शहर का मकान (कहानी)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी (उत्तराखंड प्रांत)
जनवरी का महीना था। बलुवाकोट के ऊंँचे पहाड़ों पर मुनस्यारी से लेकर छिपला केदार और गुंजी तक बर्फ की तीखी चमक और मोटी परत जमी थी। पहाड़ की ठंडी हवा हड्डियों को चबा रही थी। मोहन दाज्यू सुबह-सुबह अंगीठी के पास बैठकर अपने हाथ सेंक रहे थे। कुछ चीड़ के पेड़ों के बीच से उतरती धुंँध मानो आकाश और धरती का रिश्ता जोड़ रही हो। सामने की ऊंँची पहाड़ी पर बर्फ जमी थी, घाटी में कोहरा छाया हुआ था। जैसे प्रकृति ने सफ़ेद रजाई ओढ़ रखी हो। काली नदी की आवाज़ बलुवाकोट और नेपाल की सीमारेखा को रेखांकित कर रही थी।
कुछ चीड़ के पेड़ बर्फ की बूँदों को झटकते हुए ‘छपाछप’ करते थे, मानो कोई गाँव की औरतें पानी भरते वक्त लोटे से गिरा रही हों। पहाड़ के खेत ठंड से सिहर रहे थे, जैसे पूछ रहे हों—अबकी बार कौन हमें जोतेगा? आलू खोदने के लिए खेत में आदमी नहीं, भालू उतर आया था। प्याज़ के खेतों में बंदर धमा-चौकड़ी मचा रहे थे। गांँव में बच्चे बूढ़े-बुजुर्ग यह तमाशा देख रहे थे और सोच रहे थे कि अब पहाड़ की खेती जानवरों की दया पर ही बची है। बच्चे स्कूल में हैं, जहांँ उन्हें शिक्षा और मिड-डे मील की पानी जैसी दाल ज्यादा मिल रही है। वह दाल इतनी पतली कि उसमें चेहरा तक नज़र आ जाए। भात इतना गीला कि बिना दूध-चीनी की खीर समझ लो। बच्चे किताबों के लिए कम, थाली के उस दाल-भात के लिए ज्यादा स्कूल जा रहे थे।
इधर बलुवाकोट का मोहन दाज्यू अपनी पत्नी हेमा से कह रहा था—“हेमा, सुना है हल्द्वानी में एक कमरा मिल रहा है। छोटा ही सही, पर शहर में है। बच्चे की वहांँ अच्छी स्कूलिंग होगी, और अस्पताल भी पास रहेंगे।” हेमा ने खिड़की से झांँकते बादलों को देखा, जो मानो सुन रहे थे और हंँस रहे थे। बोली—“यहांँ तो सूरज रोज देखने को मिलता है, तारों की गिनती कर लो, पर वहांँ? वहांँ धुआंँ मिलेगा, ऑटो के हॉर्न, गाड़ियों का जाम और एंबुलेंस की आवाज़। बच्चे को नींद नहीं आएगी।” मोहन हंँसा—“बच्चा सो लेगा, अरे चिंता मत कर। हमें तो शहर में मकान बनाना ही पड़ेगा, चाहे आधा कमरा ही क्यों न हो।”
उधर पौड़ी गढ़वाल के थलीसैंण का गणेश भैजी भी अपनी पत्नी दीपा से यही चर्चा कर रहा था। दीपा बोली—“सुनो, गांँव के स्कूल में तो बस राम के भरोसे पढ़ाई है। मास्टरजी हफ्ते में दो दिन आते हैं, और तीन दिन शादी-ब्याह या चुनाव प्रचार में जाते हैं। बच्चों को भविष्य चाहिए। सुना है देहरादून में बड़े-बड़े स्कूल हैं, वहांँ बच्चे टिफिन लेकर जाते हैं। ब्रेड, ऑमलेट, फ्रूट्स! चाहें खाएंँ या न खाएंँ, पर टिफिन स्टाइलिश होना चाहिए।” गणेश ने सिर खुजाते हुए कहा—“दीपा, टिफिन का स्टाइल दिखाना है या बच्चों को पढ़ाना है?” दीपा ने तुरंत पलटकर कहा—“गांँव में तो बच्चे दाल-भात के लिए स्कूल जाते हैं, यहांँ टिफिन के लिए जाएंगे, यही तो फर्क है!”
गांँव की जिंदगी कितनी भी सुंदर क्यों न हो—आसमान बड़ा, तारे चमकीले, हवा शुद्ध, पानी के नौले से मीठा झरना बहता हो—पर वहांँ चिकित्सा यमराज के भरोसे और शिक्षा राम भरोसे है। गांँव में जब बच्चा बीमार पड़ता है तो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की एएनएम दीदी आती हैं और कीड़े मारने वाली गोलियांँ पकड़ा जाती हैं। विटामिन-डी, आयरन की गोलियांँ बांँट दी जाती हैं, और कहती हैं—“बच्चों को धूप में खिलाओ, सब ठीक हो जाएगा।” गांँव वाले भी मान जाते हैं, जैसे धूप ही सारी बीमारियों की दवा हो।
शहर की तरफ देखो, तो अस्पतालों में अलग तमाशा है। हल्द्वानी के अस्पताल में एक बार एक मरीज को मुर्दा समझकर श्मशान तक ले जाया गया। जब चिता तैयार हुई, तो वह उठ बैठा। लोग भागे, फिर हंँसे। गांँव के लोग यह किस्सा सुनते तो कहते—“शहर की दवा इतनी जोरदार है कि मुर्दे भी उठ जाते हैं।” और शहर के लोग कहते—“शहर का अस्पताल है, यहांँ तो मुर्दा और मरीज का फर्क भी समझ नहीं आता।”
इधर गांँव से जब रोडवेज बसें शहर की ओर निकलती हैं, तो दृश्य ही अलग होता है। थलीसैंण से देहरादून और बलुवाकोट से हल्द्वानी जाने वाली बसें इतनी भरी रहती हैं कि बस की छत तक पर लोग बैठे होते हैं। कुछ लोग दरवाजे पर लटकते हैं, मानो बस नहीं, कोई झूला हो। बच्चे गोद में, बकरियांँ पैरों तले, और ट्रंक छत पर। ड्राइवर हॉर्न बजाता हुआ पहाड़ की संकरी सड़कों पर बस दौड़ाता है और हर यात्री भगवान को याद करता है। पहाड़ भी तो डायनासोर जितने बड़े विशाल हैं। शहर पहुंँचते-पहुंँचते यही बसें थकी घोड़ियों की तरह हांँफने लगती हैं।
मोहन दाज्यू जब पहली बार हल्द्वानी पहुंँचे, तो उन्हें लगा कि वह किसी अलग ही दुनिया में आ गए हैं। गाड़ियों का धुआंँ ऐसा कि आंँखों से आंँसू आने लगे। हॉर्नों का शोर ऐसा कि पहाड़ के भोटिया कुत्ते भी फेल। कोई एक चिड़िया देखी तो अपने गांँव की चिड़ियों की चहचहाहट याद आ गई। पर यहांँ एक छोटा सा कमरा ढूंढा, जिसमें मुश्किल से बिस्तर और एक स्टोव समा सके। पर मोहन की आंँखों में सपने थे—“बच्चा यहीं पढ़ेगा, यहीं डॉक्टर बनेगा, यहीं से IAS बनेगा।” हेमा चुपचाप सोच रही थी—“गांँव में खुला आकाश, हवा, पानी सब छोड़ आए, और यहांँ चार दीवारों में घुटन के लिए आ गए।”
गणेश भैजी भी देहरादून में कमरे की तलाश में थे। उन्हें एक कॉलोनी में एक कमरा मिला, जिसके बगल में नाली बह रही थी। लेकिन उन्होंने सोचा—“ठीक है, नाली है तो क्या हुआ, स्कूल पास है, बाजार पास है, नौकरी का भी चांस है।” दीपा हंँसते हुए बोली—“हम तो पहाड़ से आए हैं, यहांँ नाली का पानी भी गंगाजल समझ लो।” दोनों हंँस दिए, मगर भीतर कहीं पहाड़ की याद खटकती रही।
गांँव के खेत अब बंजर होते जा रहे थे। गाय, भैंस, बकरियांँ उदास घूमती थीं, क्योंकि उन्हें चराने वाले बच्चे अब शहर के छोटे कमरों में किताबों और टिफिन के बोझ तले दबे थे। गांँव की नदियांँ पागल होकर चट्टानों से टकरातीं, मुंँह से पानी फेंकतीं, पर उन्हें देखने वाला कौन? अब गांँव में बस बूढ़े और जानवर रह गए थे। खेतों की मेड़ों पर उगती घास, जंगली झाड़ियांँ मानो कहती हों—“तुम्हारे शहर के मकान हमें रास नहीं आएंगे, हम तो यहीं रहेंगे।”
शहर के स्कूलों का भी हाल कम मजेदार नहीं था। बच्चों को ब्रेड, ऑमलेट, फ्रूट्स टिफिन में दिए जाते। मांँ-बाप सोचते—“बच्चा पढ़ाई करेगा।” लेकिन बच्चे तो टिफिन स्कूल पहुंँचते ही दोस्तों से अदला-बदली कर लेते। ब्रेड गया, बिस्किट आया। ऑमलेट गया, मैगी आई। पढ़ाई से ज्यादा टिफिन की राजनीति चलती। गांँव के बच्चे दाल-भात की प्लेट के लिए स्कूल जाते, वही शिक्षा का प्रसाद था और शहर के बच्चे टिफिन के आदान-प्रदान के लिए। फर्क बस इतना था कि गांँव में भूख पढ़ाई से बड़ी थी, शहर में दिखावा भूख से बड़ा था।
