रविवार, 31 अगस्त 2025

100 वर्ष की संघ यात्रा: नये क्षितिज ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड

 

100 वर्ष की संघ यात्रा: नये क्षितिज

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अपनी स्थापना से लेकर आज तक भारतीय समाज और राष्ट्र के मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में गहरी छाप छोड़ी है। इसकी यात्रा एक सदी को पार करते हुए जब आज के मोड़ पर खड़ी होती है, तो यह केवल एक संगठन की यात्रा नहीं लगती, बल्कि एक ऐसे विचार, भाव और संकल्प का प्रतीक प्रतीत होती है, जिसने भारत की राष्ट्रीय अस्मिता को नई ऊर्जा दी है। “100 वर्ष की संघ यात्रा” न केवल एक ऐतिहासिक मूल्यांकन का अवसर है, बल्कि आने वाले भविष्य के नये क्षितिज को पहचानने और संकल्पित करने का भी समय है।

संघ की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी। उस समय का भारत विदेशी शासन के दमन और अपमान से पीड़ित था। समाज विभाजित था, जातीय और सांप्रदायिक भेदभाव व्यापक था, और राष्ट्रीय चेतना बिखरी हुई प्रतीत होती थी। ऐसे समय में संघ की स्थापना का मूल उद्देश्य भारतीय समाज को एकात्म करना, उसे संगठित शक्ति के रूप में खड़ा करना और राष्ट्रवाद को व्यावहारिक धरातल पर स्थापित करना था। संघ ने राजनीतिक संघर्ष के बजाय सामाजिक संगठन और अनुशासन को अपना साधन बनाया। यह दृष्टिकोण उसे अन्य आंदोलनों से भिन्न बनाता है।

संघ की विचारधारा में राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक सत्ता प्राप्ति का साधन नहीं था, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भारतीय संस्कृति की चेतना को पुनः स्थापित करने का संकल्प था। इस दृष्टिकोण का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि यह भारतीय मानस की गहरी जड़ों को छूता है। भारत की जनता केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की आकांक्षी नहीं थी, वह सांस्कृतिक स्वराज्य भी चाहती थी। संघ ने इसी भाव को आत्मसात किया और राष्ट्रवाद को एक आंतरिक शक्ति के रूप में देखा।

संघ की कार्यपद्धति पर विचार करें तो पाते हैं कि इसने व्यक्ति-निर्माण पर बल दिया। शाखा इसका मुख्य माध्यम बनी। नियमित शाखा के माध्यम से अनुशासन, संगठन, शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण, और राष्ट्र के प्रति निष्ठा विकसित की गई। यह केवल औपचारिक सभा नहीं थी, बल्कि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह सामूहिक अवचेतन को आकार देने की प्रयोगशाला थी। सामूहिक खेल, व्यायाम, प्रार्थना और विचार-विनिमय के माध्यम से व्यक्तित्व को राष्ट्रोन्मुख बनाने का सतत प्रयास संघ ने किया।

संघ का यह दृष्टिकोण कि “व्यक्ति के निर्माण से समाज का निर्माण और समाज के निर्माण से राष्ट्र का निर्माण” होता है, भारतीय समाजशास्त्र और मनोविज्ञान दोनों के अनुकूल प्रतीत होता है। व्यक्ति को यदि अनुशासन, मूल्य और आदर्श मिलें तो वह समाज में सकारात्मक योगदान देता है। संघ ने यही कार्य किया और राष्ट्रवाद को केवल नारेबाजी से अलग एक जीवंत आचरण का रूप दिया।

देशभक्ति और राष्ट्रवाद संघ के लिए केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं रहे। यह व्यवहार और कार्य में अभिव्यक्त होते रहे। 1947 में स्वतंत्रता के उपरांत, जब भारत विभाजन के त्रासद दौर से गुज़र रहा था, लाखों शरणार्थियों की सेवा संघ स्वयंसेवकों ने की। यह सेवा कार्य केवल मानवीय संवेदना का परिचायक नहीं था, बल्कि यह उस राष्ट्रवादी दृष्टि का विस्तार था जो हर भारतीय को परिवार का सदस्य मानती थी। यही दृष्टिकोण बाद में विभिन्न आपदाओं में संघ के स्वयंसेवकों की सक्रिय उपस्थिति के रूप में दिखता है—चाहे वह प्राकृतिक आपदाएँ हों, युद्धकाल की परिस्थितियाँ हों या सामाजिक सुधार के अभियान।

संघ के कार्यों को यदि सामाजिक मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि संघ ने भारतीय समाज में आत्मविश्वास जगाया। शताब्दियों की दासता और उपनिवेशवाद ने भारतीय मानस में हीनभावना भर दी थी। संघ की शाखाओं ने उस हीनता को तोड़ा और व्यक्तियों को यह विश्वास दिलाया कि वे राष्ट्र की रीढ़ हैं। यह आत्मविश्वास सामाजिक परिवर्तन का आधार बना। यही कारण है कि संघ से प्रेरित अनेक संगठनों और आंदोलनों ने शिक्षा, सेवा, आदिवासी कल्याण, ग्रामीण विकास और राष्ट्रीय एकता के क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान किया।

लोगों की संघ के प्रति आस्था का एक बड़ा कारण यह भी है कि संघ ने केवल विचार प्रस्तुत नहीं किए, बल्कि स्वयंसेवकों के माध्यम से उन्हें जीवन में उतारा। “सेवा ही संगठन” का भाव केवल नारा नहीं रहा, बल्कि लाखों स्वयंसेवकों की दिनचर्या का हिस्सा बना। संघ ने एक अनुशासित और नैतिक बल का निर्माण किया, जिसने राष्ट्रवाद को ठोस सामाजिक रूप दिया। यही कारण है कि संघ आज केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक जनआंदोलन जैसा प्रतीत होता है।

100 वर्षों की इस यात्रा में संघ ने अनेक आलोचनाएँ भी झेली हैं। उसे सांप्रदायिक कहकर आरोपित किया गया, राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित कहा गया और कभी-कभी उसे समाज को विभाजित करने का दोष भी दिया गया। किंतु इन आलोचनाओं के बीच भी संघ का कार्य सतत जारी रहा और समाज में उसका प्रभाव बढ़ता गया। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि आलोचनाओं ने संघ को और अधिक दृढ़ बनाया। इसके स्वयंसेवकों ने इन्हें चुनौती के रूप में लिया और अपने कार्यों को अधिक निष्ठा से जारी रखा।

संघ की शताब्दी यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि इसने समाज में संगठन और एकता की भावना पैदा की। आज जब भारतीय समाज वैश्विकरण, उपभोक्तावाद और सांस्कृतिक आक्रमण के दौर से गुजर रहा है, संघ की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यह केवल परंपरागत मूल्यों की रक्षा का कार्य नहीं कर रहा, बल्कि नये क्षितिज की ओर भी अग्रसर है। तकनीक, शिक्षा और आधुनिकता को आत्मसात करते हुए भी संघ भारतीय संस्कृति की जड़ों को सुदृढ़ करने का कार्य कर रहा है।

भविष्य के परिप्रेक्ष्य में संघ की भूमिका और भी व्यापक दिखाई देती है। “नये क्षितिज” का अर्थ है—भारतीयता को वैश्विक संदर्भ में प्रस्तुत करना, समाज में समरसता और समानता की स्थापना करना, और राष्ट्रवाद को संकीर्ण परिभाषा से निकालकर मानवता के व्यापक हित में खड़ा करना। संघ का यह दृष्टिकोण कि “विश्व को परिवार” के रूप में देखा जाए, नये युग का मार्गदर्शन कर सकता है।

संघ की शताब्दी यात्रा पर गहराई से विचार करते हुए यह कहना समीचीन होगा कि यह केवल संगठन की यात्रा नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज की आत्मा की यात्रा है। यह उस चेतना की यात्रा है जिसने गुलामी से मुक्ति पाई, आत्मविश्वास प्राप्त किया और अब विश्व पटल पर अपने अस्तित्व को नई ऊर्जा के साथ प्रस्तुत कर रही है।

संघ ने राष्ट्रवाद और देशभक्ति को केवल नारों तक सीमित नहीं रखा। इसे जीवन का आचरण बनाया, सेवा का रूप दिया और संगठन के माध्यम से समाज में उतारा। लोगों की आस्था और विश्वास इसी कारण संघ से जुड़ा है, क्योंकि यह केवल विचार नहीं, बल्कि आचरण और सेवा का प्रतीक है।

आज 100 वर्ष की इस यात्रा के बाद जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो एक विराट परिदृश्य सामने आता है—लाखों स्वयंसेवक, हजारों शाखाएँ, सैकड़ों सेवा परियोजनाएँ और करोड़ों लोगों का विश्वास। यह उपलब्धि केवल किसी संगठन की नहीं है, बल्कि यह उस राष्ट्र की है जिसने अपनी चेतना को पुनः जगाया है।

भविष्य की ओर दृष्टिपात करते हुए यह अपेक्षा की जा सकती है कि संघ आने वाले समय में और अधिक व्यापक सामाजिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक कार्यों को आगे बढ़ाएगा। यह नये क्षितिज पर भारत को एक आत्मनिर्भर, आत्मगौरवशाली और विश्वगुरु के रूप में स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त करेगा।

संघ की 100 वर्ष की यात्रा हमें यह सिखाती है कि राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि यह सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक चेतना है। यह चेतना ही लोगों के जीवन में विश्वास, ऊर्जा और दिशा देती है। संघ ने इस चेतना को समाज के जीवन में रोपा और उसे पल्लवित किया। यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

इस प्रकार “100 वर्ष की संघ यात्रा” केवल अतीत की स्मृति नहीं है, बल्कि भविष्य का संकल्प भी है। यह यात्रा हमें यह विश्वास दिलाती है कि जब समाज संगठित होता है, जब राष्ट्र की चेतना जागती है और जब सेवा को सर्वोपरि रखा जाता है, तभी नये क्षितिज निर्मित होते हैं। संघ ने यह कार्य किया है और आगे भी करता रहेगा।

इस प्रकार “100 वर्ष की संघ यात्रा” का निष्कर्ष निकाला जाए तो निम्नलिखित बिंदुओं में इसे सूक्ष्म रूप में समझा जा सकता है -

1. संघ की शताब्दी यात्रा : केवल संगठन नहीं, चेतना की यात्रा।

2. 1925 में स्थापना : विभाजित समाज में एकात्मता का संकल्प।

3. राष्ट्रवाद की व्यापक अवधारणा : राजनीति से परे सांस्कृतिक स्वराज्य।

4. शाखा पद्धति : व्यक्ति-निर्माण से राष्ट्र-निर्माण तक

5. सेवा कार्य : शरणार्थियों से आपदाओं तक मानवीय संवेदना का विस्तार।

6. आलोचनाओं के बीच दृढ़ता : चुनौतियों को अवसर में बदलने की क्षमता।

7. सामाजिक-मनौवैज्ञानिक योगदान : आत्मविश्वास और संगठन का निर्माण।

8. वैश्वीकरण और सांस्कृतिक आक्रमण के दौर में संघ की प्रासंगिकता।

9. नये क्षितिज : विश्व को परिवार मानने की दृष्टि।

10. भविष्य का संकल्प : आत्मनिर्भर और विश्वगुरु भारत की ओर।

मंगलवार, 26 अगस्त 2025

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और युवा शक्ति: 21वीं सदी की चुनौतियाँ ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और युवा शक्ति: 21वीं सदी की चुनौतियाँ

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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भारत माता की संतानो, जब हम आज के भारत की तस्वीर पर दृष्टि डालते हैं तो सबसे पहले हमारी दृष्टि इस देश की युवा शक्ति पर ठहरती है। यही युवा इस राष्ट्र की धड़कन हैं, इसकी ऊर्जा हैं और भविष्य की दिशा भी। विश्व की सबसे बड़ी युवा जनसंख्या भारत के पास है और यही हमारे लिए सबसे बड़ा वरदान है। यदि यह विराट ऊर्जा सही दिशा में प्रवाहित हो तो भारत पुनः विश्वगुरु के सिंहासन पर प्रतिष्ठित हो सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने आरंभ से ही इस सत्य को पहचाना और अपना मूलमंत्र बनाया—“राष्ट्र प्रथम”। संघ जानता है कि यदि युवा जागता है तो राष्ट्र जागता है, और यदि युवा शिथिल हो जाता है तो राष्ट्र भी जर्जर हो जाता है।

संघ की शाखाओं में खिलखिलाते बाल स्वयंसेवकों का अनुशासनबद्ध खेल, प्रार्थना और समरसता यह प्रमाणित करते हैं कि राष्ट्रनिर्माण कोई पुस्तक का अध्याय नहीं बल्कि जीवन का साधना-पथ है। संघ ने हमेशा युवाओं को केवल दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय साधक बनाया है। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था—“मुझे केवल सौ ऊर्जावान, पवित्र और निःस्वार्थ युवा मिल जाएँ तो मैं भारत का कायाकल्प कर दूँ।” यह वचन आज भी संघ की शाखाओं में गूंजता है और युवाओं को यह स्मरण कराता है कि उनकी ऊर्जा केवल व्यक्तिगत सफलता के लिए नहीं, अपितु राष्ट्र के उत्कर्ष के लिए है।

इतिहास साक्षी है कि जब-जब युवाओं ने अपने आत्मबल को राष्ट्र के लिए समर्पित किया, भारत ने नई दिशा पाई। छत्रपति शिवाजी महाराज ने युवावस्था में ही संकल्प लिया था कि भारत की धरती पर विदेशी सत्ता को स्वीकार नहीं करेंगे। छत्रपति शिवाजी महाराज का स्वराज्य केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं था, बल्कि भारतीय समाज के आत्मविश्वास, स्वतंत्रता और न्याय की अनवरत यात्रा की शुरुआत थी। छत्रपति शिवाजी महाराज का स्वराज्य केवल सत्ता या राजसिंहासन पाने का सपना नहीं था, बल्कि यह था जनता के हक़ और आत्मसम्मान का आंदोलन। उनके लिए राज्य का अर्थ था—जनकल्याण, धर्म-सहिष्णुता, न्याय और सुरक्षा। राजनीतिक दृष्टि से उनका स्वराज्य आज भी प्रेरणा है। उन्होंने सत्ता को वंश परंपरा की जागीर नहीं, बल्कि जनता की जिम्मेदारी माना। उनकी शपथ थी कि—“यह स्वराज्य दैवप्रदत्त नहीं, बल्कि परिश्रम, साहस और त्याग से अर्जित करना है।” यही आत्मगौरव आज के युवाओं में भी जागृत होना चाहिए। (RSS) संघ इस चेतना को जगाता है कि भारतीयता केवल शब्द नहीं, बल्कि आत्मा का घोष है।

21वीं सदी के युवाओं के सामने चुनौतियाँ भी कम नहीं। बेरोजगारी, कौशल की कमी, नशाखोरी, मानसिक तनाव और पश्चिमी उपभोक्तावादी संस्कृति ने युवाओं के मार्ग में अनेक अवरोध खड़े किए हैं। सोशल मीडिया का मायाजाल उन्हें आभासी जगत में खींच लेता है, जहाँ वास्तविक जीवन की कठोर साधना के स्थान पर त्वरित सुख और दिखावे की प्रवृत्ति पनपती है। ऐसे समय में संघ का अनुशासन युवाओं को दिशा देता है। डॉ. हेडगेवार जी ने कहा था—“हमारा लक्ष्य ऐसा राष्ट्र निर्माण है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपने को हिंदू संस्कृति का प्रहरी समझे।” यही प्रहरी बनने के लिए युवा शक्ति को आत्मानुशासन और राष्ट्रभावना से सुसज्जित करना अनिवार्य है।

संघ के जीवन में खेल, प्रार्थना और सेवा केवल औपचारिकताएँ नहीं, बल्कि जीवन के प्रशिक्षण मंत्र हैं। गुरुजी गोलवलकर जी ने स्पष्ट कहा था—“व्यक्ति बनता है तो राष्ट्र बनता है। व्यक्ति गिरता है तो राष्ट्र भी गिरता है।” अतः संघ पहले व्यक्ति का निर्माण करता है, उसके चरित्र को दृढ़ करता है और फिर उसी व्यक्ति से राष्ट्र की सेवा का बीज बोता है। जब लाखों स्वयंसेवक प्रतिदिन शाखाओं में खेलते, सीखते और सेवा का संकल्प लेते हैं तो वे केवल स्वयं को नहीं गढ़ते, वे भारत के भविष्य को गढ़ते हैं।

शिक्षा और कौशल विकास में भी संघ की दृष्टि अत्यंत व्यापक रही है। शिक्षण संस्थानों, गुरुकुलों और विभिन्न वैचारिक मंचों के माध्यम से युवाओं को केवल पाठ्यपुस्तक नहीं, बल्कि जीवन-पुस्तक पढ़ाई जाती है। यह शिक्षा उन्हें स्वावलंबन की राह दिखाती है। यही कारण है कि संघ-प्रेरित अनेक संगठन ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं को रोजगार और उद्यमिता की ओर अग्रसर कर रहे हैं।

21वीं सदी के भारत में सामाजिक चुनौतियाँ भी गंभीर हैं। जातिवाद, संप्रदायवाद और असमानता की दीवारें अभी भी समाज में विद्यमान हैं। लेकिन संघ का प्रयास इन्हें तोड़कर एक अखंड भारत की रचना करना है। संघ महिलाओं को समाज की आधी शक्ति मानता है और उनके सशक्तिकरण को आवश्यक मानता है। आपदाओं के समय संघ-प्रेरित स्वयंसेवकों का सेवाकार्य विश्व ने देखा है—चाहे भूकंप हो, बाढ़ हो या महामारी, संघ के कार्यकर्ता प्रथम पंक्ति में खड़े मिलते हैं। यह सेवा केवल राहत का कार्य नहीं, बल्कि “समाज मेरा परिवार है”, 'मैं मेरे राष्ट्र के लिए ' होने का एक जीवंत भावात्मक उदाहरण है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दृष्टि अद्वितीय है। आज प्रवासी भारतीय युवा दुनिया के कोने-कोने में भारतीय संस्कृति का गौरवपूर्ण ध्वज फहरा रहे हैं। “वसुधैव कुटुंबकम्” का आदर्श केवल ग्रंथों तक सीमित न रहकर व्यवहार में भी जीवन बन जाए—संघ इसी दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है। वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने स्पष्ट कहा है—“युवा अपने जीवन का उद्देश्य केवल स्वयं के लिए न खोजें, बल्कि राष्ट्र के लिए तय करें, तभी जीवन सार्थक और प्रेरक होगा।” यही संदेश आज की पीढ़ी के लिए सबसे प्रासंगिक और प्रेरक है।

निस्संदेह, संघ पर समय-समय पर आलोचनाएँ भी होती रही हैं। उसकी राजनीति से निकटता या वैचारिक दृष्टिकोण पर प्रश्न उठते हैं। किंतु सत्य यह है कि संघ का मूल कार्यक्षेत्र राजनीति नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण है। संघ जानता है कि यदि समाज सुदृढ़ और सशक्त होगा, तो राजनीति स्वतः ही राष्ट्रहित में संचालित होगी। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने कहा था—“राष्ट्रवाद कोई संकुचित अवधारणा नहीं, यह तो प्राणों में बसने वाला भाव है।” यही भाव संघ के कार्यकर्ता को प्रेरित करता है कि वह हर परिस्थिति में राष्ट्र के लिए समर्पित रहे, स्वयं परिश्रम करे, पूरी ईमानदारी और मेहनत से राष्ट्र के विकास में योगदान दे। जब व्यक्ति अपने कर्तव्यों और परिश्रम को अपने जीवन का आधार बनाएगा, तभी राष्ट्र के लिए सच्चा समर्पण संभव होगा और यही भाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सबसे बड़ी शक्ति है।

