गुरुवार, 20 अगस्त 2026

महायोगी शिव (समाधि → ताण्डव → करुणा → अद्वैत) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

महायोगी शिव

(समाधि → ताण्डव → करुणा → अद्वैत)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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"शिव केवल किसी देवमूर्ति का नाम नहीं, वे चेतना की उस अखंड अवस्था का प्रतीक हैं जहाँ मौन ही मंत्र बन जाता है, नाद ही सृष्टि का प्रथम स्पंदन, करुणा ही धर्म का सर्वोच्च स्वरूप और आत्मबोध ही मोक्ष का द्वार। इस गीत की यात्रा कैलास की निस्तब्ध समाधि से आरंभ होकर नटराज के विराट ताण्डव, नीलकण्ठ की लोकमंगलमयी करुणा और अंततः 'शिवोऽहम्' के अद्वैत बोध तक पहुँचती है। यह केवल भगवान शिव का स्तवन नहीं, बल्कि प्रत्येक साधक की अंतर्मुखी यात्रा का काव्य है—जहाँ बाह्य शिव धीरे-धीरे अंतःकरण के शिव में रूपांतरित हो जाते हैं।

जब मन का कोलाहल मौन में विलीन होता है, तब समाधि का द्वार खुलता है। जब चेतना जागती है, तब वही मौन ताण्डव बनकर जड़ता को भंग करता है। जब हृदय लोकमंगल के लिए अपने सुख-दुःख से ऊपर उठता है, तब नीलकण्ठ की करुणा प्रकट होती है। और जब 'मैं' का आवरण हट जाता है, तब साधक अनुभव करता है कि जिसकी खोज वह पर्वतों, मंदिरों और तीर्थों में कर रहा था, वह तो उसके अपने ही अंतर में अनादि काल से आलोकित था। यही इस गीत का मर्म है—शिव को केवल पूजना ही पर्याप्त नहीं; उन्हें अपने अंतर्मन में जागृत करना ही साधना की चरम परिणति है।"

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ओम् नमः शिवाय 
☘️🙏ॐ 🙏☘️

प्रथम भाग : मौन महायोगी


मौन शिखर पर ध्यान निरंतर, यह तपस्वी भगवान कौन?

शून्य स्वयं जिसके सम्मुख झुके, वह चिरंतन ज्ञान कौन?


हिम की साँसें थम-सी जातीं,

भोर चरण में शीश झुकाती,

जटा-जूट में नभ समेटे, वह असीम विस्तार कौन?


भस्म-अंग पर काल ठिठकता,

क्षण-क्षण युग का रूप बदलता,

बंद नयन से लोक निहारता, वह अद्भुत साक्षात्कार कौन?


गंगा धीमे मंत्र सुनाती,

चंद्रकला मुस्कान सजाती,

नाग बने निज मौन उपासक, वह विरक्त सम्राट कौन?


वायु स्वयं जप करती दिखती,

दिशा-दिशा आरती-सी लिखती,

ध्वनि से पहले जो विद्यमान, वह अनहद ओंकार कौन?


कण भी जिसका नाम जपें जब,

पर्वत भी प्रणत हो जाएँ तब,

अंतरतम में दीप जलाए, वह परम प्रकाश कौन?


नयन मूँदकर जग को देखे,

मौन रहकर वेद सहेजे,

आदि अनादि अनंत विराजे—

वह कैलासाधीश कौन?



