अंतस् के रथ (कविता)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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रथ केवल पुरी की सड़कों पर नहीं चलता, वह मनुष्य की स्मृति, करुणा और साझा चेतना के भीतर भी अपनी यात्रा करता है। उसके पहियों के साथ समय, परंपरा और विश्वास एक नए अर्थ में गतिमान हो उठते हैं। असंख्य हाथ जब एक ही रस्सी को थामते हैं, तब भिन्नताओं का शोर मौन होकर एक सामूहिक स्पंदन में बदल जाता है। इस यात्रा का सबसे बड़ा चमत्कार यही है कि ईश्वर ऊँचाइयों से उतरकर धूल का स्पर्श स्वीकार करते हैं और मनुष्य को उसके भीतर छिपी करुणा, सह-अस्तित्व और विनम्रता का स्मरण कराते हैं। अंततः रथ बाहर से अधिक भीतर चलता है—जहाँ हर यात्रा मनुष्य को स्वयं से आगे, और थोड़ा अधिक मनुष्य होने की दिशा में ले जाती है।
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आज फिर
समुद्र ने
अपने नमक को थोड़ी देर के लिए
प्रार्थना में बदल दिया है।
पुरी की हवा में
लकड़ी की गंध नहीं,
शताब्दियों की साँसें तैर रही हैं।
तीन रथ हैं—
पर चल रहा है
एक ही समय।
पहियों के भीतर
वृत्त नहीं घूमते,
बीते हुए युग
अपनी धुरी पहचानते हैं।
भीड़
कभी भीड़ नहीं होती—
वह असंख्य नामों से निकलकर
एक ही स्पंदन में बदल जाने की
दुर्लभ घटना होती है।
किसी हथेली में
धान की महक है,
किसी में लोहे का ताप,
किसी में बच्चों की उँगलियों की नमी,
किसी में अधूरी प्रार्थनाओं का कंपन।
रस्सी
सिर्फ़ रेशों से नहीं बनी—
उसमें वे सारे अदृश्य धागे हैं
जो मनुष्य को
उसके अकेलेपन से बाहर खींचते हैं।
किसी ने
ईश्वर को ऊँचाइयों पर खोजा,
किसी ने शास्त्रों में,
किसी ने समाधियों में—
और वे
हर वर्ष
धूल की ओर उतर आते हैं।
धूल—
जो पाँवों से कुचली जाती है,
उसी के माथे पर
आज आकाश का स्पर्श है।
शंख की ध्वनि
समुद्र तक जाती होगी,
पर उसकी प्रतिध्वनि
शायद मनुष्य के भीतर
और अधिक देर तक रहती है।
रथ आगे बढ़ता है।
पीछे
कोई पदचिह्न नहीं छोड़ता—
केवल
इतना भर होता है कि
लौटते हुए लोग
पहले जैसे नहीं रहते।
शायद यात्राएँ
दूरी से नहीं,
भीतर बदलते भूगोल से मापी जाती हैं।
हर वर्ष
लकड़ी नई होती है,
रस्सियाँ भी—
पर उन्हें खींचने वाली प्रतीक्षा
कभी पुरानी नहीं पड़ती।
किसी सभ्यता को
यदि एक दृश्य में पढ़ना हो,
तो शायद
यह वही क्षण है—
जब असंख्य हाथ
अपनी-अपनी दिशाओं से निकलकर
एक ही गति का उच्चारण करते हैं।
और तब लगता है—
रथ
सड़क पर कम,
मनुष्य की स्मृति में अधिक चलता है।
उसके पहिए
धरती पर जितनी रेखाएँ नहीं बनाते,
उससे कहीं अधिक
भीतर के समय पर अंकित कर जाते हैं।
शाम ढले
जब जयघोष धीरे-धीरे
हवा में घुल जाएगा,
जब समुद्र
अपनी लहरों को फिर
सामान्य लय में लौटा देगा,
तब भी
एक सूक्ष्म-सी गति
शेष रहेगी—
मानो किसी ने
हमारे भीतर
एक अदृश्य रथ रख दिया हो,
जो हर बार
अहंकार से करुणा की ओर,
विभाजन से सह-अस्तित्व की ओर,
और मनुष्य से
थोड़ा-सा अधिक
मनुष्य होने की ओर
चुपचाप चलता रहता है...





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