हिमालय पर आदित्य (कहानी)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
आदित्य के दिन की शुरुआत हमेशा उसी प्रश्न से होती—क्या भगवान सच में हमारे साथ हैं? बचपन में यह सवाल रोमांचक था, जैसे कोई पहेली जिसका उत्तर खोजने लायक हो। लेकिन अब, जब वह रोज़ सुबह उठकर शहर की भीड़ में पैरों को रगड़ता, मेट्रो में खड़ा होता, और नौकरी के लिए आवेदन करता, तब यह प्रश्न उसकी ज़िंदगी का सबसे गहरा रियलिटी‑चेक बन चुका था।
उसका कमरा छोटा सा था, लेकिन दीवारों तक किताबों की भरमार थी—दर्शनशास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र, इतिहास और कुछ क्लासिक्स। जब दोस्त या भाई‑बहन किसी फ़िल्म, गेम या क्रिकेट की चर्चा करते, वह इन किताबों में झाँकता रहता। आदित्य केवल पढ़ने वाला नहीं, सोचने वाला युवक था। प्रोफेसर कहते थे, “तुम बहुत सोचते हो।” दोस्त कहते—“तुम सिस्टम को चुनौती देते हो।” और वह सोचता—“मैं केवल जवाब खोज रहा हूँ।”
विश्वविद्यालय की दीवारों के बाहर की दुनिया बिल्कुल अलग थी। यहाँ ज्ञान और सोच को नज़रअंदाज़ किया जाता था। यहाँ मूल्य वह है जो जल्दी फटाफट काम दे और मुनाफ़ा कमाए। यही वजह थी कि उसने सरकारी विभागों, गैर-सरकारी संगठनों, थिंक-टैंक्स और कॉर्पोरेट संस्थाओं में आवेदन किया। इंटरव्यू हुए—लेकिन सफलता नहीं।
पहला इंटरव्यू सरकारी विभाग में था। पैनल में बैठे लोग गंभीर चेहरे लेकर बैठे थे। आदित्य ने बड़े आत्मविश्वास से अपनी बात रखी—समाज की संरचना, युवा बेरोज़गारी, शिक्षा और नीति का अंतर। पैनल में से एक ने पूछा—
“आपके पास कितने साल का फील्ड अनुभव है?”
आदित्य ने कहा—“मैंने शोध और फील्डवर्क किया है।”
पैनल (हँसते हुए)—“हमें ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो सिस्टम में जल्दी फिट हो जाएँ।”
दूसरा इंटरव्यू एक एनजीओ में हुआ। पैनल में बैठे लोगों ने शालीनता से कहा—
“आप बहुत आदर्शवादी हैं।”
आदित्य चुप रहा। भीतर सोचता—क्या विचारशील होना अब अपराध है?
तीसरा इंटरव्यू एक कॉर्पोरेट कंपनी में हुआ। वहाँ पैनल ने लगभग बोझ की तरह कहा—
“आप बहुत सवाल पूछते हैं।”
और फिर एक प्राइवेट कंपनी ने तो सीधे कहा—
“आप जैसे लोग जल्दी थक जाते हैं। हमें ऐसा चाहिए जो फ़ाइलों में ढले रहे। इंसान नहीं, मशीन।”
यह सुनकर आदित्य ने पहली बार गहरी हँसी निकाली—इतनी निर्लज्जता! इतना जिम्मानहीन कटाक्ष! उसने सोचा—इस दुनिया में शायद ज्ञान का मूल्य केवल तभी है जब वह तय पैमाने पर मुनाफ़ा कमाए। और उसने खुद से कहा—“शायद मैं बहुत बुद्धिमान हूँ, इसलिए इनकी समझ से बाहर हूँ।”
लेकिन यही विचित्रता आदित्य के मन में व्यंग्य की जड़ें इतना पका दीं कि वह खुद मुस्कुराने लगा।
एक रोज़ उसने ख़ुद से पूछा—“क्या मुझे वह नौकरी चाहिए जहाँ मैं हर दिन अपनी बुद्धि को ठुकराते हुए काम करूँ?”
दिन-रात इंटरव्यू, नौकरी पोर्टल, रिज़ल्ट का इंतज़ार—यही उसके जीवन की रोज़मर्रा की मनोरंजक कड़वी पुनरावृत्ति बन गया। कभी-कभी वह सोचता—आज कौन सा इंटरव्यू मुझे ठुकराएगा? आज कौन सी लाइन मेरे आत्मविश्वास को चुभेगी? कौन सा अधिकारी मेरी बुद्धि की हँसी उड़ाएगा?
शहर की भीड़, धूप और धूल—कुछ अलग नहीं था। वहाँ हर कोई किसी न किसी “जॉब” की दौड़ में भागता हुआ दिखाई देता—नमन करता काम को, पर शायद समाज की अपेक्षा के बोझ तले दबा हुआ इंसान।
और माँ रोज़ फोन करती—
“भगवान हमारे साथ हैं।”
उसने हमेशा हाँ कह दिया—लेकिन अब भीतर सवाल उठता—
“यदि भगवान हैं, तो मैं इस संघर्ष के बीच क्यों हूँ?”
एक दिन, लगातार तीन असफल इंटरव्यू के बाद, आदित्य ने अचानक कहा—
“अब बस!”
और बिना योजना के, बिना लक्ष्य के वह शहर के पुराने हिस्से में निकल पड़ा। वहाँ संकरी गलियाँ, टूटी-फूटी इमारतें, हल्की धूप, और मन की एक अजीब सी ख़ामोशी थी।
जैसे ही वह चल रहा था, उसकी नज़र एक पुराने मंदिर पर पड़ी—भव्यता नहीं, लेकिन शरीर के पुराने हिस्सों का आकर्षण था। मंदिर की घड़ियाँ इतनी पुरानी थीं कि वे समय को पूछती सी लगतीं—“तुम क्या ढूँढ रहे हो?”
वह मंदिर में गया। बरामदे में बैठा और देखा—लोग आते-जाते थे, कुछ चुपचाप प्रार्थना करते, कुछ निराशा के साथ हाथ जोड़ते, और कुछ उत्सुक चेहरे लिए। वहाँ कुछ युवा भी थे—बेरोज़गार, हाथों में खाली कागज़ों की फ़ाइलें लिए, और आँखों में वही सवाल—“आगे क्या?”
तभी उसकी नजर एक वृद्ध संत पर पड़ी। साधारण वस्त्र, शांत चेहरे की झुर्रियाँ, और आँखों में अनुभव की दीप्ति। आदित्य उनके पास गया। और अचानक अपने मन की पूरी कहानी बोल दी—शिक्षा, बेरोज़गारी, असफल इंटरव्यू, निष्फल प्रयास, समाज, और अंत में एक प्रश्न—“अगर भगवान हमारे साथ हैं, तो अवसर क्यों नहीं मिलता?”
संत ने शांत स्वर में कहा—
“बेटा, ईश्वर हर व्यक्ति को दृष्टि देता है। जिसे कुछ नहीं मिलता, उसे अहंकार दे दिया जाता है। जिसे सब कुछ मिलता है, उसे भी अहंकार दे दिया जाता है। अंतर केवल इतना है कि व्यक्ति उस अहंकार से क्या बनाता है—दीवार या पुल।”
आदित्य ने पूछा—
“लेकिन संत, जब सब प्रयास करने के बाद भी सफलता नहीं मिलती, तो यह अहंकार क्यों?”
संत ने हँसते हुए कहा—
“क्योंकि तुमने देखा नहीं कि वही जो तुम सोचते हो, वही तुम्हें अवसर भी दे सकता है। भगवान ने दृष्टि दी है; अब तुम्हें उसे व्यवहार में बदलना है।”
आदित्य उस रात मंदिर के बरामदे में बैठकर लोगों की उम्मीदें, उनकी असफलताएँ, उनका उत्साह देखता रहा।
यह सब देखकर उसे समझ आया—बेरोज़गारी केवल अवसर की कमी नहीं, बल्कि मानसिकता की चुनौती है।
और यह चुनौती हलकी नहीं थी; इसमें तर्क, आत्मनिरीक्षण और उत्साह दोनों की आवश्यकता थी।
सुबह होते ही आदित्य गाँव की ओर निकल पड़ा। रास्ते में हिमालय की चोटियाँ, हरे-भरे जंगल, गहरी घाटियाँ और नदी का गीत—यह सब उसे एक नया दृष्टिकोण दे रहा था।
उसने महसूस किया—प्रकृति भी तर्कपूर्ण है। नदी अपने मार्ग पर है, पेड़ अपने स्थान पर, पहाड़ अपनी मजबूती में। कुछ भी व्यर्थ नहीं।
फिर क्यों इंसान व्यर्थ संघर्ष में फँसा है? क्यों अपनी योग्यता को केवल प्रमाणपत्र और नौकरी से जोड़ता है?
