बुधवार, 8 जुलाई 2026

अर्थों का निर्वासन ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

अर्थों का निर्वासन (कविता)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 



जब प्यासे हों खेत, गगन में सावन के मेले क्या होंगे,
सूखी धरती रोती हो तो बादल के झूले क्या होंगे।
जब टूटी हो आस, सितारों की चादर भी फीकी होगी,
मन के भीतर रात बसी हो, हर सुबह अधूरी होगी।
जब दुख की धूप झुलसाए तन, छाया भी बेगानी हो,
तब सुख के सारे स्वर्णिम किस्से केवल मनमानी हो।
जब अपने ही साथ न दें, संसार सहारा क्या देगा,
टूटी हुई पतवारों को मझधार किनारा क्या देगा।

जब आँखों में जल हो लेकिन कोई पढ़ने वाला न हो,
भीतर पीड़ा का जंगल हो, कोई चलने वाला न हो।
तब शब्दों के सारे मोती बिखरे-बिखरे लगते हैं,
हँसते चेहरे भी अक्सर फिर ठहरे-ठहरे लगते हैं।
जब छोटे-छोटे सुख के पंछी आँगन छोड़ उड़ जाते हैं,
तब उत्सव के दीप महल में जलकर फिर बुझ जाते हैं।
जब मन की वीणा के तारों में करुणा का कंपन न हो 
तब गीतों के विस्तृत सागर में मधुरिम स्पंदन न हो।

जब प्रेम नदी का जल सूखें, संबंधों के घाट मरें,
तब चंदन जैसे कोमल क्षण भी काँटों जैसे घाव करें।
जब वाणी में मधु हो लेकिन हृदय विषैले भाव भरे,
तब अभिनंदन के उपवन में केवल शूल-प्रसाद झरे।
जब जीवन के राजमहल में संवेदन का वास न हो,
धन-दौलत के ऊँचे शिखरों पर भी कोई प्रकाश न हो।
जब श्रम के हाथों को सम्मानित करने वाला जन न मिले,
तब सत्य अकेला रोता जाए, उसको कोई मन न मिले।

जब आशा की अंतिम लौ भी आँधी से घबराने लगे,
विश्वासों का नन्हा पौधा सूखेपन से मुरझाने लगे।
तब वैभव, यश, अधिकार, विजय — सब माटी हो जाते हैं,
बिन अपनत्व के सारे अर्थ अनाथी हो जाते हैं।
इसलिए बचाकर रखना मन में प्रेम दीप का उजियारा,
यही समय की धूल जीतता, यही जीवन का एक तारा।
वरना सोने के पर्वत भी रेत समान बिखर जाएँगे,
और अर्थ के सारे दर्पण खाली गूँज बन जाएँगे।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें