेष सब दूर भगाकर,
प्रेम-सुधा उर में भरते।
जो प्रतिदिन गाथा को गाए,
मन में श्रद्धा-ज्योति जलाए।
उसके कष्ट स्वयं मिट जाएँ,
जीवन में मंगल ही आएँ।
दरिद्रता का तम हर लेना,
सद्बुद्धि का दीपक देना।
सत्य-धर्म में दृढ़ कर देना,
मानवता से उर भर देना।
हे महावीर कृपा बरसाओ,
हर प्राणी को गले लगाओ।
भय-अन्याय अधर्म मिटाओ,
भारत-भूमि पुनः महकाओ।
गंगा-जल सी निर्मल भक्ति,
सूर्य-सम प्रखर रहे शक्ति।
हर जन में सद्भाव जगाना,
सेवा का संकल्प दिलाना।
जब तक नभ में चंदा-तारा,
जब तक बहती गंग-धारा।
तब तक गूँजे नाम तुम्हारा,
जय-जय हनुमत वीर हमारा।
राम-नाम उर भीतर बसता,
हनुमत-भक्त कभी न डरता।
भवसागर का पार वही है,
जिसके संग तुम्हारी कृपा है।
संकट-मोचन नाम तुम्हारा,
हरता भव का अंधियारा।
दीन-जनों के तुम रखवाले,
रामभक्ति के दीप निराले।
जय अंजनि-सुत वीर हनुमाना,
जय पवनसुत महाबलवाना।
सिद्धि-बुद्धि के दिव्य दाता,
भक्त-हृदय के परम त्राता।
तुमसे जीवन ज्योति पाता,
भटका मानव राह को पाता।
भक्ति-शक्ति का वर दे देना,
सत्य-पथों पर दृढ़ कर देना।
अंत समय जब प्राण डगमग,
नाम तुम्हारा देता संबल।
राम-नाम के साथ तुम्हारा,
हो जाता भवसागर पारा।
हर मंदिर में दीप जलेंगे,
हनुमत-गुण जब गाएंगे।
हर जन के अंतरमन में,
रामराज्य फिर आएगा।
सत्य अहिंसा धर्म बचाना,
निर्बल जन का साथ निभाना।
यही तुम्हारा दिव्य संदेश,
यही सनातन धर्म विशेष।
हे कपिराज कृपानिधि स्वामी,
तुम बिन कौन बने हितकारी।
जीवन-पथ पर साथ निभाना,
हर संकट से पार लगाना।
राम-भक्ति अमृत बरसाओ,
कलुष-द्वेष सब दूर भगाओ।
हर हृदय में प्रेम जगाना,
मानव को मानव बनाना।
जय-जय-जय हनुमत बलधारी,
जय संकटहरण हितकारी।
रामदूत रुद्रावतारी,
भक्त-जनों के मंगलकारी।
जय श्री राम जय जय राम
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
प्रकृति और मनुष्य का टूटता संबंध ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
प्रकृति और मनुष्य का टूटता संबंध
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 
मिट्टी से मशीन तक : संवेदनाओं का सूखता संसार -
मनुष्य और प्रकृति का संबंध केवल उपयोग का संबंध नहीं था; वह आत्मा और श्वास का संबंध था। कभी मनुष्य धरती को माँ कहता था, नदियों को बहन, वृक्षों को देवता और पर्वतों को धैर्य का प्रतीक मानता था। सुबह की पहली किरण जब खेतों पर उतरती थी, तो किसान के चेहरे पर उम्मीद खिलती थी। पक्षियों का कलरव केवल ध्वनि नहीं था, वह जीवन की लय थी। हवा केवल बहती नहीं थी, वह मनुष्य के थके हुए मन को सहलाती थी। वर्षा की बूंदें केवल पानी नहीं थीं, वे सूखी आत्मा पर गिरती हुई सांत्वना थीं। प्रकृति मनुष्य के भीतर रहने वाली उस कोमलता का विस्तार थी, जो उसे मनुष्य बनाती थी। लेकिन आधुनिक समय में यह रिश्ता धीरे-धीरे टूटने लगा है। मनुष्य ने विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति को संसाधन समझ लिया, संवेदना नहीं। उसने नदियों को नालों में बदल दिया, जंगलों को कंक्रीट के जंगलों में और खेतों को उद्योगों की धूल में खो दिया। अब शहरों में सुबह होती है, पर पक्षियों की आवाज़ नहीं आती; वर्षा होती है, पर मिट्टी की वह सुगंध नहीं उठती जो आत्मा को भिगो देती थी। मनुष्य ने अपने चारों ओर ऊँची इमारतें तो खड़ी कर लीं, पर भीतर की हरियाली खो दी।
बिखरते रिश्तों के बीच जीवन की नई दिशा -
फिर भी पूरी तरह अंधकार नहीं है। प्रकृति अब भी मनुष्य को पुकार रही है। वह हर सुबह सूरज के रूप में लौटती है, हर शाम हवा के झोंकों में संदेश देती है कि अभी भी संबंधों को बचाया जा सकता है। जब कोई थका हुआ व्यक्ति किसी पेड़ की छाया में बैठता है, तो उसे एक अनकही शांति मिलती है। जब कोई नदी किनारे खड़ा होकर बहते जल को देखता है, तो उसके भीतर जमी हुई उदासी धीरे-धीरे पिघलने लगती है। प्रकृति आज भी मनुष्य को जीवन का सबसे बड़ा सत्य सिखाती है—संतुलन का सत्य। वृक्ष बिना भेदभाव के छाया देते हैं, नदियाँ बिना अपेक्षा के बहती हैं, फूल बिना किसी पुरस्कार के खुशबू बाँटते हैं। प्रकृति का पूरा संसार त्याग, धैर्य और सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाता है। यदि मनुष्य इस भाषा को फिर से समझ ले, तो शायद उसका बिखरता हुआ जीवन फिर से जुड़ सकता है।
आज आवश्यकता केवल पर्यावरण बचाने की नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा बचाने की है। यदि प्रकृति नष्ट होगी, तो मनुष्य भी भीतर से नष्ट हो जाएगा। इसलिए हमें केवल वृक्ष लगाने की औपचारिकता नहीं करनी, बल्कि वृक्षों से प्रेम करना सीखना होगा। नदियों को केवल संसाधन नहीं, जीवन की धड़कन समझना होगा। बच्चों को फिर से मिट्टी से जोड़ना होगा, ताकि वे केवल सफल मनुष्य नहीं, संवेदनशील मनुष्य बन सकें। आधुनिकता आवश्यक है, पर ऐसी आधुनिकता जो प्रकृति को साथ लेकर चले, उसे कुचलकर नहीं। विकास तब तक अधूरा है, जब तक उसमें हवा की स्वच्छता, जल की पवित्रता और धरती की हरियाली सुरक्षित न हो।
मनुष्य और प्रकृति का संबंध टूटेगा, तो अंततः मनुष्य स्वयं अपने अस्तित्व से टूट जाएगा। क्योंकि प्रकृति बाहर नहीं, मनुष्य के भीतर भी रहती है। जब पेड़ कटते हैं, तो मनुष्य के भीतर का धैर्य कटता है; जब नदियाँ प्रदूषित होती हैं, तो मनुष्य के विचार भी प्रदूषित होते हैं। इसलिए समय की सबसे बड़ी पुकार यही है कि मनुष्य फिर से प्रकृति की ओर लौटे। वह मिट्टी को केवल धूल न समझे, बल्कि अपने अस्तित्व की जड़ माने। वह हवा को केवल गैस न समझे, बल्कि जीवन का स्पर्श माने। प्रकृति से जुड़ना केवल पर्यावरण बचाना नहीं, बल्कि अपने भीतर बचे हुए मनुष्य को बचाना है। शायद इसी लौटने में भविष्य की सबसे बड़ी आशा छिपी है, जहाँ मनुष्य फिर से वृक्षों की छाया में शांति खोजेगा, नदियों के संगीत में अपने टूटे हुए मन को जोड़ेगा और प्रकृति की गोद में जीवन की नई दिशा पाएगा।
बुधवार, 27 मई 2026
सीमांत पर धूप और मेघों का राग (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी ......
सीमांत पर धूप और मेघों का राग
(कविता)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी ......
