रविवार, 17 अगस्त 2025

चाय की चुस्की - (कहानी) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

 चाय की चुस्की - (कहानी)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत 

सुबह का वक्त था। पहाड़ों पर हल्की-हल्की धुंध ऐसे पसरी थी मानो किसी ऋषि ने अपने जटाजूट से सफेद रेशमी बादल झटक दिए हों। घाटी में उतरते बादल इस अंदाज़ से लहराते थे जैसे कोई बरात ढोल-दमामे के संग चढ़ाई-उतराई कर रही हो। चीड़ और देवदार की ऊँची-ऊँची कतारें ओस से नहाई दुल्हनों-सी खड़ी थीं, और उनकी शाखों पर बैठी चिड़ियाँ सामूहिक रागिनी गा रही थीं। कहीं दूर से ग्वाले की बांसुरी की धीमी तान सुनाई देती थी, मानो किसी लोकगीत की आत्मा हवा में तैर रही हो।

ढलानों पर चरती बकरियों की टनटनाहट उस प्राकृतिक संगीत में ताल भर रही थी। खेतों की मेड़ों पर झुकी औरतें कंधे पर घास और लकड़ी के गट्ठर रखे घरों की ओर तेज़ कदमों से बढ़ रही थीं। गली-कूचों में भोर की ठंडी धूप ऐसे उतर रही थी जैसे किसी चित्रकार ने सुनहरी रंगों से कैनवास भर दिया हो। पास की नदी कल-कल करती हुई मानो सारा राज़ सुना देना चाहती थी कि प्रकृति ही असली कवयित्री है।

सड़क किनारे, इसी रमणीय दृश्य के बीच, लकड़ी और टीन की टपकती छत से बनी एक पुरानी सी दुकान थी, जिसे गाँव भर में मज़ाक-मजाक में “लोकसभा टी स्टॉल” कहा जाता था। दुकान का मालिक था मंगू, या सबकी जुबान पर ‘मंगूदा’ — जिसकी चाय की खुशबू इतनी दूर तक जाती कि राहगीर भी प्यासे-से ठिठक जाते।

आज भी सुबह-सुबह दुकान पर वही बौद्धिक दरबार सजने लगा। सबसे पहले पधारे ग्राम प्रधान जी। खादी का कुर्ता, पैरों में घिसी-सी सैंडल, आँखों में सदा रहने वाली आधी-सी मुस्कान और जेब में गुटखे का पाउच—यह उनकी पहचान थी। दुकान में घुसते ही उन्होंने अपनी ऐनक को नाक पर चढ़ाया और ऊँची आवाज़ में बोले—

“अरे मंगू! ज़रा जल्दी से चाय बना। आज तो बड़ा दिन है। अभी-अभी मुख्यालय से फोन आया है। हमारी पंचायत को पचास लाख की योजना मिली है। अब देखना, गाँव की तस्वीर बदल जाएगी।”

कोने में बैठा राम सिंह धामी, जो रोज मज़दूरी करता था और जिसके हाथों की दरारों में मेहनत का इतिहास लिखा हुआ था, मुस्कराकर बोला—

“हाँ प्रधान जी, पिछली बार भी तस्वीर बदली थी। फर्क इतना ही था कि फोटो अखबार में आपका था और पैसा ठेकेदार का।”

इतना कहते ही दुकान का माहौल गूँज उठा। हँसी के ठहाके ऐसे फूटे मानो किसी ने लंबे सूखे के बाद अचानक बाँध का दरवाज़ा खोल दिया हो। मंगूदा भी चाय छानते-छानते हँस पड़ा और बोला—

“सच कह रहा है धामी। पिछली बार तो पंचायत भवन की छत बनाने का ठेका था, छत बनी नहीं, लेकिन प्रधान जी की नई जीप गाँव में जरूर आ गई।”

प्रधान जी ने मुस्कान तो बनाए रखी, लेकिन गुटखे का पाउच जल्दी से मुँह में खिसका लिया, ताकि बोलने की बजाय चबाने का बहाना मिल सके। उनकी आँखों में क्षणभर को जो खीज चमकी, वह भी चाय की भाप में खो गई।

उधर से धीमी चाल में सेवानिवृत्त प्रिंसिपल साहब भी आ पहुँचे। रिटायरमेंट के बाद से यही उनकी स्थायी यूनिवर्सिटी थी—बिना हाजिरी, बिना टाइम-टेबल और बिना परिणाम की। आते ही उन्होंने अपनी खाँसती हुई आवाज़ को सँभालते हुए लंबी साँस भरी और बोले—

“आजकल के युवाओं का तो कोई भविष्य ही नहीं रहा। पढ़ाई-लिखाई का कोई महत्व ही नहीं बचा। जब मैं पढ़ाता था, तब बच्चे शेर बनकर निकलते थे।”

यह सुनकर सामने बैठे छोटू मास्टर ने, जो खुद अस्थायी नियुक्ति पर पिछले दस साल से गाँव की प्राथमिक पाठशाला में टिका था, हल्की मुस्कान के साथ जवाब जड़ा—

“प्रिंसिपल साहब, जब आप बच्चों को शेर बना रहे थे, उसी समय हमारे गाँव के आधे युवा दिल्ली के कॉल सेंटरों में टेलीफोन पर भौंकने लग गए, और बाकी शहरों में रिक्शा खींचने लगे। अब जरा बताइए, ये शेर किस चिड़ियाघर में रखे गए हैं?”