आज का भारत अवसरों का देश है। विज्ञान, तकनीक और नवाचार के क्षेत्र में हमारी युवा पीढ़ी वैश्विक मानचित्र पर अपनी विशिष्ट पहचान बना रही है। किंतु यदि यह अद्भुत प्रतिभा राष्ट्र से कटकर केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित रह गई, तो उसका वास्तविक मूल्य समाप्त हो जाएगा। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था—“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” यह लक्ष्य केवल व्यक्तिगत सफलता का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के उत्थान और सामूहिक गौरव का होना चाहिए।

संघ की शाखाओं में साधारण दिखने वाले स्वयंसेवक ही इस अदृश्य, अटूट शक्ति के प्रतीक हैं। उनका जीवन न किसी पुरस्कार की आकांक्षा में बंधा है, न प्रसिद्धि की लालसा में लिप्त, बल्कि पूरी तरह राष्ट्र की सेवा में निःस्वार्थ रूप से समर्पित है। यही जीवनशैली, यही अडिग आत्मानुशासन, और यही प्रखर राष्ट्रप्रेम आज के युवा के लिए प्रकाशस्तंभ है—जो उन्हें सिर्फ मार्ग दिखाता नहीं, बल्कि उनके हृदय में जागरूकता और साहस की अग्नि प्रज्ज्वलित करता है।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि 21वीं सदी भारत के लिए अवसरों और चुनौतियों का युग है। यदि हमारी युवा शक्ति राष्ट्र के प्रति सजग, कर्तव्यनिष्ठ और समर्पित हो जाए, तो न केवल भारत पुनः विश्वगुरु बन सकता है, बल्कि वह समग्र मानवता के लिए मार्गदर्शक भी बन सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल एक संगठन नहीं, बल्कि युवाओं का प्रेरक, मार्गदर्शक और संस्कारयुक्त साधक है। छत्रपति शिवाजी महाराज जी की अद्भुत वीरता, स्वामी विवेकानंद जी का प्रखर साहस, आदरणीय डॉ. हेडगेवार जी का दूरदर्शी दृष्टिकोण, गुरुजी गोलवलकर जी का चरित्र निर्माण और आदरणीय मोहन भागवत जी का आह्वान—इन सभी का अद्भुत संगम ही संघ की पहचान है और यही शक्ति युवाओं को राष्ट्र के प्रति उत्साहित करती है।

आज भारत की युवा शक्ति से यही आह्वान है—भारत माता की सेवा ही परम धर्म है, और राष्ट्र का उत्थान ही जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य। यदि हर युवा अपने कर्तव्य का निर्वहन उत्तरदायित्व और निष्ठा के साथ करे, सतत परिश्रम, नैतिक चरित्र और मानवीय मूल्यों को अपना आधार बनाए, जन सरोकार और पर्यावरण जैसे जीवनदायिनी मुद्दों के प्रति आस्था प्रकट करे और शिक्षा, ज्ञान, चिकित्सा, कृषि तथा विज्ञान–तकनीक के विविध क्षेत्रों में ईमानदारीपूर्वक राष्ट्रहित में कार्य करे—तो निश्चित ही भारत वैश्विक स्तर पर एक अद्वितीय पहचान स्थापित करेगा। तब आने वाली पीढ़ियाँ श्रद्धा से कहेंगी—“भारत पुनः जगतगुरु बना, और समस्त मानवता ने यहाँ आकर सत्य, ज्ञान और जीवन का मार्ग पाया।”


शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) धर्म, संस्कृति और मानवता : राष्ट्रवाद के विशेष संदर्भ - ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) धर्म, संस्कृति और मानवता : राष्ट्रवाद के विशेष संदर्भ -

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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भारतभूमि की आत्मा उसके प्राणतत्व में निहित है, और वह प्राणतत्व है—सनातन धर्म। युगों से यह भूमि न केवल ऋषियों-मुनियों का तपोवन रही है, बल्कि धर्म, संस्कृति और मानवता का अखंड स्रोत भी रही है। जब-जब विश्व ने अंधकार और असंतुलन का सामना किया, तब-तब इस धरती से यह उद्घोष गूँजा—“आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।” यही उद्घोष मानवता की रक्षा, संस्कृति की रक्षा और राष्ट्रवाद की सशक्त घोषणा है। इसी भाव को नवजागरण की धारा प्रदान करता है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिसके स्वर से गूँजता है हिंदुत्व का शंखनाद और सनातन संस्कृति का विजयगान।

मानव जीवन की परिभाषा मात्र भौतिक उपलब्धियों और सांसारिक सुखों तक सीमित नहीं है। जब तक जीवन में धर्म की आधारशिला, संस्कृति की छवि और मानवता की सुवास न हो, तब तक मनुष्य पूर्ण नहीं माना जा सकता। यही दृष्टि भारत की आत्मा है और यही भावनाएँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरक धारा के रूप में प्रवाहित होती रही हैं।

सनातन धर्म कोई एक पंथ या संप्रदाय का नाम नहीं, यह तो वह शाश्वत सत्य है जो अनादि से प्रवाहित है। यह केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन का पूर्ण दर्शन है। संघ इसी सत्य का प्रतिपादन करता है कि धर्म तभी जीवित है जब वह आचरण में उतरे। व्यक्ति, समाज और राष्ट्र तभी सशक्त होंगे जब उनका चरित्र धर्म और संस्कृति से ओत-प्रोत होगा। यही धर्म का मर्म है और यही राष्ट्रवाद की आत्मा है—जहाँ प्रत्येक नागरिक स्वयं को राष्ट्र की आत्मा से अभिन्न मानता है।

आज का युग उपभोक्तावाद और भौतिकता की अंधी दौड़ का है। मनुष्य ने अपने अस्तित्व को केवल सुख-सुविधाओं में बाँध लिया है। किंतु संघ स्मरण कराता है कि भारतीयता का मापदंड केवल भौतिक भोग नहीं, बल्कि त्याग, संयम, सेवा और आत्मानुशासन है। स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था—“उठो, जागो और अपने लक्ष्य की प्राप्ति तक रुको मत।” यह आह्वान केवल आत्मोत्थान का नहीं था, बल्कि राष्ट्रोत्थान का भी था। विवेकानंद का राष्ट्रवाद इसी में निहित था कि प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर की शक्ति को पहचानकर राष्ट्र के लिए समर्पित हो। संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक इसी विचार का संवाहक है।

संघ के कार्यों में हम देखते हैं कि धर्म और संस्कृति कोई संग्रहालय की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन का प्रवाहमान स्वरूप हैं। शाखाओं में साधारण स्वयंसेवक जब गीत गाता है, प्रार्थना करता है, दंड उठाता है, तो वह केवल व्यायाम नहीं करता—वह राष्ट्रवाद का संस्कार अपने भीतर भरता है। यह परंपरा केवल अनुशासन की नहीं, बल्कि आत्मगौरव और राष्ट्रीय अस्मिता की यात्रा है।

हिंदू धर्म की विशालता यह है कि वह किसी को पराया नहीं मानता। उसका उद्घोष है—“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।” यही सार्वभौमिक दृष्टि भारत को विश्वगुरु बनाती है। संघ इसी दृष्टि को व्यवहार में उतारने का प्रयत्न करता है। हिंदू राष्ट्र का विचार किसी संकीर्णता का नाम नहीं, बल्कि इस विराट दृष्टि की परिणति है। हिंदू राष्ट्र का अर्थ है वह राष्ट्र जो धर्म, संस्कृति और मानवता के मूल्यों पर आधारित हो। यही राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप है।

भारतीय इतिहास गवाह है कि यहाँ की संस्कृति ने सदैव मानवता का संरक्षण किया। जब रोमन साम्राज्य का वैभव समाप्त हो रहा था, तब नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों से ज्ञान की गंगा प्रवाहित हो रही थी। जब यूरोप अंधकार युग में डूबा था, तब भारत के उपनिषद मानवता के लिए प्रकाश बनकर जगमगा रहे थे। गुरु गोविंद सिंह ने अपने जीवन से यह सिखाया कि राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए बलिदान ही सच्चा आभूषण है। उनके जीवन का प्रत्येक क्षण इस बात का प्रमाण है कि धर्म और राष्ट्रवाद एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं।

भाषा संस्कृति की आत्मा है। संघ का आग्रह है कि मातृभाषा का संरक्षण हो। अंग्रेज़ी या अन्य भाषाएँ ज्ञान अर्जन का साधन हो सकती हैं, लेकिन आत्मा की अभिव्यक्ति मातृभाषा में ही संभव है। रामकृष्ण परमहंस जी ने कहा था—“धर्म को अनुभव करो, केवल चर्चा मत करो।” यह अनुभव तभी संभव है जब भाषा में आत्मीयता हो। मातृभाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि संस्कृति और राष्ट्रवाद का वाहक है।

संघ की सेवा-परंपरा में मानवीय सरोकारों का अद्वितीय रूप दिखाई देता है। बाढ़, भूकंप, महामारी या किसी भी संकट की घड़ी हो, संघ का स्वयंसेवक बिना भेदभाव के सहायता करता है। यह सेवा केवल परोपकार नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद का जीता-जागता उदाहरण है। छत्रपति शिवाजी महाराज जी ने भी अपने जीवन से यह दिखाया कि राष्ट्र की सेवा ही धर्म की सर्वोच्च साधना है। छत्रपति शिवाजी महाराज जी ने अपने पराक्रम से हिंदवी स्वराज्य की स्थापना कर यह संदेश दिया कि राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक अवधारणा नहीं, बल्कि संस्कृति और धर्म की रक्षा का संकल्प है।

भारतीय संस्कृति का आदर्श है—“परहित सरिस धर्म नहीं भाई।” जब हम परहित को धर्म मानते हैं, तभी संवेदनाएँ जागृत होती हैं। संघ का उद्देश्य ऐसा समाज गढ़ना है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्रहित में अपने जीवन को समर्पित करे। यही वह राष्ट्रवाद है जहाँ व्यक्तिगत स्वार्थ मिटकर समाज और राष्ट्र के लिए जीवन खिला देता है।

हिंदुत्व का शंखनाद केवल धार्मिक उद्घोष नहीं, यह राष्ट्रीय आत्मगौरव का उद्घोष है। यह स्मरण दिलाता है कि हम सनातन परंपरा के उत्तराधिकारी हैं। हिंदुत्व का अर्थ संकीर्णता में बंधना नहीं, बल्कि सार्वभौमिकता में विस्तार पाना है। यही शंखनाद जब समाज में गूँजता है तो प्रत्येक नागरिक के भीतर राष्ट्रवाद का दीपक प्रज्ज्वलित होता है।

आज आवश्यकता है कि हम इन आदर्शों को जीवन में उतारें। यदि धर्म केवल ग्रंथों में रहेगा तो वह मृत हो जाएगा, यदि संस्कृति केवल उत्सवों में सिमट जाएगी तो उसका जीवंत स्वरूप समाप्त हो जाएगा। संघ हमें प्रेरित करता है कि धर्म को आचरण में, संस्कृति को व्यवहार में और राष्ट्रवाद को आत्मगौरव में उतारें। यही जीवन की सच्ची साधना है।

संघ के शताब्दी की ओर अग्रसर कार्यकाल ने सिद्ध कर दिया है कि राष्ट्र-निर्माण केवल राजनीति से संभव नहीं। सत्ता बदल सकती है, लेकिन समाज का चरित्र यदि जाग्रत हो जाए तो राष्ट्र स्थायी रूप से सशक्त हो जाता है। यही राष्ट्रवाद का वास्तविक स्वरूप है—चरित्र, संस्कृति और सेवा का समन्वय।

सनातन संस्कृति हमें यह सिखाती है कि जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल भोग नहीं, बल्कि मोक्ष है। भौतिकता की चमक में जब मनुष्य अपना पथ भूल जाता है, तब संघ स्मरण कराता है कि तुम्हारा लक्ष्य केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि राष्ट्र की सेवा और मानवता की उन्नति है। यही राष्ट्रवाद है जहाँ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा राष्ट्रहित में बदल जाती है।

अंततः यही कहा जा सकता है कि धर्म, संस्कृति और मानवता—ये तीनों एक ही सूत्र में गुँथे हुए हैं। धर्म हमें आचरण की दिशा देता है, संस्कृति हमें गौरव और पहचान देती है, और मानवता हमें सेवा और करुणा की प्रेरणा देती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इन तीनों का संगम है। उसका प्रत्येक स्वर, प्रत्येक कार्य, प्रत्येक संदेश यही उद्घोष करता है कि हिंदुत्व का जागरण ही सच्चा राष्ट्रवाद है और यही राष्ट्रवाद संपूर्ण मानवता का उत्थान है। जब यह जागरण होगा तभी विश्व में शांति, करुणा और सद्भाव की स्थापना होगी। यही वह विजयघोष है जो आने वाले युगों में ध्वनित होता रहेगा।

बुधवार, 20 अगस्त 2025

महादेव का डमरू (कहानी) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

महादेव का डमरू (कहानी) 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत 


कैलाश की श्वेत शिखर-मालाएँ रात के अंधेरे में स्वर्णाभ चमक रही थीं। चंद्रमा का दूधिया प्रकाश जब बर्फ की परतों पर बिखरता, तो ऐसा लगता मानो स्वयं चंद्रशेखर अपनी जटाओं से अमृत झर रहे हों। देवदार और चीड़ के वृक्षों पर ठहरी बर्फ की शांति वैसी ही थी जैसी स्थाणु की अचलता—जो काल और परिस्थिति के पार खड़ी रहती है। हवा शाखाओं से टकराकर गूँजती तो लगता मानो किसी अदृश्य स्वर में महाकाल का उद्घोष हो रहा हो, और झरनों की कल-कल लय, शिलाओं की निस्तब्धता के साथ मिलकर आदियोगी का शाश्वत संगीत रच रही हो।

आकाश के तारे हिमालय की धवल शिखाओं पर बिखरे स्वर्ण कण जैसे चमकते, मानो त्रिलोचन की तीसरी आँख से झरते दिव्य नक्षत्र हों। बर्फ की ढलानों पर चाँदनी की आभा ऐसी प्रतीत होती जैसे शशिभूषण का मस्तक धरती पर अपनी आभा बिखेर रहा हो। हिमगुफाओं से उठती श्वेत धुंध में ऐसा लगता जैसे महेश्वर की श्वासें ब्रह्मांड में विलीन होकर आकाश से संवाद कर रही हों। मंद-मंद बहती बयार में देवदार की सुगंध घुलकर ऐसा आभास देती मानो गंगाधर की धारा हवा के साथ झर रही हो। दूर हिमशिखरों से दूध जैसी धाराएँ बहतीं, तो प्रतीत होता जैसे स्वयं शम्भु करुणामयी अंचल खोलकर जगत को आशीष दे रहे हों।

पूरा दृश्य केवल सौंदर्य का नहीं, बल्कि संकेत का चित्र था—मानो प्रकृति स्वयं कह रही हो कि कोई अदृश्य शक्ति अपने विराट आगमन की तैयारी कर रही है। हर बर्फ का कण भूतनाथ का स्तवन कर रहा था, हर तारा महेश्वर की झलक बन चमक रहा था, और हर हवा की लहर महाकालेश्वर के नाद में बदल रही थी। यह समूची वसुंधरा, यह आकाश, यह निस्तब्धता—सब मिलकर पर्दा उठा रहे थे उस अनन्त नाटक का, जिसमें प्रवेश करने वाले थे स्वयं नटराज। और तभी वातावरण में पहली बार गूँजी वह थाप, जो न केवल समय को चीरती थी बल्कि अनन्तता का उद्घोष करती थी—“ॐ नमः शिवाय।”

महादेव इस विराट निस्तब्धता के केंद्र में अविचल ध्यानमग्न बैठे थे। उनके आगमन से मानो सम्पूर्ण प्रकृति अपनी श्वास रोककर खड़ी हो गई हो। उनके विशाल कंधों पर बर्फ के शिखरों की उज्ज्वल आभा विराजमान थी और उनकी जटाओं से झरते गंगाजल की बूँदें धरती को ऐसे सींच रही थीं जैसे ब्रह्मांड का अमृत टपक रहा हो। हिमालय की चोटियाँ उनकी पीठ के पीछे प्रहरी की तरह खड़ी थीं, और आकाश उनके ललाट का तिलक बन गया था।

वातावरण में अचानक एक भयंकर गंभीरता उतर आई। पहाड़ों की दरारों से गर्जन की ध्वनियाँ निकलने लगीं, मानो शिलाएँ स्वयं अपने भीतर छिपे रहस्यों को उद्घाटित करने लगी हों। आकाश में घूमते बादल बिजली की तलवारें चमकाने लगे और ऐसा प्रतीत हुआ मानो सृष्टि स्वयं किसी अदृश्य युद्ध की तैयारी कर रही हो। देवदार के वृक्ष हवा से काँप उठे, उनकी शाखाएँ किसी अज्ञात भय में करुण स्वर निकालने लगीं। दूर के झरनों की गर्जना भी एकाएक तीव्र हो गई, जैसे उनके भीतर की धाराएँ महादेव के स्वरूप को प्रणाम कर रही हों।

उनकी आँखों में शून्य की गहराई और अग्नि की दहकन साथ-साथ दिखाई देती थी। उनके चरणों के पास बैठा नंदी अचल पर्वत जैसा स्थिर था, पर उसकी आँखों में गर्व और श्रद्धा की ज्वाला नृत्य कर रही थी। उनके कंठ से निकलती मंद ध्वनि में समुद्र की गरज, अग्नि की चटकन और आकाश की गूँज समाहित थी।

और फिर—उनके हाथों में वह डमरू था, जिसकी एक थाप सृष्टि को हिला देने की सामर्थ्य रखती है। जब उन्होंने उसे उठाया, तो ऐसा लगा मानो समय अपनी धड़कन भूल गया हो। पर्वत हिल उठे, नदियाँ ठिठक गईं, हवाएँ सन्नाटे में बदल गईं, और वृक्षों ने अपनी शाखाएँ फैला दीं—मानो समस्त सृष्टि इस दिव्य ध्वनि के आलाप में सम्मिलित होने के लिए उतावली हो उठी हो।

स्वर्गलोक में जैसे ही डमरूकेश्वर महादेव की ध्वनि पहुँची, इन्द्रसभा की चकाचौंध अचानक काँच के महल की तरह दरकने लगी। सोने की दीवारें तड़ककर अपनी आभा खो बैठीं, इन्द्रासन हिल उठा मानो उसके नीचे की नींव ही खोखली हो गई हो। देवगण, जो अपने पद और अधिकारों की मखमली चादर में लिपटे हुए बैठे थे, अचानक ऐसे तिलमिला उठे जैसे किसी ने उनकी असलियत का नकाब नोच लिया हो।

अप्सराओं का नृत्य बीच आकाश में ही थम गया। उनके पाँव की पायलें बेसुरी होकर ऐसे झंकारने लगीं जैसे टूटे हुए वाद्ययंत्र। गीतों की तान अचानक बेमानी लगने लगी—मानो मधुरता का आवरण उतरते ही नग्न शोर बचा रह गया हो। स्वर्ण-मोती की चमक उस ध्वनि के आगे ऐसे लगने लगी जैसे मिट्टी में फेंके हुए काँच के टुकड़े।

इन्द्र का मुकुट डगमगाने लगा, और उसकी आँखों में पहली बार वह भय उतर आया जिसे वह सामान्यतः केवल मनुष्यों पर फेंकता था। देवता आपस में फुसफुसाकर पूछने लगे—“यह कैसी ध्वनि है जो हमें भीतर से खाली कर रही है? यह क्यों हमें हमारे ही वैभव पर संदेह करा रही है?” उनकी बेचैनी इस बात का प्रमाण थी कि डमरू की थाप ने उनके मनोमंदिर की दीवारें हिला दी थीं।

