गुरुवार, 16 जुलाई 2026

हरेला : प्रकृति पर्व, संस्कृति और नवजीवन का महापर्व 🌿 ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

हरेला : प्रकृति पर्व, संस्कृति और नवजीवन का महापर्व 🌿

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

हरेला केवल उत्तराखंड का एक लोकपर्व नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के बीच अटूट संबंध का जीवंत उत्सव है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि हमारा जीवन वृक्षों, जल, जंगल, भूमि और जैव-विविधता से जुड़ा हुआ है। सावन के आगमन पर मनाया जाने वाला हरेला हरियाली, समृद्धि, नई आशाओं और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है। इस दिन घरों में हरेला बोया जाता है, उसकी पूजा की जाती है और परिवार के बड़े-बुज़ुर्ग उसे सिर पर रखकर आशीर्वाद देते हैं। यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भारतीय जीवन-दृष्टि का प्रतीक है।


उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में हरेला का विशेष महत्व है। पर्वतीय जीवन सदियों से जल, जंगल और जमीन पर आधारित रहा है, इसलिए हरेला यहाँ की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग बन गया है। यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति का संरक्षण केवल सरकारों का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक कर्तव्य है। आज जब जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, जलस्रोतों का सूखना और पर्यावरणीय संकट पूरी दुनिया के सामने चुनौती बनकर खड़े हैं, तब हरेला का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।


हरेला हमें यह भी प्रेरणा देता है कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। यदि हम प्रत्येक वर्ष एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल करने का संकल्प लें, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित, स्वच्छ और हरित भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। यही कारण है कि आज हरेला केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के जनआंदोलन का स्वरूप ग्रहण कर रहा है।


आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें कि "एक व्यक्ति – एक पौधा, एक परिवार – एक हरित अभियान" को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँगे। यही हरेला का वास्तविक संदेश है और यही प्रकृति के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि भी।


हरेला पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ!

"जी रये, जागि रये, धरती जस आगव,

आकाश जस चाकव होये, दूब जस फलिए-फूलिए, 

सदा स्वस्थ, सुखी और समृद्ध रहिए।" 🌿🌱

अंतस् के रथ (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

अंतस् के रथ (कविता)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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रथ केवल पुरी की सड़कों पर नहीं चलता, वह मनुष्य की स्मृति, करुणा और साझा चेतना के भीतर भी अपनी यात्रा करता है। उसके पहियों के साथ समय, परंपरा और विश्वास एक नए अर्थ में गतिमान हो उठते हैं। असंख्य हाथ जब एक ही रस्सी को थामते हैं, तब भिन्नताओं का शोर मौन होकर एक सामूहिक स्पंदन में बदल जाता है। इस यात्रा का सबसे बड़ा चमत्कार यही है कि ईश्वर ऊँचाइयों से उतरकर धूल का स्पर्श स्वीकार करते हैं और मनुष्य को उसके भीतर छिपी करुणा, सह-अस्तित्व और विनम्रता का स्मरण कराते हैं। अंततः रथ बाहर से अधिक भीतर चलता है—जहाँ हर यात्रा मनुष्य को स्वयं से आगे, और थोड़ा अधिक मनुष्य होने की दिशा में ले जाती है।






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आज फिर

समुद्र ने

अपने नमक को थोड़ी देर के लिए

प्रार्थना में बदल दिया है।


पुरी की हवा में

लकड़ी की गंध नहीं,

शताब्दियों की साँसें तैर रही हैं।


तीन रथ हैं—

पर चल रहा है

एक ही समय।


पहियों के भीतर

वृत्त नहीं घूमते,

बीते हुए युग

अपनी धुरी पहचानते हैं।


भीड़

कभी भीड़ नहीं होती—

वह असंख्य नामों से निकलकर

एक ही स्पंदन में बदल जाने की

दुर्लभ घटना होती है।


किसी हथेली में

धान की महक है,

किसी में लोहे का ताप,

किसी में बच्चों की उँगलियों की नमी,

किसी में अधूरी प्रार्थनाओं का कंपन।


रस्सी

सिर्फ़ रेशों से नहीं बनी—

उसमें वे सारे अदृश्य धागे हैं

जो मनुष्य को

उसके अकेलेपन से बाहर खींचते हैं।


किसी ने

ईश्वर को ऊँचाइयों पर खोजा,

किसी ने शास्त्रों में,

किसी ने समाधियों में—



और वे

हर वर्ष

धूल की ओर उतर आते हैं।


धूल—

जो पाँवों से कुचली जाती है,

उसी के माथे पर

आज आकाश का स्पर्श है।


शंख की ध्वनि

समुद्र तक जाती होगी,

पर उसकी प्रतिध्वनि

शायद मनुष्य के भीतर

और अधिक देर तक रहती है।


रथ आगे बढ़ता है।


पीछे

कोई पदचिह्न नहीं छोड़ता—



केवल

इतना भर होता है कि

लौटते हुए लोग

पहले जैसे नहीं रहते।


शायद यात्राएँ

दूरी से नहीं,

भीतर बदलते भूगोल से मापी जाती हैं।


हर वर्ष 








लकड़ी नई होती है,

रस्सियाँ भी—


पर उन्हें खींचने वाली प्रतीक्षा

कभी पुरानी नहीं पड़ती।


किसी सभ्यता को

यदि एक दृश्य में पढ़ना हो,

तो शायद

यह वही क्षण है—


जब असंख्य हाथ

अपनी-अपनी दिशाओं से निकलकर

एक ही गति का उच्चारण करते हैं।


और तब लगता है—


रथ

सड़क पर कम,

मनुष्य की स्मृति में अधिक चलता है।


उसके पहिए

धरती पर जितनी रेखाएँ नहीं बनाते,

उससे कहीं अधिक

भीतर के समय पर अंकित कर जाते हैं।


शाम ढले

जब जयघोष धीरे-धीरे

हवा में घुल जाएगा,


जब समुद्र

अपनी लहरों को फिर

सामान्य लय में लौटा देगा,



तब भी

एक सूक्ष्म-सी गति

शेष रहेगी—


मानो किसी ने

हमारे भीतर

एक अदृश्य रथ रख दिया हो,


जो हर बार

अहंकार से करुणा की ओर,


विभाजन से सह-अस्तित्व की ओर,


और मनुष्य से

थोड़ा-सा अधिक

मनुष्य होने की ओर

चुपचाप चलता रहता है...


