सरकारी फ़ाइल (कहानी)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत
बरसों पहले, जब मेरी मूंछें नई-नई जवान हुई थीं तब चेहरे पर सरकारी नौकरी का सपना उतना ही चमकता था जितना सावन की पहली बारिश में गांँव के सरकारी प्राथमिक पाठशाला की टिन की छत और पोखरों का पानी, मैंने तय कर लिया था कि सरकारी नौकरी ही करनी है। तब मुझे लगा था कि सरकारी नौकरी वह चांँद है, जो पूर्णिमा की रात मेरे आंँगन में उतरकर चांँदी की थाल में परोसा जाएगा। लेकिन बाद में समझ आया कि यह चांँद सरकारी फाइलों के बादलों में छिपा रहता है, और उसे देखने के लिए न जाने कितनी अमावस्याएँ काटनी पड़ती हैं।
जब मेरी उम्र 21 साल की थी, तो मैंने पहली बार अख़बार में सरकारी नौकरी का विज्ञापन देखा। आधा पन्ना चमचमाता हुआ, ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा था — “युवा शक्ति को सुनहरा अवसर!” नीचे लिखा था, “योग्यता- स्नातक, मेहनती, ईमानदार, देशसेवा का भाव।” पढ़कर मेरी आँखों में सपनों के जुगनू-सी चमक आ गई। लगा, यह तो मेरे लिए ही निकला है। लेकिन जब नज़र शर्तों की सूची पर पड़ी, तो लगा जैसे किसी ने बर्फ का गोला माथे पर दे मारा हो — “उम्र सीमा- 21 से 25 वर्ष, अनुभव- कम से कम 5 वर्ष।” अब समझिए, 21 की उम्र में 5 साल का अनुभव कहाँ से लाऊँ? क्या बचपन में ही सरकारी नौकरी ज्वाइन कर लेता? पर उस समय मैं इतना भोला था कि सोच लिया, “अरे, ये सब औपचारिकताएँ हैं, असल में योग्यता देखेंगे।” मुझे क्या पता था कि सरकारी विज्ञापन भी दूल्हे के रिश्ते की तरह होता है — ऊपर से सबको अच्छा दिखता है, पर अंदर की कहानी सिर्फ घरवाले जानते हैं।
पहली बार जब दफ्तर में फाइल जमा करने गया, तो बाबू जी ने मुझे ऐसे देखा जैसे किसी पंडित ने विवाह-समारोह में बिना बुलाए आए बाराती को देख लिया हो। मुस्कुराते हुए बोले, "भैया, चिंता न करो, यह तो दो हफ्ते में हो जाएगा।" मैंने भी मासूमियत से मान लिया, पर दो हफ्ते बाद फाइल दूसरे टेबल पर थी। नए बाबू जी ने पन्ने ऐसे पलटे जैसे कोई ज्योतिषी कुंडली पढ़ता है—"देखो भैया, अभी अमावस्या चल रही है, फाइल को शुभ दिन में आगे बढ़ाएंगे।" मुझे तब अहसास हुआ कि फाइलें भी विवाह-शादी की तरह ग्रह-नक्षत्र देखकर ही चलती हैं।
फाइल की रफ्तार का असली दर्शन मुझे तब हुआ जब एक बार पर्वतीय अंचल में एक योजना के सिलसिले में गया। पहाड़ की सड़कें ऐसी टेढ़ी-मेढ़ी कि स्कूटर चढ़ाई पर हाँफ जाए। दफ्तर पहुँचा तो कमरे में लकड़ी का चूल्हा जल रहा था, और बाबू जी गर्म चाय के साथ अख़बार पढ़ रहे थे। मैंने फाइल आगे बढ़ाने की बात की, तो बोले — "अरे भैया, यहाँ सब धीरे चलता है। जैसे पहाड़ पर पानी की धार, बूँद-बूँद गिरकर ही झरना बनती है। फाइल भी बूँद-बूँद आगे बढ़ती है, महीने-महीने में एक नोटिंग।” मैंने मजाक में कहा, "तो फिर यह झरना कब समुंदर बनेगा?" वे बोले, "भैया, यहाँ समुद्र नहीं, बस तालाब बनते हैं — और वो भी बरसात में!" सच में, पहाड़ में फाइल की स्पीड ऐसी होती है जैसे बर्फ पिघलना — गर्मियों का इंतज़ार करना पड़ता है, वरना सब जमकर बैठा रहता है।
