फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
हर एक चेहरे पे मत जाना, सभी सच्चे नहीं होते,
जो दरिया शोर करते हैं, वही गहरे नहीं होते।
अदावत पालने वालों से बस इतना ही सीखा है,
दिलों के फ़ासले अक्सर सफ़र से कम नहीं होते।
वक़्त जब आईना लेकर मुक़ाबिल आ खड़ा होता,
कई किरदार फिर अपनी नज़र में भी बड़े नहीं होते।
गुरूर-ए-हुस्न हो या फिर गुरूर-ए-दौलत-ओ-मंसब,
ये ऐसे ख़्वाब हैं जो उम्र भर ठहरे नहीं होते।
जो अपने दर्द को चुपचाप सीने में छुपा लेते,
वही अक्सर ज़माने में कभी चर्चा नहीं होते।
किसी के हक़ में बोलो तो अदब से बोलना साहिब,
बुलंद आवाज़ से रिश्ते कभी ऊँचे नहीं होते।
नसीब अपना बदलता है पसीने की इबादत से,
फ़क़त तक़दीर लिख देने से मंज़र ही नहीं होते।
सलीक़ा सीख लो लोगों के ग़म को बाँटने का भी,
हर इक एहसान के क़िस्से ज़ुबाँ पर ही नहीं होते।
नज़र का फ़र्क़ है साहिब, कोई पत्थर, कोई हीरा,
हर इक इंसान दुनिया में बराबर सा नहीं होता।
ज़ुबाँ मीठी भी रखिए और किरदार भी रौशन हो,
फ़क़त लहजे से कोई आदमी अच्छा नहीं होता।
जो अपनी ग़ल्तियों पर ख़ुद ही पर्दा डाल देते हैं,
उन्हें आईना भी अक्सर गवारा-सा नहीं होता।
चराग़ों की हिफ़ाज़त आँधियाँ हरगिज़ नहीं करतीं,
उजालों का सफ़र आसान दुनिया में नहीं होता।
मिज़ाज-ए-वक़्त पढ़ना भी बड़ी फ़नकारी है यारो,
हर इक मौसम हमेशा एक जैसा नहीं होता।
दुआएँ साथ चलती हैं तो रस्ते ख़ुद सँवरते हैं,
फ़क़त तदबीर से हर मसअला हल नहीं होता।
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