बुधवार, 15 जुलाई 2026

सावन, अंतस् की धारा ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 सावन, अंतस् की धारा 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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सावन केवल आकाश से उतरती हुई वर्षा नहीं, वह मनुष्य के भीतर फिर से हरित हो उठती पृथ्वी है। हर बूँद मिट्टी पर नहीं, स्मृतियों और संवेदनाओं पर गिरती है, हर नदी जल नहीं, पर्वत की आत्मा और वन की साँस बहाती है। शिव की आराधना मंदिरों से पहले प्रकृति के मौन में घटित होती है, जहाँ वृक्ष, पर्वत, मेघ और मिट्टी एक ही प्रार्थना बन जाते हैं। 

जो भीतर से सूख गया है, सावन उसी में करुणा का अंकुर फोड़ता है, और अंततः स्मरण कराता है—मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसकी धड़कन का एक क्षणिक स्पंदन मात्र है।


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सावन
केवल बादलों का आना नहीं है।
यह पृथ्वी का
अपने ही भीतर लौट आने का समय है।

जब पहली बूँद
सूखी मिट्टी के माथे को छूती है,
तब केवल वर्षा नहीं होती—
स्मृतियों की एक पुरानी नदी
फिर से बहना शुरू करती है।

पेड़
इस मौसम में हरे नहीं होते,
वे अपनी चुप्पियों में
नई भाषा उगाते हैं।
पत्तियाँ
हवा के लिए नहीं हिलतीं,
वे आकाश से मिले पत्र
धीरे-धीरे पढ़ती रहती हैं।

पहाड़
बारिश में भीगते नहीं,
वे अपने भीतर जमा
शताब्दियों की धूल धोते हैं।
झरने
चट्टानों से नहीं फूटते,
वे उन मौन प्रार्थनाओं से जन्म लेते हैं
जिन्हें किसी ने कभी शब्द नहीं दिए।

धुंध
दृश्य को छिपाती नहीं,
वह बताती है—
हर स्पष्ट दिखाई देने वाली चीज़
पूरी तरह समझी नहीं जा सकती।

मेघ
आकाश पर लिखी हुई
जल की चलती हुई लिपि हैं।
विद्युत्
उस लिपि का विराम-चिह्न,
और गर्जन—
एक ऐसा वाक्य,
जिसे सुनकर बीज
मिट्टी के अँधेरे में
अपनी आँखें खोल देते हैं।

किसान
खेत में अन्न नहीं बोता,
वह अपने विश्वास का सबसे कठिन बीज
धरती को सौंप देता है।
बारिश
फसल से पहले
उस विश्वास को सींचती है।

नदियाँ
पानी लेकर नहीं बहतीं,
वे पर्वतों की स्मृति,
वनों की गंध,
पत्तों की हरियाली
और अनगिनत अनकहे स्पर्श
समुद्र तक पहुँचाती हैं।
इसीलिए
हर नदी का जल
किसी एक स्रोत का नहीं होता।

मयूर का नृत्य
केवल उल्लास नहीं,
सूखी प्रतीक्षा का
पहला उच्चारण है।
कोयल की भीगी हुई तान में
विरह भी भीगता है,
मिलन भी।

और मनुष्य...

वह जितना बाहर भीगता है,
उससे कहीं अधिक
भीतर भीगने लगता है।
आँखों में उतर आया पानी
कई बार बादलों से नहीं,
वर्षों से रूकी हुई संवेदनाओं से आता है।

शायद इसीलिए
सावन में शिव की आराधना
केवल देवालयों में नहीं होती।
हर वृक्ष
एक मौन शिवलिंग बन जाता है,
हर नदी
अभिषेक का जल,
हर पर्वत
ध्यान में बैठा हुआ ऋषि,
और हर बूँद—
जीवन के पक्ष में
प्रकृति का हस्ताक्षर।

सावन
मनुष्य और प्रकृति के बीच
किसी उत्सव का नहीं,
एक प्राचीन समझौते का महीना है—
जहाँ मिट्टी
मनुष्य को फिर से याद दिलाती है
कि वह पृथ्वी का स्वामी नहीं,
उसकी श्वास का
एक क्षणिक विस्तार मात्र है।

जिस दिन
हम वर्षा को
केवल मौसम नहीं,
अपने भीतर बची हुई करुणा की अंतिम नमी की तरह
पहचान लेंगे—

शायद उसी दिन
धरती को
इतना बरसना नहीं पड़ेगा।


मंगलवार, 14 जुलाई 2026

नियति का विधान ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

नियति का विधान 

 ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


जब चाँद बादलों में खो जाता, तब याद सुखद वह आता है,
उजियारे में उसकी कीमत कौन भला बतलाता है।
जब राहों पर छा जाता तम, हर पथिक भरम-सा जाता है,
तब चाँद-सा एक सहारा ही जीवन-पथ दिखलाता है।

अपने दुःख के एकांतों में मन कितना घबराता है,
सुख का सारा वैभव पल में आँखों से ओझल हो जाता है।
सब अपनी करनी का ही फल, समय हमें समझाता है,
भाग्य में जो लिखा न हो, मिलकर भी न मिल पाता है।

भले दिनों की छाँव कभी पलभर में धूप बन जाती है,
जीवन की हर मुस्कान यहाँ नियति की चाल बताती है।
जो विधि ने लिखा ललाट पर, वही अंततः फल पाता है,
भाग्य में जो लिखा न हो, मिलकर भी नहीं मिल पाता है।



सोमवार, 13 जुलाई 2026

पिता के जाने के बाद ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

पिता के जाने के बाद

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

कुछ रिश्ते समय के साथ समाप्त नहीं होते, वे स्मृतियों की धड़कनों में जीवित रहते हैं। पिता भी ऐसा ही एक विराट सत्य हैं—जो चले जाने के बाद भी जीवन के हर निर्णय, हर संघर्ष और हर सफलता में मौन उपस्थिति बनकर साथ रहते हैं। उनकी अनुपस्थिति केवल एक व्यक्ति का अभाव नहीं, बल्कि उस छाया का खो जाना है जिसके नीचे जीवन निडर होकर खिलता था।

