मातृभाषा: अस्मिता से वैश्विक चेतना तक — अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का बहुआयामी विमर्श
(“मातृभाषा: भारतीय स्वाभिमान से वैश्विक संवाद तक”)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
प्रस्तावना -
भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना, संवेदना और सामूहिक स्मृति का जीवंत आधार है। ‘मां’, ‘मातृभूमि’ और ‘मातृभाषा’—ये तीनों शब्द भावनात्मक, सांस्कृतिक और अस्तित्वगत स्तर पर एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। जिस प्रकार मां जीवन देती है, मातृभूमि पहचान देती है, उसी प्रकार मातृभाषा व्यक्तित्व को अभिव्यक्ति देती है। यही कारण है कि विश्व समुदाय ने भाषाई विविधता और मातृभाषाओं के संरक्षण को मानवता की साझा विरासत के रूप में स्वीकार किया है।
यूनेस्को द्वारा नवंबर 1999 में 21 फरवरी को ‘अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’ घोषित किया गया। इसका उद्देश्य विश्व की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को संरक्षित करना तथा बहुभाषावाद को बढ़ावा देना है। वर्ष 2020 से 2024 तक विभिन्न विषयों के माध्यम से यह दिवस सीमाओं के बिना भाषाओं, शिक्षा में समावेश, तकनीकी के उपयोग तथा अंतर-पीढ़ीगत सीखने जैसे आयामों पर केंद्रित रहा। वर्ष 2025 का संभावित वैश्विक विषय “डिजिटल युग में भाषाई विविधता और समावेशी शिक्षा” तथा वर्ष 2026 का संभावित विषय “सतत विकास के लिए स्वदेशी और मातृभाषाओं का सशक्तिकरण” बहुभाषी विश्व के निर्माण की दिशा में अग्रसर चिंतन को दर्शाते हैं।
इस शोधलेख में मातृभाषा को मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय और वैश्विक संदर्भों में समझते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के आलोक में उसका व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है।
1. मातृभाषा और मनोवैज्ञानिक विकास: चेतना, आत्मबोध और व्यक्तित्व निर्माण -
मातृभाषा वह प्रथम भाषा है, जिसके माध्यम से बालक संसार को जानना प्रारंभ करता है। जन्म के पश्चात वह जो ध्वनियाँ सुनता है, जो शब्द आत्मसात करता है, वही उसके संज्ञानात्मक विकास का आधार बनते हैं। मनोविज्ञान के अनुसार प्रारंभिक भाषा-अनुभव मस्तिष्क की संरचना और तंत्रिका-प्रक्रियाओं को आकार देते हैं। मातृभाषा में सीखी गई अवधारणाएँ अधिक स्थायी और गहरी होती हैं, क्योंकि वे भावनात्मक अनुभवों से जुड़ी होती हैं।
बालक जब ‘मां’ शब्द बोलता है, तो वह केवल ध्वनि नहीं उच्चारित करता, बल्कि सुरक्षा, स्नेह और विश्वास की अनुभूति व्यक्त करता है। यही प्रक्रिया आगे चलकर सामाजिक संबंधों, आत्मसम्मान और आत्मविश्वास के निर्माण में सहायक होती है। मातृभाषा व्यक्ति को आत्म-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देती है। वह अपने विचारों, आशंकाओं, आकांक्षाओं और सपनों को सहजता से व्यक्त कर पाता है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने वाले बच्चों में बौद्धिक स्पष्टता, रचनात्मकता और विश्लेषणात्मक क्षमता अधिक विकसित होती है। जब शिक्षा किसी विदेशी भाषा में प्रारंभ होती है, तो बालक का संज्ञानात्मक संसाधन भाषा को समझने में अधिक व्यय होता है, जिससे विषयवस्तु की गहराई प्रभावित हो सकती है। मातृभाषा में शिक्षा बालक को मानसिक सुरक्षा प्रदान करती है, जिससे सीखना आनंददायक और प्रभावी बनता है।