दुकान में ऐसा ठहाका फूटा कि मंगूदा की चाय छलककर चूल्हे पर टपक पड़ी और खटर-खटर की आवाज़ करने लगी। बगल में बैठे दूध सप्लाई करने वाले नंदू ने ठहाका मारते हुए कहा—

“अरे मास्टरजी, सही कहा आपने! अब तो हालत ये है कि जिनके दाँत में कीड़ा लगा है, वो भी खुद को शेर समझते हैं। शेर वाली दहाड़ तो दूर, गाँव का कुत्ता भी उनके आगे भौंक जाए तो ये भाग खड़े होते हैं।”

प्रिंसिपल साहब ने खाँसी का पुराना बहाना अपनाया। गले पर हाथ रखते हुए धीरे से बोले—

“हाँ-हाँ, मौसम ही ऐसा है… गले में खराश रहती है।”

मगर सब समझ रहे थे कि खराश गले में नहीं, बल्कि आत्मसम्मान में हो रही है।

तभी अचानक धूल उड़ाती एक जीप दुकान के सामने आकर अटक गई। इतनी तेज़ ब्रेक मारी कि पास खड़ा बकरा भी डर के मारे मिमियाने लगा। गाड़ी से नेता जी उतरे—सिर पर चमचमाता हुआ सफेद नेहरू टोप, आँखों पर काला चश्मा और हाथ में हवा में लहराता रुमाल, मानो चुनावी सभा के मंच पर ही खड़े हों। पीछे-पीछे उनका वफ़ादार चमचा कल्लू भाई ऐसे भागता आया जैसे खुद गाड़ी को धक्का देकर लाया हो।

नेता जी ने आते ही सीना फुलाकर दुकान को मंच मान लिया और गूँजती आवाज़ में बोले—

“दोस्तों! इस बार हमारी पार्टी सत्ता में आई, तो हम इस पहाड़ को स्विट्ज़रलैंड बना देंगे। बर्फ़, फूल और पर्यटक—सब यहाँ उमड़ पड़ेंगे। तब तुम सबको नौकरी के लिए दिल्ली भागने की ज़रूरत नहीं रहेगी।”

इतना सुनते ही कल्लू भाई ताली बजाकर चिल्लाए—

“वाह नेताजी, ज़िंदाबाद! आप तो हिमालय से भी ऊँचे हैं।”

कोने में बैठे राम सिंह धामी ने अपनी फटी हुई बनियान को खींचते हुए ठंडी हँसी में कहा—

“नेताजी, पहले हमारी टूटी सड़क बनवा दो। स्विट्ज़रलैंड तो बाद में भी बन जाएगा। रोज़ हम खच्चरों की तरह गड्ढों में उछल-उछल कर बाज़ार जाते हैं। कभी हमारे हड्डी-पसली भी सलामत रखवा दो।”

नेता जी ने तुरंत गंभीर मुद्रा ओढ़ ली, मानो वे पहाड़ पर नहीं, संसद में बैठे हों। भारी आवाज़ में बोले—

“रामदा, तुम्हें दूरदृष्टि रखनी चाहिए। सड़क जैसी मामूली बातों में मत उलझो। नेता वही है जो बड़े सपने दिखाए। सड़क तो कल भी बन सकती है, पर स्विट्ज़रलैंड बनने का सपना आज से देखना चाहिए।”

यह सुनते ही दुकान पर बैठे सबने एक-दूसरे को देखा और हँसी रोकते-रोकते पेट में बल पड़ गए।

उसी वक्त घास की भारी-भरकम गाठें सिर पर ढोती हुई कुछ औरतें दुकान के पास से गुज़रीं। उनमें से एक ने ठिठोली करते हुए कहा—

“अरे देखो तो, सारे बड़े मर्द यहीं बैठे हैं। चाय पी-पीकर देश बचाने का ठेका इन्हीं के पास है। अगर घर की आधी चिंता भी कर लें तो ये पहाड़ सचमुच स्वर्ग बन जाए।”

औरत की बात सुनकर पूरा दरबार खिलखिलाकर हँस पड़ा। मंगूदा चायवाले ने भी गिलास धोते-धोते चुटकी ली—

“बात तो पक्की है। नेताजी हों या प्रधान जी—सब मुफ्त की चाय और बड़ी-बड़ी बातें करने यहाँ आते हैं। अगर मैंने सचमुच पैसे वसूलने शुरू कर दिए, तो तुम्हारा स्विट्ज़रलैंड यहीं चाय की केतली में डूब जाएगा।”

यह सुनते ही नेताजी के चश्मे के पीछे से पसीना छलक पड़ा। कल्लू भाई ने जल्दी से ताली बजाकर माहौल सँभालने की कोशिश की—

“वाह मंगू भाई! आपकी चाय ही तो इस गाँव की असली संसद है।”

इतने में बबलू दाज्यू पत्रकार अपनी फटी डायरी और कैमरे के उस प्राचीन ढांचे के साथ दुकान पर आ धमके, जो देखने में कैमरा कम और ढोलक का बक्सा ज़्यादा लगता था। आते ही सांस सँभालते हुए घोषणा की—

“दोस्तों! कल अख़बार में छपा है कि सरकार हमारे गाँव को मॉडल गाँव बनाने जा रही है।”