वह ध्वनि एक व्यंग्य बनकर उनके कानों में गूँजी—
“हे इन्द्र! तुम्हारा स्वर्ग केवल सजे हुए मंच का दृश्य है, वास्तविकता नहीं। तुम्हारा गर्व उसी तरह क्षणभंगुर है जैसे बादलों में बिजली की चमक, जो पल भर में बुझ जाती है। तुम्हारे रत्न, तुम्हारी आभा, तुम्हारी सत्ता—सब एक नाटक है, और यह नाटक डमरू की पहली थाप में ही धराशायी हो सकता है।”

स्वर्ग की दीवारों पर यह व्यंग्यात्मक प्रतिध्वनि ऐसे गूँज रही थी मानो ब्रह्मांड स्वयं आईना पकड़कर कह रहा हो—
“जिस वैभव को तुम अनंत समझते हो, वह महज सजावट है; असली स्वर्ग वहाँ है जहाँ नदी की धारा करुणा बनकर बहती है, जहाँ वनों की हरियाली जीवन की साँसें सँभालती है, और जहाँ बर्फ की श्वेतता में निस्पृहता की पवित्रता चमकती है।”

इन्द्रसभा में बैठे देवता पहली बार समझ रहे थे कि उनका भय वास्तव में सिंहासन खोने का नहीं, बल्कि अपने भीतर के शून्य से सामना करने का है।

मानव लोक में डमरूकेश्वर महादेव की थाप पहुँची तो वह किसी साधारण ध्वनि की तरह नहीं थी, बल्कि जैसे ब्रह्मांड ने एकाएक “फायर अलार्म” बजा दिया हो। शहरों की नीऑन लाइटें, जो रात को कृत्रिम दिन में बदल देती थीं, उस ध्वनि के सामने ऐसे बुझीं जैसे परीक्षा में नकल करते पकड़े गए छात्र अचानक बेंच पर झुक जाते हैं। गाड़ियों के हॉर्न, इंजन और ब्रेक की चीख उस गूँज में ऐसे थरथराने लगे मानो सारा यातायात खुद अपने पापों का चार्ट बनाकर ब्लैकबोर्ड पर टाँग दिया हो।

फैक्ट्रियों की चिमनियाँ, जो हर पल धुआँ उगलती थीं, डमरू की थाप पर खाँसते-खाँसते हाँफने लगीं। ऐसा लगा मानो खुद मशीनें यह स्वीकार कर रही हों कि वे सिर्फ प्रगति के नाम पर प्रदूषण की पर्ची बाँट रही थीं। नदियाँ, जिन्हें बाँधों की जंजीरों में जकड़ा गया था, अचानक बिफरकर गरज उठीं—“तुमने हमें कैद किया है, पर हर बूँद में विद्रोह है। हम वह विद्यार्थी हैं जिसे दबाया गया है, पर एक दिन यही बगावत पूरी कक्षा को हिला देगी।” जंगलों के ठूँठ, जो मौन गवाही देते खड़े थे, वे इस नाद में बोल उठे—“हमारी जड़ों को काटकर तुमने जो सभ्यता गढ़ी है, वही तुम्हारा प्रश्नपत्र बनेगी, और इस परीक्षा में तुम्हारे पास कोई उत्तर नहीं होगा।”

राजनीति की सभाओं में भूचाल आ गया। नेता अपने खोखले भाषणों से जनता को बहलाने लगे, पर डमरू की तान ने उनके वक्तव्यों को ऐसे उड़ा दिया जैसे किसी छात्र की कॉपी पर लाल स्याही से लिख दिया गया हो—“फेल।” उनकी नीतियाँ बर्फ पर लिखी घोषणाओं की तरह दिखने लगीं, जो धूप आते ही गायब हो जाती हैं।

मीडिया के पन्ने और स्क्रीन इस नाद के व्यंग्य में हँसने लगे। अखबारों की सुर्खियाँ अपने ही अक्षरों पर तंज कसने लगीं—“सत्य को दबाकर छापा नहीं जा सकता, जैसे गणित का गलत हल सौ बार लिखकर भी सही नहीं होता।” टीवी की बहसें, जिनमें एंकर शोर को ज्ञान समझकर परोसते थे, डमरू की गूँज में ऐसे लगने लगीं जैसे माइक से उल्टा करंट गुजर गया हो।

छात्र, जो इस सारे दृश्य को देखते हुए पीढ़ियों के भविष्य का गणित हल करने की कोशिश कर रहे थे, भीतर से काँप उठे। डमरू का हर नाद उन्हें यह समझा रहा था कि यह सभ्यता किसी प्रयोगशाला का असफल प्रयोग है—जहाँ मशीनें तो बनीं, पर मनुष्यता का “डेटा” खो गया। यह गूँज छात्रों को ऐसे सावधान कर रही थी जैसे परीक्षा हॉल में घंटी बजने से पहले चेतावनी दी जाती है—“समय कम है, उत्तर खोज लो, वरना कॉपी अधूरी रह जाएगी।”

महादेव का डमरू यहाँ महज़ वाद्य नहीं था, बल्कि एक क्वांटम चेतावनी था। उसने मानवलोक को दिखा दिया कि उनके सारे षड्यंत्र, चालाकियाँ और तकनीकी चमत्कार उस गूँज के आगे खिलौने हैं। यह नाद भयावह भी था और करुण भी—जैसे कोई शिक्षक आखिरी बार छात्र से कह रहा हो—
“पढ़ लो बेटा, वरना यह सृष्टि तुम्हारे नालायकी के लिए शून्य अंक लिख देगी।”

पाताल लोक में अंधकार पसरा था। यह अंधकार कोई साधारण अँधेरा नहीं था, बल्कि जैसे किसी “ब्लैक-हैट हैकर” का सर्वर रूम हो जहाँ षड्यंत्र डेटा पैकेट्स बनकर घूम रहे हों। नाग और असुर गुफाओं की दरारों में अपने योजनाओं की कोडिंग कर रहे थे—किस तरह तीनों लोकों के सिस्टम में घुसपैठ की जाए, कैसे “ट्रोजन” डालकर सत्ता को हैंग कर दिया जाए। उनकी फुसफुसाहटें वैसी थीं जैसे इंटरनेट के अंधेरे कोनों में गूँजती हुई डार्क वेब की गुप्त चैट।

तभी महादेव के डमरू की थाप वहाँ पहुँची।
वह कोई साधारण आवाज़ नहीं थी, बल्कि जैसे कॉस्मिक साउंड वेव ने फायरवॉल तोड़कर सीधा हैकिंग रूम में एंट्री मार दी हो।

अंधकार चीरकर वह ध्वनि गुफाओं में टकराई तो नागों के फन काँप उठे। उनकी आँखें वैसी फड़फड़ाईं जैसे किसी साइबर अपराधी की स्क्रीन अचानक “एरर 404” दिखाने लगे।

एक नाग ने काँपते हुए कहा—
“यह ध्वनि हमें चुभ रही है।”
दूसरे नाग ने उत्तर दिया—
“क्योंकि यह व्यंग्य है। यह हमें बता रही है कि हमारी चालाकियाँ उतनी ही क्षणिक हैं जितनी मोबाइल स्क्रीन पर टिक-टॉक वीडियो—कुछ सेकंड की चमक, फिर शून्य। और याद रखो, यह कोई सामान्य ध्वनि नहीं है—यह तो हमारे आराध्य डमरूकेश्वर महादेव का ही डमरू है, जो हमें सावधान कर रहा है कि अंधकार की सीमा यहीं समाप्त होती है।”

पाताल की दीवारें डमरू की गूँज से हिलने लगीं। गुफाओं में फैले षड्यंत्र कोड, हैकिंग प्लान और विषैले डेटा ऐसे राख हो गए मानो किसी ने “डिलीट ऑल” का बटन दबा दिया हो। असुरों की सेनाएँ, जो अपनी योजनाओं को बुलेटप्रूफ मान रही थीं, उस ध्वनि में ऐसे बिखर गईं जैसे गलत पासवर्ड डालने पर अकाउंट स्थायी रूप से ब्लॉक हो जाए।

पाताल लोक के प्राणी समझ गए कि उनका अंधकार कितना भी गाढ़ा क्यों न हो, प्रकाश का यह व्यंग्य हमेशा अपडेटेड सॉफ़्टवेयर की तरह होगा—पुराने वायरस को तुरंत ध्वस्त कर देगा।

अब गुफाओं की निस्तब्धता में वही गूँज बची थी जो चेतावनी बनकर कह रही थी—
“काला नेटवर्क चाहे जितना भी गहरा क्यों न हो, सत्य का नाद उसमें घुसकर सब फ़ाइलें करप्ट कर देगा।”

और फिर वह ध्वनि पहुँची जुगाड़लोक में—एक ऐसा लोक जिसे मनुष्य ने आधुनिक युग की अपनी सुविधा और अजीब मानसिकता से गढ़ा था। यहाँ हर समस्या का समाधान जुगाड़ से निकाला जाता था। मेहनत को तरकीब से रिप्लेस कर दिया गया था, ईमानदारी को “नेटवर्किंग” और “अप्रोच” से, और सत्य को “पीआर पैकेज” से ढँक दिया गया था। धर्म भी यहाँ विज्ञापन की स्क्रिप्ट बन चुका था—पोस्टर, बैनर और सेल्फी के फ्रेम में सजाकर। इस लोक के निवासी गर्व से कहते—“हम हर समस्या का हल निकाल लेंगे, बस एक नया जुगाड़ चाहिए।”

डमरू की थाप इस लोक में पहुँची तो सब कुछ उलट-पुलट हो गया। लोग अपनी मीटिंग्स, कॉन्फ्रेंस कॉल्स और भाषणों में व्यस्त थे। हर कोई पॉवरपॉइंट प्रेज़ेंटेशन में “सॉल्यूशन” दिखा रहा था। पर अचानक हवा में यह आवाज फैल गई कि उनके सारे जुगाड़ उतने ही खोखले हैं जितनी “कॉपी-पेस्ट की गई” रिपोर्ट। किसी ने कहा—“जलवायु परिवर्तन? प्रोजेक्ट प्रपोज़ल बना दो, फंडिंग आ जाएगी, भाषण दे दो, फोटो खिंचवा लो, सब ठीक हो जाएगा।” किसी और ने कहा—“नदी सूख रही है? सोशल मीडिया पर हैशटैग ट्रेंड करा दो, जनता को दिखाओ कि हम काम कर रहे हैं।” लेकिन डमरू की ध्वनि ने व्यंग्य करते हुए कहा—“तुम्हारी तरकीबें उतनी ही क्षणभंगुर हैं जितनी हवा में उठी धूल। सत्य को ढकने वाले सारे पर्दे डमरू की थाप में फट जाते हैं।”

जुगाड़लोक की चमचमाती इमारतें काँप उठीं, मशीनों की गूँज बौनी हो गई और तरकीबों के नकली परदे गिर गए। यहाँ तक कि वे लोग भी जो अपनी नौकरी जुगाड़ से पाई थी, जो प्रमोशन “नेटवर्किंग” से हासिल करते थे, और जो नेतागिरी प्रलोभनों के पैकेज बाँटकर करते थे—उनके सारे “फिट किए गए जुगाड़” ऐसे ढह गए जैसे नकली सर्टिफिकेट का सर्वर क्रैश हो जाए। वहाँ के निवासी अपनी ही हँसी में फँस गए। उनके सारे उपाय, सारे आविष्कार और सारे दिखावे उस व्यंग्यात्मक ध्वनि के सामने ऐसे खोखले प्रतीत हुए जैसे टूटा हुआ माइक किसी बड़े भाषण को बेसुरा कर दे।

महादेव की आँखें अब भी गंभीर थीं। उनमें करुणा की नमी थी, पर एक लोहे जैसी कठोरता भी। डमरू की हर थाप केवल ध्वनि नहीं, बल्कि एक ब्रह्मांडीय नोटिफिकेशन थी—सृष्टि को भेजा गया एक अनिवार्य अपडेट। उसने स्वर्गलोक को स्मरण कराया कि उनका वैभव केवल ट्रायल वर्ज़न है, जो कभी भी एक्सपायर हो सकता है। उसने मानव लोक को दिखाया कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना ऐसे है जैसे हार्डडिस्क को फॉर्मेट करके भी यह सोचना कि डेटा सुरक्षित रहेगा। उसने पाताल लोक को चेताया कि अंधकार में रचे गए षड्यंत्र उतने ही व्यर्थ हैं जितनी “स्पैम मेल्स”—जिन्हें अंततः डिलीट होना ही है। और उसने जुगाड़लोक को आईना दिखाया कि उनका हर जुगाड़ केवल शॉर्टकट की है—जो असली प्रोग्राम को कभी नहीं चला सकती।

प्रकृति का हर अंश इस संदेश में बोल उठा। नदी की धाराएँ करुणा बनकर बह रही थीं, जैसे जीवन की नाड़ियों में धड़कन। पहाड़ व्यंग्य के प्रहरी की भाँति खड़े थे, मानो यह कह रहे हों कि जो झूठ पर टिका है वह भूकंप की पहली थरथराहट में ढह जाएगा। वृक्ष अपनी शाखाओं से कह रहे थे—“हम गिरे तो भी हमारी जड़ें जीवित रहेंगी, और फिर से हरियाली लौट आएगी।” आकाश तारों से भरकर यह फुसफुसा रहा था कि अनंतता के सामने मनुष्य की सारी चालाकियाँ उतनी ही क्षणभंगुर हैं जितनी हवा में उठी धूल।

जब अंतिम थाप पड़ी, तो सम्पूर्ण सृष्टि मौन हो गई। नदी का कलकल थम गया, वृक्ष अपनी साँस रोककर खड़े हो गए, हवा की गति मानो समय से भी पीछे ठहर गई। पूरा ब्रह्मांड एक क्षण के लिए ठहरकर सुनने लगा। केवल प्रतिध्वनि गूँज रही थी—उसमें करुणा थी, व्यंग्य था, चेतावनी थी और एक गहरा आह्वान भी। महादेव ने डमरू को थाम लिया, पर उसकी गूँज अब भी हर लोक में बह रही थी। वह हर प्राणी से कह रही थी—“प्रकृति केवल दृश्य नहीं, चेतना है। उसे अनसुना करोगे तो उसका व्यंग्य तुम्हारे अहंकार को चूर कर देगा। सच्चा स्वर्ग, सच्चा धर्म और सच्चा जीवन उसी लय में है जिसमें मेरा डमरू बजता है।”

और तभी वह प्रतिध्वनि धीरे-धीरे एक अनंत स्वर में बदल गई—“ॐ…”। यह स्वर न आरंभ था, न अंत, वह बस अस्तित्व की धड़कन था। उसने नदियों को फिर से बहाया, वृक्षों को फिर से साँस दी, और आकाश में तारों को नई चमक। यह ध्वनि पर्वतों की चुप्पी में भी गूँज रही थी और मनुष्य के हृदय की गहराइयों में भी। पूरी सृष्टि उसी गूँज में डूब गई—मानो जगत की हर धड़कन अब उस एक स्वर में विलीन होकर कह रही हो कि यही अनादि-अनंत सत्य है।

रविवार, 17 अगस्त 2025

कॉन्ट्रैक्ट टीचर (कहानी) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

 कॉन्ट्रैक्ट टीचर (कहानी)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत 

बरसात के बाद का पहाड़ी इलाका हमेशा एक नई किताब की तरह खुलता है। धुले हुए आकाश में पहाड़ों की चोटियाँ साफ झलकती हैं, कहीं-कहीं बादल ऐसे टिके रहते हैं जैसे पहाड़ पर सफेद ओढ़नी डाल दी हो। गाँव की पगडंडियों पर छोटे-छोटे पोखर बन गए हैं जिनमें बच्चे छपाछप करते हुए कागज़ की नाव तैरा रहे हैं। झरनों की ध्वनि दूर से किसी अनसुनी बांसुरी जैसी लगती है। खेतों के किनारे बैठे बगुले, तालाब में तैरती मछलियाँ और गाँव के मंदिर से आती भजन की हल्की गूँज मिलकर एक विचित्र सांगीतिक दृश्य रचते हैं।

दोपहर के समय स्कूल के आँगन से मिड-डे मील की खुशबू उड़ रही है। कहीं दाल का उबाल, कहीं खिचड़ी की सोंधी गंध, और बच्चों के कानों में टीचर की आवाज़ के साथ-साथ थाली-गिलास की खनक भी घुली हुई है। यह पहाड़ है—जहाँ जीवन कठिन है पर रंगों से भरा हुआ भी।

इसी जीवन के केंद्र में है नितांत काम चलाऊ शिक्षक—कभी कॉन्ट्रैक्ट टीचर, कभी अतिथि शिक्षक, कभी संविदा शिक्षक कहलाने वाला वह पात्र, जो पूरे तंत्र की आत्मा भी है और उसकी सबसे कमजोर कड़ी भी।

बरसाती दोपहर में भीगी हुई पगडंडी से मास्टर जगत सिंह आ रहे थे। उनकी छतरी टेढ़ी थी—मानो व्यवस्था की रीढ़ की तरह झुकी हुई। जूतों पर चिपका कीचड़ किसी सरकारी फाइल की धूल जैसा था—जो न धुलता है, न हटता है।

आँगन में पहुँचते ही बच्चे एक स्वर में बोले—

“गुड मॉर्निंग सर!”

जगत सिंह मुस्कराए—

“गुड मॉर्निंग… और गुड लक भी, क्योंकि आज बिजली नहीं है, तो टेस्ट हाथ से लिखवाना पड़ेगा। यह भी एक तरह का प्रायोगिक पाठ है—कि अंधेरे में भी लिखना सीखो।”

पास ही रसोई से खिचड़ी की खुशबू उठ रही थी। मिड-डे मील बाँटती रसोइया बोली—

“मास्साब, आज ज़रा जल्दी करा दीजिए, बरसात में बच्चे भूखे जल्दी हो जाते हैं।”

जगत सिंह ने हल्की हँसी में गहरी व्यथा छिपाते हुए कहा—

“भूख तो हमें भी जल्दी लग जाती है बहन जी… फर्क बस इतना है कि आपकी खिचड़ी वक्त पर पक जाती है, पर हमारी तनख्वाह हमेशा अधपकी रह जाती है।”

बच्चों की खिलखिलाहट, रसोइया की व्यस्तता और मास्टर की ठिठोली—तीनों मिलकर उस शिक्षा-तंत्र की सजीव तस्वीर रच रहे थे, जहाँ व्यंग्य ही अब जीवन की सबसे सच्ची भाषा बन चुकी है।

कक्षा में बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते वे खुद से बुदबुदा रहे थे—“इतनी बारिश में अगर सड़क बह जाए, तो अगली तनख्वाह भी किसी झरने में गुम हो जाएगी।”

बच्चे हँस पड़े। वे समझ नहीं पाए कि यह मज़ाक था या कटाक्ष।

पहाड़ी कस्बे के एक महाविद्यालय में कॉन्ट्रैक्ट लेक्चरर सुधा मैम किताबों का पुलिंदा सँभालती हुई क्लास में दाखिल हुईं। विषय था— हिंदी साहित्य में व्यंग्य परंपरा। उन्होंने मुस्कराकर शुरुआत की—

“हर व्यंग्य किसी न किसी सच्चाई की छाती पर रखा हुआ आईना है।”

कक्षा में बैठे छात्र खिलखिलाकर हँस पड़े।

एक छात्र ने शरारत से पूछा—

“मैम, तो क्या आपका जीवन भी व्यंग्य है?”

