सावन, अंतस् की धारा
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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सावन केवल आकाश से उतरती हुई वर्षा नहीं, वह मनुष्य के भीतर फिर से हरित हो उठती पृथ्वी है। हर बूँद मिट्टी पर नहीं, स्मृतियों और संवेदनाओं पर गिरती है, हर नदी जल नहीं, पर्वत की आत्मा और वन की साँस बहाती है। शिव की आराधना मंदिरों से पहले प्रकृति के मौन में घटित होती है, जहाँ वृक्ष, पर्वत, मेघ और मिट्टी एक ही प्रार्थना बन जाते हैं।
जो भीतर से सूख गया है, सावन उसी में करुणा का अंकुर फोड़ता है, और अंततः स्मरण कराता है—मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसकी धड़कन का एक क्षणिक स्पंदन मात्र है।
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सावन
केवल बादलों का आना नहीं है।
यह पृथ्वी का
अपने ही भीतर लौट आने का समय है।
जब पहली बूँद
सूखी मिट्टी के माथे को छूती है,
तब केवल वर्षा नहीं होती—
स्मृतियों की एक पुरानी नदी
फिर से बहना शुरू करती है।
पेड़
इस मौसम में हरे नहीं होते,
वे अपनी चुप्पियों में
नई भाषा उगाते हैं।
पत्तियाँ
हवा के लिए नहीं हिलतीं,
वे आकाश से मिले पत्र
धीरे-धीरे पढ़ती रहती हैं।
पहाड़
बारिश में भीगते नहीं,
वे अपने भीतर जमा
शताब्दियों की धूल धोते हैं।
झरने
चट्टानों से नहीं फूटते,
वे उन मौन प्रार्थनाओं से जन्म लेते हैं
जिन्हें किसी ने कभी शब्द नहीं दिए।
धुंध
दृश्य को छिपाती नहीं,
वह बताती है—
हर स्पष्ट दिखाई देने वाली चीज़
पूरी तरह समझी नहीं जा सकती।
मेघ
आकाश पर लिखी हुई
जल की चलती हुई लिपि हैं।
विद्युत्
उस लिपि का विराम-चिह्न,
और गर्जन—
एक ऐसा वाक्य,
जिसे सुनकर बीज
मिट्टी के अँधेरे में
अपनी आँखें खोल देते हैं।
किसान
खेत में अन्न नहीं बोता,
वह अपने विश्वास का सबसे कठिन बीज
धरती को सौंप देता है।
बारिश
फसल से पहले
उस विश्वास को सींचती है।
नदियाँ
पानी लेकर नहीं बहतीं,
वे पर्वतों की स्मृति,
वनों की गंध,
पत्तों की हरियाली
और अनगिनत अनकहे स्पर्श
समुद्र तक पहुँचाती हैं।
इसीलिए
हर नदी का जल
किसी एक स्रोत का नहीं होता।
मयूर का नृत्य
केवल उल्लास नहीं,
सूखी प्रतीक्षा का
पहला उच्चारण है।
कोयल की भीगी हुई तान में
विरह भी भीगता है,
मिलन भी।
और मनुष्य...
वह जितना बाहर भीगता है,
उससे कहीं अधिक
भीतर भीगने लगता है।
आँखों में उतर आया पानी
कई बार बादलों से नहीं,
वर्षों से रूकी हुई संवेदनाओं से आता है।
शायद इसीलिए
सावन में शिव की आराधना
केवल देवालयों में नहीं होती।
हर वृक्ष
एक मौन शिवलिंग बन जाता है,
हर नदी
अभिषेक का जल,
हर पर्वत
ध्यान में बैठा हुआ ऋषि,
और हर बूँद—
जीवन के पक्ष में
प्रकृति का हस्ताक्षर।
सावन
मनुष्य और प्रकृति के बीच
किसी उत्सव का नहीं,
एक प्राचीन समझौते का महीना है—
जहाँ मिट्टी
मनुष्य को फिर से याद दिलाती है
कि वह पृथ्वी का स्वामी नहीं,
उसकी श्वास का
एक क्षणिक विस्तार मात्र है।
जिस दिन
हम वर्षा को
केवल मौसम नहीं,
अपने भीतर बची हुई करुणा की अंतिम नमी की तरह
पहचान लेंगे—
शायद उसी दिन
धरती को
इतना बरसना नहीं पड़ेगा।

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