धीरे-धीरे मोहन दाज्यू और गणेश भैजी दोनों का परिवार शहर में रम गए। पर हर बार जब सर्दी आती और धुंँध छाती, तो उन्हें पहाड़ की याद सताती। मोहन दाज्यू सोचते—“वहांँ तो सुबह सूरज की किरणें सीढ़ीनुमा खेतों पर सुनहरी झालर डालती थीं। यहांँ सूरज दिनभर धुएंँ में लुका-छिपी खेलता है।” गणेश भैजी सोचते—“वहांँ तारों से भरा आकाश होता था, यहांँ रात में बस स्ट्रीट लाइट की टिमटिमाहट।”
पर बच्चों की पढ़ाई, मेडिकल सुविधाएं, और नौकरी का सपना इतना बड़ा था कि इन सब बातों पर हंसी-ठिठोली कर आगे बढ़ जाते। कभी गांँव फोन करते तो वहांँ के रिश्तेदार कहते—“खेत बंजर हो गए हैं, आलू अब भालू खोद रहे हैं, और प्याज़ टमाटर बंदर खा रहे हैं।” इस पर मोहन और गणेश दोनों हंँसते और कहते—“ठीक है, खेती जानवरों को ही सौंप दो, हम शहर में मकान बना रहे हैं।”
शहर का मकान अब सपना नहीं, मजबूरी था। गांँव की खुली हवा, तारे, सूरज, बारिश, गधेरे और नौले सब पीछे छूट चुके थे। पर इन सबकी कीमत पर शहर का मकान बना, जिसमें सपनों की दीवारें थीं और व्यंग्य की छत। आखिर गांँव से शहर तक का सफर हंँसी और व्यंग्य से भरा हुआ था—जहांँ गांँव में भालू , सूअर और बंदर खेतों के राजा थे, वहीं शहर में हॉर्न और धुआंँ जिंदगी के मालिक। दोनों जगह का सच अलग था, पर दोनों में एक जैसा—जीवन किसी का आसान नहीं, बस दिखावा अलग-अलग है।
मोहन दाज्यू अपनी छत पर बैठे थे। ईंट-पत्थरों से बने उस किराए के घर की दीवारों को देखते हुए मुस्कराए—“ये मकान मेरा है, बस उतना ही जितना बैंक चाहे।” पत्नी ने पूछा, “तो हमारा घर कब होगा?” मोहन दाज्यू ने सिर झुकाकर जवाब दिया, “घर तो गाँव में था, यहाँ तो सिर्फ़ कमरे हैं।” बच्चे नीचे गली में टूटी चप्पल को फुटबॉल बनाकर खेल रहे थे, और बार-बार मासूमियत से पूछते—“पापा, हमारे भी गाँव जैसा आँगन होगा?” मोहन दाज्यू के होंठों पर मुस्कान थी, पर आँखों में वही खामोशी थी, जो हर महीने बैंक की ईएमआई की पर्ची के साथ आती थी। मोहन दाज्यू सोचने लगे कि जितना बड़ा मकान शहर में बनता है, उतना ही छोटा आदमी अपनी ही सोच में हो जाता है। मकान ऊपर उठाने के चक्कर में आंँगन छोटा हो जाता है। रिश्ते और संबंध और भी छोटे।
उधर पौड़ी गढ़वाल के गणेश भैजी थे, जिनकी सरकारी नौकरी ने उन्हें सुरक्षित बना दिया था, लेकिन भीतर का असुरक्षित आदमी हर वक्त चिल्लाता था। पत्नी ने ताना मारा—“इतना तनाव क्यों? तुम्हें तो पेंशन भी मिलेगी।” गणेश भैजी ने गहरी साँस लेकर कहा—ओल्ड पेंशन स्कीम थोड़ी ना है अब ..! अब तो नई पेंशन स्कीम है। वैसे—“तनाव केवल पेंशन का ही नहीं है दीपा , तनाव इस बात का है कि हम बच्चों को गाँव की धूप, अपने खेत, गधेरे, संस्कृति , अपनापन , रिश्ते नहीं दे पाए, सिर्फ़ ट्यूशन फीस , शिक्षा और शहरी स्क्रीन की रोशनी दी।” बच्चे महँगे स्कूल की किताबों में उलझे रहे, लेकिन दादी की कहानियों में कभी नहीं। गणेश भैजी के चेहरे पर व्यंग्य भरी मुस्कान थी—“हमने बच्चों को मकान तो दिया, मगर घर छीन लिया। मिट्टी की गंध की जगह एयर प्यूरीफ़ायर पकड़ा दिया।” गणेश भैजी सोचने लगे कि शहर में मकान आदमी को थामता है, जबकि गाँव में आदमी घर को थामे रहता है।
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