सुधा ने क्षणभर रुककर देखा, फिर धीमे स्वर में मुस्कराईं—

“नहीं, मेरा जीवन उस व्यंग्य का फुटनोट है, जिसे सरकार ने लिखा है। असली व्यंग्य तो यही है कि जिस समाज को हम आईना दिखाते हैं, वही समाज हमें धुँधला काँच समझकर किनारे रख देता है।”

कक्षा में एक अजीब-सी चुप्पी उतर आई।

स्टाफरूम में लौटकर, चाय की भाप और पुरानी अलमारी की गंध के बीच, सुधा मैम ने अपने सहकर्मियों से कहा—

“जब तक रिज़ल्ट बनाना है, टाइम-टेबल सँभालना है, या विश्वविद्यालय का निरीक्षण पास कराना है—तब हम स्थायी जैसे हैं। लेकिन जब तनख्वाह बढ़ाने या हक की बात करनी हो, तब हम अचानक अस्थायी हो जाते हैं। यह भी एक किस्म का साहित्य है—नौकरी का निराला छंद। जिसमें तुक मिलती है, पर अर्थ बार-बार टूटा हुआ लगता है।”

स्टाफरूम ठहाकों से गूँज उठा। पर वह हँसी भीतर ही भीतर खुरदरे पत्थरों से टकराकर लौट आई—जैसे बरसात की नमी में भी न सूखने वाला दीवार का सीलन।

यहाँ धर्मेंद्र यादव नाम के नितांत काम चलाऊ प्राध्यापक इतिहास पढ़ा रहे थे।

वह बड़े आत्मविश्वास से कह रहे थे—

“इतिहास हमें सिखाता है कि साम्राज्य स्थायी नहीं होते। मौर्य गए, गुप्त गए, मुगल गए, अंग्रेज भी गए…”

इतना कहते ही पीछे से एक छात्र मुस्कराते हुए बोला—

“सर, अगर साम्राज्य स्थायी नहीं होते, तो फिर आपकी नौकरी क्यों स्थायी नहीं हो पाती?”

कक्षा ठहाकों से गूँज उठी।

धर्मेंद्र जी ने क्षणभर के लिए चुप्पी साधी, फिर हल्की मुस्कान के साथ बोले—

“बेटा, सही कहा। इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि कुछ साम्राज्य तो ढह जाते हैं, और कुछ राजाओं की तरह हम भी हर साल नवीनीकरण की याचना लेकर दरबार में खड़े रहते हैं। फर्क बस इतना है कि साम्राज्य किताबों में अमर हो जाते हैं, और हम आवेदन पत्रों में अस्थायी बने रहते हैं।”

लेकिन विश्वविद्यालय की कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

कभी-कभी अचानक आदेश आता है—

“अब स्थायी नियुक्ति हो गई है, नितांत काम चलाऊ शिक्षकों को कार्यमुक्त किया जाए।”

बस यह एक वाक्य, और मानो पूरा पहाड़ ढह पड़ता है उस शिक्षक पर।

जैसे पुराना किला, वर्षों तक अपनी ईंटों में इतिहास सँभाले खड़ा रहता है, और एक दिन बुलडोज़र की गड़गड़ाहट में मलबे में बदल जाता है।

जिस ब्लैकबोर्ड पर उसने सपनों की आकृतियाँ बनाईं, जिस कक्षा में उसने अपने ही बचपन की गूंज सुनी, वहाँ अचानक वह अजनबी घोषित कर दिया जाता है।

उस दिन उसकी चाल में अजीब-सी सुस्ती होती है। किताबें बाँधते हुए उसकी उंगलियाँ काँपती हैं, जैसे कोई माँ परदेश जाते बेटे का सामान बाँध रही हो। छात्र दौड़कर कहते हैं—“सर, आप हमें छोड़कर जा रहे हैं?”

वह मुस्कराकर उत्तर देता है—“नहीं बेटा, मैं तो यहीं हूँ… तुम्हारी आँखों की चमक और यादों में।”

लेकिन भीतर ही भीतर वह जानता है कि यह आखिरी क्लास उसके जीवन की सबसे कठिन परीक्षा है—जहाँ प्रश्न सिर्फ एक है, और उत्तर हर हाल में मौन है।

फिर परमानेंट शिक्षक आता है, और उसी कुर्सी पर बैठ जाता है। चाय की महक वही रहती है, ब्लैकबोर्ड पर वही खड़िया चलती है, पर नितांत काम चलाऊ शिक्षक के लिए यह सब उस घर जैसा है जहाँ दीपक जलाने वाला व्यक्ति ही बाहर कर दिया गया हो।

मन में यही टीस उठती है—“मैंने अपने जीवन के सबसे उजले साल यहाँ जलाकर रख दिए, और बदले में मेरी जगह सिर्फ एक आदेश-पत्र ने ले ली।”

उसकी संवेदना किसी उखड़े हुए पौधे जैसी होती है, जिसे जड़ों समेत बाहर निकालकर सड़क किनारे रख दिया गया हो। वह पौधा जानता है—उसके पत्ते कुछ दिन और हरे रहेंगे, पर मिट्टी की गंध और पानी का स्पर्श उसके लिए अब बीते हुए कल की स्मृति बन चुका है।

गाँव, कस्बा और विश्वविद्यालय—तीनों जगह तस्वीर मानो एक-सी खिंची हो। नदी, तालाब और झरनों की तरह ही यह शिक्षा-तंत्र भी बहता है, पर हर मोड़ पर कोई न कोई बाँध खड़ा कर दिया गया है। कहीं बजट का बाँध, कहीं नीति का, कहीं भर्ती की अधिसूचना का। सरकार इन नितांत काम चलाऊ शिक्षकों के लिए नित नए नाम गढ़ती रहती है—अतिथि, संविदा, शिक्षा मित्र, शिक्षा बंधु। जैसे जादूगर अपनी टोपी से हर बार नया खरगोश निकालकर दिखाता है, वैसे ही नाम बदलते हैं, पर हालात की जादुई थाली खाली की खाली रहती है।

पूरा तंत्र ही “काम चलाऊ” है। यह वैसा है जैसे टूटी हुई छतरी, जो बरसात में कुछ बूंदें रोककर मन को दिलासा देती है, पर भीतर का कपड़ा पहले से ही टपक रहा होता है। ये शिक्षक उस छतरी जैसे हैं—झड़ी के बीच बच्चों को भिगोने से बचाए रखते हैं। पर जैसे ही सूरज निकलता है और मौसम साफ होता है, वही छतरी बेदर्दी से कोने में फेंक दी जाती है। यह व्यवस्था मानो मिट्टी का दिया है—अंधेरे में रोशनी के लिए जलाया जाता है, पर भोर होते ही बुझाकर फेंक दिया जाता है।

उसने झरने की ओर देखा—झरना निरंतर बह रहा था, बिना थके, बिना रुके। उसकी छलकती धारा में उसे अपना ही जीवन दिखाई दिया। कभी उसे शिक्षा मित्र कहा गया, कभी शिक्षक बंधु, कभी अतिथि, कभी संविदा, कभी नितांत काम चलाऊ और कभी महज़ ठेके पर रखा गया प्राणी। नाम बदलते रहे, पर धारा कभी नहीं थमी। वह सोचने लगा—झरने की यही सबसे बड़ी ताक़त है कि वह चट्टानों से टकराकर भी गीत गाता है, पत्तों पर गिरकर भी संगीत रचता है और घाटियों में उतरकर भी जीवन बाँटता है। उसका अस्तित्व किसी स्थायी पद की मोहर से नहीं, बल्कि उस धारा से है, जो बच्चों की आँखों की चमक, उनके भविष्य की प्यास और उनके सपनों की मिट्टी को सींचती रहती है। शायद यही उसकी नियति है—नदी की तरह बहना, बादल की तरह बरसना और दीपक की तरह जलना, चाहे कोई उसका नाम याद रखे या न रखे।

यही धारा धर्मेंद्र यादव जी में दिखती है, जो इतिहास पढ़ाते हुए हर साल खुद अपने ही अनुबंध का इतिहास लिखते हैं; सुधा मैम में, जो व्यंग्य पढ़ाते हुए जानती हैं कि असली व्यंग्य तो उनकी तनख़्वाह है; और जगत सिंह में, जो बच्चों की भूख के बीच अपनी जेब की ख़ाली थाली देखकर भी मुस्कराते हैं। ये अलग-अलग चेहरे दरअसल उसी शिक्षा-तंत्र की सामूहिक गूँज हैं—जहाँ अध्यापक किसी पाठ्यपुस्तक की तरह हैं, जिन्हें साल-दर-साल पलटा जाता है, रटा जाता है और फिर नया संस्करण आने पर फेंक दिया जाता है। असल में, यह पूरा तंत्र ही “नितांत काम चलाऊ” है—क्योंकि शिक्षक अब भी झरनों की तरह बह रहे हैं, पर व्यवस्था पोखर की तरह सड़ चुकी है।

चाय की चुस्की - (कहानी) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

 चाय की चुस्की - (कहानी)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत 

सुबह का वक्त था। पहाड़ों पर हल्की-हल्की धुंध ऐसे पसरी थी मानो किसी ऋषि ने अपने जटाजूट से सफेद रेशमी बादल झटक दिए हों। घाटी में उतरते बादल इस अंदाज़ से लहराते थे जैसे कोई बरात ढोल-दमामे के संग चढ़ाई-उतराई कर रही हो। चीड़ और देवदार की ऊँची-ऊँची कतारें ओस से नहाई दुल्हनों-सी खड़ी थीं, और उनकी शाखों पर बैठी चिड़ियाँ सामूहिक रागिनी गा रही थीं। कहीं दूर से ग्वाले की बांसुरी की धीमी तान सुनाई देती थी, मानो किसी लोकगीत की आत्मा हवा में तैर रही हो।

ढलानों पर चरती बकरियों की टनटनाहट उस प्राकृतिक संगीत में ताल भर रही थी। खेतों की मेड़ों पर झुकी औरतें कंधे पर घास और लकड़ी के गट्ठर रखे घरों की ओर तेज़ कदमों से बढ़ रही थीं। गली-कूचों में भोर की ठंडी धूप ऐसे उतर रही थी जैसे किसी चित्रकार ने सुनहरी रंगों से कैनवास भर दिया हो। पास की नदी कल-कल करती हुई मानो सारा राज़ सुना देना चाहती थी कि प्रकृति ही असली कवयित्री है।

सड़क किनारे, इसी रमणीय दृश्य के बीच, लकड़ी और टीन की टपकती छत से बनी एक पुरानी सी दुकान थी, जिसे गाँव भर में मज़ाक-मजाक में “लोकसभा टी स्टॉल” कहा जाता था। दुकान का मालिक था मंगू, या सबकी जुबान पर ‘मंगूदा’ — जिसकी चाय की खुशबू इतनी दूर तक जाती कि राहगीर भी प्यासे-से ठिठक जाते।

आज भी सुबह-सुबह दुकान पर वही बौद्धिक दरबार सजने लगा। सबसे पहले पधारे ग्राम प्रधान जी। खादी का कुर्ता, पैरों में घिसी-सी सैंडल, आँखों में सदा रहने वाली आधी-सी मुस्कान और जेब में गुटखे का पाउच—यह उनकी पहचान थी। दुकान में घुसते ही उन्होंने अपनी ऐनक को नाक पर चढ़ाया और ऊँची आवाज़ में बोले—

“अरे मंगू! ज़रा जल्दी से चाय बना। आज तो बड़ा दिन है। अभी-अभी मुख्यालय से फोन आया है। हमारी पंचायत को पचास लाख की योजना मिली है। अब देखना, गाँव की तस्वीर बदल जाएगी।”

कोने में बैठा राम सिंह धामी, जो रोज मज़दूरी करता था और जिसके हाथों की दरारों में मेहनत का इतिहास लिखा हुआ था, मुस्कराकर बोला—

“हाँ प्रधान जी, पिछली बार भी तस्वीर बदली थी। फर्क इतना ही था कि फोटो अखबार में आपका था और पैसा ठेकेदार का।”

इतना कहते ही दुकान का माहौल गूँज उठा। हँसी के ठहाके ऐसे फूटे मानो किसी ने लंबे सूखे के बाद अचानक बाँध का दरवाज़ा खोल दिया हो। मंगूदा भी चाय छानते-छानते हँस पड़ा और बोला—

“सच कह रहा है धामी। पिछली बार तो पंचायत भवन की छत बनाने का ठेका था, छत बनी नहीं, लेकिन प्रधान जी की नई जीप गाँव में जरूर आ गई।”

प्रधान जी ने मुस्कान तो बनाए रखी, लेकिन गुटखे का पाउच जल्दी से मुँह में खिसका लिया, ताकि बोलने की बजाय चबाने का बहाना मिल सके। उनकी आँखों में क्षणभर को जो खीज चमकी, वह भी चाय की भाप में खो गई।

उधर से धीमी चाल में सेवानिवृत्त प्रिंसिपल साहब भी आ पहुँचे। रिटायरमेंट के बाद से यही उनकी स्थायी यूनिवर्सिटी थी—बिना हाजिरी, बिना टाइम-टेबल और बिना परिणाम की। आते ही उन्होंने अपनी खाँसती हुई आवाज़ को सँभालते हुए लंबी साँस भरी और बोले—

“आजकल के युवाओं का तो कोई भविष्य ही नहीं रहा। पढ़ाई-लिखाई का कोई महत्व ही नहीं बचा। जब मैं पढ़ाता था, तब बच्चे शेर बनकर निकलते थे।”

यह सुनकर सामने बैठे छोटू मास्टर ने, जो खुद अस्थायी नियुक्ति पर पिछले दस साल से गाँव की प्राथमिक पाठशाला में टिका था, हल्की मुस्कान के साथ जवाब जड़ा—

“प्रिंसिपल साहब, जब आप बच्चों को शेर बना रहे थे, उसी समय हमारे गाँव के आधे युवा दिल्ली के कॉल सेंटरों में टेलीफोन पर भौंकने लग गए, और बाकी शहरों में रिक्शा खींचने लगे। अब जरा बताइए, ये शेर किस चिड़ियाघर में रखे गए हैं?”

दुकान में ऐसा ठहाका फूटा कि मंगूदा की चाय छलककर चूल्हे पर टपक पड़ी और खटर-खटर की आवाज़ करने लगी। बगल में बैठे दूध सप्लाई करने वाले नंदू ने ठहाका मारते हुए कहा—

“अरे मास्टरजी, सही कहा आपने! अब तो हालत ये है कि जिनके दाँत में कीड़ा लगा है, वो भी खुद को शेर समझते हैं। शेर वाली दहाड़ तो दूर, गाँव का कुत्ता भी उनके आगे भौंक जाए तो ये भाग खड़े होते हैं।”

प्रिंसिपल साहब ने खाँसी का पुराना बहाना अपनाया। गले पर हाथ रखते हुए धीरे से बोले—

“हाँ-हाँ, मौसम ही ऐसा है… गले में खराश रहती है।”

मगर सब समझ रहे थे कि खराश गले में नहीं, बल्कि आत्मसम्मान में हो रही है।

तभी अचानक धूल उड़ाती एक जीप दुकान के सामने आकर अटक गई। इतनी तेज़ ब्रेक मारी कि पास खड़ा बकरा भी डर के मारे मिमियाने लगा। गाड़ी से नेता जी उतरे—सिर पर चमचमाता हुआ सफेद नेहरू टोप, आँखों पर काला चश्मा और हाथ में हवा में लहराता रुमाल, मानो चुनावी सभा के मंच पर ही खड़े हों। पीछे-पीछे उनका वफ़ादार चमचा कल्लू भाई ऐसे भागता आया जैसे खुद गाड़ी को धक्का देकर लाया हो।

नेता जी ने आते ही सीना फुलाकर दुकान को मंच मान लिया और गूँजती आवाज़ में बोले—

“दोस्तों! इस बार हमारी पार्टी सत्ता में आई, तो हम इस पहाड़ को स्विट्ज़रलैंड बना देंगे। बर्फ़, फूल और पर्यटक—सब यहाँ उमड़ पड़ेंगे। तब तुम सबको नौकरी के लिए दिल्ली भागने की ज़रूरत नहीं रहेगी।”

इतना सुनते ही कल्लू भाई ताली बजाकर चिल्लाए—

“वाह नेताजी, ज़िंदाबाद! आप तो हिमालय से भी ऊँचे हैं।”

कोने में बैठे राम सिंह धामी ने अपनी फटी हुई बनियान को खींचते हुए ठंडी हँसी में कहा—

“नेताजी, पहले हमारी टूटी सड़क बनवा दो। स्विट्ज़रलैंड तो बाद में भी बन जाएगा। रोज़ हम खच्चरों की तरह गड्ढों में उछल-उछल कर बाज़ार जाते हैं। कभी हमारे हड्डी-पसली भी सलामत रखवा दो।”

नेता जी ने तुरंत गंभीर मुद्रा ओढ़ ली, मानो वे पहाड़ पर नहीं, संसद में बैठे हों। भारी आवाज़ में बोले—

“रामदा, तुम्हें दूरदृष्टि रखनी चाहिए। सड़क जैसी मामूली बातों में मत उलझो। नेता वही है जो बड़े सपने दिखाए। सड़क तो कल भी बन सकती है, पर स्विट्ज़रलैंड बनने का सपना आज से देखना चाहिए।”

यह सुनते ही दुकान पर बैठे सबने एक-दूसरे को देखा और हँसी रोकते-रोकते पेट में बल पड़ गए।

उसी वक्त घास की भारी-भरकम गाठें सिर पर ढोती हुई कुछ औरतें दुकान के पास से गुज़रीं। उनमें से एक ने ठिठोली करते हुए कहा—

“अरे देखो तो, सारे बड़े मर्द यहीं बैठे हैं। चाय पी-पीकर देश बचाने का ठेका इन्हीं के पास है। अगर घर की आधी चिंता भी कर लें तो ये पहाड़ सचमुच स्वर्ग बन जाए।”

औरत की बात सुनकर पूरा दरबार खिलखिलाकर हँस पड़ा। मंगूदा चायवाले ने भी गिलास धोते-धोते चुटकी ली—

“बात तो पक्की है। नेताजी हों या प्रधान जी—सब मुफ्त की चाय और बड़ी-बड़ी बातें करने यहाँ आते हैं। अगर मैंने सचमुच पैसे वसूलने शुरू कर दिए, तो तुम्हारा स्विट्ज़रलैंड यहीं चाय की केतली में डूब जाएगा।”

यह सुनते ही नेताजी के चश्मे के पीछे से पसीना छलक पड़ा। कल्लू भाई ने जल्दी से ताली बजाकर माहौल सँभालने की कोशिश की—

“वाह मंगू भाई! आपकी चाय ही तो इस गाँव की असली संसद है।”

इतने में बबलू दाज्यू पत्रकार अपनी फटी डायरी और कैमरे के उस प्राचीन ढांचे के साथ दुकान पर आ धमके, जो देखने में कैमरा कम और ढोलक का बक्सा ज़्यादा लगता था। आते ही सांस सँभालते हुए घोषणा की—

“दोस्तों! कल अख़बार में छपा है कि सरकार हमारे गाँव को मॉडल गाँव बनाने जा रही है।”

बात इतनी ही थी, पर उसका असर बारूद की चिंगारी जैसा हुआ। रामदा ने हँसते-हँसते पेट पकड़ लिया और बोला—

“हाँ, मॉडल तो बन ही गया है। बस अब सिलाई मशीन और मेकअप किट आ जाएँ, तो गाँव की लड़कियाँ फैशन वीक में भाग ले लें।”