यह कविता उसी रिक्तता, उसी मौन संवाद और उसी अनंत स्नेह को शब्दों में संजोने का एक विनम्र प्रयास है।
यदि इन पंक्तियों में कहीं आपकी अपनी स्मृतियाँ भी आँसू बनकर उतर आएँ, तो समझिएगा—पिता कभी विदा नहीं होते, वे संतान के हृदय में शाश्वत होकर बस जाते हैं।

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पिता के जाने के बाद, आँगन में धूप तो उतरी, पर उजाला कहीं खो गया।

बरगद खड़ा रहा वहीं, मगर उसकी छाँव का अर्थ बदल गया।

दीवारों ने पहली बार सिसकियों की भाषा पढ़नी सीखी।

चौखट हर आहट पर आज भी उनके कदमों का भ्रम पालती है।


घर अब मकान है—जिसकी हर ईंट स्मृतियों का दीप जलाती है।

उनकी चुप्पियाँ आज जीवन का सबसे गहरा उपदेश बन गई हैं।

सिर पर रखा उनका हाथ हटते ही आकाश कुछ और दूर हो गया।

समय ने मुस्कुराना सिखाया, पर भीतर का बालक अनाथ ही रहा।


रोटियों की खुशबू में अब भी उनके श्रम का पसीना महकता है।

रात के सबसे गहरे सन्नाटे में उनका विश्वास तारे बनकर उतरता है।

मैं जब भी टूटता हूँ, उनकी सीख नदी की धारा-सी मुझे थाम लेती है।

आँसू बहते हैं, पर उनकी मर्यादा पलकों पर पहरा देती रहती है।


उन्होंने जीवन नहीं, संघर्ष को मुस्कुराकर जीने की विरासत छोड़ी।

अब हर कठिन मोड़ पर उनकी अनुपस्थिति ही मेरा साहस बनती है।

पिता कभी जाते नहीं—वे रक्त में धड़कन, संस्कार में प्रकाश बनकर बसते हैं।

उनकी स्मृतियाँ पीपल की जड़ों-सी, हर ऋतु में जीवन को थामे रहती हैं।


मैं हर सफलता में उनका मौन आशीष सुन लेता हूँ।

हर असफलता में उनकी आँखों का धैर्य मुझे फिर खड़ा कर देता है।

पिता के जाने के बाद समझ आया—वृक्ष गिरता नहीं, वन का हृदय खाली हो जाता है।

और पुत्र जीवन भर उसी रिक्त छाँव में, उनके नाम का आकाश ओढ़कर चलता रहता है।


शनिवार, 11 जुलाई 2026

दो पदों के बीच ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 दो पदों के बीच (कविता) 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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'दो पदों के बीच' केवल चलने की क्रिया का दृश्य नहीं, बल्कि मनुष्य के समूचे अस्तित्व का एक सूक्ष्म रूपक है। यह कविता बताती है कि जीवन की यात्रा आगे और पीछे के संघर्ष से अधिक, उनके बीच उपस्थित उस अदृश्य संतुलन की यात्रा है जहाँ समय, स्मृति, संभावना और परिवर्तन एक साथ साँस लेते हैं। प्रकृति का प्रत्येक तत्व—लहर, वृक्ष, पर्वत, धूल और क्षितिज—इसी मौन विधान का साक्षी है कि कोई भी स्थिति अंतिम नहीं होती। कविता में पदचिह्न केवल पैरों के नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर निरंतर बदलते बोध, अहं, विनम्रता और समय के संवाद के प्रतीक हैं। कविता किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँचती; वह केवल एक प्रश्न पाठक के भीतर रख देती है—क्या यात्रा वास्तव में मनुष्य करता है, या समय उसके भीतर अपने पदचिह्न बदलता चलता है?

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चलते हुए

दो चरणों के बीच

जितनी-सी जगह बची रहती है,

समय अक्सर

वहीं अपना सबसे गुप्त बीज रख देता है।


एक पद

क्षितिज की ओर झुकता है,

दूसरा

मिट्टी की नब्ज़ पर

अपनी धड़कन टटोलता रहता है।


अचरज यह नहीं

कि एक आगे है

और दूसरा पीछे—


अचरज तो यह है

कि हवा

कभी आगे निकलती हुई पत्ती का अभिनंदन नहीं करती,

और न पीछे छूटती हुई पत्ती का अपमान।


समुद्र ने

किसी लहर को

स्थायी शिखर नहीं दिया;

हर उठान के भीतर

एक लौटना पहले से लिखा था।


देखना—

सबसे अधिक फल से भरी डाल

सबसे पहले झुकती है,

और पर्वत की सबसे ऊँची चोटी भी

अपने भीतर

घाटियों का मौन सँजोए रहती है।


शायद इसी कारण

प्रकृति में कहीं

विजय-घोष सुनाई नहीं देता।


केवल मनुष्य है

जो अपने ही पदचिह्नों पर

सिंहासन तराशता रहता है...


जबकि समय

हर अगला कदम रखते ही

पहले कदम को

धूल की वर्णमाला में लिख देता है।


और तब...


रास्ते पर बचे रह जाते हैं

केवल बदलते हुए निशान।


बहुत देर तक सोचता रहता हूँ—

चल कौन 

रहा था?

वे दो चरण...

या उनके बीच

धीरे-धीरे सरकती हुई पृथ्वी?


