सोमवार, 3 अगस्त 2026

तुम्हारे घर के पास (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

तुम्हारे घर के पास (कविता)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 



तुम्हारे घर के पास

एक सड़क है—

जो किसी नक़्शे में

सिर्फ़ सड़क है,

पर मेरी स्मृतियों में

वह आज भी धड़कती हुई नस है।


उस पर चलते हुए

मैंने कई बार

अपने कदमों की आहट से अधिक

अपने मौन को सुना है।


तुम्हारे घर के पास

एक गुलमोहर है।


वह हर साल

लाल हो जाता है,

पर किसी ने कभी नहीं पूछा—

फूल खिलते हैं,

या पेड़

अपना रक्त धीरे-धीरे

धरती को सौंप देता है?


कभी वहीं

हमने भविष्य का एक छोटा-सा घर बनाया था—

ईंटों से नहीं,

उन शब्दों से

जिन्हें बोलते समय

हम दोनों को लगता था

कि भाषा अमर होती है।


फिर समय आया।


उसने कोई शोर नहीं किया।

बस

तुम्हारे नाम के आगे

किसी और का उपनाम जोड़ दिया,

और मेरे भीतर

एक पूरा नगर

बिना भूकम्प के

ढह गया।


अब भी

तुम्हारे घर के पास से गुज़रता हूँ।


वहाँ

न तुम मिलती हो,

न वह लड़का

जो तुम्हें देखकर

अपनी उम्र से बड़ा हो जाता था।


केवल एक कुत्ता

मुझे पहचानकर

क्षणभर ठहर जाता है।


सोचता हूँ—

क्या स्मृतियाँ

मनुष्यों से पहले

जानवरों के पास शरण ले लेती हैं?


तुम्हारे घर की खिड़की

अब भी वहीं है।


पर परदे बदल गए हैं।


अजीब है—

कभी-कभी

जीवन में सबसे पहले

रंग बदलते हैं,

फिर चेहरे,

फिर संबोधन,

और अंत में

हम स्वयं अपने लिए

अजनबी हो जाते हैं।


मोबाइल की स्क्रीन पर

अब प्रेम

हरे बिंदुओं में जलता है,

नीले टिकों में टूटता है,

और आख़िरी बार

'ऑनलाइन' दिखकर

सदैव के लिए

अनुपस्थित हो जाता है।


किसी ने कहा था—

प्रेम मिलन है।


पर मुझे लगता है,

प्रेम शायद वह है

जो बिछड़ जाने के बाद भी

किसी अनजान मोड़ पर

अचानक

तुम्हारे शहर की हवा बनकर

फेफड़ों में उतर आता है।


मैंने कई बार चाहा

कि तुम्हारे घर के पास से

किसी दूसरी सड़क पर मुड़ जाऊँ।


पर कुछ रास्ते

पैर नहीं चुनते,

वे भीतर का कोई अधूरा वाक्य चुनता है।


तुम्हारे घर के पास

अब एक नया कैफ़े खुल गया है।


वहाँ

नए प्रेमी बैठते हैं।


उनकी हँसी में

मैं अपना बीता हुआ कल नहीं खोजता,

केवल यह सोचता हूँ—

क्या हर पीढ़ी

प्रेम को पहली बार जीती है,

या हर बार

उसी प्राचीन घाव पर

एक नया नाम लिख देती है?


मैं लौट आता हूँ।


पर सच कहूँ—

मैं कभी लौट नहीं पाता।


क्योंकि मनुष्य

घर से नहीं,

अपने अनकहे प्रेम से सबसे अधिक निर्वासित होता है।


और तब

रात के सबसे शांत पहर में

एक प्रश्न

दरवाज़े पर दस्तक देता है—


क्या सचमुच

मैं तुम्हारे घर के पास से गुज़रता हूँ...


या आज भी

तुम ही

मेरे भीतर बने उस घर के पास रहती हो,

जिसका पता

समय कभी बदल नहीं पाया?

एक टूटी हुई शाम (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

एक टूटी हुई शाम (कविता)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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"एक टूटी हुई शाम' केवल संध्या का दृश्य नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर धीरे-धीरे फैलती उस अदृश्य दरार का प्रतीक है, जहाँ संबंध, विश्वास, स्मृतियाँ और संवेदनाएँ मौन होकर बिखरने लगती हैं। यह कविता प्रकृति के बिंबों के माध्यम से हमारे समय की आत्मिक विडंबनाओं, अकेलेपन और मानवीय मूल्यों के क्षरण को अभिव्यक्त करती है। कविता किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती; बल्कि एक ऐसा प्रश्न छोड़ जाती है, जिसका उत्तर प्रत्येक पाठक को अपने भीतर खोजना होगा। यही इसकी संवेदना है, यही इसका प्रतीकात्मक सौंदर्य।"
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शाम आज फिर

