एक टूटी हुई शाम (कविता)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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"एक टूटी हुई शाम' केवल संध्या का दृश्य नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर धीरे-धीरे फैलती उस अदृश्य दरार का प्रतीक है, जहाँ संबंध, विश्वास, स्मृतियाँ और संवेदनाएँ मौन होकर बिखरने लगती हैं। यह कविता प्रकृति के बिंबों के माध्यम से हमारे समय की आत्मिक विडंबनाओं, अकेलेपन और मानवीय मूल्यों के क्षरण को अभिव्यक्त करती है। कविता किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती; बल्कि एक ऐसा प्रश्न छोड़ जाती है, जिसका उत्तर प्रत्येक पाठक को अपने भीतर खोजना होगा। यही इसकी संवेदना है, यही इसका प्रतीकात्मक सौंदर्य।"
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शाम आज फिर
किसी पुराने आईने की तरह
बिना आवाज़ के चटक गई।
सूरज ने
अपने सुनहरे वस्त्र
क्षितिज की देहरी पर उतार दिए,
और आकाश ने
लालिमा नहीं,
एक मौन शोक पहन लिया।
हवा गुज़री—
पर पेड़ों ने
पत्तों से कोई संवाद नहीं किया।
लगता था
जड़ों तक पहुँच चुकी है
किसी अदृश्य दरार की ख़बर।
नदी बहती रही,
किन्तु उसका जल
जैसे अपने ही प्रतिबिंब से
नज़रें चुरा रहा था।
एक पक्षी लौटा,
पर अपने घोंसले पर नहीं बैठा।
शायद
घोंसले भी कभी-कभी
घर होने से इनकार कर देते हैं।
दीपक जल रहा था,
पर लौ की थरथराहट में
हवा का दोष नहीं था;
कुछ अँधेरे
बाहर से नहीं,
मनुष्य के भीतर से उठते हैं।
मैंने देखा—
शाम केवल आकाश में नहीं टूटती,
वह टूटती है
उन आँखों में
जो अब भी प्रतीक्षा करती हैं।
वह टूटती है
उन रिश्तों में
जहाँ शब्द जीवित हैं,
पर अर्थ मर चुके हैं।
वह टूटती है
उन नगरों में
जहाँ रोशनी बहुत है,
पर किसी चेहरे पर
सवेरा नहीं उतरता।
और तब लगा—
हर टूटी हुई शाम
दरअसल समय की नहीं,
मनुष्य की आत्मा में पड़ी
उस महीन दरार का नाम है
जिसे सभ्यता
विकास कहकर छिपा देती है।
अब प्रश्न शाम का नहीं है...
टूटा कौन है—
क्षितिज,
सूरज,
या वह मनुष्य
जिसने अपने भीतर का उजाला
सबसे पहले खो दिया था?
बहुत दुःख हुआ कि इतनी अर्थपूर्ण और प्रभावी कविता के लिए कोई टिप्पणी नहीं। सच को बेहद सरल और मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। हार्दिक धन्यवाद और बधाई
जवाब देंहटाएंसधन्यवाद जी
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