राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और युवा शक्ति: 21वीं सदी की चुनौतियाँ
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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भारत माता की संतानो, जब हम आज के भारत की तस्वीर पर दृष्टि डालते हैं तो सबसे पहले हमारी दृष्टि इस देश की युवा शक्ति पर ठहरती है। यही युवा इस राष्ट्र की धड़कन हैं, इसकी ऊर्जा हैं और भविष्य की दिशा भी। विश्व की सबसे बड़ी युवा जनसंख्या भारत के पास है और यही हमारे लिए सबसे बड़ा वरदान है। यदि यह विराट ऊर्जा सही दिशा में प्रवाहित हो तो भारत पुनः विश्वगुरु के सिंहासन पर प्रतिष्ठित हो सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने आरंभ से ही इस सत्य को पहचाना और अपना मूलमंत्र बनाया—“राष्ट्र प्रथम”। संघ जानता है कि यदि युवा जागता है तो राष्ट्र जागता है, और यदि युवा शिथिल हो जाता है तो राष्ट्र भी जर्जर हो जाता है।
संघ की शाखाओं में खिलखिलाते बाल स्वयंसेवकों का अनुशासनबद्ध खेल, प्रार्थना और समरसता यह प्रमाणित करते हैं कि राष्ट्रनिर्माण कोई पुस्तक का अध्याय नहीं बल्कि जीवन का साधना-पथ है। संघ ने हमेशा युवाओं को केवल दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय साधक बनाया है। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था—“मुझे केवल सौ ऊर्जावान, पवित्र और निःस्वार्थ युवा मिल जाएँ तो मैं भारत का कायाकल्प कर दूँ।” यह वचन आज भी संघ की शाखाओं में गूंजता है और युवाओं को यह स्मरण कराता है कि उनकी ऊर्जा केवल व्यक्तिगत सफलता के लिए नहीं, अपितु राष्ट्र के उत्कर्ष के लिए है।
इतिहास साक्षी है कि जब-जब युवाओं ने अपने आत्मबल को राष्ट्र के लिए समर्पित किया, भारत ने नई दिशा पाई। छत्रपति शिवाजी महाराज ने युवावस्था में ही संकल्प लिया था कि भारत की धरती पर विदेशी सत्ता को स्वीकार नहीं करेंगे। छत्रपति शिवाजी महाराज का स्वराज्य केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं था, बल्कि भारतीय समाज के आत्मविश्वास, स्वतंत्रता और न्याय की अनवरत यात्रा की शुरुआत थी। छत्रपति शिवाजी महाराज का स्वराज्य केवल सत्ता या राजसिंहासन पाने का सपना नहीं था, बल्कि यह था जनता के हक़ और आत्मसम्मान का आंदोलन। उनके लिए राज्य का अर्थ था—जनकल्याण, धर्म-सहिष्णुता, न्याय और सुरक्षा। राजनीतिक दृष्टि से उनका स्वराज्य आज भी प्रेरणा है। उन्होंने सत्ता को वंश परंपरा की जागीर नहीं, बल्कि जनता की जिम्मेदारी माना। उनकी शपथ थी कि—“यह स्वराज्य दैवप्रदत्त नहीं, बल्कि परिश्रम, साहस और त्याग से अर्जित करना है।” यही आत्मगौरव आज के युवाओं में भी जागृत होना चाहिए। (RSS) संघ इस चेतना को जगाता है कि भारतीयता केवल शब्द नहीं, बल्कि आत्मा का घोष है।
21वीं सदी के युवाओं के सामने चुनौतियाँ भी कम नहीं। बेरोजगारी, कौशल की कमी, नशाखोरी, मानसिक तनाव और पश्चिमी उपभोक्तावादी संस्कृति ने युवाओं के मार्ग में अनेक अवरोध खड़े किए हैं। सोशल मीडिया का मायाजाल उन्हें आभासी जगत में खींच लेता है, जहाँ वास्तविक जीवन की कठोर साधना के स्थान पर त्वरित सुख और दिखावे की प्रवृत्ति पनपती है। ऐसे समय में संघ का अनुशासन युवाओं को दिशा देता है। डॉ. हेडगेवार जी ने कहा था—“हमारा लक्ष्य ऐसा राष्ट्र निर्माण है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपने को हिंदू संस्कृति का प्रहरी समझे।” यही प्रहरी बनने के लिए युवा शक्ति को आत्मानुशासन और राष्ट्रभावना से सुसज्जित करना अनिवार्य है।
