हरेला : प्रकृति पर्व, संस्कृति और नवजीवन का महापर्व 🌿
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
हरेला केवल उत्तराखंड का एक लोकपर्व नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के बीच अटूट संबंध का जीवंत उत्सव है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि हमारा जीवन वृक्षों, जल, जंगल, भूमि और जैव-विविधता से जुड़ा हुआ है। सावन के आगमन पर मनाया जाने वाला हरेला हरियाली, समृद्धि, नई आशाओं और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है। इस दिन घरों में हरेला बोया जाता है, उसकी पूजा की जाती है और परिवार के बड़े-बुज़ुर्ग उसे सिर पर रखकर आशीर्वाद देते हैं। यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भारतीय जीवन-दृष्टि का प्रतीक है।
उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में हरेला का विशेष महत्व है। पर्वतीय जीवन सदियों से जल, जंगल और जमीन पर आधारित रहा है, इसलिए हरेला यहाँ की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग बन गया है। यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति का संरक्षण केवल सरकारों का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक कर्तव्य है। आज जब जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, जलस्रोतों का सूखना और पर्यावरणीय संकट पूरी दुनिया के सामने चुनौती बनकर खड़े हैं, तब हरेला का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।
हरेला हमें यह भी प्रेरणा देता है कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। यदि हम प्रत्येक वर्ष एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल करने का संकल्प लें, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित, स्वच्छ और हरित भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। यही कारण है कि आज हरेला केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के जनआंदोलन का स्वरूप ग्रहण कर रहा है।
आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें कि "एक व्यक्ति – एक पौधा, एक परिवार – एक हरित अभियान" को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँगे। यही हरेला का वास्तविक संदेश है और यही प्रकृति के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि भी।
हरेला पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ!
"जी रये, जागि रये, धरती जस आगव,
आकाश जस चाकव होये, दूब जस फलिए-फूलिए,
सदा स्वस्थ, सुखी और समृद्ध रहिए।" 🌿🌱
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