बर्फ का गोला (कहानी)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
रात का तीसरा पहर था। आकाश में तारे ऐसे ठिठुर रहे थे मानो किसी ने उन्हें भी बर्फ की चादर में लपेट दिया हो। दूर, बहुत दूर, हिमालय की ऊँची चोटियाँ चाँदनी में ऐसे चमक रही थीं जैसे किसी देवता के मस्तक पर जड़ी हुई चाँदी की मुकुट-मालाएँ। दारमा घाटी की उस छोटी-सी बस्ती में अचानक एक स्त्री का विलाप हवा को चीरता हुआ उठा—“नहीं… नहीं… उसे मत ले जा!” और उसी क्षण मोनू हड़बड़ा कर उठ बैठा। उसकी साँसें तेज थीं, आँखें डरी हुई, और सामने दीवार पर टँगा पिता का पुराना ऊनी कोट चाँदनी में ऐसे लहरा रहा था जैसे वह स्वयं पिता की छाया हो।
मोनू ने अपने सीने पर हाथ रखा। सपना फिर वही था—सफेद बर्फ का एक विराट गोला, जो धीरे-धीरे लुढ़कता हुआ उसके पिता को अपनी गोद में समेट लेता है। वह चिल्लाता है, दौड़ता है, पर उसके छोटे-छोटे पाँव उस बर्फ के गोले तक पहुँच नहीं पाते। और फिर सब कुछ श्वेत हो जाता है—एक ऐसी श्वेतता, जिसमें आवाज़ें भी दफन हो जाती हैं। दो वर्ष पहले, जब उसके पिता कीड़ा जड़ी की खोज में ऊँचे शिखरों की ओर गए थे, तब इसी श्वेतता ने उन्हें अपने भीतर सुला लिया था। लोग कहते हैं कि वे छिपला केदार की ढलानों पर बर्फ के एक बड़े गोले के नीचे दब गए। तब से वह बर्फ का गोला मोनू के मन में एक जीवित प्रतीक बनकर बैठ गया था—दुर्भाग्य का, संघर्ष का, और शायद नियति का भी।
दारमा घाटी की वह बस्ती, जो धारचूला से ऊपर की ओर जाती पगडंडियों के बीच कहीं छिपी हुई थी, सुबह होते ही अपनी सादगी में जाग उठती थी। कच्चे पत्थरों के घर, छतों पर रखी लकड़ियाँ, और दूर-दूर तक फैले बुग्याल, जिन पर जून-जुलाई में भी कहीं-कहीं बर्फ की सफेद रेखाएँ दिख जाती थीं। सामने व्यास घाटी, उधर चौंदास घाटी, और ऊपर कहीं बादलों से संवाद करता छिपला केदार—मानो हिमालय स्वयं इन घाटियों का प्रहरी हो।
मोनू बारह-तेरह साल का था, पर उसके चेहरे पर उम्र से कहीं अधिक गंभीरता उतर आई थी। छह बहनों में सबसे छोटा, पर अब घर का एकमात्र सहारा। उसकी माँ की आँखों में स्थायी थकान थी, पर वह थकान टूटन नहीं थी; वह हिमालय की तरह स्थिर थी। बहनें दिन भर खेत, घर, लकड़ी, पानी—हर काम में जुटी रहतीं। पहाड़ की जिंदगी दूर से देखने वालों को जितनी सुंदर लगती है, भीतर से वह उतनी ही कठोर होती है। हवा में ताजगी है, पर उस ताजगी को पाने के लिए फेफड़ों को पहाड़ की चढ़ाई से जूझना पड़ता है। नदियाँ स्वच्छ हैं, पर उनके किनारे तक पहुँचने के लिए पाँवों को पथरीली राहों से गुजरना पड़ता है।
जून का महीना था। गाँव में हलचल थी। कीड़ा जड़ी का मौसम आ गया था। दो महीने—बस दो महीने—जब ऊँचे हिमालय की ढलानों पर बर्फ के नीचे दबी उस अनमोल जड़ी को खोजा जाता है, जिसे लोग ‘पहाड़ का सोना’ कहते हैं। उसी से साल भर का घर चलता है। उसी से बहनों की किताबें आती हैं, माँ की दवा आती है, और चूल्हे में लकड़ी की जगह कभी-कभी गैस का सपना भी झिलमिला उठता है।