बात इतनी ही थी, पर उसका असर बारूद की चिंगारी जैसा हुआ। रामदा ने हँसते-हँसते पेट पकड़ लिया और बोला—

“हाँ, मॉडल तो बन ही गया है। बस अब सिलाई मशीन और मेकअप किट आ जाएँ, तो गाँव की लड़कियाँ फैशन वीक में भाग ले लें।”

भीड़ एक बार फिर ठहाकों से गूंज उठी। बबलू दाज्यू का चेहरा लाल पड़ गया। दरअसल, अभी कल ही तो उसने नेताजी से चुनावी विज्ञापन छापने के नाम पर दो हज़ार ऐंठे थे। सो, उसके शब्द भी गले की हड्डी बनकर अटक गए। वह चुपचाप कोने में बैठ गया, जैसे अख़बार की स्याही भी उसकी जेब की तरह फीकी पड़ गई हो।

इसी बीच तहसीलदार का चपरासी पन्ना लाल दुकान में घुस आया। उसके कदमों में ऐसी अकड़ थी मानो खुद कलेक्टर साहब उसकी जेब में रखे हों। ऊँची आवाज़ में बोला—

“सुन लो सब! साहब कह रहे थे कि इस बार की योजना का पैसा ठीक से लगे, वरना ऊपर तक रिपोर्ट जाएगी।”

प्रधान जी ने पान की पीक थूकते हुए मुस्कुराकर जवाब दिया—

“अरे पन्ना लाल, तू चिंता न कर। तेरा हिस्सा तो पहले से ही बजट में फिक्स है। बस अंगूठा लगाने की मेहनत करनी पड़ेगी।”

भीड़ में हल्की फुसफुसाहट हुई और सब एक-दूसरे की ओर देख कर मुस्कुरा दिए। दुकान का वातावरण उस समय टेंडर मीटिंग की तरह लग रहा था—जहाँ कॉन्ट्रैक्ट से ज़्यादा कॉन्टैक्ट पर जोर दिया जाता है।

तभी दूर से गाय-भैंस चरा कर किशनुवा और उसका साथी आ पहुँचे। उनके चेहरे धूप में तपे हुए थे और माथे से पसीने की बूँदें टपक रही थीं। किशनुवा ने पास आते ही हँसकर कहा—

“अरे वाह, बड़ा दरबार सजा है। सब देश बदल रहे हैं चाय की प्याली में डूबकर। इधर हमारे जानवर पानी के बिना हाँफ रहे हैं।”

यह सुनकर प्रिंसिपल साहब, जिनकी उम्र अब अकादमिक उपदेशों में ही अटक चुकी थी, तुरंत बोले—

“बेटा, ये छोटी बातें हैं। तुम्हें देश की बड़ी नीतियाँ समझनी चाहिए। विकास योजनाएँ, पंचवर्षीय कार्यक्रम, मॉडल गाँव, डिजिटल इंडिया—यही असली मुद्दे हैं।”

किशनुवा ने व्यंग्य से हँसते हुए कहा—

“नीति से हमें भूसा मिलेगा कि पानी? हमारी भैंस तो रोज़ सूखी घास चबाकर गटक रही है। शायद डिजिटल इंडिया से मोबाइल चार्ज करके प्यास बुझा लेगी।”

यह सुनते ही दुकान में बैठे लोग हँसी से फट पड़े। हँसी में कड़वाहट भी थी और ताजगी भी।

नेता जी का चेहरा अचानक कसैला हो गया। चश्मे को ठीक करते हुए वे बोले—

“तुम ग्रामीण लोग कभी बड़े सपने नहीं देखते। यही कारण है कि पिछड़े रह जाते हो। बड़ा सोचो—पहाड़ को स्विट्ज़रलैंड बनाओ, पर्यटन लाओ, उद्योग लगाओ।”

किशनुवा ने आँखें तरेरकर सीधा जवाब दिया—

“सपना तो रोज़ देखता हूँ नेताजी। सपना ये कि आज मेरी भैंस पानी पी सके। पर वो सपना कभी पूरा नहीं होता। आप स्विट्ज़रलैंड का सपना दिखाते रहिए, मैं कल भी अपनी सूखी भैंस का सपना देखूँगा।”

पूरा दरबार सन्नाटे में डूब गया। उस क्षण पहाड़ी धूप की तपिश और भी चुभने लगी। मानो किशनुवा ने अनजाने ही इस व्यंग्य दरबार को आईना दिखा दिया हो—जहाँ सपनों की ऊँचाई और पेट की भूख हमेशा दो विपरीत दिशाओं में खड़ी रहती है।

अब तक बहस का तापमान जून की दोपहरी की तरह चढ़ चुका था।

प्रधान जी सरकारी योजनाओं का ऐसा बखान कर रहे थे मानो योजना आयोग उन्हीं की दुकान पर बैठा हो।

प्रिंसिपल साहब शिक्षा की दुहाई दे रहे थे, लेकिन उनकी बातें इतनी किताबनुमा थीं कि कोई सुनते-सुनते खुद को “एमए फेल” महसूस करने लगे।

नेता जी अब भी पहाड़ को स्विट्ज़रलैंड बनाने की शपथ ले रहे थे, और पत्रकार बबलू दाज्यू अपनी डायरी में वही पुराने शब्दों की मालाएँ गढ़ रहा था—“दूरदर्शी नेता, विकास के शिल्पी, जनता का मसीहा”।

