शनिवार, 22 जुलाई 2023

संस्कृति का यथार्थ-* ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी / उत्तराखंड प्रांत

 *संस्कृति का यथार्थ-*

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

उत्तराखंड प्रांत 


*सभ्यता के नगर

संस्कृति की डगर

पद चिन्हों पर चलकर

परंपरा का आधुनिक शहर 

बहुत दूर नहीं वैभव-संस्कृति की नगरी

आत्ममंथन - आत्मचिंतन - स्वएकांत

प्रकृति अमृत कलश - जीवनदायिनी शक्ति

यत्र-तत्र-सर्वत्र भर लें अमृतसर गगरी ।*

(स्वरचित)

मध्य हिमालय की उपत्यकाओं के मध्य, प्रकृति की परिधि के मध्य, मनुष्य की समाधि की परिधि की गहराइयों से, एकांत का केंद्रीयकृत नैसर्गिक आकर्षण, युगबोध की संस्कृति का अमर-जयघोष, जीवन संस्कृति के मूल्यांकन की गहराईयों की सभ्यताओं से निकला हुआ, अमृत मंथन के समान अमृत कलश भारतीय चिंतन परंपरा का स्वाभाविक विकास है। यह एकांत की संस्कृति का जयघोष है और प्रकृति का नाद् -मय सौंदर्य। एकांत के गर्भ से उपजा हुआ जीव मात्र की चिंतन धारा का स्वाभाविक विकास। यह किसी ग्रंथ का आधार नहीं अपितु संपूर्ण विश्व के आदि ग्रंथ इसी एकांत की संस्कृति के आधार ग्रंथ हैं। यही मानवता का सच्चा विकास है। यही अद्वैतवाद की संस्कृति का नाद् -मय सौंदर्य चित्रण भी है। यही भारतीय चिंतन परंपरा का स्वाभाविक विकास भी और यही भारतीय चिंतन की प्रक्रिया का मूल मंत्र भी।

गाय, गंगा , गीता और गांव की आधार संस्कृति का यथार्थ भी।


साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है। एक ऐसा विकास जो मनुष्य को मनुष्य बने रहने की शिक्षा देता है। यह मौखिक भी हो सकता है और लिखित भी। परंतु वास्तविकता यह है कि साहित्य का लिखित रूप मानव जीवन की संचित राशि का कोश है और ऋषि मुनियों की आजीवन तपस्या का सकारात्मक प्रतिफल भी है। जो मानव सभ्यता को प्रकृति के साथ मिलाकर रहने की भावना का विकास भी कराता आया है। अर्थात मानव और प्रकृति का तादात्म्य स्थापित करता है। प्रकृति की गोद में बैठकर ही भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों का चिंतन किया जा सकता है। जब से प्रकृति का निर्माण हुआ है, यह धरती ने अपना अस्तित्व इस समस्त आकाशगंगा के परिदृश्य में स्थापित किया है। तब से प्राणी जगत की उत्पत्ति और उसके विकास के कथा का चिंतन, जन्म मरण का चिंतन, यश और वैभव का चिंतन, वीर और कायर का चिंतन, अपने और पराये का चिंतन, मानव सभ्यता का चिंतन, सजीव और निर्जीव का चिंतन, प्राणी जगत की उत्पत्ति का चिंतन, और इस समस्त भूमंडल का चिंतन, एक छोटे सा कण जो उदासीन बनकर इस भूमंडलीय परिदृश्य पर विचरण करता है, उसका चिंतन उदासीन पड़े मानव जीवन की भांति ही उस सूक्ष्म कण का वैज्ञानिक एवं दार्शनिक रूप से चिंतन, यह सब बिंदु चिंतन परंपरा की उत्पत्ति एवं विकास की प्रक्रिया के सतत विकासात्मक गति की चिंतन प्रक्रिया के ही कई आयाम है। इन आयामों से गुजरते- गुजरते मानव सभ्यता भी कभी रामायण तो कभी महाभारत के दृश्य दिखाती है। कभी इस धरती पर अपने आराध्य देव को बुलाने पर मजबूर हो जाती हैं। स्थिति इस जग की कुछ ऐसी है। जब- जब मानव सभ्यता बुरी आत्माओं के वशीभूत होकर मानवों का ही विनाश करने पर हावी हो जाती है तो ईश्वर को स्वयं धरती पर अवतारी पुरुष के रूप में प्रकट होना पड़ता है।यह गीता का उपदेश है जो स्वार्थ पर परमार्थ का, यथार्थ पर निहितार्थ का, असत्य पर सत्य का, मरहम बन कर सामने आता है और शीतलता प्रदान करता है। यही मानव सभ्यता का इतिहास है। यही कुरुक्षेत्र की विभीषिका की विध्वंसलीला का प्रमाण भी है। यही धरती पर अपने आराध्य देव को बुलाकर समर्पण का भाव भी दर्शाता है। जब -जब इस धरती पर धर्म पर अधर्म हावी होता है, तब -तब प्रभु स्वयं धरती पर अवतरित होकर मानव के कल्याण के परमार्थ का कारण बनते हैं। 


