राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) धर्म, संस्कृति और मानवता : राष्ट्रवाद के विशेष संदर्भ -
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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भारतभूमि की आत्मा उसके प्राणतत्व में निहित है, और वह प्राणतत्व है—सनातन धर्म। युगों से यह भूमि न केवल ऋषियों-मुनियों का तपोवन रही है, बल्कि धर्म, संस्कृति और मानवता का अखंड स्रोत भी रही है। जब-जब विश्व ने अंधकार और असंतुलन का सामना किया, तब-तब इस धरती से यह उद्घोष गूँजा—“आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।” यही उद्घोष मानवता की रक्षा, संस्कृति की रक्षा और राष्ट्रवाद की सशक्त घोषणा है। इसी भाव को नवजागरण की धारा प्रदान करता है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिसके स्वर से गूँजता है हिंदुत्व का शंखनाद और सनातन संस्कृति का विजयगान।
मानव जीवन की परिभाषा मात्र भौतिक उपलब्धियों और सांसारिक सुखों तक सीमित नहीं है। जब तक जीवन में धर्म की आधारशिला, संस्कृति की छवि और मानवता की सुवास न हो, तब तक मनुष्य पूर्ण नहीं माना जा सकता। यही दृष्टि भारत की आत्मा है और यही भावनाएँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरक धारा के रूप में प्रवाहित होती रही हैं।
सनातन धर्म कोई एक पंथ या संप्रदाय का नाम नहीं, यह तो वह शाश्वत सत्य है जो अनादि से प्रवाहित है। यह केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन का पूर्ण दर्शन है। संघ इसी सत्य का प्रतिपादन करता है कि धर्म तभी जीवित है जब वह आचरण में उतरे। व्यक्ति, समाज और राष्ट्र तभी सशक्त होंगे जब उनका चरित्र धर्म और संस्कृति से ओत-प्रोत होगा। यही धर्म का मर्म है और यही राष्ट्रवाद की आत्मा है—जहाँ प्रत्येक नागरिक स्वयं को राष्ट्र की आत्मा से अभिन्न मानता है।
आज का युग उपभोक्तावाद और भौतिकता की अंधी दौड़ का है। मनुष्य ने अपने अस्तित्व को केवल सुख-सुविधाओं में बाँध लिया है। किंतु संघ स्मरण कराता है कि भारतीयता का मापदंड केवल भौतिक भोग नहीं, बल्कि त्याग, संयम, सेवा और आत्मानुशासन है। स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था—“उठो, जागो और अपने लक्ष्य की प्राप्ति तक रुको मत।” यह आह्वान केवल आत्मोत्थान का नहीं था, बल्कि राष्ट्रोत्थान का भी था। विवेकानंद का राष्ट्रवाद इसी में निहित था कि प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर की शक्ति को पहचानकर राष्ट्र के लिए समर्पित हो। संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक इसी विचार का संवाहक है।
संघ के कार्यों में हम देखते हैं कि धर्म और संस्कृति कोई संग्रहालय की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन का प्रवाहमान स्वरूप हैं। शाखाओं में साधारण स्वयंसेवक जब गीत गाता है, प्रार्थना करता है, दंड उठाता है, तो वह केवल व्यायाम नहीं करता—वह राष्ट्रवाद का संस्कार अपने भीतर भरता है। यह परंपरा केवल अनुशासन की नहीं, बल्कि आत्मगौरव और राष्ट्रीय अस्मिता की यात्रा है।
हिंदू धर्म की विशालता यह है कि वह किसी को पराया नहीं मानता। उसका उद्घोष है—“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।” यही सार्वभौमिक दृष्टि भारत को विश्वगुरु बनाती है। संघ इसी दृष्टि को व्यवहार में उतारने का प्रयत्न करता है। हिंदू राष्ट्र का विचार किसी संकीर्णता का नाम नहीं, बल्कि इस विराट दृष्टि की परिणति है। हिंदू राष्ट्र का अर्थ है वह राष्ट्र जो धर्म, संस्कृति और मानवता के मूल्यों पर आधारित हो। यही राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप है।
भारतीय इतिहास गवाह है कि यहाँ की संस्कृति ने सदैव मानवता का संरक्षण किया। जब रोमन साम्राज्य का वैभव समाप्त हो रहा था, तब नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों से ज्ञान की गंगा प्रवाहित हो रही थी। जब यूरोप अंधकार युग में डूबा था, तब भारत के उपनिषद मानवता के लिए प्रकाश बनकर जगमगा रहे थे। गुरु गोविंद सिंह ने अपने जीवन से यह सिखाया कि राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए बलिदान ही सच्चा आभूषण है। उनके जीवन का प्रत्येक क्षण इस बात का प्रमाण है कि धर्म और राष्ट्रवाद एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं।
