रविवार, 5 जुलाई 2026

फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

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ज़िंदगी ने मुझे हर मोड़ पे इतना पढ़ाया,

अब किसी हादसे से इम्तिहान नहीं होता।


जो पेड़ धूप में बरसों खड़ा रहा तनहा,

उसी की छाँव में हर कारवाँ ठहरता है।


समंदरों से बड़ा हौसला तो आँखों का है,

डूबती हैं मगर ख़्वाब बहने नहीं देतीं।


मैंने देखा है चराग़ों को आँधियों के क़रीब,

रौशनी ख़ौफ़ से समझौता नहीं करती।


हवा के साथ सभी लोग उड़ नहीं सकते,

परों से पहले इरादों का आसमाँ होता है।


जो अपने दर्द को तहज़ीब में बदलते हैं,

उन्हीं के लफ़्ज़ ज़माने का दिल बदलते हैं।


मकानों से कभी आबादियाँ नहीं बनतीं,

घर वहीं है जहाँ रिश्ते साँस लेते हों।


अना की धूप में रिश्ते पिघल ही जाते हैं,

मोहब्बतों को हमेशा दरख़्त होना है।


वक़्त सबसे बड़ा उस्ताद है जहाँ भर का,

बिना किताब के जीना सिखा दिया उसने।


मैंने मिट्टी से यही एक सबक़ सीखा है,

जो झुक गया वही फ़सल बनकर उगता है।


सफ़र में सिर्फ़ मुसाफ़िर नहीं बदलते हैं,

कई दफ़ा तो मुक़द्दर भी रास्ते बदलते हैं।


जिसे यक़ीन है अपने हुनर की ख़ुश्बू पर,

वो फूल मौसमों का मोहताज कब हुआ है।


बहुत क़रीब से देखा है जीत को मैंने,

हर एक फ़त्ह के पीछे शिकस्त रहती है।


ज़ुबाँ से मीठे बहुत लोग मिल ही जाते हैं,

मगर किरदार की ख़ुश्बू कमाल होती है।


चराग़ बनने की क़ीमत भी कम नहीं होती,

तमाम उम्र ख़ुद अपना वजूद जलता है।


जो आदमी को बड़ा आदमी बनाती है,

वो दौलतें नहीं, तजुर्बों की मुफ़लिसी है।


मैं आज भी उसी मिट्टी का एहतराम करूँ,

जिसने गिराकर मुझे फिर खड़ा किया हर बार।


उड़ान भरने से पहले ये याद रख ऐ दिल,

हवा से पहले परिंदे का हौसला उड़ता है।


किसी की हार पे हँसना बहुत आसान मगर,

गिरे हुए को उठाना कमाल होता है।


ज़िंदगी रोज़ नया फ़लसफ़ा सुनाती है,

जो सुन सके वही सचमुच जवान रहता है।


मैं अपने आप से सदियों से गुफ़्तगू में रहा,

जहाँ भी लोग मिले, बस तआरुफ़ों में रहे।


किसी ने रूह का दरिया कभी नहीं देखा,

सभी ने जिस्म की सतह पे फ़ैसले लिखे।


हम अपने दर्द की नीलामी भी न कर पाए,

वो एक आह थी, जिसे लोग शायरी समझे।


मैं एक ख़ामोश किताबों-सा आदमी ठहरा,

मुझे वही पढ़ सका, जो ख़ुद भी टूटा था।


तमाम उम्र यही सोचकर गुज़र गई,

मैं किसका था, कोई आख़िर मेरा भी था कि नहीं।


वो मेरी हार का क़िस्सा सुनाकर ख़ुश था,

उसे ख़बर न थी, मैं इम्तिहान छोड़ आया।


अजीब लोग हैं, चेहरे बदलते रहते हैं,

मगर ज़मीर बदलने में देर लगती है।


मैंने हर एक रिश्ते को रूह से सींचा था,

वो अपने मतलबों की धूप लेकर आए।


ये और बात कि तन्हा दिखाई देता हूँ,

मेरे भीतर कई मौसम ठहरे बैठे हैं।


जो मेरे सच से कभी आँख मिला न सके,

वही मेरे लिए इल्ज़ाम लिखते रहते हैं।


मैं अपने हिस्से की वीरानियाँ भी जी आया,

अब कोई शहर मुझे बेघर नहीं करता।


बड़ी अजीब है इस दिल की सल्तनत यारो,

यहीं बग़ावत भी होती है, यहीं सज्दा भी।


मैं अपनी ख़ाक से ऊँचा ज़रूर उठ जाऊँगा,

हवा के ज़ोर से पर्वत नहीं झुका करते।


मेरे वजूद का हासिल यही रहा आख़िर,

मैं ख़ुद को ढूँढ़ता रहा, ख़ुद ही नहीं मिला।


जिसे भी चाहा, उसी ने यही सिखाया है,

मोहब्बतें कभी आसान रास्ता नहीं होतीं।


मैं अपने ज़ख़्म छुपाता रहा हँसी बनकर,

लोग वाह-वाह में मेरा इलाज ढूँढ़ते रहे।


सवाल इतना नहीं कौन छोड़कर गया,

कमाल ये है कि मैं फिर भी टूटकर न बिखरा।


मैंने ख़ुद अपने मुक़द्दर पे ख़ाक डाली है,

किसी को दोष दूँ, इतना भी बेअदब नहीं।


हर एक शख़्स यहाँ आईना लिए बैठा है,

मगर किसी को अपना चेहरा नहीं दिखता।


मेरे ख़िलाफ़ हवाओं ने फ़ैसले लिखे,

मैं फिर भी अपने चराग़ों के साथ चलता रहा।

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