धारचूला की भोर में
काली नदी
नीले पारदर्शी कांच-सी चमकती बहती है,
और दार्चुला नेपाल की ढलानों से
धूप
सोने के हजारों सिक्कों-सी
पहाड़ों पर ओस के मोती-सी बिखर जाती है।
ओम पर्वत के हिम-मस्तक पर
मेघ
कभी जटाधारी साधु की
काली दाढ़ी लगते हैं,
कभी नागफनों-से लहराते
अँधेरे सर्प,
जो शिखरों की देह पर
धीरे-धीरे सरकते रहते हैं।
आदि कैलाश के निस्तब्ध प्रदेश में
सूरज
पिघले हुए ताँबे की तरह
चट्टानों पर फैलता है,
और चौदास घाटी के बुग्यालों में
हवा
ऊन की सफेद चादरों-सी
धरती को ढँक लेती है।
दारमा घाटी की संकरी पगडंडियों पर
छायाएँ
कभी यक्षिणी के खुले केश लगती हैं,
कभी किसी बूढ़े चरवाहे का
फटा हुआ काला कंबल,
जिसमें सदियों की ठंड
अब भी दुबकी बैठी है।
व्यास घाटी के ऊपर
बादल
लोहे की चलती हुई दीवारों जैसे
धीरे-धीरे उमड़ते हैं,
और उनके पीछे
धूप
चाँदी के टूटे हुए कंगनों-सी
आकाश में झनकती रहती है।
मुनस्यारी की ओर
जब पंचाचुली
संध्या में अंगारों-सी धधकती है,
तब गोरी नदी
पत्थरों के बीच
काँच की चूड़ियों-सी बजती हुई
दूर तक चली जाती है।
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| काली नदी |
बलुवाकोट की ढलानों पर
बरसाती धुंध
ऐसे उतरती है
मानो किसी ने
देवदारों के कंधों पर
राख से बुना शॉल रख दिया हो।
जौलजीबी के संगम में
काली और गोरी
दो स्मृतियों की तरह मिलती हैं,
एक गहरी,
एक उजली,
पर दोनों के जल में
पहाड़ों का अकेलापन
समान रूप से काँपता रहता है।
आदि कैलाश यात्रा मार्ग पर
चलते यात्रियों के चेहरों पर
धूप
कभी दीपावली के दीयों-सी झिलमिलाती है,
कभी तपते हुए पीतल-सी
आँखों में उतर आती है।
और जब सीमांत के गाँवों पर
रात
अपने भीगे काले परदे गिराती है,
तब हिमालय
एक वृद्ध संत की तरह
मौन बैठा रहता है—
जिसकी पलकों पर
अब भी
मेघों की थकी परछाइयाँ
धीरे-धीरे सो रही होती हैं।
मंगलवार, 26 मई 2026
सीमांत के बादल ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
सीमांत के बादल
(कविता)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
धारचूला की भोर में
जब काली नदी
नीले शंख-सी बजती है,
तब सीमांत के बादल
धीरे-धीरे उतरते हैं
ओम पर्वत की श्वेत देह पर
मानो किसी ऋषि ने
आकाश पर मंत्र लिख दिए हों।
दार्चुला की पहाड़ियों में
धूप तिब्बती घंटियों-सी काँपती है,
और चौदास घाटी के बुग्यालों पर
हवा, देवदार की बाँसुरी लेकर
अनकहे गीत गाती चलती है।
आदि कैलाश के सम्मुख
मेघ कभी तपस्वी बन जाते हैं,
कभी यक्षिणी के केशों जैसे
धरमा घाटी में बिखर जाते हैं।
उनकी छाया में
भेड़ों के झुंड
चलते हैं जैसे
धरती पर बहती हुई श्वेत प्रार्थनाएँ।
नारायण आश्रम की सीढ़ियों पर
शाम उतरती है
केसर और धुएँ के रंग में,
जहाँ हिमालय
अपने ही मौन का दीप जलाता है।
गुंजी और नाभी के घरों से
उठता है लकड़ियों का धुआँ,
और आकाश
अपनी भीगी चादर फैलाकर
बच्चों की हँसी समेट लेता है।
बलुवाकोट की ढलानों पर
रात जब
सितारों की राख बिखेरती है,
तब छारछुम के संगम में
नदियाँ
चाँदी के घुँघरू पहन
अँधेरे को नाच सिखाती हैं।
कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग पर
चलते यात्रियों के चरणों में
बर्फ पिघलती है
जैसे समय स्वयं
भक्ति बनकर बह रहा हो।
व्यास घाटी के ऊँचे शिखरों पर
सीमांत के बादल
कभी माँ के आँचल-से लगते हैं,
कभी विरही के नेत्रों की नमी,
कभी रणभूमि से लौटे सैनिक की
मौन थकान जैसे।
ओ बादलो!
तुम्हीं ने देखा है
इन सीमांत गाँवों का अकेलापन,
जहाँ पहाड़
अपने भीतर सदियों का लोकगीत छिपाए
धीरे-धीरे बूढ़े होते हैं।
तुम जब बरसते हो
तो चीड़ों के वन
मृदंग बन जाते हैं,
और समूचा हिमालय
एक विशाल राग की तरह
धरती पर गूँज उठता है।
तब लगता है—
यह केवल प्रकृति नहीं,
यह सीमांत का हृदय है,
जो मेघों की वीणा पर
अनश्वर गीत बनकर
आज भी गा रहा है।
रविवार, 24 मई 2026
हिमालय की चन्द्रवेला ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
हिमालय की चन्द्रवेला
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
नील गगन की मौन झील में पूर्णशशि जब उतर गया,
हिमगिरि के शुभ्र कपोलों पर स्वर्णिम स्वप्न बिखर गया।
देवदारु की दीर्घ भुजाएँ पवन-वीणा बन झूम उठीं,
चीड़ों की चिर श्वासों में वन-गाथाएँ फिर घूम उठीं।
दूर कहीं निर्झर की ध्वनि में वेदों का संगीत जगा,
जुगनू की सूक्ष्म ज्योति तले रजनी का अतीत जगा।
काली शैल की गहरी चुप्पी गोरी धारा गुनगुनाती,
पत्थर-पत्थर से टकराकर जीवन का संदेश सुनाती।
अचानक मेघों के रथ पर विद्युत् का अश्व उतर आया,
तूफानी पवनों ने फिर वन-उपवन में तांडव गाया।
फिर वर्षा की कोमल बूँदें प्यासे पल्लव सहलाने लगीं,
मिट्टी की सोंधी गंधों में भूली स्मृतियाँ गाने लगीं।
प्रथम प्रभाकर की रश्मियों ने जब हिम-जटाएँ चूम लीं,
उषा स्वयं कैलास-द्वार पर स्वर्णिम आरती घूम ली।
गौ-बंशी की दूर तान में जाग उठा पर्वत का मन,
घाटी-घाटी गूँज उठा फिर प्रकृति-प्राण का मधुर वचन।
हिमालय केवल पर्वत नहीं—मौन ऋषियों की वाणी है,
प्रकृति स्वयं परमात्मा की अनदेखी अमृत-कहानी है।
अनुशासन, ईमानदारी और विकास की विराट गाथा : उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी को विनम्र श्रद्धांजलि - ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
अनुशासन, ईमानदारी और विकास की विराट गाथा : उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी को विनम्र श्रद्धांजलि
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
"वर्दी में सीमा की रक्षा की,
और राजनीति में जनविश्वास की मर्यादा निभाई।
सेना के अनुशासन से राज्य संचालन तक,
उन्होंने हर जिम्मेदारी को राष्ट्रधर्म माना।
एक सैनिक अधिकारी जब मुख्यमंत्री बना,
तो सत्ता नहीं — सेवा की कमान संभाली।"
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
असिस्टेंट प्रोफेसर - हिंदी
राजकीय महाविद्यालय बलुवाकोट
धारचूला रोड़, पिथौरागढ़, उत्तराखंड - भारत
भारतीय राजनीति में कुछ व्यक्तित्व केवल पदों से नहीं, बल्कि अपने चरित्र, कर्म और नैतिक दृढ़ता से पहचाने जाते हैं। भुवन चंद्र खंडूरी ऐसे ही विरल राजनेताओं में थे, जिनके भीतर सैनिक का अनुशासन, प्रशासक की स्पष्टता और जननेता की संवेदनशीलता एक साथ विद्यमान थी।
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने जिस सादगी, ईमानदारी और विकास-दृष्टि के साथ कार्य किया, उसने उन्हें जनता के हृदय में स्थायी स्थान दिलाया। उनके निधन ने केवल उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र को एक ऐसे जननायक से वंचित कर दिया है, जिसने सत्ता को सेवा का माध्यम बनाया।
1. सैनिक जीवन से जनसेवा तक : राष्ट्रनिष्ठा की अद्वितीय यात्रा
भुवन चंद्र खंडूरी का जीवन संघर्ष, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति की प्रेरणादायक मिसाल था। भारतीय सेना में मेजर जनरल के रूप में उन्होंने लगभग 36 वर्षों तक देश की सेवा की। सेना के कठोर अनुशासन और राष्ट्रहित की भावना ने उनके व्यक्तित्व को असाधारण दृढ़ता प्रदान की। यही कारण था कि जब वे राजनीति में आए, तब भी उनके निर्णयों में सैनिक जैसी स्पष्टता और कठोर नैतिकता दिखाई देती रही।
राजनीति में उनका प्रवेश केवल सत्ता प्राप्ति का प्रयास नहीं था, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए व्यापक स्तर पर कार्य करने की इच्छा थी। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता के रूप में उन्होंने उत्तराखंड की राजनीतिक चेतना को नई दिशा दी। वे उन विरले नेताओं में थे, जिनके विरोधी भी उनकी ईमानदारी और कार्यशैली का सम्मान करते थे।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने कभी राजनीति को व्यक्तिगत लाभ का माध्यम नहीं बनने दिया। आज जब राजनीति में नैतिक मूल्यों का संकट दिखाई देता है, तब खंडूरी जी का जीवन आदर्श की तरह सामने आता है। वे कठोर निर्णय लेने से नहीं डरते थे। भ्रष्टाचार और प्रशासनिक ढिलाई के प्रति उनका रवैया सदैव स्पष्ट और अडिग रहा।
