ठोकरों का आत्मविश्वास
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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यह कविता जीवन के उन अदृश्य सत्यों को उद्घाटित करती है, जहाँ संघर्ष, असफलता और ठोकरें बाधाएँ नहीं, बल्कि व्यक्तित्व के निर्माण की आधारशिलाएँ बन जाती हैं। प्रकृति के गहन प्रतीकों के माध्यम से कविता यह संदेश देती है कि कठिनाइयाँ मनुष्य को तोड़ने नहीं, बल्कि उसे भीतर से अधिक दृढ़, परिपक्व और आत्मविश्वासी बनाने आती हैं। अंततः यही अनुभव जीवन-पथ को सफलता से अधिक सार्थक और आत्मविश्वास से अधिक आलोकित बना देते हैं।
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रास्तों ने
कभी किसी पाँव से क्षमा नहीं माँगी।
वे चुपचाप
पत्थरों की वर्णमाला बिछाते रहे,
और मनुष्य
उसे पीड़ा समझकर पढ़ता रहा।
पहाड़ जानते थे—
ऊँचाइयाँ
सीधी चढ़ाइयों से नहीं मिलतीं।
इसलिए उन्होंने
ढलानों के बीच
कुछ नुकीले पत्थर रख छोड़े,
ताकि पाँव से पहले
अहंकार घायल हो।
बीज भी
धरती का अँधेरा ओढ़े बिना
कभी वृक्ष नहीं होता।
और शिलाएँ...
वे मंदिरों में जन्म नहीं लेतीं,
बरसों तक
हथौड़ों की भाषा सहती हैं,
तब कहीं जाकर
मौन का चेहरा पहनती हैं।
किसी नदी से पूछना—
समुद्र का रास्ता
मानचित्र ने नहीं बताया था उसे;
हर चट्टान ने
उसकी धारा का व्याकरण बदला था।
धूप ने
कभी फूलों को नहीं गढ़ा,
वह तो तपती रही;
सुगंध का निर्णय
ऋतुओं ने किया।
कितना विचित्र है—
मनुष्य
हार से बचना चाहता है,
जबकि समय
उसी के भीतर
एक अदृश्य प्रतिमा तराश रहा होता है।
कुछ दरारें
दीवारों में नहीं पड़तीं,
दृष्टि में उतरती हैं।
कुछ ठोकरें
घुटनों पर नहीं लगतीं,
विश्वास की नींद तोड़ती हैं।
और तब...
चलना
सिर्फ़ चलना नहीं रह जाता।
पत्थर
पत्थर नहीं रहते।
रास्ते
रास्ते नहीं रहते।
वे धीरे-धीरे...
आत्मविश्वास का
दूसरा नाम बन जाते हैं।
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