गुरुवार, 9 जुलाई 2026

शिक्षा, परीक्षा और निवेश ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

शिक्षा, परीक्षा और निवेश

जब भविष्य की फसल बोने वाले खेतों में प्रश्नपत्रों की दलाली उगने लगे

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


शिक्षा

भारत में शिक्षा केवल विद्यालय जाने या डिग्री प्राप्त करने की प्रक्रिया नहीं है। यह करोड़ों परिवारों के सपनों, संघर्षों और उम्मीदों का सबसे बड़ा आधार है। एक किसान अपने खेत की पैदावार बेचकर बच्चे की फीस भरता है, एक मजदूर अतिरिक्त काम करके किताबें खरीदता है और एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार अपनी इच्छाओं का त्याग करके बच्चों को पढ़ाता है।

आज शिक्षा को सामाजिक उन्नति का सबसे विश्वसनीय माध्यम माना जाता है। गरीब परिवारों के लिए शिक्षा ही वह रास्ता है जिससे वे आने वाली पीढ़ी को गरीबी और अभाव से बाहर निकालने का सपना देखते हैं।

लेकिन वर्तमान समय में शिक्षा का स्वरूप बदल चुका है। अब शिक्षा का केंद्र विद्यालय और विश्वविद्यालय कम तथा प्रतियोगी परीक्षाएँ अधिक हो गई हैं। यूपीएससी, जेईई, नीट, एसएससी, आरआरबी और अन्य परीक्षाएँ युवाओं के जीवन का मुख्य लक्ष्य बन चुकी हैं।

एक विद्यार्थी अपनी युवावस्था के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष तैयारी में लगा देता है। उसकी सुबह पाठ्यक्रम से शुरू होती है और रात मॉक टेस्ट पर समाप्त होती है। वह केवल पढ़ाई नहीं करता, बल्कि अपने भविष्य के लिए निरंतर निवेश करता है।

आज शिक्षा के चारों ओर एक विशाल आर्थिक तंत्र खड़ा हो चुका है। कोचिंग संस्थान, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, टेस्ट सीरीज़, पुस्तक उद्योग, छात्रावास और परिवहन सेवाएँ इस व्यवस्था का हिस्सा हैं। शिक्षा अब एक सामाजिक आवश्यकता के साथ-साथ एक बड़ा आर्थिक क्षेत्र भी बन चुकी है।

विडम्बना यह है कि शिक्षा में निवेश लगातार बढ़ रहा है, लेकिन उसके परिणाम तक पहुँचने वाली परीक्षा प्रणाली पर विश्वास लगातार कमजोर होता दिखाई दे रहा है।


परीक्षा

यदि शिक्षा एक यात्रा है तो परीक्षा उसका निर्णायक पड़ाव है। यही वह बिंदु है जहाँ वर्षों की मेहनत, त्याग और उम्मीदें परिणाम में बदलती हैं।

भारत में हर वर्ष करोड़ों विद्यार्थी विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होते हैं। इनमें से अधिकांश विद्यार्थी ऐसे परिवारों से आते हैं जिनके लिए सरकारी नौकरी केवल रोजगार नहीं बल्कि सम्मान, स्थिरता और सुरक्षा का प्रतीक होती है।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में परीक्षा प्रणाली बार-बार सवालों के घेरे में रही है। पेपर लीक, परीक्षा रद्द होना, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और तकनीकी अव्यवस्थाएँ अब सामान्य समाचार बनती जा रही हैं।

पेपर लीक वास्तव में प्रश्नपत्र की चोरी नहीं है; यह विश्वास की चोरी है। यह उन लाखों युवाओं की मेहनत पर चोट है जिन्होंने वर्षों तक ईमानदारी से तैयारी की होती है।

जब कोई विद्यार्थी परीक्षा कक्ष में बैठता है तो वह केवल प्रश्नों के उत्तर नहीं लिख रहा होता, बल्कि अपने भविष्य का प्रारूप लिख रहा होता है। लेकिन जब परीक्षा के बाद यह पता चलता है कि प्रश्नपत्र पहले ही कुछ लोगों तक पहुँच चुका था, तब उसकी पूरी मेहनत संदेह के घेरे में आ जाती है।

सबसे अधिक पीड़ा उस गरीब विद्यार्थी को होती है जिसके लिए एक परीक्षा ही अवसर का दूसरा नाम होती है। वह आवेदन शुल्क भरने के लिए पैसे जोड़ता है, परीक्षा केंद्र तक पहुँचने के लिए लंबी यात्रा करता है और वर्षों तक तैयारी करता है।

एक पेपर लीक केवल परीक्षा को प्रभावित नहीं करता; वह उसके समय, धन और आत्मविश्वास को भी प्रभावित करता है। कई बार परीक्षा रद्द होने का अर्थ होता है कि विद्यार्थी को फिर से तैयारी करनी होगी, फिर से खर्च करना होगा और फिर से प्रतीक्षा करनी होगी।

