शनिवार, 12 अगस्त 2023

व्यंग्य की तलाश - (भाग दो) - डॉ चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत


व्यंग्य की तलाश - (भाग दो) 

 डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत 

हिन्दू समाज की सबसे बड़ी धरोहर उसका वैदिक साहित्य है। इस साहित्य में सभी हिन्दुओं की आस्थाओं, श्रद्धा, भक्ति, आत्म-विश्वास तथा मानवीय जीवन मूल्यों का क्रिया-कर्म होता रहता है। संपूर्ण भारतीय वांग्मय उसी की धुरी पर टिका हुआ है। इस बात में शक नहीं कि साहित्य सत्य और काल्पनिक दोनों होता है, परंतु जहाँ तक मानवीय मूल्यों का सवाल है तो साहित्य समाज सापेक्ष अभिव्यक्त होता है। युगबोध एवं मूल्यबोध पर आधारित होता है।

जीवन में समस्याएं कभी कम नहीं होती हैं। घर परिवार से लेकर देशभर में कोई इकलौता नहीं जहांँ समस्याएँ न हों।
आज देश में इतनी समस्याएँ हैं कि उन पर बातें करते हुए कई और समस्याएँ पैदा होने की पूरी संभावना है। हर समस्या के समाधान के लिए एक सरकारी योजना चाहिए। सरकारी योजनाएं डोली पर बैठती हुई किसी दुल्हन की तरह है। जिसका चीरहरण संभावित है। केंद्र सरकार अगर कोई योजना राज्य सरकारों को आबंटित करती है तो यहां बैठे भूखे सभासदों, मेयरों, और विधायकों के चेहरे खिलखिला उठते हैं। किसी लकड़बग्घे की तरफ जो फेंके हुए टुकड़े को नोंच नोंच कर खा जाता है।
कमीशनखोरी प्याज की परतों की तरह धीरे-धीरे खुलती है। असल में ग़रीब तबके का आदमी प्याज के उतरते छिलकों की तरह धीरे-धीरे निर्वस्त्र हो रहा होता है।

 सरकारी परियोजना प्रेशर कुकर की वह सिटी है जो कभी बजती नहीं है लेकिन खाना पका देती है। उच्च पदों से लेकर ग्रामीण स्तर तक सबको धूप और बतासे चढ़ावे के रूप में चाहिए। सरकारी योजनाओं से मिलने वाला प्रसाद मन को आनंदित तो करता ही है आत्मा को भी प्रफुल्लित कर देता है। कर्मशील स्वयं आत्मानुशासित कर्मवीर है परन्तु कर्महीन स्व-आचरणहीन होने पर भी पूर्ण कर्म में अपूर्ण भाव को देखने का अभ्यस्त है । कर्महीन व्यक्तियों का सबसे सुंदर आभूषण सरकारी योजनाओं से मिलने वाला प्रसाद है। ऐसे प्रसाद को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को  चहुँमुखी प्रतिभाशाली और समाज का सच्चा हितैषी स्वयं को दिखाना होता है। जो जितना कर्महीन होगा वह प्रसाद का उतना बड़ा दावेदार होगा। समाज के सारे बनावटी दुःख दर्द समेटकर अपने भीतर रखने की क्षमता ही व्यक्ति को भीतर से इस चरित्रहीन मंदिर का एकमात्र पुजारी बना देती है। ऐसे मंदिर का पुजारी हमेशा लोकतंत्र की आय पर निर्भर रहकर आत्मनिर्भर बना रहता है। 

कर्म के द्वारा ही धर्म का पालन किया जाता है, कर्माभिमुख धर्म ही प्रेम का उपजीव्य है। क्योंकि प्रेम, संवेदना सभी मानवीय मूल्यों में सर्वोपरि है। आनंदोपलब्धि जीवन की अंतिम और एकमात्र वैकल्पिक पूंजी है। सभी विषयों में सर्वोपरि और मूल्यनिष्ठ। साहित्य की अनेक कालजयी कृतियाॅ मानवीय मूल्यों का विषय प्रवर्तन करती हैं। सचमुच वैसी ही पुस्तकों का साहित्य कालजयी एवं मानवीय मूल्यों का आधार होता है जिसके रचयिता सत्ता के गलियारे में जाकर चिंघाड़तें या घिंघियाते नहीं अपितु अपनी परंपरा से जुड़े रहते हैं और अपनी लेखनी से मानवता का सच्चा मार्गदर्शन करते हैं। आज मानवीय मूल्यों में बदलाव का स्तर कंकाल सदृश्य बनता जा रहा है जिसे स्वयं ओंकारेश्वर भी समझने में अक्षम होंगे। स्वयं ब्रह्म भी उदासीन भाव लिए ऊर्जा विहीन होंगे।


हम हर बात पर नेताओं को कोसते हैं। यह कितना ठीक है। जिसे हम और आप टीका चंदन लगाकर संसद में भेजते हैं वह भी हमारे ही मध्य से तो होता है। कुर्सी की जिस दौड़ में युवाओं की साँसें फूलने लगती हैं, पाँव उखड़ने लगते हैं उनका हाजमां खाराब हो जाता है और आँतड़ों के पसीने छूट जाते हैं तो वहीं दूसरी ओर उम्र की सफेदी और डायलेसिस पर बैठा यमराज को अपनी बांह में दबाये चुनाव भी जीतता है और युवा पीढ़ी का आदर्श भी बनता है। हमारे देश के मंद विकास में नेताओं की कुर्सी पकड़ने की तीव्र गति एक ईश्वरीय कारण है। हमारे देश में पाँच साल की सरकार होती है। इन पाँच सालों में टेबल की आत्मनिर्भरता और कुर्सी की बांहों को मजबूती से पकड़े रखना परम धर्म अनवरत कौशल है। यह प्रक्रिया आत्मा को कुर्सी पर स्थायित्व प्रदान करे, हर कोई चरित्र विजयी नहीं हो सकता। किन्तु विजयोत्सव मनाया जाएगा, यही तो जनाधार है। आनंद जौहरी का तराशा हुआ हीरा नहीं साहब, यह तो नैसर्गिक प्रवृत्तिगत आत्मिक अंतिम मनोगत मनोजगत का एकमात्र वैकल्पिक आधार है।

रामायण और महाभारत का विस्तृत कथानक कुर्सी की आत्मनिर्भरता और चरित्र की आत्महीनता के कई पहलू दर्शाता है। देश की कुर्सी हो या राजा का सिंहासन यह करोड़ों लोगों की भावनाएँ से बनी होती है। चुनाव के दौरान हर कार्यकर्ता के पसीने की बूँद से इसके खाँचे मजबूत बनें रहते हैं। लेकिन शायद जनता भी वोट देने के बाद अपने घर का रास्ता भटक गई है। राह में उसे अपना घर नहीं मिल रहा। चुनावी योजनाओं में सड़क निर्माण की बातें सोचता हुआ आम आदमी अचानक बड़े से गढ्ढे में गिरता है। ऐसे गढ्ढे जनता के आत्मविश्वास को बढ़ावा देने के लिए सड़कों पर छोड़ दिये जाते हैं। विगत दिनों कुछ कोरोना महामारी से बचने के लिए सुरक्षा घेरा समझकर नीचे गिरते हुए आत्मनिर्भर योजना का पूरा फायदा उठाने का प्रयास करते हैं।


क्रमशः आज की जीवन शैली और जरूरतों की बढ़ती परिधि के समक्ष मानवीय मूल्यों की धमनियों में काॅलेस्ट्रोल, वसा अपना दायरा फैला रही है। समय रहते बाई पास सर्जरी की जरूरत है अन्यथा हृदय रूपी विस्तृत समाज की ओपन हार्ट सर्जरी, रिश्तों की चीर-फाड़ संवेदनाओं रहित संस्कृति सब की सब एक्सप्रेस वे पर वैश्विक होती चली जाएंगी। 

मानव सभ्यता का इतिहास रचनात्मकता एवं नवाचारों से भरा है। रचनात्मकता प्लेटो के अनुकरण सिद्धांत की परिधि से गुजरते हुए अरस्तू के अनुकरण सिद्धांत का पुनर्सृजनवादी नवाचारिक दृष्टिकोण है। जो कल्पना के यथार्थ को पुनर्जीवित करता रहता है। साथ ही कल्पना की शक्ति, नई-नई उद्भावनाओं के साथ मानव मन को सक्रिय एवं ऊर्जा से परिपूर्ण करते हुए निरंतर चिंतनशील बनाती है और समाज के लिए अमूल्य-उपहार उपलब्ध कराती है। कल्पना की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि कल्पनाशील व्यक्ति सीमित संसाधनों में साधारण होते हुए भी असाधारण कार्य कर जाता है और यह सकारात्मक-चिंतन सृजन के साथ-साथ प्रकृति का पुनर्सृजन भी है। इस महाकालेश्वरी -धरणी पर सृजन-पुनर्सृजन-विसर्जन की प्रक्रिया निरंतर-नित-नित और अनवरत चलती रहती है। कल्पना का मिश्रण सभी में रहता है।  

आत्मनिर्भरता की दिशा में हमारे पास ढेरों जुगाड़ हैं। आत्मनिर्भरता अंधेरी रात में पैदा हुआ ऐसा बच्चा है जो स्कूल में दाखिले के लिए अपने माता-पिता का नाम खोज रहा है। हम भारतीय विश्वास को जगाने से पहले अंधविश्वास की संकरी गली के चक्कर लगाते हुए, टीका चंदन से माथा लाल कर भक्त होने का स्थायी प्रमाण-पत्र प्राप्त करते हैं। जब अंधविश्वास का पूजन हो जाता है तो हमारा विश्वास स्वतः ही ऊपर हो आता है। अंधविश्वास के चलते कई साधु संतों की अच्छी चल जाती है। खैर यह कर्म भी काफ़ी परिश्रम और जोख़िम से भरपूर है। निरपराध जनता ने घर की सुख शांति के लिए जिन साधु महात्माओं की भक्ति के गीत गाये और जिन संतों को समाज का सच्चा हितैषी समझा वही महात्मा उसके दूध की पतेली से मलाई ढूंढ-ढूंढ कर खा गये और कबाड़ीवाला पतेली ले भागा। देश में अंधविश्वास का अच्छा साम्राज्य फल-फूल रहा है। किसी की नौकरी लगाने का झांसा देकर, किसी की शादी कराने का लालच देकर, मानसिक बीमारी से लेकर शारीरिक समस्या तक का समाधान, किसी दम्पत्ति के बच्चे न हो सकें तो इन नीम हकीम बाबा-संतों के पास वह सारे साधन हैं जो उच्च कोटि के अस्पतालों में ढूंढने से भी न मिलें। मेडिकल का छात्र फेल हो जाएगा, परंतु नीम हकीम बाबा-संतों की नीम हकीकी चलती रहेगी।


वैसे एक मनोवैज्ञानिक सामाजिक सोच है कि अंधविश्वास और विश्वास दोनों की जननी एक ही है। भेद हृदय और बुद्धि का भ्रांतिमान है। देह और संदेह का समायोजन, एक के साथ एक मुफ्त वाली योजना। विश्वास की कोंपलें मौसम और परिस्थितियों के अनुसार ही हरी होंगी। पानी में नमक की तरह और दूध में पानी की तरह, विश्वास स्थायी रहता है कर्म के सकारात्मक परिणाम में। विश्वास को स्थापित करने के लिए अंधविश्वास की आवश्यकता हो सकती है परंतु अंधविश्वास से विश्वास कभी स्थायी नहीं रहता। पत्थर में प्रत्येक व्यक्ति अपनी भावनाओं के अनुसार ही विषयवस्तु को देखता है। किसी को भगवान तो किसी को नींव का आधार। परंतु सहारा तो दोनों ही दशाओं में है। विश्वास उस तैरते हुए मुर्दे के समान है जिसने अतल गहराई में जाकर सत्य का गंगाजल अपने फेफड़ों में भर लिया है। विश्वास गहराई से बढ़ता है और ऊँचाई मिलने से सम्मानित होता है। मध्य स्थिति में मनुष्य पके हुए आम की तरह अनिश्चित-सा रहता है। नीचे गिरने का डर रह-रह कर सताता है। ऐसे फलों को निशाना लगाकर गिराया जाता है। गिरने का डर अधिक घातक है बजाय ज़ीने के डर से। बगैर गिरने की दूरी तय किए भी व्यक्ति गिर रहा है। 

हमारी संस्कृति बेजोड़ है। श्रद्धा भाव की यहां कोई कमी नहीं है। हमारे ईश्वर तो झूठे बेरों से ही प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। अपने देवों को प्रसन्न करने के चक्कर में हमने हजारों लीटर दूध पत्थरों पर चढ़ाया है। हमारा समाज सभ्यता का वह नायाब नमूना है जो यह देखकर अनजान बना हुआ है कि जहां कई बच्चे दूध के अभाव में कुपोषण के शिकार होते हैं। उस देश में भगवान कैसे प्रसन्न रह सकते हैं। हमारे देव तो बाल मनोरम दृश्यों में ही देखे गए हैं। भूख लगी तो मटकी से माखन निकाल मित्रों संग बैठ खा लिया। शिशुओं में ही ईश्वर का वास होता है। भला दूध के बिना हमारे शिशु भूखे रहेंगे तो हमारे देव हम पर कुपित न होंगे। यह भला कैसा सामाजिक न्याय है?


भारत की संस्कृति में अधिकांश लोक देवताओं के निवास गुफाओं और कंदराओं में देखे जा सकते हैं। सभी देवता पत्थर के हैं कुछ लोहे से निर्मित भी हैं। अतीत में वृक्षों और भूमि की पूजा होती रही है। सूर्य और चंद्रमा वर्षों से बल्ब और ट्यूब्लाइट का काम करते आये हैं। हमने पेड़-पौधों के अलावा जानवरों में भी देवताओं को तलाशा हैं। हमारे अधिकांश देवताओं के जानवरों से अच्छे संबंध रहे हैं। इसीलिए हमारे आराध्य देवों ने अपना स्थायी निवास ऊँचे पहाड़ों और घने जंगलों को चुना। हमें प्रकृति से जुड़ना सीखाया। पशु-पक्षियों के व्यवहार द्वारा शिक्षा के संदेश दर्शाये। परंतु फिर भी हमारे आराध्य देव पत्थर के हैं उन्हें पूजने वाले पत्थरों से लड़ते हुए कभी पत्थरबाज कहलाते हैं तो कभी पत्थरों से मिली आग से अपनों का घर फूंकने को तैयार खड़े हैं। कहते हैं कि दूध का जला छांछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है। जब हम दूध और छांछ में अंतर ही नहीं समझ रहे तो भ्रम की स्थिति में ही रहेंगे ना..!



क्रमशः ...

बुधवार, 9 अगस्त 2023

व्यंग्य की तलाश (भाग - एक)- ©डॉ चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

व्यंग्य की तलाश - (भाग - एक)- 

डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

रंगों का स्पर्श शरीर से कहीं अधिक मन को प्रभावित करता है । रंगों को छूने से जो प्रसन्नता जो आत्मिक संतुष्टि मन को प्राप्त होती है उसको शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह भावनात्मक रूप से परिपूर्ण होकर एक-दूसरे को परस्पर संवाद करने की अनुमति प्रदान करता है। बालकों सी स्वच्छंदता, कल्पना की सीमा-रेखा से परे, नवजात शिशु सी कोमलता और यौवन की महत्वाकांक्षा भी रंगों का स्पर्श पाकर, तीव्र गति से लक्ष्य की ओर बढ़ती है। जिन रंगों को बालक एक दूसरे पर बड़ी आसानी से डालते हुए आनंद प्राप्त करते हैं उन्हीं रंगों को उम्रदराज लोग लगाने में घबराते हैं।

रंगो का स्पर्श उम्र की सीमाओं का अतिक्रमण कर सारे बंधनों को तोड़ कभी बचपन के रंग में रंग जाता है तो कभी जवानी के गोते खाता हुआ ऊंचे नील गगन में आजाद पंछी की तरह तैरता रहता है। साठ बरस की उम्र के गांठ को खोलने वाला चाहिए। गांठ खुल जाए तो अनुभव और ज्ञान के अपार स्रोत बहेंगे। हमारे बुजुर्गों में युवाओं का कलेजा है। उम्र का ग्राफ तो घटता बढ़ता रहता है। वैसे तो उम्र दिमागी बुखार का पारा है। जो थोड़ी गर्मी-सर्दी बढ़ने से ही गिरता-चढ़ता है। हमारे देश में बुजुर्गों को इतना सम्मान मिला है कि तितली की चंचलता और भंवरे की गुनगुनाहट को आदर्श मानकर उम्र की किसी भी सीढ़ी पर बाप बनकर फूल खिलाने की भिन्न-भिन्न रंगों से मधुरस लेने की छूट है। यौवन का रंग हमारे मार्गदर्शक बुजुर्गों की नसों में बुझते दीये की तरह हमेशा फड़फड़ाता रहता है। बसंत के मौसम की गुनगुनी धूप में घूमता हुआ कोई मनचला राजनीति का दबंग भंवरा रंगों की चहक-महक और चकाचैंध में भिनभिनाता हुआ तन-मन को भिगोकर आत्मसंतुष्टि का अनुभव करता है। समाज सेवा का तमगा अब कुछ फीका हो चला है।

कीचड़ का रंग बालकों की स्वछंदता का प्रतीक है। समानता का आधार है। जब तक कीचड़ में सभी बालक मिलकर एक नहीं हो जाते तब तक समानता के सारे आधार बेरंग हैं। लड़-झगड़ कर एक दूसरे के कपड़े फाड़ना और एक दूसरे पर कीचड़ उछालना मिट्टी फेंकना यही तो बचपन की अमीरी और गरीबी की एकरूपता की आजादी का रंग है। व्यक्ति की महत्वाकांक्षाएं जैसे-जैसे बड़ी होती हैं यही मिट्टी और कीचड़ उछालने के रंग दाग के रूप में बदल जाते हैं और बचपन इनसे कोसों दूर निकल जाता है। बच्चा जैसे- जैसे लंगोट से पैजामे तक पहुंचता है। मां बाप की चिंता घर की चारदीवारी से बाहर झांकने लगती है। उम्र के रोशनदान से झांकती हुई जवानी किसी भी परेशानी की चिंता का कारण हो सकती है। अमीर बच्चों और गरीब बच्चों का अंतर सरकारी और प्राइवेट स्कूल में बंट जाता है। जिससे हमारी शिक्षा के रंग भी अलग-अलग हो जाते हैं।

वैसे हमारी शिक्षा बहुरंगी है। यहां अपने रिस्क पर जितना चाहो पढ़ सकते हैं। हवा में तैरती हुई पतंग की तरह जितनी ऊंचाई तक जाना चाहो उड़ सकते हो। पतंग कटने का जिम्मा सरकार का नहीं है। भारत की शिक्षा प्रणाली की थाली में मिड डे मील की तरह जब चाहो खा लो या जब चाहो बजा लो। हमारी शिक्षा प्रणाली योजनाओं की दो नाली बंदूक से निकल चुकी है। गोली निशाने पर लगे या निशाना गोली के आगे आ जाए, इस बात से बेखबर कई डेली वेज शिक्षकों के वर्ग इस निशाने की परिधि के भीतर घूम रहे हैं। जिनमें अतिथि, तदर्थ, शिक्षामित्र, नियोजित शिक्षक, शिक्षक बंधु, ठेके के शिक्षक विश्व मानव या महामानव बनाने का जिम्मा अपने सिर उठाए हैं। इनकी जरा सी भूल विश्व मानव का हाजमा बिगाड़ सकती है। गंभीरता और भावुकता के बीच की संकरी गली से गुजरने का रिस्क तो खुद ही उठाना होगा साहब।

मनुष्य भावात्मक रूप से मूर्ख और कामचोर होते हुए भी हर सभा में विद्वता का परिचय देता है। इसे अभ्यास कहें या फिर परिस्थितियों से भी परिस्थितियाँ बनाकर उनसे बाहर निकलने की परिस्थिती में अभ्यस्त व्यक्ति, ही नेतृत्व कौशल में कुशल सामाजिक चोर कहलाता है। यह रंगों की शक्ति का प्रमाण है। भावनाओं की शक्ति का विस्तार है। रंग जिंदगी के अनेक भावों को दर्शाते हैं।

भाषा सृष्टि में सर्वत्र विद्यमान है। सृष्टि की किसी भी वस्तु को देखने के बाद अगर मस्तिष्क के प्रकोष्ठों पर बिंबात्मक दृश्य न उभरें तो भाषाई चेतना नौ रसों की भांति सुसुप्त बुद्धियुग के अवचेतनात्मक महासमर में पथविहीन सी नजर आती है। जिस प्रकार आत्मा मोक्ष मार्ग की प्राप्ति की तलाश में भटकती है, ठीक उसी प्रकार भाषा भी अपना पथ तलाश करने के लिए गूँज की भांति अखिल अनिश्चित अकल्पनीय ब्रह्मांड में ध्वन्यात्मक प्रतीकों का समुच्चय बन सार्थक शब्दों का नया शरीर पाने के लिए आतुर रहती है।

भाषा शिशु के भीतर उतनी ही सार्थक है जितनी वृद्ध के लिए श्वास। भाषा बनावटी रिश्तों के लिए भी उतनी ही सार्थक है जितनी कि समाज और साहित्य के निर्माण के लिए आवश्यक। भाषा का समाजशास्त्र उतना ही मुश्किल है जितना आलोचना की सामाजिकता। कवि हमेशा ही रचना की शब्दनुमा परिधि के भीतरी प्रकोष्ठों में आलोचना को अवचेतनात्मक रूप में रखते चलता है, फिर भी रचना आलोचना की मांग करती है। भाषा हमेशा नवीन शब्दनुमा आवरण को धारण करने में अपनी वास्तविक प्रासंगिकता खो देती है परंतु फिर भी रचना कालजयी बन जाती है।