दूसरी ओर, मजदूर-ग्वाले ताने पर ताने कस रहे थे। उनका हर वाक्य किसी अदृश्य हथौड़े की तरह इन तथाकथित बुद्धिजीवियों पर गिर रहा था।

माहौल ऐसा था जैसे लाइव टेलीकास्ट हो रहा हो—बस फर्क इतना कि यहाँ लाल बत्ती गाड़ी नहीं, बल्कि लाल पीक चमक रही थी।

दुकान सचमुच किसी संसद से कम नहीं लग रही थी—जहाँ सवाल तो गूँजते हैं, पर जवाब चाय की भाप में उड़ जाते हैं।

इसी उबाल के बीच अचानक मंगूदा ने ऊँची आवाज़ में पूछा—

“भाइयों! ज़रा ध्यान दो, चाय का हिसाब कौन देगा?”

सवाल साधारण था, पर असर असाधारण। जैसे ही यह वाक्य गूंजा, बहस की आग पलभर में राख हो गई। सब एक-दूसरे की तरफ ऐसे देखने लगे जैसे संसद में कटौती प्रस्ताव रख दिया गया हो।

नेता जी ने जेब में हाथ डाला, पर तभी फोन बजने का नाटक रचकर बाहर निकल गए। उनकी आवाज़ गली तक गूँजी—“हाँ जी, अभी मुख्यमंत्री जी से बात कर रहा हूँ…”

प्रिंसिपल साहब ने खाँसते हुए कहा—

“अरे भाई, मेरे पास छुट्टा नहीं है। कल लाइब्रेरी से किताब लौटाकर देता हूँ।”

पत्रकार ने तुरंत तिलमिलाकर ऐलान किया—

“मैं तो समाज की सेवा कर रहा हूँ। मुझसे चाय का पैसा माँगना पत्रकारिता की हत्या है। मैं तो रिपोर्ट में लिख दूँगा कि यह चाय जनकल्याणकारी थी।”

सन्नाटा फिर गाढ़ा हो गया। तभी रामदा धीरे से उठा, जैसे सदियों की थकान उसके कंधों पर रखी हो। बोला—

“ठीक है मंगूदा, आज भी मजदूर ही सबका बिल चुकाएगा। क्योंकि मजदूर ही असली देशभक्त है।

बाकी सब लोग तो चाय की चुस्की से क्रांति लाने निकले हैं।”

उसके शब्द सुनते ही माहौल ठहाके और खामोशी के बीच झूल गया। यह ठहाका मजाक का कम, आत्मग्लानि का ज़्यादा था।

बाहर सूरज ढल चुका था। पहाड़ की चोटियों पर लालिमा ऐसे बिखरी थी जैसे दिन ने भी बहस में अपना खून झोंक दिया हो।

औरतें अब भी ढलती रोशनी में घास काट रही थीं, बच्चे सड़क किनारे प्लास्टिक की गेंद से क्रिकेट खेल रहे थे, और चाय की दुकान पर बैठे तथाकथित विद्वान एक और चुस्की लेकर बहस की नई पारी में उतर रहे थे।

मानो यह देश आगे नहीं बढ़ रहा, बस चाय की प्यालियों में ही चक्कर काट रहा हो।


कहानी का अगला हिस्सा - भाग 2


दूसरी सुबह भी दुकान पर वही पुराना मंजर था। चाय की भाप उठते ही बहस का धुआँ भी उड़ने लगा। मंगू अब इस आदत का आदी हो चुका था। वह हँसकर कहता—

“भाइयों, संसद भवन दिल्ली में सिर्फ़ दिखावे के लिए है, असली कैबिनेट तो यहीं बैठती है। फर्क इतना है कि वहाँ भत्ते और वेतन मिलते हैं, और यहाँ उधार की चाय।”

सब हँसते, पर भीतर से जानते थे कि यह हँसी ही सबसे कड़वा सच है।

प्रधान जी फिर उसी पुरानी रिकॉर्डिंग पर आ गए—

“भाइयों, इस बार जो पचास लाख की योजना आई है न, उससे गाँव में सीमेंट की सड़क बनेगी, नाली बनेगी, और सामुदायिक भवन भी खड़ा होगा। अब देखना, गाँव किसी शहर से कम नहीं रहेगा।”

रामदा ने अपने पैरों की तरफ देखा, जिन पर अब भी पुराने फटे जूते थे, फिर हँसते हुए बोला—

“हाँ, पिछली बार भी नाली बनी थी, लेकिन उसमें पानी से ज्यादा बीयर और देशी शराब की बोतलें तैर रही थीं। सामुदायिक भवन की छत तो पहली बरसात में ऐसे उड़ गई थी जैसे सरकारी नौकरी का वादा उड़ जाता है। अब गाँव वाले कहते हैं कि भवन नहीं, भूत बंगला बना है—रात में गाय भी वहाँ से गुज़रने से डरती है।”

सुनते ही सब ठहाकों से लोटपोट हो गए।

प्रधान जी ने हँसी के पीछे गुस्सा दबा लिया और बोले—

“रामदा, तू मजदूर आदमी है, राजनीति की बड़ी-बड़ी बातें तुझे क्या समझ आएँगी? यह सब बड़े स्तर की योजनाएँ हैं, गाँव-देहात की सोच से ऊपर की।”