“माँ, मैं भी जाऊँगा,” मोनू ने एक सुबह धीरे से कहा।
माँ ने उसे देखा। उसकी आँखों में डर था, वही पुराना डर, जो दो साल से उसके भीतर जमा था। “नहीं, मोनू… वहाँ बहुत खतरा है। तेरे बापू…” शब्द गले में अटक गए।
“बापू भी तो गए थे, माँ। अगर वो डर जाते तो हम दो साल पहले ही भूखे मर जाते। मैं डरूँगा नहीं। कालू है मेरे साथ।”
दरवाजे के बाहर भोटिया कुत्ता कालू अपनी काली चमकती आँखों से भीतर झाँक रहा था। उसकी देह मजबूत, गर्दन पर घना बाल, और चाल में एक स्वाभाविक साहस था। वह मोनू का साया था। जहाँ मोनू, वहाँ कालू।
माँ ने चुपचाप उसके सिर पर हाथ फेरा। “तू अभी बच्चा है।”
मोनू ने पहली बार माँ की आँखों में सीधा देखा—“पहाड़ के बच्चे जल्दी बड़े हो जाते हैं, माँ।”
उस वाक्य में एक ठंडी सच्चाई थी, जैसे हिमालय की हवा।
गाँव के दस-पंद्रह लोग तैयार थे। रस्सियाँ, टेंट, सूखा आटा, नमक, माचिस, और कुछ दवाइयाँ। साथ में तीन भोटिया कुत्ते—कालू, शेरू और भूरा। सुबह जब वे निकले, तो घाटी में हल्का कोहरा था। सूरज की पहली किरणें दूर कैलाश दिशा की चोटियों को छू रही थीं। लोग कहते हैं कि वहाँ कहीं देवताओं का निवास है। मोनू ने उन शिखरों की ओर देखा और मन ही मन कहा—“बापू, मैं आ रहा हूँ… पर लौटकर भी आऊँगा।”
पहाड़ की चढ़ाई आसान नहीं थी। पगडंडी कभी चट्टानों के बीच से निकलती, कभी नाले को पार करती, तो कभी बुग्याल की मुलायम घास पर कदम रखती। दिन चढ़ते-चढ़ते साँसें तेज हो जातीं। मोनू ने अपने छोटे कंधों पर रखा बोझ कसकर पकड़ा। कालू उसके आगे-आगे चल रहा था, जैसे रास्ता दिखा रहा हो।
पहली रात उन्होंने एक खुले बुग्याल में टेंट लगाया। दूर-दूर तक कोई बस्ती नहीं, केवल हवा की आवाज़ और कभी-कभी किसी अनजाने पक्षी का स्वर। रात गहराई तो ठंड बढ़ गई। मोनू टेंट में सिकुड़कर लेटा था। उसने कालू को पास खींच लिया।
“डर तो नहीं लगता, कालू?” उसने फुसफुसाकर पूछा।
कालू ने हल्की-सी भौंक दी, जैसे कह रहा हो—“जब तक मैं हूँ, डर कैसा?”
मोनू मुस्कराया। “अगर बर्फ का बड़ा गोला आया तो?”
बाहर हवा ने अचानक एक लंबी हूक भरी। मोनू का दिल धक से हुआ। फिर उसने खुद से कहा—“नहीं, इस बार बर्फ मुझे नहीं दबाएगी। मैं उसे चीरकर कीड़ा जड़ी निकालूँगा।”
अगले दिन से असली काम शुरू हुआ। ऊँचाई बढ़ती गई। बर्फ की सफेद चादर दूर से सुंदर लगती थी, पर पास जाकर वह ठंडी और कठोर लगती। लोग लकड़ी की डंडियों से बर्फ कुरेदते, ध्यान से देखते कि कहीं कोई पतली-सी काली रेखा तो नहीं दिख रही—वही कीड़ा जड़ी का संकेत। कई बार घंटों मेहनत के बाद भी कुछ नहीं मिलता। कई बार एक छोटा-सा टुकड़ा मिल जाता, जिसे सब खुशी से देखते जैसे किसी ने सोने का कण पा लिया हो।
मोनू भी झुक-झुककर बर्फ कुरेदता। उसकी उँगलियाँ सुन्न हो जातीं, पर वह रुकता नहीं। उसे हर बर्फ का गोला पिता की याद दिलाता। वह सोचता—“क्या बापू भी ऐसे ही खोज रहे होंगे? क्या उन्हें भी कोई टुकड़ा मिला होगा?”