भाषा का तांडव बड़ा विध्वंसकारी होता है। भाषा शिव के त्रिशूल से विष्णु के सुदर्शन से ब्रह्मा के कमंडल से निकलते हुए संपूर्ण प्रकृति को मधुर संगीत से वशीभूत कर देती है और पशु पक्षी जीव जंतु सभी इस भाषा के वशीकरण में शामिल हो जाते हैं और फिर भाषा अपना चक्र चलाती है। जो समय का चक्र है वही नियति का चक्र है। भाषा मनुष्य के साथ चूहे बिल्ली की तरह खेलती है। सांप नेवले की तरह किसी भी स्थिति के लिए मनुष्य को मौका देती है। हिरण की तरह दौड़ाती है तो बाघ की ऊंची छलांग मारकर अपने शिकार की श्वास नली को दबोच लेती है। मदारी की भाषा में बंदर अपनी पूरी जवानी उछल-कूद में बिता देता है। बंदर उस भाषा का गुलाम बन जाता है और भालू डुगडुगी की आवाज में सर के बल दौड़ता हुआ बार-बार बेवकूफ बनता है। नादानी में नाचता है और लोगों का मन बहलाता है। भालू की विवशता और बंदर की मजबूरी सब भाषा की करामाती सौगात है। भाषा भले व्यक्ति को निर्वस्त्र और नंगे को कपड़ा दे सकती है। भूखे को भोजन और धनवान को कबाड़ी भी बना सकती है। भाषा का अनुशासन पशु पक्षियों और जानवरों में इंसानों से अधिक देखा गया है। इंसानों को भाषा द्वारा ही हर प्रकार की शिक्षा दी जाती है। परंतु इसके विपरीत पशु पक्षियों एवं जानवरों को प्रकृति स्वयं शिक्षा देती है। प्रकृति की गोद में निरीह प्राणियों के लिए मातृत्व का भाव है। देवत्व की स्थापना है। देवी का स्तुत्य है और शिव प्रदेश का आशीर्वाद है। प्रकृति ने हमेशा रंग -बिरंगे वस्त्र दिए हैं। विकलांगों को राहत दी है। भिखारियों को भोजन दिया है। दुराचारियों को निवास भी दिए हैं। हमारे ईश्वर का निवास और हमारा अंतिम मोक्ष भी प्रकृति की गोद में ही निहित है। प्रकृति की गोद में हमारी सुबह दोपहर और शाम होती है और हमारी रात भी प्रकृति की गोद में ही अगली सुबह के इंतजार में पूर्ण होती है। पर हम चांडाल प्रकृति का इतना दोहन कर बैठे हैं कि संपूर्ण मानवता खतरे के निशान से ऊपर आ चुकी है। मानव जो अपने ज्ञान का इतना दंभ भरता है प्रकृति के समक्ष वह रेंगते हुए केंचुए के समान है। जिसको जंगली मुर्गी कभी भी अपना आहार बना लेती है।

जितनी प्रतिस्पर्धा हम इंसानों में है उससे कहीं अधिक प्रतिस्पर्धा का भाव पशु पक्षियों एवं जानवरों में देखा गया है। शेर और हिरण दोनों का मकसद एक ही होता है परंतु दोनों अपना-अपना धर्म निभाने के लिए दौड़ रहे होते हैं। प्रकृति की जीत हमेशा निर्दयी हाथों में होती है।

पशु-पक्षियों एवं जीव-जंतुओं का अनुशासन और प्रेम बड़े उच्च कोटि का होता है। चींटियों का अनुशासन मानव जीवन के लिए बहुत बड़ा दृष्टांत। हाथियों का झुंड अपनी मौजमस्ती/दादागिरी करता हुआ किसी के भी खेत में बेधड़क शराबी की तरह घुसकर गोबर गणेश कर सकता है। सूअरों का आतंक आजकल अपनी सरहद की सीमा रेखा को लांघ गया है। कुछ मनचले सूअर जंगल की सीमा रेखा को फांदकर अपने मनचले स्वभाव के अनुकूल लोगों के आलू खोदकर अपनी भड़ास निकालते हैं और अभिव्यक्ति की आजादी का राग अलापने लगते हैं। कुछ हमारे पाले हुए सूअर इतने अनभिज्ञ हैं कि स्थानीय संसाधनों का प्रयोग करते हुए भूलवश अपने सरल स्वभाव के कारण स्वच्छ भारत अभियान को चुनौती देते देखे जा सकते हैं। कीचड़ में नाक घुसा-घुसाकर सूर्य नमस्कार करता और आनंदोपलब्धि मनाता हुआ स्वर्गिक अनुभूति का परम सुख प्राप्त करता हुआ इसी परिवेश में जीवन जीने का अभ्यस्त हो चुका है। कीचड़ से जीवन का रस निचोड़ अपने यथार्थ से जुड़ा हुआ सूअरों का दल सभ्य और अभिजात्य समाज का अटूट हिस्सा है।

जानवरों की सभा से लेकर देश की महासभा तक भाषा एक बहुत बड़ा प्रश्न है। जिसका उत्तर खोजने के लिए भाषा के नाम पर कई विमर्श चल रहे हैं। प्रयोगशाला में कई प्रयोग हो रहे हैं। परंतु भाषा मौन बने हुए भी बहुत कुछ कह देती हैं। आज देश में भाषा का प्रश्न आम बात है अधिकांश लोग भाषा विमर्श के नाम पर पूरे का पूरा दिन बोलने में खपा देते हैं। होता तो कुछ नहीं है वही ढाक के तीन पात। हां लेकिन कुछ लोगों को भाषा के नाम पर काम मिल गया है। कुछ लोगों के लिए भाषा विमर्श सरकारी परियोजनाओं से उतरता हुआ कागज का जहाज जिस पर गुलाबी और हरे-हरे गांधीजी के चित्र बने हुए हैं उल्लू पर लक्ष्मी बैठकर स्वयं आई है तो भाषा अपने बिल से बाहर निकल कर इधर उधर झांकती है और दुल्हन की तरह घुंघट ओढ़ कर किसी किनारे में बैठ जाती है।

भाषा एक हथियार है वास्तविक हथियार नहीं, एक शाब्दिक विकल्प। भाषा दुःख का उत्सव है तो हर्ष का विलाप, भाषा संस्कृति का नगरकोट है तो राजनीति खण्डहर सदृश्य। भाषा मरुतप्राण सी शक्ति है तो श्वापदों का वाक-युद्ध। भाषा साहित्य और संस्कृति का उन्नयन व अवनमन है। भाषा स्वयं में अपनी वास्तविक प्रासंगिकता से कोसों दूर रहकर भी रचना को भू-खंड के सदृश्य वट-वृक्षों की कूॅची से निर्मित नवजात शिशु की भांति पालन-पोषण करती है। लेकिन इतना सब होने के बावजूद भी भाषा एक ऐसे नवजात शिशु का विलाप है जो अपनी मां की गोद से बिछड़ गई है। और सरकारी अस्पताल के किसी बेड पर वेंटीलेटर पर लेटी हुई है। देश के हर भाषा प्रेमी को उस दिन का इंतजार बड़ी बेसब्री से है कि जिस दिन यह बड़ी होगी अपने पैरों पर खड़ी होगी उसके बाद भाषा पर बात करने के लिए बचेगा क्या?

भाषा का खेल दिन-रात चलता रहता है। इस तरह भाषा की आड़ में पूरी रात शिव का तांडव नृत्य चलता है। इस तांडव का सूत्रधार कौरवों की सभा का धृतराष्ट्र बंद आंखों से पूरी रात भाषा के नाम पर नए-नए तरीके इजाद करेगा और सुबह होने पर किसी समाचार पत्र में उसे प्रकाशित करके अपने परिश्रम का पारितोष दर्शक दीर्घा से मांगने के लिए लालायित रहेगा।

मदारी ने हमें बंदर और भालू की तरह ही नचाया है। क्योंकि हमने सिर्फ डुगडुगी की ध्वनि सुनी है। हमने आवाज के पीछे कारणों का अध्ययन नहीं किया।

मनुष्य स्वभाव से कर्मशील और परिश्रमी होने के साथ-साथ भीतर से धूर्त और चालाक भी होता है। स्वाभाविक गुण के विपरीत अगर वह जाता है तो वह कामचोरी या आलस्य न होकर नवाचार का एक रूप भी हो सकता है। जिसे चिंतन कहा जा सकता है और वह एकांत में बैठकर ही उपजता है।

एकांत व्यक्ति के व्यक्तित्व को योगी बना देता है तो अकेलापन व्यक्ति के व्यक्तित्व को भोगी बना देता है और जो जरूरत से ज्यादा चालाक होने के साथ-साथ धूर्त होता है वह स्वयं को रोगी बना लेता है। क्योंकि ऐसे व्यक्ति के भीतर की रोमानियत स्वाभाविक रूप से खत्म हो जाती है और रिक्त स्थान पर सम-सामयिक एवं प्रासंगिक विषय पर आधुनिकता के कलेवर में लिपटी धूर्तता और चालाकियाँ उत्सुकतावश मस्तिष्क के प्रकोष्ठों पर अपना आयाम विकसित कर लेती हैं। साथ ही चुनौतियों से लड़ने की प्रेरणा भी देती हैं।

समाज हमेशा की तरह स्वयं वर्ग निर्धारित कर लेता है। अकारण ही धूल को भभूत समझकर अपने मस्तक पर लगाने का जोखिम उठा लेता है । और ऐसे व्यक्ति जो अपने रोजमर्रा के कार्यों का डंका पीटने वाले, महज तारीफ और सभा/महोत्सव के केंद्रीय स्थान पर अपनी भूमिका बनाये रखें हेतु ऐसे कार्यों में संलिप्तता दर्शानें का कार्य करते हैं, ऐसे व्यक्तियों के प्रति अकारण अपनी प्रतिबद्धता दर्शाते हैं जो महज राई को पर्वत बना देती हैं ,कामचोर/निठल्ले को नेता बना देती हैं, जिसे भाषा की समझ न हो उसे भाषा का संरक्षक/ शिक्षक बना देते हैं। गली-नुक्कड़ पर भीख मांगने वाले बाबाओं को अपना आदर्श मानकर साधकता दर्शानें में सुखानुभूति का अनुभव करती हैं । आज का मनुष्य भौतिक सुविधाओं का गुलाम बनता जा रहा है। असंतोष, अलगाववादिता, उपद्रव, स्त्रियों को निर्वस्त्र कर घुमाया जाना, जातिगत समीकरण को लेकर नैतिक चरित्र को अपमानित किया जाना, वोट - नोट - चोट की राजनीति, क्रांतियांँ, आंदोलन, असमानता, विषमता, अनैतिकता, अत्याचार, अपमान, असफलताएं, अस्थितरता, अवसाद, वासना, चिंता, संघर्ष, अनिश्चित्ता, हिंसा और कई वाद यह सब मानवीय सभ्यताओं के नैतिक चरित्र और आचरण को अंदर से दीमक की तरह खोखला कर रहे हैं। तो वहीं व्यक्तिवाद, जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रीयतावाद, हिंसावाद, भाई-भतीजावाद, क्षणवाद, अस्तित्ववाद, आधुनिकतावाद, उत्तरआधुनिकतावाद, विभिन्न समसामयिक स्थितियों के चलते समाज में बहुभाषावाद एवं बहुसंस्कृतिवाद सभी वादों के समानान्तर चरित्रहीनतावाद अपने पैर पसार चुका है और मानवीय मूल्यों और अपनत्व को भीतर से घाव कर रहा है, जिससे मनुष्यों के नैतिक चरित्र का अवमूल्यन हो रहा है। व्यक्तित्व के सभी निर्णय और योग्यता के सम्पूर्ण साक्षात्कार एवं मापदंड अब व्हट्सएप्प विश्वविद्यालय में होते हैं।


क्रमशः......

© डॉ चंद्रकांत तिवारी 

सोमवार, 7 अगस्त 2023

सागर किनारे - डॉ चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

 


सागर किनारे सूरज पुकारे 

रेतों के महलों पर 

लहरों के साये

चंचल रश्मियांँ - बेसुध उर्मियांँ

यौवन युगल पर

स्मृति सजाये 

वैभव का सागर

निज भावों की गागर

लहरों की गुंजन मृदंग बजाये

लौटी तटों पर कोमल करों पर

सहज सरलता कोमल तरलता

मातृत्व स्पर्श-सा स्नेह-प्यारा

कोमल हृदय से करती दुलारा

छूकर चरण तल देती सहारा

वैभव की जननी मिलती दोबारा ।


लहरों की धारा

डूबा क्षितिज पर

ओझल किनारा

लोहित गगन पर

रोहित किनारा

मैं निज खड़ा हूंँ

सम्मुख तुम्हारे 

भूतल किनारे

तटबंध सारे

लहरें पुकारे

हम-तुम सहारे

सागर पुकारे

क्षितिज धरा पर

सारस्वत किनारे

मिलते रहेंगे 

हम-तुम किनारे।


स्वरचित कविता -

© चंद्रकांत तिवारी 

fb-Chandra Tewari 


थलीसैंण - पौड़ी गढ़वाल - डॉ चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

 
 

सुबह हो गई भोर तिलक-सा

प्रखर-रश्मियां स्वेत वसन-सा

मस्तक उज्ज्वल यश गाता है

विश्व मुकुट-सा हिमसागर सेमल

हिम-देवालय हेमल चमकाता है।


सिंधु धरा-सा दक्षिण सागर 

उत्तर विश्व हिमालय सागर

मध्य हिमालय का रचना खंड

दिव्य भाल-सा उत्तराखंड।


बहती नदियों की जल धारा

करती कल-कल गंगा धारा

मानस -केदार की मीठी बोली 

निर्झर-सी बहती दूधातोली।


दिव्य शिलाओं की चोटी से सूरज की किरणें अभिसार हुई

थलीसैंण के प्रांगण में मां सरस्वती की तान हुई

गूंँज उठी देवभूमि की धरती

पावन किरणें मनुहार हुई

ऊंँची पावन शीला पर दीबा देवी मंदिर की जयकार हुई ।

चौंरीखाल


उर्मि रश्मियां धीरे-धीरे चौरीखाल से आती हैं 

शांत तिमिर-घाटी थलीसैंण को 

पलभर में चमकाती हैं

ऊंँचे-अडिग चीड़ों के वैभव 

देवदार की हरियाली

प्रहरी भूतल - गवाक्ष खड़े

निज प्रतिनिधि बीजों से बढ़े 

श्वेत हिम शिखरों की लाली

पूर्वी न्यार

वसुधा बहती-पूर्वी न्यार

लहराती हरियाली खेतों में बाली

कंठ-शीतल कल-कल मृदु-मनुहार

क्षितिज परिधि थलीसैंण साकार

अपनी गंगा -पूर्वी न्यार ।


ऊंँचे पर्वत गांँव- गंगा की धार

हिमालय के गांँव ईगास-बग्वाल

थलीसैंण की घाटी-पौड़ी गढ़वाल 

दूधातोली पर्वत की सांँझ निराली

बाघों के जंगल बांँझ-वृक्ष हरियाली 

सड़कें छोटी सर्पीली - बर्फीली धार

पुण्य मिले यहांँ दीवा देवी बारंबार ।

हंसेश्वर

हंसेश्वर

बिंदेश्वर
बिंदेश्वर

हंसेश्वर-बिंदेश्वर शिव प्रदेश परिधि में मिलता 

थलीसैंण की घाटी में किरण सूर्य-सा खिलता 

दिव्य हिमालय की यह गाथा 

ज्ञान मनोहर की अभिलाषा

कंकड़ कंकड़ यश गाता है

पर्वत का मानस पुत्र यहांँ

श्रम कण का बरसाता है 

हे दिव्य हिमालय तेरी धरती 

निज कोना-कोना गाता है 

थलीसैंण की घाटी में सूर्य-कमल दल खिलता है 

चौरीखाल के जंगल में बाघों का डेरा मिलता है

असंख्य खग कुल का वैभव यहांँ 

निज दिव्य हिमालय ढलता है

सेमल-सा हेमलता हिम शिखरों का जल

जब धरा वसन मुख भरता है ।


है प्रखर ज्योति की उज्ज्वल आभा 

नदियों की कलकल धारा 

यह दुधातोली की पर्वतमाला

झरने का कलरव गाता है

थलीसैंण की घाटी-पौड़ी में 

किरण सूर्य-दल खिलता है।

दुधातोली

दुधातोली

पावन रज किरणों का रथ

जब धीरे-धीरे आता है

थलीसैंण का दिव्य भाल

धीरे-धीरे चमकाता है।

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की यश गाथा है

मध्य हिमालय का भूखंड थलीसैंण कहलाता है।

ऊंँचे ऊंँचे शैल खंड वीरों का मस्तक ऊंँचा करते

कलकल बहती नदियांँ तन शीतल मन हरते।


मातृभूमि-पुण्यभूमि तेरी जय हो थलीसैंण यश गायेगा

विवेक-ज्ञान, यश-वैभव का  सूर्य हिमालय लायेगा।

थलीसैंण 

थलीसैंण 

थलीसैंण 


स्वरचित कविता -

डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

fb-Chandra Tewari 

चिंतन से चिंता धीरे-धीरे घटती है- डॉ चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

 चिंतन से चिंता धीरे-धीरे घटती है

प्रभु दर्शन की प्यास सदा

धीरे-धीरे बढ़ती है

बाधाएं विपरीत आ जाएं 

घनघोर घटाएं छा जाएं

वह चरण वंदना करता है 

मन-चित्त में चिंतन करता है

क्या दुख उसका कर पाएगा

सब वक्त बुरा कट जाएगा

साहस और विश्वास की सीढ़ी क़दम-क़दम पर चढ़ती है

प्रभु चिंतन से सबकी चिंता धीरे-धीरे घटती है।

गुरुवार, 3 अगस्त 2023

भारतीय ज्ञान परम्परा : प्रारूप एवं भविष्य (निज व्यक्तित्व की तलाश) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 भारतीय ज्ञान परम्परा : प्रारूप एवं भविष्य 

(निज व्यक्तित्व की तलाश)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

सारांश -

"द्वंद्व मिट जाता है

द्वैत खो जाता है

एकांत की समाधि में

परमार्थ मिल जाता है ।

स्वार्थ खो जाता है

ज्ञान निहितार्थ में

परमार्थ मिल जाता है 

सूक्ष्म श्रम यथार्थ में 

आत्म अंक विस्तार में 

ज्ञान सत्य पदार्थ में ।"

ज्ञान परंपरा की वैचारिकी की मूलभूत संरचना की विचारधारा, परंपरा, आधुनिकता, नैतिकता, धर्म, संस्कृति, सभ्यता, संस्कार, जीवन-जगत की सभी कोटियों से समाहित होता, व्यवहारिक संवेदना का प्रकृतिवादी, मनोवैज्ञानिक, अनुभवजनित, अभ्यासरत परिणाम है। नकारात्मक ऊर्जा से सकारात्मक परिणाम का प्रभाव भी ज्ञान परंपरा को दिशा-निर्देश एवं शक्ति जारी करता है। सकारात्मक दृष्टिकोण से नकारात्मक ऊर्जा का विलोपन भी ज्ञान परंपरा की विरासत शक्ति का ही परिणाम है।

सृजनशीलता और नवीनता ज्ञान परंपरा के आधार स्तंभ हैं। 

जीवन के यथार्थ दृश्यों को हम किस रूप में देखते हैं, किस रूप में महसूस करते हैं, महसूस करने के बाद क्या हम उन साक्षात दृश्यों/वस्तुओं से अपनेपन का लगाव रख पाते हैं? ऐसा लगाव जो हमें बार-बार अपनी ओर आकर्षित करता हो। हमारे मन की रिक्तता को पूर्ण करता हो। हमारे जीवन के अवकाश को इंद्रधनुषी रंगों से भर देता हो। हमारी विषम और कठिन बनती जा रही जीवनशैली को सरल और सहज बना देता हो। हमारी कम पड़ती श्वांसों के मध्य रक्त का संचार करता हुआ जीवन की लालिमा के नए दृश्यों को उभरता हो। यह संभव है कि हम अंतिम स्पंदन तक स्वयं से ही संघर्ष कर रहे होते हैं परंतु जो प्रकृति हमने अपने लिए निर्मित की है वह एक ऐसी दुनिया है जो दो सगे-संबंधियों के अकेलेपन से भरी हुई है। जैसे जीवन का संगीत रिक्त हो गया है जीवन की तलाश में भटकता हुआ कवि हृदय शून्य की परिधि पर घूम रहा हो। स्वयं के प्रश्नों में ही उत्तर को तलाश कर रहा हो। कवि हृदय कई सौ हृदयों का समुच्चय है। उसकी अभिव्यंजना और अभिव्यक्ति से पहले उसकी देखने की शक्ति स्पर्श और गंध के अनुभवों का साक्षात् बिंम होती है। हवाओं में तैरता हुआ संगीत कवि की सांसों में घुलमिल कर साकार हो जाता है। यह सब एकांत की वीणा से निकला हुआ नादमय संगीत है। जीवन का वास्तविक जयघोष है। यही गुरु परंपरा की लोक संस्कृति का उत्थान मंच है। यही गुरुत्व शक्तियों की गतिविधियों का आत्मिक दर्शन जो व्यष्टि से समष्टि और समष्टि से व्यष्टि एवं मानवता की जन्मभूमि की विकास यात्रा का अंतिम और प्रारंभिक प्रस्थान बिंदु है। 

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इतिहास गवाह है साहित्य ने भौगोलिक एवं प्राकृतिक परिवेश से नया जीवन दर्शन प्राप्त किया है और मनुष्य ने अपनी प्रज्ञा के बल पर अंतरिक्ष में अन्वेषक को नया आयाम दिया है। ज्ञान दर्पण के बल पर गूंगे को जुबान, अज्ञान को ज्ञान, अनैतिक को नैतिकता, परंपरा को आधुनिकता के कलेवर में लिपटा हुआ यथार्थ चरित्र दिया है। जिसकी सीमाएं अनंत है। जो अंतरिक्ष के अपार बिंदुओं को भी स्पर्श कर लेता है। भविष्य के गर्भ से यथार्थ के पुष्प खिलाने की क्षमता रखता है। नैतिकता के आवरण में लिपटा हुआ भारतीय चरित्र सनातन संस्कृति का जयघोष प्रभु श्री राम की अनंत विरासत का ज्योतिपुंज स्वयं अपने ही ज्ञान दर्पण के प्रारूप में भविष्य के सपने देखने वाला प्रत्येक भारतवासी के ज्ञान की पाठशाला का नैतिक चरित्र, अपनी परंपरा में राष्ट्र की यश गाथा का नाम है। कहने को भारत है। रहने को भारत है। यश और कीर्ति की सोने की चिड़िया और देश और विदेश में अपनी ज्ञान परंपरा से विश्व गुरु का कीर्ति स्तंभ भी है। 

भारत अपने चरित्र से संपूर्ण विश्व का आदर्श बिंदु है। अपनी ज्ञान परंपराओं से संपूर्ण विश्व का पथ प्रदर्शक है।अपने नैतिक आचरण से विश्व की आंँख का तारा है।अपने कट्टर शत्रु पाकिस्तान का भी प्यारा है। इसका रज- रज प्रत्येक भारतवासी को न्यारा है। इसीलिए कहते हैं कि अखंड भारत हमारा है। भारतीय ज्ञान परंपरा भारत की मिट्टी में रची बसी है इसका विशाल चरित्र इसकी मिट्टी में समाया है। यहां का जनमानस मिट्टी से भी संवेदनात्मक रिश्ता बनता है। इसीलिए भारत विविधताओं से भरा है। विभिन्न संस्कृतियों की परंपराओं ऐसा प्रारुप है जो अपनी प्रज्ञा की ज्ञानमाला को वैश्विक क्षितिज पर आधुनिकता और नवीनता के विविध आयामों को लेकर अजस्र बुद्धिमत्ता का जयघोषित स्थापित कर रहा है।

भारत में ऐसे कई ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्थल हैं जो भारतीय ज्ञान परंपरा के आदि केंद्र हैं। यहां सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक इतिहास से जुड़े कई महत्वपूर्ण स्थल भारत की विरासत का हिस्सा हैं। जिनमें नालंदा, राजगीर, बोधगया और वैशाली नगर और गौतम बुद्ध से जुड़े स्थल हैं। वही अन्य स्थलों में कुरुक्षेत्र, मथुरा, वाराणसी, प्रयाग, हरिद्वार, सारनाथ, अयोध्या, खजुराहों, साँची, अजन्ता और एलोरा, पुरी आदि भारत के पुरा ऐतिहासिक स्थल हमारी विरासत की धरोहर हैं एवं प्राचीन ज्ञान परंपराओं की भारतीयता का दैदीप्यमान ज्योतिपुंज - सा जयघोष भी। भारतीय ज्ञान परंपरा के धार्मिक केंद्रों में उत्तराखंड राज्य का विशेष महत्व है यहां आने वाले श्रद्धालु भारतीय संस्कृति का हिस्सा हैं।

भारत की सांस्कृतिक विरासत की पृष्ठभूमि बहु-आयामी और बहु-भाषी है। जिसमें भारत का महान इतिहास, विलक्षणता से परिपूर्ण भूगोल और अविष्कारों से भरा है। मानवीय सरोकारों का प्रामाणिक दस्तावेज सिन्धु घाटी की सभ्यता के दौरान बनी और आगे चलकर वैदिक युग में विकसित हुई, बौद्ध धर्म एवं स्वर्ण युग की शुरुआत और उसके सूर्यास्तगमन के साथ-साथ फली-फूली और खुद पल्लवित-पुष्पित हुई। इसके साथ ही पड़ोसी देशों के रीति-रिवाज़, परम्पराओं और विचारों का भी इसमें समावेश मिलता है। पिछली पाँच सहस्राब्दियों से अधिक समय से भारत के रीति-रिवाज़, भाषाएँ, प्रथाएँ और परम्पराएँ इसके एक-दूसरे से परस्पर सम्बंधों में महान विविधताओं का एक अद्वितीय उदाहरण देती आ रही हैं। 

ज्ञान का प्रारंभिक द्वार और प्रथम केंद्र है वाणी। वाणी का प्राथमिक अनुशासनात्मक व्यवहार है व्याकरण। ज्ञान की इसी परंपरा में पाणिनि ने दुनिया का पहला व्याकरण लिखा है। यास्क द्वारा भाषा के अनुशासनात्मकता पर निरुक्त लिखा गया है। पतंजलि ने योगसूत्र व भाषा अनुशासन लिखा है। योग विज्ञान वैज्ञानिक है एवं वैश्विक है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र वैश्विक है। आचार्य वात्स्यायन का कामसूत्र, भरतमुनि का नाट्यशास्त्र तो इसी ज्ञान परंपरा में चरक और सुश्रुत संहिताएं आयुर्विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित एवं वैश्विक हैं। प्राचीन भारत ने दर्शन, ध्वन्यात्मक भाषा विज्ञान, अनुष्ठान, व्याकरण, खगोल विज्ञान, अर्थशास्त्र, सांख्य दर्शन सिद्धांत, तर्क़ दर्शन, जीवन दर्शन, आयुर्वेदिक चिकित्सा, ज्योतिषीय ज्ञान एवं संगीत शास्त्र विभिन्न विषयों को लेकर ज्ञान और परंपरा की खोज में शोधार्थियों एवं तत्व चिंतन करने वाले साधकों ने असाध्यवीणा को साधने में अपना संपूर्ण जीवन लगा दिया। सुखी मानवीय जीवन यात्रा की विरासत को अपनाने के लिए, तत्त्व चिंतन करने वाले विद्वानों द्वारा अनुसंधान किए गए। अणुबम से लेकर परमाणु बम तक शिक्षा, चिकित्सा और कृषि में नए-नए प्रयोग एवं नए-नए आविष्कार किए गए। प्राचीन सभ्यता एवं गुरुकुल परंपरा द्वारा मिलने वाला ज्ञान आज प्रायोगिक रूप में मशीनीकरण के द्वारा प्राप्त किया जाने लगा। प्राचीन काल से मध्य हिमालय की विरासत की परिधि में बैठकर वर्षो ऋषि-मुनियों द्वारा तपस्या की गई। तब जाकर मानव सभ्यता की विकास यात्रा का प्रारंभ, ज्ञान की चिंतन धाराओं का अजस्र स्रोत, हिमालय से बहने वाली नदी की धाराओं के समान जनमानस के हृदय को भीगोता हुआ मानव कल्याण की दिशा में अग्रसर हुआ।

 प्राचीन ग्रंथों में ही जीवन का नवीनतम अभिनय प्रयोग है। बढ़ती मानवीय सभ्यता और विस्तृत होता आधुनिक जनमानस इस बात की अपेक्षा रखता है कि युगों-युगों से प्राचीन परंपराओं का ज्ञान-विज्ञान आज के प्रत्येक व्यक्ति की जीवन शैली के लिए, उसके रहन-सहन और उसके व्यवहारिक पक्ष के लिए, सामाजिक आचरण के साथ-साथ धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ते हुए मानवीय सभ्यता के आत्मिक मिलन और नैतिक आचरण के लिए अत्यंत आवश्यक है।

वेदों में जीवन रस है। आनंद की विकास यात्रा का अमृत कलश है। वेद इस बात के प्रमाण हैं कि नियति और परंपरा के बीच ज्ञान-विज्ञान अपना क्या महत्व रखता है? विज्ञान ज्ञान से किस प्रकार भिन्न है? चरित्र नैतिकता से किस प्रकार जुड़ा हुआ है? दृष्टि किस प्रकार से सृष्टि से जुड़ी हुई है? व्यष्टि किस प्रकार से समष्टि से जुड़ी हुई है? साधारण व्यक्तित्व असाधारण कैसे बन जाता है? विशेष व्यक्ति सामान्य भाव भूमि पर कैसे अवतरित होता है ? लोक रंजक और लोकप्रिय कैसे बन जाता है? कैसे सबके हृदय का कंठहार बनते हुऐ सबकी आंँखों का नेत्र बिंदु बन जाता है? यह चिंता से आनंद की विकास यात्रा का प्रतिफल है। वेदों, उपनिषदों में जीवन रस है और वेदांग में जीवन का सार।

अपने निजी चरित्र से व्यक्तित्व तब उठता है जब अपने संस्कारों से अपनी ही संस्कृति के गले में सभ्यता का निष्कलंक हार चढ़ाता है। सभ्यताओं ने संस्कृति को हमेशा ही आदर दिया है। सत्कार किया है। संस्कृति के नैतिक चरित्र को मनोबल दिया है, तो वहीं दूसरी ओर संस्कृति ने सभ्यता को हृदय मंदिर में निवास दिया और संस्कार पर्वत की ओर अग्रसारित करते हुए विस्तृत हिमालय के श्वेत मस्तक को सूर्य की किरणों से सुशोभित कर मानव सभ्यता को उठना सिखाया है । यही भारतीय ज्ञान परंपरा की विरासत है। यही प्रज्ञा की योग समाधि । जनमानस की चिंता का प्रतिफल और ऋषि मुनियों की तपस्या का आध्यात्मिक अंश भी । जिसने स्वभाविक चिंतन परंपरा को प्रकृति के नैसर्गिक परिवेश के मध्य में जीवंत रखते हुए मानवीय संबंधों की कांवड़ यात्रा को स्थापित किया। दीपों के त्योहार और रंगों के उत्सव को, रक्षा के धागों को, नदी घाटों, तटों और सूरज, चांँद की उपासना पद्धति को, हृदय मंदिर में स्थान दिया। पत्थर में भगवान के दर्शन, बहते पानी को गंगा मांँ की संज्ञा देकर मनुष्य के नैतिक आचरण को भारतीयता के रंग में भिगो दिया है । यह भारतीय ज्ञान परंपरा का विस्तार है। अतीत के काल खंडों से सौभाग्य का ज्ञान कुंज है। जिसके लिए विदेशी व्यक्ति भी भारत भूमि में जन्म लेना अपना सौभाग्य समझता है। ऐसे भारत को विभिन्न नामों से जम्बूद्वीप, भारतखण्ड, हिमवर्ष, अजनाभवर्ष, भारतवर्ष, आर्यावर्त, हिन्द, हिन्दुस्तान और इंडिया समय-समय पर कहते हुए यहांँ के लोकमानस द्वारा हृदय में स्थान दिया गया। विभिन्न जातियों का मेल, विभिन्न संप्रदायों का मेल, ज्ञान की सीमा से परे, अपनत्व की भावना में समाया हुआ, एक ऐसा आत्मिक सागर बन गया जिसके उच्च शिखर पर ज्ञान परंपरा अपना विजयोत्सव एवं विजय पताका फहरा रही है। भारतीय ज्ञान परंपरा का यही अमर संगीत है।

