कॉन्ट्रैक्ट टीचर (कहानी)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत
बरसात के बाद का पहाड़ी इलाका हमेशा एक नई किताब की तरह खुलता है। धुले हुए आकाश में पहाड़ों की चोटियाँ साफ झलकती हैं, कहीं-कहीं बादल ऐसे टिके रहते हैं जैसे पहाड़ पर सफेद ओढ़नी डाल दी हो। गाँव की पगडंडियों पर छोटे-छोटे पोखर बन गए हैं जिनमें बच्चे छपाछप करते हुए कागज़ की नाव तैरा रहे हैं। झरनों की ध्वनि दूर से किसी अनसुनी बांसुरी जैसी लगती है। खेतों के किनारे बैठे बगुले, तालाब में तैरती मछलियाँ और गाँव के मंदिर से आती भजन की हल्की गूँज मिलकर एक विचित्र सांगीतिक दृश्य रचते हैं।
दोपहर के समय स्कूल के आँगन से मिड-डे मील की खुशबू उड़ रही है। कहीं दाल का उबाल, कहीं खिचड़ी की सोंधी गंध, और बच्चों के कानों में टीचर की आवाज़ के साथ-साथ थाली-गिलास की खनक भी घुली हुई है। यह पहाड़ है—जहाँ जीवन कठिन है पर रंगों से भरा हुआ भी।
इसी जीवन के केंद्र में है नितांत काम चलाऊ शिक्षक—कभी कॉन्ट्रैक्ट टीचर, कभी अतिथि शिक्षक, कभी संविदा शिक्षक कहलाने वाला वह पात्र, जो पूरे तंत्र की आत्मा भी है और उसकी सबसे कमजोर कड़ी भी।
बरसाती दोपहर में भीगी हुई पगडंडी से मास्टर जगत सिंह आ रहे थे। उनकी छतरी टेढ़ी थी—मानो व्यवस्था की रीढ़ की तरह झुकी हुई। जूतों पर चिपका कीचड़ किसी सरकारी फाइल की धूल जैसा था—जो न धुलता है, न हटता है।
आँगन में पहुँचते ही बच्चे एक स्वर में बोले—
“गुड मॉर्निंग सर!”
जगत सिंह मुस्कराए—
“गुड मॉर्निंग… और गुड लक भी, क्योंकि आज बिजली नहीं है, तो टेस्ट हाथ से लिखवाना पड़ेगा। यह भी एक तरह का प्रायोगिक पाठ है—कि अंधेरे में भी लिखना सीखो।”
पास ही रसोई से खिचड़ी की खुशबू उठ रही थी। मिड-डे मील बाँटती रसोइया बोली—
“मास्साब, आज ज़रा जल्दी करा दीजिए, बरसात में बच्चे भूखे जल्दी हो जाते हैं।”
जगत सिंह ने हल्की हँसी में गहरी व्यथा छिपाते हुए कहा—
“भूख तो हमें भी जल्दी लग जाती है बहन जी… फर्क बस इतना है कि आपकी खिचड़ी वक्त पर पक जाती है, पर हमारी तनख्वाह हमेशा अधपकी रह जाती है।”
बच्चों की खिलखिलाहट, रसोइया की व्यस्तता और मास्टर की ठिठोली—तीनों मिलकर उस शिक्षा-तंत्र की सजीव तस्वीर रच रहे थे, जहाँ व्यंग्य ही अब जीवन की सबसे सच्ची भाषा बन चुकी है।
कक्षा में बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते वे खुद से बुदबुदा रहे थे—“इतनी बारिश में अगर सड़क बह जाए, तो अगली तनख्वाह भी किसी झरने में गुम हो जाएगी।”
बच्चे हँस पड़े। वे समझ नहीं पाए कि यह मज़ाक था या कटाक्ष।
पहाड़ी कस्बे के एक महाविद्यालय में कॉन्ट्रैक्ट लेक्चरर सुधा मैम किताबों का पुलिंदा सँभालती हुई क्लास में दाखिल हुईं। विषय था— हिंदी साहित्य में व्यंग्य परंपरा। उन्होंने मुस्कराकर शुरुआत की—
“हर व्यंग्य किसी न किसी सच्चाई की छाती पर रखा हुआ आईना है।”
कक्षा में बैठे छात्र खिलखिलाकर हँस पड़े।
एक छात्र ने शरारत से पूछा—
“मैम, तो क्या आपका जीवन भी व्यंग्य है?”
