फ़लसफ़ा ऐ ज़िंदगी
(एक टुकड़ा लम्हा)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
कोई याद रखे न रखे, तुम याद रखना,
अपना हर कदम इंसानियत के साथ रखना।
उठे हाथ तो किसी मूरत को नहीं,
किसी टूटे हुए मन का आसमान थाम लेना।
बहुत नासमझ मिलेंगे राहों में,
उनकी आवाज़ नहीं, उनकी खामोशी पढ़ना।
अपने हिस्से की लड़ाई लड़ना,
पर किसी और की रोटी पर तलवार मत रखना।
जब भी आईना देखो,
चेहरा नहीं, अपने भीतर का मौसम देखना।
हर चमक सोना नहीं होती,
कुछ उजाले कब्रों से भी उठते हैं।
पेड़ बन सको तो छाँव देना,
दीवार बनो तो किसी का रास्ता मत रोकना।
शहर तुम्हें तालियाँ देगा,
गाँव तुम्हें दुआएँ देगा—फ़ैसला तुम्हारा होगा।
समंदर बनने की ज़िद से पहले,
किसी प्यासे की हथेली भर प्यास बनना।
जो लोग बहुत ऊँचा उड़ते हैं,
अक्सर उन्हें ज़मीन की ख़ुशबू याद रहती नहीं।
हर जीत के बाद थोड़ा हार रखना,
अपने ही अहंकार से खुद को पार रखना
कभी किसी रोते हुए चेहरे के पास बैठना,
सलाह से पहले अपना मौन रखना।
रिश्ते धागों से नहीं टूटते,
अनकहे शब्दों के बोझ से बिखरते हैं।
जिस दिन तुम्हारे पास सब कुछ हो,
उस दिन किसी अभावग्रस्त की आँखों में अपना कल देखना।
किताबों से ज्ञान लेना,
पर जीवन का अर्थ किसी मज़दूर की हथेलियों से पढ़ना।
फूल बनो तो ख़ुशबू बाँटना,
काँटे बनो तो अपने ही अहंकार को चुभना।
समय कभी किसी का नहीं हुआ,
फिर भी लोग घड़ियों पर उम्र टाँगते रहे।
जो टूटकर भी मुस्कुराते हैं,
असल में वही दुनिया को सहारा बांटते हैं।
अगर कभी बहुत अकेले पड़ जाओ,
तो किसी बूढ़े बरगद से बातें कर लेना।
हर सवाल का जवाब मत ढूँढना,
कुछ प्रश्न ही मनुष्य को मनुष्य बनाए रखते हैं।
जब दुनिया तुम्हें सफल कहे,
तो अपने भीतर बैठे बच्चे से पूछ लेना—
क्या वह अब भी बेवजह हँसता है?
और अंत में...
यदि कभी तुम्हारे जाने के बाद
लोग तुम्हारा नाम भूल भी जाएँ,
तो इतना भर होना चाहिए—
किसी अनजान की दुआ में
तुम्हारा किया हुआ एक छोटा-सा अच्छा काम
अब भी साँस ले रहा हो।