नवगीत - पलायन
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
सूना आँगन, बंद किवाड़ें,
चीड़ अकेला जागे।
चूल्हे की ठंडी राखों में
दिन के टूटे धागे।
गौरैया हर भोर पुरानी
देहरी पर आ जाती,
खाली घर की चुप दीवारें
बुलबुल बात बनाती।
पगडंडी की धूल पूछती—
"पाँव कहाँ खो आए?"
नदी किनारे बैठे पत्थर
किसको आज बुलाएँ?
खेत अभी भी बीज सँजोए,
बादल राह न भूले,
गाँव किसी नक़्शे का टुकड़ा
नहीं, साँस के झूले।
घर केवल छत का नाम नहीं,
स्मृतियों का वन है;
जो जड़ों से रिश्ता तोड़े,
वह भीतर से निर्धन है।

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