उनकी कार्यशैली में दिखावटी भाषणों की अपेक्षा जमीन पर काम करने की संस्कृति अधिक दिखाई देती थी। वे कम बोलते थे, लेकिन जो कहते थे उसे पूरा करने का प्रयास अवश्य करते थे। यही कारण है कि उत्तराखंड की जनता उन्हें केवल एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि एक सच्चे संरक्षक के रूप में देखती रही।
उनका व्यक्तित्व भारतीय लोकतंत्र के उस आदर्श स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ सत्ता का अर्थ जनकल्याण होता है। उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही कि उन्होंने राजनीति में रहते हुए भी अपनी सादगी और नैतिक गरिमा को कभी नष्ट नहीं होने दिया।
2. उत्तराखंड के विकासपुरुष : मुख्यमंत्री के रूप में दूरदर्शी नेतृत्व
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में भुवन चंद्र खंडूरी ने राज्य के विकास को नई दिशा देने का कार्य किया। वे दो बार राज्य के मुख्यमंत्री बने और दोनों कार्यकालों में उन्होंने प्रशासनिक पारदर्शिता, सड़क विकास, ग्रामीण संपर्क और सुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
उनकी सबसे बड़ी पहचान सड़क और आधारभूत संरचना के विकास को लेकर बनी। पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में सड़क केवल परिवहन का माध्यम नहीं, बल्कि जीवनरेखा होती है। खंडूरी जी ने इस सत्य को समझते हुए दुर्गम क्षेत्रों तक सड़क पहुँचाने का व्यापक अभियान चलाया। इससे पहाड़ों में रहने वाले लोगों के जीवन में बड़ा परिवर्तन आया।
उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था में अनुशासन स्थापित करने का प्रयास किया। सरकारी कार्यालयों में कार्य संस्कृति सुधारने, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण लगाने और जवाबदेही बढ़ाने के लिए उन्होंने कई कठोर कदम उठाए। उनका मानना था कि यदि प्रशासन ईमानदार और सक्रिय होगा, तभी जनता का विश्वास लोकतंत्र में बना रहेगा।
मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में भी अनेक महत्वपूर्ण पहलें कीं। वे उत्तराखंड को केवल पर्यटन आधारित राज्य नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर और संगठित राज्य के रूप में विकसित करना चाहते थे। उनके नेतृत्व में राज्य में विकास और प्रशासनिक शुचिता की एक नई चर्चा प्रारंभ हुई।
खंडूरी जी का दृष्टिकोण केवल वर्तमान तक सीमित नहीं था। वे भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर योजनाएँ बनाते थे। पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन रोकने, युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने और स्थानीय संसाधनों के उपयोग पर उन्होंने विशेष बल दिया।
उनकी राजनीतिक छवि एक कठोर लेकिन निष्पक्ष प्रशासक की रही। जनता को विश्वास था कि खंडूरी जी व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर निर्णय लेते हैं। यही कारण था कि वे उत्तराखंड की राजनीति में नैतिक नेतृत्व के प्रतीक बन गए।
3. ईमानदार राजनीति का पर्याय : जनविश्वास और नैतिक आदर्श
आज के राजनीतिक परिवेश में भुवन चंद्र खंडूरी का नाम ईमानदारी और स्वच्छ राजनीति के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि राजनीति में रहते हुए भी नैतिकता, सादगी और जनसेवा के मूल्यों को जीवित रखा जा सकता है।
उनका जीवन इस बात का प्रमाण था कि जननेता वही होता है, जो जनता के दुःख और संघर्ष को समझे। वे सत्ता के वैभव से दूर रहकर सामान्य जीवनशैली अपनाने वाले नेता थे। जनता से उनका संवाद सीधा और आत्मीय होता था। यही कारण था कि उत्तराखंड के गाँवों और पर्वतीय क्षेत्रों में भी उनके प्रति गहरा सम्मान दिखाई देता था।
उनकी ईमानदारी केवल व्यक्तिगत व्यवहार तक सीमित नहीं थी, बल्कि शासन व्यवस्था में भी स्पष्ट दिखाई देती थी। उन्होंने प्रशासनिक निर्णयों में पारदर्शिता को प्राथमिकता दी। भ्रष्टाचार के प्रति उनकी कठोरता के कारण कई बार उन्हें राजनीतिक चुनौतियों का सामना भी करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
खंडूरी जी की राजनीति में राष्ट्रहित सर्वोपरि था। सेना की पृष्ठभूमि से आने के कारण उनमें देशभक्ति की भावना अत्यंत प्रबल थी। वे मानते थे कि राजनीति का उद्देश्य समाज को बेहतर दिशा देना है, न कि केवल सत्ता प्राप्त करना।
उनकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण उनका विश्वसनीय व्यक्तित्व था। जनता को विश्वास था कि यह नेता जो कहता है, उसे ईमानदारी से पूरा करने का प्रयास करता है। यही विश्वास किसी भी लोकतांत्रिक नेतृत्व की सबसे बड़ी पूँजी होता है।
आज जब राजनीति में नैतिक मूल्यों पर प्रश्न उठते हैं, तब खंडूरी जी का जीवन नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनकर सामने आता है। उनका व्यक्तित्व हमें यह सिखाता है कि सार्वजनिक जीवन में चरित्र की शक्ति सबसे बड़ी शक्ति होती है।
4. अंतिम विदाई : उत्तराखंड की आत्मा में सदैव जीवित रहेंगे खंडूरी जी
भुवन चंद्र खंडूरी का निधन उत्तराखंड की राजनीति और सार्वजनिक जीवन के लिए अपूरणीय क्षति है। उनके जाने से एक ऐसा युग समाप्त हुआ है, जिसमें राजनीति में मर्यादा, शुचिता और जनसेवा की भावना स्पष्ट दिखाई देती थी। उनके निधन पर पूरे उत्तराखंड में शोक की लहर फैल गई और अनेक नेताओं तथा नागरिकों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सहित अनेक नेताओं ने उन्हें सच्चा जनसेवक, अनुशासित प्रशासक और राष्ट्रहित के प्रति समर्पित व्यक्तित्व बताया। यह श्रद्धांजलि केवल औपचारिक शब्द नहीं, बल्कि उनके जीवन के वास्तविक मूल्यांकन का प्रतीक है।
खंडूरी जी का योगदान केवल राजनीतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। उन्होंने उत्तराखंड की राजनीतिक संस्कृति को नैतिकता और ईमानदारी का आधार प्रदान किया। उन्होंने यह विश्वास जगाया कि यदि नेतृत्व निष्ठावान हो, तो सीमित संसाधनों वाला पर्वतीय राज्य भी विकास की नई ऊँचाइयाँ प्राप्त कर सकता है।
उनकी स्मृति उत्तराखंड की पर्वत श्रृंखलाओं, गाँवों, सड़कों और जनमानस में सदैव जीवित रहेगी। आने वाली पीढ़ियाँ उन्हें केवल एक मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे आदर्श पुरुष के रूप में याद करेंगी, जिसने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कर्तव्य को सर्वोच्च स्थान दिया।
उनकी विनम्रता, सादगी और राष्ट्रनिष्ठा भारतीय लोकतंत्र के लिए प्रेरणा है। वे चले गए, लेकिन उनका जीवन संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है — सत्ता का वास्तविक अर्थ जनसेवा है, और सच्चा नेतृत्व वही है जो स्वयं से पहले समाज और राष्ट्र को रखे।
उत्तराखंड की धरती अपने इस महान सपूत को सदैव श्रद्धा और सम्मान के साथ स्मरण करती रहेगी। विनम्र श्रद्धांजलि। 🙏
कॉकरोच जनता पार्टी और आज का युवा वर्ग - ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
कॉकरोच जनता पार्टी और आज का युवा वर्ग
"बेरोज़गारी, डिजिटल विडम्बना और समकालीन भारतीय समाज का प्रतीकात्मक आख्यान"