सुधा ने क्षणभर रुककर देखा, फिर धीमे स्वर में मुस्कराईं—
“नहीं, मेरा जीवन उस व्यंग्य का फुटनोट है, जिसे सरकार ने लिखा है। असली व्यंग्य तो यही है कि जिस समाज को हम आईना दिखाते हैं, वही समाज हमें धुँधला काँच समझकर किनारे रख देता है।”
कक्षा में एक अजीब-सी चुप्पी उतर आई।
स्टाफरूम में लौटकर, चाय की भाप और पुरानी अलमारी की गंध के बीच, सुधा मैम ने अपने सहकर्मियों से कहा—
“जब तक रिज़ल्ट बनाना है, टाइम-टेबल सँभालना है, या विश्वविद्यालय का निरीक्षण पास कराना है—तब हम स्थायी जैसे हैं। लेकिन जब तनख्वाह बढ़ाने या हक की बात करनी हो, तब हम अचानक अस्थायी हो जाते हैं। यह भी एक किस्म का साहित्य है—नौकरी का निराला छंद। जिसमें तुक मिलती है, पर अर्थ बार-बार टूटा हुआ लगता है।”
स्टाफरूम ठहाकों से गूँज उठा। पर वह हँसी भीतर ही भीतर खुरदरे पत्थरों से टकराकर लौट आई—जैसे बरसात की नमी में भी न सूखने वाला दीवार का सीलन।
यहाँ धर्मेंद्र यादव नाम के नितांत काम चलाऊ प्राध्यापक इतिहास पढ़ा रहे थे।
वह बड़े आत्मविश्वास से कह रहे थे—
“इतिहास हमें सिखाता है कि साम्राज्य स्थायी नहीं होते। मौर्य गए, गुप्त गए, मुगल गए, अंग्रेज भी गए…”
इतना कहते ही पीछे से एक छात्र मुस्कराते हुए बोला—
“सर, अगर साम्राज्य स्थायी नहीं होते, तो फिर आपकी नौकरी क्यों स्थायी नहीं हो पाती?”
कक्षा ठहाकों से गूँज उठी।
धर्मेंद्र जी ने क्षणभर के लिए चुप्पी साधी, फिर हल्की मुस्कान के साथ बोले—
“बेटा, सही कहा। इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि कुछ साम्राज्य तो ढह जाते हैं, और कुछ राजाओं की तरह हम भी हर साल नवीनीकरण की याचना लेकर दरबार में खड़े रहते हैं। फर्क बस इतना है कि साम्राज्य किताबों में अमर हो जाते हैं, और हम आवेदन पत्रों में अस्थायी बने रहते हैं।”
लेकिन विश्वविद्यालय की कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
कभी-कभी अचानक आदेश आता है—
“अब स्थायी नियुक्ति हो गई है, नितांत काम चलाऊ शिक्षकों को कार्यमुक्त किया जाए।”
बस यह एक वाक्य, और मानो पूरा पहाड़ ढह पड़ता है उस शिक्षक पर।
जैसे पुराना किला, वर्षों तक अपनी ईंटों में इतिहास सँभाले खड़ा रहता है, और एक दिन बुलडोज़र की गड़गड़ाहट में मलबे में बदल जाता है।
जिस ब्लैकबोर्ड पर उसने सपनों की आकृतियाँ बनाईं, जिस कक्षा में उसने अपने ही बचपन की गूंज सुनी, वहाँ अचानक वह अजनबी घोषित कर दिया जाता है।
उस दिन उसकी चाल में अजीब-सी सुस्ती होती है। किताबें बाँधते हुए उसकी उंगलियाँ काँपती हैं, जैसे कोई माँ परदेश जाते बेटे का सामान बाँध रही हो। छात्र दौड़कर कहते हैं—“सर, आप हमें छोड़कर जा रहे हैं?”