यह जीवन एक ऐसा रण क्षेत्र है जहांँ हर कुशल योद्धा निहत्था रह जाता है और उसकी नियति निहत्था बनकर युद्ध करने की रह जाती है। प्रभु स्वयं अपनी अमर वाणी से मानव सभ्यता का कल्याण करते हैं। यह जीवन एक कुरुक्षेत्र का रणक्षेत्र है। इस रणक्षेत्र में अपने आप में सक्षम होने के बावजूद भी अर्जुन जैसा योद्धा थी श्रीकृष्ण की दिव्य वाणी से अपने आप को ताजा महसूस करता है और गांडीव लेकर युद्ध करने को तत्पर होता है। बिना गुरु के ज्ञान संभव नहीं। स्वयं प्रभु श्रीकृष्ण जो मानव धर्म के प्रजा पालक हैं, लोक कल्याणकारी हैं, संपूर्ण जगत में धर्म की स्थापना करने के लिए अवतरित हुए हैं और कुरुक्षेत्र के रण क्षेत्र में महाभारत के नायक अर्जुन को कर्म की शिक्षा देते हैं। स्वयं उसका सारथी बनकर रणक्षेत्र में गीता के ज्ञान की अपार राशि लुटाते हैं। यह एक ऐसा गहरा चिंतन है जिसके मूल में ऋषि-मुनियों की तपस्या का फल प्रतिबिंबित होता है। यही भारतीय चिंतन की परंपरा का प्रतिफल है और मानव जीवन के कल्याण का सकारात्मक प्रयत्न भी। यह एक ऐसा पद है जिस पर सरलता एवं सहजता से मानव सभ्यता का इतिहास अपने स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। भारतीय चिंतन की परंपरा में सनातन धर्म पद्धति सबके कल्याण की भावना और वसुधैव कुटुंबकम् का मंत्र समाहित होते हुए, अतिथि देवो भव का भाव भी प्रतिबिंबित होता है। भारतवर्ष का इतिहास यहां का रहन-सहन यहां की सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक स्थितियों के साथ-साथ राजनीतिक एवं भौतिक परिवेश भी उपर्युक्त कई बिंदुओं को प्रभावित करने वाले कारक के रूप में प्रकट होता है। यह भारतीय चिंतन की परंपरा का आदि स्रोत है और भारतीय चिंतन की वैश्विक स्तर पर ख्याति का आधार स्तंभ भी है। एक ऐसी परंपरा जिसे जानने के लिए इतिहास के प्राचीन स्रोतों को चिंतन एवं मनन के स्तर पर समझने एवं समझाने की आज वर्तमान समय में महत्वपूर्ण आवश्यकता है।


सिंधु घाटी सभ्यता के इतिहास के काल खंडों को लेकर आज वर्तमान समय तक इतिहास एवं साहित्य के काल खंडों के अतीत का अध्ययन करते हुए उसका दार्शनिक मूल्यांकन एवं आंकलन किया जाए तो सब के मूल में संपूर्ण भारतीय संस्कृति, समाज, भाषा, सभ्यताएं अपना नवीन मार्ग तय कर रही हैं। यही भारतीय संस्कृति की चिंतन परंपरा का आदि स्रोत है। भारतीय चिंतन परंपरा का वैश्विक आधार भी इन्हीं प्रमुख बिंदुओं में प्रकट होता है। हमारा साहित्य हमें वैश्विक स्तर पर चिंतन के विभिन्न आयामों को स्थापित करने की शक्ति एवं बल देता है। चारों वेद ग्रंथ, वेदांग, उपनिषद, धर्म-ग्रंथ और भारत के आदि विश्वविद्यालय, भारतीय संस्कृति, समाज, सभ्यता एवं भाषाओं के साथ-साथ क्षेत्रीय बोलियां भी हमारी सभ्यता एवं संस्कृति का जयघोष स्थापित करती हैं। सब के मूल में भारतीय चिंतन परंपरा का विकास है। यह साधारण बात नहीं स्वयं में असाधारण विषय है। इसीलिए कहा गया है कि साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है। संचित राशि का आदि कोष है। भारतीय चिंतन परंपरा का विकास है। यह भारतीय चिंतन परंपरा किसी एक व्यक्ति की निजी भावना नहीं अपितु संपूर्ण मानवीय सभ्यता की चिंतन धाराओं एवं सभ्यताओं का परंपरागत, नैतिक, अमूल्य, अनवरत, अनगिनत, अगणित, अव्याप्त, अतुलनीय, अनुपम, असंख्य आकर्षणों की चेतनाओं का चिंतन विकास है। अतीत के गर्भ से निकलने वाले अमृत कलश की बूंदों से नवयुग की लालिमा का विकास है। समुंद्र मंथन से निकलने वाले अमृत की बूंदों के मध्य विष को पीने वाले शिव अर्थात विष को भी सरलता एवं सहजता से प्राप्त करने वाले आदि पुरुष की चिंतन परंपरा है। 


भारतीय चिंतन परंपरा को ढूंढने के लिए किसी पद एवं प्रतिष्ठा की कोई अभिलाषा नहीं होनी चाहिए। अगर उस चिंतन परंपरा को यथार्थ के धरातल पर ढूंढना है तो व्यक्ति एवं मानव सभ्यता को स्वयं के भीतर अपने ईश्वर को तलाश करना होगा। वह किसी रण क्षेत्र में नहीं मिलेगा और नहीं देवालय में मिलेगा। मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर में नहीं मिलेगा। यह कोई वेद ग्रंथ या कुरान बाइबल या गुरु ग्रंथ साहब, अगर वह चिंतन परंपरा हम सबको प्राप्त होगी तो हमारी स्वयं की आत्मा एवं हमारे मन के भीतरी आवरण चित्र में दिखाई देगा। कहा भी गया है कि ईश्वर कण कण में विराजमान है। हिंदी साहित्य का भक्ति काल और संतों की आदि परंपरा जिसमें निर्गुण और सगुण दोनों ने ही अपने-अपने स्तर से अपने आराध्य देव को अपने स्वयं के भीतर ढूंढने का प्रयास किया। यही भारतीय चिंतन परंपरा का मूल है। जिससे अनपढ़ और बड़ा ज्ञानी व्यक्ति कबीर घट- घट में प्राप्त करता है। बंद आंखों से जिसे सूरदास जैसी कविता बाल लीलाओं का वर्णन करती है। प्रेम की पीर में मग्न कवि मलिक मोहम्मद जायसी जिसके मूल के अर्थों में ही स्वयं को पाता है और लौकिक-अलौकिक की जिज्ञासाओं को समझने का प्रयास करता है। स्वयं अपने को दास भाव से समर्पित पूजा अर्चन करने वाला कवि तुलसीदास प्रभु श्री राम के दिव्य अलौकिक रूप को रामचरित्र मानस में साकार करता है। यह सब भारतीय परंपरा का चिंतनीय विकास ही तो है। जिसे आधुनिक काल में कवि जयशंकर प्रसाद चिंता से आनंद लोक की अमर यात्रा का वर्णन करते हुए अपनी चिंतन परंपरा को समझने एवं समझाने का प्रयत्न कर रहे हैं। संपूर्ण हिंदी साहित्य भी अतीत एवं वर्तमान के काल खंडों से होते हुए सतत विकासात्मक नदी की तरह भारतीय चिंतन परंपरा के कई विविध आयामों को रेखांकित करता हुआ बढ़ रहा है।


