100 वर्ष की संघ यात्रा: नये क्षितिज
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अपनी स्थापना से लेकर आज तक भारतीय समाज और राष्ट्र के मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में गहरी छाप छोड़ी है। इसकी यात्रा एक सदी को पार करते हुए जब आज के मोड़ पर खड़ी होती है, तो यह केवल एक संगठन की यात्रा नहीं लगती, बल्कि एक ऐसे विचार, भाव और संकल्प का प्रतीक प्रतीत होती है, जिसने भारत की राष्ट्रीय अस्मिता को नई ऊर्जा दी है। “100 वर्ष की संघ यात्रा” न केवल एक ऐतिहासिक मूल्यांकन का अवसर है, बल्कि आने वाले भविष्य के नये क्षितिज को पहचानने और संकल्पित करने का भी समय है।
संघ की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी। उस समय का भारत विदेशी शासन के दमन और अपमान से पीड़ित था। समाज विभाजित था, जातीय और सांप्रदायिक भेदभाव व्यापक था, और राष्ट्रीय चेतना बिखरी हुई प्रतीत होती थी। ऐसे समय में संघ की स्थापना का मूल उद्देश्य भारतीय समाज को एकात्म करना, उसे संगठित शक्ति के रूप में खड़ा करना और राष्ट्रवाद को व्यावहारिक धरातल पर स्थापित करना था। संघ ने राजनीतिक संघर्ष के बजाय सामाजिक संगठन और अनुशासन को अपना साधन बनाया। यह दृष्टिकोण उसे अन्य आंदोलनों से भिन्न बनाता है।
संघ की विचारधारा में राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक सत्ता प्राप्ति का साधन नहीं था, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भारतीय संस्कृति की चेतना को पुनः स्थापित करने का संकल्प था। इस दृष्टिकोण का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि यह भारतीय मानस की गहरी जड़ों को छूता है। भारत की जनता केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की आकांक्षी नहीं थी, वह सांस्कृतिक स्वराज्य भी चाहती थी। संघ ने इसी भाव को आत्मसात किया और राष्ट्रवाद को एक आंतरिक शक्ति के रूप में देखा।
संघ की कार्यपद्धति पर विचार करें तो पाते हैं कि इसने व्यक्ति-निर्माण पर बल दिया। शाखा इसका मुख्य माध्यम बनी। नियमित शाखा के माध्यम से अनुशासन, संगठन, शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण, और राष्ट्र के प्रति निष्ठा विकसित की गई। यह केवल औपचारिक सभा नहीं थी, बल्कि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह सामूहिक अवचेतन को आकार देने की प्रयोगशाला थी। सामूहिक खेल, व्यायाम, प्रार्थना और विचार-विनिमय के माध्यम से व्यक्तित्व को राष्ट्रोन्मुख बनाने का सतत प्रयास संघ ने किया।
संघ का यह दृष्टिकोण कि “व्यक्ति के निर्माण से समाज का निर्माण और समाज के निर्माण से राष्ट्र का निर्माण” होता है, भारतीय समाजशास्त्र और मनोविज्ञान दोनों के अनुकूल प्रतीत होता है। व्यक्ति को यदि अनुशासन, मूल्य और आदर्श मिलें तो वह समाज में सकारात्मक योगदान देता है। संघ ने यही कार्य किया और राष्ट्रवाद को केवल नारेबाजी से अलग एक जीवंत आचरण का रूप दिया।
देशभक्ति और राष्ट्रवाद संघ के लिए केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं रहे। यह व्यवहार और कार्य में अभिव्यक्त होते रहे। 1947 में स्वतंत्रता के उपरांत, जब भारत विभाजन के त्रासद दौर से गुज़र रहा था, लाखों शरणार्थियों की सेवा संघ स्वयंसेवकों ने की। यह सेवा कार्य केवल मानवीय संवेदना का परिचायक नहीं था, बल्कि यह उस राष्ट्रवादी दृष्टि का विस्तार था जो हर भारतीय को परिवार का सदस्य मानती थी। यही दृष्टिकोण बाद में विभिन्न आपदाओं में संघ के स्वयंसेवकों की सक्रिय उपस्थिति के रूप में दिखता है—चाहे वह प्राकृतिक आपदाएँ हों, युद्धकाल की परिस्थितियाँ हों या सामाजिक सुधार के अभियान।
संघ के कार्यों को यदि सामाजिक मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि संघ ने भारतीय समाज में आत्मविश्वास जगाया। शताब्दियों की दासता और उपनिवेशवाद ने भारतीय मानस में हीनभावना भर दी थी। संघ की शाखाओं ने उस हीनता को तोड़ा और व्यक्तियों को यह विश्वास दिलाया कि वे राष्ट्र की रीढ़ हैं। यह आत्मविश्वास सामाजिक परिवर्तन का आधार बना। यही कारण है कि संघ से प्रेरित अनेक संगठनों और आंदोलनों ने शिक्षा, सेवा, आदिवासी कल्याण, ग्रामीण विकास और राष्ट्रीय एकता के क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान किया।
लोगों की संघ के प्रति आस्था का एक बड़ा कारण यह भी है कि संघ ने केवल विचार प्रस्तुत नहीं किए, बल्कि स्वयंसेवकों के माध्यम से उन्हें जीवन में उतारा। “सेवा ही संगठन” का भाव केवल नारा नहीं रहा, बल्कि लाखों स्वयंसेवकों की दिनचर्या का हिस्सा बना। संघ ने एक अनुशासित और नैतिक बल का निर्माण किया, जिसने राष्ट्रवाद को ठोस सामाजिक रूप दिया। यही कारण है कि संघ आज केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक जनआंदोलन जैसा प्रतीत होता है।