इतने में सामने से रघुवीर मिस्त्री आया। हाथ में औज़ार, चेहरे पर धूल और आँखों में नींद की जगह ईंटों का बोझ। बैठते ही बोला—

“भैया, एक चाय पिला दो। सुबह से ईंट ढो रहा हूँ। पर एक बात बताऊँ, इन योजनाओं का फायदा हमें मजदूरों को तो मिलता ही नहीं। ठेकेदार लोग आधा पैसा गाड़ी और बंगले में खा जाते हैं, और बाकी आधा सीमेंट-रेत में मिल जाता है। सड़क की मोटाई उतनी ही होती है जितनी मोबाइल में डेटा बैलेंस बचा हो।”

मंगू ने तुरंत जोड़ा—

“सही कहा! अब तो गड्ढे सड़क में कम, और सरकारी फाइलों में ज़्यादा मिलते हैं।”

पत्रकार बबलू दाज्यू, जो अब तक सब नोट कर रहे थे, मुस्कराते हुए बोले—

“अरे रघुवीर, यही तो लोकतंत्र की खूबसूरती है। एक तरफ ठेकेदारों की तिजोरी भरती है, दूसरी तरफ तुम्हारे औज़ार टूटते हैं। और इस बीच हम पत्रकार लोग हेडलाइन बनाते हैं—

‘गाँव विकास की राह पर अग्रसर’।”

सुनते ही रामदा फिर हँस पड़ा—

“हाँ दाज्यू, और अगली हेडलाइन यह भी लिख देना—

‘गाँव वालों की जेब खाली, पर भाषण भारी।’”

अबकी बार हँसी में तल्ख़ी भी थी।

बाहर धूप तेज़ हो चुकी थी, पर भीतर बहस की तपिश और ज्यादा थी। चाय की दुकान अब सिर्फ़ दुकान नहीं, एक लाइव न्यूज़ चैनल थी—जहाँ हर कोई एंकर भी था, पैनलिस्ट भी और दर्शक भी।

प्रिंसिपल साहब ने अपनी ऐनक को थोड़ा और नाक पर चढ़ाते हुए विद्वतापूर्ण लहज़े में कहा –

“रघुवीर, यह सब समाज की विसंगतियाँ हैं। जब तक शिक्षा का प्रकाश नहीं फैलेगा, तब तक अंधकार रहेगा। देखना, जिस दिन गाँव का हर बच्चा पढ़-लिख जाएगा, उसी दिन भ्रष्टाचार अपने आप ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।”

रघुवीर ने हथौड़ा जमीन पर पटका और मुस्कुराते हुए बोला –

“प्रिंसिपल साहब, आपके ज़माने में तो आधा गाँव हाई स्कूल तक पहुँच ही नहीं पाया। अब आप शिक्षा का मशाल उठा रहे हैं! वैसे एक बात बताइए, बच्चों को अभी भूख मिटाने के लिए रोज़गार चाहिए या पेट में दर्शन-शास्त्र की थ्योरी? क्योंकि खाली पेट गांधीगीरी नहीं, रोटीगिरी चाहिए।”

यह सुनते ही दुकान में ठहाकों की सुनामी उठ गई। प्रिंसिपल साहब ने खिसियाकर चाय की प्याली उठाई, एक लंबी चुस्की ली, और अखबार की तरह तह होकर चुप्पी साध ली।

इसी बीच नेता जी, जो पिछले आधे घंटे से मोबाइल पर किसी “बड़े साहब” से ऊँची-ऊँची आवाज़ में बात कर रहे थे, अचानक कॉल काटकर मंचनुमा अंदाज़ में खड़े हो गए। दोनों हाथ हवा में लहराते हुए बोले –

“भाइयों! अभी-अभी मेरी सीधी बात बड़े साहब से हुई है। बहुत जल्द इस पहाड़ पर एक बड़ी परियोजना शुरू होने वाली है। हजारों नौजवानों को रोज़गार मिलेगा। अब गाँव में बेरोजगारी का नामोनिशान मिट जाएगा। आने वाले समय में यह गाँव ‘मिनी दुबई’ कहलाएगा।”

सुनते ही बबलू दाज्यू, जो हर मौके पर “लाइव टेलीग्राफ़” बन जाते थे, तुरंत अपनी पुरानी डायरी में लिखने लगे –

“नेता जी ने किया बड़ा ऐलान।”

कल के अख़बार की हेडिंग उसी वक्त तैयार हो गई।

रामदा ने खैनी मलते हुए ताना मारा –

“नेता जी, पिछली बार भी आपने कहा था कि हमारे पहाड़ पर एयरपोर्ट बनेगा। नतीजा? बस खेतों में सर्वे के खंभे गड़े और फिर गाय-बकरियों ने उन्हें तोड़ डाला, लोगों ने लकड़ी की तरह जला डाला। गाँव वाले अब कहते हैं—‘नेता जी के वादे खंभों जैसे हैं, खड़े भी नहीं रहते और टिकते भी नहीं।’”

भीड़ ठहाकों से गूँज उठी। मंगू ने भी चुटकी लेते हुए जोड़ा -  

“नेता जी, अगली बार जब भी योजना का ऐलान करें न, तो एक रिटर्न पॉलिसी भी जोड़ दें—अगर काम न हो तो वादा वापस।”