बिल पास करवाने का भी एक अद्भुत कला-शास्त्र है। जैसे मोरनी बारिश में नाचकर मोर को रिझाती है, वैसे ही आवेदक को सरकारी बाबुओं को रिझाना पड़ता है। शहर में यह कला समोसे और चाय के साथ निखरती है, तो पहाड़ में यह गर्म आलू के पराठे और मक्खन की टिक्की के साथ खिलती है। यहाँ बाबू जी के हाथ गर्म रहें, तभी फाइल भी गरम-गरम आगे बढ़ेगी। गरम-गरम दूध और जलेबी की तरह जिसकी सुगंध आने जाने वाले को आती रहनी चाहिए। एक बार तो मैंने देखा, कोई आवेदक बाबू जी के घर सीधे ताज़ा शहद का छत्ता लेकर गया, जिसमें गांँधी चिपके हुए थे। अगले दिन उसकी फाइल में तीन नोटिंग एक साथ हो गईं! तभी मुझे समझ आया कि यहाँ की फाइलें भी मधुमक्खी की तरह हैं — मीठा पाकर ही परिश्रम करती हैं।
रोज-रोज का दफ्तर का चक्कर किसी प्रेम-कहानी की तरह होता है — शुरुआत में रोमांच, बीच में थकान, और आखिर में बस आदत। सुबह उम्मीद की धूप में निकलता हूँ, शाम को निराशा की परछाइयों के साथ लौटता हूँ। कभी-कभी मौसम भी फाइल की यात्रा में बाधा डाल देता है। एक दिन तो बादल ऐसे फटे कि दफ्तर के अंदर तक गंगा मैया चली आई। स्थिति नर से नारायण, जटाशंकर भी फेल। 'जल परियोजना' का पानी डायरेक्ट फाइलों में अपलोड हो गया। गार्ड बोला, “फाइलें भीग गई हैं, पन्ने चिपक गए हैं, अब धूप में सुखाकर ही खुलेंगी।” मैंने सोचा, ‘वाह! ये फाइलें तो प्रेम विवाह के बाद का नवदम्पति - सा व्यवहार कर रही हैं—अलग होने का नाम ही नहीं ले रहीं।’
सरकारी नौकरी के लिए उम्र का आधा हिस्सा तो कतार में खड़े-खड़े निकल जाता है। जवानी में जब ताकत होती है, तब नौकरी के लिए परीक्षा-परीक्षा खेली जाती है। और जब आखिर में नियुक्ति पत्र आता है, तब तक बालों में चांँदी और चाल में ठहराव आ चुका होता है। यह नौकरी भी चांँदनी रात की तरह होती है—दूर से रोमांटिक, पास से ठंडी और कभी-कभी भूतिया-सी।
बाबू साहिब सरकारी नौकरी पाने की कोशिश एक ऐसी मैराथन है, जिसकी फिनिश लाइन हर साल पाँच किलोमीटर आगे खिसकती है। पहले आप 25 की उम्र में फॉर्म भरते हैं, फिर परीक्षा की तारीख बदलती है, फिर रिजल्ट में “तकनीकी कारणों” का नोटिस आता है। और जब अंत में नियुक्ति पत्र आता है, तब तक चेहरे की त्वचा में झुर्रियों का नेटवर्क उतना ही गहरा हो जाता है जितना किसी पुराने नक्शे में नदियों का। नौकरी मिलते-मिलते पेंशन की उम्मीद भी धुंधली हो जाती है, जैसे कोहरे में पहाड़ की चोटी या धुंध में राजधानी की सड़कें।