गीता में कर्म योग का संदेश मनुष्य को भौतिक जगत में जीने की प्रेरणा देता है। आज संपूर्ण समाज के समक्ष अगर कोई व्यक्ति बुरी आत्माओं की परिधि में स्वयं कैद हो जाता है तो गीता का संदेश उसका मार्गदर्शन तय करता है। यह वही संदेश है जो अर्जुन जैसे गांडीवधारी वीर धुरंधर योद्धा को रणक्षेत्र में अग्निकुंड के समान वीर पुरुष बना देता है। यह भारतीय चिंतन परंपरा का ही ज्वलंत प्रमाण है कि व्यक्ति लक्ष्य विहीन होने के बावजूद भी सकारात्मक जीवन दृष्टि को धारण करते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सक्षम होता है। यह साधारण बात तो है परंतु इस साधारण बात के भीतर भारतीय चिंतन परंपरा की असाधारणता गहराई से अपनी जड़े जमाई हुई है।


हमारी भाषा एवं बोलियों में, संस्कृति एवं समाज में, तीज़ एवं त्योहारों में, तीर्थ स्थानों में, रहन-सहन, खान-पान, भाईचारे आदि बिंदुओं में भारतीय चिंतन परंपरा का विकास झलकता है। पर्वतीय प्रदेशों की सरलता एवं सहजता में, तराई क्षेत्र की जीवन शैली में, संपूर्ण जगत की चराचर सभ्यताओं में, भारतीय चिंतन परंपरा का स्थाई विकास अनवरत रूप से गतिमान है। हमारे देश में गाय, गंगा और गीता की पवित्रता में चिंतन धारा का सतत विकास अपना अजस्र स्रोत लिए हुए बह रहा है और संपूर्ण मानव जगत को कर्म योग की शिक्षा दे रहा है।

रविवार, 18 सितंबर 2022

महंगें शब्द सस्ते लोग डॉ चंद्रकांत तिवारी

 अपनी इज़्ज़त को ईमानदारी के चादर पर लपेट कर चलता हूंँ 

ऊंँची-नीची पथरीली राहों पर पैदल अकेले ही चलता हूंँ।


जानता हूंँ ईमानदारी एक महंगा शौक़ है गीत यह मैं गुनगुनाऊंँगा फिर भी 

आपकी आवाज़ भी खनकती है पर आप सस्ती चीजों के शौकीन हैं।

अपनी मिट्टी अपने शब्द - डॉ चंद्रकांत तिवारी

 घर के दरवाज़ पर छोटा-सा ताला है 

घर के भीतर बड़े-बड़े बक्से हैं 

बक्सों में लगा बड़ा-सा ताला है

भाषा की दौड़ में-कई भाषाएं दौड़ रही हैं...!

जहांँ घर पर अब तक अपनी ही मिट्टी की माला है

वहांँ हिम आंँगन-सा सूरज का पहला उजाला है 

यहांँ अब सरकारी हाथों में अंग्रेजी की बंदूक है

अपनी ही भाषा की किताबों का बंद संदूक़ है।

©चंद्रकांत fb-Chandra Tewari 


Go on continuously -Dr. C K TEWARI

 A long road 

miles of travel 

Two small steps. 

desire for will 

green grass and some pebbles 

somewhere thorny path 

All companions are of life.

have to keep going 

a few moments rest 

will power in mind 

being energetic again 

Go on continuously.