भीड़ एक बार फिर ठहाकों से गूंज उठी। बबलू दाज्यू का चेहरा लाल पड़ गया। दरअसल, अभी कल ही तो उसने नेताजी से चुनावी विज्ञापन छापने के नाम पर दो हज़ार ऐंठे थे। सो, उसके शब्द भी गले की हड्डी बनकर अटक गए। वह चुपचाप कोने में बैठ गया, जैसे अख़बार की स्याही भी उसकी जेब की तरह फीकी पड़ गई हो।

इसी बीच तहसीलदार का चपरासी पन्ना लाल दुकान में घुस आया। उसके कदमों में ऐसी अकड़ थी मानो खुद कलेक्टर साहब उसकी जेब में रखे हों। ऊँची आवाज़ में बोला—

“सुन लो सब! साहब कह रहे थे कि इस बार की योजना का पैसा ठीक से लगे, वरना ऊपर तक रिपोर्ट जाएगी।”

प्रधान जी ने पान की पीक थूकते हुए मुस्कुराकर जवाब दिया—

“अरे पन्ना लाल, तू चिंता न कर। तेरा हिस्सा तो पहले से ही बजट में फिक्स है। बस अंगूठा लगाने की मेहनत करनी पड़ेगी।”

भीड़ में हल्की फुसफुसाहट हुई और सब एक-दूसरे की ओर देख कर मुस्कुरा दिए। दुकान का वातावरण उस समय टेंडर मीटिंग की तरह लग रहा था—जहाँ कॉन्ट्रैक्ट से ज़्यादा कॉन्टैक्ट पर जोर दिया जाता है।

तभी दूर से गाय-भैंस चरा कर किशनुवा और उसका साथी आ पहुँचे। उनके चेहरे धूप में तपे हुए थे और माथे से पसीने की बूँदें टपक रही थीं। किशनुवा ने पास आते ही हँसकर कहा—

“अरे वाह, बड़ा दरबार सजा है। सब देश बदल रहे हैं चाय की प्याली में डूबकर। इधर हमारे जानवर पानी के बिना हाँफ रहे हैं।”

यह सुनकर प्रिंसिपल साहब, जिनकी उम्र अब अकादमिक उपदेशों में ही अटक चुकी थी, तुरंत बोले—

“बेटा, ये छोटी बातें हैं। तुम्हें देश की बड़ी नीतियाँ समझनी चाहिए। विकास योजनाएँ, पंचवर्षीय कार्यक्रम, मॉडल गाँव, डिजिटल इंडिया—यही असली मुद्दे हैं।”

किशनुवा ने व्यंग्य से हँसते हुए कहा—

“नीति से हमें भूसा मिलेगा कि पानी? हमारी भैंस तो रोज़ सूखी घास चबाकर गटक रही है। शायद डिजिटल इंडिया से मोबाइल चार्ज करके प्यास बुझा लेगी।”

यह सुनते ही दुकान में बैठे लोग हँसी से फट पड़े। हँसी में कड़वाहट भी थी और ताजगी भी।

नेता जी का चेहरा अचानक कसैला हो गया। चश्मे को ठीक करते हुए वे बोले—

“तुम ग्रामीण लोग कभी बड़े सपने नहीं देखते। यही कारण है कि पिछड़े रह जाते हो। बड़ा सोचो—पहाड़ को स्विट्ज़रलैंड बनाओ, पर्यटन लाओ, उद्योग लगाओ।”

किशनुवा ने आँखें तरेरकर सीधा जवाब दिया—

“सपना तो रोज़ देखता हूँ नेताजी। सपना ये कि आज मेरी भैंस पानी पी सके। पर वो सपना कभी पूरा नहीं होता। आप स्विट्ज़रलैंड का सपना दिखाते रहिए, मैं कल भी अपनी सूखी भैंस का सपना देखूँगा।”

पूरा दरबार सन्नाटे में डूब गया। उस क्षण पहाड़ी धूप की तपिश और भी चुभने लगी। मानो किशनुवा ने अनजाने ही इस व्यंग्य दरबार को आईना दिखा दिया हो—जहाँ सपनों की ऊँचाई और पेट की भूख हमेशा दो विपरीत दिशाओं में खड़ी रहती है।

अब तक बहस का तापमान जून की दोपहरी की तरह चढ़ चुका था।

प्रधान जी सरकारी योजनाओं का ऐसा बखान कर रहे थे मानो योजना आयोग उन्हीं की दुकान पर बैठा हो।

प्रिंसिपल साहब शिक्षा की दुहाई दे रहे थे, लेकिन उनकी बातें इतनी किताबनुमा थीं कि कोई सुनते-सुनते खुद को “एमए फेल” महसूस करने लगे।

नेता जी अब भी पहाड़ को स्विट्ज़रलैंड बनाने की शपथ ले रहे थे, और पत्रकार बबलू दाज्यू अपनी डायरी में वही पुराने शब्दों की मालाएँ गढ़ रहा था—“दूरदर्शी नेता, विकास के शिल्पी, जनता का मसीहा”।

दूसरी ओर, मजदूर-ग्वाले ताने पर ताने कस रहे थे। उनका हर वाक्य किसी अदृश्य हथौड़े की तरह इन तथाकथित बुद्धिजीवियों पर गिर रहा था।

माहौल ऐसा था जैसे लाइव टेलीकास्ट हो रहा हो—बस फर्क इतना कि यहाँ लाल बत्ती गाड़ी नहीं, बल्कि लाल पीक चमक रही थी।

दुकान सचमुच किसी संसद से कम नहीं लग रही थी—जहाँ सवाल तो गूँजते हैं, पर जवाब चाय की भाप में उड़ जाते हैं।

इसी उबाल के बीच अचानक मंगूदा ने ऊँची आवाज़ में पूछा—

“भाइयों! ज़रा ध्यान दो, चाय का हिसाब कौन देगा?”

सवाल साधारण था, पर असर असाधारण। जैसे ही यह वाक्य गूंजा, बहस की आग पलभर में राख हो गई। सब एक-दूसरे की तरफ ऐसे देखने लगे जैसे संसद में कटौती प्रस्ताव रख दिया गया हो।

नेता जी ने जेब में हाथ डाला, पर तभी फोन बजने का नाटक रचकर बाहर निकल गए। उनकी आवाज़ गली तक गूँजी—“हाँ जी, अभी मुख्यमंत्री जी से बात कर रहा हूँ…”

प्रिंसिपल साहब ने खाँसते हुए कहा—

“अरे भाई, मेरे पास छुट्टा नहीं है। कल लाइब्रेरी से किताब लौटाकर देता हूँ।”

पत्रकार ने तुरंत तिलमिलाकर ऐलान किया—

“मैं तो समाज की सेवा कर रहा हूँ। मुझसे चाय का पैसा माँगना पत्रकारिता की हत्या है। मैं तो रिपोर्ट में लिख दूँगा कि यह चाय जनकल्याणकारी थी।”

सन्नाटा फिर गाढ़ा हो गया। तभी रामदा धीरे से उठा, जैसे सदियों की थकान उसके कंधों पर रखी हो। बोला—

“ठीक है मंगूदा, आज भी मजदूर ही सबका बिल चुकाएगा। क्योंकि मजदूर ही असली देशभक्त है।

बाकी सब लोग तो चाय की चुस्की से क्रांति लाने निकले हैं।”

उसके शब्द सुनते ही माहौल ठहाके और खामोशी के बीच झूल गया। यह ठहाका मजाक का कम, आत्मग्लानि का ज़्यादा था।

बाहर सूरज ढल चुका था। पहाड़ की चोटियों पर लालिमा ऐसे बिखरी थी जैसे दिन ने भी बहस में अपना खून झोंक दिया हो।

औरतें अब भी ढलती रोशनी में घास काट रही थीं, बच्चे सड़क किनारे प्लास्टिक की गेंद से क्रिकेट खेल रहे थे, और चाय की दुकान पर बैठे तथाकथित विद्वान एक और चुस्की लेकर बहस की नई पारी में उतर रहे थे।

मानो यह देश आगे नहीं बढ़ रहा, बस चाय की प्यालियों में ही चक्कर काट रहा हो।


कहानी का अगला हिस्सा - भाग 2


दूसरी सुबह भी दुकान पर वही पुराना मंजर था। चाय की भाप उठते ही बहस का धुआँ भी उड़ने लगा। मंगू अब इस आदत का आदी हो चुका था। वह हँसकर कहता—

“भाइयों, संसद भवन दिल्ली में सिर्फ़ दिखावे के लिए है, असली कैबिनेट तो यहीं बैठती है। फर्क इतना है कि वहाँ भत्ते और वेतन मिलते हैं, और यहाँ उधार की चाय।”

सब हँसते, पर भीतर से जानते थे कि यह हँसी ही सबसे कड़वा सच है।

प्रधान जी फिर उसी पुरानी रिकॉर्डिंग पर आ गए—

“भाइयों, इस बार जो पचास लाख की योजना आई है न, उससे गाँव में सीमेंट की सड़क बनेगी, नाली बनेगी, और सामुदायिक भवन भी खड़ा होगा। अब देखना, गाँव किसी शहर से कम नहीं रहेगा।”

रामदा ने अपने पैरों की तरफ देखा, जिन पर अब भी पुराने फटे जूते थे, फिर हँसते हुए बोला—

“हाँ, पिछली बार भी नाली बनी थी, लेकिन उसमें पानी से ज्यादा बीयर और देशी शराब की बोतलें तैर रही थीं। सामुदायिक भवन की छत तो पहली बरसात में ऐसे उड़ गई थी जैसे सरकारी नौकरी का वादा उड़ जाता है। अब गाँव वाले कहते हैं कि भवन नहीं, भूत बंगला बना है—रात में गाय भी वहाँ से गुज़रने से डरती है।”

सुनते ही सब ठहाकों से लोटपोट हो गए।

प्रधान जी ने हँसी के पीछे गुस्सा दबा लिया और बोले—

“रामदा, तू मजदूर आदमी है, राजनीति की बड़ी-बड़ी बातें तुझे क्या समझ आएँगी? यह सब बड़े स्तर की योजनाएँ हैं, गाँव-देहात की सोच से ऊपर की।”

इतने में सामने से रघुवीर मिस्त्री आया। हाथ में औज़ार, चेहरे पर धूल और आँखों में नींद की जगह ईंटों का बोझ। बैठते ही बोला—

“भैया, एक चाय पिला दो। सुबह से ईंट ढो रहा हूँ। पर एक बात बताऊँ, इन योजनाओं का फायदा हमें मजदूरों को तो मिलता ही नहीं। ठेकेदार लोग आधा पैसा गाड़ी और बंगले में खा जाते हैं, और बाकी आधा सीमेंट-रेत में मिल जाता है। सड़क की मोटाई उतनी ही होती है जितनी मोबाइल में डेटा बैलेंस बचा हो।”

मंगू ने तुरंत जोड़ा—

“सही कहा! अब तो गड्ढे सड़क में कम, और सरकारी फाइलों में ज़्यादा मिलते हैं।”

पत्रकार बबलू दाज्यू, जो अब तक सब नोट कर रहे थे, मुस्कराते हुए बोले—

“अरे रघुवीर, यही तो लोकतंत्र की खूबसूरती है। एक तरफ ठेकेदारों की तिजोरी भरती है, दूसरी तरफ तुम्हारे औज़ार टूटते हैं। और इस बीच हम पत्रकार लोग हेडलाइन बनाते हैं—

‘गाँव विकास की राह पर अग्रसर’।”

सुनते ही रामदा फिर हँस पड़ा—

“हाँ दाज्यू, और अगली हेडलाइन यह भी लिख देना—

‘गाँव वालों की जेब खाली, पर भाषण भारी।’”

अबकी बार हँसी में तल्ख़ी भी थी।

बाहर धूप तेज़ हो चुकी थी, पर भीतर बहस की तपिश और ज्यादा थी। चाय की दुकान अब सिर्फ़ दुकान नहीं, एक लाइव न्यूज़ चैनल थी—जहाँ हर कोई एंकर भी था, पैनलिस्ट भी और दर्शक भी।

प्रिंसिपल साहब ने अपनी ऐनक को थोड़ा और नाक पर चढ़ाते हुए विद्वतापूर्ण लहज़े में कहा –

“रघुवीर, यह सब समाज की विसंगतियाँ हैं। जब तक शिक्षा का प्रकाश नहीं फैलेगा, तब तक अंधकार रहेगा। देखना, जिस दिन गाँव का हर बच्चा पढ़-लिख जाएगा, उसी दिन भ्रष्टाचार अपने आप ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।”

रघुवीर ने हथौड़ा जमीन पर पटका और मुस्कुराते हुए बोला –

“प्रिंसिपल साहब, आपके ज़माने में तो आधा गाँव हाई स्कूल तक पहुँच ही नहीं पाया। अब आप शिक्षा का मशाल उठा रहे हैं! वैसे एक बात बताइए, बच्चों को अभी भूख मिटाने के लिए रोज़गार चाहिए या पेट में दर्शन-शास्त्र की थ्योरी? क्योंकि खाली पेट गांधीगीरी नहीं, रोटीगिरी चाहिए।”

यह सुनते ही दुकान में ठहाकों की सुनामी उठ गई। प्रिंसिपल साहब ने खिसियाकर चाय की प्याली उठाई, एक लंबी चुस्की ली, और अखबार की तरह तह होकर चुप्पी साध ली।

इसी बीच नेता जी, जो पिछले आधे घंटे से मोबाइल पर किसी “बड़े साहब” से ऊँची-ऊँची आवाज़ में बात कर रहे थे, अचानक कॉल काटकर मंचनुमा अंदाज़ में खड़े हो गए। दोनों हाथ हवा में लहराते हुए बोले –

“भाइयों! अभी-अभी मेरी सीधी बात बड़े साहब से हुई है। बहुत जल्द इस पहाड़ पर एक बड़ी परियोजना शुरू होने वाली है। हजारों नौजवानों को रोज़गार मिलेगा। अब गाँव में बेरोजगारी का नामोनिशान मिट जाएगा। आने वाले समय में यह गाँव ‘मिनी दुबई’ कहलाएगा।”

सुनते ही बबलू दाज्यू, जो हर मौके पर “लाइव टेलीग्राफ़” बन जाते थे, तुरंत अपनी पुरानी डायरी में लिखने लगे –

“नेता जी ने किया बड़ा ऐलान।”

कल के अख़बार की हेडिंग उसी वक्त तैयार हो गई।

रामदा ने खैनी मलते हुए ताना मारा –

“नेता जी, पिछली बार भी आपने कहा था कि हमारे पहाड़ पर एयरपोर्ट बनेगा। नतीजा? बस खेतों में सर्वे के खंभे गड़े और फिर गाय-बकरियों ने उन्हें तोड़ डाला, लोगों ने लकड़ी की तरह जला डाला। गाँव वाले अब कहते हैं—‘नेता जी के वादे खंभों जैसे हैं, खड़े भी नहीं रहते और टिकते भी नहीं।’”

भीड़ ठहाकों से गूँज उठी। मंगू ने भी चुटकी लेते हुए जोड़ा -  

“नेता जी, अगली बार जब भी योजना का ऐलान करें न, तो एक रिटर्न पॉलिसी भी जोड़ दें—अगर काम न हो तो वादा वापस।”

रघुवीर ने हँसते हुए तंज कसा –

“हाँ, बिल्कुल, जैसे मोबाइल में कैशबैक ऑफ़र आता है। यहाँ भी होना चाहिए—‘परियोजना असफल तो जनता को कैशबैक।’”

दुकान में बैठे लोग पेट पकड़कर हँसने लगे, और नेता जी का चेहरा वैसे ही उतर गया जैसे बिना नेटवर्क का मोबाइल।

किशनुवा ने ज़ोर का ठहाका लगाया –

“हाँ रे भाई, नेताजी तो कहते थे कि हमारी बकरियाँ स्विस गाय बन जाएँगी, और दूध सीधा पैकेजिंग प्लांट से निकलेगा। लेकिन हकीकत ये है कि मैं आज भी नौले से पानी भरकर ला रहा हूँ। फर्क बस इतना हुआ है कि पहले तांँबे की गगरी लाता था, अब प्लास्टिक की बोतल और डब्बे भर रहा हूँ।”

दुकान ठहाकों से गूँज उठी।

इतनी देर में घड़े रखे कुछ और औरतें भी आ बैठीं। उनमें से एक ने सिर पर दुपट्टा ठीक करते हुए तंज कसा –

“हमारे मर्द तो बस देश-समाज सुधारने में लगे रहते हैं। सुबह से शाम तक चाय की चुस्की, फेसबुकिया चर्चा और व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से डिग्री। लेकिन घर का राशन कौन लाएगा, ये सवाल कभी किसी बहस का हिस्सा नहीं होता।”

मंगूदा ने हँसते-हँसते कहा –

“आमा, घर का राशन छोड़ो, ये तो मेरी दुकान का हिसाब भी नहीं देते। बस उधारी की डायरी देखकर ऐसे हँसते हैं जैसे संसद में मुफ़्त का वाई-फाई मिल गया हो।”

सभी जोर से हँसने लगे, लेकिन नेताजी और प्रिंसिपल का चेहरा वैसा ही उतर गया जैसे नेटवर्क बीच कॉल में कट जाए।

तभी पन्ना लाल चपरासी, जो हमेशा ‘अंदर की ख़बर’ रखने का दावा करता था, आगे झुककर बोला –

“साहब कह रहे थे कि इस बार रिपोर्ट बहुत सख़्त जाएगी। ऊपर तक सबकी निगरानी हो रही है। कोई बच नहीं पाएगा।”

रामदा ने बीड़ी सुलगाते हुए तुरंत तीर छोड़ा –

“हाँ-हाँ, निगरानी तो होती है, लेकिन सिर्फ़ चाय पीने की। बाकी पैसा तो सीधा ऊपर चला जाता है। ये निगरानी का कैमरा भी नेताजी की जेब में फिट है। तस्वीर जनता की खींची जाती है, लेकिन फोटो गैलरी में सेव सिर्फ़ ‘ऊपरवालों’ की मुस्कान होती है।”

भीड़ खिलखिला पड़ी।

रघुवीर ने और जोड़ दिया –

“अरे, ये निगरानी सिस्टम भी क्या कमाल का है! CCTV कैमरे सड़क पर लगे हैं, लेकिन रिकॉर्डिंग प्राइवेट पार्टी के घर की चल रही है। गाँव वाले तो बस कैमरे के सामने हाथ हिलाते रह जाते हैं।

महिलाओं में से एक बोली –

“हमारे घर का गैस सिलेंडर तीन महीने से खाली है। लेकिन नेताजी कह रहे थे स्मार्ट गाँव बन जाएगा। अरे, पहले हमारे चूल्हे में आग तो स्मार्ट कर दो!”

इस पर मंगूदा ने आखिरी तंज कसा –

“भाई, स्मार्ट गाँव तो तभी बनेगा जब नेता जी का वादा रीचार्ज पैक की तरह हो—समय पूरा होने पर अपने आप बंद।”

दुकान पर बैठी भीड़ फिर से पेट पकड़कर हँसने लगी, और नेताजी का चेहरा बिल्कुल वैसा हो गया जैसे चुनाव में हारने के बाद वोटिंग मशीन की स्क्रीन।

किशनुवा बोला –

“हाँ, और जब तवा गरम होता है तो सब अपनी-अपनी रोटी सेंकने में लग जाते हैं। जनता चाहे जले या भूखी रह जाए, नेताजी की थाली में तो मलाई पराठा हमेशा पहुँच ही जाता है।”

मंगूदा चायवाले ने अपनी कड़छी झाड़ते हुए जोड़ा –

“मुझे तो लगता है कि ये चाय की दुकान ही असली संसद है। यहाँ सरकार हर रोज़ बनती है, गिरती है और मुफ्त में चलती है। फर्क बस इतना है कि यहाँ स्पीकर मैं हूँ और माइक के बिना भी सब चीखते रहते हैं।”

भीड़ में बैठे लोग ठहाका मारकर हँस पड़े।

थोड़ी देर में चर्चा राष्ट्रीय राजनीति पर घूम गई। नेता जी मंच जैसी मुद्रा में गला साफ़ करते हुए बोले –

“देश बदल रहा है भाइयों! अब विकास की आँधी आ चुकी है। निश्चिंत रहिए…!”