भोजन की थाली में भी मुझे सरकारी प्रक्रिया नज़र आती है। जैसे दाल में नमक कम हुआ तो घरवाली कहेगी — “अभी डाल देती हूँ,” और फिर वह नमक चम्मच लेकर बैठे-बैठे किसी और बात में लग जाएगी, वैसे ही फाइल में कमी पूरी करने के वादे महीनों खिंचते हैं। रोटी गोल बने या चपटी, यह घर का विषय है; फाइल पूरी हो या अधूरी, यह पंचायत से लेकर जिला अफसर तक की चिंता है — और गरीब आवेदक की बस एक ही चिंता है कि उसकी फाइल पर धूल की परत न जम जाए।
ऊपरी आमदनी का मनोविज्ञान भी बड़ा अद्भुत है। जैसे किसान खेत में खाद डाले, तो पौधे हरे-भरे हो जाते हैं; बाबू की जेब में 'विशेष खाद' डाली जाए, तो फाइल की कलियाँ खिलने लगती हैं। गरीब के पास खाद नहीं होती, तो उसकी फाइल सूखकर हड्डी बन जाती है। मैंने खुद देखा है कि जिसके पास 'खाद' ज्यादा है, उसकी फाइल पूर्णिमा के चाँद की तरह चमकती है — बाकी की फाइलें अमावस्या की रात में गुम हो जाती हैं।
फाइल की गति पर मैंने गहन शोध किया। निष्कर्ष यह निकला कि घोंघा तेज है। घोंघा रास्ते में कभी-कभी पत्ते खा लेता है, लेकिन फाइल रास्ते में 'मतलब की बातें' खाती है। और अगर बारिश हो गई, तो घोंघा फिसलकर आगे बढ़ जाता है, फाइल अलमारी में दुबक जाती है — जैसे बिल्ली कुत्ते से डरकर कोने में छुप जाती है।
राजनीति का ताना-बाना भी फाइल के इर्द-गिर्द बुना है। प्रधान कहेगा — “ऊपर तक बात पहुँचा दो,” और ऊपर से मतलब तारे हैं, चाँद है, मंत्री है — पर कब किसका ग्रह उल्टा है, यह कोई नहीं बताता। जिला पंचायत सदस्य, पटवारी, यहांँ तक कि चाय बेचने वाला भी सलाह देगा — “थोड़ा समय दो, यहाँ सब धीरे चलता है।” धीरे चलने का मतलब है पाँच साल — और पाँच साल में गांँव के तालाब में भी दो बार कमल खिल और मुरझा जाते हैं।
सरकारी नौकरी और प्रकृति का रिश्ता बड़ा अजीब है। बरसात का पानी कब आएगा, यह बादल तय करते हैं; नौकरी कब मिलेगी, यह नोटिंग और अनुमोदन तय करते हैं। चाँद और तारे आसमान में घूमते रहते हैं, पर उनकी दूरी हमारी पकड़ से बाहर है — ठीक वैसे ही जैसे इंटरव्यू का परिणाम।
आज इतने साल बाद जब मैं अर्ध शतक पार कर चुका हूँ। आईने में देखता हूँ तो लगता है, मैंने अपनी आधी जिंदगी अमावस्या और पूर्णिमा के बीच फँसी एक फाइल की तरह गुजारी है। एक अदृश्य दौड़ में गुजार दी—जहाँ हर चक्कर में उम्मीद की नई पूर्णिमा थी, और हर वापसी में निराशा की अमावस्या। सरकारी नौकरी मिलना चांँद पर पानी मिलने जैसा है—सुना सबने है, देखा कम ने। कभी उम्मीद की चाँदनी में नहाया, कभी निराशा के अंँधेरे में डूबा। सरकारी नौकरी पाना अब मुझे चाँद पर बाग़ लगाने जैसा लगता है। कहानियों में सुनने योग्य, हकीकत में लगभग असंभव। और सरकारी फाइल? वह अब भी कहीं न कहीं घूम रही है, ठीक वैसे ही जैसे चांँद बादलों में—कभी दिखता है, कभी छिप जाता है और कभी चुनावी आचार संहिता में गुम हो जाता है और हम बस आसमान ताकते रहते हैं। झिलमिल नम आंँखों से ..! हम बस दूर तलक देखते रहते हैं, उम्मीद करते हुए कि शायद अगली पूर्णिमा को वह हमारे आँगन में उतर आए।
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