शिक्षा का ताबीज़ (कहानी)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी (उत्तराखंड प्रांत)
सुबह के आठ बज रहे थे। पहाड़ी कस्बे के सरकारी महाविद्यालय का बरामदा ठंड में जम-सा गया था। दीवारों पर पुरानी पोस्टरें, आधे छूटे चुनावी नारे और कोने में टंगा बिजली का पंखा—जो वर्षों से घूमना भूल गया था—सब मिलकर मानो बता रहे थे कि यहाँ चीज़ें सिर्फ दिखाने के लिए हैं, चलने के लिए नहीं। बरामदे में शिवांगी खड़ी थी—अंतिम वर्ष की छात्रा, हाथ में फटी डायरी, आँखों में सवाल और चेहरा ऐसा जैसे पिछले साल के अपने रद्द रिज़ल्ट का बोझ अब भी उठाए हुए हो।
चपरासी लालू हाँफते हुए आया, हाथ में मुड़ा-तुड़ा नोटिस..!
“सुनो-सुनो! आदेश आया है—आज से हर छात्र को मिलेगा शिक्षा का ताबीज़। इसे पहनते ही पढ़ाई में मन लगेगा, रिज़ल्ट सुधरेगा, और जिंदगी बदल जाएगी।”
बरामदे में हल्की हंसी दौड़ गई। मास्टर साहब—जो कभी गणित पढ़ाते थे, अब मीटर रीडिंग और बिजली बिल वसूली में महारत हासिल कर चुके थे—पास आकर बोले,
“बेटी, ये ताबीज़ बिजली कटौती जैसा है—शोर बहुत करता है, लेकिन रोशनी नहीं देता।”
तभी प्रिंसिपल साहब निकले। फटा जूता, सिलेंडर जैसा पेट, हाथ में आधा चाय का गिलास, और मुस्कान—वही जो हर सरकारी मीटिंग में ‘हम सब अच्छा कर रहे हैं’ कहने के लिए लगाई जाती है।
“देखो बेटा,” उन्होंने अपनी भारी आवाज में कहा, “ये ताबीज़ पढ़ाई के लिए नहीं, व्यवस्था के लिए है। जैसे बैल गाड़ी खींचता है—धीरे-धीरे, और कभी-कभी उल्टी दिशा में।”
शिवांगी ने हिम्मत की, “सर, इससे शिक्षा सुधरेगी?”
उन्होंने पेट पर हाथ फेरते हुए कहा, “सुधर जाएगी… जैसे ही नेतागिरी सुधर जाएगी, ठेकेदार ठेका छोड़ देंगे, और बल्ब खुद जलना सीख जाएगा।”
महाविद्यालय की सीढ़ियों पर उस दिन असामान्य भीड़ थी। कम्प्यूटर लैब में मशीनें बार-बार “पेट खराब” का बहाना बनाकर बंद हो रही थीं। स्क्रीन पर वही एरर मैसेज—सिस्टम इज नॉट रिस्पॉन्डिंग—जैसे बेरोजगार युवाओं की जिंदगी का नारा हो: सिस्टम इज नॉट रिस्पॉन्डिंग। किराएदार प्रोफेसर बाथरूम के फर्श पर फिसलकर घर बैठे थे, लेकिन उनके नाम से तीन मीटिंग के मिनट्स पास हो चुके थे।
इसी अफरा-तफरी में मदारी आ गया। कंधे पर बन्दर, हाथ में डुगडुगी—
“भाइयों और बहनों ! यही है असली शिक्षा। मिलेगी सबको दीक्षा..!
डिग्री लेने से पहले डुगडुगी बजाना ज़रूरी है।”
बन्दर ने ताबीज़ को ओलिंपिक मशाल की तरह उठाया, भीड़ ने ताली बजाई, और शिवांगी ने सोचा—ये मशाल नहीं, बुझा हुआ बल्ब है—जिसे दिखावे के लिए टांगा गया है, रोशनी देने के लिए नहीं।
गाँव के महाविद्यालय में उस दिन चाय के साथ ‘गोबर का गुड़’ पर चर्चा थी।
पहला शिक्षक—“ठंड का फंड इस बार नेताजी के भाषणों में खर्च होगा।”
दूसरा—“और हीटर सिर्फ प्रिंसिपल के कमरे में चलेगा। बच्चों के लिए ताबीज़ काफी है।”
इसी बीच मंच पर एक अनपढ़ नेता का अभिनय हुआ—
“हम शिक्षा हर घर पहुँचाएँगे… बस किताबें बाद में भेजेंगे।” पेपर छुट्टियों में करवाएंगे।
पीछे खड़ा ठेकेदार मुस्कुराया, “और बिल पहले ही बना देंगे।”
शिवांगी को यह दृश्य नदी और कीचड़ के संगम जैसा लगा—जहाँ साफ़ पानी और गंदगी दोनों साथ-साथ बहते हैं, और कोई भी एक-दूसरे से अलग नहीं होता।
पुलिस चौकी के सामने एक आदमी बैठा था—पहले का टॉपर, अब “कामयाब बेरोजगार” की सूची में नाम। गले में ताबीज़, आँखों में थकी हुई उम्मीद का टार्च।
शिवांगी ने पूछा, “भैया, ताबीज़ काम करता है?”