समकालीन भारतीय समाज और वैश्विक परिदृश्य में युवा वर्ग आज बेरोज़गारी, मानसिक दबाव, सामाजिक असुरक्षा और डिजिटल विडम्बनाओं के बीच संघर्ष कर रहा है। “कॉकरोच जनता पार्टी” एक प्रतीकात्मक व्यंग्य है, जो उस पीढ़ी की पीड़ा को अभिव्यक्त करता है जिसे व्यवस्था ने जीवित रहने तक सीमित कर दिया है। सोशल मीडिया ने युवाओं को अभिव्यक्ति का मंच तो दिया, किंतु तुलना, अवसाद और आभासी सफलता की संस्कृति भी बढ़ाई। आज का शिक्षित युवा डिग्रियों के बावजूद अवसरों के अभाव से जूझ रहा है और उसकी हताशा मीम्स, व्यंग्य और डिजिटल प्रतिक्रियाओं में दिखाई देती है। यह स्थिति केवल भारत की नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक असंतुलन और पूँजीवादी संरचनाओं का परिणाम है। फिर भी युवा वर्ग पूरी तरह पराजित नहीं हुआ है; उसके भीतर संघर्ष, सृजन और परिवर्तन की अद्भुत क्षमता विद्यमान है। आवश्यकता इस बात की है कि समाज, सरकार और शिक्षा व्यवस्था युवा शक्ति को केवल रोजगार के आँकड़ों से नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा और सृजनात्मक संभावनाओं के आधार पर समझें। यही दृष्टि भविष्य के अधिक संवेदनशील, न्यायपूर्ण और मानवीय समाज की आधारशिला बन सकती है।
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
1. कॉकरोच जनता पार्टी : एक प्रतीक, एक व्यंग्य, एक सामाजिक दस्तावेज़
समकालीन भारतीय समाज में भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं रही, वह प्रतिरोध, व्यंग्य और सामाजिक चेतना का हथियार भी बन चुकी है। “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसा शीर्षक पहली दृष्टि में हास्यास्पद, विचित्र और अतिरंजित प्रतीत हो सकता है, किंतु इसके भीतर आज के समाज का गहरा यथार्थ छिपा हुआ है। यह शीर्षक दरअसल उस मानसिकता, व्यवस्था और सामाजिक संरचना का प्रतीक है जिसमें युवा वर्ग स्वयं को एक ऐसे जीव की तरह अनुभव करने लगा है जो हर परिस्थिति में जीवित तो रहता है, पर सम्मानपूर्वक नहीं जी पाता। कॉकरोच यहाँ केवल एक कीट नहीं, बल्कि उस उपेक्षित, कुचले गए, लगातार संघर्षरत और अस्तित्व बचाने में लगे युवा का प्रतीक बन जाता है जिसे आधुनिक व्यवस्था ने “जीवित रहने” तक सीमित कर दिया है।
आज का युवा डिग्रियों के बोझ से दबा हुआ है। विश्वविद्यालयों की चमकदार इमारतों से निकलने वाला छात्र जब रोजगार के अंधकार में प्रवेश करता है, तब उसे महसूस होता है कि शिक्षा और अवसर के बीच एक विशाल खाई है। यह खाई केवल भारत में नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर दिखाई देती है। अमेरिका, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और भारत—हर जगह युवा वर्ग अस्थिर रोजगार, अनुबंध आधारित नौकरियों और मानसिक तनाव से गुजर रहा है। वैश्विक पूँजीवाद ने श्रम को “डेटा” में बदल दिया है और मनुष्य को “यूज़र” में। इस परिवर्तन ने युवा पीढ़ी को आत्मिक स्तर पर गहरे संकट में डाल दिया है।
“कॉकरोच जनता पार्टी” इसी संकट का प्रतीकात्मक राजनीतिक रूपक है। यह उन युवाओं की काल्पनिक पार्टी है जिनके पास घोषणापत्र तो है, पर अवसर नहीं; जिनके पास प्रतिभा है, पर मंच नहीं; जिनके पास सपने हैं, पर व्यवस्था में उनके लिए स्थान नहीं। वे हर असफलता के बाद पुनः उठ खड़े होते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे कॉकरोच को कितनी भी बार हटाया जाए, वह किसी अंधेरे कोने से फिर बाहर आ जाता है। यह प्रतीक समाज की क्रूरता को भी उद्घाटित करता है—समाज उन युवाओं को “बेकार”, “निकम्मा” या “फालतू” कहकर उपहास करता है जो वास्तव में व्यवस्था की विफलताओं के शिकार हैं।
भारतीय संदर्भ में यह स्थिति और भी जटिल है। यहाँ बेरोज़गारी केवल आर्थिक समस्या नहीं, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संकट भी है। गाँवों से महानगरों की ओर पलायन करने वाला युवा जब प्रतियोगी परीक्षाओं के अंतहीन चक्र में फँस जाता है, तब उसका जीवन एक प्रतीक्षा-कक्ष बन जाता है। रेलवे स्टेशन, कोचिंग संस्थान, किराए के छोटे कमरे और सोशल मीडिया के स्क्रीन—यही उसकी दुनिया बन जाती है। वह धीरे-धीरे स्वयं को समाज से कटता हुआ अनुभव करता है।
इस पूरे परिदृश्य में सोशल मीडिया एक विचित्र भूमिका निभाता है। वह एक ओर अवसरों का मंच है, दूसरी ओर निराशा का बाज़ार। वहाँ सफलता का प्रदर्शन इतना तीव्र है कि असफल युवा स्वयं को और अधिक असफल महसूस करने लगता है। इंस्टाग्राम की चमक, यूट्यूब की कृत्रिम प्रेरणाएँ और वायरल ट्रेंड्स युवा को वास्तविक संघर्ष से दूर ले जाकर एक आभासी प्रतिस्पर्धा में धकेल देते हैं। परिणामस्वरूप, उसकी चेतना विखंडित होने लगती है।
“कॉकरोच जनता पार्टी” इसी विखंडित चेतना का व्यंग्यात्मक घोषणापत्र है। यह शीर्षक बताता है कि आज का युवा व्यवस्था से लड़ते-लड़ते इतना थक चुका है कि उसने अपने दर्द को हास्य में बदलना सीख लिया है। वह मीम बनाता है, व्यंग्य लिखता है, ट्रोल करता है, क्योंकि उसके पास यही अंतिम प्रतिरोध बचा है। हास्य यहाँ मनोरंजन नहीं, बल्कि पीड़ा की अभिव्यक्ति है।
2. बेरोज़गारी का वैश्विक परिदृश्य और भारतीय युवा का मौन संघर्ष
इक्कीसवीं सदी को तकनीकी क्रांति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल विकास की सदी कहा जाता है, किंतु इसी सदी का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि अभूतपूर्व विकास के बावजूद युवाओं के हाथों में स्थायी रोजगार नहीं है। विश्व स्तर पर बेरोज़गारी अब केवल आर्थिक आँकड़ों का विषय नहीं रही, बल्कि सभ्यता के संकट का प्रश्न बन चुकी है। जिस दुनिया ने “ग्लोबल विलेज” का सपना दिखाया था, वही दुनिया आज करोड़ों युवाओं को अवसरहीनता के अंधेरे में धकेल रही है।
भारत इस संकट का सबसे बड़ा उदाहरण है। यहाँ हर वर्ष लाखों युवा विश्वविद्यालयों से निकलते हैं, लेकिन रोजगार के अवसर उसी अनुपात में नहीं बढ़ते। इंजीनियरिंग, प्रबंधन, कला, विज्ञान—हर क्षेत्र में डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, पर नौकरियाँ सिकुड़ती जा रही हैं। युवा वर्ग प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अपने जीवन के सबसे ऊर्जावान वर्ष खर्च कर देता है। कई बार परीक्षाएँ स्थगित हो जाती हैं, परिणामों में देरी होती है या भर्ती प्रक्रिया विवादों में घिर जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में युवा का आत्मविश्वास धीरे-धीरे टूटने लगता है।
वैश्विक स्तर पर भी स्थिति अलग नहीं है। यूरोप में “गिग इकॉनमी” ने स्थायी नौकरियों की जगह अस्थायी कामों को बढ़ावा दिया है। अमेरिका में छात्र ऋण का बोझ युवाओं को मानसिक रूप से तोड़ रहा है। चीन में “लेटिंग इट रॉट” जैसी प्रवृत्तियाँ सामने आई हैं जहाँ युवा व्यवस्था से निराश होकर निष्क्रियता को अपनाने लगे हैं। जापान में अकेलापन और सामाजिक दूरी युवाओं को आत्महत्या तक की ओर धकेल रही है। यह स्पष्ट संकेत है कि आधुनिक आर्थिक मॉडल मानव की गरिमा की रक्षा करने में असफल हो रहा है।
भारतीय युवा का संघर्ष विशेष रूप से मार्मिक है क्योंकि यहाँ बेरोज़गारी सामाजिक प्रतिष्ठा से भी जुड़ी हुई है। भारतीय परिवारों में नौकरी केवल आय का स्रोत नहीं, बल्कि सम्मान, विवाह, पहचान और सामाजिक स्वीकृति का आधार मानी जाती है। बेरोज़गार युवा इसलिए केवल आर्थिक कठिनाई नहीं झेलता, बल्कि निरंतर सामाजिक दबाव भी सहता है। घर के प्रश्न—“कुछ हुआ?”, “कब तक तैयारी करोगे?”, “फलाँ का लड़का तो नौकरी में लग गया”—धीरे-धीरे उसके भीतर अपराधबोध भरने लगते हैं।