यह स्थिति तब और अधिक गंभीर हो जाती है जब भर्ती प्रक्रियाएँ वर्षों तक लंबित रहती हैं। विद्यार्थी की आयु बढ़ती जाती है, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ बढ़ती जाती हैं और भविष्य की अनिश्चितता भी बढ़ती जाती है।

मानसिक स्वास्थ्य का संकट भी इसी व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। लगातार तैयारी, बेरोजगारी का दबाव, असफलता का भय और परीक्षा विवाद युवाओं को गहरे तनाव की ओर धकेलते हैं।

देश में अनेक विद्यार्थियों ने परीक्षा संबंधी तनाव और निराशा के कारण आत्महत्या जैसा दुखद कदम उठाया है। यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि व्यवस्था के लिए चेतावनी है।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न जवाबदेही का है। यदि पेपर लीक होता है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है? यदि परीक्षा रद्द होती है तो उसकी कीमत केवल विद्यार्थी ही क्यों चुकाए? यदि लाखों युवाओं का भविष्य प्रभावित होता है तो जिम्मेदार लोगों पर कठोर कार्रवाई क्यों न हो?

लोकतंत्र में अधिकार और जवाबदेही साथ-साथ चलते हैं। परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं को भी उसी सिद्धांत पर परखा जाना चाहिए।


निवेश

निवेश केवल धन लगाने का नाम नहीं है। शिक्षा और परीक्षा के संदर्भ में निवेश का अर्थ समय, श्रम, सपनों और विश्वास का निवेश भी है।

एक विद्यार्थी अपनी युवावस्था का सबसे मूल्यवान समय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगाता है। वह अपने जीवन के कई वर्ष इस आशा में समर्पित कर देता है कि एक दिन उसकी मेहनत उसे अवसर दिलाएगी।

अभिभावक अपनी आय का बड़ा हिस्सा बच्चों की शिक्षा पर खर्च करते हैं। कई परिवार बचत समाप्त कर देते हैं, कई ऋण लेते हैं और कई अपनी आवश्यकताओं में कटौती करके बच्चों की तैयारी जारी रखते हैं।

यूपीएससी, जेईई, नीट, एसएससी और आरआरबी जैसी परीक्षाओं के इर्द-गिर्द एक विशाल आर्थिक ढाँचा विकसित हो चुका है। आवेदन शुल्क, कोचिंग फीस, अध्ययन सामग्री, ऑनलाइन पाठ्यक्रम, छात्रावास, परिवहन और अन्य सेवाओं पर हर वर्ष हजारों करोड़ रुपये खर्च होते हैं।

इन गतिविधियों से सरकार को कर और जीएसटी के रूप में राजस्व भी प्राप्त होता है। अर्थात शिक्षा और परीक्षा केवल सामाजिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आर्थिक गतिविधि का भी बड़ा क्षेत्र हैं।

लेकिन किसी भी निवेश की सबसे बड़ी शर्त सुरक्षा होती है। यदि निवेश सुरक्षित नहीं होगा तो विश्वास भी नहीं टिकेगा।

जब लाखों विद्यार्थी अपनी मेहनत निवेश कर रहे हों, तब परीक्षा प्रणाली का निष्पक्ष और सुरक्षित होना अनिवार्य हो जाता है। यदि बार-बार पेपर लीक होते रहें, परीक्षाएँ रद्द होती रहें और भर्तियाँ वर्षों तक लंबित रहें, तो यह निवेश असुरक्षित दिखाई देने लगता है।

आज का युवा नौकरी से पहले निष्पक्ष अवसर चाहता है। वह यह विश्वास चाहता है कि उसकी सफलता बिकाऊ नहीं है और उसका भविष्य किसी गिरोह, दलाल या प्रशासनिक लापरवाही के हाथों बंधक नहीं है।

आवश्यकता केवल नई परीक्षाएँ आयोजित करने की नहीं है। आवश्यकता ऐसी व्यवस्था बनाने की है जहाँ प्रत्येक परीक्षा के साथ स्पष्ट जवाबदेही जुड़ी हो, प्रत्येक त्रुटि पर उत्तरदायित्व तय हो और प्रत्येक विद्यार्थी को यह भरोसा मिले कि उसकी मेहनत का सम्मान होगा।

क्योंकि राष्ट्र केवल आर्थिक पूँजी से नहीं बनते, बल्कि विश्वास की पूँजी से बनते हैं। और आज भारत का युवा उसी विश्वास को अपने प्रवेश पत्र के साथ परीक्षा केंद्र तक लेकर जा रहा है।

प्रश्न यह है कि क्या हमारी व्यवस्था उस विश्वास की रक्षा कर पा रही है?

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