भाषा संस्कृति की आत्मा है। संघ का आग्रह है कि मातृभाषा का संरक्षण हो। अंग्रेज़ी या अन्य भाषाएँ ज्ञान अर्जन का साधन हो सकती हैं, लेकिन आत्मा की अभिव्यक्ति मातृभाषा में ही संभव है। रामकृष्ण परमहंस जी ने कहा था—“धर्म को अनुभव करो, केवल चर्चा मत करो।” यह अनुभव तभी संभव है जब भाषा में आत्मीयता हो। मातृभाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि संस्कृति और राष्ट्रवाद का वाहक है।
संघ की सेवा-परंपरा में मानवीय सरोकारों का अद्वितीय रूप दिखाई देता है। बाढ़, भूकंप, महामारी या किसी भी संकट की घड़ी हो, संघ का स्वयंसेवक बिना भेदभाव के सहायता करता है। यह सेवा केवल परोपकार नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद का जीता-जागता उदाहरण है। छत्रपति शिवाजी महाराज जी ने भी अपने जीवन से यह दिखाया कि राष्ट्र की सेवा ही धर्म की सर्वोच्च साधना है। छत्रपति शिवाजी महाराज जी ने अपने पराक्रम से हिंदवी स्वराज्य की स्थापना कर यह संदेश दिया कि राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक अवधारणा नहीं, बल्कि संस्कृति और धर्म की रक्षा का संकल्प है।
भारतीय संस्कृति का आदर्श है—“परहित सरिस धर्म नहीं भाई।” जब हम परहित को धर्म मानते हैं, तभी संवेदनाएँ जागृत होती हैं। संघ का उद्देश्य ऐसा समाज गढ़ना है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्रहित में अपने जीवन को समर्पित करे। यही वह राष्ट्रवाद है जहाँ व्यक्तिगत स्वार्थ मिटकर समाज और राष्ट्र के लिए जीवन खिला देता है।
हिंदुत्व का शंखनाद केवल धार्मिक उद्घोष नहीं, यह राष्ट्रीय आत्मगौरव का उद्घोष है। यह स्मरण दिलाता है कि हम सनातन परंपरा के उत्तराधिकारी हैं। हिंदुत्व का अर्थ संकीर्णता में बंधना नहीं, बल्कि सार्वभौमिकता में विस्तार पाना है। यही शंखनाद जब समाज में गूँजता है तो प्रत्येक नागरिक के भीतर राष्ट्रवाद का दीपक प्रज्ज्वलित होता है।
आज आवश्यकता है कि हम इन आदर्शों को जीवन में उतारें। यदि धर्म केवल ग्रंथों में रहेगा तो वह मृत हो जाएगा, यदि संस्कृति केवल उत्सवों में सिमट जाएगी तो उसका जीवंत स्वरूप समाप्त हो जाएगा। संघ हमें प्रेरित करता है कि धर्म को आचरण में, संस्कृति को व्यवहार में और राष्ट्रवाद को आत्मगौरव में उतारें। यही जीवन की सच्ची साधना है।
संघ के शताब्दी की ओर अग्रसर कार्यकाल ने सिद्ध कर दिया है कि राष्ट्र-निर्माण केवल राजनीति से संभव नहीं। सत्ता बदल सकती है, लेकिन समाज का चरित्र यदि जाग्रत हो जाए तो राष्ट्र स्थायी रूप से सशक्त हो जाता है। यही राष्ट्रवाद का वास्तविक स्वरूप है—चरित्र, संस्कृति और सेवा का समन्वय।
सनातन संस्कृति हमें यह सिखाती है कि जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल भोग नहीं, बल्कि मोक्ष है। भौतिकता की चमक में जब मनुष्य अपना पथ भूल जाता है, तब संघ स्मरण कराता है कि तुम्हारा लक्ष्य केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि राष्ट्र की सेवा और मानवता की उन्नति है। यही राष्ट्रवाद है जहाँ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा राष्ट्रहित में बदल जाती है।
अंततः यही कहा जा सकता है कि धर्म, संस्कृति और मानवता—ये तीनों एक ही सूत्र में गुँथे हुए हैं। धर्म हमें आचरण की दिशा देता है, संस्कृति हमें गौरव और पहचान देती है, और मानवता हमें सेवा और करुणा की प्रेरणा देती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इन तीनों का संगम है। उसका प्रत्येक स्वर, प्रत्येक कार्य, प्रत्येक संदेश यही उद्घोष करता है कि हिंदुत्व का जागरण ही सच्चा राष्ट्रवाद है और यही राष्ट्रवाद संपूर्ण मानवता का उत्थान है। जब यह जागरण होगा तभी विश्व में शांति, करुणा और सद्भाव की स्थापना होगी। यही वह विजयघोष है जो आने वाले युगों में ध्वनित होता रहेगा।
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