ऐसी परिस्थिति में सोशल मीडिया एक नया रंगमंच बनकर उभरा है। बेरोज़गार युवा वहाँ अपनी हताशा को मीम्स, व्यंग्यों और ट्रेंड्स के माध्यम से व्यक्त करता है। “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसी अवधारणाएँ इसी डिजिटल संस्कृति की उपज हैं। यह दरअसल उस पीढ़ी की सामूहिक चीख है जो सीधे विद्रोह नहीं कर सकती, इसलिए व्यंग्य का सहारा लेती है। यह डिजिटल व्यंग्य समाज के भीतर छिपे असंतोष को उजागर करता है।
फिर भी इस पूरी त्रासदी के बीच आशा की कुछ किरणें दिखाई देती हैं। आज का युवा केवल नौकरी खोजने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि नए अवसरों का सृजनकर्ता भी बन रहा है। स्टार्टअप संस्कृति, डिजिटल उद्यमिता, स्वतंत्र लेखन, ऑनलाइन शिक्षा और सामाजिक नवाचारों ने नई संभावनाएँ खोली हैं। हालाँकि ये अवसर अभी सीमित हैं, लेकिन वे यह संकेत देते हैं कि युवा वर्ग केवल व्यवस्था का शिकार नहीं, परिवर्तन का वाहक भी बन सकता है।
3. सोशल मीडिया, मीम संस्कृति और युवा चेतना का विखंडन
आज का समाज सूचना-प्रधान समाज है। मनुष्य अब वास्तविक जीवन से अधिक स्क्रीन पर जीने लगा है। सोशल मीडिया ने संवाद को लोकतांत्रिक तो बनाया, किंतु उसी के साथ उसने मनुष्य की चेतना को खंडित भी कर दिया। विशेषतः युवा वर्ग इस डिजिटल संस्कृति का सबसे बड़ा उपभोक्ता और शिकार दोनों बन गया है।
“कॉकरोच जनता पार्टी” जैसी अवधारणाएँ सोशल मीडिया की ही उपज हैं। यह वह दुनिया है जहाँ गंभीर समस्याएँ भी मीम्स में बदल जाती हैं। बेरोज़गारी, अवसाद, असफलता और सामाजिक उपेक्षा—सब कुछ हास्य के आवरण में प्रस्तुत किया जाता है। यह हास्य दरअसल आधुनिक युवा की आत्मरक्षा की तकनीक है। वह रो नहीं सकता, इसलिए हँसता है; वह विरोध नहीं कर सकता, इसलिए व्यंग्य करता है।
सोशल मीडिया ने तुलना की संस्कृति को अत्यधिक बढ़ावा दिया है। हर व्यक्ति अपनी सफलता का प्रदर्शन कर रहा है। कोई विदेश में है, कोई नई कार खरीद रहा है, कोई स्टार्टअप शुरू कर रहा है, कोई “मोटिवेशनल गुरु” बन चुका है। इस निरंतर प्रदर्शन के बीच बेरोज़गार युवा स्वयं को और अधिक असफल महसूस करता है। उसकी वास्तविकता और डिजिटल दुनिया के बीच एक गहरी खाई बन जाती है।
यही कारण है कि आज मानसिक स्वास्थ्य का संकट तेजी से बढ़ रहा है। अवसाद, चिंता, अकेलापन और आत्महीनता युवा पीढ़ी को भीतर से खोखला कर रहे हैं। सोशल मीडिया का एल्गोरिद्म व्यक्ति को लगातार उसी सामग्री में उलझाए रखता है जो उसकी भावनाओं को भड़काती है। परिणामस्वरूप, युवा धीरे-धीरे वास्तविक सामाजिक संवाद से दूर होता जाता है।
भारतीय समाज में यह संकट इसलिए और गहरा है क्योंकि यहाँ पारंपरिक सामुदायिक संरचनाएँ भी कमजोर होती जा रही हैं। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, गाँवों का सामूहिक जीवन समाप्त हो रहा है और महानगरों में व्यक्ति अकेला पड़ता जा रहा है। ऐसे में सोशल मीडिया उसका नया समाज बन जाता है। लेकिन यह समाज वास्तविक सहानुभूति नहीं देता; वह केवल प्रतिक्रियाएँ देता है—लाइक, शेयर और इमोजी।
“कॉकरोच जनता पार्टी” इस डिजिटल विडम्बना का प्रतीक है। यह बताती है कि आज का युवा स्वयं को व्यवस्था का सदस्य नहीं, बल्कि व्यवस्था के अंधेरे कोनों में जीवित रहने वाला प्राणी मानने लगा है। यह अत्यंत भयावह स्थिति है क्योंकि जब कोई पीढ़ी अपने अस्तित्व को ही व्यंग्य में बदल दे, तब समाज की संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है।
फिर भी इस पूरी परिस्थिति में सोशल मीडिया को केवल नकारात्मक नहीं कहा जा सकता। इसी माध्यम ने अनेक युवाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच भी दिया है। छोटे कस्बों और गाँवों के युवाओं ने डिजिटल माध्यमों से अपनी आवाज़ विश्व स्तर तक पहुँचाई है। शिक्षा, कला, साहित्य, पत्रकारिता और सामाजिक आंदोलनों में सोशल मीडिया ने नई ऊर्जा भी पैदा की है। समस्या माध्यम में नहीं, बल्कि उसके अनियंत्रित प्रभाव और बाज़ारवादी संरचना में है।
4. युवा शक्ति, नई संभावनाएँ और भविष्य की दिशा
हर संकट अपने भीतर परिवर्तन की संभावना भी छिपाए रहता है। आज का युवा वर्ग चाहे जितनी चुनौतियों से घिरा हो, उसके भीतर नई दुनिया बनाने की क्षमता भी मौजूद है। “कॉकरोच जनता पार्टी” का प्रतीक यदि एक ओर व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है, तो दूसरी ओर यह युवा की अद्भुत जीवटता का भी संकेत देता है। कॉकरोच हर परिस्थिति में जीवित रहता है; उसी प्रकार आज का युवा भी लगातार संघर्ष करते हुए नए रास्ते खोज रहा है।
भारतीय युवा के पास दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या शक्ति है। यदि इस ऊर्जा को सही दिशा मिले तो भारत केवल आर्थिक महाशक्ति ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और मानवीय नेतृत्व भी प्रदान कर सकता है। इसके लिए सबसे पहले शिक्षा व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन आवश्यक है। शिक्षा को केवल नौकरी प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि कौशल, सृजनात्मकता और सामाजिक चेतना विकसित करने का साधन बनाना होगा।
रोजगार के पारंपरिक मॉडल अब पर्याप्त नहीं हैं। सरकारों को कृषि, ग्रामीण उद्योग, हरित तकनीक, स्थानीय उद्यमिता और डिजिटल नवाचारों में नए अवसर उत्पन्न करने होंगे। साथ ही मानसिक स्वास्थ्य को भी राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाना होगा। बेरोज़गार युवा को केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि भावनात्मक और सामाजिक सहारा भी चाहिए।
समाज को भी अपनी दृष्टि बदलनी होगी। हर युवा की सफलता को केवल सरकारी नौकरी या ऊँची तनख्वाह से नहीं मापा जा सकता। कला, साहित्य, शोध, सामाजिक कार्य और उद्यमिता भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। जब तक समाज सफलता की संकीर्ण परिभाषा से बाहर नहीं निकलेगा, तब तक युवा पीढ़ी निरंतर दबाव में जीती रहेगी।
वैश्विक स्तर पर भी मानव-केंद्रित विकास मॉडल की आवश्यकता है। केवल आर्थिक वृद्धि से समाज खुशहाल नहीं बन सकता। विकास तभी सार्थक होगा जब वह मनुष्य की गरिमा, मानसिक शांति और सामाजिक समानता की रक्षा करे। आज की युवा पीढ़ी इस परिवर्तन की वाहक बन सकती है क्योंकि वह तकनीक को भी समझती है और सामाजिक विडम्बनाओं को भी महसूस करती है।
अंततः “कॉकरोच जनता पार्टी” कोई वास्तविक राजनीतिक संगठन नहीं, बल्कि हमारे समय का सांस्कृतिक रूपक है। यह उस पीढ़ी की आवाज़ है जो उपहास के भीतर अपना दुःख छिपाए हुए है। यह हमें चेतावनी देती है कि यदि समाज ने युवाओं की पीड़ा को नहीं समझा, तो आने वाला समय और अधिक विखंडित, अकेला और असंतुलित हो सकता है।
फिर भी आशा शेष है—क्योंकि हर अंधेरे समय में युवा ही इतिहास को नई दिशा देते हैं। वही पीढ़ी जो आज मीम्स में अपना दर्द व्यक्त कर रही है, वही कल परिवर्तन का घोषणापत्र भी लिख सकती है। भारत का भविष्य केवल आर्थिक नीतियों में नहीं, बल्कि उसके युवाओं की आँखों में छिपा हुआ है। यदि उन आँखों में विश्वास, सम्मान और अवसर लौटा दिए जाएँ, तो कोई भी “कॉकरोच जनता पार्टी” फिर केवल व्यंग्य बनकर रह जाएगी, यथार्थ नहीं।
मर्यादा के मेघ-मुकुट : श्री राम🙏🕉️ ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
मर्यादा के मेघ-मुकुट : श्री राम🙏🕉️
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
नील नभों में नीरव गाथा, शशि-सा शीतल नाम,
वन-पथ पर दीपक बन चलते, रघुवर श्रीराम।
स्वर्ण सिंहासन धूलि हुआ जब सत्य पुकारा था,
राजमहल से अधिक उन्हें वन का पथ प्यारा था।
मुकुट छोड़ कर मौन तपस्या का वरण किया,
अपने ही अंतर में जीवन का चरण लिया।
“धर्म जहाँ हो, वहीं राम हैं।”
कैकेयी के कठोर वचन भी करुणा बन बहते,
वज्र-वेदना पीकर भी वे कमल-नयन रहते।