किसी पुराने आईने की तरह

बिना आवाज़ के चटक गई।


सूरज ने

अपने सुनहरे वस्त्र

क्षितिज की देहरी पर उतार दिए,

और आकाश ने

लालिमा नहीं,

एक मौन शोक पहन लिया।


हवा गुज़री—

पर पेड़ों ने

पत्तों से कोई संवाद नहीं किया।

लगता था

जड़ों तक पहुँच चुकी है

किसी अदृश्य दरार की ख़बर।


नदी बहती रही,

किन्तु उसका जल

जैसे अपने ही प्रतिबिंब से

नज़रें चुरा रहा था।


एक पक्षी लौटा,

पर अपने घोंसले पर नहीं बैठा।

शायद

घोंसले भी कभी-कभी

घर होने से इनकार कर देते हैं।


दीपक जल रहा था,

पर लौ की थरथराहट में

हवा का दोष नहीं था;

कुछ अँधेरे

बाहर से नहीं,

मनुष्य के भीतर से उठते हैं।


मैंने देखा—

शाम केवल आकाश में नहीं टूटती,

वह टूटती है

उन आँखों में

जो अब भी प्रतीक्षा करती हैं।


वह टूटती है

उन रिश्तों में

जहाँ शब्द जीवित हैं,

पर अर्थ मर चुके हैं।


वह टूटती है

उन नगरों में

जहाँ रोशनी बहुत है,

पर किसी चेहरे पर

सवेरा नहीं उतरता।


और तब लगा—

हर टूटी हुई शाम

दरअसल समय की नहीं,

मनुष्य की आत्मा में पड़ी

उस महीन दरार का नाम है

जिसे सभ्यता

विकास कहकर छिपा देती है।


अब प्रश्न शाम का नहीं है...


टूटा कौन है—

क्षितिज,

सूरज,

या वह मनुष्य

जिसने अपने भीतर का उजाला

सबसे पहले खो दिया था?

रविवार, 2 अगस्त 2026

फ़लसफ़ा ऐ ज़िंदगी (एक टुकड़ा लम्हा) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

फ़लसफ़ा ऐ ज़िंदगी 

(एक टुकड़ा लम्हा)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


कोई याद रखे न रखे, तुम याद रखना,

अपना हर कदम इंसानियत के साथ रखना।


उठे हाथ तो किसी मूरत को नहीं,

किसी टूटे हुए मन का आसमान थाम लेना।


बहुत नासमझ मिलेंगे राहों में,

उनकी आवाज़ नहीं, उनकी खामोशी पढ़ना।


अपने हिस्से की लड़ाई लड़ना,

पर किसी और की रोटी पर तलवार मत रखना।


जब भी आईना देखो,

चेहरा नहीं, अपने भीतर का मौसम देखना।


हर चमक सोना नहीं होती,

कुछ उजाले कब्रों से भी उठते हैं।


पेड़ बन सको तो छाँव देना,

दीवार बनो तो किसी का रास्ता मत रोकना।


शहर तुम्हें तालियाँ देगा,

गाँव तुम्हें दुआएँ देगा—फ़ैसला तुम्हारा होगा।


समंदर बनने की ज़िद से पहले,

किसी प्यासे की हथेली भर प्यास बनना।


जो लोग बहुत ऊँचा उड़ते हैं,

अक्सर उन्हें ज़मीन की ख़ुशबू याद रहती नहीं।


हर जीत के बाद थोड़ा हार रखना,

अपने ही अहंकार से खुद को पार रखना


कभी किसी रोते हुए चेहरे के पास बैठना,

सलाह से पहले अपना मौन रखना।


रिश्ते धागों से नहीं टूटते,

अनकहे शब्दों के बोझ से बिखरते हैं।


जिस दिन तुम्हारे पास सब कुछ हो,

उस दिन किसी अभावग्रस्त की आँखों में अपना कल देखना।


किताबों से ज्ञान लेना,

पर जीवन का अर्थ किसी मज़दूर की हथेलियों से पढ़ना।


फूल बनो तो ख़ुशबू बाँटना,

काँटे बनो तो अपने ही अहंकार को चुभना।


समय कभी किसी का नहीं हुआ,

फिर भी लोग घड़ियों पर उम्र टाँगते रहे।


जो टूटकर भी मुस्कुराते हैं,

असल में वही दुनिया को सहारा बांटते हैं।


अगर कभी बहुत अकेले पड़ जाओ,

तो किसी बूढ़े बरगद से बातें कर लेना।


हर सवाल का जवाब मत ढूँढना,

कुछ प्रश्न ही मनुष्य को मनुष्य बनाए रखते हैं।


जब दुनिया तुम्हें सफल कहे,

तो अपने भीतर बैठे बच्चे से पूछ लेना—

क्या वह अब भी बेवजह हँसता है?


और अंत में...

यदि कभी तुम्हारे जाने के बाद

लोग तुम्हारा नाम भूल भी जाएँ,

तो इतना भर होना चाहिए—

किसी अनजान की दुआ में

तुम्हारा किया हुआ एक छोटा-सा अच्छा काम

अब भी साँस ले रहा हो।



शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

ठोकरों का आत्मविश्वास ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

ठोकरों का आत्मविश्वास

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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यह कविता जीवन के उन अदृश्य सत्यों को उद्घाटित करती है, जहाँ संघर्ष, असफलता और ठोकरें बाधाएँ नहीं, बल्कि व्यक्तित्व के निर्माण की आधारशिलाएँ बन जाती हैं। प्रकृति के गहन प्रतीकों के माध्यम से कविता यह संदेश देती है कि कठिनाइयाँ मनुष्य को तोड़ने नहीं, बल्कि उसे भीतर से अधिक दृढ़, परिपक्व और आत्मविश्वासी बनाने आती हैं। अंततः यही अनुभव जीवन-पथ को सफलता से अधिक सार्थक और आत्मविश्वास से अधिक आलोकित बना देते हैं।