द्वितीय भाग : नटराज का ताण्डव


मौन पिघलकर नाद बना तो, डमरू का उद्घोष हुआ,

एक थाप में काल थरथर, एक निनाद में होश हुआ।


डम-डम डमरू गूँज उठे जब,

दिशि-दिशि प्राण प्रफुल्लित हों तब,

पंचमहाभूतों के भीतर, जागा कैसा जोश नया।


पद की गति से पर्वत डोले,

सागर अपने बंधन खोले,

तारक-मंडल लय में झूमें, नभ का बदला वेश नया।


जटा-जूट से बिजली फूटी,

गंगा हँसकर धरा पर छूटी,

लहर-लहर में शिव की लीला, कण-कण में संदेश नया।


त्रिनयन की ज्वाला दहके,

तम के दुर्ग स्वयं ही ढहके,

अज्ञानों के घोर अँधेरों पर, फूट पड़ा परिवेश नया।


भैरव भी मुस्काकर गाएँ,

देव, दनुज सब शीश झुकाएँ,

जिसकी लय में युग बहते हैं, वह अनश्वर आवेश नया।


सृष्टि स्वयं जब नृत्य रचाए,

प्रलय स्वयं उत्सव बन जाए,

सृजन और संहार समेटे, वह चिरनूतन देश नया।


डमरू की हर थाप सुनो तो,

'ॐ' स्वयं स्वर बनकर बोले,

नृत्य नहीं—यह ब्रह्म का स्पंदन, शिव का अमर संदेश नया।



तृतीय भाग : नीलकण्ठ – करुणा का महासागर


जब-जब जग पर घोर विषमता, जब-जब पीड़ा का विस्तार,

तब-तब आगे बढ़कर तुमने, अपने ऊपर लिया प्रहार।


हलाहल की ज्वाला जागी,

काँप उठी भू, काँपा अम्बर,

देवों के सब धैर्य बिखरते, सूना हुआ संसार।


मुस्काए तुम मौन अधर से,

विष को मान लिया प्रसाद,

नीलकण्ठ बन अमृत कर दी, त्यागमयी वह धार।


अपने कंठ में दाह समेटे,

जग को शीतल छाया दी,

दुख की धूप स्वयं सह ली तुम, बाँटी सुख की बयार।


रोता जन जब द्वार तुम्हारे,

खाली कोई लौटे कब?

भोले होकर सुनते सबकी, आँसू का व्यवहार।


भस्म रमाए, व्याघ्राम्बर धारे,

राजमहल का मोह न माना,

दीन, अनाथ, विरक्त, तपस्वी—सबके तुम आधार।


नाम तुम्हारा लेते ही क्यों,

मन का अंधकार पिघल जाता?

कैसी करुणा, कैसी ममता, कैसा निर्मल प्यार!


हे आशुतोष! तुम्हारी महिमा,

शब्दों से कब बँध पाती है?

जो भी अपना अहं विसर्जित करे, वही पाए सच्चा द्वार।


नीलकण्ठ! तुम दया के सागर,

शिव! तुम जीवन के उद्धार,

अपने दुख को मौन पी जाने का, तुम ही हो साकार।




चतुर्थ भाग : शिवोऽहम् — आत्मज्योति का उदय


खोजा तुमको गिरि की चोटी, तीर्थों में, मंदिर के द्वार,

अंतर्मन की निस्तब्धी बोली— "यहीं विराजे त्रिपुरारि।"


श्वास-श्वास में मंत्र तुम्हारा,

धड़कन-धड़कन नाम तुम्हारा,

जिसने अपने भीतर झाँका, उसने पाया पारावार।


नयन खुले तो जग बदला था,

मन बदला तो सत्य मिला था,

दूर न थे कैलास-निवासी, अंतर था ही कैलास।


राग मिटे तो योग प्रकट था,

अहं गिरा तो लोक प्रकट था,

'मैं' का अंतिम दीप बुझा तो, जाग उठा विश्वास।


कण-कण में शिव, प्राण-प्राण में,

सूर्य-किरण और गगन-विहान में,

मिट्टी, जल, अग्नि, नभ, समीर में, उनका ही उल्लास।


नाद वही, ओंकार वही है,

ज्योति वही, विस्तार वही है,

जीव और शिव एक तत्त्व हैं, यही सनातन प्रकाश।


ना कोई दूरी, ना कोई सीमा,

ना कोई बंधन, ना अँधियारा,

जो अपने अंतर को जीता, वही हुआ कैलास।


विष भी जीवन, अमृत भी जीवन,

हार भी जीवन, जीत भी जीवन,

समता जिसकी साधना बन जाए, वही सच्चा संन्यास।


मौन जहाँ संगीत बन जाए,

श्वास स्वयं आरती गाए,

वहीं प्रकट होते हैं शम्भु, वहीं अमर निवास।


आदि वही हैं, अंत वही हैं,

शब्द वही, अनहद भी वही हैं,

जग का कण-कण गाकर बोले—

"शिवोऽहम्… शिवोऽहम्… शिवोऽहम्…"


ओम् नमः शिवाय 
☘️🙏ॐ 🙏☘️



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