गुरुवार, 9 जुलाई 2026

शिक्षा, परीक्षा और निवेश ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

शिक्षा, परीक्षा और निवेश

जब भविष्य की फसल बोने वाले खेतों में प्रश्नपत्रों की दलाली उगने लगे

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


शिक्षा

भारत में शिक्षा केवल विद्यालय जाने या डिग्री प्राप्त करने की प्रक्रिया नहीं है। यह करोड़ों परिवारों के सपनों, संघर्षों और उम्मीदों का सबसे बड़ा आधार है। एक किसान अपने खेत की पैदावार बेचकर बच्चे की फीस भरता है, एक मजदूर अतिरिक्त काम करके किताबें खरीदता है और एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार अपनी इच्छाओं का त्याग करके बच्चों को पढ़ाता है।

आज शिक्षा को सामाजिक उन्नति का सबसे विश्वसनीय माध्यम माना जाता है। गरीब परिवारों के लिए शिक्षा ही वह रास्ता है जिससे वे आने वाली पीढ़ी को गरीबी और अभाव से बाहर निकालने का सपना देखते हैं।

लेकिन वर्तमान समय में शिक्षा का स्वरूप बदल चुका है। अब शिक्षा का केंद्र विद्यालय और विश्वविद्यालय कम तथा प्रतियोगी परीक्षाएँ अधिक हो गई हैं। यूपीएससी, जेईई, नीट, एसएससी, आरआरबी और अन्य परीक्षाएँ युवाओं के जीवन का मुख्य लक्ष्य बन चुकी हैं।

एक विद्यार्थी अपनी युवावस्था के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष तैयारी में लगा देता है। उसकी सुबह पाठ्यक्रम से शुरू होती है और रात मॉक टेस्ट पर समाप्त होती है। वह केवल पढ़ाई नहीं करता, बल्कि अपने भविष्य के लिए निरंतर निवेश करता है।

आज शिक्षा के चारों ओर एक विशाल आर्थिक तंत्र खड़ा हो चुका है। कोचिंग संस्थान, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, टेस्ट सीरीज़, पुस्तक उद्योग, छात्रावास और परिवहन सेवाएँ इस व्यवस्था का हिस्सा हैं। शिक्षा अब एक सामाजिक आवश्यकता के साथ-साथ एक बड़ा आर्थिक क्षेत्र भी बन चुकी है।

विडम्बना यह है कि शिक्षा में निवेश लगातार बढ़ रहा है, लेकिन उसके परिणाम तक पहुँचने वाली परीक्षा प्रणाली पर विश्वास लगातार कमजोर होता दिखाई दे रहा है।


परीक्षा

यदि शिक्षा एक यात्रा है तो परीक्षा उसका निर्णायक पड़ाव है। यही वह बिंदु है जहाँ वर्षों की मेहनत, त्याग और उम्मीदें परिणाम में बदलती हैं।

भारत में हर वर्ष करोड़ों विद्यार्थी विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होते हैं। इनमें से अधिकांश विद्यार्थी ऐसे परिवारों से आते हैं जिनके लिए सरकारी नौकरी केवल रोजगार नहीं बल्कि सम्मान, स्थिरता और सुरक्षा का प्रतीक होती है।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में परीक्षा प्रणाली बार-बार सवालों के घेरे में रही है। पेपर लीक, परीक्षा रद्द होना, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और तकनीकी अव्यवस्थाएँ अब सामान्य समाचार बनती जा रही हैं।

पेपर लीक वास्तव में प्रश्नपत्र की चोरी नहीं है; यह विश्वास की चोरी है। यह उन लाखों युवाओं की मेहनत पर चोट है जिन्होंने वर्षों तक ईमानदारी से तैयारी की होती है।

जब कोई विद्यार्थी परीक्षा कक्ष में बैठता है तो वह केवल प्रश्नों के उत्तर नहीं लिख रहा होता, बल्कि अपने भविष्य का प्रारूप लिख रहा होता है। लेकिन जब परीक्षा के बाद यह पता चलता है कि प्रश्नपत्र पहले ही कुछ लोगों तक पहुँच चुका था, तब उसकी पूरी मेहनत संदेह के घेरे में आ जाती है।

सबसे अधिक पीड़ा उस गरीब विद्यार्थी को होती है जिसके लिए एक परीक्षा ही अवसर का दूसरा नाम होती है। वह आवेदन शुल्क भरने के लिए पैसे जोड़ता है, परीक्षा केंद्र तक पहुँचने के लिए लंबी यात्रा करता है और वर्षों तक तैयारी करता है।

एक पेपर लीक केवल परीक्षा को प्रभावित नहीं करता; वह उसके समय, धन और आत्मविश्वास को भी प्रभावित करता है। कई बार परीक्षा रद्द होने का अर्थ होता है कि विद्यार्थी को फिर से तैयारी करनी होगी, फिर से खर्च करना होगा और फिर से प्रतीक्षा करनी होगी।

यह स्थिति तब और अधिक गंभीर हो जाती है जब भर्ती प्रक्रियाएँ वर्षों तक लंबित रहती हैं। विद्यार्थी की आयु बढ़ती जाती है, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ बढ़ती जाती हैं और भविष्य की अनिश्चितता भी बढ़ती जाती है।

मानसिक स्वास्थ्य का संकट भी इसी व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। लगातार तैयारी, बेरोजगारी का दबाव, असफलता का भय और परीक्षा विवाद युवाओं को गहरे तनाव की ओर धकेलते हैं।

देश में अनेक विद्यार्थियों ने परीक्षा संबंधी तनाव और निराशा के कारण आत्महत्या जैसा दुखद कदम उठाया है। यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि व्यवस्था के लिए चेतावनी है।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न जवाबदेही का है। यदि पेपर लीक होता है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है? यदि परीक्षा रद्द होती है तो उसकी कीमत केवल विद्यार्थी ही क्यों चुकाए? यदि लाखों युवाओं का भविष्य प्रभावित होता है तो जिम्मेदार लोगों पर कठोर कार्रवाई क्यों न हो?