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रास्तों ने

कभी किसी पाँव से क्षमा नहीं माँगी।


वे चुपचाप

पत्थरों की वर्णमाला बिछाते रहे,

और मनुष्य

उसे पीड़ा समझकर पढ़ता रहा।


पहाड़ जानते थे—

ऊँचाइयाँ

सीधी चढ़ाइयों से नहीं मिलतीं।


इसलिए उन्होंने

ढलानों के बीच

कुछ नुकीले पत्थर रख छोड़े,

ताकि पाँव से पहले

अहंकार घायल हो।


बीज भी

धरती का अँधेरा ओढ़े बिना

कभी वृक्ष नहीं होता।


और शिलाएँ...

वे मंदिरों में जन्म नहीं लेतीं,

बरसों तक

हथौड़ों की भाषा सहती हैं,

तब कहीं जाकर

मौन का चेहरा पहनती हैं।


किसी नदी से पूछना—

समुद्र का रास्ता

मानचित्र ने नहीं बताया था उसे;

हर चट्टान ने

उसकी धारा का व्याकरण बदला था।


धूप ने

कभी फूलों को नहीं गढ़ा,

वह तो तपती रही;

सुगंध का निर्णय

ऋतुओं ने किया।


कितना विचित्र है—

मनुष्य

हार से बचना चाहता है,

जबकि समय

उसी के भीतर

एक अदृश्य प्रतिमा तराश रहा होता है।


कुछ दरारें

दीवारों में नहीं पड़तीं,

दृष्टि में उतरती हैं।


कुछ ठोकरें

घुटनों पर नहीं लगतीं,

विश्वास की नींद तोड़ती हैं।


और तब...


चलना

सिर्फ़ चलना नहीं रह जाता।


पत्थर

पत्थर नहीं रहते।


रास्ते

रास्ते नहीं रहते।


वे धीरे-धीरे...


आत्मविश्वास का

दूसरा नाम बन जाते हैं।





रविवार, 26 जुलाई 2026

अपने हिस्से की धूप ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

अपने हिस्से की धूप 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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मनुष्य का जीवन केवल समय का नहीं, बल्कि रिश्तों, दायित्वों और अपेक्षाओं का भी एक लंबा सफ़र है। इस यात्रा में वह अपनों के लिए जीते-जीते अक्सर स्वयं से ही दूर हो जाता है। यह कविता उसी मौन पीड़ा और जीवन-सत्य की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति है—जहाँ रिश्तों का सम्मान भी है और अपने अस्तित्व को बचाए रखने की विनम्र पुकार भी। "अपने हिस्से की धूप" हमें स्मरण कराती है कि यदि जीवन में कुछ पल स्वयं के लिए भी बचा लिए जाएँ, तभी रिश्तों की छाँव और जीवन की धूप दोनों का वास्तविक अर्थ समझा जा सकता है।

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अपने हिस्से की धूप 


जीवन सब रिश्तों में बाँटा, मेरे हिस्से कुछ बचा नहीं,

दूर क्षितिज को ताक रहा था, पास पड़ा कुछ दिखा नहीं।

आते-जाते हर रिश्ते में, कोई रिश्ता बचा नहीं,

जीवन भर क्या पाया जग में, मेरे हिस्से कुछ बचा नहीं।


सुबह उगी तो स्वप्न बटोरें, साँझ हुई तो थककर सोए,

दिन की धूप पराई निकली, अपने आँगन दीप न रोए।

नदियों-सा बहते ही गुज़रे, सागर बनना याद रहा नहीं,

पत्तों जैसे झरते मौसम, मन का वन फिर हरा नहीं।


सबके आँसू अपनी आँखों में, अपनी पीड़ा कह पाया नहीं,

हर मुस्कान की कीमत दी, अपना चेहरा पढ़ पाया नहीं।

पर्वत-सा दायित्व उठाया, पंछी-सा उन्मुक्त उड़ा नहीं,

भीड़ बहुत थी जीवन-पथ पर, स्वयं से लेकिन मिला नहीं।


थोड़ी देर स्वयं के संग भी, बैठ सकूँ तो बात बने,

मन के सूने आँगन में फिर, कोई चुप-सी भोर तने।

साँस-साँस जग को सौंप दी, अपने लिए जिया नहीं,

भीतर बैठा जो मैं था, उससे कभी मिला नहीं।


रिश्ते जीवन की छाया हैं, उनसे सुंदर जग में क्या,

पर अपने मन का द्वार खुला हो, इससे बढ़कर सुख भी क्या।

जो हर दिन थोड़ा स्वयं से मिले, वही सचमुच जीता है,

वरना जीवन सबको देकर, मन अपना ही रीता है।

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

यह हिमगिरि का बहता नीर (गीत) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

यह हिमगिरि का बहता नीर (गीत)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी


यह हिमगिरि का बहता नीर,

कितना शीतल, कितना धीर।

शुभ्र शिखर की पावन गोद,

जाग उठी बन जीवन-ओद,

कल-कल, छल-छल मधुर प्रबोध


तन का उज्ज्वल, मन का तीर,

यह हिमगिरि का बहता नीर।


हिम के उर से निकल-निकल,

शैल-शिखर से सँभल-सँभल,

चट्टानों से मिल मचल-मचल,

कंकड़ गाते छम-छम पल-पल,

वन-उपवन हँसते अविरल


धरती का मधुमय गंभीर,

यह हिमगिरि का बहता नीर।


सूखी धरती की प्यास लिए,

हरियाली का विश्वास लिए,

माटी की सौंधी साँस लिए,

जीवन का मधु-उल्लास लिए,

चलता अपना प्रकाश लिए


करुणा की अनुपम जागीर,

यह हिमगिरि का बहता नीर।


भोर सुनहरी दीप जलाए,

साँझ सितारों को पास बुलाए,

चन्दा अपने चरण धुलाए,

सूरज स्वर्णिम हार पहनाए,

नभ धरती का गीत सुनाए


प्रकृति बने संगीत-शरीर,

यह हिमगिरि का बहता नीर।


नहीं किसी से कुछ भी माँगे,

देता जाए हेमल के धागे,

सूखे वन में स्वप्न उगाए,

पत्थर तक में फूल खिलाए,

पीड़ा को भी प्यार सिखाए


त्याग बना जिसकी तक़दीर,

यह हिमगिरि का बहता नीर।


ऋषियों का यह मौन तपोवन,

कृषकों का श्रम, बालक का मन,

माँ की ममता, संतों का धन,

जन-जन का यह जीवन-स्पंदन,

भारत का अमृत-आवर्तन


युग-युग गूँजे इसकी पीर,

यह हिमगिरि का बहता नीर।


जब तक गगन, धरा, वन होंगे,

जब तक ऋतु के मधुवन होंगे,

जब तक मानव-हृदय धरेगा,

प्रेम-दीप अन्तस में जलेगा,

तब तक इसका गीत बहेगा


अमर रहेगा काली-गोरी नदियों का नीर,

हिमगिरि का हेमल-सा बहता नीर।

फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी

(एक टुकड़ा लम्हा)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 



कोई रिश्ता अगर ख़ामोश होकर भी महकता है,

यक़ीन मानों वही रिश्ता सबसे हसीन होता है।


हमने चेहरों से ज़्यादा आँखें पढ़ना सीख लिया,

लफ़्ज़ अक्सर झूठ बोलते हैं, ख़ामोशियाँ नहीं।


बहुत ऊँचा था वो अपने ही तकब्बुर की वजह से,

हवा चली तो सबसे पहले वही दरख़्त टूटा।


घर बड़ा होने से तन्हाई नहीं मर जाती,

एक अपना-सा इंसान हो तो झोपड़ी भी काफ़ी है।


उम्र भर आईने बदलने में लगे रहे लोग,

किसी ने ख़ुद को बदलने की ज़हमत न उठाई।


धूप ने मुझसे कहा—चल, मैं तुझे तपाऊँगी,

छाँव ने हँसकर कहा—पहले सफ़र तो कर।


जो अपने दर्द को दुनिया की दुआ कर दे,

वही इंसान ज़माने से बड़ा हो जाता है।


मिट्टी ने हर बार मुझे झुकना सिखाया,

इसीलिए शायद मैं गिरकर भी बिखरा नहीं।


रात भर चाँद से बातें तो बहुत की हमने,

सुबह मालूम हुआ, जवाब अपने भीतर था।


बहुत संभाल के रखिए जनाब अपने लहजे को,

यही एक चीज़ है जो लौटकर नहीं आती।


हर एक जीत का चेहरा चमकता ज़रूर है,

मगर उसके पीछे कई हारें दफ़्न होती हैं।


दुआ देने वाले हाथ कभी ख़ाली नहीं रहते,

ये कारोबार किसी बाज़ार का मोहताज नहीं।


जिस दिन अपने होने का गुरूर उतर जाएगा,

उसी दिन हर आदमी अपना-सा लगने लगेगा।


कुछ लोग किताबों की तरह उम्र भर खुले रहे,

कुछ लोग एक सफ़्हा भी पढ़ने न दिए गए।


वक़्त ने जब भी मुझे आईना दिखलाया है,

मैंने अपने ही सवालों को खड़ा पाया है।


चराग़ बनने की चाहत हो तो जलना सीखो,

उजाले मुफ़्त में किसी के हिस्से नहीं आते।


रिश्ते आवाज़ से नहीं, एहसास से ज़िंदा रहते हैं,

वरना रोज़ मिलने वाले भी अजनबी निकलते हैं।


अपनी ख़ुशबू को हवाओं का सहारा न बनाओ,

फूल बनना है तो ख़ुद अपनी पहचान बनो।


ज़िंदगी ने यही सिखाया है मुसाफ़िर बनकर,

जो बाँटते चले गए, वही सबसे अमीर निकले।


मरने के बाद तस्वीरें ही नहीं बचतीं साहब,

अगर किरदार अच्छा हो तो लोग दुआओँ में भी रखते हैं।




मंगलवार, 21 जुलाई 2026

मेघमन्थन : श्रावण का आत्मगान ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 

मेघमन्थन : श्रावण का आत्मगान

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


नील नभ के नीरव उर में घन का गम्भीर निमंत्रण है,

धरती के उन्मीलित लोचन में नवजीवन का स्पन्दन है।

हरित वसन में लिपटी प्रकृति का मौन मधुर अभिनन्दन है,

श्रावण केवल ऋतु नहीं—सृष्टि-हृदय का वन्दन है।


शैल-शिखर की शान्त तपस्या आज सुधा से भीग रही,

निर्झर की निस्सीम सरगम अन्तर-वीणा छेड़ रही।

देवदारु के ध्यान-वृक्ष पर धुंध दिगन्तों से उतरी है,

मानो युग की मौन समाधि नव चेतन से जाग रही।


कदम्बों की कोमल शाखों पर बूँदों का श्रृंगार खिला,

वन-पथ के हर तृण ने जैसे स्वर्णिम जीवन-सार मिला।

पवन प्राचीन ऋषि-सा बहकर कानों में कुछ कह जाता,

मौन शिलाओं के अंतर में भी नव आलोक-विहार मिला।


विद्युत् की चंचल रेखा ने तम का आवरण चीर दिया,

क्षण भर में ही असीम गगन का अन्तर्मन गंभीर किया।

मेघों ने जब करुणा बनकर अपनी पलकों को झुका दिया,

सूखी धरती के अधरों पर जीवन का अमृत नीर दिया।


घाटी-घाटी गूँज रहे हैं निर्झर के निर्मल आलाप,

वन-वन में झंकृत हो उठता पत्तों का मृदुल प्रतिताप।

मयूर-पंख पर नाच रही है इन्द्रधनुष की मौन हँसी,

कोयल के भी भीगे स्वर में विरह बना मधुमय जाप।


नदियाँ अपने उद्गम का इतिहास कभी दोहराती नहीं,

त्याग-तरंगों का संगीत लिए क्षण भर भी थक जाती नहीं।

पर्वत के उर का सारा स्नेह समतल तक पहुँचा देतीं,

अपना सब कुछ देकर भी वे प्रतिदान कभी चाहती नहीं।


हल की रेखा धरती के उर पर आशा का अभिलेख बने,

बीजों की निस्तब्ध तपस्या कल का स्वर्णिम लेख बने।

मेघ-कृपा से श्रम का कण-कण अन्नपूर्णा बन मुस्काए,

किसान के श्रम का प्रत्येक श्वास मंगल-अभिषेक बने।


धुंध दुल्हन बन पर्वत के नील कपोलों को चूम रही,

ओस मुकुल की पलकों पर चुप स्वप्निल दीपक झूम रही।

हर पत्ती पर बूँद ठहरकर जैसे मोती बन जाती है,

सृष्टि स्वयं अपने दर्पण में अपना रूप निहार रही।


श्रावण! तुम केवल जलधारा, केवल बादल, केवल मेघ नहीं,

तुम जीवन की मौन प्रार्थना, करुणा का अनुपमेय स्नेह हो।

तुमसे ही सूखे अन्तरवन में फिर हरियाली जन्मे है,

तुमसे ही मानव के उर में फिर विश्वास का सेतु रहे।


जब-जब जीवन धूल भरे पथ पर थककर रुक-सा जाता है,

तब-तब श्रावण बनकर कोई भीगा सपना आता है।

बूँद-बूँद में ब्रह्म का स्पर्श, पात-पात में प्रेम बसा—

प्रकृति नहीं, स्वयं ईश्वर ही हरियाली बन गाता है।


धरती का कण-कण आज अनन्त का अभिनव अर्थ हुआ,

मेघों का प्रत्येक निनाद स्वयं वेदों का स्वर-पार्थ हुआ।

श्रावण आया—और लगा यह सारा जग नवजात हुआ,

जीवन का प्रत्येक श्वास स्वयं परमात्मा का गान हुआ।




शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

हरेला की टोकरी ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

हरेला की टोकरी

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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"हरेला की टोकरी" केवल उत्तराखंड के लोकपर्व का काव्यात्मक चित्रण नहीं, बल्कि मनुष्य, प्रकृति, स्मृति और सांस्कृतिक अस्मिता के बीच टूटते-बनते संबंधों का एक गहन प्रतीक है। यह कविता वर्ष में मनाए जाने वाले तीनों हरेलों—चैत (चैत), श्रावण (सौण) और आश्विन (असौज)—को केवल ऋतु-परिवर्तन के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के तीन आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पड़ावों के रूप में देखती है। चैत (चैत) आशा और सृजन का, श्रावण (सौण) संवेदना और जीवन-स्पंदन का, तथा आश्विन (असौज) स्मृति, आत्ममंथन और जड़ों की ओर लौटने का प्रतीक बनकर उभरता है। कविता यह प्रश्न उठाती है कि यदि पलायन के कारण गाँव, लोकभाषा, लोकपर्व और सामुदायिक जीवन निरंतर रिक्त होते जाएँ, तो केवल पर्वों का जीवित रहना पर्याप्त नहीं होगा। इस प्रकार हरेला की टोकरी अंततः बीजों की नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर बची हुई उस अंतिम हरियाली, अपनी मिट्टी से जुड़े रहने की चेतना और उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा को बचाए रखने की सामूहिक जिम्मेदारी का सशक्त रूपक बन जाती है।