संघ के जीवन में खेल, प्रार्थना और सेवा केवल औपचारिकताएँ नहीं, बल्कि जीवन के प्रशिक्षण मंत्र हैं। गुरुजी गोलवलकर जी ने स्पष्ट कहा था—“व्यक्ति बनता है तो राष्ट्र बनता है। व्यक्ति गिरता है तो राष्ट्र भी गिरता है।” अतः संघ पहले व्यक्ति का निर्माण करता है, उसके चरित्र को दृढ़ करता है और फिर उसी व्यक्ति से राष्ट्र की सेवा का बीज बोता है। जब लाखों स्वयंसेवक प्रतिदिन शाखाओं में खेलते, सीखते और सेवा का संकल्प लेते हैं तो वे केवल स्वयं को नहीं गढ़ते, वे भारत के भविष्य को गढ़ते हैं।
शिक्षा और कौशल विकास में भी संघ की दृष्टि अत्यंत व्यापक रही है। शिक्षण संस्थानों, गुरुकुलों और विभिन्न वैचारिक मंचों के माध्यम से युवाओं को केवल पाठ्यपुस्तक नहीं, बल्कि जीवन-पुस्तक पढ़ाई जाती है। यह शिक्षा उन्हें स्वावलंबन की राह दिखाती है। यही कारण है कि संघ-प्रेरित अनेक संगठन ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं को रोजगार और उद्यमिता की ओर अग्रसर कर रहे हैं।
21वीं सदी के भारत में सामाजिक चुनौतियाँ भी गंभीर हैं। जातिवाद, संप्रदायवाद और असमानता की दीवारें अभी भी समाज में विद्यमान हैं। लेकिन संघ का प्रयास इन्हें तोड़कर एक अखंड भारत की रचना करना है। संघ महिलाओं को समाज की आधी शक्ति मानता है और उनके सशक्तिकरण को आवश्यक मानता है। आपदाओं के समय संघ-प्रेरित स्वयंसेवकों का सेवाकार्य विश्व ने देखा है—चाहे भूकंप हो, बाढ़ हो या महामारी, संघ के कार्यकर्ता प्रथम पंक्ति में खड़े मिलते हैं। यह सेवा केवल राहत का कार्य नहीं, बल्कि “समाज मेरा परिवार है”, 'मैं मेरे राष्ट्र के लिए ' होने का एक जीवंत भावात्मक उदाहरण है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दृष्टि अद्वितीय है। आज प्रवासी भारतीय युवा दुनिया के कोने-कोने में भारतीय संस्कृति का गौरवपूर्ण ध्वज फहरा रहे हैं। “वसुधैव कुटुंबकम्” का आदर्श केवल ग्रंथों तक सीमित न रहकर व्यवहार में भी जीवन बन जाए—संघ इसी दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है। वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने स्पष्ट कहा है—“युवा अपने जीवन का उद्देश्य केवल स्वयं के लिए न खोजें, बल्कि राष्ट्र के लिए तय करें, तभी जीवन सार्थक और प्रेरक होगा।” यही संदेश आज की पीढ़ी के लिए सबसे प्रासंगिक और प्रेरक है।
निस्संदेह, संघ पर समय-समय पर आलोचनाएँ भी होती रही हैं। उसकी राजनीति से निकटता या वैचारिक दृष्टिकोण पर प्रश्न उठते हैं। किंतु सत्य यह है कि संघ का मूल कार्यक्षेत्र राजनीति नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण है। संघ जानता है कि यदि समाज सुदृढ़ और सशक्त होगा, तो राजनीति स्वतः ही राष्ट्रहित में संचालित होगी। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने कहा था—“राष्ट्रवाद कोई संकुचित अवधारणा नहीं, यह तो प्राणों में बसने वाला भाव है।” यही भाव संघ के कार्यकर्ता को प्रेरित करता है कि वह हर परिस्थिति में राष्ट्र के लिए समर्पित रहे, स्वयं परिश्रम करे, पूरी ईमानदारी और मेहनत से राष्ट्र के विकास में योगदान दे। जब व्यक्ति अपने कर्तव्यों और परिश्रम को अपने जीवन का आधार बनाएगा, तभी राष्ट्र के लिए सच्चा समर्पण संभव होगा और यही भाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सबसे बड़ी शक्ति है।
