मंगलवार, 21 जुलाई 2026

मेघमन्थन : श्रावण का आत्मगान ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 

मेघमन्थन : श्रावण का आत्मगान

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


नील नभ के नीरव उर में घन का गम्भीर निमंत्रण है,

धरती के उन्मीलित लोचन में नवजीवन का स्पन्दन है।

हरित वसन में लिपटी प्रकृति का मौन मधुर अभिनन्दन है,

श्रावण केवल ऋतु नहीं—सृष्टि-हृदय का वन्दन है।


शैल-शिखर की शान्त तपस्या आज सुधा से भीग रही,

निर्झर की निस्सीम सरगम अन्तर-वीणा छेड़ रही।

देवदारु के ध्यान-वृक्ष पर धुंध दिगन्तों से उतरी है,

मानो युग की मौन समाधि नव चेतन से जाग रही।


कदम्बों की कोमल शाखों पर बूँदों का श्रृंगार खिला,

वन-पथ के हर तृण ने जैसे स्वर्णिम जीवन-सार मिला।

पवन प्राचीन ऋषि-सा बहकर कानों में कुछ कह जाता,

मौन शिलाओं के अंतर में भी नव आलोक-विहार मिला।


विद्युत् की चंचल रेखा ने तम का आवरण चीर दिया,

क्षण भर में ही असीम गगन का अन्तर्मन गंभीर किया।

मेघों ने जब करुणा बनकर अपनी पलकों को झुका दिया,

सूखी धरती के अधरों पर जीवन का अमृत नीर दिया।


घाटी-घाटी गूँज रहे हैं निर्झर के निर्मल आलाप,

वन-वन में झंकृत हो उठता पत्तों का मृदुल प्रतिताप।

मयूर-पंख पर नाच रही है इन्द्रधनुष की मौन हँसी,

कोयल के भी भीगे स्वर में विरह बना मधुमय जाप।


नदियाँ अपने उद्गम का इतिहास कभी दोहराती नहीं,

त्याग-तरंगों का संगीत लिए क्षण भर भी थक जाती नहीं।

पर्वत के उर का सारा स्नेह समतल तक पहुँचा देतीं,

अपना सब कुछ देकर भी वे प्रतिदान कभी चाहती नहीं।


हल की रेखा धरती के उर पर आशा का अभिलेख बने,

बीजों की निस्तब्ध तपस्या कल का स्वर्णिम लेख बने।

मेघ-कृपा से श्रम का कण-कण अन्नपूर्णा बन मुस्काए,

किसान के श्रम का प्रत्येक श्वास मंगल-अभिषेक बने।


धुंध दुल्हन बन पर्वत के नील कपोलों को चूम रही,

ओस मुकुल की पलकों पर चुप स्वप्निल दीपक झूम रही।

हर पत्ती पर बूँद ठहरकर जैसे मोती बन जाती है,

सृष्टि स्वयं अपने दर्पण में अपना रूप निहार रही।


श्रावण! तुम केवल जलधारा, केवल बादल, केवल मेघ नहीं,

तुम जीवन की मौन प्रार्थना, करुणा का अनुपमेय स्नेह हो।

तुमसे ही सूखे अन्तरवन में फिर हरियाली जन्मे है,

तुमसे ही मानव के उर में फिर विश्वास का सेतु रहे।


जब-जब जीवन धूल भरे पथ पर थककर रुक-सा जाता है,

तब-तब श्रावण बनकर कोई भीगा सपना आता है।

बूँद-बूँद में ब्रह्म का स्पर्श, पात-पात में प्रेम बसा—

प्रकृति नहीं, स्वयं ईश्वर ही हरियाली बन गाता है।


धरती का कण-कण आज अनन्त का अभिनव अर्थ हुआ,

मेघों का प्रत्येक निनाद स्वयं वेदों का स्वर-पार्थ हुआ।

श्रावण आया—और लगा यह सारा जग नवजात हुआ,

जीवन का प्रत्येक श्वास स्वयं परमात्मा का गान हुआ।




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