गाँव पहुँचकर उसने देखा कि पैतृक भूमि लंबे समय से उपेक्षित थी। युवा शहर चले गए थे, बेरोज़गारी फैल गई थी, संसाधन बर्बाद हो रहे थे।
तभी उसके दिमाग़ में एक सटीक विचार आया—
‘धार्मिक पर्यटन आधारित एंटरप्रेन्योरशिप’!
यह कोई परी कथात्मक विचार नहीं था; यह ठोस, व्यावहारिक, और उत्सुकता से भरा हुआ था।
वह योजना बनाने लगा—एक ऐसा स्थान जो न केवल आस्था का केंद्र हो, बल्कि रोज़गार, शिक्षा, पर्यटन, संस्कृति और सृजन का केंद्र भी।
मंदिर को केवल पूजा का केंद्र नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन स्थल बनाया जाए—जहाँ लोग न सिर्फ़ दर्शन करें, बल्कि यहाँ के अनुभव से सीखें, आत्मनिरीक्षण करें और रोजगार के अवसर देखें।
निर्माण शुरू हुआ—पत्थर, लकड़ी, स्थानीय संसाधन। गाँव के युवाओं को काम मिला—कुछ राह बनाने में, कुछ भोजन और ठहरने की व्यवस्था में, कुछ डिजाइन और मार्केटिंग में।
इस प्रक्रिया ने केवल रोजगार नहीं दिया, बल्कि आत्म-सम्मान भी उभारा।
मंदिर का स्वरूप भी साधारण नहीं था—
यहाँ रचनात्मक स्थल, इंटरैक्टिव टूर, विचार मंच, स्थानीय कलाकारों की प्रदर्शनी, हाथ से बने उत्पादों की दुकानें, और विचार विमर्श के कार्यक्रम आयोजित होते।
धीरे-धीरे यह मंदिर एक अनोखा पर्यटन स्थल बन गया।
लोग कहते—“यह जगह अलग है।”
कोई कहता—“यहाँ शांति है।”
कोई कहता—“यहाँ रोजगार और अवसर मिलते हैं।”
आदित्य ने युवाओं को प्रशिक्षण दिया—
कैसे छोटे व्यवसाय शुरू करें,
कैसे संसाधनों का उपयोग करें,
और धर्म, संस्कृति और पर्यटन को जोड़कर स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करें।
उसने देखा कि तर्क और आस्था का संतुलन ही समाज में स्थायी परिवर्तन लाता है।
समय बीतता गया, और आदित्य की कहानी युवाओं में प्रेरणा बन गई।
यह कहानी केवल इसलिए नहीं कि उसने मंदिर बनाया,
बल्कि इसलिए कि उसने विचारों को क्रियाशीलता में बदलकर रोजगार और समाजोपयोगी मॉडल तैयार किया।
शाम को वह अक्सर उसी चोटी पर बैठता—
हिमालय की चोटियाँ सामने,
घाटी नीचे,
और भीतर संतुलित शांति।
अब जब माँ फोन पर कहती—
“भगवान हमारे साथ हैं,”
वह मुस्कुराता और जानता है—
भगवान का साथ प्रतीकात्मक है; लेकिन असली परिणाम तब आता है जब दृष्टि, तर्क और कर्म एक साथ मिलते हैं।
आदित्य का संदेश स्पष्ट था—
बेरोज़गारी अवसर की कमी नहीं, मानसिकता की चुनौती है।
यदि व्यक्ति अपनी दृष्टि, तर्क और क्रिया को जोड़ता है,
तो कोई भी युवा एंटरप्रेन्योर बन सकता है,
रोज़गार पैदा कर सकता है,
और समाज में स्थायी बदलाव ला सकता है।
और यही था वह उत्तर—
कि चींटी की मेहनत और दृष्टि से हिमालय भी बन जाता है।
आदित्य हिमालय पर रोज चमकता है और आदित्य नारायण मंदिर में।
!!समाप्त!!