वह हंसा—“पहनते ही दिमाग ऐसा घूमता है जैसे बल्ब में बिजली आकर भी जलने से मना कर दे। नौकरी तो दूर, अब तो अपना नाम भी याद नहीं रहता।”
पास खड़े डाक्टर ने ठहाका लगाया—“ये सामान्य है। हमारे यहाँ पढ़ाई का असर दिमाग पर कम और पेट पर ज्यादा पड़ता है।”
जंगल से लौटते समय पहाड़ी महाविद्यालय के बच्चों ने आसमानी बिजली की गड़गड़ाहट सुनी। मानों जैसे बल्ब फ्यूज हो गया, और बच्चे ताबीज़ की ओर ऐसे देख रहे थे जैसे उससे रोशनी फूट पड़ेगी।
तभी शाम तक आदेश आया—“कल से चुनाव ड्यूटी है, कक्षाएँ बंद।”
मदारी ने डुगडुगी बजाई, “यही है असली शिक्षा—पढ़ाई का वादा, नेतागिरी का फायदा।”
बन्दर ने सिर हिलाया जैसे कह रहा हो, “सिलेबस यही है, इसमें बदलाव नहीं।”
शिवांगी को यह पूरा खेल मनोवैज्ञानिक प्रतीकों का जाल लगा। ताबीज़ मरीज़ के पर्चे जैसा था—दवा का नाम लिखा, लेकिन दवा ही नहीं।
प्रिंसिपल का “बिमारी का पंचनामा” फाइलों में दर्ज था—पेट फूलने से लेकर टाइपिंग स्पीड धीमी होने तक—लेकिन इलाज का कॉलम खाली।
ठंड के दिनों में कम्प्यूटर लैब में बैठना किसी परीक्षा से कम नहीं था—स्क्रीन जम जाती, की-बोर्ड की चाबियाँ कांपतीं, और बिजली कटते ही लैब अंधेरे में डूब जाती।
मदारी ने ताना मारा, “जब ये बन्दर प्रिंसिपल बनेगा और फटा कुर्ता पहनकर मीटर रीडिंग लेने जाएगा, तब कम्प्यूटर भी गणित पढ़ा देगा।”
सब हंसे, लेकिन शिवांगी के होंठ सिले थे—उसे पता था कि इस मजाक में सच का मील का पत्थर गड़ा है।
फिर आया ताबीज़ वितरण का दिन। वह भी रविवार को। मंच पर नेता, ठेकेदार, मदारी, प्रिंसिपल, और बन्दर सब विराजमान थे।
नेता ने ऐलान किया, “ये ताबीज़ पहनते ही ज्ञान अपने आप दिमाग में उतर आएगा।”
शिवांगी ने अपना ताबीज़ खोला—अंदर न किताब, न कलम—बस कीचड़, बिजली का अधूरा बिल, टाइम-टेबल और चुनाव ड्यूटी की सूची।
भीड़ ताली बजा रही थी, मदारी डुगडुगी बजा रहा था, और बन्दर ताबीज़ चबा रहा था।
शिवांगी को लगा यह शिक्षा नहीं, मदारी का खेल है—जहाँ भीड़ को बस व्यस्त रखना असली मकसद है।
रात को आसमान में सितारे ऐसे चमक रहे थे जैसे कोई बिजली मीटर की रीडिंग गिन रहा हो।
शिवांगी ने ताबीज़ नदी में फेंक दिया, जो बहते ही कीचड़ में बदल गया।
उसे लगा, असली शिक्षा ताबीज़ से बाहर है—जहाँ सवाल पूछने पर उत्तर किताब से आता है, डुगडुगी से नहीं।
लेकिन कस्बा, गाँव और शहर सब इस खेल के आदी थे—जैसे बिजली कटने पर भी पंखे को टांगकर रखा जाता है, उम्मीद में कि कभी तो घूमेगा।
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