आज का भारत अवसरों का देश है। विज्ञान, तकनीक और नवाचार के क्षेत्र में हमारी युवा पीढ़ी वैश्विक मानचित्र पर अपनी विशिष्ट पहचान बना रही है। किंतु यदि यह अद्भुत प्रतिभा राष्ट्र से कटकर केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित रह गई, तो उसका वास्तविक मूल्य समाप्त हो जाएगा। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था—“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” यह लक्ष्य केवल व्यक्तिगत सफलता का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के उत्थान और सामूहिक गौरव का होना चाहिए।
संघ की शाखाओं में साधारण दिखने वाले स्वयंसेवक ही इस अदृश्य, अटूट शक्ति के प्रतीक हैं। उनका जीवन न किसी पुरस्कार की आकांक्षा में बंधा है, न प्रसिद्धि की लालसा में लिप्त, बल्कि पूरी तरह राष्ट्र की सेवा में निःस्वार्थ रूप से समर्पित है। यही जीवनशैली, यही अडिग आत्मानुशासन, और यही प्रखर राष्ट्रप्रेम आज के युवा के लिए प्रकाशस्तंभ है—जो उन्हें सिर्फ मार्ग दिखाता नहीं, बल्कि उनके हृदय में जागरूकता और साहस की अग्नि प्रज्ज्वलित करता है।
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि 21वीं सदी भारत के लिए अवसरों और चुनौतियों का युग है। यदि हमारी युवा शक्ति राष्ट्र के प्रति सजग, कर्तव्यनिष्ठ और समर्पित हो जाए, तो न केवल भारत पुनः विश्वगुरु बन सकता है, बल्कि वह समग्र मानवता के लिए मार्गदर्शक भी बन सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल एक संगठन नहीं, बल्कि युवाओं का प्रेरक, मार्गदर्शक और संस्कारयुक्त साधक है। छत्रपति शिवाजी महाराज जी की अद्भुत वीरता, स्वामी विवेकानंद जी का प्रखर साहस, आदरणीय डॉ. हेडगेवार जी का दूरदर्शी दृष्टिकोण, गुरुजी गोलवलकर जी का चरित्र निर्माण और आदरणीय मोहन भागवत जी का आह्वान—इन सभी का अद्भुत संगम ही संघ की पहचान है और यही शक्ति युवाओं को राष्ट्र के प्रति उत्साहित करती है।
आज भारत की युवा शक्ति से यही आह्वान है—भारत माता की सेवा ही परम धर्म है, और राष्ट्र का उत्थान ही जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य। यदि हर युवा अपने कर्तव्य का निर्वहन उत्तरदायित्व और निष्ठा के साथ करे, सतत परिश्रम, नैतिक चरित्र और मानवीय मूल्यों को अपना आधार बनाए, जन सरोकार और पर्यावरण जैसे जीवनदायिनी मुद्दों के प्रति आस्था प्रकट करे और शिक्षा, ज्ञान, चिकित्सा, कृषि तथा विज्ञान–तकनीक के विविध क्षेत्रों में ईमानदारीपूर्वक राष्ट्रहित में कार्य करे—तो निश्चित ही भारत वैश्विक स्तर पर एक अद्वितीय पहचान स्थापित करेगा। तब आने वाली पीढ़ियाँ श्रद्धा से कहेंगी—“भारत पुनः जगतगुरु बना, और समस्त मानवता ने यहाँ आकर सत्य, ज्ञान और जीवन का मार्ग पाया।”
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