रामदा ने बीड़ी का धुआँ उड़ाते हुए काटा –

“हाँ, आँधी तो है, लेकिन उसमें सिर्फ गरीबों की झोपड़ी उड़ रही है। अमीरों के बंगले और फार्महाउस पर तो एक खरोंच भी नहीं आती। आँधी भी अब VIP पास देखकर चलती है।”

सभी हँसते-हँसते ताली पीटने लगे।

प्रिंसिपल साहब ने चश्मा ठीक करते हुए गंभीरता ओढ़ी –

“भाई, राजनीति तो चलती रहेगी। असली संकट है हमारी संस्कृति का। आज के बच्चे मोबाइल और रील्स में खोए रहते हैं। न लोकगीत जानते हैं, न लोककथाएँ और न ही लोक-संस्कृति। सब कुछ बर्बाद हो रहा है।”

किशनुवा ने मुस्कुराकर तीर मारा –

“प्रिंसिपल साहब, बच्चा मोबाइल में खोए तो आपको संस्कृति का संकट दिखता है। लेकिन जब बच्चा आपकी क्लास में सो जाता था तो आप कहते थे – ‘विद्यार्थी ध्यानमग्न है’। अब ध्यान ऑनलाइन बदल गया है तो आपको लगे कि संस्कृति डूब रही है।”

भीड़ फिर ठहाकों से गूँज उठी।

रघुवीर ने भी जोड़ दिया –

“साहब, संस्कृति की चिंता छोड़ो। अब तो हमारी सभ्यता भी डेटा पैक पर चल रही है। जब तक रीचार्ज है, तब तक भारतीयता चमक रही है। जैसे ही नेट खत्म, वैसे ही संस्कृति ऑफ़लाइन।”

तभी औरतों में से एक बोली –

“हमारे घर के बच्चे तो लोकगीत तभी गाते हैं जब नेटवर्क डाउन हो जाए। वरना तो दिन-भर ट्रेंडिंग गाने पर नाचते रहते हैं। अब हमें समझ नहीं आता, किसको बचाएँ – संस्कृति को या मोबाइल की बैटरी को।”

मंगूदा ने आखिरी वार किया –

“भाई, संस्कृति हो या राजनीति, दोनों ही क्लाउड सर्वर पर अपलोड हो गई हैं। गाँव वाले तो अभी तक पेंड्राइव खोज रहे हैं और नेताजी अनलिमिटेड डेटा प्लान में मौज कर रहे हैं।”

दुकान एक बार फिर जोरदार हँसी और ठहाकों से गूँज उठी, और नेताजी का चेहरा ऐसा लग रहा था जैसे ईवीएम में उनकी सीट शून्य वोट दिखा दे।

इसी बीच बबलू दाज्यू पत्रकार धीरे-धीरे खिसककर नेता जी के पास बैठ गया और फुसफुसाते हुए बोला –

“नेताजी, अगर आप चाहें तो मैं कल अख़बार में आपकी योजना वाली खबर पहले पन्ने पर छाप दूँगा। बस थोड़ा-सा सहयोग चाहिए। खबर को मैं ऐसा रंग दूँगा कि जनता पढ़कर रो पड़े और आप वोट पक्के कर लें।”

नेता जी ने मुस्कराकर आँख दबाई और जेब से नोट ऐसे सरका दिए जैसे विज्ञापन पैकेज हो। नोट बबलू की डायरी में ऐसे घुसे जैसे एडिटोरियल पॉलिसी में ‘स्पॉन्सर्ड कंटेंट’।

रामदा यह सब देख चुका था। उसने ऊँची आवाज़ में तीर छोड़ा –

“वाह, पत्रकारिता भी अब चाय की तरह हो गई। पैसा डालो और मनपसंद खबर निकालो। फर्क बस इतना है कि यहाँ शक्कर की जगह नोट डलते हैं और स्वाद उसी हिसाब से बदल जाता है।”

भीड़ ठहाके मारने लगी। बबलू सकपका गया। सबकी नज़रें उसकी डायरी पर टिक गईं, मानो उसमें खबर नहीं, बल्कि शेयर मार्केट का गुप्त सौदा लिखा हो। लेकिन बबलू पत्रकार था, बच निकलने का हुनर जानता था। तुरंत विषय बदलकर बोला –

“देश बदल रहा है भाइयों। मीडिया जनता की आवाज़ बन रहा है। अब तो हर न्यूज़ चैनल सच दिखाता है।”

रामदा हँस पड़ा –

“हाँ, बिल्कुल। सच दिखाता है… लेकिन TRP वाले सच। वही सच, जिसमें स्टूडियो की रोशनी ज्यादा चमकती है और जनता की अंधियारी गली कभी कैमरे में नहीं आती।”

चर्चा गहराने लगी। कोई सरकार को कोस रहा था, कोई जनता को निकम्मा बता रहा था, कोई शिक्षा का रोना रो रहा था, तो कोई संस्कृति का विलाप कर रहा था। सब अपने-अपने को विद्वान मानकर बोल रहे थे, जैसे चाय की दुकान विचारों का विश्वविद्यालय हो और हर ग्राहक यहाँ मानद प्रोफेसर। वैसे ये सभी अपने हिसाब से पढ़े-लिखे थे। चाय की चुस्ती लेते-लेते इन्होंने देश-विदेश का ज्ञान प्राप्त कर लिया था।

शाम ढल रही थी। पहाड़ की चोटियों पर लालिमा फैल चुकी थी। लेकिन चाय की दुकान अब भी गूँज रही थी।

तभी मंगूदा ने याद दिलाया –

“भाइयों, हिसाब तो कर दो। चाय मुफ्त की नहीं है।”

नेता जी ने कुर्सी पीछे सरकाते हुए कहा –

“मेरी गाड़ी में पेट्रोल खत्म हो रहा है, कल आऊँगा तो हिसाब कर दूँगा। वैसे भी नेताओं के हिसाब हमेशा अगले चुनाव तक टलते हैं।”

प्रिंसिपल साहब ने फिर वही बहाना दुहराया –

“मेरे पास छुट्टा नहीं है। शिक्षा व्यवस्था की तरह मेरी जेब भी हमेशा कैश क्रंच में रहती है।”

बबलू पत्रकार ने कॉलर ठीक करते हुए कहा –

“मैं तो समाज के लिए लिख रहा हूँ। मुझसे पैसा लेना पत्रकारिता का अपमान होगा।”

भीड़ खिलखिलाई।

अंत में रामदा फिर खड़ा हुआ और तंज़ कसते हुए बोला –

“ठीक है, मजदूर ही सबका बिल चुकाएगा। वैसे भी इस देश में असली विकास मजदूर के कंधों पर ही टिका है। बाकी सब लोग तो सिर्फ चाय की चुस्की और भाषण की फ्री रील्स से क्रांति लाने आते हैं। असल पसीना वही बहाता है, और मज़ा बाकी सब उड़ाते हैं।”


इतना कहकर उसने जेब से सिक्के निकाले और मंगूदा को थमा दिए। दुकान में एक अजीब-सी खामोशी छा गई। सबकी हँसी जैसे कहीं भीतर अटक गई हो।

दूर पहाड़ पर ढलते सूरज की आखिरी किरणें खप्पर वाले घरों पर पड़ रही थीं – मानो कह रही हों कि यहाँ असली रोशनी अब भी सिर्फ मजदूर के चूल्हे की आग से आती है, बाकी तो सब इलेक्शन मैनिफेस्टो का उजाला है।

बाहर अंँधेरा गहराने लगा था। पहाड़ की चोटियों पर तारे ऐसे टिमटिमाने लगे मानो आसमान भी नीचे बैठी बहस सुनकर मुस्करा रहा हो। औरतें अब भी घास की गाठें पीठ पर लादे लौट रही थीं—कदम थके हुए, लेकिन चेहरे पर वही मजबूरी की शांति। बच्चे अंधेरे में भी खेलते रहे, जैसे उनके हिस्से की बचपन की रोशनी बिजली कटौती के बावजूद बुझने से इनकार कर रही हो।

चाय की दुकान के भीतर तथाकथित विद्वान अपनी आखिरी चुस्की लेकर लंबी साँस छोड़ने लगे। कुछ ने अगली सुबह फिर मिलने का वादा किया, जैसे यह चाय की दुकान संसद हो और अगला सत्र कल ही शुरू होना हो।

देश वहीं का वहीं था। योजनाएँ वहीं की वहीं थीं। सड़कें अब भी टूटी-फूटी थीं, अस्पतालों की दीवारों पर अब भी सीलन थी, स्कूलों की खिड़कियों से अब भी सर्द हवा बच्चों को कंपकँपाती थी। टॉयलेट और बाथरूम के नाम पर बिना दरवाज़े का एक कोना था। मगर चर्चा इतनी ऊँची थी मानो अगले ही दिन पहाड़ स्विट्ज़रलैंड बनने वाला हो या मिनी दुबई ।

रामदा ने बाहर झाँककर देखा। अँधेरे में घास लादे औरतें धीरे-धीरे गाँव की ओर उतर रही थीं। उसने एक गहरी साँस भरी और बुदबुदाया –

“ये पहाड़ स्विट्ज़रलैंड नहीं बनेगा भाइयों, क्योंकि यहाँ औरत की पीठ पर घास और मजदूर की जेब में खालीपन ही लोकतंत्र की असली तस्वीर है। बाकी सब चर्चा बस चाय की भाप है—ठंडी पड़ते ही गायब।”

किसी ने उसकी बात पर ठहाका नहीं लगाया। सबके चेहरे पर एक अजीब-सी चुप्पी फैल गई। यह वही चुप्पी थी जो पहाड़ के जंगलों में रात ढलते उतर आती है—गहरी, भारी और सच का बोझ उठाए।

मंगूदा ने बर्तनों को धोते हुए धीमे स्वर में कहा –

“दाज्यू, चाय तो कल भी बनेगी… लेकिन काश, इन पहाड़ों की किस्मत भी कभी बदल जाती।”

उसकी आवाज़ में उम्मीद कम और बेबसी ज्यादा थी।

तभी पहाड़ों पर ठंडी हवा का झोंका आया। तारे और तेज़ चमकने लगे, जैसे आसमान ने सुन लिया हो। लेकिन धरती पर वही अंधेरा पसरा रहा।

बहस खत्म हो चुकी थी, पर असल सवाल अब भी अनसुलझा था।

चाय की चुस्की ख़त्म हो चुकी थी, मगर देश का हिसाब अब भी बाकी था।

शनिवार, 16 अगस्त 2025

सरकारी फ़ाइल (कहानी) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

 सरकारी फ़ाइल (कहानी)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी  - उत्तराखंड प्रांत 

बरसों पहले, जब मेरी मूंछें नई-नई जवान हुई थीं तब चेहरे पर सरकारी नौकरी का सपना उतना ही चमकता था जितना सावन की पहली बारिश में गांँव के सरकारी प्राथमिक पाठशाला की टिन की छत और पोखरों का पानी, मैंने तय कर लिया था कि सरकारी नौकरी ही करनी है। तब मुझे लगा था कि सरकारी नौकरी वह चांँद है, जो पूर्णिमा की रात मेरे आंँगन में उतरकर चांँदी की थाल में परोसा जाएगा। लेकिन बाद में समझ आया कि यह चांँद सरकारी फाइलों के बादलों में छिपा रहता है, और उसे देखने के लिए न जाने कितनी अमावस्याएँ काटनी पड़ती हैं।

जब मेरी उम्र 21 साल की थी, तो मैंने पहली बार अख़बार में सरकारी नौकरी का विज्ञापन देखा। आधा पन्ना चमचमाता हुआ, ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा था — “युवा शक्ति को सुनहरा अवसर!” नीचे लिखा था, “योग्यता- स्नातक, मेहनती, ईमानदार, देशसेवा का भाव।” पढ़कर मेरी आँखों में सपनों के जुगनू-सी चमक आ गई। लगा, यह तो मेरे लिए ही निकला है। लेकिन जब नज़र शर्तों की सूची पर पड़ी, तो लगा जैसे किसी ने बर्फ का गोला माथे पर दे मारा हो — “उम्र सीमा- 21 से 25 वर्ष, अनुभव- कम से कम 5 वर्ष।” अब समझिए, 21 की उम्र में 5 साल का अनुभव कहाँ से लाऊँ? क्या बचपन में ही सरकारी नौकरी ज्वाइन कर लेता? पर उस समय मैं इतना भोला था कि सोच लिया, “अरे, ये सब औपचारिकताएँ हैं, असल में योग्यता देखेंगे।” मुझे क्या पता था कि सरकारी विज्ञापन भी दूल्हे के रिश्ते की तरह होता है — ऊपर से सबको अच्छा दिखता है, पर अंदर की कहानी सिर्फ घरवाले जानते हैं।

पहली बार जब दफ्तर में फाइल जमा करने गया, तो बाबू जी ने मुझे ऐसे देखा जैसे किसी पंडित ने विवाह-समारोह में बिना बुलाए आए बाराती को देख लिया हो। मुस्कुराते हुए बोले, "भैया, चिंता न करो, यह तो दो हफ्ते में हो जाएगा।" मैंने भी मासूमियत से मान लिया, पर दो हफ्ते बाद फाइल दूसरे टेबल पर थी। नए बाबू जी ने पन्ने ऐसे पलटे जैसे कोई ज्योतिषी कुंडली पढ़ता है—"देखो भैया, अभी अमावस्या चल रही है, फाइल को शुभ दिन में आगे बढ़ाएंगे।" मुझे तब अहसास हुआ कि फाइलें भी विवाह-शादी की तरह ग्रह-नक्षत्र देखकर ही चलती हैं।

फाइल की रफ्तार का असली दर्शन मुझे तब हुआ जब एक बार पर्वतीय अंचल में एक योजना के सिलसिले में गया। पहाड़ की सड़कें ऐसी टेढ़ी-मेढ़ी कि स्कूटर चढ़ाई पर हाँफ जाए। दफ्तर पहुँचा तो कमरे में लकड़ी का चूल्हा जल रहा था, और बाबू जी गर्म चाय के साथ अख़बार पढ़ रहे थे। मैंने फाइल आगे बढ़ाने की बात की, तो बोले — "अरे भैया, यहाँ सब धीरे चलता है। जैसे पहाड़ पर पानी की धार, बूँद-बूँद गिरकर ही झरना बनती है। फाइल भी बूँद-बूँद आगे बढ़ती है, महीने-महीने में एक नोटिंग।” मैंने मजाक में कहा, "तो फिर यह झरना कब समुंदर बनेगा?" वे बोले, "भैया, यहाँ समुद्र नहीं, बस तालाब बनते हैं — और वो भी बरसात में!" सच में, पहाड़ में फाइल की स्पीड ऐसी होती है जैसे बर्फ पिघलना — गर्मियों का इंतज़ार करना पड़ता है, वरना सब जमकर बैठा रहता है।

बिल पास करवाने का भी एक अद्भुत कला-शास्त्र है। जैसे मोरनी बारिश में नाचकर मोर को रिझाती है, वैसे ही आवेदक को सरकारी बाबुओं को रिझाना पड़ता है। शहर में यह कला समोसे और चाय के साथ निखरती है, तो पहाड़ में यह गर्म आलू के पराठे और मक्खन की टिक्की के साथ खिलती है। यहाँ बाबू जी के हाथ गर्म रहें, तभी फाइल भी गरम-गरम आगे बढ़ेगी। गरम-गरम दूध और जलेबी की तरह जिसकी सुगंध आने जाने वाले को आती रहनी चाहिए। एक बार तो मैंने देखा, कोई आवेदक बाबू जी के घर सीधे ताज़ा शहद का छत्ता लेकर गया, जिसमें गांँधी चिपके हुए थे। अगले दिन उसकी फाइल में तीन नोटिंग एक साथ हो गईं! तभी मुझे समझ आया कि यहाँ की फाइलें भी मधुमक्खी की तरह हैं — मीठा पाकर ही परिश्रम करती हैं।

रोज-रोज का दफ्तर का चक्कर किसी प्रेम-कहानी की तरह होता है — शुरुआत में रोमांच, बीच में थकान, और आखिर में बस आदत। सुबह उम्मीद की धूप में निकलता हूँ, शाम को निराशा की परछाइयों के साथ लौटता हूँ। कभी-कभी मौसम भी फाइल की यात्रा में बाधा डाल देता है। एक दिन तो बादल ऐसे फटे कि दफ्तर के अंदर तक गंगा मैया चली आई। स्थिति नर से नारायण, जटाशंकर भी फेल। 'जल परियोजना' का पानी डायरेक्ट फाइलों में अपलोड हो गया। गार्ड बोला, “फाइलें भीग गई हैं, पन्ने चिपक गए हैं, अब धूप में सुखाकर ही खुलेंगी।” मैंने सोचा, ‘वाह! ये फाइलें तो प्रेम विवाह के बाद का नवदम्पति - सा व्यवहार कर रही हैं—अलग होने का नाम ही नहीं ले रहीं।’

सरकारी नौकरी के लिए उम्र का आधा हिस्सा तो कतार में खड़े-खड़े निकल जाता है। जवानी में जब ताकत होती है, तब नौकरी के लिए परीक्षा-परीक्षा खेली जाती है। और जब आखिर में नियुक्ति पत्र आता है, तब तक बालों में चांँदी और चाल में ठहराव आ चुका होता है। यह नौकरी भी चांँदनी रात की तरह होती है—दूर से रोमांटिक, पास से ठंडी और कभी-कभी भूतिया-सी।

बाबू साहिब सरकारी नौकरी पाने की कोशिश एक ऐसी मैराथन है, जिसकी फिनिश लाइन हर साल पाँच किलोमीटर आगे खिसकती है। पहले आप 25 की उम्र में फॉर्म भरते हैं, फिर परीक्षा की तारीख बदलती है, फिर रिजल्ट में “तकनीकी कारणों” का नोटिस आता है। और जब अंत में नियुक्ति पत्र आता है, तब तक चेहरे की त्वचा में झुर्रियों का नेटवर्क उतना ही गहरा हो जाता है जितना किसी पुराने नक्शे में नदियों का। नौकरी मिलते-मिलते पेंशन की उम्मीद भी धुंधली हो जाती है, जैसे कोहरे में पहाड़ की चोटी या धुंध में राजधानी की सड़कें।

भोजन की थाली में भी मुझे सरकारी प्रक्रिया नज़र आती है। जैसे दाल में नमक कम हुआ तो घरवाली कहेगी — “अभी डाल देती हूँ,” और फिर वह नमक चम्मच लेकर बैठे-बैठे किसी और बात में लग जाएगी, वैसे ही फाइल में कमी पूरी करने के वादे महीनों खिंचते हैं। रोटी गोल बने या चपटी, यह घर का विषय है; फाइल पूरी हो या अधूरी, यह पंचायत से लेकर जिला अफसर तक की चिंता है — और गरीब आवेदक की बस एक ही चिंता है कि उसकी फाइल पर धूल की परत न जम जाए।

ऊपरी आमदनी का मनोविज्ञान भी बड़ा अद्भुत है। जैसे किसान खेत में खाद डाले, तो पौधे हरे-भरे हो जाते हैं; बाबू की जेब में 'विशेष खाद' डाली जाए, तो फाइल की कलियाँ खिलने लगती हैं। गरीब के पास खाद नहीं होती, तो उसकी फाइल सूखकर हड्डी बन जाती है। मैंने खुद देखा है कि जिसके पास 'खाद' ज्यादा है, उसकी फाइल पूर्णिमा के चाँद की तरह चमकती है — बाकी की फाइलें अमावस्या की रात में गुम हो जाती हैं।