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हरेला की टोकरी में

इस बार

केवल बीज नहीं हैं।


वहाँ रखी है

एक बूढ़ी दादी - नानी की हथेली,

जिसकी रेखाओं में अब भी

चैत उगता है।


वहाँ एक बच्चे की हँसी है,

जो शहर की किसी ऊँची इमारत में

अपनी ही कुमाऊं और गढ़वाली बोली भूलकर

धीरे-धीरे मौन हो रही है।


वहाँ

एक अधूरी पगडंडी है—

जो हर बरस

किसी लौटते हुए कदम की प्रतीक्षा में

थोड़ी और घिस जाती है।


कहा जाता है—

सौण आता है

तो धरती भीगती है।


पर किसने देखा

कि सबसे पहले

भीगती हैं स्मृतियाँ।


पहले भीगता है

एक बंद घर का किवाड़,

फिर तुलसी का सूना चौरा,

फिर वह दीपक

जिसे वर्षों से

किसी ने अपने नाम से नहीं पुकारा

और छत के पाथर।


बारिश

पहाड़ पर कभी पानी बनकर नहीं गिरती,

वह उतरती है

पूर्वजों की धीमी आवाज़ की तरह।


और जंगल...

जंगल पेड़ों का समूह नहीं होता,

वह उन लोगों का सामूहिक मौन होता है

जो अपनी जड़ों को

कभी छोड़कर नहीं गए।


फिर

असौज आता है।


धूप की तहों में

ओस अपना अंतिम हस्ताक्षर रखती है।


हवा

सूखी नहीं होती,

वह उन नामों से भर जाती है

जो अब गाँव की जनगणना में नहीं मिलते।



एक घर

जब बंद होता है,

तो केवल एक दरवाज़ा बंद नहीं होता—


एक लोकगीत

अपना श्रोता खो देता है।


एक त्योहार

अपना घर खो देता है।


एक भाषा

अपने उच्चारण का अंतिम वृक्ष खो देती है।


और पहाड़...


पहाड़

कभी अचानक खाली नहीं होते।


वे पहले

अपनी आवाज़ खोते हैं।


फिर धुआँ।


फिर बच्चों की दौड़-धूप।


फिर बाखलियों की साँझ।


और अंत में

हरेला की टोकरी

हल्की हो जाती है।


इतनी हल्की

कि उसमें रखा हुआ

एक अकेला बीज भी

पूरे हिमालय का आदर्श लगता है।


शायद इसीलिए

हरेला

ऋतु का उत्सव नहीं है।


यह मनुष्य से

उसकी मिट्टी का अंतिम संवाद है।


यह उस प्रश्न का उत्तर भी नहीं,

जो हर वर्ष चैत, सौण और असौज पूछते हैं—


यह स्वयं

वही प्रश्न है।


कि...


यदि बीज बच जाएँ

और खेत न बचें,


यदि पर्व बच जाएँ

और लोग न बचें,


यदि घर बच जाएँ

और लौटने वाले कदम न बचें,


तो बताओ—


हरेला किसके लिए उगेगा?

और काटेगा कौन ?

और गोलज्यू, गंगनाथ, भगवती के थानों पर चढ़ाएगा कौन?


और तब

हरेला की टोकरी में

अचानक दिखाई देती है


एक मुट्ठी मिट्टी—


जो किसी खेत की नहीं,


किसी राज्य की नहीं,


बल्कि

मनुष्य के भीतर

अब भी बची हुई

उस अंतिम हरियाली की है,


जिसे बचाए बिना

कोई भी पहाड़

पहाड़ नहीं रहता।





गुरुवार, 16 जुलाई 2026

हरेला : प्रकृति पर्व, संस्कृति और नवजीवन का महापर्व 🌿 ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

हरेला : प्रकृति पर्व, संस्कृति और नवजीवन का महापर्व 🌿

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

हरेला केवल उत्तराखंड का एक लोकपर्व नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के बीच अटूट संबंध का जीवंत उत्सव है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि हमारा जीवन वृक्षों, जल, जंगल, भूमि और जैव-विविधता से जुड़ा हुआ है। सावन के आगमन पर मनाया जाने वाला हरेला हरियाली, समृद्धि, नई आशाओं और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है। इस दिन घरों में हरेला बोया जाता है, उसकी पूजा की जाती है और परिवार के बड़े-बुज़ुर्ग उसे सिर पर रखकर आशीर्वाद देते हैं। यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भारतीय जीवन-दृष्टि का प्रतीक है।


उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में हरेला का विशेष महत्व है। पर्वतीय जीवन सदियों से जल, जंगल और जमीन पर आधारित रहा है, इसलिए हरेला यहाँ की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग बन गया है। यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति का संरक्षण केवल सरकारों का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक कर्तव्य है। आज जब जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, जलस्रोतों का सूखना और पर्यावरणीय संकट पूरी दुनिया के सामने चुनौती बनकर खड़े हैं, तब हरेला का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।


हरेला हमें यह भी प्रेरणा देता है कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। यदि हम प्रत्येक वर्ष एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल करने का संकल्प लें, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित, स्वच्छ और हरित भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। यही कारण है कि आज हरेला केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के जनआंदोलन का स्वरूप ग्रहण कर रहा है।


आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें कि "एक व्यक्ति – एक पौधा, एक परिवार – एक हरित अभियान" को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँगे। यही हरेला का वास्तविक संदेश है और यही प्रकृति के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि भी।


हरेला पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ!

"जी रये, जागि रये, धरती जस आगव,

आकाश जस चाकव होये, दूब जस फलिए-फूलिए, 

सदा स्वस्थ, सुखी और समृद्ध रहिए।" 🌿🌱

अंतस् के रथ (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

अंतस् के रथ (कविता)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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रथ केवल पुरी की सड़कों पर नहीं चलता, वह मनुष्य की स्मृति, करुणा और साझा चेतना के भीतर भी अपनी यात्रा करता है। उसके पहियों के साथ समय, परंपरा और विश्वास एक नए अर्थ में गतिमान हो उठते हैं। असंख्य हाथ जब एक ही रस्सी को थामते हैं, तब भिन्नताओं का शोर मौन होकर एक सामूहिक स्पंदन में बदल जाता है। इस यात्रा का सबसे बड़ा चमत्कार यही है कि ईश्वर ऊँचाइयों से उतरकर धूल का स्पर्श स्वीकार करते हैं और मनुष्य को उसके भीतर छिपी करुणा, सह-अस्तित्व और विनम्रता का स्मरण कराते हैं। अंततः रथ बाहर से अधिक भीतर चलता है—जहाँ हर यात्रा मनुष्य को स्वयं से आगे, और थोड़ा अधिक मनुष्य होने की दिशा में ले जाती है।






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आज फिर

समुद्र ने

अपने नमक को थोड़ी देर के लिए

प्रार्थना में बदल दिया है।


पुरी की हवा में

लकड़ी की गंध नहीं,

शताब्दियों की साँसें तैर रही हैं।


तीन रथ हैं—

पर चल रहा है

एक ही समय।


पहियों के भीतर

वृत्त नहीं घूमते,

बीते हुए युग

अपनी धुरी पहचानते हैं।


भीड़

कभी भीड़ नहीं होती—

वह असंख्य नामों से निकलकर

एक ही स्पंदन में बदल जाने की

दुर्लभ घटना होती है।


किसी हथेली में

धान की महक है,

किसी में लोहे का ताप,

किसी में बच्चों की उँगलियों की नमी,

किसी में अधूरी प्रार्थनाओं का कंपन।


रस्सी

सिर्फ़ रेशों से नहीं बनी—

उसमें वे सारे अदृश्य धागे हैं

जो मनुष्य को

उसके अकेलेपन से बाहर खींचते हैं।


किसी ने

ईश्वर को ऊँचाइयों पर खोजा,

किसी ने शास्त्रों में,

किसी ने समाधियों में—



और वे

हर वर्ष

धूल की ओर उतर आते हैं।


धूल—

जो पाँवों से कुचली जाती है,

उसी के माथे पर

आज आकाश का स्पर्श है।


शंख की ध्वनि

समुद्र तक जाती होगी,

पर उसकी प्रतिध्वनि

शायद मनुष्य के भीतर

और अधिक देर तक रहती है।


रथ आगे बढ़ता है।


पीछे

कोई पदचिह्न नहीं छोड़ता—



केवल

इतना भर होता है कि

लौटते हुए लोग

पहले जैसे नहीं रहते।


शायद यात्राएँ

दूरी से नहीं,

भीतर बदलते भूगोल से मापी जाती हैं।


हर वर्ष 








लकड़ी नई होती है,

रस्सियाँ भी—


पर उन्हें खींचने वाली प्रतीक्षा

कभी पुरानी नहीं पड़ती।


किसी सभ्यता को

यदि एक दृश्य में पढ़ना हो,

तो शायद

यह वही क्षण है—


जब असंख्य हाथ

अपनी-अपनी दिशाओं से निकलकर

एक ही गति का उच्चारण करते हैं।


और तब लगता है—


रथ

सड़क पर कम,

मनुष्य की स्मृति में अधिक चलता है।


उसके पहिए

धरती पर जितनी रेखाएँ नहीं बनाते,

उससे कहीं अधिक

भीतर के समय पर अंकित कर जाते हैं।


शाम ढले

जब जयघोष धीरे-धीरे

हवा में घुल जाएगा,


जब समुद्र

अपनी लहरों को फिर

सामान्य लय में लौटा देगा,



तब भी

एक सूक्ष्म-सी गति

शेष रहेगी—


मानो किसी ने

हमारे भीतर

एक अदृश्य रथ रख दिया हो,


जो हर बार

अहंकार से करुणा की ओर,


विभाजन से सह-अस्तित्व की ओर,


और मनुष्य से

थोड़ा-सा अधिक

मनुष्य होने की ओर

चुपचाप चलता रहता है...


बुधवार, 15 जुलाई 2026

सावन, अंतस् की धारा ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 सावन, अंतस् की धारा 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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सावन केवल आकाश से उतरती हुई वर्षा नहीं, वह मनुष्य के भीतर फिर से हरित हो उठती पृथ्वी है। हर बूँद मिट्टी पर नहीं, स्मृतियों और संवेदनाओं पर गिरती है, हर नदी जल नहीं, पर्वत की आत्मा और वन की साँस बहाती है। शिव की आराधना मंदिरों से पहले प्रकृति के मौन में घटित होती है, जहाँ वृक्ष, पर्वत, मेघ और मिट्टी एक ही प्रार्थना बन जाते हैं। 

जो भीतर से सूख गया है, सावन उसी में करुणा का अंकुर फोड़ता है, और अंततः स्मरण कराता है—मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसकी धड़कन का एक क्षणिक स्पंदन मात्र है।


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सावन
केवल बादलों का आना नहीं है।
यह पृथ्वी का
अपने ही भीतर लौट आने का समय है।

जब पहली बूँद
सूखी मिट्टी के माथे को छूती है,
तब केवल वर्षा नहीं होती—
स्मृतियों की एक पुरानी नदी
फिर से बहना शुरू करती है।

पेड़
इस मौसम में हरे नहीं होते,
वे अपनी चुप्पियों में
नई भाषा उगाते हैं।
पत्तियाँ
हवा के लिए नहीं हिलतीं,
वे आकाश से मिले पत्र
धीरे-धीरे पढ़ती रहती हैं।

पहाड़
बारिश में भीगते नहीं,
वे अपने भीतर जमा
शताब्दियों की धूल धोते हैं।
झरने
चट्टानों से नहीं फूटते,
वे उन मौन प्रार्थनाओं से जन्म लेते हैं
जिन्हें किसी ने कभी शब्द नहीं दिए।

धुंध
दृश्य को छिपाती नहीं,
वह बताती है—
हर स्पष्ट दिखाई देने वाली चीज़
पूरी तरह समझी नहीं जा सकती।

मेघ
आकाश पर लिखी हुई
जल की चलती हुई लिपि हैं।
विद्युत्
उस लिपि का विराम-चिह्न,
और गर्जन—
एक ऐसा वाक्य,
जिसे सुनकर बीज
मिट्टी के अँधेरे में
अपनी आँखें खोल देते हैं।

किसान
खेत में अन्न नहीं बोता,
वह अपने विश्वास का सबसे कठिन बीज
धरती को सौंप देता है।
बारिश
फसल से पहले
उस विश्वास को सींचती है।

नदियाँ
पानी लेकर नहीं बहतीं,
वे पर्वतों की स्मृति,
वनों की गंध,
पत्तों की हरियाली
और अनगिनत अनकहे स्पर्श
समुद्र तक पहुँचाती हैं।
इसीलिए
हर नदी का जल
किसी एक स्रोत का नहीं होता।

मयूर का नृत्य
केवल उल्लास नहीं,
सूखी प्रतीक्षा का
पहला उच्चारण है।
कोयल की भीगी हुई तान में
विरह भी भीगता है,
मिलन भी।

और मनुष्य...

वह जितना बाहर भीगता है,
उससे कहीं अधिक
भीतर भीगने लगता है।
आँखों में उतर आया पानी
कई बार बादलों से नहीं,
वर्षों से रूकी हुई संवेदनाओं से आता है।

शायद इसीलिए
सावन में शिव की आराधना
केवल देवालयों में नहीं होती।
हर वृक्ष
एक मौन शिवलिंग बन जाता है,
हर नदी
अभिषेक का जल,
हर पर्वत
ध्यान में बैठा हुआ ऋषि,
और हर बूँद—
जीवन के पक्ष में
प्रकृति का हस्ताक्षर।

सावन
मनुष्य और प्रकृति के बीच
किसी उत्सव का नहीं,
एक प्राचीन समझौते का महीना है—
जहाँ मिट्टी
मनुष्य को फिर से याद दिलाती है
कि वह पृथ्वी का स्वामी नहीं,
उसकी श्वास का
एक क्षणिक विस्तार मात्र है।

जिस दिन
हम वर्षा को
केवल मौसम नहीं,
अपने भीतर बची हुई करुणा की अंतिम नमी की तरह
पहचान लेंगे—

शायद उसी दिन
धरती को
इतना बरसना नहीं पड़ेगा।


मंगलवार, 14 जुलाई 2026

नियति का विधान ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

नियति का विधान 

 ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


जब चाँद बादलों में खो जाता, तब याद सुखद वह आता है,
उजियारे में उसकी कीमत कौन भला बतलाता है।
जब राहों पर छा जाता तम, हर पथिक भरम-सा जाता है,
तब चाँद-सा एक सहारा ही जीवन-पथ दिखलाता है।

अपने दुःख के एकांतों में मन कितना घबराता है,
सुख का सारा वैभव पल में आँखों से ओझल हो जाता है।
सब अपनी करनी का ही फल, समय हमें समझाता है,
भाग्य में जो लिखा न हो, मिलकर भी न मिल पाता है।

भले दिनों की छाँव कभी पलभर में धूप बन जाती है,
जीवन की हर मुस्कान यहाँ नियति की चाल बताती है।
जो विधि ने लिखा ललाट पर, वही अंततः फल पाता है,
भाग्य में जो लिखा न हो, मिलकर भी नहीं मिल पाता है।