सांस्कृतिक मनोविज्ञान के अनुसार भाषा व्यक्ति को उसके समुदाय से जोड़ती है। लोकगीत, लोककथाएँ, कहावतें और मिथक—ये सभी सांस्कृतिक स्मृति के वाहक हैं। मातृभाषा के माध्यम से ही व्यक्ति अपनी जड़ों से जुड़ता है और सांस्कृतिक निरंतरता का अनुभव करता है। यदि मातृभाषा कमजोर होती है, तो सांस्कृतिक आत्मबोध भी कमजोर पड़ता है।
इस प्रकार मातृभाषा केवल भाषिक कौशल नहीं, बल्कि व्यक्तित्व, आत्मगौरव और सांस्कृतिक पहचान का मूलाधार है।
2. मातृभाषा और सांस्कृतिक अस्मिता: परंपरा से आधुनिकता तक -
भाषा संस्कृति की आत्मा है। किसी भी राष्ट्र की परंपराएँ, मूल्य, इतिहास और सामूहिक अनुभव भाषा में ही संरक्षित रहते हैं। जब कोई समाज अपनी मातृभाषा का सम्मान करता है, तो वह अपनी सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा करता है। इसके विपरीत, भाषा का ह्रास सांस्कृतिक क्षरण का संकेत है।
विश्व स्तर पर अनेक भाषाएँ विलुप्ति के कगार पर हैं। वैश्वीकरण, शहरीकरण और तकनीकी प्रभुत्व के कारण बड़ी भाषाओं का प्रभाव बढ़ रहा है, जबकि छोटी और स्वदेशी भाषाएँ संकट में हैं। संयुक्त राष्ट्र ने 2022 से 2032 तक की अवधि को ‘स्वदेशी भाषाओं का अंतर्राष्ट्रीय दशक’ घोषित कर यह संदेश दिया है कि भाषाई विविधता मानवता की साझा धरोहर है।
भारत जैसे बहुभाषी देश में मातृभाषा का महत्व और भी अधिक है। यहाँ सैकड़ों भाषाएँ और बोलियाँ जीवंत हैं। प्रत्येक भाषा अपने साथ एक विशिष्ट लोक-संसार, जीवन-दर्शन और सांस्कृतिक स्मृति लेकर चलती है। हिंदी, तमिल, बंगला, मराठी, कन्नड़, असमिया, उर्दू, संस्कृत जैसी भाषाएँ केवल संप्रेषण के साधन नहीं, बल्कि सभ्यताओं की वाहक हैं।
मातृभाषा सांस्कृतिक लोकतंत्र को सशक्त करती है। जब शासन, न्याय और शिक्षा की भाषा जनता की भाषा से जुड़ी होती है, तब नागरिक सहभागिता बढ़ती है। भाषा के माध्यम से ही साहित्य, संगीत, नाटक और कला का विकास संभव होता है। कबीरदास, सूरदास, तुलसीदास, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सुब्रह्मण्य भारती जैसे रचनाकारों ने अपनी मातृभाषा में सृजन कर सांस्कृतिक चेतना को वैश्विक स्तर तक पहुँचाया।
आधुनिक युग में चुनौती यह है कि मातृभाषा को आधुनिक विज्ञान, तकनीक और डिजिटल माध्यमों से जोड़ा जाए। यदि मातृभाषाएँ केवल भावनात्मक स्मृति तक सीमित रह जाएँगी और ज्ञान-विज्ञान से दूर रहेंगी, तो उनकी उपयोगिता सीमित हो जाएगी। अतः आवश्यक है कि मातृभाषाओं को समकालीन संदर्भ में सशक्त किया जाए।
3. वैश्विक परिप्रेक्ष्य में मातृभाषा: बहुभाषावाद, तकनीक और समावेशन -
अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के विभिन्न विषय यह संकेत देते हैं कि विश्व समुदाय बहुभाषावाद को समावेशी विकास का आधार मानता है। 2020 की थीम ‘सीमाओं के बिना भाषाएँ’ ने यह स्पष्ट किया कि भाषा भौगोलिक सीमाओं से परे सांस्कृतिक सेतु का कार्य करती है। 2021 में ‘शिक्षा और समाज में समावेश के लिए बहुभाषावाद’ ने सामाजिक न्याय की दिशा में भाषा की भूमिका को रेखांकित किया। 2022 और 2023 में तकनीकी और शिक्षा-परिवर्तन पर केंद्रित विषयों ने डिजिटल युग में भाषाई समावेशन की आवश्यकता को रेखांकित किया।