फाइल की गति पर मैंने गहन शोध किया। निष्कर्ष यह निकला कि घोंघा तेज है। घोंघा रास्ते में कभी-कभी पत्ते खा लेता है, लेकिन फाइल रास्ते में 'मतलब की बातें' खाती है। और अगर बारिश हो गई, तो घोंघा फिसलकर आगे बढ़ जाता है, फाइल अलमारी में दुबक जाती है — जैसे बिल्ली कुत्ते से डरकर कोने में छुप जाती है।

राजनीति का ताना-बाना भी फाइल के इर्द-गिर्द बुना है। प्रधान कहेगा — “ऊपर तक बात पहुँचा दो,” और ऊपर से मतलब तारे हैं, चाँद है, मंत्री है — पर कब किसका ग्रह उल्टा है, यह कोई नहीं बताता। जिला पंचायत सदस्य, पटवारी, यहांँ तक कि चाय बेचने वाला भी सलाह देगा — “थोड़ा समय दो, यहाँ सब धीरे चलता है।” धीरे चलने का मतलब है पाँच साल — और पाँच साल में गांँव के तालाब में भी दो बार कमल खिल और मुरझा जाते हैं।

सरकारी नौकरी और प्रकृति का रिश्ता बड़ा अजीब है। बरसात का पानी कब आएगा, यह बादल तय करते हैं; नौकरी कब मिलेगी, यह नोटिंग और अनुमोदन तय करते हैं। चाँद और तारे आसमान में घूमते रहते हैं, पर उनकी दूरी हमारी पकड़ से बाहर है — ठीक वैसे ही जैसे इंटरव्यू का परिणाम।

आज इतने साल बाद जब मैं अर्ध शतक पार कर चुका हूँ। आईने में देखता हूँ तो लगता है, मैंने अपनी आधी जिंदगी अमावस्या और पूर्णिमा के बीच फँसी एक फाइल की तरह गुजारी है। एक अदृश्य दौड़ में गुजार दी—जहाँ हर चक्कर में उम्मीद की नई पूर्णिमा थी, और हर वापसी में निराशा की अमावस्या। सरकारी नौकरी मिलना चांँद पर पानी मिलने जैसा है—सुना सबने है, देखा कम ने। कभी उम्मीद की चाँदनी में नहाया, कभी निराशा के अंँधेरे में डूबा। सरकारी नौकरी पाना अब मुझे चाँद पर बाग़ लगाने जैसा लगता है। कहानियों में सुनने योग्य, हकीकत में लगभग असंभव। और सरकारी फाइल? वह अब भी कहीं न कहीं घूम रही है, ठीक वैसे ही जैसे चांँद बादलों में—कभी दिखता है, कभी छिप जाता है और कभी चुनावी आचार संहिता में गुम हो जाता है और हम बस आसमान ताकते रहते हैं। झिलमिल नम आंँखों से ..! हम बस दूर तलक देखते रहते हैं, उम्मीद करते हुए कि शायद अगली पूर्णिमा को वह हमारे आँगन में उतर आए।

शहर का मकान (कहानी) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी (उत्तराखंड प्रांत)

 शहर का मकान (कहानी)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी (उत्तराखंड प्रांत)

जनवरी का महीना था। बलुवाकोट के ऊंँचे पहाड़ों पर मुनस्यारी से लेकर छिपला केदार और गुंजी तक बर्फ की तीखी चमक और मोटी परत जमी थी। पहाड़ की ठंडी हवा हड्डियों को चबा रही थी। मोहन दाज्यू सुबह-सुबह अंगीठी के पास बैठकर अपने हाथ सेंक रहे थे। कुछ चीड़ के पेड़ों के बीच से उतरती धुंँध मानो आकाश और धरती का रिश्ता जोड़ रही हो। सामने की ऊंँची पहाड़ी पर बर्फ जमी थी, घाटी में कोहरा छाया हुआ था। जैसे प्रकृति ने सफ़ेद रजाई ओढ़ रखी हो। काली नदी की आवाज़ बलुवाकोट और नेपाल की सीमारेखा को रेखांकित कर रही थी।

कुछ चीड़ के पेड़ बर्फ की बूँदों को झटकते हुए ‘छपाछप’ करते थे, मानो कोई गाँव की औरतें पानी भरते वक्त लोटे से गिरा रही हों। पहाड़ के खेत ठंड से सिहर रहे थे, जैसे पूछ रहे हों—अबकी बार कौन हमें जोतेगा? आलू खोदने के लिए खेत में आदमी नहीं, भालू उतर आया था। प्याज़ के खेतों में बंदर धमा-चौकड़ी मचा रहे थे। गांँव में बच्चे बूढ़े-बुजुर्ग यह तमाशा देख रहे थे और सोच रहे थे कि अब पहाड़ की खेती जानवरों की दया पर ही बची है। बच्चे स्कूल में हैं, जहांँ उन्हें शिक्षा और मिड-डे मील की पानी जैसी दाल ज्यादा मिल रही है। वह दाल इतनी पतली कि उसमें चेहरा तक नज़र आ जाए। भात इतना गीला कि बिना दूध-चीनी की खीर समझ लो। बच्चे किताबों के लिए कम, थाली के उस दाल-भात के लिए ज्यादा स्कूल जा रहे थे।

इधर बलुवाकोट का मोहन दाज्यू अपनी पत्नी हेमा से कह रहा था—“हेमा, सुना है हल्द्वानी में एक कमरा मिल रहा है। छोटा ही सही, पर शहर में है। बच्चे की वहांँ अच्छी स्कूलिंग होगी, और अस्पताल भी पास रहेंगे।” हेमा ने खिड़की से झांँकते बादलों को देखा, जो मानो सुन रहे थे और हंँस रहे थे। बोली—“यहांँ तो सूरज रोज देखने को मिलता है, तारों की गिनती कर लो, पर वहांँ? वहांँ धुआंँ मिलेगा, ऑटो के हॉर्न, गाड़ियों का जाम और एंबुलेंस की आवाज़। बच्चे को नींद नहीं आएगी।” मोहन हंँसा—“बच्चा सो लेगा, अरे चिंता मत कर। हमें तो शहर में मकान बनाना ही पड़ेगा, चाहे आधा कमरा ही क्यों न हो।”

उधर पौड़ी गढ़वाल के थलीसैंण का गणेश भैजी भी अपनी पत्नी दीपा से यही चर्चा कर रहा था। दीपा बोली—“सुनो, गांँव के स्कूल में तो बस राम के भरोसे पढ़ाई है। मास्टरजी हफ्ते में दो दिन आते हैं, और तीन दिन शादी-ब्याह या चुनाव प्रचार में जाते हैं। बच्चों को भविष्य चाहिए। सुना है देहरादून में बड़े-बड़े स्कूल हैं, वहांँ बच्चे टिफिन लेकर जाते हैं। ब्रेड, ऑमलेट, फ्रूट्स! चाहें खाएंँ या न खाएंँ, पर टिफिन स्टाइलिश होना चाहिए।” गणेश ने सिर खुजाते हुए कहा—“दीपा, टिफिन का स्टाइल दिखाना है या बच्चों को पढ़ाना है?” दीपा ने तुरंत पलटकर कहा—“गांँव में तो बच्चे दाल-भात के लिए स्कूल जाते हैं, यहांँ टिफिन के लिए जाएंगे, यही तो फर्क है!”

गांँव की जिंदगी कितनी भी सुंदर क्यों न हो—आसमान बड़ा, तारे चमकीले, हवा शुद्ध, पानी के नौले से मीठा झरना बहता हो—पर वहांँ चिकित्सा यमराज के भरोसे और शिक्षा राम भरोसे है। गांँव में जब बच्चा बीमार पड़ता है तो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की एएनएम दीदी आती हैं और कीड़े मारने वाली गोलियांँ पकड़ा जाती हैं। विटामिन-डी, आयरन की गोलियांँ बांँट दी जाती हैं, और कहती हैं—“बच्चों को धूप में खिलाओ, सब ठीक हो जाएगा।” गांँव वाले भी मान जाते हैं, जैसे धूप ही सारी बीमारियों की दवा हो।

शहर की तरफ देखो, तो अस्पतालों में अलग तमाशा है। हल्द्वानी के अस्पताल में एक बार एक मरीज को मुर्दा समझकर श्मशान तक ले जाया गया। जब चिता तैयार हुई, तो वह उठ बैठा। लोग भागे, फिर हंँसे। गांँव के लोग यह किस्सा सुनते तो कहते—“शहर की दवा इतनी जोरदार है कि मुर्दे भी उठ जाते हैं।” और शहर के लोग कहते—“शहर का अस्पताल है, यहांँ तो मुर्दा और मरीज का फर्क भी समझ नहीं आता।”

इधर गांँव से जब रोडवेज बसें शहर की ओर निकलती हैं, तो दृश्य ही अलग होता है। थलीसैंण से देहरादून और बलुवाकोट से हल्द्वानी जाने वाली बसें इतनी भरी रहती हैं कि बस की छत तक पर लोग बैठे होते हैं। कुछ लोग दरवाजे पर लटकते हैं, मानो बस नहीं, कोई झूला हो। बच्चे गोद में, बकरियांँ पैरों तले, और ट्रंक छत पर। ड्राइवर हॉर्न बजाता हुआ पहाड़ की संकरी सड़कों पर बस दौड़ाता है और हर यात्री भगवान को याद करता है। पहाड़ भी तो डायनासोर जितने बड़े विशाल हैं। शहर पहुंँचते-पहुंँचते यही बसें थकी घोड़ियों की तरह हांँफने लगती हैं।

मोहन दाज्यू जब पहली बार हल्द्वानी पहुंँचे, तो उन्हें लगा कि वह किसी अलग ही दुनिया में आ गए हैं। गाड़ियों का धुआंँ ऐसा कि आंँखों से आंँसू आने लगे। हॉर्नों का शोर ऐसा कि पहाड़ के भोटिया कुत्ते भी फेल। कोई एक चिड़िया देखी तो अपने गांँव की चिड़ियों की चहचहाहट याद आ गई। पर यहांँ एक छोटा सा कमरा ढूंढा, जिसमें मुश्किल से बिस्तर और एक स्टोव समा सके। पर मोहन की आंँखों में सपने थे—“बच्चा यहीं पढ़ेगा, यहीं डॉक्टर बनेगा, यहीं से IAS बनेगा।” हेमा चुपचाप सोच रही थी—“गांँव में खुला आकाश, हवा, पानी सब छोड़ आए, और यहांँ चार दीवारों में घुटन के लिए आ गए।”

गणेश भैजी भी देहरादून में कमरे की तलाश में थे। उन्हें एक कॉलोनी में एक कमरा मिला, जिसके बगल में नाली बह रही थी। लेकिन उन्होंने सोचा—“ठीक है, नाली है तो क्या हुआ, स्कूल पास है, बाजार पास है, नौकरी का भी चांस है।” दीपा हंँसते हुए बोली—“हम तो पहाड़ से आए हैं, यहांँ नाली का पानी भी गंगाजल समझ लो।” दोनों हंँस दिए, मगर भीतर कहीं पहाड़ की याद खटकती रही।

गांँव के खेत अब बंजर होते जा रहे थे। गाय, भैंस, बकरियांँ उदास घूमती थीं, क्योंकि उन्हें चराने वाले बच्चे अब शहर के छोटे कमरों में किताबों और टिफिन के बोझ तले दबे थे। गांँव की नदियांँ पागल होकर चट्टानों से टकरातीं, मुंँह से पानी फेंकतीं, पर उन्हें देखने वाला कौन? अब गांँव में बस बूढ़े और जानवर रह गए थे। खेतों की मेड़ों पर उगती घास, जंगली झाड़ियांँ मानो कहती हों—“तुम्हारे शहर के मकान हमें रास नहीं आएंगे, हम तो यहीं रहेंगे।”

शहर के स्कूलों का भी हाल कम मजेदार नहीं था। बच्चों को ब्रेड, ऑमलेट, फ्रूट्स टिफिन में दिए जाते। मांँ-बाप सोचते—“बच्चा पढ़ाई करेगा।” लेकिन बच्चे तो टिफिन स्कूल पहुंँचते ही दोस्तों से अदला-बदली कर लेते। ब्रेड गया, बिस्किट आया। ऑमलेट गया, मैगी आई। पढ़ाई से ज्यादा टिफिन की राजनीति चलती। गांँव के बच्चे दाल-भात की प्लेट के लिए स्कूल जाते, वही शिक्षा का प्रसाद था और शहर के बच्चे टिफिन के आदान-प्रदान के लिए। फर्क बस इतना था कि गांँव में भूख पढ़ाई से बड़ी थी, शहर में दिखावा भूख से बड़ा था।

धीरे-धीरे मोहन दाज्यू और गणेश भैजी दोनों का परिवार शहर में रम गए। पर हर बार जब सर्दी आती और धुंँध छाती, तो उन्हें पहाड़ की याद सताती। मोहन दाज्यू सोचते—“वहांँ तो सुबह सूरज की किरणें सीढ़ीनुमा खेतों पर सुनहरी झालर डालती थीं। यहांँ सूरज दिनभर धुएंँ में लुका-छिपी खेलता है।” गणेश भैजी सोचते—“वहांँ तारों से भरा आकाश होता था, यहांँ रात में बस स्ट्रीट लाइट की टिमटिमाहट।”

पर बच्चों की पढ़ाई, मेडिकल सुविधाएं, और नौकरी का सपना इतना बड़ा था कि इन सब बातों पर हंसी-ठिठोली कर आगे बढ़ जाते। कभी गांँव फोन करते तो वहांँ के रिश्तेदार कहते—“खेत बंजर हो गए हैं, आलू अब भालू खोद रहे हैं, और प्याज़ टमाटर बंदर खा रहे हैं।” इस पर मोहन और गणेश दोनों हंँसते और कहते—“ठीक है, खेती जानवरों को ही सौंप दो, हम शहर में मकान बना रहे हैं।”

शहर का मकान अब सपना नहीं, मजबूरी था। गांँव की खुली हवा, तारे, सूरज, बारिश, गधेरे और नौले सब पीछे छूट चुके थे। पर इन सबकी कीमत पर शहर का मकान बना, जिसमें सपनों की दीवारें थीं और व्यंग्य की छत। आखिर गांँव से शहर तक का सफर हंँसी और व्यंग्य से भरा हुआ था—जहांँ गांँव में भालू , सूअर और बंदर खेतों के राजा थे, वहीं शहर में हॉर्न और धुआंँ जिंदगी के मालिक। दोनों जगह का सच अलग था, पर दोनों में एक जैसा—जीवन किसी का आसान नहीं, बस दिखावा अलग-अलग है।

मोहन दाज्यू अपनी छत पर बैठे थे। ईंट-पत्थरों से बने उस किराए के घर की दीवारों को देखते हुए मुस्कराए—“ये मकान मेरा है, बस उतना ही जितना बैंक चाहे।” पत्नी ने पूछा, “तो हमारा घर कब होगा?” मोहन दाज्यू ने सिर झुकाकर जवाब दिया, “घर तो गाँव में था, यहाँ तो सिर्फ़ कमरे हैं।” बच्चे नीचे गली में टूटी चप्पल को फुटबॉल बनाकर खेल रहे थे, और बार-बार मासूमियत से पूछते—“पापा, हमारे भी गाँव जैसा आँगन होगा?” मोहन दाज्यू के होंठों पर मुस्कान थी, पर आँखों में वही खामोशी थी, जो हर महीने बैंक की ईएमआई की पर्ची के साथ आती थी। मोहन दाज्यू सोचने लगे कि जितना बड़ा मकान शहर में बनता है, उतना ही छोटा आदमी अपनी ही सोच में हो जाता है। मकान ऊपर उठाने के चक्कर में आंँगन छोटा हो जाता है। रिश्ते और संबंध और भी छोटे।

उधर पौड़ी गढ़वाल के गणेश भैजी थे, जिनकी सरकारी नौकरी ने उन्हें सुरक्षित बना दिया था, लेकिन भीतर का असुरक्षित आदमी हर वक्त चिल्लाता था। पत्नी ने ताना मारा—“इतना तनाव क्यों? तुम्हें तो पेंशन भी मिलेगी।” गणेश भैजी ने गहरी साँस लेकर कहा—ओल्ड पेंशन स्कीम थोड़ी ना है अब ..! अब तो नई पेंशन स्कीम है। वैसे—“तनाव केवल पेंशन का ही नहीं है दीपा , तनाव इस बात का है कि हम बच्चों को गाँव की धूप, अपने खेत, गधेरे, संस्कृति , अपनापन , रिश्ते नहीं दे पाए, सिर्फ़ ट्यूशन फीस , शिक्षा और शहरी स्क्रीन की रोशनी दी।” बच्चे महँगे स्कूल की किताबों में उलझे रहे, लेकिन दादी की कहानियों में कभी नहीं। गणेश भैजी के चेहरे पर व्यंग्य भरी मुस्कान थी—“हमने बच्चों को मकान तो दिया, मगर घर छीन लिया। मिट्टी की गंध की जगह एयर प्यूरीफ़ायर पकड़ा दिया।” गणेश भैजी सोचने लगे कि शहर में मकान आदमी को थामता है, जबकि गाँव में आदमी घर को थामे रहता है।



शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

शिक्षा का ताबीज़ (कहानी) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी (उत्तराखंड प्रांत)

 शिक्षा का ताबीज़ (कहानी)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी  (उत्तराखंड प्रांत)


सुबह के आठ बज रहे थे। पहाड़ी कस्बे के सरकारी महाविद्यालय का बरामदा ठंड में जम-सा गया था। दीवारों पर पुरानी पोस्टरें, आधे छूटे चुनावी नारे और कोने में टंगा बिजली का पंखा—जो वर्षों से घूमना भूल गया था—सब मिलकर मानो बता रहे थे कि यहाँ चीज़ें सिर्फ दिखाने के लिए हैं, चलने के लिए नहीं। बरामदे में शिवांगी खड़ी थी—अंतिम वर्ष की छात्रा, हाथ में फटी डायरी, आँखों में सवाल और चेहरा ऐसा जैसे पिछले साल के अपने रद्द रिज़ल्ट का बोझ अब भी उठाए हुए हो।

चपरासी लालू हाँफते हुए आया, हाथ में मुड़ा-तुड़ा नोटिस..! 

“सुनो-सुनो! आदेश आया है—आज से हर छात्र को मिलेगा शिक्षा का ताबीज़। इसे पहनते ही पढ़ाई में मन लगेगा, रिज़ल्ट सुधरेगा, और जिंदगी बदल जाएगी।”

बरामदे में हल्की हंसी दौड़ गई। मास्टर साहब—जो कभी गणित पढ़ाते थे, अब मीटर रीडिंग और बिजली बिल वसूली में महारत हासिल कर चुके थे—पास आकर बोले,

“बेटी, ये ताबीज़ बिजली कटौती जैसा है—शोर बहुत करता है, लेकिन रोशनी नहीं देता।”

तभी प्रिंसिपल साहब निकले। फटा जूता, सिलेंडर जैसा पेट, हाथ में आधा चाय का गिलास, और मुस्कान—वही जो हर सरकारी मीटिंग में ‘हम सब अच्छा कर रहे हैं’ कहने के लिए लगाई जाती है।

“देखो बेटा,” उन्होंने अपनी भारी आवाज में कहा, “ये ताबीज़ पढ़ाई के लिए नहीं, व्यवस्था के लिए है। जैसे बैल गाड़ी खींचता है—धीरे-धीरे, और कभी-कभी उल्टी दिशा में।”

शिवांगी ने हिम्मत की, “सर, इससे शिक्षा सुधरेगी?”

