बुधवार, 2 सितंबर 2026

सरिता का गीत ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

सरिता का गीत

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


हिम की गोदी से निकलकर, निर्मल धारा आती है,

पत्थर-पत्थर चूमती-चूमती, मधुर गीत गाती है,

वन की छाया साथ लिए वह, घाटी में मुस्काती है,

प्यासे धरती के अधरों पर, जीवन-मधु बरसाती है।


कल-कल करती, छल-छल करती, चट्टानों पर बहती है,

फूलों की सुगंध समेटे, वन-पथ से कुछ कहती है,

चाँद उतरकर तेरी लहरों में, रजनी बन झिलमिलाती है,

भोर-किरण की पहली आभा, जल पर सोना बरसाती है।




काली श्यामल धार लिए, हिम की गाथा गाती है,

गोरी उजली हँसी लिए, पर्वत-मन बहलाती है,

सरयु के शांत किनारे, भोर सुनहरी आती है,

कोसी चंचल पायल बनकर, घाटी में झूम जाती है।


शारदा की धीमी लहरों में, वन की छाया सोती है,

गौला नदी की शांत धार में, संध्या दीप संजोती है,

छोटे गाड़-गधेरे मिलकर जब, जीवन-धारा बनती हैं,

कुमाऊँ की हर घाटी तब, हरियाली से हँसती है।


अलकनंदा नील सलिल-सी, पर्वत-गाथा गाती है,

भागीरथी हिम-शिखरों की, उजली कथा सुनाती है,

मंदाकिनी शिव-ध्यान लिए, शीतल स्वर में बहती है,

पिंडर अपने हिम-आँचल में, श्वेत कहानी कहती है।


पर जब काले मेघ उमड़कर, पर्वत पर छा जाते हैं,

बिजली के तीखे तीरों से, शिखर सभी हिल जाते हैं,

बादल फटते, जल उमड़ता, तट सारे डूब जाते हैं,

कोमल बाँहों वाली नदियों के, रौद्र नेत्र भर आते हैं।


कहीं घरों के दीप बुझते, कहीं द्वार वीरान हुए,

कहीं मलबे में दबकर कितने, सपने भी अनजान हुए।

कहीं करुण क्रंदन गूँजे, पर्वत-वन हैरान हुए,

कहीं नदी की काली लहरों में, आँगन सब मैदान हुए।


चीड़-देवदारों के वन जब, मलबे नीचे दबते हैं,

हरी पहाड़ी के आँचल में, धूसर घाव उभरते हैं।

कल तक जिन राहों पर जीवन, हँसता-गाता चलता था,

आज उन्हीं राहों पर केवल, पत्थर बिखरे मिलते हैं।


वन कटते हैं, पर्वत टूटें, धरती कैसे सह पाए,

जल की राह रोककर मानव, प्रलय स्वयं क्यों बुलाए,

प्रकृति कभी क्रोध नहीं करती, वह तो केवल चेताती है,

जो उसकी मर्यादा समझे, धरती फिर मुस्काती है।


फिर मलबे की दरारों से, दूब हरी हो जाती है,

सूखी धरती की गोदी में, कोंपल नई निकल आती है,

टूटी घाटी में फिर कोई, पंछी गीत सुनाता है,

घोर अँधेरी रात के पीछे, भोर नई आ जाती है।


ओ सरिता! तू जीवन-धारा, तू धरती की साँसें हैं,

तेरी निर्मल लहरों में ही, खेतों की हरियाली है,

तू बहती है तो वन हँसते, तू रुकती है तो सब प्यासें हैं,

तेरी सीमा में ही मानव, अपनी रक्षा पाते हैं।


फिर काली श्यामल मुस्काए, गोरी चाँदी हो जाए,

शारदा के शांत किनारे, स्वर्णिम भोर उतर आए,

अलकनंदा गीत सुनाए, भागीरथी स्वर दोहराए,

मंदाकिनी निर्मल होकर, शिव का ध्यान जगाए।


नदियाँ बहें मर्यादा लेकर, निर्मल उनका नीर रहे,

पर्वत ओढ़ें हरित वसन और, वन का मधुर गंभीर रहे,

मानव प्रकृति का सहचर बन, उसकी भाषा पढ़ता जाए,

तभी सरिता का अमर गीत, युग-युग धरती गाती जाए।


बहती रह तू, गाती रह तू, जीवन की मुस्कान लिए,

पर्वत से मैदानों तक जा, हरियाली की तान लिए,

तेरी लहरें कहती जाएँ—धरती सबकी माता है,

जिसने उसको प्रेम दिया है, उसका जीवन गाता है।