बादल, तुम्हारे फटने से…...
(धराली, उत्तर काशी की स्मृति में)
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©डॉ. चंद्रकांत तिवारी (उत्तराखंड प्रांत)
बादल, तुम इस कदर फटे कि मेरी ज़िंदगी के सारे कपड़े बेतहाशा फट गए
अब ऐसा कोई भी नहीं जो इन कपड़ों को फिर सी सके,
और ऐसा कोई दिल नहीं जो मेरे आंँसुओं के वजन को समझ सके
तुमने पानी के साथ मेरे सपनों की छत भी बहा दी
मेरी हँसी का रंग भी धो डाला।
मैं अब मिट्टी के नीचे दब गया हूँ
एक ऐसी मिट्टी, जो कीचड़ और विशाल पत्थरों से मेरी सांँसों को दबोच चुकी है
क्या तुम देख सकते हो मेरे हिलते हुए हाथ
जो अब सिर्फ मदद की आखिरी पुकार हैं ?
क्या तुम मेरी बुझती हुई सांँसों को लौटा सकते हो
ताकि मैं फिर से जीवन का आकाश देख सकूंँ ?
अगर तुम्हारे हृदय में करुणा बची है
तो मेरे इशारे को समझो और मुझे उठाओ
मुझे इस मलबे से बाहर निकालो
ताकि मैं फिर से खेत में हल चला सकूंँ
घर के चूल्हे में आग जला सकूंँ
और अपनी मांँ की आंँखों में नमी के बजाय चमक ला सकूंँ
क्योंकि बादल, पानी से जीवन भी बनता है
पर जब तुम फटते हो
तो जीवन का ताना-बाना भी बिखर जाता है
आंँखों से बरसात उतर आती है।
बादल, तुम इस तरह फटे कि मेरी ज़िंदगी का हर टुकड़ा बिखर गया
कपड़े फटे, पर उससे पहले मेरी उम्मीदों का सीवन टूट गया
मांँ की गोद में रखा अनाज बह गया
चूल्हे की आख़िरी आग ठंडी हो गई
मैं मिट्टी के नीचे दबा हूँ, सांँसें रुक-रुक कर रो रही हैं
कीचड़ और पत्थरों ने मेरे सीने का रास्ता बंद कर दिया है
क्या तुम्हें मेरे हिलते हुए हाथ दिख रहे हैं, बादल ?
ये हाथ अब सिर्फ मदद नहीं, आख़िरी विदाई के इशारे हैं
मेरी बुझती हुई सांँसें लौटाओ
ताकि मैं फिर से अपनी धरती को सींच सकूंँ
पानी से, पर मौत से नहीं।
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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