लहरों का अनुशासन -कविता- डॉ चंद्रकांत तिवारी

 कुछ गहरा और कुछ कम गहरा

लहराते हुए पानी के बुलबुले

उठती पानी की तरंगे और गहराई में खो जाती तिरंगे

निरंतर गतिमान नदी का कितना सुंदर अनुशासन है।

नदी किनारे के सुंदर हरे-भरे वृक्ष 

और पत्थरों पर टकराती प्रतिध्वनि,

प्रकृति हमारी कल्पनाओं से भी अधिक सुंदर और खूबसूरत है।

दूर तक बहती नदी को देखना बहुत सुंदर एहसास है। सच में..!

लहरों का अनुशासन और शीतलता का स्पर्श,

तरंगों का धैर्य और कल-कल करती ध्वनि,

बहती तटों तक की सीमा रेखा का गंगा जल स्पर्श

मन को भीगोनें वाला स्पंदन है।

सच में सुंदरता इतनी पुरानी है जितना कि संसार 

और इतनी नई कि प्रत्येक क्षण! 

© Chandra Kant Tewari

fb-Chandra Tewari 

The discipline of the waves ©Dr. Chandra Kant Tewari

The discipline of the waves

©Dr. Chandra Kant Tewari 

 some deep and some less deep

waving water bubbles rising water waves 

And the water gets lost in the depths of the tricolor

What a beautiful discipline of a constantly moving river.

beautiful green trees on the banks of the river

And the echo hitting the stones,

Nature is more beautiful and beautiful than our imaginations.

It is a beautiful feeling to see the river flowing far away. Really..! 

The discipline of the waves

and the touch of coolness, 

The patience of the waves 

and the echoes of time and time again,

The Ganges water touches the boundary line till the flowing banks 

It is a mind-soaking vibration.

Truly beauty is as old as the world and so new every moment! 

बीती रात एक राजनीतिक स्वप्न डॉ चंद्रकांत तिवारी

 कलम उठाने से बनता तो 

मैं भी बन जाता लोकनायक

लोक-धर्म साहित्य-शास्त्र की

नींव का पत्थर कहलाता

खादी-कुर्ता पहनकर टोपी

घर-घर में भी चिल्लाता

अर्थनीति आड़े ना आती

राजनीति में भी कर जाता

जन को जन से तोड़-जोड़कर

जननायक मैं भी कहलाता

गली-मोहल्ले-मैदानों पर

गाय-गंगा और गीता पर 

मैं भी जोर-जोर से चिल्लाता

राष्ट्रवाद की परिभाषा में

मैं भी चुनाव जीत जाता।


डॉ चंद्रकांत तिवारी 

शब्दों का कारवां चंद्र कांत

 भौतिक जगत के क्रियाकलापों से व्यक्ति सभ्य होता है परंतु आत्मबल हृदय को संस्कारित करने से ही प्राप्त होता है। आत्मिक मूल्य व्यक्ति के जीवन मूल्य को मूल्यवान बनाते हैं। भौतिक संसार में सभ्यता व्यक्ति को जीवन जीना सिखाती है परंतु संस्कारवान नहीं बनाती।

संस्कार संस्कृति का विषय है, सभ्यता शब्द होने का भाव मात्र।

© चंद्रकांत

Fb-Chandra Tewari

Feeling -poem Dr. Chandra kant Tewari

 when a deep sleep breaks

sleep dreams are broken

we return to the real world

because we are still alive

first morning thank god 

There is some familiar force around us

that gives us energy, 

breathing air, light in the eyes

feeling in the heart

With a smile on your face

and a sparkle in your eyes

Mind's hopes 

fly like a kite flying in the sky 

thank you on the first day of the day

beauty of nature all around

included in our daily routine

nature doesn't sleep

the music of nature around us

Our strength is nature's responses

language and creative music.

Sun and Moon work lifelong 

that's life before sleep

and after sleep breaks.