लोकतंत्र में अधिकार और जवाबदेही साथ-साथ चलते हैं। परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं को भी उसी सिद्धांत पर परखा जाना चाहिए।


निवेश

निवेश केवल धन लगाने का नाम नहीं है। शिक्षा और परीक्षा के संदर्भ में निवेश का अर्थ समय, श्रम, सपनों और विश्वास का निवेश भी है।

एक विद्यार्थी अपनी युवावस्था का सबसे मूल्यवान समय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगाता है। वह अपने जीवन के कई वर्ष इस आशा में समर्पित कर देता है कि एक दिन उसकी मेहनत उसे अवसर दिलाएगी।

अभिभावक अपनी आय का बड़ा हिस्सा बच्चों की शिक्षा पर खर्च करते हैं। कई परिवार बचत समाप्त कर देते हैं, कई ऋण लेते हैं और कई अपनी आवश्यकताओं में कटौती करके बच्चों की तैयारी जारी रखते हैं।

यूपीएससी, जेईई, नीट, एसएससी और आरआरबी जैसी परीक्षाओं के इर्द-गिर्द एक विशाल आर्थिक ढाँचा विकसित हो चुका है। आवेदन शुल्क, कोचिंग फीस, अध्ययन सामग्री, ऑनलाइन पाठ्यक्रम, छात्रावास, परिवहन और अन्य सेवाओं पर हर वर्ष हजारों करोड़ रुपये खर्च होते हैं।

इन गतिविधियों से सरकार को कर और जीएसटी के रूप में राजस्व भी प्राप्त होता है। अर्थात शिक्षा और परीक्षा केवल सामाजिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आर्थिक गतिविधि का भी बड़ा क्षेत्र हैं।

लेकिन किसी भी निवेश की सबसे बड़ी शर्त सुरक्षा होती है। यदि निवेश सुरक्षित नहीं होगा तो विश्वास भी नहीं टिकेगा।

जब लाखों विद्यार्थी अपनी मेहनत निवेश कर रहे हों, तब परीक्षा प्रणाली का निष्पक्ष और सुरक्षित होना अनिवार्य हो जाता है। यदि बार-बार पेपर लीक होते रहें, परीक्षाएँ रद्द होती रहें और भर्तियाँ वर्षों तक लंबित रहें, तो यह निवेश असुरक्षित दिखाई देने लगता है।

आज का युवा नौकरी से पहले निष्पक्ष अवसर चाहता है। वह यह विश्वास चाहता है कि उसकी सफलता बिकाऊ नहीं है और उसका भविष्य किसी गिरोह, दलाल या प्रशासनिक लापरवाही के हाथों बंधक नहीं है।

आवश्यकता केवल नई परीक्षाएँ आयोजित करने की नहीं है। आवश्यकता ऐसी व्यवस्था बनाने की है जहाँ प्रत्येक परीक्षा के साथ स्पष्ट जवाबदेही जुड़ी हो, प्रत्येक त्रुटि पर उत्तरदायित्व तय हो और प्रत्येक विद्यार्थी को यह भरोसा मिले कि उसकी मेहनत का सम्मान होगा।

क्योंकि राष्ट्र केवल आर्थिक पूँजी से नहीं बनते, बल्कि विश्वास की पूँजी से बनते हैं। और आज भारत का युवा उसी विश्वास को अपने प्रवेश पत्र के साथ परीक्षा केंद्र तक लेकर जा रहा है।

प्रश्न यह है कि क्या हमारी व्यवस्था उस विश्वास की रक्षा कर पा रही है?

बुधवार, 8 जुलाई 2026

अर्थों का निर्वासन ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

अर्थों का निर्वासन (कविता)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 



जब प्यासे हों खेत, गगन में सावन के मेले क्या होंगे,
सूखी धरती रोती हो तो बादल के झूले क्या होंगे।
जब टूटी हो आस, सितारों की चादर भी फीकी होगी,
मन के भीतर रात बसी हो, हर सुबह अधूरी होगी।
जब दुख की धूप झुलसाए तन, छाया भी बेगानी हो,
तब सुख के सारे स्वर्णिम किस्से केवल मनमानी हो।
जब अपने ही साथ न दें, संसार सहारा क्या देगा,
टूटी हुई पतवारों को मझधार किनारा क्या देगा।

जब आँखों में जल हो लेकिन कोई पढ़ने वाला न हो,
भीतर पीड़ा का जंगल हो, कोई चलने वाला न हो।
तब शब्दों के सारे मोती बिखरे-बिखरे लगते हैं,
हँसते चेहरे भी अक्सर फिर ठहरे-ठहरे लगते हैं।
जब छोटे-छोटे सुख के पंछी आँगन छोड़ उड़ जाते हैं,
तब उत्सव के दीप महल में जलकर फिर बुझ जाते हैं।
जब मन की वीणा के तारों में करुणा का कंपन न हो 
तब गीतों के विस्तृत सागर में मधुरिम स्पंदन न हो।

जब प्रेम नदी का जल सूखें, संबंधों के घाट मरें,
तब चंदन जैसे कोमल क्षण भी काँटों जैसे घाव करें।
जब वाणी में मधु हो लेकिन हृदय विषैले भाव भरे,
तब अभिनंदन के उपवन में केवल शूल-प्रसाद झरे।
जब जीवन के राजमहल में संवेदन का वास न हो,
धन-दौलत के ऊँचे शिखरों पर भी कोई प्रकाश न हो।
जब श्रम के हाथों को सम्मानित करने वाला जन न मिले,
तब सत्य अकेला रोता जाए, उसको कोई मन न मिले।

जब आशा की अंतिम लौ भी आँधी से घबराने लगे,
विश्वासों का नन्हा पौधा सूखेपन से मुरझाने लगे।
तब वैभव, यश, अधिकार, विजय — सब माटी हो जाते हैं,
बिन अपनत्व के सारे अर्थ अनाथी हो जाते हैं।
इसलिए बचाकर रखना मन में प्रेम दीप का उजियारा,
यही समय की धूल जीतता, यही जीवन का एक तारा।
वरना सोने के पर्वत भी रेत समान बिखर जाएँगे,
और अर्थ के सारे दर्पण खाली गूँज बन जाएँगे।


रविवार, 5 जुलाई 2026

नवगीत - पलायन ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

नवगीत - पलायन

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 



सूना आँगन, बंद किवाड़ें,

चीड़ अकेला जागे।

चूल्हे की ठंडी राखों में

दिन के टूटे धागे।


गौरैया हर भोर पुरानी

देहरी पर आ जाती,

खाली घर की चुप दीवारें

बुलबुल बात बनाती।


पगडंडी की धूल पूछती—

"पाँव कहाँ खो आए?"

