महात्मा गांँधी : साहित्य, समाज के मध्य शस्त्र-शास्त्र की भूमिका
डॉ. चंद्रकांत तिवारी
"शस्त्र शास्त्र से बढ़कर है या
शास्त्र शस्त्र से बढ़कर
द्वंद्व सही है तब जब योद्धा
अश्व शक्ति पर चढ़कर
विजित लक्ष्य हासिल करता
सम्मान राष्ट्र का शेष समर
हो जाता फिर द्वंद्व अमर ।"
स्वरचित पंक्तियां किस बात की ओर इशारा करती हैं यह हमें समझना है। शस्त्र मानवता की रक्षा और शास्त्र मानवता के कल्याण हेतु आवश्यक है। व्यक्ति शास्त्र विद्या में निपुण है तब तक शस्त्र की क्या आवश्यकता भला । जीवन में शास्त्र शक्ति ही श्रेष्ठ वर्चस्व को स्थापित करने वाली होती है। हालांकि मानवता की रक्षा और सुरक्षा के लिए शस्त्र और शास्त्र दोनों का ही समन्वित समायोजन आवश्यक है। जीवन में हिंसा का कोई स्थान नहीं परंतु हिंसा फिर भी करनी पड़ती है। धर्म की रक्षा और मर्यादा की सुरक्षा के लिए हिंदू महाकाव्य रामायण और महाभारत दोनों का महत्वपूर्ण स्थान है। महाभारत और रामायण दोनों ही धर्म की स्थापना और साम्राज्य स्थापना के प्रबल प्रमाण है। हालांकि आधुनिक जगत शास्त्र विद्या को प्राथमिकता देता है। शस्त्र मानवता की वंशावलियों का विनाश करने वाले हैं। अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र इसका प्रमाण है। ब्रह्म विद्या मानवता का कल्याण करे ना की समग्र विनाश। वैश्विक जगत बड़े विकट समस्याओं से जूझ रहा है। इजरायल ईरान इसके प्रमाण है। भारत पाकिस्तान सर्जिकल स्ट्राइक और आतंकी हमले शांति और गौतम बुद्ध की परंपरा का देश कब तक शांत बैठेगा ? देश की सुरक्षा महत्वपूर्ण है। हिंसा किसको अच्छी लगती है । परंतु मर्यादा की स्थापना के लिए राक्षसों का वध करने के लिए हिंसा भी करना पड़ती है । जानवर को मारने के लिए जानवर बनना पड़ता है। साधारण और सरल भोले वाले गांँव के ग्रामीण को कूटनीतिक नेता बनना पड़ता है। योगी, महंतों , संतों और बाबाओं को देश चलाने के लिए, नेतृत्व देने के लिए आगे आना पड़ता है।
प्रिय सहृदय पाठकों मेरे अभिन्न मित्रों यह ध्यान रहे हमेशा कि अणुबम, हथियार अत्याधुनिक मिसाइलें मानवता की समाधि को निर्मित करने वाले हैं। भारत सामाजिक सद्भाव और मानवतावादी विचारधारा को लेकर चलने वाला देश है। हथियार देश की सुरक्षा और वैश्विक जगत के समक्ष भारतीय वर्चस्व को स्थापित करने के लिए निर्मित करना भी आवश्यक है। देश की प्रगति हथियारों से नहीं बल्कि बौद्धिक व्यक्तियों और व्यक्तित्व से होती है , साथ ही कुशल नेतृत्व से वैश्विक संदर्भ में विदेश नीतियां, कूटनीतियां स्थापित की जाती हैं । सत्य और अहिंसा हमेशा ही ईश्वरी शक्ति के रूप में मानवता की रक्षा करते हैं। भारतीय संस्कृति ज्ञान और परंपरा, चिंतन परंपरा को वैश्विक स्तर पर स्थापित करते हैं। गांधीजी इसी बात के प्रबल समर्थक थे। भारतीय जनमानस को यही बात वह अपने पूरे जीवन काल में समझाते रहे कि सत्य और अहिंसा का महत्व सर्वोपरि है। हालांकि कुछ अपवाद हर स्थान पर दिखते हैं। हर कोई व्यक्ति पूर्ण शत प्रतिशत सही नहीं होता । कुछ कमियां हर व्यक्ति में होती हैं । निर्णय लेने में और निर्णय देने में । फिर भी समग्र अवलोकन किया जाए तो गांधी जी हितकर ही होंगे ऐसा माना जा सकता है। जब हम गांधी जी की प्रशंसा करते हैं तो उनके समकालीन अन्य लोक नेताओं को भुलाया नहीं जा सकता। देश की आजादी और सामाजिक सद्भाव के लिए राष्ट्रीय आंदोलन के प्रत्येक कार्यकर्ता का अपना महत्वपूर्ण और अविष्करणीय योगदान है।
महात्मा गांँधी साहित्यिक दृष्टिकोण -
गांँधी की साहित्यिक विचारधारा का मूल आधार सत्य, अहिंसा, आत्मशुद्धि, नैतिकता और मानवता रहा है। महात्मा गांँधी ना केवल एक राजनीतिक और आध्यात्मिक विचारक और नेता थे, बल्कि उनकी सोच और विचारों और दर्शन ने भारतीय साहित्यकारों और साहित्य को भी गहरे स्तर पर प्रभावित किया। गांँधी जी साहित्यिक कार्यक्रमों, सहृदयों और साहित्यकारों को नई दृष्टि और नये समसामयिक दृष्टिकोण से जोड़ते भी हैं। साथ ही युगबोध से प्रेरित और सामाजिक एकीकरण, समरूपता से समन्वित होकर स्वयं भी लेखन कार्य किया है और अनेक लेखकों को प्रेरित किया।
1. गांँधी जी का साहित्यिक योगदान
गांँधी जी का प्रमुख साहित्यिक योगदान उनके लेख, पत्र, आत्मकथा और भाषण हैं।
उनकी प्रसिद्ध पुस्तक "सत्य के प्रयोग" (The Story of My Experiments with Truth) एक आत्मकथात्मक कृति है, जो न केवल उनके जीवन की झलक देती है बल्कि उनके विचारों का दर्शन भी कराती है।
उनके संपादित पत्र ‘हरिजन’, ‘नवजीवन’ और ‘यंग इंडिया’ साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत मूल्यवान हैं।
2. गांँधी जी की साहित्यिक विचारधारा के प्रमुख तत्व
1- सत्य और अहिंसा का आदर्श – उनके लिए साहित्य एक साधना था, जो व्यक्ति को सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करे।
2 - सादा जीवन, उच्च विचार – उन्होंने सरल भाषा और शैली को अपनाया, जिससे आमजन तक विचार सरलता से पहुँच सकें।
3- रचनात्मक साहित्य का आग्रह – वे मानते थे कि साहित्य समाज का निर्माण करे, उसका विघटन नहीं।
4- नैतिकता और आत्मानुशासन – उनका साहित्य आत्मशुद्धि और आत्मसंयम पर बल देता है।
3. गांँधी जी और समकालीन साहित्यकार
गांधी जी की विचारधारा से प्रेरित होकर कई साहित्यकारों ने साहित्य सृजन किया, जैसे
मुंशी प्रेमचंद – उनके कई उपन्यासों में गांधीवादी विचारों की झलक मिलती है (जैसे "कर्मभूमि")
विनोबा भावे, जैनेन्द्र कुमार, राममनोहर लोहिया, कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी आदि पर भी गांधी का प्रभाव देखा जा सकता है।
4. गांँधी विचारधारा और हिंदी साहित्य
गांँधी जी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में महत्व दिया और हिंदी लेखन को प्रोत्साहित किया। हिंदी साहित्य में गांँधीवादी साहित्य एक अलग धारा के रूप में विकसित हुआ जिसमें रचनाकारों ने समाज सुधार, अस्पृश्यता निवारण, स्त्री सम्मान, ग्रामीण उत्थान जैसे विषयों को उठाया।