अधरों पर संध्या-सी शांति, दृग में गंगाजल,
पीड़ा को भी पूजित करते जैसे कोई पल।
चंदन-वन की छाया जैसे तन पर उतर गई,
अयोध्या रोई, किंतु राम की वाणी निखर गई।
त्यागों की पदचापों से पथ पुष्पित हो जाता,
राम जहाँ भी चल पड़ते, दुःख ज्योतिर्मय गाता।
“धर्म जहाँ हो, वहीं राम हैं।”
सीता संग वन की नीरवता वीणा बन गूँजी,
लक्ष्मण की प्रत्यंचा में भी करुणा ही पूजी।
पर्णकुटी में चंद्र उतरकर कथा सुनाने आता,
सरयू का हर तीर स्वयं प्रभु का गुण गाता।
वन के शुष्क वृक्षों में भी हरियाली झरती,
राम-दृष्टि पड़ते ही मिट्टी तक चंदन करती।
निषादराज के अश्रु हुए जब गंगाजल निर्मल,
तब मानवता ने पहना था प्रेमाभिषिक्त आँचल।
“धर्म जहाँ हो, वहीं राम हैं।”
मर्यादा के मूक हिमालय, धैर्य-दीप अविचल,
जिनके चरणों से पावन हो जाती हर हलचल।
रण में भी जिनकी करुणा ने क्रोधों को हर डाला,
रावण के पतन में भी मानव-धर्म संभाला।
वे केवल धनुर्धर ही थे— ऐसा कहना कम है,
उनके भीतर वेदों जैसा गंभीर परम दम है।
अग्नि-ज्योति-सा तप था जिनमें, जल-सा कोमल मन,
एक हृदय में साथ बसे थे शस्त्र और सावन।
“धर्म जहाँ हो, वहीं राम हैं।”
अश्रु जिन्हें छूकर निर्मल तीर्थों में ढल जाते,
पथराए अंतर भी जिनको सुनकर पिघल जाते।
उनकी वाणी में था जैसे तुलसी का आलोक,
शब्द-शब्द में झरता रहता था करुणा का श्लोक।
राज्य नहीं— जनमन का विश्वास बड़ा होता,
कर्मों से ही मानव का आकाश खड़ा होता।
राम इसी सत्याग्नि के दिव्य शिखर कहलाए,
अपने दुख को त्याग जगत के आँसू अपनाए।
वनवासों के वटवृक्षों पर स्वर्ण प्रभात उगा,
मर्यादा का सूर्य धरा के अंचल में जगा।
युग बीतें, पर राम अभी भी मानव में जीवित,
जब-जब धर्म डगमग होता, उनका स्वर दीक्षित।
“धर्म जहाँ हो, वहीं राम हैं।”
बुधवार, 20 मई 2026
प्रकृति के शाश्वत गायक : छायावाद के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत की 126वीं जयंती पर स्मरण ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
प्रकृति के शाश्वत गायक : छायावाद के सुकुमार कवि कवि श्री सुमित्रानंदन पंत की 126वीं जयंती पर स्मरणोत्सव.. 🙏🙏
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
1. प्रकृति के दिव्य आलोक में निर्मित कवि-चेतना : पंत का जीवन और सौंदर्य-दर्शन
सुमित्रानंदन पंत हिंदी साहित्य के उस स्वर्णिम नक्षत्र का नाम है जिसने प्रकृति को केवल दृश्य-विलास नहीं माना, बल्कि उसे चेतना, करुणा, संगीत और आत्मा का विराट विस्तार समझा। उत्तराखंड की पर्वतीय वादियों में स्थित कौसानी की निर्मल गोद में जन्मे पंत के भीतर बचपन से ही हिमालय की श्वेत धवलता, देवदारों की मौन साधना, बादलों की मुक्त उड़ान और झरनों की स्वर-लहरियाँ एक साथ स्पंदित होती रहीं। उनके लिए प्रकृति किसी बाह्य सत्ता का नाम नहीं थी; वह मनुष्य के अंतर्मन की प्रतिछाया थी। इसी कारण उनकी कविता में फूल केवल फूल नहीं रहते, वे कोमल मानवीय संवेदनाओं के प्रतीक बन जाते हैं; चाँद केवल आकाशीय पिंड नहीं, बल्कि विरह, स्मृति और सौंदर्य का दैदीप्यमान बिंब बन जाता है।
पंत की काव्य-यात्रा का आरंभ जिस समय हुआ, उस समय हिंदी कविता द्विवेदी युग की नैतिकतावादी और इतिवृत्तात्मक परंपरा से बाहर निकलकर भाव-संवेदना की नवीन भूमि की तलाश कर रही थी। पंत ने इस संक्रमण को सौंदर्य और संगीत की दिशा प्रदान की। उनकी भाषा में संस्कृतनिष्ठ माधुर्य है, परंतु उसमें कृत्रिमता नहीं; उसमें हिमालयी वायु की स्वच्छता और सरिता की तरलता है। वे प्रकृति को मानवीय रूप देकर उससे संवाद करते हैं। उनके लिए वन, उपवन, पक्षी, संध्या, प्रभात, पल्लव और पवन सभी जीवंत चेतनाएँ हैं। उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ— पल्लव, गुंजन, वीणा, युगांत, ग्राम्या और लोकायतन— प्रकृति से लेकर मानवतावाद और आधुनिक चिंतन तक की विराट यात्रा का प्रतिनिधित्व करती हैं।
पंत की कविताओं में प्रकृति का चित्रण केवल दृश्यात्मक नहीं बल्कि मनोविश्लेषणात्मक है। वे प्रकृति के माध्यम से मनुष्य की भीतरी रिक्तताओं, आकांक्षाओं और आध्यात्मिक खोजों को स्वर देते हैं। उनके यहाँ वर्षा का आगमन केवल मौसम परिवर्तन नहीं, बल्कि अंतःकरण की शुष्कता पर करुणा की वर्षा है। हिमालय उनके लिए शक्ति और तप का प्रतीक है; पुष्प कोमलता और प्रेम का; और आकाश अनंत संभावनाओं का प्रतीक बन जाता है। इस प्रकार पंत की कविता बिंबात्मकता और प्रतीकात्मकता की अत्यंत ऊँची भूमि पर स्थापित दिखाई देती है।
आज जब मनुष्य तकनीक और उपभोगवाद के अंधे विस्तार में प्रकृति से दूर होता जा रहा है, तब पंत की कविता हमें स्मरण कराती है कि प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि अस्तित्व का मूल आधार है। मनुष्य यदि प्रकृति से कट जाएगा, तो वह अपनी आत्मा से भी कट जाएगा। पंत की काव्य-दृष्टि आज पर्यावरणीय संकट के युग में और अधिक प्रासंगिक प्रतीत होती है। वे हमें बताते हैं कि प्रकृति ही विज्ञान है, प्रकृति ही ईश्वर है, और प्रकृति ही जीवन का मौलिक संगीत है।
2. छायावाद का सौंदर्यलोक और कवि सुमित्रानंदन पंत : जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा तथा समकालीन कवियों के मध्य पंत की विशिष्टता-
हिंदी साहित्य का छायावाद केवल एक काव्य-आंदोलन नहीं था; वह भारतीय आत्मा की पुनर्खोज का सांस्कृतिक अभियान था। इस आंदोलन के चार प्रमुख स्तंभ— जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा और सुमित्रानंदन पंत— ने हिंदी कविता को भाव, कल्पना, संगीत और आत्म-अनुभूति की नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। इन चारों कवियों में पंत का स्वर सबसे अधिक सुकुमार, प्रकृतिनिष्ठ और सौंदर्याभिमुख दिखाई देता है।
जयशंकर प्रसाद की कविता में इतिहास और दर्शन का विराट वैभव है; सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के यहाँ विद्रोह, मानवीय करुणा और सामाजिक चेतना का तीखा स्वर है; महादेवी वर्मा की कविता आत्मिक विरह और आध्यात्मिक पीड़ा की संगीतात्मक अभिव्यक्ति है। परंतु पंत का काव्य इन सबके बीच प्रकृति की कोमल छवियों, रंगों और ध्वनियों का अनुपम उत्सव बनकर उभरता है। वे फूलों के कवि हैं, पर्वतों के कवि हैं, प्रकाश और पवन के कवि हैं। उनकी संवेदना में प्रकृति और मनुष्य के बीच कोई दूरी नहीं है।
गढ़वाल और कुमाऊँ के अनेक कवियों ने भी प्रकृति को अपनी कविता का केंद्र बनाया। चंद्रकुंवर बर्त्वाल जैसे कवियों ने हिमालयी जीवन की करुणा, संघर्ष और सौंदर्य को अपनी रचनाओं में अमर किया। बर्त्वाल की कविता में पर्वतीय जीवन की पीड़ा और तप है, जबकि पंत के यहाँ वही पर्वत सौंदर्य और संगीत की दिव्यता में रूपांतरित हो जाते हैं। दोनों कवियों की दृष्टि में प्रकृति केंद्रीय है, किंतु पंत की प्रकृति अधिक स्वप्निल और लाक्षणिक है।
छायावाद के कवियों ने प्रकृति को मनुष्य के भावलोक से जोड़कर देखा। उनके लिए प्रकृति केवल बाह्य दृश्य नहीं, बल्कि अंतःचेतना का विस्तार थी। पंत ने इस दृष्टि को सबसे अधिक सघनता से विकसित किया। उनकी कविता में संध्या की लाली किसी नवयौवना की लज्जा बन जाती है; पवन किसी प्रेमिल स्पर्श में परिवर्तित हो जाता है; और पत्तों की सरसराहट मानो आत्मा का संगीत बन जाती है। यही कारण है कि उन्हें “प्रकृति का सुकुमार कवि” कहा गया।
आज जब आधुनिक कविता का बड़ा हिस्सा शहरी विसंगतियों और विखंडित यथार्थ में उलझा हुआ दिखाई देता है, तब पंत और उनके समकालीन कवियों की प्रकृति-दृष्टि हमें मानवीय संवेदनाओं की ओर लौटने का मार्ग दिखाती है। उनका साहित्य यह सिखाता है कि कविता केवल शब्दों की रचना नहीं, बल्कि जीवन और प्रकृति के बीच एक गहन आध्यात्मिक संवाद है।