एक दिन दोपहर के समय, जब सूरज सिर पर था और बर्फ की चमक आँखों को चुभ रही थी, अचानक दूर झाड़ियों में सरसराहट हुई। शेरू भौंका। कालू सतर्क हो गया। सब लोग एक-दूसरे को देखने लगे। और फिर झाड़ियों से एक विशालकाय बाघ निकल आया। उसकी आँखें पीली आग की तरह चमक रही थीं।
क्षण भर के लिए समय ठहर गया। मोनू का दिल जैसे गले में आ गया। पर उसी क्षण कालू बिजली की तरह आगे बढ़ा। उसने जोर से भौंकते हुए बाघ पर झपट्टा मारा। शेरू और भूरा भी साथ हो लिए। बाघ ने गुर्राकर पंजा मारा, पर तीनों कुत्तों की एकजुटता ने उसे पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। लोग शोर मचाते हुए डंडे लहराने लगे। कुछ ही पल में बाघ मुड़ा और बर्फीली ढलान की ओर भाग गया।
मोनू काँप रहा था। उसने कालू को कसकर गले लगा लिया। “तू तो सच में शेर निकला, कालू!” उसकी आँखों में आँसू थे—डर के भी, गर्व के भी।
उस रात टेंट में लेटे हुए उसने कालू से कहा—“देखा, हम डरेंगे नहीं। बापू को बर्फ ने दबाया था, पर हमें नहीं दबा पाएगी। हम उससे अपना हक लेकर जाएँगे।”
ऊँचाइयों पर दिन और रात का फर्क कम हो जाता है। दिन में सूरज तीखा, रात में ठंड कड़वी। कई बार तेज बर्फीली आँधी टेंट को हिलाती। एक रात सचमुच ऊपर की ढलान से बर्फ का एक बड़ा गोला लुढ़कता हुआ नीचे आया। सब लोग बाहर निकलकर चिल्लाए। गोला टेंट से कुछ दूरी पर आकर रुक गया।
मोनू ने उसे देखा—वही श्वेत, गोल, ठंडा प्रतीक। उसने धीरे से कहा—“तू मेरा दुश्मन नहीं है। तू तो बस पहाड़ का खेल है। अगर तुझे समझ लिया, तो तू रास्ता भी बन सकता है।”
उसने अगले दिन उसी गोले के पास बर्फ हटाई। और आश्चर्य—वहीं नीचे उसे कीड़ा जड़ी का एक मोटा टुकड़ा मिला। उसने उसे हाथ में लिया, जैसे किसी ने उसे आशीर्वाद दिया हो।
दो महीने बीतते-बीतते उसकी थैली भर गई। हर टुकड़ा एक कहानी था—कभी ठंड से जूझने की, कभी भूख से, कभी डर से। पर हर कहानी के केंद्र में एक दृढ़ निश्चय था।
और एक सुबह, जब आकाश साफ था और दूर कैलाश दिशा की चोटियाँ सुनहरी हो रही थीं, गाँव के लोग वापसी की तैयारी करने लगे। मोनू ने आखिरी बार ऊँचे शिखरों की ओर देखा। उसे लगा जैसे हिमालय मुस्करा रहा हो—कठोर, पर दयालु।
वह जानता था, यह केवल कीड़ा जड़ी नहीं, बल्कि उसका साहस है, जिसे वह बर्फ के बड़े-बड़े गोलों के भीतर से निकालकर अपने साथ ले जा रहा है।
भाग दो
वापसी की सुबह पहाड़ कुछ अलग था। जैसे दो महीनों तक परखने के बाद अब वह अपने इस छोटे यात्री को विदा देने के लिए गंभीर खड़ा हो। हवा में एक अजीब-सी मधुरता थी—ठंडी, पर चुभती नहीं; तेज, पर भयावह नहीं। मोनू ने अपने थैले को कसकर बाँधा। उसमें भरी कीड़ा जड़ी केवल जड़ी नहीं थी—वह उसकी माँ की सूखी आँखों की नमी थी, बहनों की पढ़ाई का उजाला था, और उसके भीतर जागे पुरुषार्थ का प्रमाण भी।
“चलो, अब नीचे की ओर,” दल के मुखिया ने कहा।
ऊपर चढ़ना जितना कठिन था, उतरना उससे कम नहीं। बर्फ की ढलानों पर पैर फिसलते, कहीं पत्थर खिसकते, कहीं नीचे बहती बर्फीली धाराएँ रास्ता काट देतीं। मोनू हर कदम सोच-समझकर रखता। कालू उसके पीछे-पीछे चलता, कभी आगे आकर उसकी राह सूँघता, कभी मुड़कर उसे देखता—मानो पूछ रहा हो, “थक तो नहीं गया?”