वह मुस्कराकर उत्तर देता है—“नहीं बेटा, मैं तो यहीं हूँ… तुम्हारी आँखों की चमक और यादों में।”
लेकिन भीतर ही भीतर वह जानता है कि यह आखिरी क्लास उसके जीवन की सबसे कठिन परीक्षा है—जहाँ प्रश्न सिर्फ एक है, और उत्तर हर हाल में मौन है।
फिर परमानेंट शिक्षक आता है, और उसी कुर्सी पर बैठ जाता है। चाय की महक वही रहती है, ब्लैकबोर्ड पर वही खड़िया चलती है, पर नितांत काम चलाऊ शिक्षक के लिए यह सब उस घर जैसा है जहाँ दीपक जलाने वाला व्यक्ति ही बाहर कर दिया गया हो।
मन में यही टीस उठती है—“मैंने अपने जीवन के सबसे उजले साल यहाँ जलाकर रख दिए, और बदले में मेरी जगह सिर्फ एक आदेश-पत्र ने ले ली।”
उसकी संवेदना किसी उखड़े हुए पौधे जैसी होती है, जिसे जड़ों समेत बाहर निकालकर सड़क किनारे रख दिया गया हो। वह पौधा जानता है—उसके पत्ते कुछ दिन और हरे रहेंगे, पर मिट्टी की गंध और पानी का स्पर्श उसके लिए अब बीते हुए कल की स्मृति बन चुका है।
गाँव, कस्बा और विश्वविद्यालय—तीनों जगह तस्वीर मानो एक-सी खिंची हो। नदी, तालाब और झरनों की तरह ही यह शिक्षा-तंत्र भी बहता है, पर हर मोड़ पर कोई न कोई बाँध खड़ा कर दिया गया है। कहीं बजट का बाँध, कहीं नीति का, कहीं भर्ती की अधिसूचना का। सरकार इन नितांत काम चलाऊ शिक्षकों के लिए नित नए नाम गढ़ती रहती है—अतिथि, संविदा, शिक्षा मित्र, शिक्षा बंधु। जैसे जादूगर अपनी टोपी से हर बार नया खरगोश निकालकर दिखाता है, वैसे ही नाम बदलते हैं, पर हालात की जादुई थाली खाली की खाली रहती है।
पूरा तंत्र ही “काम चलाऊ” है। यह वैसा है जैसे टूटी हुई छतरी, जो बरसात में कुछ बूंदें रोककर मन को दिलासा देती है, पर भीतर का कपड़ा पहले से ही टपक रहा होता है। ये शिक्षक उस छतरी जैसे हैं—झड़ी के बीच बच्चों को भिगोने से बचाए रखते हैं। पर जैसे ही सूरज निकलता है और मौसम साफ होता है, वही छतरी बेदर्दी से कोने में फेंक दी जाती है। यह व्यवस्था मानो मिट्टी का दिया है—अंधेरे में रोशनी के लिए जलाया जाता है, पर भोर होते ही बुझाकर फेंक दिया जाता है।
उसने झरने की ओर देखा—झरना निरंतर बह रहा था, बिना थके, बिना रुके। उसकी छलकती धारा में उसे अपना ही जीवन दिखाई दिया। कभी उसे शिक्षा मित्र कहा गया, कभी शिक्षक बंधु, कभी अतिथि, कभी संविदा, कभी नितांत काम चलाऊ और कभी महज़ ठेके पर रखा गया प्राणी। नाम बदलते रहे, पर धारा कभी नहीं थमी। वह सोचने लगा—झरने की यही सबसे बड़ी ताक़त है कि वह चट्टानों से टकराकर भी गीत गाता है, पत्तों पर गिरकर भी संगीत रचता है और घाटियों में उतरकर भी जीवन बाँटता है। उसका अस्तित्व किसी स्थायी पद की मोहर से नहीं, बल्कि उस धारा से है, जो बच्चों की आँखों की चमक, उनके भविष्य की प्यास और उनके सपनों की मिट्टी को सींचती रहती है। शायद यही उसकी नियति है—नदी की तरह बहना, बादल की तरह बरसना और दीपक की तरह जलना, चाहे कोई उसका नाम याद रखे या न रखे।
यही धारा धर्मेंद्र यादव जी में दिखती है, जो इतिहास पढ़ाते हुए हर साल खुद अपने ही अनुबंध का इतिहास लिखते हैं; सुधा मैम में, जो व्यंग्य पढ़ाते हुए जानती हैं कि असली व्यंग्य तो उनकी तनख़्वाह है; और जगत सिंह में, जो बच्चों की भूख के बीच अपनी जेब की ख़ाली थाली देखकर भी मुस्कराते हैं। ये अलग-अलग चेहरे दरअसल उसी शिक्षा-तंत्र की सामूहिक गूँज हैं—जहाँ अध्यापक किसी पाठ्यपुस्तक की तरह हैं, जिन्हें साल-दर-साल पलटा जाता है, रटा जाता है और फिर नया संस्करण आने पर फेंक दिया जाता है। असल में, यह पूरा तंत्र ही “नितांत काम चलाऊ” है—क्योंकि शिक्षक अब भी झरनों की तरह बह रहे हैं, पर व्यवस्था पोखर की तरह सड़ चुकी है।
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