3. पाश्चात्य कवि विलियम वर्ड्सवर्थ और सुमित्रानंदन पंत : प्रकृति-दर्शन की तुलनात्मक संवेदना-
अंग्रेजी साहित्य में कवि विलियम वर्ड्सवर्थ को जिस प्रकार “Nature Poet” कहा जाता है, उसी प्रकार हिंदी साहित्य में सुमित्रानंदन पंत प्रकृति के सर्वाधिक सुकुमार और संवेदनशील कवि माने जाते हैं। दोनों कवियों की काव्य-दृष्टि में प्रकृति केवल सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि नैतिक, आध्यात्मिक और मानवीय चेतना का आधार है। दोनों ने अपने-अपने युग में मनुष्य को प्रकृति की ओर लौटने का संदेश दिया।
पाश्चात्य कवि विलियम वर्ड्सवर्थ औद्योगिक क्रांति के युग में लिख रहे थे, जब मशीनों और नगरीय जीवन ने मनुष्य को प्रकृति से दूर करना आरंभ कर दिया था। उन्होंने प्रकृति को मानव आत्मा की शिक्षिका माना। उनकी कविता में झीलें, पर्वत, वन और ग्रामीण जीवन मनुष्य को सरलता, करुणा और शांति का पाठ पढ़ाते हैं। दूसरी ओर सुमित्रानंदन पंत भी आधुनिक सभ्यता की कृत्रिमता के बीच प्रकृति की ओर लौटने का आह्वान करते हैं। किंतु पंत की प्रकृति भारतीय सांस्कृतिक चेतना से अनुप्राणित है। उसमें वेदों का आध्यात्मिक आलोक, उपनिषदों की विराटता और हिमालय की दिव्यता समाहित है।
वर्ड्सवर्थ की कविता में प्रकृति एक नैतिक गुरु है, जबकि पंत की कविता में प्रकृति सौंदर्य और आत्मानुभूति की संगीतात्मक चेतना है। वर्ड्सवर्थ प्रकृति के माध्यम से स्मृति और अनुभूति की गहराइयों में उतरते हैं; पंत प्रकृति के माध्यम से सौंदर्य और प्रेम के अलौकिक संसार का निर्माण करते हैं। दोनों कवियों के यहाँ बालमन की निष्कलुषता और प्रकृति के प्रति गहरी आस्था दिखाई देती है।
तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो पंत की भाषा अधिक लाक्षणिक, प्रतीकात्मक और संगीतात्मक है। उनकी कविता रंगों और ध्वनियों की चित्रशाला जैसी प्रतीत होती है। वहीं वर्ड्सवर्थ की भाषा अपेक्षाकृत सरल और दार्शनिक है। किंतु दोनों की संवेदना का मूल एक ही है— मनुष्य और प्रकृति का अभिन्न संबंध।
आज वैश्विक तापवृद्धि, पर्यावरण प्रदूषण और प्राकृतिक संतुलन के संकट के समय में वर्ड्सवर्थ और पंत दोनों की कविताएँ नई प्रासंगिकता प्राप्त करती हैं। वे हमें यह चेतावनी देते हैं कि यदि मनुष्य प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु मानता रहेगा, तो अंततः वह स्वयं अपने अस्तित्व को संकट में डाल देगा। उनकी कविता प्रकृति के प्रति प्रेम, संवेदना और संरक्षण का सांस्कृतिक घोषणापत्र बन जाती है।
4. आज के समय में कवि सुमित्रानंदन पंत की प्रासंगिकता : प्रकृति, मनुष्य और अस्तित्व का पुनर्संबंध-
इक्कीसवीं सदी का मनुष्य अभूतपूर्व वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद भीतर से अत्यंत अकेला, तनावग्रस्त और प्रकृति-विहीन होता जा रहा है। महानगरों की कृत्रिम रोशनियों ने तारों भरे आकाश को ढँक दिया है; कंक्रीट के जंगलों ने वृक्षों की हरियाली को निगल लिया है; और उपभोगवादी संस्कृति ने मनुष्य को संवेदना से दूर कर दिया है। ऐसे समय में सुमित्रानंदन पंत की कविता एक सांस्कृतिक प्रतिरोध की तरह सामने आती है। वे हमें स्मरण कराते हैं कि मनुष्य का वास्तविक विकास प्रकृति से जुड़कर ही संभव है।
पंत की कविता में प्रकृति कोई पलायन नहीं, बल्कि जीवन की मौलिक सच्चाई है। वे फूलों, पत्तों, पर्वतों और नदियों के माध्यम से मनुष्य को उसकी आत्मा से जोड़ते हैं। उनकी दृष्टि में प्रकृति और मनुष्य परस्पर पूरक हैं। प्रकृति के बिना मनुष्य अधूरा है और मनुष्य के बिना प्रकृति का सौंदर्य भी निरर्थक हो जाता है। यही कारण है कि उनकी कविता में प्रकृति और मानव भावनाएँ एक-दूसरे में घुल-मिल जाती हैं।
आज जब पर्यावरणीय संकट विश्व की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन चुका है, तब पंत की कविताएँ केवल साहित्यिक धरोहर नहीं रह जातीं, बल्कि पर्यावरणीय चेतना का सांस्कृतिक दस्तावेज बन जाती हैं। उनकी कविता हमें वृक्षों से प्रेम करना सिखाती है, नदियों की रक्षा करना सिखाती है और पृथ्वी को केवल संसाधन नहीं बल्कि माता के रूप में देखने की दृष्टि प्रदान करती है।
समकालीन समय में जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल संसार और आभासी संबंध मनुष्य के जीवन पर हावी हो रहे हैं, तब पंत की कविता हमें वास्तविक जीवन की ओर लौटाती है। वह हमें हवा की सुगंध महसूस करना सिखाती है, चिड़ियों के स्वर सुनना सिखाती है और हिमालय की मौन साधना को समझना सिखाती है। उनकी कविता बताती है कि प्रकृति ही मनुष्य की सबसे बड़ी शिक्षक, सबसे बड़ी शक्ति और सबसे बड़ी शरणस्थली है।
सुमित्रानंदन पंत की 126वीं जयंती केवल एक कवि का स्मरण नहीं, बल्कि प्रकृति, संवेदना और मनुष्यता की उस विराट परंपरा का उत्सव है जिसने हिंदी साहित्य को सौंदर्य, संगीत और आत्मा का अद्वितीय आलोक प्रदान किया। पंत आज भी जीवित हैं— हिमालय की हवाओं में, फूलों की गंध में, वर्षा की बूँदों में और हर उस हृदय में जो प्रकृति को प्रेम की तरह महसूस करता है।
मंगलवार, 14 अप्रैल 2026
डॉ. भीमराव अंबेडकर: भारतीय समाज का समकालीन पुनर्पाठ और चेतना का पुनर्सृजन - डॉ. चंद्रकांत तिवारी
डॉ. भीमराव अंबेडकर: भारतीय समाज का समकालीन पुनर्पाठ और चेतना का पुनर्सृजन
"चेतना की वह आग, जो अन्याय को राख कर देती है।”
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
1. चेतना का उद्भव: मनुष्य से मानवता तक का बौद्धिक पुनर्पाठ -
भारतीय समाज के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में यदि हम गहराई से उतरते हैं, तो स्पष्ट होता है कि यहाँ की संरचना केवल सांस्कृतिक विविधता का परिणाम नहीं, बल्कि जटिल सामाजिक पदानुक्रमों का भी द्योतक रही है। ऐसे परिदृश्य में डॉ. भीमराव अंबेडकर का उदय केवल एक व्यक्ति का उदय नहीं, बल्कि एक नई चेतना का प्रादुर्भाव है, जो मनुष्य को उसकी वास्तविक पहचान—‘मानव’—तक पुनः स्थापित करता है। अंबेडकर का चिंतन हमें यह सिखाता है कि व्यक्ति की असली पहचान उसकी जाति, वर्ग या जन्म से नहीं, बल्कि उसकी मानवीय गरिमा और बौद्धिक स्वतंत्रता से निर्धारित होती है।
कबीरदास ने अपने समय में जिस प्रकार जाति-पांति की संकीर्णताओं को चुनौती दी थी, अंबेडकर ने उसी चेतना को आधुनिक सामाजिक और राजनीतिक संदर्भों में पुनर्परिभाषित किया। जहाँ कबीर का स्वर आध्यात्मिक विद्रोह का था, वहीं अंबेडकर का स्वर सामाजिक संरचनाओं के यथार्थवादी विश्लेषण का है। महात्मा गांधी ने आत्मशुद्धि और नैतिकता के माध्यम से समाज को बदलने की बात कही, लेकिन अंबेडकर ने यह स्पष्ट किया कि केवल नैतिक सुधार पर्याप्त नहीं है, बल्कि सामाजिक संस्थाओं में संरचनात्मक परिवर्तन भी आवश्यक है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो अंबेडकर का जीवन आत्मसम्मान की पुनःप्राप्ति का एक अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने अपने साथ हुए भेदभाव को आत्महीनता में बदलने के बजाय उसे आत्मबल और आत्मचेतना का स्रोत बनाया। यह वही मनोबल है, जो नेल्सन मंडेला के संघर्ष में दिखाई देता है, जहाँ अन्याय के विरुद्ध संघर्ष केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक दृढ़ता का भी परिणाम होता है। इस प्रकार अंबेडकर का व्यक्तित्व एक ऐसे बौद्धिक पुनर्पाठ का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें व्यक्ति स्वयं को पुनः परिभाषित करता है और समाज को नई दिशा देता है।
2. शिक्षा का विमर्श: ज्ञान, मुक्ति और आत्मनिर्भरता का सामाजिक आयाम -