नदी किनारे बैठे पत्थर

किसको आज बुलाएँ?


खेत अभी भी बीज सँजोए,

बादल राह न भूले,

गाँव किसी नक़्शे का टुकड़ा

नहीं, साँस के झूले।


घर केवल छत का नाम नहीं,

स्मृतियों का वन है;

जो जड़ों से रिश्ता तोड़े,

वह भीतर से निर्धन है।

फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

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ज़िंदगी ने मुझे हर मोड़ पे इतना पढ़ाया,

अब किसी हादसे से इम्तिहान नहीं होता।


जो पेड़ धूप में बरसों खड़ा रहा तनहा,

उसी की छाँव में हर कारवाँ ठहरता है।


समंदरों से बड़ा हौसला तो आँखों का है,

डूबती हैं मगर ख़्वाब बहने नहीं देतीं।


मैंने देखा है चराग़ों को आँधियों के क़रीब,

रौशनी ख़ौफ़ से समझौता नहीं करती।


हवा के साथ सभी लोग उड़ नहीं सकते,

परों से पहले इरादों का आसमाँ होता है।


जो अपने दर्द को तहज़ीब में बदलते हैं,

उन्हीं के लफ़्ज़ ज़माने का दिल बदलते हैं।


मकानों से कभी आबादियाँ नहीं बनतीं,

घर वहीं है जहाँ रिश्ते साँस लेते हों।


अना की धूप में रिश्ते पिघल ही जाते हैं,

मोहब्बतों को हमेशा दरख़्त होना है।


वक़्त सबसे बड़ा उस्ताद है जहाँ भर का,

बिना किताब के जीना सिखा दिया उसने।


मैंने मिट्टी से यही एक सबक़ सीखा है,

जो झुक गया वही फ़सल बनकर उगता है।


सफ़र में सिर्फ़ मुसाफ़िर नहीं बदलते हैं,

कई दफ़ा तो मुक़द्दर भी रास्ते बदलते हैं।


जिसे यक़ीन है अपने हुनर की ख़ुश्बू पर,

वो फूल मौसमों का मोहताज कब हुआ है।


बहुत क़रीब से देखा है जीत को मैंने,

हर एक फ़त्ह के पीछे शिकस्त रहती है।


ज़ुबाँ से मीठे बहुत लोग मिल ही जाते हैं,

मगर किरदार की ख़ुश्बू कमाल होती है।


चराग़ बनने की क़ीमत भी कम नहीं होती,

तमाम उम्र ख़ुद अपना वजूद जलता है।


जो आदमी को बड़ा आदमी बनाती है,

वो दौलतें नहीं, तजुर्बों की मुफ़लिसी है।


मैं आज भी उसी मिट्टी का एहतराम करूँ,

जिसने गिराकर मुझे फिर खड़ा किया हर बार।


उड़ान भरने से पहले ये याद रख ऐ दिल,

हवा से पहले परिंदे का हौसला उड़ता है।


किसी की हार पे हँसना बहुत आसान मगर,

गिरे हुए को उठाना कमाल होता है।


ज़िंदगी रोज़ नया फ़लसफ़ा सुनाती है,

जो सुन सके वही सचमुच जवान रहता है।


मैं अपने आप से सदियों से गुफ़्तगू में रहा,

जहाँ भी लोग मिले, बस तआरुफ़ों में रहे।


किसी ने रूह का दरिया कभी नहीं देखा,

सभी ने जिस्म की सतह पे फ़ैसले लिखे।


हम अपने दर्द की नीलामी भी न कर पाए,

वो एक आह थी, जिसे लोग शायरी समझे।


मैं एक ख़ामोश किताबों-सा आदमी ठहरा,

मुझे वही पढ़ सका, जो ख़ुद भी टूटा था।


तमाम उम्र यही सोचकर गुज़र गई,

मैं किसका था, कोई आख़िर मेरा भी था कि नहीं।


वो मेरी हार का क़िस्सा सुनाकर ख़ुश था,

उसे ख़बर न थी, मैं इम्तिहान छोड़ आया।


अजीब लोग हैं, चेहरे बदलते रहते हैं,

मगर ज़मीर बदलने में देर लगती है।


मैंने हर एक रिश्ते को रूह से सींचा था,

वो अपने मतलबों की धूप लेकर आए।


ये और बात कि तन्हा दिखाई देता हूँ,

मेरे भीतर कई मौसम ठहरे बैठे हैं।


जो मेरे सच से कभी आँख मिला न सके,

वही मेरे लिए इल्ज़ाम लिखते रहते हैं।


मैं अपने हिस्से की वीरानियाँ भी जी आया,

अब कोई शहर मुझे बेघर नहीं करता।


बड़ी अजीब है इस दिल की सल्तनत यारो,

यहीं बग़ावत भी होती है, यहीं सज्दा भी।


मैं अपनी ख़ाक से ऊँचा ज़रूर उठ जाऊँगा,

हवा के ज़ोर से पर्वत नहीं झुका करते।


मेरे वजूद का हासिल यही रहा आख़िर,

मैं ख़ुद को ढूँढ़ता रहा, ख़ुद ही नहीं मिला।


जिसे भी चाहा, उसी ने यही सिखाया है,

मोहब्बतें कभी आसान रास्ता नहीं होतीं।


मैं अपने ज़ख़्म छुपाता रहा हँसी बनकर,

लोग वाह-वाह में मेरा इलाज ढूँढ़ते रहे।


सवाल इतना नहीं कौन छोड़कर गया,

कमाल ये है कि मैं फिर भी टूटकर न बिखरा।


मैंने ख़ुद अपने मुक़द्दर पे ख़ाक डाली है,

किसी को दोष दूँ, इतना भी बेअदब नहीं।


हर एक शख़्स यहाँ आईना लिए बैठा है,

मगर किसी को अपना चेहरा नहीं दिखता।


मेरे ख़िलाफ़ हवाओं ने फ़ैसले लिखे,

मैं फिर भी अपने चराग़ों के साथ चलता रहा।

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


हर एक चेहरे पे मत जाना, सभी सच्चे नहीं होते,

जो दरिया शोर करते हैं, वही गहरे नहीं होते।


अदावत पालने वालों से बस इतना ही सीखा है,

दिलों के फ़ासले अक्सर सफ़र से कम नहीं होते।


वक़्त जब आईना लेकर मुक़ाबिल आ खड़ा होता,

कई किरदार फिर अपनी नज़र में भी बड़े नहीं होते।