“नहीं रे,” मोनू मुस्कराता, “अब तो घर दिखने वाला है।”
पर घर अभी दूर था। तीसरे दिन दोपहर को अचानक मौसम बदला। आसमान पर घने बादल छा गए। हवा की गति तेज हुई। दूर से गर्जना-सी सुनाई दी। दल के लोग समझ गए—ऊपर कहीं हिमस्खलन हुआ है। सबने गति तेज की।
एक संकरी घाटी में पहुँचते ही उन्होंने देखा—ऊपर की ढलान से बर्फ के बड़े-बड़े गोले लुढ़कते आ रहे हैं। कुछ छोटे, कुछ विशाल। वे पेड़ों से टकराकर टूटते, फिर और गोल होकर नीचे आते। दृश्य भयावह था।
“दाएँ हटो!” किसी ने चिल्लाया।
मोनू के सामने से एक बड़ा गोला गुजरा। उसने अपनी साँस रोक ली। उसे लगा जैसे वही पुराना सपना फिर जीवित हो उठा है। वही श्वेत दानव, जो सब कुछ निगल सकता है। एक पल को उसके पाँव जम गए।
“मोनू!” पीछे से आवाज़ आई।
तभी कालू ने जोर से भौंकते हुए उसकी टांग पर हल्का-सा दाँत रखा—जैसे झटका दे रहा हो। मोनू चौंका। उसने अपने भीतर एक आवाज़ सुनी—“भाग मत, समझ। बर्फ का गोला डर है, पर रास्ता भी उसी के किनारे से निकलेगा।”
वह दाईं ओर चट्टान से चिपक गया। एक विशाल गोला उसके सामने आकर रुका, फिर धीरे-धीरे टूट गया। उसके भीतर से जमी हुई बर्फ की परतों के बीच कुछ काली रेखाएँ चमकीं। मोनू की आँखें फैल गईं। उसने सावधानी से बर्फ हटाई—वहाँ कीड़ा जड़ी के दो मोटे टुकड़े और थे, शायद किसी पुराने हिमस्खलन से दबे हुए।
उसने उन्हें उठाया। उसकी हथेलियाँ काँप रही थीं, पर इस बार डर से नहीं—एक अजीब-सी अनुभूति से। उसे लगा जैसे पहाड़ कह रहा हो—“जो मुझे समझ लेता है, उसे मैं खाली नहीं लौटाता।”
मौसम कुछ देर बाद शांत हुआ। दल के लोग सुरक्षित नीचे आ गए। उस शाम उन्होंने अपेक्षाकृत निचली ढलान पर टेंट लगाया। नीचे दूर-दूर तक हरियाली झलक रही थी। बर्फ अब पीछे छूटती जा रही थी।
रात को आग जलाकर सब बैठे। किसी ने रोटी सेंकी, किसी ने नमक-मिर्च मिलाकर सूप बनाया। मोनू आग की लौ को देखता रहा। उसे उसमें कभी पिता का चेहरा दिखता, कभी माँ की आँखें।
वह धीरे से कालू के पास खिसक आया। “जानता है कालू,” उसने फुसफुसाकर कहा, “बर्फ का गोला अब मुझे डराता नहीं। वो तो जैसे परीक्षा थी। अगर बापू उसमें दब गए, तो शायद इसलिए कि पहाड़ ने उन्हें अपने पास बुला लिया। पर मुझे अभी नीचे जाना है… माँ के पास।”
कालू ने उसकी हथेली चाट ली।
अगले दिन जब वे दारमा घाटी की ओर उतर रहे थे, तो दूर से नदी की आवाज़ सुनाई देने लगी। वह आवाज़ जीवन की थी—बहती, चंचल, निरंतर। बर्फ की स्थिरता के बाद यह बहाव जैसे नया संगीत था। मोनू ने पहली बार महसूस किया कि पहाड़ केवल कठोर नहीं, संवेदनशील भी है। उसके शिखर तपस्या हैं, उसकी घाटियाँ करुणा।
गाँव की पहली झलक दिखी तो मोनू का हृदय तेज़ी से धड़कने लगा। पत्थर की वही झोपड़ियाँ, धुएँ की हल्की लकीरें, और आँगन में खड़ी उसकी छह बहनें—मानो किसी प्रतीक्षा की प्रतिमा। माँ दरवाजे पर खड़ी थी। उसकी आँखें बार-बार पगडंडी की ओर उठतीं, फिर झुक जातीं।