रघुवीर ने हँसते हुए तंज कसा –

“हाँ, बिल्कुल, जैसे मोबाइल में कैशबैक ऑफ़र आता है। यहाँ भी होना चाहिए—‘परियोजना असफल तो जनता को कैशबैक।’”

दुकान में बैठे लोग पेट पकड़कर हँसने लगे, और नेता जी का चेहरा वैसे ही उतर गया जैसे बिना नेटवर्क का मोबाइल।

किशनुवा ने ज़ोर का ठहाका लगाया –

“हाँ रे भाई, नेताजी तो कहते थे कि हमारी बकरियाँ स्विस गाय बन जाएँगी, और दूध सीधा पैकेजिंग प्लांट से निकलेगा। लेकिन हकीकत ये है कि मैं आज भी नौले से पानी भरकर ला रहा हूँ। फर्क बस इतना हुआ है कि पहले तांँबे की गगरी लाता था, अब प्लास्टिक की बोतल और डब्बे भर रहा हूँ।”

दुकान ठहाकों से गूँज उठी।

इतनी देर में घड़े रखे कुछ और औरतें भी आ बैठीं। उनमें से एक ने सिर पर दुपट्टा ठीक करते हुए तंज कसा –

“हमारे मर्द तो बस देश-समाज सुधारने में लगे रहते हैं। सुबह से शाम तक चाय की चुस्की, फेसबुकिया चर्चा और व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से डिग्री। लेकिन घर का राशन कौन लाएगा, ये सवाल कभी किसी बहस का हिस्सा नहीं होता।”

मंगूदा ने हँसते-हँसते कहा –

“आमा, घर का राशन छोड़ो, ये तो मेरी दुकान का हिसाब भी नहीं देते। बस उधारी की डायरी देखकर ऐसे हँसते हैं जैसे संसद में मुफ़्त का वाई-फाई मिल गया हो।”

सभी जोर से हँसने लगे, लेकिन नेताजी और प्रिंसिपल का चेहरा वैसा ही उतर गया जैसे नेटवर्क बीच कॉल में कट जाए।

तभी पन्ना लाल चपरासी, जो हमेशा ‘अंदर की ख़बर’ रखने का दावा करता था, आगे झुककर बोला –

“साहब कह रहे थे कि इस बार रिपोर्ट बहुत सख़्त जाएगी। ऊपर तक सबकी निगरानी हो रही है। कोई बच नहीं पाएगा।”

रामदा ने बीड़ी सुलगाते हुए तुरंत तीर छोड़ा –

“हाँ-हाँ, निगरानी तो होती है, लेकिन सिर्फ़ चाय पीने की। बाकी पैसा तो सीधा ऊपर चला जाता है। ये निगरानी का कैमरा भी नेताजी की जेब में फिट है। तस्वीर जनता की खींची जाती है, लेकिन फोटो गैलरी में सेव सिर्फ़ ‘ऊपरवालों’ की मुस्कान होती है।”

भीड़ खिलखिला पड़ी।

रघुवीर ने और जोड़ दिया –

“अरे, ये निगरानी सिस्टम भी क्या कमाल का है! CCTV कैमरे सड़क पर लगे हैं, लेकिन रिकॉर्डिंग प्राइवेट पार्टी के घर की चल रही है। गाँव वाले तो बस कैमरे के सामने हाथ हिलाते रह जाते हैं।

महिलाओं में से एक बोली –

“हमारे घर का गैस सिलेंडर तीन महीने से खाली है। लेकिन नेताजी कह रहे थे स्मार्ट गाँव बन जाएगा। अरे, पहले हमारे चूल्हे में आग तो स्मार्ट कर दो!”

इस पर मंगूदा ने आखिरी तंज कसा –

“भाई, स्मार्ट गाँव तो तभी बनेगा जब नेता जी का वादा रीचार्ज पैक की तरह हो—समय पूरा होने पर अपने आप बंद।”

दुकान पर बैठी भीड़ फिर से पेट पकड़कर हँसने लगी, और नेताजी का चेहरा बिल्कुल वैसा हो गया जैसे चुनाव में हारने के बाद वोटिंग मशीन की स्क्रीन।

किशनुवा बोला –

“हाँ, और जब तवा गरम होता है तो सब अपनी-अपनी रोटी सेंकने में लग जाते हैं। जनता चाहे जले या भूखी रह जाए, नेताजी की थाली में तो मलाई पराठा हमेशा पहुँच ही जाता है।”

मंगूदा चायवाले ने अपनी कड़छी झाड़ते हुए जोड़ा –

“मुझे तो लगता है कि ये चाय की दुकान ही असली संसद है। यहाँ सरकार हर रोज़ बनती है, गिरती है और मुफ्त में चलती है। फर्क बस इतना है कि यहाँ स्पीकर मैं हूँ और माइक के बिना भी सब चीखते रहते हैं।”

भीड़ में बैठे लोग ठहाका मारकर हँस पड़े।

थोड़ी देर में चर्चा राष्ट्रीय राजनीति पर घूम गई। नेता जी मंच जैसी मुद्रा में गला साफ़ करते हुए बोले –

“देश बदल रहा है भाइयों! अब विकास की आँधी आ चुकी है। निश्चिंत रहिए…!”