वर्ष 2025 की प्रस्तावित थीम “डिजिटल युग में भाषाई विविधता और समावेशी शिक्षा” यह संकेत देती है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन अनुवाद और डिजिटल सामग्री निर्माण के क्षेत्र में मातृभाषाओं की भागीदारी सुनिश्चित करना अनिवार्य है। यदि डिजिटल संसाधन केवल कुछ प्रमुख भाषाओं में उपलब्ध होंगे, तो भाषाई असमानता और गहरी होगी।
वर्ष 2026 की संभावित थीम “सतत विकास के लिए स्वदेशी और मातृभाषाओं का सशक्तिकरण” भाषा और सतत विकास लक्ष्यों के बीच संबंध को स्पष्ट करती है। स्वास्थ्य, पर्यावरण, लैंगिक समानता और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में जागरूकता तभी प्रभावी होगी जब संदेश स्थानीय भाषाओं में पहुँचेगा।
वैश्विक स्तर पर कनाडा, फिनलैंड, न्यूजीलैंड और अफ्रीकी देशों ने स्वदेशी भाषाओं के संरक्षण हेतु विशेष नीतियाँ अपनाई हैं। बहुभाषी समाजों में भाषा-नीति केवल प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवाधिकार का प्रश्न है। मातृभाषा में शिक्षा और सूचना तक पहुँच नागरिक सशक्तिकरण का आधार है।
4. भारतीय संदर्भ और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: मातृभाषा की पुनर्स्थापना -
भारत की भाषाई विविधता विश्व में अद्वितीय है। ऐसे बहुभाषी समाज में मातृभाषा-आधारित शिक्षा की आवश्यकता लंबे समय से अनुभव की जाती रही है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने इस आवश्यकता को औपचारिक रूप से स्वीकार करते हुए प्रारंभिक कक्षाओं में मातृभाषा/स्थानीय भाषा में शिक्षा देने की अनुशंसा की है।
नीति के अनुसार, कम-से-कम कक्षा 5 तक और संभव हो तो कक्षा 8 तक शिक्षा मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में दी जानी चाहिए। इसका उद्देश्य बच्चों की समझ, रचनात्मकता और तार्किक क्षमता को सुदृढ़ करना है। शोध बताते हैं कि मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की शैक्षणिक उपलब्धि बेहतर होती है।
नीति बहुभाषावाद को प्रोत्साहित करते हुए त्रिभाषा सूत्र को लचीले रूप में लागू करने की बात करती है। भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा और शोध को बढ़ावा देने के लिए अनुवाद, शब्दावली विकास और डिजिटल संसाधनों के निर्माण पर बल दिया गया है। भारतीय भाषाओं में ई-कंटेंट, ऑनलाइन पाठ्यक्रम और तकनीकी शब्दकोश तैयार करने की दिशा में भी प्रयास अपेक्षित हैं।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 मातृभाषा को केवल भावनात्मक विषय नहीं, बल्कि ज्ञान-निर्माण का माध्यम मानती है। यह दृष्टिकोण भारतीय भाषाओं को आत्मनिर्भर भारत के निर्माण से जोड़ता है। जब विज्ञान, प्रौद्योगिकी, कानून और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में मातृभाषाओं का उपयोग बढ़ेगा, तब ज्ञान का लोकतंत्रीकरण संभव होगा।
5. मातृभाषा, राष्ट्र और वैश्विक नागरिकता: संतुलन और समन्वय -
मातृभाषा राष्ट्र की आत्मा है, परंतु वैश्विक युग में बहुभाषिकता भी अनिवार्य है। प्रश्न यह नहीं कि मातृभाषा या विदेशी भाषा—बल्कि यह कि मातृभाषा के आधार पर अन्य भाषाओं का अधिगम कैसे सशक्त किया जाए। जो व्यक्ति अपनी मातृभाषा में दक्ष होता है, वह अन्य भाषाएँ भी अधिक सहजता से सीख सकता है।