उन्होंने पेट पर हाथ फेरते हुए कहा, “सुधर जाएगी… जैसे ही नेतागिरी सुधर जाएगी, ठेकेदार ठेका छोड़ देंगे, और बल्ब खुद जलना सीख जाएगा।”

महाविद्यालय की सीढ़ियों पर उस दिन असामान्य भीड़ थी। कम्प्यूटर लैब में मशीनें बार-बार “पेट खराब” का बहाना बनाकर बंद हो रही थीं। स्क्रीन पर वही एरर मैसेज—सिस्टम इज नॉट रिस्पॉन्डिंग—जैसे बेरोजगार युवाओं की जिंदगी का नारा हो: सिस्टम इज नॉट रिस्पॉन्डिंग। किराएदार प्रोफेसर बाथरूम के फर्श पर फिसलकर घर बैठे थे, लेकिन उनके नाम से तीन मीटिंग के मिनट्स पास हो चुके थे।

इसी अफरा-तफरी में मदारी आ गया। कंधे पर बन्दर, हाथ में डुगडुगी—

“भाइयों और बहनों ! यही है असली शिक्षा। मिलेगी सबको दीक्षा..! 

डिग्री लेने से पहले डुगडुगी बजाना ज़रूरी है।”

बन्दर ने ताबीज़ को ओलिंपिक मशाल की तरह उठाया, भीड़ ने ताली बजाई, और शिवांगी ने सोचा—ये मशाल नहीं, बुझा हुआ बल्ब है—जिसे दिखावे के लिए टांगा गया है, रोशनी देने के लिए नहीं।

गाँव के महाविद्यालय में उस दिन चाय के साथ ‘गोबर का गुड़’ पर चर्चा थी।

पहला शिक्षक—“ठंड का फंड इस बार नेताजी के भाषणों में खर्च होगा।”

दूसरा—“और हीटर सिर्फ प्रिंसिपल के कमरे में चलेगा। बच्चों के लिए ताबीज़ काफी है।”

इसी बीच मंच पर एक अनपढ़ नेता का अभिनय हुआ—

“हम शिक्षा हर घर पहुँचाएँगे… बस किताबें बाद में भेजेंगे।” पेपर छुट्टियों में करवाएंगे।

पीछे खड़ा ठेकेदार मुस्कुराया, “और बिल पहले ही बना देंगे।”

शिवांगी को यह दृश्य नदी और कीचड़ के संगम जैसा लगा—जहाँ साफ़ पानी और गंदगी दोनों साथ-साथ बहते हैं, और कोई भी एक-दूसरे से अलग नहीं होता।

पुलिस चौकी के सामने एक आदमी बैठा था—पहले का टॉपर, अब “कामयाब बेरोजगार” की सूची में नाम। गले में ताबीज़, आँखों में थकी हुई उम्मीद का टार्च।

शिवांगी ने पूछा, “भैया, ताबीज़ काम करता है?”

वह हंसा—“पहनते ही दिमाग ऐसा घूमता है जैसे बल्ब में बिजली आकर भी जलने से मना कर दे। नौकरी तो दूर, अब तो अपना नाम भी याद नहीं रहता।”

पास खड़े डाक्टर ने ठहाका लगाया—“ये सामान्य है। हमारे यहाँ पढ़ाई का असर दिमाग पर कम और पेट पर ज्यादा पड़ता है।”

जंगल से लौटते समय पहाड़ी महाविद्यालय के बच्चों ने आसमानी बिजली की गड़गड़ाहट सुनी। मानों जैसे बल्ब फ्यूज हो गया, और बच्चे ताबीज़ की ओर ऐसे देख रहे थे जैसे उससे रोशनी फूट पड़ेगी।

तभी शाम तक आदेश आया—“कल से चुनाव ड्यूटी है, कक्षाएँ बंद।”

मदारी ने डुगडुगी बजाई, “यही है असली शिक्षा—पढ़ाई का वादा, नेतागिरी का फायदा।”

बन्दर ने सिर हिलाया जैसे कह रहा हो, “सिलेबस यही है, इसमें बदलाव नहीं।”

शिवांगी को यह पूरा खेल मनोवैज्ञानिक प्रतीकों का जाल लगा। ताबीज़ मरीज़ के पर्चे जैसा था—दवा का नाम लिखा, लेकिन दवा ही नहीं।

प्रिंसिपल का “बिमारी का पंचनामा” फाइलों में दर्ज था—पेट फूलने से लेकर टाइपिंग स्पीड धीमी होने तक—लेकिन इलाज का कॉलम खाली।

ठंड के दिनों में कम्प्यूटर लैब में बैठना किसी परीक्षा से कम नहीं था—स्क्रीन जम जाती, की-बोर्ड की चाबियाँ कांपतीं, और बिजली कटते ही लैब अंधेरे में डूब जाती।

मदारी ने ताना मारा, “जब ये बन्दर प्रिंसिपल बनेगा और फटा कुर्ता पहनकर मीटर रीडिंग लेने जाएगा, तब कम्प्यूटर भी गणित पढ़ा देगा।”

सब हंसे, लेकिन शिवांगी के होंठ सिले थे—उसे पता था कि इस मजाक में सच का मील का पत्थर गड़ा है।


फिर आया ताबीज़ वितरण का दिन। वह भी रविवार को। मंच पर नेता, ठेकेदार, मदारी, प्रिंसिपल, और बन्दर सब विराजमान थे।

नेता ने ऐलान किया, “ये ताबीज़ पहनते ही ज्ञान अपने आप दिमाग में उतर आएगा।”

शिवांगी ने अपना ताबीज़ खोला—अंदर न किताब, न कलम—बस कीचड़, बिजली का अधूरा बिल, टाइम-टेबल और चुनाव ड्यूटी की सूची।

भीड़ ताली बजा रही थी, मदारी डुगडुगी बजा रहा था, और बन्दर ताबीज़ चबा रहा था।

शिवांगी को लगा यह शिक्षा नहीं, मदारी का खेल है—जहाँ भीड़ को बस व्यस्त रखना असली मकसद है।


रात को आसमान में सितारे ऐसे चमक रहे थे जैसे कोई बिजली मीटर की रीडिंग गिन रहा हो।

शिवांगी ने ताबीज़ नदी में फेंक दिया, जो बहते ही कीचड़ में बदल गया।

उसे लगा, असली शिक्षा ताबीज़ से बाहर है—जहाँ सवाल पूछने पर उत्तर किताब से आता है, डुगडुगी से नहीं।

लेकिन कस्बा, गाँव और शहर सब इस खेल के आदी थे—जैसे बिजली कटने पर भी पंखे को टांगकर रखा जाता है, उम्मीद में कि कभी तो घूमेगा।

गुरुवार, 14 अगस्त 2025

स्कूल की छुट्टी (कहानी) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड

स्कूल की छुट्टी (कहानी)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड 

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सुबह के धुंधलके में पहाड़ ऐसे लग रहे थे जैसे किसी ने सफ़ेद रजाई ओढ़ ली हो। बादल, जैसे आलसी सरकारी बाबू, चुपचाप घाटियों में बैठकर चाय पी रहे थे और सोच रहे थे कि आज थोड़ा ज़्यादा बरसें, ताकि काम करने वालों को बहाना मिले और न करने वालों को मौका। हवा में ठंडक थी, लेकिन बादलों में गर्मजोशी। वे धीरे-धीरे सरकते हुए गांँवों के ऊपर इकट्ठा हो गए, जैसे कोई अफसर दफ्तर में देर से पहुंचकर भी बैठक बुला ले। पहली बूँद गिरते ही कच्ची सड़कों ने खुद को नदी घोषित कर दिया। मिट्टी ने अपने सारे रंग छोड़ दिए और पानी में मिलकर बहने लगी। पुलों ने इस्तीफ़ा दे दिया—“हम इतनी जिम्मेदारी नहीं उठा सकते।” पगडंडियां अचानक गायब हो गईं, मानो कह रही हों कि आज हमें भी छुट्टी चाहिए।

गांँव में लोग सुबह की चाय पी ही रहे थे कि मोबाइल पर टन-टन की आवाज़ आई। शिक्षा विभाग का संदेश—“भारी वर्षा के कारण सभी विद्यालय आज बंद रहेंगे।” आदेश उतनी तेज़ी से गांँव-गांँव फैला जितनी तेज़ी से पहाड़ों में बिजली चली जाती है और चाय की केतली की भपक दुकानों में खुशबू फैलाती है। बच्चे, जो रोज़ सुबह उठते ही बस्ता देखकर सुस्त हो जाते थे, आज बिस्तर छोड़कर खिड़की से बारिश का नजारा लेने दौड़ पड़े। राजू, जो किताब खोलते ही जम्हाई लेने का मास्टर था, आज बारिश में नंगे पैर दौड़ रहा था। उसकी कागज की नाव तेज़ बहाव में ऐसे भाग रही थी जैसे सपनों की नौकरी विदेश में मिल गई हो। कमला ने हाथ में छाता लिया, लेकिन वह छाता भी बरसात में ऐसे नाच रहा था जैसे कोई नेता चुनावी रैली में—शोर ज्यादा, काम कम। पहिले तो छाता खुला ही नहीं जब खुला तो पैराशूट बन गया। बच्चों की टोली कूद-फांद करती, पानी में छपाक-छपाक करती, मानो बरसात कोई बड़ा त्योहार हो और वह सब मुख्य अतिथि हों।

गांँव के मास्टर तिवारी जी बरामदे में ऊन का मफलर बुन रहे थे। हर टांका मानो कह रहा हो—“आज पाठ नहीं, पकौड़े होंगे।” उनके चेहरे पर संतोष का भाव था, जैसे प्रकृति ने खुद उन्हें अवकाश पत्र दे दिया हो। उनकी पत्नी ने पूछा, “आज बच्चों को पढ़ाने का मन नहीं?” तिवारी जी ने गंभीर लहजे में कहा, “प्रकृति जब पढ़ा रही है जलचक्र, तो मैं क्यों बीच में दखल दूंँ?” उनका यह दर्शन न केवल व्यावहारिक था बल्कि आलस्य का भी उत्तम उदाहरण था।

बरसात में पहाड़ का भूगोल अपने असली रूप में सामने आता है। झरने बताते हैं कि गुरुत्वाकर्षण किसका बाप है। लुढ़कते पत्थर चेतावनी देते हैं कि स्थिरता सिर्फ किताबों में है। मिट्टी के धसकने से समझ आता है कि आधार कमजोर हो तो इमारत गिरना तय है—चाहे वह घर हो या व्यवस्था। गांँव के ऊपर के रास्ते बहकर गायब हो गए थे और नीचे के रास्ते कीचड़ में ऐसे डूब गए थे जैसे सरकार की योजनाएं फ़ाइलों में।

बारिश थमने पर गांँव की पंचायत में चर्चा छिड़ी। गणेश काका, जो अपने जमाने को इतिहास मानते थे, बोले, “हमारे जमाने में तो बारिश में भी स्कूल जाते थे… बस्ता भीग जाए तो क्या।” पप्पू, जो वर्तमान पीढ़ी का प्रतिनिधि था, तुरंत बोला, “काका, तब शिक्षा पानी में नहीं बहती थी, अब तो बजट से लेकर किताब तक सब बह जाता है।” दीपा की मांँ, जो गांँव के मध्यम वर्ग की आवाज़ थीं, बोलीं, “अब तो बच्चे घर से ऑनलाइन पढ़ते हैं, बरसात में तो और भी आसान।” पप्पू हंसा, “हाँ मौसी, लेकिन नेटवर्क भी तो पहाड़ी है—कभी ऊपर, कभी नीचे।” पकड़ में आ ही नहीं रहा है। एक - दो डंडे से क्या होगा ? इस पर पंचायत में बैठे सब लोग खिलखिला पड़े। हंँसी में छिपी यह सच्चाई सबको चुभ रही थी—बरसात में शिक्षा विभाग से लेकर चाय की दुकान तक, हर कोई ‘सुरक्षा’ के नाम पर आराम चाहता है। जिसका बेटा फौज में है वह छाती चौड़ी कर लेता है।

सोशल मीडिया ने बरसात को और भी रंगीन बना दिया था। हालांकि रंग जिंदगी के अनेक भावों को दर्शाते हैं। गांँव के युवा शिक्षक प्रदीप सर ने छुट्टी मिलते ही इंस्टाग्राम पर फोटो डाल दी—“Rainy day in the hills”। पीछे बहते झरने का वीडियो, जिसमें वे बड़े साहित्यिक अंदाज में खड़े थे। कमेंट आया—“सर, यह स्कूल के पीछे का झरना है ना? तो आप वहीं क्यों नहीं पढ़ा रहे?” सर ने जवाब दिया—“ये जलधारा शिक्षा से भी तेज बह रही है, बेटा।” फेसबुक और व्हाट्सऐप विश्विद्यालय पर बरसात का मेला लगा था। “Rainy Day Vibes” के साथ चाय-पकौड़े की तस्वीरें, बच्चों के कीचड़ में कूदने के वीडियो और शिक्षकों के पोस्ट—“सुरक्षा के लिए छुट्टी जरूरी”, जिनके बैकग्राउंड में गरम भाप उठती कॉफी साफ दिख रही थी।

बरसात में प्रकृति का हर कोना मानो प्रतीक बन जाता है। तेज़ बहाव वाली नालियांँ उस व्यवस्था का रूप ले लेती हैं, जो सबको अपने साथ बहा ले जाती है, चाहे कोई तैयार हो या न हो। पुल, जो बहकर चले जाते हैं, वे कमजोर नीतियों का रूपक हैं, जो पहले मौके पर टूट जाते हैं। और वह ऊंँचे-ऊंँचे पहाड़, जिन पर बादल टिक जाते हैं, वे उस जड़ मानसिकता का प्रतीक हैं, जिसे हिलाना मुश्किल है, चाहे कितनी ही बारिश क्यों न हो।

शाम होते-होते बादल हटे, लेकिन पहाड़ी रास्तों पर सड़कों पर गड्ढों में जमकर कीचड़ और पानी अपलोड हो गया और फिर कीचड़, फिसलन , धुंध और ठंड का साम्राज्य आ गया। बच्चे सोच रहे थे—काश कल भी बारिश हो, ताकि छुट्टी जारी रहे। शिक्षक सोच रहे थे—काश कल बच्चे आधे ही आएं ! और प्रशासन सोच रहा था—काश हर बरसात में हमें ‘तुरंत निर्णय’ लेने का अवसर मिले। यहांँ बरसात सिर्फ पानी नहीं थी, बल्कि एक आईना थी, जिसमें हर कोई अपनी असलियत देख रहा था।

यह दिन गांँव के लिए उत्सव भी था और आलस्य का पर्व भी। बच्चों ने इसे खेल में बदल दिया, शिक्षकों ने आराम में, और प्रशासन ने अपनी ‘सुरक्षा नीति’ में। बरसात ने सबको एक मंच पर ला खड़ा किया, जहांँ हर कोई अपने तरीके से छुट्टी का अर्थ समझा रहा था। अध्यापकगण इस दिन को “अनपेड वर्क-फ्रॉम-होम” मानकर आत्मचिंतन करते हैं—अगले हफ्ते का होमवर्क और भी ज्यादा कैसे दिया जाए।

बरसात में हर पात्र अपने प्रतीकात्मक रूप में था। बच्चे थे ‘स्वतंत्रता की नदियांँ’, जो हर दिशा में बहना चाहती थीं। शिक्षक थे ‘पहाड़ी देवदार’, जो अपनी जगह स्थिर रहकर भी मौसम का आनंद लेते थे। प्रशासन था ‘दूर का बादल’, जो गरजता ज्यादा और बरसता कम था। और गांँव का आम आदमी था ‘पगडंडी’, जिस पर सबका आना-जाना तो होता है, लेकिन उसका हाल पूछने वाला कोई नहीं।

बरसात ने दिखा दिया कि शिक्षा व्यवस्था चाहे कितनी भी आधुनिक हो जाए, इंटरनेट और स्मार्टफोन कितने भी पहुंँच जाएं, पहाड़ में छुट्टी का मतलब अब भी वही है, जो आजादी से पहिले था। कि आराम, पकौड़े, और खिड़की से बाहर बरसते पानी को देखना। यह भी तय है कि बरसात का यह प्रतीकात्मक खेल हर साल दोहराया जाएगा। प्रकृति अपनी भूमिका निभाएगी, और हम सब अपनी-अपनी पुरानी स्क्रिप्ट। फर्क बस इतना होगा कि फोटो अब और ज्यादा हाई-रेज़ॉल्यूशन में आएंगे, और ‘Rainy Day’ का हैशटैग और लंबा होगा।

बरसात यहांँ एक मौसम नहीं, बल्कि एक सामूहिक बहाना है—काम से बचने का, जिम्मेदारी टालने का और बचपन जीने का , और यही उसका सबसे सटीक, सबसे सजीव, और सबसे व्यंग्यात्मक रूप है। हालांकि प्रकृति हम सबकी कल्पनाओं से भी अधिक सुंदर है। बरसात एक उपमान।

मंगलवार, 12 अगस्त 2025

बादल, तुम्हारे फटने से…... ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 बादल, तुम्हारे फटने से…...

(धराली, उत्तर काशी की स्मृति में)

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©डॉ. चंद्रकांत तिवारी  (उत्तराखंड प्रांत)


बादल, तुम इस कदर फटे कि मेरी ज़िंदगी के सारे कपड़े बेतहाशा फट गए

अब ऐसा कोई भी नहीं जो इन कपड़ों को फिर सी सके, 

और ऐसा कोई दिल नहीं जो मेरे आंँसुओं के वजन को समझ सके

तुमने पानी के साथ मेरे सपनों की छत भी बहा दी

मेरी हँसी का रंग भी धो डाला।


मैं अब मिट्टी के नीचे दब गया हूँ

एक ऐसी मिट्टी, जो कीचड़ और विशाल पत्थरों से मेरी सांँसों को दबोच चुकी है

क्या तुम देख सकते हो मेरे हिलते हुए हाथ

जो अब सिर्फ मदद की आखिरी पुकार हैं ? 

क्या तुम मेरी बुझती हुई सांँसों को लौटा सकते हो

ताकि मैं फिर से जीवन का आकाश देख सकूंँ ?


अगर तुम्हारे हृदय में करुणा बची है

तो मेरे इशारे को समझो और मुझे उठाओ

मुझे इस मलबे से बाहर निकालो

ताकि मैं फिर से खेत में हल चला सकूंँ

घर के चूल्हे में आग जला सकूंँ

और अपनी मांँ की आंँखों में नमी के बजाय चमक ला सकूंँ

क्योंकि बादल, पानी से जीवन भी बनता है

पर जब तुम फटते हो

तो जीवन का ताना-बाना भी बिखर जाता है

आंँखों से बरसात उतर आती है।


बादल, तुम इस तरह फटे कि मेरी ज़िंदगी का हर टुकड़ा बिखर गया

कपड़े फटे, पर उससे पहले मेरी उम्मीदों का सीवन टूट गया


मांँ की गोद में रखा अनाज बह गया

चूल्हे की आख़िरी आग ठंडी हो गई


मैं मिट्टी के नीचे दबा हूँ, सांँसें रुक-रुक कर रो रही हैं

कीचड़ और पत्थरों ने मेरे सीने का रास्ता बंद कर दिया है


क्या तुम्हें मेरे हिलते हुए हाथ दिख रहे हैं, बादल ?

ये हाथ अब सिर्फ मदद नहीं, आख़िरी विदाई के इशारे हैं


मेरी बुझती हुई सांँसें लौटाओ

ताकि मैं फिर से अपनी धरती को सींच सकूंँ

पानी से, पर मौत से नहीं।

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी