शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

हरेला की टोकरी ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

हरेला की टोकरी

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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"हरेला की टोकरी" केवल उत्तराखंड के लोकपर्व का काव्यात्मक चित्रण नहीं, बल्कि मनुष्य, प्रकृति, स्मृति और सांस्कृतिक अस्मिता के बीच टूटते-बनते संबंधों का एक गहन प्रतीक है। यह कविता वर्ष में मनाए जाने वाले तीनों हरेलों—चैत (चैत), श्रावण (सौण) और आश्विन (असौज)—को केवल ऋतु-परिवर्तन के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के तीन आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पड़ावों के रूप में देखती है। चैत (चैत) आशा और सृजन का, श्रावण (सौण) संवेदना और जीवन-स्पंदन का, तथा आश्विन (असौज) स्मृति, आत्ममंथन और जड़ों की ओर लौटने का प्रतीक बनकर उभरता है। कविता यह प्रश्न उठाती है कि यदि पलायन के कारण गाँव, लोकभाषा, लोकपर्व और सामुदायिक जीवन निरंतर रिक्त होते जाएँ, तो केवल पर्वों का जीवित रहना पर्याप्त नहीं होगा। इस प्रकार हरेला की टोकरी अंततः बीजों की नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर बची हुई उस अंतिम हरियाली, अपनी मिट्टी से जुड़े रहने की चेतना और उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा को बचाए रखने की सामूहिक जिम्मेदारी का सशक्त रूपक बन जाती है।

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हरेला की टोकरी में

इस बार

केवल बीज नहीं हैं।


वहाँ रखी है

एक बूढ़ी दादी - नानी की हथेली,

जिसकी रेखाओं में अब भी

चैत उगता है।


वहाँ एक बच्चे की हँसी है,

जो शहर की किसी ऊँची इमारत में

अपनी ही कुमाऊं और गढ़वाली बोली भूलकर

धीरे-धीरे मौन हो रही है।


वहाँ

एक अधूरी पगडंडी है—

जो हर बरस

किसी लौटते हुए कदम की प्रतीक्षा में

थोड़ी और घिस जाती है।


कहा जाता है—

सौण आता है

तो धरती भीगती है।


पर किसने देखा

कि सबसे पहले

भीगती हैं स्मृतियाँ।


पहले भीगता है

एक बंद घर का किवाड़,

फिर तुलसी का सूना चौरा,

फिर वह दीपक

जिसे वर्षों से

किसी ने अपने नाम से नहीं पुकारा

और छत के पाथर।


बारिश

पहाड़ पर कभी पानी बनकर नहीं गिरती,

वह उतरती है

पूर्वजों की धीमी आवाज़ की तरह।


और जंगल...

जंगल पेड़ों का समूह नहीं होता,

वह उन लोगों का सामूहिक मौन होता है

जो अपनी जड़ों को

कभी छोड़कर नहीं गए।


फिर

असौज आता है।


धूप की तहों में

ओस अपना अंतिम हस्ताक्षर रखती है।


हवा

सूखी नहीं होती,

वह उन नामों से भर जाती है

जो अब गाँव की जनगणना में नहीं मिलते।



एक घर

जब बंद होता है,

तो केवल एक दरवाज़ा बंद नहीं होता—


एक लोकगीत

अपना श्रोता खो देता है।


एक त्योहार

अपना घर खो देता है।


एक भाषा

अपने उच्चारण का अंतिम वृक्ष खो देती है।


और पहाड़...


पहाड़

कभी अचानक खाली नहीं होते।


वे पहले

अपनी आवाज़ खोते हैं।


फिर धुआँ।


फिर बच्चों की दौड़-धूप।


फिर बाखलियों की साँझ।


और अंत में

हरेला की टोकरी

हल्की हो जाती है।


इतनी हल्की

कि उसमें रखा हुआ

एक अकेला बीज भी

पूरे हिमालय का आदर्श लगता है।


शायद इसीलिए

हरेला

ऋतु का उत्सव नहीं है।


यह मनुष्य से

उसकी मिट्टी का अंतिम संवाद है।


यह उस प्रश्न का उत्तर भी नहीं,

जो हर वर्ष चैत, सौण और असौज पूछते हैं—


यह स्वयं

वही प्रश्न है।


कि...


यदि बीज बच जाएँ

और खेत न बचें,


यदि पर्व बच जाएँ

और लोग न बचें,


यदि घर बच जाएँ

और लौटने वाले कदम न बचें,


तो बताओ—


हरेला किसके लिए उगेगा?

और काटेगा कौन ?

और गोलज्यू, गंगनाथ, भगवती के थानों पर चढ़ाएगा कौन?


और तब

हरेला की टोकरी में

अचानक दिखाई देती है


एक मुट्ठी मिट्टी—


जो किसी खेत की नहीं,


किसी राज्य की नहीं,


बल्कि

मनुष्य के भीतर

अब भी बची हुई

उस अंतिम हरियाली की है,


जिसे बचाए बिना

कोई भी पहाड़

पहाड़ नहीं रहता।





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