“आ गए!” किसी ने चिल्लाकर कहा।
माँ की आँखों में जैसे दो वर्षों का जमा हुआ हिम पिघल गया। वह दौड़कर आई। मोनू उसके सीने से लग गया। कुछ क्षण कोई कुछ नहीं बोला। केवल साँसों की आवाज़ थी, और उस आवाज़ में समाया हुआ राहत का संगीत।
“तू ठीक है न?” माँ ने उसके चेहरे को दोनों हथेलियों में लेकर पूछा।
“हाँ, माँ। देख, कितना लाया हूँ।” उसने थैला खोला। कीड़ा जड़ी के टुकड़े धूप में चमक उठे—जैसे बर्फ के भीतर से निकला हुआ जीवन।
बहनों की आँखों में आश्चर्य और गर्व था। “भैया तो सच में पहाड़ बन गया,” सबसे बड़ी बहन ने धीमे से कहा।
मोनू मुस्कराया। “नहीं दीदी, पहाड़ तो पहाड़ ही है। हम तो बस उसके बच्चे हैं।”
उस रात घर में कई महीनों बाद सच्ची मुस्कान थी। चूल्हे की आँच कुछ अधिक उजली लगी। माँ ने रोटी सेंकते हुए कहा—“तेरे बापू जहाँ भी होंगे, खुश होंगे।”
मोनू ने बाहर आकाश की ओर देखा। हिमालय की चोटियाँ दूर से दिख रही थीं—शांत, गंभीर, अडिग। उसे लगा जैसे उन शिखरों के बीच कहीं पिता की आत्मा मुस्करा रही हो।
दिन बीतने लगे। कीड़ा जड़ी अच्छे दाम में बिकी। घर में राशन आया, बहनों के लिए किताबें आईं, माँ के लिए गरम शॉल। पर मोनू के भीतर सबसे बड़ा परिवर्तन यह था कि अब वह बर्फ के गोले से नहीं डरता था।
एक शाम वह अकेला नदी किनारे बैठा था। कालू पास लेटा था। उसने पत्थर उठाकर पानी में फेंका। गोल लहरें फैल गईं। उसने सोचा—“बर्फ का गोला भी तो ऐसा ही था। एक घटना, जिसने हमारे जीवन में लहरें फैलाईं। अगर हम टूट जाते, तो वहीं जम जाते। पर हमने बहना चुना।”
उसने कालू से कहा—“अगले साल फिर चलेंगे?”
कालू ने पूँछ हिलाई।
मोनू ने आकाश की ओर देखा—“जीवन भी पहाड़ की तरह है। चढ़ाई है, फिसलन है, बर्फ है, आँधी है। पर जो चढ़ता है, वही शिखर देखता है।”
हवा ने उसके बालों को छुआ। दूर हिमालय की श्वेत चादर सांझ की सुनहरी रोशनी में रंग बदल रही थी। बर्फ के वे बड़े-बड़े गोले, जो कभी उसके लिए भय के प्रतीक थे, अब उसे संघर्ष की पाठशाला लगते थे।
वह जान गया था—जीवन जीने के लिए संघर्ष करना ही पड़ता है। मेहनत ही वह धूप है, जो बर्फ को पिघलाकर रास्ता बनाती है। और साहस वह कुदाल है, जो श्वेत चादर के भीतर दबे हुए स्वप्नों को बाहर निकालती है।
मोनू उठ खड़ा हुआ। उसके कदमों में अब संकोच नहीं, दृढ़ता थी। कालू उसके साथ-साथ चल पड़ा। पीछे दारमा घाटी की साँझ उतर रही थी, और ऊपर हिमालय अटल खड़ा था—मानो कह रहा हो, “जो मुझसे टकराता नहीं, बल्कि मुझे समझता है, वही मेरी गोद से जीवन का सोना लेकर लौटता है।”
और इस प्रकार बर्फ के बड़े-बड़े गोलों के भीतर से कीड़ा जड़ी निकालने वाला वह बारह-तेरह वर्ष का बालक केवल जड़ी ही नहीं, बल्कि अपने भीतर छिपी हुई हिमालय-सी शक्ति भी खोज लाया। उसके लिए बर्फ अब दफनाने वा
ली श्वेतता नहीं, बल्कि जीवन को गढ़ने वाली कठोर शाला थी।
संघर्ष ही उसका उत्सव था, और हिमालय उसका मौन गुरु।
!! समाप्त !!