Dr. Chandra Kant Tewari

fb-Chandra Tewari 

एहसास एक शब्द सीमा - डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 कभी चांँदनी की रोशनी 

कभी दिन का उजाला है

कभी बोलती हैं आँखें

कभी ज़ुबान पर ताला है

समंदर-सी लहरों में 

एक ख़्वाब पाला है।


रास्ता है बेखबर मेरे जज़्बातों का

हवाओं संग लहरों ने डेरा डाला है

यहां जल-समाधि में भी जीने की आश है

खारे पानी में भी मीठे पानी की प्यास है।

© चंद्रकांत fb-Chandra Tewari 


अल्फाजों में कविता- डॉ. चंद्रकांत तिवारी

शहर के किसी कोने में शोर हुआ है

वक्त निकालकर सुनना 

किसी अपने की चीखने की आवाज

सुनाई देती है यहां कानों में


अल्फाजों में कविता बोलती है

कहीं जलती धूप से शहर चमकता है मेरा

कविता के देश में कभी

शब्द भी रोते हैं।

अब मुस्कुराने की तासीर कम पड़ गई है

कविता में शब्दों की मिलावट है

फ़ालतू के शब्दों की बनावट

इतिहास की एक झूठी किताब है

शब्दों के रेखाचित्र

बनावटी हैं कुछ ऐतिहासिक चरित्र


देखना होगा मिट्टी को कुरेद कर

किसी गांव की तलहटी में

तेरे शहर में शोर बहुत होता है।

शोणित बहाकर शीश कटाकर

धरती की प्यास बुझाई

कभी बारिश की चंद बूंदों ने

रज-रज कण चमकाई 

जननी जन्मभूमि स्वर्गिक मेरी

रज-रज स्वर्णिम कहलायी।


हिन्दी पखवाड़ा कार्यक्रम डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 *हिन्दी पखवाड़ा*

1 सितंबर से 15 सितंबर

16 सितंबर से 30 सितंबर ।

भारत सरकार की राजभाषा नीति/नियमों के अनुसरण में राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए वर्ष भर कई समारोहों का आयोजन किया जाता है। प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को 'हिन्दी दिवस' मनाया जाता है और 1 सितम्बर से 15 सितंबर या 15 सितम्बर से 30 सितंबर तक हिन्दी पखवाड़ा मनाया जाता है। इस दौरान प्रशासन के अधिकारियों तथा कर्मचारियों को राजभाषा हिन्दी में काम करने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु हिन्दी में टिप्पण एवं आलेखन और कर्मचारियों के लिए टंकण प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती है। काव्य गोष्ठियां, हिंदी भाषा संबंधी सेमिनार आयोजित किए जाते हैं। विद्यार्थियों के लिए निबंध लेखन वाद -विवाद प्रतियोगिता, अंताक्षरी, तकनीकी भाषा लेखन, इसके साथ ही साथ विद्यार्थियों में भी राजभाषा हिन्दी के प्रति अभिरूची उत्पन्न करने और उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए कई प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं। इसके अतिरिक्त सभी माध्यमिक और वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों के लिए वाक्पटुता प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। इसके अलावा मुख्यालय क्षेत्र के महाविद्यालय स्तर के विद्यार्थियों के लिए स्वरचित कविता पाठ आयोजित किया जाता है। क्षेत्र के महाविद्यालय स्वयं इस दिशा में उत्कृष्ट कार्य करते हैं।

हिन्दी पखवाड़ा के दौरान राजभाषा विभाग द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में भारी संख्या में अधिकारी, कर्मचारी और विद्यार्थी काफी उत्साह से भाग लेते हैं। प्रशासन के सभी विभागों द्वारा भी अपने-अपने कार्यालयों में हिन्दी पखवाड़ा मनाए जाने के सिलसिले में कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है और कर्मचारियों को हिन्दी में कार्य करने के लिए प्रेरित किया जाता है, जिसके लिए विभागों के अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए प्रतियोगिताएँ आयोजित कर विजेताओं को पुरस्कृत किया जाता है। राजभाषा विभाग द्वारा हिन्दी पखवाड़ा के समापन पर पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन किया जाता है, जिसमें विजेताओं को पुरस्कारों से सम्मानित किया जाता है। पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन बड़े ही भव्य रूप से किया जाता है जिसमें बड़ी संख्या में अधिकारी, कर्मचारी और विद्यार्थी उपस्थित होते हैं।  