गुरूर-ए-हुस्न हो या फिर गुरूर-ए-दौलत-ओ-मंसब,

ये ऐसे ख़्वाब हैं जो उम्र भर ठहरे नहीं होते।


जो अपने दर्द को चुपचाप सीने में छुपा लेते,

वही अक्सर ज़माने में कभी चर्चा नहीं होते।


किसी के हक़ में बोलो तो अदब से बोलना साहिब,

बुलंद आवाज़ से रिश्ते कभी ऊँचे नहीं होते।


नसीब अपना बदलता है पसीने की इबादत से,

फ़क़त तक़दीर लिख देने से मंज़र ही नहीं होते।


सलीक़ा सीख लो लोगों के ग़म को बाँटने का भी,

हर इक एहसान के क़िस्से ज़ुबाँ पर ही नहीं होते।


नज़र का फ़र्क़ है साहिब, कोई पत्थर, कोई हीरा,

हर इक इंसान दुनिया में बराबर सा नहीं होता।


ज़ुबाँ मीठी भी रखिए और किरदार भी रौशन हो,

फ़क़त लहजे से कोई आदमी अच्छा नहीं होता।


जो अपनी ग़ल्तियों पर ख़ुद ही पर्दा डाल देते हैं,

उन्हें आईना भी अक्सर गवारा-सा नहीं होता।


चराग़ों की हिफ़ाज़त आँधियाँ हरगिज़ नहीं करतीं,

उजालों का सफ़र आसान दुनिया में नहीं होता।


मिज़ाज-ए-वक़्त पढ़ना भी बड़ी फ़नकारी है यारो,

हर इक मौसम हमेशा एक जैसा नहीं होता।


दुआएँ साथ चलती हैं तो रस्ते ख़ुद सँवरते हैं,

फ़क़त तदबीर से हर मसअला हल नहीं होता।

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी 

 ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 



संभल कर बोलना, लफ़्ज़ों का मोल होता है,

हर इक ज़ख़्म का दुनिया में खुला मरहम नहीं होता।


बहुत ऊँचा उड़ोगे तो हवा पहचान लेगी फिर,

परिंदों का हमेशा आसमाँ अपना नहीं होता।


जो चेहरे मुस्कुराते हैं, वही सबसे थके होते,

हर इक हँसते हुए चेहरे में इक दरिया नहीं होता।


कभी हालात इंसाँ को किताबों से बड़ा करते,

हर इक उस्ताद का हर सबक़ किस्सा नहीं होता।


कई रिश्ते तो बस ख़ामोशियों पर साँस लेते हैं,

हर इक झगड़े का मतलब फ़ैसला नहीं होता।


गिरा देता है अक्सर आदमी को उसका ही गुरूर,

हवा से लड़ने वाला पेड़ फिर ज़िंदा नहीं होता।


किसी की जीत पर इतना कभी मत इतराना तुम,

समय के हाथ में कोई मुकद्दर स्थिर नहीं होता।


जो अपने दर्द पर हर रोज़ हँसना सीख जाते हैं,

उन्हें दुनिया का कोई ग़म बहुत भारी नहीं होता।


भरोसा टूट जाए तो सदा आवाज़ रहती है,

मगर टूटा हुआ रिश्ता कभी पहला नहीं होता।


जहाँ मतलब की ख़ातिर लोग चेहरे बदल लेते,

वहाँ हर मुस्कुराता आदमी अपना नहीं होता।


कभी चुप रह के भी इंसाँ बहुत कुछ बोल देता है,

हर इक एहसास का लफ़्ज़ों में तरजुमा नहीं होता।


सफ़र में धूप जितनी हो, वही मंज़िल सिखाती है,

हमेशा छाँव में रहकर कोई दरख़्त बड़ा नहीं होता।


जो आँसू पी गया हँसकर, वही मज़बूत कहलाया,

हर इक रोने वाला कमज़ोर हो ऐसा नहीं होता।


किसी की हार पर खुशियाँ मनाना छोड़ दो यारों,

गिरा कल जो था, वो हर रोज़ गिरे, ऐसा नहीं होता।


मुसीबत जब भी आती है, पता सबका बता देती,

हर इक अपना मुसीबत में दिखाई नहीं होता।


कभी किरदार की ख़ुशबू भी महका कर तो देखो तुम,

महकने के लिए हर बार इत्र ज़रूरी नहीं होता।

,

जो ख़ुद से जीत जाता है, वही दुनिया भी जीतता है,

हर इक मैदान में तलवार, होने से ही नहीं होता।


समंदर भी कभी-कभी किनारों से सीखता होगा,

हमेशा डूब जाने से ही गहराई का पता नहीं होता।


वक़्त की धूप ने हमको बहुत कुछ सिखला डाला है,

हर इक ठोकर का मतलब, सिर्फ़ गिर जाना नहीं होता।


उसी इंसान की बातें सदा दिल में उतरती हैं,

जिसे ख़ुद पर गुरूर-ए-इल्म का पर्दा नहीं होता।


©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

बुधवार, 1 जुलाई 2026

बुझी हुई राख © डॉ. चंद्रकांत तिवारी

बुझी हुई राख 

© डॉ. चंद्रकांत तिवारी

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"यह कविता मनुष्य के जीवन का एक गहन सत्य उद्घाटित करती है कि कोई भी पराजय अंतिम नहीं होती और कोई भी बुझी हुई राख पूरी तरह निःजीव नहीं होती। हर टूटन, हर पीड़ा, हर असफलता और हर अँधेरा अपने भीतर एक नई शुरुआत की संभावना छिपाए रहता है। प्रकृति के असंख्य प्रतीकों के माध्यम से कविता यह विश्वास जगाती है कि संघर्ष ही जीवन की सबसे बड़ी ऊर्जा है और आशा वह चिंगारी है जो सबसे बुझी हुई आत्मा को भी फिर से प्रज्वलित कर सकती है। इसका मूल संदेश है कि मनुष्य परिस्थितियों से नहीं, बल्कि अपने धैर्य, साहस, आत्मविश्वास और पुनः उठ खड़े होने की क्षमता से महान बनता है; क्योंकि हर राख के भीतर भविष्य की अग्नि अब भी जीवित रहती है।"