भारत में ऋग्वेद लोकमंगल हितैषी ज्ञान परंपरा है। ज्ञान हिमालय-सा पवित्र विषय रहा है। ज्ञान सभी रहस्यों का उद्घाटन करता है। अंधेरे को चीरने के समान ज्ञान अपनी परंपरा का निर्वहन करता आया है। अपनी निजता की आहुति का अंशदान करता है। ज्ञान से धर्म-कर्म की रक्षा होती है। मनुष्य अपने भीतर के अहं साधता है। ज्ञान से ही अर्थ, काम और मोक्ष का त्रिकोण मिलता हैं। पाणिनि, पतंजलि, कौटिल्य, वात्स्यायन, भरतमुनि, चरक, सुश्रुत, आर्यभट्ट, वराहमिहिर आदि सभी विद्वान अपने पूर्ववर्ती आचार्यों का उल्लेख करते हैं। भारतीय अखंड ज्ञान परंपरा का परिचय देते हुए उसके प्राथमिक प्रारूप को निर्मित करते हैं।

भारत की सर्वोच्च शैक्षणिक संस्थाओं द्वारा जैसे यूजीसी ने नई शिक्षा नीति के अनुसरण को अपनाते हुए भारत की ज्ञान परंपरा को छात्र-छात्राओं, अध्यापकों के लिए मार्गदर्शी बताया है। चरित्र के निर्माण में सहायक एवं नैतिक आदर्श का केंद्र बताया है। भारतीय चिंतन शिविर को भारतीय सनातन संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा के मूल से जोड़ने का कार्यक्रम बनाया है। ज्ञान का लक्ष्य केवल सूचना उपलब्ध कराना नहीं है अपितु ज्ञान, विज्ञान और दर्शन, इच्छा, भाव और कर्म सभी मिलजुल कर विश्व कल्याण की मंगल कामनाओं का सार्वभौमिक हित निर्मित कर रहे होते हैं।

वैदिक कालीन ज्ञान दर्शन-परंपरा मानवीय जीवन का स्वर्णिम उदय काल है। उत्साह, जिज्ञासा, जिजीविषा, जीवन का यथार्थ प्रश्नपत्र है। ऐसे प्रश्नपत्र के उत्तर लिखने के लिए मन-मस्तिक सदा चिंतनशील और तर्कशील बना रहे, इसके लिए निज व्यक्तित्व को सदा ज्ञान की विभिन्न कोटियों से परिष्कृत करते रहना ही अपनी सनातन धर्म संस्कृति का उचित निर्वहन करना है। ज्ञान की प्राप्ति के लिए व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक अनुभव तो संचारी भाव के समान हैं। परंतु जीवन की वास्तविक प्रज्ञा तो स्थायी भाव के रूप में रहस्यमयी स्थिति में रसमय होकर अनुभूति की अभिव्यक्ति और अभिव्यक्ति की अनुभूति स्वत: ही दिलाता रहता है। जीवन-जगत की स्थितियां तो उद्दीपन के रूप में अपना नैसर्गिक दृश्य बदलती रहती हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा का वैचारिक ढांचा रस की मूलभूत निजता का मनोवैज्ञानिक आधार है। जिसका केंद्र मस्तिक से होकर स्नायु तंत्र तक लघु सरिता की तरह जीवन सरिता के विस्तृत आयाम पर बहता हुआ दिशा तय करता है। जिसका प्रकृति प्रदत्त एक आधार है। वह निराधार कैसे हो सकता है। ज्ञान की वास्तविक परंपरा और प्रारूप मनुष्य हृदय में विराजमान है। वह तो सहृदय की अभिव्यक्ति है। कवि हृदय की अनुभूति है। लोकमानस की विचारधारा है। और कह सकते हैं कि यह सभी सशक्त ज्ञान के उपकरण मात्र हैं। ज्ञान दर्शन की वैश्विक परंपरा ऋग्वेद सहित समस्त वैदिक संहिताओं, ग्रंथों में विश्व की पहली ज्ञान परंपरा का पोर्टफोलियो है। 

भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरुकुल शिक्षा के प्रमुख आधार केंद्र थे। शिक्षार्थी अठारह विद्याओं – छः वेदांग, चार वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वेद), चार उपवेद (आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्व वेद, शिल्पवेद), मीमांसा, न्याय, पुराण तथा धर्मशास्त्र का अर्जन गुरु के निर्देशन में ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए अनुष्ठानपूर्वक अभ्यास कर अध्ययन करते थे। प्रशिक्षणार्थियों एवं विद्यार्थियों को ऐसे अध्ययन से मिलने वाला ज्ञान आजीविका निर्वहन के साथ-साथ कौशल विकास एवं व्यक्तित्व विकास में सहायक बना और इन ग्रंथों के अध्ययन से नेतृत्व कौशल विकसित हुआ। भारतीय ज्ञान परंपरा का देश-विदेशों में प्रचार-प्रसार हुआ।

त्याग, तपस्या, निज व्यक्तित्व की समाधि से निकलने वाला जीवन रस अमृत की बूंदों के समान गुरु ज्ञान की परंपरा का आधार बना। धन लोभ से परे वृत्तिसम्पन्न तथा धन की तृष्णारूपी नैसर्गिक प्रवृत्ति से परे आचार्य एवं कुलगुरू ही शैक्षिक भारतीय ज्ञान परंपरा पद्धति में शिक्षक माना गया है। 

भाषा के लिखित रूप जिसमें शिक्षा, चिकित्सा और कृषि पर आधारित ग्रंथ हमें विरासत के रूप में प्राप्त हुए हैं। पुरातनपंथी यह ज्ञान परंपरा मनुष्य का मार्ग निर्देशन कर रही है। अप्रतिम, अमूल्य, अनवरत, अक्षुण्ण भारतीय ज्ञान परंपरा में वेद ग्रंथों को, पुराण ग्रंथों को अप्रतिम माना गया है। प्राचीन काल में गीत, संगीत, चित्रकला और स्थापत्य सहित सभी ज्ञान-विज्ञान के अनुशासनात्मक क्रिया कलाप आधुनिक परिवेश के लिए एक प्रारूप का निर्माण करते हैं। कमोबेश यह देखने में आया है कि काल परिस्थितियों के यथार्थवादी प्रवाह में यह ज्ञान परंपरा अपनी वास्तविक जड़ों से टूट-सी गई हैं। कहीं ना कहीं एक सनातन पद्धति में कुछ बिखराव सा आ रहा है। जिसे आज शोधात्मक दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। व्यवहारिक जीवन में धारण करने की महत्वपूर्ण उपादेयता भी सनातन ज्ञान परंपरा की शक्ति को बचाए रख सकती हैं।

ऋग्वेद संपूर्ण कलाओं से भरा पड़ा है। संगीत की कला में सामवेद उत्कृष्ट कोटि का है। यजुर्वेद में सौंदर्यपूर्ण छंदों का अप्रतिम विधान निर्मित है। अथर्ववेद तो पूरा सांसारिक गतिविधियों का गठजोड़ है। भारत में सौंदर्य शास्त्र की हजारों वर्ष पुरानी ज्ञान परंपरा है। भारतीय ज्ञान परंपरा अद्वितीय ज्ञान और प्रज्ञा का प्रतीक है जिसमें ज्ञान और विज्ञान, लौकिक और पारलौकिक, कर्म और धर्म तथा भोग और त्याग का अद्भुत समन्वय है। यही हमारी ज्ञान परंपरा का मूलभूत और स्थाई प्रारूप है। जिसमें भविष्य के सुनहरे, विविध आयामी दृष्टिकोण व्याप्त हैं। यह तो हम मानवों की नैसर्गिक प्रवृत्ति है कि हम कहां से कितना ज्ञान प्राप्त करते हैं। प्राचीन का कितना अनुसरण हम अपने नवीन जीवन में धारण करते हैं। यह देश गुरु परंपरा का देश रहा है। यहां प्राणों से बढ़कर रक्त का मूल्य चुकाया जाता है। भारतीय ज्ञान पद्धति, वैश्विक परंपरा की परिधि की विशाल जीवन यात्रा है। कल, आज और कल इसका प्रारूप और भविष्य यहां की मिट्टी और भौगोलिक परिवेश यहां की संस्कृति और यहां के धार्मिक आचरण में दिखता है।

भारतीय चिंतन परंपरा को ढूंढने के लिए किसी पद एवं प्रतिष्ठा की कोई अभिलाषा नहीं होनी चाहिए। अगर उस चिंतन परंपरा को यथार्थ के धरातल पर ढूंढना है तो व्यक्ति एवं मानव सभ्यता को स्वयं के भीतर अपने ईश्वर को तलाश करना होगा। वह किसी रण क्षेत्र में नहीं मिलेगा और नहीं देवालय में मिलेगा। मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर में नहीं मिलेगा। यह कोई वेद ग्रंथ या कुरान बाइबल या गुरु ग्रंथ साहब, अगर वह चिंतन परंपरा हम सबको प्राप्त होगी तो हमारी स्वयं की आत्मा एवं हमारे मन के भीतरी आवरण चित्र में दिखाई देगा। कहा भी गया है कि ईश्वर कण कण में विराजमान है। हिंदी साहित्य का भक्ति काल और संतों की आदि परंपरा जिसमें निर्गुण और सगुण दोनों ने ही अपने-अपने स्तर से अपने आराध्य देव को अपने स्वयं के भीतर ढूंढने का प्रयास किया। यही भारतीय चिंतन परंपरा का मूल है। जिससे अनपढ़ और बड़ा ज्ञानी व्यक्ति कबीर घट- घट में प्राप्त करता है। बंद आंखों से जिसे सूरदास जैसी कविता बाल लीलाओं का वर्णन करती है। प्रेम की पीर में मग्न कवि मलिक मोहम्मद जायसी जिसके मूल के अर्थों में ही स्वयं को पाता है और लौकिक-अलौकिक की जिज्ञासाओं को समझने का प्रयास करता है। स्वयं अपने को दास भाव से समर्पित पूजा अर्चन करने वाला कवि तुलसीदास प्रभु श्री राम के दिव्य अलौकिक रूप को रामचरित्र मानस में साकार करता है। यह सब भारतीय परंपरा का चिंतनीय विकास ही तो है। जिसे आधुनिक काल में कवि जयशंकर प्रसाद चिंता से आनंद लोक की अमर यात्रा का वर्णन करते हुए अपनी चिंतन परंपरा को समझने एवं समझाने का प्रयत्न कर रहे हैं। संपूर्ण हिंदी साहित्य भी अतीत एवं वर्तमान के काल खंडों से होते हुए सतत विकासात्मक नदी की तरह भारतीय चिंतन परंपरा के कई विविध आयामों को रेखांकित करता हुआ बढ़ रहा है।

