बुधवार, 1 जुलाई 2026

बुझी हुई राख © डॉ. चंद्रकांत तिवारी

बुझी हुई राख 

© डॉ. चंद्रकांत तिवारी

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"यह कविता मनुष्य के जीवन का एक गहन सत्य उद्घाटित करती है कि कोई भी पराजय अंतिम नहीं होती और कोई भी बुझी हुई राख पूरी तरह निःजीव नहीं होती। हर टूटन, हर पीड़ा, हर असफलता और हर अँधेरा अपने भीतर एक नई शुरुआत की संभावना छिपाए रहता है। प्रकृति के असंख्य प्रतीकों के माध्यम से कविता यह विश्वास जगाती है कि संघर्ष ही जीवन की सबसे बड़ी ऊर्जा है और आशा वह चिंगारी है जो सबसे बुझी हुई आत्मा को भी फिर से प्रज्वलित कर सकती है। इसका मूल संदेश है कि मनुष्य परिस्थितियों से नहीं, बल्कि अपने धैर्य, साहस, आत्मविश्वास और पुनः उठ खड़े होने की क्षमता से महान बनता है; क्योंकि हर राख के भीतर भविष्य की अग्नि अब भी जीवित रहती है।"

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कभी भी


राख को देखकर यह मत मान लेना कि आग मर चुकी है।


आग मरती नहीं, 

बस कुछ समय के लिए अपना लाल चेहरा 

राख के भीतर छिपा लेती है।


किसी बूढ़े बरगद की तरह जो पतझड़ में भी अपनी जड़ों के भीतर बसंत सँजोए रहता है।


याद रखना—


रात कभी सूरज की हत्या नहीं करती, वह केवल उसे अगले सवेरे के लिए विश्राम देती है।


चाँद अँधेरे का साथी नहीं,

उसके विरुद्ध रात का सबसे शांत प्रतिरोध है।


और एक छोटी-सी किरण—


पूरे आकाश को नहीं, 

केवल एक पथिक का चेहरा उजाला देती है,

पर उतना ही काफी होता है दिशा बदलने के लिए।


देखो—


राख के नीचे सोई हुई चिंगारी हवा का इंतज़ार करती है, चमत्कार का नहीं।


सूखे कुएँ में भी पानी की स्मृति मरती नहीं।


बंजर खेत बीज का अपमान नहीं करते, 

वे पहली बारिश की भाषा सुन रहे होते हैं।


टूटी हुई नाव समुद्र से नफ़रत नहीं करती, 

उसे बस एक किनारे की ज़रूरत होती है।


बिखरे हुए घोंसले पक्षियों की उड़ान नहीं छीनते।


पतंग कटने के बाद भी हवा को दोष नहीं देती।


दीवार की दरार में उगी हुई घास धरती का सबसे धीमा विद्रोह है।


और सूखी नदी—


अपने भीतर समुद्र का पता कभी नहीं भूलती।


सुनो—


जिस स्त्री ने अपना सुहाग राख में बदलते देखा,


उसकी आँखों में भी एक दिन सूर्योदय लौट सकता है।


जिस लड़की ने समाज के पत्थरों से बचने के लिए घर छोड़ा,


वह भी एक दिन अपने भीतर घर बना सकती है।


जिस औरत ने अपमान की रोटियाँ खाईं,


वह भी एक दिन अपने आत्मसम्मान का पहला अन्न उगा सकती है।


जिस माँ ने अपने बच्चे की भूख अपने हिस्से की रोटी में छिपा दी,


उसकी हथेली पर समय एक दिन भाग्य लिखता है।


जिस आदमी ने बार-बार हार का स्वाद चखा,


उसी की मुस्कान सबसे सच्ची होती है।


जिस प्रेमी का पहला प्रेम टूट गया,


उसके भीतर प्रेम नहीं मरता—बस वह चेहरे से हटकर चरित्र में उतर जाता है।


जिस कवि की पहली कविता ठुकरा दी गई,


वही एक दिन लोगों की चुप्पियों का शब्दकोश लिखता है।


देखो—


सीपी हर बार मोती नहीं बनाती,

फिर भी समुद्र छोड़ती नहीं।


बादल हर बार बरसते नहीं, 

फिर भी आकाश से रिश्ता नहीं तोड़ते।


नाविक हर लहर पर जीतता नहीं,

फिर भी पतवार फेंकता नहीं।


हवा


हर वृक्ष को एक जैसी धुन नहीं देती।


फिर भी जंगल मौन नहीं होता।


तुम भी—


अपने भीतर जो राख बची है,


उसे हार का प्रमाण मत समझो।


वहीं कहीं एक लाल बिंदु अब भी धड़क रहा है।


वही तुम्हारे भविष्य का पहला सूर्य है।


याद रखना—


आँसू आँख की हार नहीं, हृदय की धुलाई हैं।


घाव शरीर का अंत नहीं, नई त्वचा का प्रारूप हैं।


अकेलापन सज़ा नहीं,

आत्मा का सबसे ईमानदार कमरा है।


मौन शब्दों की मृत्यु नहीं, उनका गर्भकाल है।


और प्रतीक्षा—


वह समय का सबसे सुंदर तप है।


देखो—


अंकुर धरती को धक्का देकर नहीं,

धैर्य देकर ऊपर आता है।


सूर्योदय आकाश पर आक्रमण नहीं करता, 

धीरे-धीरे रात का हाथ छुड़ाता है।


तितली उड़ना सीखने से पहले 

अपने ही बनाए कारागार में लंबा समय बिताती है।


बाँसुरी


खाली होने के बाद ही संगीत बनती है।


शंख


समुद्र छोड़कर ही मंदिर तक पहुँचता है।


और राख—


वह आग की हार नहीं,


उसकी सबसे विश्वसनीय स्मृति है।


इसलिए—


अगर आज तुम्हारी आँखों में धुआँ है,


तो विश्वास रखना—


कहीं तुम्हारे भीतर अभी भी एक चिंगारी साँस ले रही है।


उसे दुनिया की आँधियों से नहीं,


अपने ही संदेहों से बचाना।


क्योंकि


सबसे पहले मनुष्य बाहर नहीं,


अपने भीतर बुझता है।


और


सबसे पहले वहीं फिर से जलता भी है।


याद रखना—


हर समाप्ति अपने भीतर एक आरंभ की गुप्त राख रखती है।


हर पराजय अपने भीतर एक अदृश्य विजय का बीज छिपाती है।


हर टूटन एक नए आकार की प्रस्तावना होती है।


हर अँधेरा प्रकाश का अधूरा वाक्य है।


हर रात उजाले का गर्भ है।


और


हर बुझी हुई राख में—


एक ऐसी चिंगारी अब भी जीवित रहती है,


जो यदि एक बार विश्वास की हवा पा जाए,


तो


केवल एक दीपक नहीं,


पूरे आकाश को फिर से रोशन कर सकती है।