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कभी भी


राख को देखकर यह मत मान लेना कि आग मर चुकी है।


आग मरती नहीं, 

बस कुछ समय के लिए अपना लाल चेहरा 

राख के भीतर छिपा लेती है।


किसी बूढ़े बरगद की तरह जो पतझड़ में भी अपनी जड़ों के भीतर बसंत सँजोए रहता है।


याद रखना—


रात कभी सूरज की हत्या नहीं करती, वह केवल उसे अगले सवेरे के लिए विश्राम देती है।


चाँद अँधेरे का साथी नहीं,

उसके विरुद्ध रात का सबसे शांत प्रतिरोध है।


और एक छोटी-सी किरण—


पूरे आकाश को नहीं, 

केवल एक पथिक का चेहरा उजाला देती है,

पर उतना ही काफी होता है दिशा बदलने के लिए।


देखो—


राख के नीचे सोई हुई चिंगारी हवा का इंतज़ार करती है, चमत्कार का नहीं।


सूखे कुएँ में भी पानी की स्मृति मरती नहीं।


बंजर खेत बीज का अपमान नहीं करते, 

वे पहली बारिश की भाषा सुन रहे होते हैं।


टूटी हुई नाव समुद्र से नफ़रत नहीं करती, 

उसे बस एक किनारे की ज़रूरत होती है।


बिखरे हुए घोंसले पक्षियों की उड़ान नहीं छीनते।


पतंग कटने के बाद भी हवा को दोष नहीं देती।


दीवार की दरार में उगी हुई घास धरती का सबसे धीमा विद्रोह है।


और सूखी नदी—


अपने भीतर समुद्र का पता कभी नहीं भूलती।


सुनो—


जिस स्त्री ने अपना सुहाग राख में बदलते देखा,


उसकी आँखों में भी एक दिन सूर्योदय लौट सकता है।


जिस लड़की ने समाज के पत्थरों से बचने के लिए घर छोड़ा,


वह भी एक दिन अपने भीतर घर बना सकती है।


जिस औरत ने अपमान की रोटियाँ खाईं,


वह भी एक दिन अपने आत्मसम्मान का पहला अन्न उगा सकती है।


जिस माँ ने अपने बच्चे की भूख अपने हिस्से की रोटी में छिपा दी,


उसकी हथेली पर समय एक दिन भाग्य लिखता है।


जिस आदमी ने बार-बार हार का स्वाद चखा,


उसी की मुस्कान सबसे सच्ची होती है।


जिस प्रेमी का पहला प्रेम टूट गया,


उसके भीतर प्रेम नहीं मरता—बस वह चेहरे से हटकर चरित्र में उतर जाता है।


जिस कवि की पहली कविता ठुकरा दी गई,


वही एक दिन लोगों की चुप्पियों का शब्दकोश लिखता है।


देखो—


सीपी हर बार मोती नहीं बनाती,

फिर भी समुद्र छोड़ती नहीं।


बादल हर बार बरसते नहीं, 

फिर भी आकाश से रिश्ता नहीं तोड़ते।


नाविक हर लहर पर जीतता नहीं,

फिर भी पतवार फेंकता नहीं।


हवा


हर वृक्ष को एक जैसी धुन नहीं देती।


फिर भी जंगल मौन नहीं होता।


तुम भी—


अपने भीतर जो राख बची है,


उसे हार का प्रमाण मत समझो।


वहीं कहीं एक लाल बिंदु अब भी धड़क रहा है।


वही तुम्हारे भविष्य का पहला सूर्य है।


याद रखना—


आँसू आँख की हार नहीं, हृदय की धुलाई हैं।


घाव शरीर का अंत नहीं, नई त्वचा का प्रारूप हैं।


अकेलापन सज़ा नहीं,

आत्मा का सबसे ईमानदार कमरा है।


मौन शब्दों की मृत्यु नहीं, उनका गर्भकाल है।


और प्रतीक्षा—


वह समय का सबसे सुंदर तप है।


देखो—


अंकुर धरती को धक्का देकर नहीं,

धैर्य देकर ऊपर आता है।


सूर्योदय आकाश पर आक्रमण नहीं करता, 

धीरे-धीरे रात का हाथ छुड़ाता है।


तितली उड़ना सीखने से पहले 

अपने ही बनाए कारागार में लंबा समय बिताती है।


बाँसुरी


खाली होने के बाद ही संगीत बनती है।


शंख


समुद्र छोड़कर ही मंदिर तक पहुँचता है।


और राख—


वह आग की हार नहीं,


उसकी सबसे विश्वसनीय स्मृति है।


इसलिए—


अगर आज तुम्हारी आँखों में धुआँ है,


तो विश्वास रखना—


कहीं तुम्हारे भीतर अभी भी एक चिंगारी साँस ले रही है।


उसे दुनिया की आँधियों से नहीं,


अपने ही संदेहों से बचाना।


क्योंकि


सबसे पहले मनुष्य बाहर नहीं,


अपने भीतर बुझता है।


और


सबसे पहले वहीं फिर से जलता भी है।


याद रखना—


हर समाप्ति अपने भीतर एक आरंभ की गुप्त राख रखती है।


हर पराजय अपने भीतर एक अदृश्य विजय का बीज छिपाती है।


हर टूटन एक नए आकार की प्रस्तावना होती है।


हर अँधेरा प्रकाश का अधूरा वाक्य है।


हर रात उजाले का गर्भ है।


और


हर बुझी हुई राख में—


एक ऐसी चिंगारी अब भी जीवित रहती है,


जो यदि एक बार विश्वास की हवा पा जाए,


तो


केवल एक दीपक नहीं,


पूरे आकाश को फिर से रोशन कर सकती है।