रामदा ने बीड़ी का धुआँ उड़ाते हुए काटा –

“हाँ, आँधी तो है, लेकिन उसमें सिर्फ गरीबों की झोपड़ी उड़ रही है। अमीरों के बंगले और फार्महाउस पर तो एक खरोंच भी नहीं आती। आँधी भी अब VIP पास देखकर चलती है।”

सभी हँसते-हँसते ताली पीटने लगे।

प्रिंसिपल साहब ने चश्मा ठीक करते हुए गंभीरता ओढ़ी –

“भाई, राजनीति तो चलती रहेगी। असली संकट है हमारी संस्कृति का। आज के बच्चे मोबाइल और रील्स में खोए रहते हैं। न लोकगीत जानते हैं, न लोककथाएँ और न ही लोक-संस्कृति। सब कुछ बर्बाद हो रहा है।”

किशनुवा ने मुस्कुराकर तीर मारा –

“प्रिंसिपल साहब, बच्चा मोबाइल में खोए तो आपको संस्कृति का संकट दिखता है। लेकिन जब बच्चा आपकी क्लास में सो जाता था तो आप कहते थे – ‘विद्यार्थी ध्यानमग्न है’। अब ध्यान ऑनलाइन बदल गया है तो आपको लगे कि संस्कृति डूब रही है।”

भीड़ फिर ठहाकों से गूँज उठी।

रघुवीर ने भी जोड़ दिया –

“साहब, संस्कृति की चिंता छोड़ो। अब तो हमारी सभ्यता भी डेटा पैक पर चल रही है। जब तक रीचार्ज है, तब तक भारतीयता चमक रही है। जैसे ही नेट खत्म, वैसे ही संस्कृति ऑफ़लाइन।”

तभी औरतों में से एक बोली –

“हमारे घर के बच्चे तो लोकगीत तभी गाते हैं जब नेटवर्क डाउन हो जाए। वरना तो दिन-भर ट्रेंडिंग गाने पर नाचते रहते हैं। अब हमें समझ नहीं आता, किसको बचाएँ – संस्कृति को या मोबाइल की बैटरी को।”

मंगूदा ने आखिरी वार किया –

“भाई, संस्कृति हो या राजनीति, दोनों ही क्लाउड सर्वर पर अपलोड हो गई हैं। गाँव वाले तो अभी तक पेंड्राइव खोज रहे हैं और नेताजी अनलिमिटेड डेटा प्लान में मौज कर रहे हैं।”

दुकान एक बार फिर जोरदार हँसी और ठहाकों से गूँज उठी, और नेताजी का चेहरा ऐसा लग रहा था जैसे ईवीएम में उनकी सीट शून्य वोट दिखा दे।

इसी बीच बबलू दाज्यू पत्रकार धीरे-धीरे खिसककर नेता जी के पास बैठ गया और फुसफुसाते हुए बोला –

“नेताजी, अगर आप चाहें तो मैं कल अख़बार में आपकी योजना वाली खबर पहले पन्ने पर छाप दूँगा। बस थोड़ा-सा सहयोग चाहिए। खबर को मैं ऐसा रंग दूँगा कि जनता पढ़कर रो पड़े और आप वोट पक्के कर लें।”

नेता जी ने मुस्कराकर आँख दबाई और जेब से नोट ऐसे सरका दिए जैसे विज्ञापन पैकेज हो। नोट बबलू की डायरी में ऐसे घुसे जैसे एडिटोरियल पॉलिसी में ‘स्पॉन्सर्ड कंटेंट’।

रामदा यह सब देख चुका था। उसने ऊँची आवाज़ में तीर छोड़ा –

“वाह, पत्रकारिता भी अब चाय की तरह हो गई। पैसा डालो और मनपसंद खबर निकालो। फर्क बस इतना है कि यहाँ शक्कर की जगह नोट डलते हैं और स्वाद उसी हिसाब से बदल जाता है।”

भीड़ ठहाके मारने लगी। बबलू सकपका गया। सबकी नज़रें उसकी डायरी पर टिक गईं, मानो उसमें खबर नहीं, बल्कि शेयर मार्केट का गुप्त सौदा लिखा हो। लेकिन बबलू पत्रकार था, बच निकलने का हुनर जानता था। तुरंत विषय बदलकर बोला –

“देश बदल रहा है भाइयों। मीडिया जनता की आवाज़ बन रहा है। अब तो हर न्यूज़ चैनल सच दिखाता है।”

रामदा हँस पड़ा –

“हाँ, बिल्कुल। सच दिखाता है… लेकिन TRP वाले सच। वही सच, जिसमें स्टूडियो की रोशनी ज्यादा चमकती है और जनता की अंधियारी गली कभी कैमरे में नहीं आती।”

चर्चा गहराने लगी। कोई सरकार को कोस रहा था, कोई जनता को निकम्मा बता रहा था, कोई शिक्षा का रोना रो रहा था, तो कोई संस्कृति का विलाप कर रहा था। सब अपने-अपने को विद्वान मानकर बोल रहे थे, जैसे चाय की दुकान विचारों का विश्वविद्यालय हो और हर ग्राहक यहाँ मानद प्रोफेसर। वैसे ये सभी अपने हिसाब से पढ़े-लिखे थे। चाय की चुस्ती लेते-लेते इन्होंने देश-विदेश का ज्ञान प्राप्त कर लिया था।