गीता में कर्म योग का संदेश मनुष्य को भौतिक जगत में जीने की प्रेरणा देता है। आज संपूर्ण समाज के समक्ष अगर कोई व्यक्ति बुरी आत्माओं की परिधि में स्वयं कैद हो जाता है तो गीता का संदेश उसका मार्गदर्शन तय करता है। यह वही संदेश है जो अर्जुन जैसे गांडीवधारी वीर धुरंधर योद्धा को रणक्षेत्र में अग्निकुंड के समान वीर पुरुष बना देता है। यह भारतीय चिंतन परंपरा का ही ज्वलंत प्रमाण है कि व्यक्ति लक्ष्य विहीन होने के बावजूद भी सकारात्मक जीवन दृष्टि को धारण करते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सक्षम होता है। यह साधारण बात तो है परंतु इस साधारण बात के भीतर भारतीय चिंतन परंपरा की असाधारणता गहराई से अपनी जड़े जमाई हुई है।

भारतीय ज्ञान परंपरा की इस पद्धति को आज विश्वविद्यालय स्तर पर अपनाने की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। ज्ञान विचारधारा का विषय नहीं है। विचारधारा ज्ञान का विषय हो सकता है। ज्ञान किसी भी व्यक्ति के मस्तिष्क के भीतर राजमुकुट-सा जड़ित, चमकते हिमालय की तरह, हीरे के समान है। आज जहांँ लोभ एवं अपराध दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है, मनुष्य स्वभाव से ही लालची है। ऐसी स्थिति में भारतीय प्राचीन ज्ञान परंपरा का अनुसरण एवं शिक्षण विद्यालय एवं विश्वविद्यालय का आधार बने, यह अत्यंत आवश्यक बन जाता है।

निष्कर्ष -

इसी आशा और विश्वास के साथ कि भारतीय ज्ञान परंपरा के ज्ञान रूपी इस धारा के प्रारूप एवं भविष्य को हम कहां तक सुदृढ़, पुष्पित एवं पल्लवित बना पाएंगे यह हमारे नैसर्गिक आचरण पर निर्भर करता है। जीवन में सर्वप्रमुख निज व्यक्तित्व की तलाश जरूरी है। स्वयं से साक्षात्कार जरूरी है। द्वैत और अद्वैत की मूलभूत संरचना को समझना जरूरी है।


युद्ध कर यथार्थ से

स्वार्थ के निहितार्थ से

कर्म - नित्य परमार्थ से

धर्म देवार्थ - रक्षार्थ से

सरल - जीवन सेवार्थ से

शब्द - कठिन भावार्थ से

निज - अभिव्यक्ति पदार्थ से

युद्ध कर यथार्थ से !! 

(स्वरचित कविता) -डॉ. चंद्रकांत तिवारी

यह लेख मेरा मौलिक कार्य है।

©डॉ चंद्रकांत तिवारी

उत्तराखंड प्रांत 


गुरुवार, 27 जुलाई 2023

आशा अमरधन स्वरचित कविता - डॉ चंद्रकांत तिवारी

आशा अमरधन

स्वरचित कविता - डॉ चंद्रकांत तिवारी 


"वह फूल ही क्या 

जिसमें मिट्टी के कण न हों 

वह जीवन ही क्या 

जिसमें दुख के क्षण न हों ।


मुश्किलें तो हर पल 

नए रास्ते दिखलाती हैं 

रास्तों पर दृढ़ होकर 

चलना ही जीवन है।"

©चंद्रकांत तिवारी 

शहीद स्मृति - डॉ चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

शहीद स्मृति     

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत 

 प्यारे नेता चले गए संस्कार अभी तक बांँकी है

हिंद देश के वासी हैं आजाद हिंद की खाकी है

सुनों युवा भारत के वासी नाम सुभाष का काफी है

शहीद हुए वह देश के खातिर जीवन उनका सन्यासी है

जो न लड़ सका देश के खातिर चेहरा उसका आभासी है

फिरंगी कूच कर गए वतन से स्वराज्य अपना अभिलाषी है

आजादी के अमर सेनानी यह विरासत अमृतवाणी है 

बंद तलवार रह गई म्यानों में सूर्योदय कहांँ कल्याणी है

जो रूधिर वसन में लिपट न पाया वह रूधिर नहीं वह पानी है

जो अपने वंश को बचा ना पाया

वह धर्म-चरित्र अज्ञानी है ।


उठ न सका अपने पैरों पर राष्ट्र भला बच पाएगा

किस घर जाकर ढूंँढ रहें हम

सुभाष क्या वापस आएगा

स्वराज्य हमारा - राज्य हमारा

हिंद-विरासत पूरी छोड़ गया

फौलाद इरादों का युग-बालक 

विरासत-उपवन छोड़ गया

भारतमाता-अमरकोश मिट्टी से रिश्ता जोड़ गया ।


ऊंँचे हों आदर्श युवा के पदचिन्ह सुभाष के बांँकी हैं 

हम कथनी-करनी का अंतर भूल गए

फिर किस बात की हमको मांँफी है 

जो नहीं कर सके रण-अभिषेक

भला युद्ध कहांँ वह जीतें हैं

न तिलक शहीदों की मिट्टी का

कब गंगाजल भर पीते हैं ।


जो अपने ही आंँसू को सैलाब बनाकर पीते हैं

निज रुधिर-रक्त की धारों में स्वाभिमान बनाकर जीते हैं

है राष्ट्र-वसन जिनका यश-वैभव कफन तिरंगा ओढ़ा है

ऐसे ही जांँबाज़ युवा ने फिरंगी का मस्तक तोड़ा है 

कण-कण खून बहाया अपना आजादी का बिगुल बजाया था

प्यारे सुभाष ने अपने रक्त से आजादी का स्वप्न सजाया था।


स्वरचित -

©चंद्रकांत तिवारी

भाग - एक *क्या अनिवार्य मिलिट्री सेवा से सेना का हित होगा ? पक्ष और विपक्ष* ©डॉ.चंद्रकांत तिवारी

*क्या अनिवार्य मिलिट्री सेवा से सेना का हित होगा ? 

पक्ष और विपक्ष*

©डॉ.चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत 


*पक्ष-*


"मुझे तोड़ लेना बनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक!

मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने, जिस पथ पर जावें वीर अनेक!"


देश सेवा के भाव क्या होते हैं कवि माखनलाल चतुर्वेदी जी की उपर्युक्त कविता पुष्प की अभिलाषा से प्रकट होता है।     


भारतवर्ष की गौरव गाथा, यहां की सेना के जवानों की कार्यकुशलता वीरता से भरी पड़ी है। देश सेवा, राष्ट्रवाद और अनुशासन भारतीय सेना का मूल मंत्र है। विषम परिस्थितियों में भी भारतीय सैनिकों की कार्यकुशलता, साहस और मनोबल का विश्व स्तर पर सम्मान होता आया है। अगर हमें कुशल नेतृत्व मिल जाए तो हम विश्वविजय की दिशा में होंगे और यह सब हमारे देश के युवाओं की बदौलत संभव है। 


            गांव की सड़कों से दौड़ता हुआ भारत का युवा सेना में आकर अपने आप को गौरवान्वित महसूस करता है कि वह सेना का अभिन्न अंग है। उसकी वर्दी के सितारे उसकी किस्मत के सितारों से भी बढ़कर होते हैं। वह उनकी चमक कभी कम नहीं होने देता है। सांसे थम जाएं तो क्या? रक्त जम जाए तो क्या? फिर भी सेना का जवान कर्तव्य पथ पर अपने प्राणों की बाजी लगा देगा। ऐसे रणबांकुरे, धुरंधर योद्धाओं की जीत हमेशा पथ चूमती है। बुरा वक्त भी ऐसे जांबाज योद्धाओं के जीवन में यश लेकर आता है। वीरता की कुछ ऐसी परिभाषा भारतीय सेना के जांबाज योद्धा रणक्षेत्र में देते हैं।

"जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं

वह हृदय नहीं, वह पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।"


कवि गया प्रसाद शुक्ल 'स्नेही' जी की यह पंक्ति स्वदेश प्रेम और राष्ट्रप्रेम को दर्शाती है। राष्ट्रवाद की इससे सच्ची परिभाषा और क्या हो सकती है कि सेना स्वयं राष्ट्रभक्ति का स्वर्णिम मौका दे रही है।


            आज देश का हर कोई युवा भारतीय सेना का अंग बनना चाहता है और इस वर्दी की चाह को पूर्ण करना चाहता है। देश सेवा के लिए भारतीय सेना में आकर तन-मन से राष्ट्र को समर्पित होता है। आज हमारी सरकार युवाओं के सपनों को पूरा करने के लिए और सेना को युवा सैन्य बल प्रदान करने के लिए प्रयासरत है। इसी व्यवस्था के तहत 'टूर टू ड्यूटी' का विकल्प लेकर देश की सरकार रक्षा मंत्रालय के साथ मिलकर भारतीय सेना में नए जोशीले रणबांकुरों की फ़ौज को कर्तव्य की नई दिशा और राष्ट्रवाद की परिभाषा सिखाने के लिए वचनबद्ध है और एक मजबूत आधार प्रदान करना चाहती है।

देश की हर मां अपने बेटे के बदन पर सेना की वर्दी देखना चाहती है। जब एक बूढ़ी मां अपने बेटे को देश की रक्षा के लिए घर से विदा करती है तो वह कहती है! जा बेटे.. कर्तव्य पथ पर.. भारत मां की रक्षा के लिए अगर प्राणों का भी उत्सर्ग करना पड़े तो कभी पीछे मत हटना बेटा.. हमेशा आगे बढ़ते जाना। मां से किए वादे को पूर्ण करने के लिए अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए देश का युवा, सेना में आने के लिए, सेना के तौर तरीके सीखने के लिए, अपना खून पसीना एक कर देता है और भारतीय सेना का अभिन्न अंग बन कर अपने आप को गौरवान्वित महसूस करता है कुछ इस प्रकार का है हमारे देश का युवा रक्त। जिसकी धमनियों में रक्त का तूफान एक सैलाब बनकर उमड़ रहा है। सेना का कुशल नेतृत्व और अनुशासित वातावरण ऐसे सैलाब को नई दिशा और गति देगा। यह सेना के लिए भी गौरव की बात है।


