रविवार, 5 जुलाई 2026

नवगीत - पलायन ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

नवगीत - पलायन

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 



सूना आँगन, बंद किवाड़ें,

चीड़ अकेला जागे।

चूल्हे की ठंडी राखों में

दिन के टूटे धागे।


गौरैया हर भोर पुरानी

देहरी पर आ जाती,

खाली घर की चुप दीवारें

बुलबुल बात बनाती।


पगडंडी की धूल पूछती—

"पाँव कहाँ खो आए?"

नदी किनारे बैठे पत्थर

किसको आज बुलाएँ?


खेत अभी भी बीज सँजोए,

बादल राह न भूले,

गाँव किसी नक़्शे का टुकड़ा

नहीं, साँस के झूले।


घर केवल छत का नाम नहीं,

स्मृतियों का वन है;

जो जड़ों से रिश्ता तोड़े,

वह भीतर से निर्धन है।

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