शाम ढल रही थी। पहाड़ की चोटियों पर लालिमा फैल चुकी थी। लेकिन चाय की दुकान अब भी गूँज रही थी।

तभी मंगूदा ने याद दिलाया –

“भाइयों, हिसाब तो कर दो। चाय मुफ्त की नहीं है।”

नेता जी ने कुर्सी पीछे सरकाते हुए कहा –

“मेरी गाड़ी में पेट्रोल खत्म हो रहा है, कल आऊँगा तो हिसाब कर दूँगा। वैसे भी नेताओं के हिसाब हमेशा अगले चुनाव तक टलते हैं।”

प्रिंसिपल साहब ने फिर वही बहाना दुहराया –

“मेरे पास छुट्टा नहीं है। शिक्षा व्यवस्था की तरह मेरी जेब भी हमेशा कैश क्रंच में रहती है।”

बबलू पत्रकार ने कॉलर ठीक करते हुए कहा –

“मैं तो समाज के लिए लिख रहा हूँ। मुझसे पैसा लेना पत्रकारिता का अपमान होगा।”

भीड़ खिलखिलाई।

अंत में रामदा फिर खड़ा हुआ और तंज़ कसते हुए बोला –

“ठीक है, मजदूर ही सबका बिल चुकाएगा। वैसे भी इस देश में असली विकास मजदूर के कंधों पर ही टिका है। बाकी सब लोग तो सिर्फ चाय की चुस्की और भाषण की फ्री रील्स से क्रांति लाने आते हैं। असल पसीना वही बहाता है, और मज़ा बाकी सब उड़ाते हैं।”


इतना कहकर उसने जेब से सिक्के निकाले और मंगूदा को थमा दिए। दुकान में एक अजीब-सी खामोशी छा गई। सबकी हँसी जैसे कहीं भीतर अटक गई हो।

दूर पहाड़ पर ढलते सूरज की आखिरी किरणें खप्पर वाले घरों पर पड़ रही थीं – मानो कह रही हों कि यहाँ असली रोशनी अब भी सिर्फ मजदूर के चूल्हे की आग से आती है, बाकी तो सब इलेक्शन मैनिफेस्टो का उजाला है।

बाहर अंँधेरा गहराने लगा था। पहाड़ की चोटियों पर तारे ऐसे टिमटिमाने लगे मानो आसमान भी नीचे बैठी बहस सुनकर मुस्करा रहा हो। औरतें अब भी घास की गाठें पीठ पर लादे लौट रही थीं—कदम थके हुए, लेकिन चेहरे पर वही मजबूरी की शांति। बच्चे अंधेरे में भी खेलते रहे, जैसे उनके हिस्से की बचपन की रोशनी बिजली कटौती के बावजूद बुझने से इनकार कर रही हो।

चाय की दुकान के भीतर तथाकथित विद्वान अपनी आखिरी चुस्की लेकर लंबी साँस छोड़ने लगे। कुछ ने अगली सुबह फिर मिलने का वादा किया, जैसे यह चाय की दुकान संसद हो और अगला सत्र कल ही शुरू होना हो।

देश वहीं का वहीं था। योजनाएँ वहीं की वहीं थीं। सड़कें अब भी टूटी-फूटी थीं, अस्पतालों की दीवारों पर अब भी सीलन थी, स्कूलों की खिड़कियों से अब भी सर्द हवा बच्चों को कंपकँपाती थी। टॉयलेट और बाथरूम के नाम पर बिना दरवाज़े का एक कोना था। मगर चर्चा इतनी ऊँची थी मानो अगले ही दिन पहाड़ स्विट्ज़रलैंड बनने वाला हो या मिनी दुबई ।

रामदा ने बाहर झाँककर देखा। अँधेरे में घास लादे औरतें धीरे-धीरे गाँव की ओर उतर रही थीं। उसने एक गहरी साँस भरी और बुदबुदाया –

“ये पहाड़ स्विट्ज़रलैंड नहीं बनेगा भाइयों, क्योंकि यहाँ औरत की पीठ पर घास और मजदूर की जेब में खालीपन ही लोकतंत्र की असली तस्वीर है। बाकी सब चर्चा बस चाय की भाप है—ठंडी पड़ते ही गायब।”

किसी ने उसकी बात पर ठहाका नहीं लगाया। सबके चेहरे पर एक अजीब-सी चुप्पी फैल गई। यह वही चुप्पी थी जो पहाड़ के जंगलों में रात ढलते उतर आती है—गहरी, भारी और सच का बोझ उठाए।

मंगूदा ने बर्तनों को धोते हुए धीमे स्वर में कहा –

“दाज्यू, चाय तो कल भी बनेगी… लेकिन काश, इन पहाड़ों की किस्मत भी कभी बदल जाती।”

उसकी आवाज़ में उम्मीद कम और बेबसी ज्यादा थी।

तभी पहाड़ों पर ठंडी हवा का झोंका आया। तारे और तेज़ चमकने लगे, जैसे आसमान ने सुन लिया हो। लेकिन धरती पर वही अंधेरा पसरा रहा।

बहस खत्म हो चुकी थी, पर असल सवाल अब भी अनसुलझा था।

चाय की चुस्की ख़त्म हो चुकी थी, मगर देश का हिसाब अब भी बाकी था।

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