उच्च शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी संस्थाएं एवं शिक्षण संस्थान इस क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करती हैं।

*हिंदी प्रकृति और संस्कृति की भाषा है। 

हिंदी हमारे राष्ट्र का गौरव है।*

डॉ. चंद्रकांत तिवारी fb-Chandra Tewari 



🇮🇳

रविवार, 11 सितंबर 2022

आंँखों पर हिमालय- कविता डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 आंँखों पर हिमालय- डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत 

पैरों से मस्तक की ओट किए गंगा पर्वत भी चढ़ती है 
मस्तक की शीर्ष जटाओं से गंगा चरणों तक बहती है

मस्तक पर फिर से शीश झुका गंगा धारा बन बहती है
मस्तक-मस्तक की चोट लिए गंगा शीतल मन हरती है

मस्तक की कुटिल-कटारों पर वैभव के तीव्र प्रहारों पर
कष्टों के दंश निगलती है यहांँ गंगा कण-कण ढलती है।

शिला-शैल पर्वतमाला श्वेत वसन-सा गलता है
शिव प्रदेश का कौमार्य यहांँ हिमजल स्वयं पिघलता है 

समतल तल-सम पाने को पानी-सा पेय उतरता है 
नेत्रों की करुण पुकारों पर हिम-धवल अभिसारों पर

सूखे-कंठों की अभिलाषाओं पर मस्तक के शिखर पिघलते हैं
बिन भाषा ज्ञान के अश्रु यहांँ वातायन में बहते हैं

तन शीतल मन हरने को हाथों गंगाजल भरने को
सब संकल्प यहीं रह जाते हैं हम धारा-प्रवाह बढ़ जाते हैं।

हे गिरिधर ! गिरीप्रांत, गिरिवर, नगतल -पगतल  नगपति विशाल
चरणों पर शीश झुकाता हूंँ  तुम ही रक्षक तुम ही ढाल
नगपति मेरे जगपति विशाल मेरी मिट्टी के हिमगिरी भाल
ओट तुम्हारी बैठे हैं मांँ पार्वती शिव-शंकर महाकाल 
तुम जननी-तुम ही त्रिकाल, हर प्रश्नों के उत्तर की ढाल।

तुम स्रोत-वाहिनियों के जीवन-आधार
जीवन-जगत के पारावार
मैं भी लौट गया इस पार
हाथों में गंगा जल की धार
हे सृष्टि विनायक भूतल-धार
पार लगाओ जीवन पतवार
कविता सरिता बहती सत्कार
अखिल विश्व के पालनहार
हे हिमगिरी के उज्ज्वल आधार
सर्वत्र तुम्हारा संगीत सितार
कैसे हो जीवन मनुहार!

एकांत प्रांत में बैठा- बैठा
पथिक जीवन-मन कुछ खोज रहा
कंकड़-पत्थर हाथों में लिए
अपना घर-आंगन जोड़ रहा
एकांत प्रांत में बैठा- बैठा
हिम आंँचल को टोह रहा
हिम प्रदेश का होकर भी
निज वातायन को खोज रहा
हिमाचल के प्रांगण में बैठा
निज आलय को खोज रहा।

मन में भी तो कितने सागर 
नित-नित उठते गिरते हैं 
कितने ही अखंड-पर्वत यहांँ 
पल भर में बनते गिरते हैं
मन में रोज पिघलता है
हर रोज हिमालय ढलता है
हिम प्रदेश का वासी हूंँ
आंँखों से हिमालय बहता है
वह हिमगिरि का वासी है 
जिन आंँखों पर हिमालय बसता है
पथरीली कंकड़ राहों पर 
मन  हंसता-हंसता  बसता है।

©चंद्रकांत 
fb-Chandra Tewari