मंगल गीत (कविता)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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"मंगल गीत" प्रकृति के विविध रूपों में निहित जीवन-दर्शन का सहज, सरस और प्रेरणादायी काव्य है। इसमें सूर्य, नदी, वृक्ष, पवन, पंछी, धरती और चाँद जैसे प्राकृतिक तत्वों के माध्यम से साहस, निरंतरता, विनम्रता, प्रेम, विश्वास, सेवा, करुणा और मानवता जैसे शाश्वत जीवन-मूल्यों का संदेश दिया गया है। यह कविता केवल प्रकृति का वर्णन नहीं करती, बल्कि मनुष्य को श्रेष्ठ जीवन जीने की दिशा दिखाती है और उसे स्वयं के साथ-साथ समस्त सृष्टि के कल्याण का पथ अपनाने की प्रेरणा देती है।
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सूरज कहता रोज़ निकलकर,
तम से कभी न घबराना।
दीपक बनकर स्वयं जलो तुम,
औरों का पथ भी चमकाना।
नदियाँ कहतीं बहते रहना,
रुकना जीवन की रीति नहीं।
चट्टानों से हँसकर मिलना,
संघर्षों से प्रीति सही।
वृक्ष सिखाते फल से झुकना,
छाया देना जीवन भर।
पत्थर खाकर भी मुस्काना,
यही मनुज का सच्चा स्वर।
पवन कहता मुक्त विचरना,
मन में निर्मल गंध बसाओ।
जहाँ पहुँचो वहाँ प्रेम की,
मधुर सुवास सदा फैलाओ।
पंछी कहते नभ छोटा है,
यदि विश्वास तुम्हारे संग।
साहस के दो पंख लगाओ,
जीत सुनिश्चित हर एक जंग।
धरती कहती बीज बनो तुम,
जिससे हरियाली मुस्काए।
प्रेम, दया, सेवा के अंकुर,
हर मानव के मन उपजाए।
चाँद सिखाता शीतल रहना,
तपते मन को शांति देना।
अपने सुख से पहले सीखो,
दुखियों को भी हँसी देना।
प्रकृति पुकारे एक स्वर में—
मानव! अपना धर्म निभाओ।
स्वार्थ छोड़कर प्रेम जगाओ,
धरती को स्वर्ग स्वयं बनाओ।
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