राष्ट्रभक्ति का अर्थ भाषाई संकीर्णता नहीं, बल्कि अपनी भाषा के प्रति सम्मान और अन्य भाषाओं के प्रति सद्भाव है। मातृभाषा व्यक्ति को जड़ों से जोड़ती है, जबकि वैश्विक भाषाएँ उसे पंख देती हैं। जड़ और पंख दोनों का संतुलन ही समग्र विकास का मार्ग है।
आज आवश्यकता है कि मातृभाषाओं को डिजिटल मंचों, शोध, प्रशासन और उद्यमिता से जोड़ा जाए। स्टार्टअप, नवाचार और तकनीकी विकास में भारतीय भाषाओं की भागीदारी बढ़े। स्थानीय भाषाओं में ई-गवर्नेंस, स्वास्थ्य सेवाएँ और न्यायिक सूचना उपलब्ध हो।
मातृभाषा का संरक्षण केवल सरकारी नीतियों से नहीं, बल्कि सामाजिक संकल्प से संभव है। परिवार, विद्यालय और समाज मिलकर यदि मातृभाषा को सम्मान दें, तो वह जीवंत रहेगी। भाषा का विकास उपयोग से होता है; अतः दैनिक जीवन में मातृभाषा का प्रयोग बढ़ाना आवश्यक है।
6. यूनेस्को द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस (21 फरवरी) की वर्षवार थीम
यूनेस्को द्वारा घोषित अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की वर्षवार आधिकारिक थीम इस प्रकार हैं— 2020: “Languages without Borders” (सीमाओं के बिना भाषाएँ); 2021: “Fostering Multilingualism for Inclusion in Education and Society” (शिक्षा और समाज में समावेश के लिए बहुभाषावाद को बढ़ावा देना); 2022: “Using Technology for Multilingual Learning: Challenges and Opportunities” (बहुभाषी शिक्षण के लिए तकनीक का उपयोग: चुनौतियाँ और अवसर); 2023: “Multilingual Education – A Necessity to Transform Education” (बहुभाषी शिक्षा – शिक्षा को रूपांतरित करने की आवश्यकता); 2024: “Multilingual Education – A Pillar of Learning and Intergenerational Learning” (बहुभाषी शिक्षा – सीखने और अंतर-पीढ़ीगत शिक्षा का एक स्तंभ); 2025: “Languages Matter: Silver Jubilee Celebration of International Mother Language Day” (भाषाएँ महत्वपूर्ण हैं: अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की रजत जयंती समारोह); तथा 2026: “Empowering Indigenous and Mother Languages for Sustainable Development” (सतत विकास के लिए स्वदेशी और मातृभाषाओं का सशक्तिकरण) — संभावित विषय।
निष्कर्ष -
अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि भाषा मानवता की साझा धरोहर है। मातृभाषा केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की संभावना है। मनोवैज्ञानिक विकास से लेकर सांस्कृतिक अस्मिता, राष्ट्रीय एकता से लेकर वैश्विक समावेशन तक—मातृभाषा का महत्व बहुआयामी है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने मातृभाषा को शिक्षा के केंद्र में रखकर एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। अब आवश्यकता है कि इसे व्यवहारिक स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू किया जाए। डिजिटल युग में मातृभाषाओं को तकनीकी संसाधनों से जोड़ना और वैश्विक मंच पर उन्हें प्रतिष्ठा दिलाना समय की मांग है।
जब राष्ट्र अपनी मातृभाषा को सम्मान देता है, तो वह अपनी आत्मा को सम्मान देता है। मातृभाषा का शंखनाद केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान का उद्घोष है। अतः आइए, हम मातृभाषा को केवल उत्सव का विषय न बनाकर जीवन का आधार बनाएं—ताकि ‘मां’, ‘मातृभूमि’ और ‘मातृभाषा’ का यह त्रिवेणी-संगम मानवता को एक नई दिशा दे सके।
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