निष्कर्षत: महात्मा गांँधी की साहित्यिक विचारधारा केवल लेखन में नहीं, बल्कि उनके जीवन में भी अभिव्यक्त होती है। उनका साहित्यिक दृष्टिकोण मानवतावादी है जो सत्य, नैतिकता और सेवा पर आधारित है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि साहित्य केवल मनोरंजन या अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का सशक्त साधन हो सकता है।
महात्मा गांँधी और समाजवादी दृष्टिकोण -
महात्मा गांँधी की सामाजिक दृष्टि 'सर्वोदय' पर आधारित थी, अर्थात् सबका कल्याण और उत्थान। गांँधी जी ने अस्पृश्यता को अधर्म और अमानवीय बताया। गांँधी जी का सामाजिक दृष्टिकोण सत्य और अहिंसा पर केंद्रित है ।
शिक्षा-दृष्टि में सामाजिक सद्भावना, सेवा, श्रम, नैतिक शिक्षा , हस्तकला शिक्षा , नई तालीम को प्राथमिकता दी। महिलाओं को राष्ट्रसेवा और समाजसेवा से जोड़ने के लिए ग्राम स्वराज का संकल्प संदेश स्थापित किया। हर गाँव और हर ग्रामीण आत्म-निर्भर हो ऐसी व्यवस्था को मजबूत बनाने में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करना समाजिक धर्म समझा और लोक को समझाया।
निम्नलिखित विविध दृष्टिकोणों से समाजवादी विचारधारा को रेखांकित किया जा सकता है।
1. अस्पृश्यता निवारण और सामाजिक समानता
2. सत्य और अहिंसा का समन्वित सिद्धांत
3. नारी जीवन सशक्तिकरण पर केंद्रित
4. स्वदेशी और ग्राम स्वराज का सिद्धांत
5. शिक्षा धर्म नैतिकतापूर्ण और सेवाकर्म
6. धर्म और सहिष्णुतावादी दृष्टिकोण
7. धार्मिक सहिष्णुता, भाई-चारा और सांप्रदायिक सौहार्द
8. सामाजिक समरसता और शांति की स्थापना
कोशिश, प्रयास, संघर्ष और सकारात्मक दृष्टिकोण जीवन के साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और शास्त्र - शास्त्र की भूमिका को रेखांकित करते हुए मानव जीवन के लिए व्यापक फलक प्रदान करते हैं। मनुष्य को सकारात्मक दृष्टि से संघर्ष और प्रयास करते रहना चाहिए।
"रात कितनी भी अंधेरी क्यों ना हो
सुबह होना तो तय है
सफ़र पूरा करना ही होगा हमको
बेख़ौफ़ आंँखों में फिर किस बात का भय है।
एक घेरे में हम सभी टकराएंगे
आज के छोटे बच्चे कल को देश चलाएंगे
आज के युवा कल को बूढ़े हो जाएंगे
अधेड़ और बुजुर्ग दोनों कहांँ मिल पाएंगे
कुछ सुबह को जाएंगे कुछ रात को जाएंगे
अपने-अपने समय से आएंगे और जाएंगे
सफ़र पूरा करना ही होगा सबको अकारण भय है
रात कितनी भी अंधेरी क्यों ना हो
सुबह होना तो तय है ।"
स्वरचित कविता के साथ पुनः मिलूंगा !! आपके लिए इस आशा से, परंतु वचन दें कि आप विचारियेगा इस आलेख को ! कविता की पक्तियों को...
© डॉ. चंद्रकांत तिवारी
बहुत ही सटीक और सार्थक लेख तिवारीजी
जवाब देंहटाएंजी धन्यवाद सच्चिदानंद जी !!
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