सोमवार, 13 जुलाई 2026

पिता के जाने के बाद ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

पिता के जाने के बाद

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

कुछ रिश्ते समय के साथ समाप्त नहीं होते, वे स्मृतियों की धड़कनों में जीवित रहते हैं। पिता भी ऐसा ही एक विराट सत्य हैं—जो चले जाने के बाद भी जीवन के हर निर्णय, हर संघर्ष और हर सफलता में मौन उपस्थिति बनकर साथ रहते हैं। उनकी अनुपस्थिति केवल एक व्यक्ति का अभाव नहीं, बल्कि उस छाया का खो जाना है जिसके नीचे जीवन निडर होकर खिलता था।

यह कविता उसी रिक्तता, उसी मौन संवाद और उसी अनंत स्नेह को शब्दों में संजोने का एक विनम्र प्रयास है।
यदि इन पंक्तियों में कहीं आपकी अपनी स्मृतियाँ भी आँसू बनकर उतर आएँ, तो समझिएगा—पिता कभी विदा नहीं होते, वे संतान के हृदय में शाश्वत होकर बस जाते हैं।

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पिता के जाने के बाद, आँगन में धूप तो उतरी, पर उजाला कहीं खो गया।

बरगद खड़ा रहा वहीं, मगर उसकी छाँव का अर्थ बदल गया।

दीवारों ने पहली बार सिसकियों की भाषा पढ़नी सीखी।

चौखट हर आहट पर आज भी उनके कदमों का भ्रम पालती है।


घर अब मकान है—जिसकी हर ईंट स्मृतियों का दीप जलाती है।

उनकी चुप्पियाँ आज जीवन का सबसे गहरा उपदेश बन गई हैं।

सिर पर रखा उनका हाथ हटते ही आकाश कुछ और दूर हो गया।

समय ने मुस्कुराना सिखाया, पर भीतर का बालक अनाथ ही रहा।


रोटियों की खुशबू में अब भी उनके श्रम का पसीना महकता है।

रात के सबसे गहरे सन्नाटे में उनका विश्वास तारे बनकर उतरता है।

मैं जब भी टूटता हूँ, उनकी सीख नदी की धारा-सी मुझे थाम लेती है।

आँसू बहते हैं, पर उनकी मर्यादा पलकों पर पहरा देती रहती है।


उन्होंने जीवन नहीं, संघर्ष को मुस्कुराकर जीने की विरासत छोड़ी।

अब हर कठिन मोड़ पर उनकी अनुपस्थिति ही मेरा साहस बनती है।

पिता कभी जाते नहीं—वे रक्त में धड़कन, संस्कार में प्रकाश बनकर बसते हैं।

उनकी स्मृतियाँ पीपल की जड़ों-सी, हर ऋतु में जीवन को थामे रहती हैं।


मैं हर सफलता में उनका मौन आशीष सुन लेता हूँ।

हर असफलता में उनकी आँखों का धैर्य मुझे फिर खड़ा कर देता है।

पिता के जाने के बाद समझ आया—वृक्ष गिरता नहीं, वन का हृदय खाली हो जाता है।

और पुत्र जीवन भर उसी रिक्त छाँव में, उनके नाम का आकाश ओढ़कर चलता रहता है।


9 टिप्‍पणियां:

  1. पिता होते ही ऐसे हैं। संतानों पर छाया बनकर खुद धूप में तपते हैं लेकिन संतान को अपनी छाया से निहाल किए रहते हैं। पिता का रिश्ता ऐसा है जिनकी उपस्थिति और अनुपस्थिति दोनों ही स्थितियों में जीवन जीने का उद्देश्य निर्धारित कर देता है। उनकी उपस्थिति जीवन संवारती है तो अनुपस्थिति लगातार प्रेरणा देती रहती है। पिता कभी मरते नहीं है। वे हमेशा हमारे साथ रहते हैं, अंत समय तक। आपकी यह कविता पिता के अस्तित्व को सदा के लिए जीवित करने वाली है। साथ ही पितृऋण को स्वीकारती भी है।

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  2. पिता होते ही ऐसे हैं। संतानों पर छाया बनकर खुद धूप में तपते हैं लेकिन संतान को अपनी छाया से निहाल किए रहते हैं। पिता का रिश्ता ऐसा है जिनकी उपस्थिति और अनुपस्थिति दोनों ही स्थितियों में जीवन जीने का उद्देश्य निर्धारित कर देता है। उनकी उपस्थिति जीवन संवारती है तो अनुपस्थिति लगातार प्रेरणा देती रहती है। पिता कभी मरते नहीं है। वे हमेशा हमारे साथ रहते हैं, अंत समय तक। आपकी यह कविता पिता के अस्तित्व को सदा के लिए जीवित करने वाली है। साथ ही पितृऋण को स्वीकारती भी है।

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  3. पिता होते ही ऐसे हैं। संतानों पर छाया बनकर खुद धूप में तपते हैं लेकिन संतान को अपनी छाया से निहाल किए रहते हैं। पिता का रिश्ता ऐसा है जिनकी उपस्थिति और अनुपस्थिति दोनों ही स्थितियों में जीवन जीने का उद्देश्य निर्धारित कर देता है। उनकी उपस्थिति जीवन संवारती है तो अनुपस्थिति लगातार प्रेरणा देती रहती है। पिता कभी मरते नहीं है। वे हमेशा हमारे साथ रहते हैं, अंत समय तक। आपकी यह कविता पिता के अस्तित्व को सदा के लिए जीवित करने वाली है। साथ ही पितृऋण को स्वीकारती भी है।

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  4. पिता के प्रति अति संवेदनशील रचना है। लेकिन पिता ही नहीं माता भी और हमारे पूर्वज भी इसी भाँति अदृश्य शक्ति के रूप में हमारे साथ रहते हैं और अनुभूतियों में जीवित रहते हैं।

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