महर्षि दयानंद सरस्वती और हिंदी : वैदिक चेतना से राष्ट्रीय भाषा तक-
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
उन्नीसवीं शताब्दी का भारत आत्मसंघर्ष और आत्मअन्वेषण के दौर से गुजर रहा था। एक ओर औपनिवेशिक सत्ता का सांस्कृतिक दबाव था, तो दूसरी ओर समाज रूढ़ियों और अंधविश्वासों की जकड़न में बँधा हुआ था। ऐसे संक्रमणकाल में स्वामी दयानंद सरस्वती का प्रादुर्भाव केवल एक धार्मिक सुधारक के रूप में नहीं, अपितु एक भाषिक जागरण–पुरुष के रूप में भी हुआ। उन्होंने वेदों की ज्योति को जन-जन तक पहुँचाने के लिए जिस माध्यम को चुना, वह हिंदी थी—सरल, सुस्पष्ट, ओजस्विनी और आत्मीय हिंदी।
स्वामी दयानंद का विश्वास था कि राष्ट्र की आत्मा उसकी भाषा में निवास करती है। यदि ज्ञान केवल संस्कृत के पांडित्य-गर्भित कक्षों में सीमित रहेगा, तो वह लोकजीवन को आलोकित नहीं कर सकेगा। इसीलिए उन्होंने संस्कृत के गूढ़ वैदिक तत्त्वज्ञान को हिंदी की सहज धारा में प्रवाहित किया। उनके प्रवचन, वाद-विवाद और ग्रंथ—सभी में भाषा की स्पष्टता, तर्क की तीक्ष्णता और भाव की गंभीरता एक साथ दिखाई देती है। उनकी हिंदी न तो अलंकार-भार से दबी हुई है, न ही शुष्क बौद्धिकता से ग्रस्त; उसमें विचार की ज्वाला और अभिव्यक्ति की सादगी का अद्भुत संतुलन है।
उनकी अमर कृति ‘सत्यार्थ प्रकाश’ हिंदी गद्य की विकास-यात्रा में एक मील का पत्थर है। यह ग्रंथ केवल धार्मिक प्रतिपादन नहीं, बल्कि विचार-क्रांति का उद्घोष है। इसमें उन्होंने वेदों की युक्तियुक्त व्याख्या करते हुए समाज की कुरीतियों, अंधविश्वासों और पाखंडों का निर्भीक खंडन किया। भाषा यहाँ शास्त्रार्थ की दृढ़ता के साथ-साथ नैतिक आग्रह की ऊष्मा से भी अनुप्राणित है। इस रचना ने हिंदी गद्य को तार्किकता, ओज और वैचारिक प्रखरता प्रदान की—जो आगे चलकर भारतेन्दु युग की चेतना का आधार बनी।
स्वामी दयानंद के लिए हिंदी केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं थी; वह राष्ट्रीय एकता का सेतु थी। उन्होंने आर्य समाज की शाखाओं, गुरुकुलों और सभाओं में हिंदी को शिक्षण और संवाद की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया। देवनागरी लिपि के समर्थन द्वारा उन्होंने भाषिक स्वाभिमान को सुदृढ़ किया। उनके प्रयासों से हिंदी उत्तर भारत में नवचेतना की वाहक बनी और जनमानस में आत्मगौरव का भाव जाग्रत हुआ।
उनकी भाषा में एक प्रकार की वैदिक गंभीरता और सुधारवादी आवेग का समन्वय मिलता है। वे शब्दों को केवल सजाते नहीं, उन्हें उद्देश्यपूर्ण बनाते हैं। उनकी शैली में प्रश्नोत्तरी का तीखापन है, तर्क का अनुशासन है और सत्य के प्रति अडिग निष्ठा है। यही कारण है कि उनकी हिंदी पाठक को केवल जानकारी नहीं देती, बल्कि उसे विचार करने, प्रश्न उठाने और परिवर्तन के लिए प्रेरित करती है।
इस प्रकार स्वामी दयानंद सरस्वती हिंदी के इतिहास में केवल एक लेखक या उपदेशक नहीं, बल्कि एक भाषिक पुनर्जागरण के अग्रदूत के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने हिंदी को वैदिक चेतना की गरिमा, सामाजिक सुधार की शक्ति और राष्ट्रीय स्वाभिमान की ध्वनि प्रदान की। उनकी वाणी में निहित ओज आज भी हिंदी को आत्मबल और आत्मविश्वास का संचार करता है।
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