यह हिमगिरि का बहता नीर (गीत)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
यह हिमगिरि का बहता नीर,
कितना शीतल, कितना धीर।
शुभ्र शिखर की पावन गोद,
जाग उठी बन जीवन-ओद,
कल-कल, छल-छल मधुर प्रबोध
तन का उज्ज्वल, मन का तीर,
यह हिमगिरि का बहता नीर।
हिम के उर से निकल-निकल,
शैल-शिखर से सँभल-सँभल,
चट्टानों से मिल मचल-मचल,
कंकड़ गाते छम-छम पल-पल,
वन-उपवन हँसते अविरल
धरती का मधुमय गंभीर,
यह हिमगिरि का बहता नीर।
सूखी धरती की प्यास लिए,
हरियाली का विश्वास लिए,
माटी की सौंधी साँस लिए,
जीवन का मधु-उल्लास लिए,
चलता अपना प्रकाश लिए
करुणा की अनुपम जागीर,
यह हिमगिरि का बहता नीर।
भोर सुनहरी दीप जलाए,
साँझ सितारों को पास बुलाए,
चन्दा अपने चरण धुलाए,
सूरज स्वर्णिम हार पहनाए,
नभ धरती का गीत सुनाए
प्रकृति बने संगीत-शरीर,
यह हिमगिरि का बहता नीर।
नहीं किसी से कुछ भी माँगे,
देता जाए हेमल के धागे,
सूखे वन में स्वप्न उगाए,
पत्थर तक में फूल खिलाए,
पीड़ा को भी प्यार सिखाए
त्याग बना जिसकी तक़दीर,
यह हिमगिरि का बहता नीर।
ऋषियों का यह मौन तपोवन,
कृषकों का श्रम, बालक का मन,
माँ की ममता, संतों का धन,
जन-जन का यह जीवन-स्पंदन,
भारत का अमृत-आवर्तन
युग-युग गूँजे इसकी पीर,
यह हिमगिरि का बहता नीर।
जब तक गगन, धरा, वन होंगे,
जब तक ऋतु के मधुवन होंगे,
जब तक मानव-हृदय धरेगा,
प्रेम-दीप अन्तस में जलेगा,
तब तक इसका गीत बहेगा
अमर रहेगा काली-गोरी नदियों का नीर,
हिमगिरि का हेमल-सा बहता नीर।

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