डॉ. अंबेडकर के विचारों में शिक्षा केवल एक साधन नहीं, बल्कि एक क्रांतिकारी प्रक्रिया है, जो व्यक्ति को उसकी सीमाओं से मुक्त कर उसे आत्मनिर्भर बनाती है। उनका प्रसिद्ध सूत्र—“शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो”—दरअसल एक समग्र सामाजिक परिवर्तन की रणनीति है, जिसमें शिक्षा को केंद्र में रखा गया है। अंबेडकर का मानना था कि जब तक व्यक्ति शिक्षित नहीं होगा, तब तक वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं हो सकता और न ही वह सामाजिक अन्याय का प्रभावी प्रतिरोध कर सकता है।
पंडित मदन मोहन मालवीय ने शिक्षा को राष्ट्रनिर्माण का आधार माना और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के माध्यम से इस विचार को मूर्त रूप दिया। वहीं डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने शिक्षा को आत्मा के विकास का माध्यम बताया। अंबेडकर इन दोनों दृष्टियों को एक व्यापक सामाजिक संदर्भ में जोड़ते हैं, जहाँ शिक्षा केवल बौद्धिक विकास का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक समानता की कुंजी बन जाती है।
अटल बिहारी वाजपेयी के विचारों में शिक्षा राष्ट्र की आत्मा को अभिव्यक्त करने का माध्यम है, लेकिन अंबेडकर इस आत्मा को सामाजिक न्याय के साथ जोड़ते हैं। मदर टेरेसा ने सेवा और करुणा के माध्यम से मानवता की सेवा की, लेकिन अंबेडकर ने यह प्रश्न उठाया कि क्या समाज ऐसा नहीं होना चाहिए, जहाँ करुणा की आवश्यकता ही समाप्त हो जाए क्योंकि सभी को समान अवसर और सम्मान प्राप्त हो।
समकालीन भारत में, जहाँ शिक्षा का क्षेत्र तेजी से बाजारीकरण की ओर बढ़ रहा है, अंबेडकर का यह विचार अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति को स्वतंत्र, विवेकशील और सामाजिक रूप से उत्तरदायी नागरिक बनाना है। इस दृष्टि से अंबेडकर का शैक्षिक चिंतन आज भी भारतीय समाज के लिए मार्गदर्शक है।
3. सामाजिक न्याय का पुनर्पाठ: समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का व्यावहारिक स्वरूप -
डॉ. अंबेडकर का सामाजिक दर्शन तीन मूलभूत सिद्धांतों—समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व—पर आधारित है। ये सिद्धांत केवल सैद्धांतिक आदर्श नहीं हैं, बल्कि एक ऐसे समाज की आधारशिला हैं, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर और सम्मान प्राप्त हो। अंबेडकर ने इन मूल्यों को भारतीय समाज की जटिल संरचना के अनुरूप ढालते हुए एक व्यावहारिक रूप प्रदान किया।
जवाहरलाल नेहरू ने आधुनिक भारत के निर्माण में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और लोकतांत्रिक संस्थाओं को महत्व दिया, लेकिन अंबेडकर ने यह सुनिश्चित किया कि इन संस्थाओं का संचालन सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित हो। महाराज शिवाजी ने राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया, जबकि अंबेडकर ने सामाजिक स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी, जो किसी भी समाज के वास्तविक विकास के लिए आवश्यक है।
इस संदर्भ में अंबेडकर का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्होंने एक ऐसी व्यवस्था की परिकल्पना की, जिसमें कानून के समक्ष सभी समान हों और किसी भी प्रकार का भेदभाव स्वीकार्य न हो। उनके द्वारा प्रतिपादित प्रमुख बिंदुओं में समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध संरक्षण, धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार, न्यायिक संरक्षण, सामाजिक न्याय की स्थापना, आरक्षण की व्यवस्था, लोकतांत्रिक शासन, संघीय ढांचा और नागरिक कर्तव्यों की अवधारणा शामिल हैं।
कबीर की समता, गांधी की अहिंसा और नेहरू की आधुनिकता—इन सभी विचारधाराओं का समन्वय अंबेडकर के चिंतन में दिखाई देता है, लेकिन उनका दृष्टिकोण इनसे आगे जाकर एक संस्थागत ढांचा तैयार करता है, जो सामाजिक न्याय को केवल आदर्श नहीं, बल्कि व्यवहारिक वास्तविकता बनाता है।
4. संघर्ष का सौंदर्यशास्त्र: पीड़ा से प्रतिरोध और सृजन तक की यात्रा -
डॉ. अंबेडकर का जीवन इस बात का सशक्त उदाहरण है कि संघर्ष केवल विरोध का माध्यम नहीं, बल्कि सृजन का आधार भी हो सकता है। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों को एक व्यापक सामाजिक आंदोलन में परिवर्तित किया, जो आज भी भारतीय समाज को दिशा दे रहा है।
अंबेडकर का संघर्ष केवल बाहरी नहीं था, बल्कि वह एक गहन बौद्धिक और वैचारिक संघर्ष भी था, जिसमें उन्होंने स्थापित मान्यताओं को चुनौती दी और नए विचारों को जन्म दिया।
नेल्सन मंडेला का संघर्ष राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए था, जबकि अंबेडकर का संघर्ष सामाजिक समानता के लिए था। महात्मा गांधी ने अहिंसा और सत्याग्रह के माध्यम से परिवर्तन का मार्ग अपनाया, जबकि अंबेडकर ने तर्क, ज्ञान और संगठन को अपने संघर्ष का आधार बनाया। यह दोनों दृष्टिकोण भारतीय समाज के लिए पूरक हैं, जो हमें यह सिखाते हैं कि परिवर्तन के लिए विभिन्न मार्ग हो सकते हैं, लेकिन लक्ष्य एक ही होता है—मानव गरिमा की स्थापना।
अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीति में संवाद और सहमति का स्वर प्रमुख है, जबकि अंबेडकर की विचारधारा में स्पष्टता और दृढ़ता का विशेष स्थान है। यह स्पष्टता ही उनके संघर्ष को प्रभावशाली बनाती है, क्योंकि उन्होंने कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
अंबेडकर का संघर्ष हमें यह सिखाता है कि किसी भी समाज में वास्तविक परिवर्तन केवल विरोध से नहीं, बल्कि वैकल्पिक व्यवस्था के निर्माण से आता है। उन्होंने अपने लेखन, भाषण और संगठनात्मक प्रयासों के माध्यम से एक ऐसी बौद्धिक क्रांति की नींव रखी, जो आज भी प्रासंगिक है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेगी।
5. समकालीन भारत में अंबेडकर का पुनर्पाठ: विचार से व्यवहार तक की यात्रा -
आज का भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ एक ओर तकनीकी और आर्थिक विकास के नए आयाम स्थापित हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सामाजिक असमानताएं और चुनौतियां भी बनी हुई हैं। ऐसे समय में डॉ. अंबेडकर के विचारों का पुनर्पाठ अत्यंत आवश्यक हो जाता है, क्योंकि वे हमें यह सिखाते हैं कि विकास केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी होना चाहिए।
अंबेडकर का दृष्टिकोण हमें यह समझाता है कि किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है, जब उसके सभी नागरिकों को समान अवसर और सम्मान प्राप्त हो। जवाहरलाल नेहरू ने आधुनिक भारत की नींव रखी, महात्मा गांधी ने उसे नैतिक आधार प्रदान किया, और अंबेडकर ने यह सुनिश्चित किया कि यह नींव सामाजिक न्याय पर आधारित हो।
आज शिक्षा, रोजगार और सामाजिक संबंधों में जो असमानताएं दिखाई देती हैं, उनका समाधान अंबेडकर की विचारधारा में निहित है। उनका जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि व्यक्ति अपने परिस्थितियों का दास नहीं, बल्कि उनका निर्माता हो सकता है।
समकालीन भारतीय समाज में अंबेडकर का पुनर्पाठ केवल एक अकादमिक अभ्यास नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक आवश्यकता है, जो हमें यह दिशा देता है कि हम किस प्रकार एक समतामूलक, न्यायपूर्ण और मानवीय समाज का निर्माण कर सकते हैं, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को उसकी गरिमा और अधिकारों के साथ जीने का अवसर प्राप्त हो और यही विचार अंततः भारतीय समाज को उसकी वास्तविक पूर्णता की ओर अग्रसर करता है।