100 वर्षों की इस यात्रा में संघ ने अनेक आलोचनाएँ भी झेली हैं। उसे सांप्रदायिक कहकर आरोपित किया गया, राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित कहा गया और कभी-कभी उसे समाज को विभाजित करने का दोष भी दिया गया। किंतु इन आलोचनाओं के बीच भी संघ का कार्य सतत जारी रहा और समाज में उसका प्रभाव बढ़ता गया। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि आलोचनाओं ने संघ को और अधिक दृढ़ बनाया। इसके स्वयंसेवकों ने इन्हें चुनौती के रूप में लिया और अपने कार्यों को अधिक निष्ठा से जारी रखा।
संघ की शताब्दी यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि इसने समाज में संगठन और एकता की भावना पैदा की। आज जब भारतीय समाज वैश्विकरण, उपभोक्तावाद और सांस्कृतिक आक्रमण के दौर से गुजर रहा है, संघ की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यह केवल परंपरागत मूल्यों की रक्षा का कार्य नहीं कर रहा, बल्कि नये क्षितिज की ओर भी अग्रसर है। तकनीक, शिक्षा और आधुनिकता को आत्मसात करते हुए भी संघ भारतीय संस्कृति की जड़ों को सुदृढ़ करने का कार्य कर रहा है।
भविष्य के परिप्रेक्ष्य में संघ की भूमिका और भी व्यापक दिखाई देती है। “नये क्षितिज” का अर्थ है—भारतीयता को वैश्विक संदर्भ में प्रस्तुत करना, समाज में समरसता और समानता की स्थापना करना, और राष्ट्रवाद को संकीर्ण परिभाषा से निकालकर मानवता के व्यापक हित में खड़ा करना। संघ का यह दृष्टिकोण कि “विश्व को परिवार” के रूप में देखा जाए, नये युग का मार्गदर्शन कर सकता है।
संघ की शताब्दी यात्रा पर गहराई से विचार करते हुए यह कहना समीचीन होगा कि यह केवल संगठन की यात्रा नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज की आत्मा की यात्रा है। यह उस चेतना की यात्रा है जिसने गुलामी से मुक्ति पाई, आत्मविश्वास प्राप्त किया और अब विश्व पटल पर अपने अस्तित्व को नई ऊर्जा के साथ प्रस्तुत कर रही है।
संघ ने राष्ट्रवाद और देशभक्ति को केवल नारों तक सीमित नहीं रखा। इसे जीवन का आचरण बनाया, सेवा का रूप दिया और संगठन के माध्यम से समाज में उतारा। लोगों की आस्था और विश्वास इसी कारण संघ से जुड़ा है, क्योंकि यह केवल विचार नहीं, बल्कि आचरण और सेवा का प्रतीक है।
आज 100 वर्ष की इस यात्रा के बाद जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो एक विराट परिदृश्य सामने आता है—लाखों स्वयंसेवक, हजारों शाखाएँ, सैकड़ों सेवा परियोजनाएँ और करोड़ों लोगों का विश्वास। यह उपलब्धि केवल किसी संगठन की नहीं है, बल्कि यह उस राष्ट्र की है जिसने अपनी चेतना को पुनः जगाया है।
भविष्य की ओर दृष्टिपात करते हुए यह अपेक्षा की जा सकती है कि संघ आने वाले समय में और अधिक व्यापक सामाजिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक कार्यों को आगे बढ़ाएगा। यह नये क्षितिज पर भारत को एक आत्मनिर्भर, आत्मगौरवशाली और विश्वगुरु के रूप में स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त करेगा।
संघ की 100 वर्ष की यात्रा हमें यह सिखाती है कि राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि यह सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक चेतना है। यह चेतना ही लोगों के जीवन में विश्वास, ऊर्जा और दिशा देती है। संघ ने इस चेतना को समाज के जीवन में रोपा और उसे पल्लवित किया। यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
इस प्रकार “100 वर्ष की संघ यात्रा” केवल अतीत की स्मृति नहीं है, बल्कि भविष्य का संकल्प भी है। यह यात्रा हमें यह विश्वास दिलाती है कि जब समाज संगठित होता है, जब राष्ट्र की चेतना जागती है और जब सेवा को सर्वोपरि रखा जाता है, तभी नये क्षितिज निर्मित होते हैं। संघ ने यह कार्य किया है और आगे भी करता रहेगा।
इस प्रकार “100 वर्ष की संघ यात्रा” का निष्कर्ष निकाला जाए तो निम्नलिखित बिंदुओं में इसे सूक्ष्म रूप में समझा जा सकता है -
1. संघ की शताब्दी यात्रा : केवल संगठन नहीं, चेतना की यात्रा।
2. 1925 में स्थापना : विभाजित समाज में एकात्मता का संकल्प।
3. राष्ट्रवाद की व्यापक अवधारणा : राजनीति से परे सांस्कृतिक स्वराज्य।
4. शाखा पद्धति : व्यक्ति-निर्माण से राष्ट्र-निर्माण तक
5. सेवा कार्य : शरणार्थियों से आपदाओं तक मानवीय संवेदना का विस्तार।
6. आलोचनाओं के बीच दृढ़ता : चुनौतियों को अवसर में बदलने की क्षमता।
7. सामाजिक-मनौवैज्ञानिक योगदान : आत्मविश्वास और संगठन का निर्माण।
8. वैश्वीकरण और सांस्कृतिक आक्रमण के दौर में संघ की प्रासंगिकता।
9. नये क्षितिज : विश्व को परिवार मानने की दृष्टि।
10. भविष्य का संकल्प : आत्मनिर्भर और विश्वगुरु भारत की ओर।
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