            परंतु कुछ लोगों को इस बात से आपत्ति है कि अगर अनिवार्य सैन्य सेवा विकल्प को भारत की सेना का अंग बना लिया जाएगा तो इससे हमारी सेना कमजोर पड़ जाएगी। क्योंकि 3 वर्ष का समय (शॉर्ट सर्विस) काफी कम है। परंतु महोदय ऐसे लोगों को मैं यह बता देना चाहता हूं कि भारतीय सेना में कार्य करने के लिए 1 दिन भी अपने आप में बहुत बड़ी अवधि है। भारत जैसे देश जहां बेरोजगारी का ग्राफ दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है, योग्यता और काबिलियत सड़कों पर बेरोजगार घूम रही है। ऐसे में कम से कम तीन वर्ष के लिए भारतीय सेना में युवाओं को नौकरी देना और उनको सैनिक गतिविधियों का प्रशिक्षण देकर देश को वैश्विक स्तर पर एक नई दिशा देना अपने आप में प्रभावी, कारगर, सटीक एवं प्रभावपूर्ण शुभ संकेत हैं। जिस पर तुरंत कार्य होना चाहिए। इससे हमारे देश को और हमारी सेना को फायदा ही होगा। कोई नुकसान नहीं होगा।


            प्रशिक्षण किसी भी साधारण व्यक्ति को असाधारण बना सकता है। मैं यह मानता हूं कि पेशेवर सैनिक ज्यादा कारगर एवं प्रभावी, सटीक एवं कुशल नेतृत्व, रणकौशल में पूर्ण होता है। परंतु 'अनिवार्य मिलिट्री सेवा' के अंतर्गत भी प्रवेश लेने वाला अधिकारी या जवान प्रशिक्षित, अनुशासित वीरता और विवेक को धारण करने वाला ही होगा। क्योंकि देश के युवाओं को आर्मी से जोड़ने का यह सुनहरा अवसर है। अभी यह व्यवस्था प्रारंभिक चरण में ही है। इस व्यवस्था से धीरे-धीरे संपूर्ण राष्ट्र में देशभक्त, देशभक्ति और राष्ट्रवाद का उदय होगा। यह व्यवस्था नए वॉलिंटियर्स को जन्म देगी। जिससे भविष्य का राष्ट्र, हमारा भारतवर्ष अपनी प्राचीन गौरवमयी परंपरा का अनुसरण करेगा। वर्दी की इच्छा रखने वाले युवाओं के लिए भी यह क्षेत्र नए विकल्पों को लेकर आएगा 'अनिवार्य मिलिट्री सेवा' के अंतर्गत 3 वर्ष के कार्यकाल में 9 महीने की मिलिट्री ट्रेनिंग के साथ-साथ प्रवेश परीक्षा और मानसिक एवं शारीरिक मापदंड पहले जैसे ही रहेंगे इस बात से तो कोई समझौता नहीं किया गया है।

इसका सकारात्मक पहलू यह रहेगा कि सेना का पैसा बच जाएगा। जैसे ग्रेच्युटी पेंशन नहीं मिलेगी। अभी वर्तमान में 10 साल में अधिकारी पर कम से कम 5 करोड़ रूपये खर्च आता है। और 14 वर्ष तक जो अधिकारी सेना में कार्य करता है एक अनुमान के तहत 7 करोड़ रूपये उस पर खर्च होते हैं। परंतु अब यह मात्र 3 वर्ष में अगर 'अनिवार्य मिलिट्री सेवा' के अंतर्गत 'टूर आफ ड्यूटी' 'शॉर्ट सर्विस' विकल्प को अपनाया जाता है तो केवल 85 लाख में 3 साल के लिए सेवा ली जा सकती है। इसका एक लाभ यह होगा कि अगर पैसा बचेगा तो वह सेना के अन्य संसाधनों में प्रयोग किया जाएगा। अभी व्यवस्था प्राथमिक चरण में ही है। जिसमें 100 अधिकारी और 1000 जवान प्रारंभिक व्यवस्था को स्थाई धरातल प्रदान करेंगे।

            हमें इजराइल, रूस, उत्तर कोरिया, दक्षिण कोरिया, ग्रीस, स्विजरलैंड, तुर्की, ईरान, क्यूबा, नार्वे आदि देशों से सीखना चाहिए। यहां पुरुष ही नहीं बल्कि महिला भी अनिवार्य रूप से सैन्य सेवा के लिए समर्पित हैं। यहां भी मात्र निश्चित समय के लिए ही जिसमें 1 वर्ष या फिर 2 वर्ष तक 'अनिवार्य मिलिट्री सेवा' दी जाती है। महोदय प्रत्येक देश की भौगोलिक, सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था उस देश की सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप ही होती है। परंतु हम विकसित राष्ट्र का चोला पहनकर वास्तविकता से तो मुंह नहीं मोड़ सकते और वास्तविकता यही है कि हमें समय के साथ चलना चाहिए। वैसे भी महोदय युद्ध हमेशा ही नहीं होते। फिर भी हमें हमेशा युद्ध की तैयारियों के अनुरूप व्यवस्था और अभ्यास को बनाए रखना चाहिए। यह भी एक कटु सत्य है कि युद्ध से बढ़कर भी देश की व्यवस्था को बनाना और सामाजिक एवं मानवीय प्रबंधन स्थापित करना है। देश को चलाना यह बात भी अपने आप में महत्वपूर्ण है।


 कुछ आलोचक धार्मिक, वैचारिक वह राजनीतिक रूप से 'अनिवार्य मिलिट्री सेवा' विकल्प को लेकर परेशान नजर आ रहे हैं। ऐसे लोगों को मैं यह कहना चाहता हूं कि भारतवर्ष की सांस्कृतिक विरासत के मूल में राष्ट्रवाद निहित है। यहां सब धर्मों से बढ़कर राष्ट्रवाद का सूरज चमकता है। यहां सूर्य की पहली किरण जब हिमालय पर्वत पर पड़ती है तो उसके प्रकाश से संपूर्ण भारतवर्ष उज्जवल सितारे की तरह चमकता है। ऐसे में भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य बन जाता है कि देश की सुरक्षा वह इस प्रकार करे जैसे वह अपने घर की सुरक्षा करता हो। 

यह देश भारत के प्रत्येक युवा के सपनों का देश है। इसलिए इस देश के विकास और प्रगति के लिए और रक्षा सुरक्षा के लिए सभी की सहभागिता अत्यावश्यक है। देश के युवाओं से अपेक्षा अधिक है। इतिहास इस बात का गवाह है कि कई विदेशी आक्रांता हमारे देश में आतंक के मकसद से आए और हमें नुकसान पहुंचाया। हमारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। अगर हमारी सुरक्षा व्यवस्था और एकता बनी रहती तो हम अंग्रेजों के गुलाम न होते। हम भारतीयों ने उपनिवेशवाद की लंबी यात्रा के बाद अपनी निजी विकास की यात्रा स्थापित की है। इसलिए हम सब का परम कर्तव्य बनता है कि समाज और देश के विकास में, मानवता के विकास के लिए कोई भी छोटा या बड़ा कार्य हो, उसमें प्रत्येक नागरिक का अंशदान होना चाहिए। भारत सभी धर्मों का देश है और राष्ट्र की प्रगति, उन्नति, सुरक्षा के लिए मानवता सबसे बड़ा धर्म है। मानवता की रक्षा के लिए 'अनिवार्य मिलिट्री सेवा' विकल्प बहुत जरूरी है। भारत का प्रत्येक नागरिक प्रशिक्षित और सैन्य क्षमताओं से पूर्ण प्रशिक्षित हो ऐसी व्यवस्था को जमीनी स्तर पर उतारने की योजना का स्वागत करना चाहिए।

            कुछ आलोचकों द्वारा यह कहा जा रहा है कि अनिवार्य मिलिट्री सेवा के लिए 'समय बहुत कम है।' परंतु यह उतना महत्वपूर्ण नहीं कम समय में भी देश का युवा सेना को शत प्रतिशत योगदान दे सकता है। यह तो कार्यशैली पर निर्भर करता है कि किस तरह कम समय में सटीक एवं प्रभावपूर्ण नेतृत्व द्वारा देशहित के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए कार्य को पूर्ण किया जा सकता है। कम समय में अधिक से अधिक युवाओं को प्रशिक्षित करके देश सेवा के प्रति समर्पण का भाव जागृत हो सके यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। यह भविष्य का शुभ संकेत है। इससे सेना का तो हित होगा ही साथ ही देश का, देशवासियों का भी हित संभव है।

हम भारतीयों ने उपनिवेशवाद की लंबी यात्रा के बाद अपनी निजी विकास यात्रा प्रारंभ की है। भारत विविधता में एकता, वसुधैव कुटुंबकम, सर्वधर्म समभाव की नीति अपनाने वाला राष्ट्र है, यहां मानवता श्रेष्ठ धर्म है।

दुश्मन राष्ट्र हमारी सरहद पर बैठा है। अनिवार्य मिलिट्री सेवा के विकल्प पर अगर अभी भी कोई तटस्थ रहता है तो वह अपराधी है। 

'क्योंकि

" समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध 

जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध।"

क्रमशः...... 

बुधवार, 26 जुलाई 2023

भाग - दो *क्या अनिवार्य मिलिट्री सेवा से सेना का हित होगा ? पक्ष और विपक्ष* ©डॉ.चंद्रकांत तिवारी

 *क्या अनिवार्य मिलिट्री सेवा से सेना का हित होगा ? 

विपक्ष-* 

©डॉ चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत 


'यह गहन प्रश्न है कैसे रहस्य बताऊं 

पेशेवर सेना के गीत कैसे-कैसे बतलाऊं 

यहां सरहद पर खून की होली होती है 

आंसुओं से भीगा दामन और चोली होती है।'


यह कैसी विडंबना है? अनिवार्यता का कैसा यक्ष प्रश्न है? क्या यह बैठी हुई डाल को काटने के सामान न होगा? यह तो स्वयं के पैर को कुल्हाड़ी पर मारने के समान है। स्वरचित पंक्तियों के माध्यम से मैं अपनी बात कहना चाहता हूं कि बालक अगर अंगारों से खेलना चाहे तो उसे यह करने नहीं दिया जाता। हाथ बढ़ाकर आसमान के तारे नहीं तोड़े जाते हैं। हर लक्ष्य तक विजय प्राप्त करने के लिए एक कुशल रणनीति का होना अति आवश्यक है। और कुशल रणनीति के लिए अभ्यास के साथ-साथ समय की भी जरूरत होती है। कम समय में पेड़ की जड़े भी मजबूत नहीं होती और ना ही उसकी शाखाएं उतनी परिपक्व हो पाती हैं। जितनी कि हम उस पेड़ से अपेक्षाएं रखते हैं। कच्ची मिट्टी का घड़ा भी अधिक देर तक जल को संचित नहीं रख सकता है। जिन पत्थरों का एक निश्चित आकार नहीं होता वह नदी के बहाव की दिशा में बह जाते हैं। ऊंची इमारत बनाने में नींव के पत्थरों को भी समय देकर तराशा जाता है। छैनी और हथौड़े की एक-एक चोट से उसके आकार को साकार किया जाता है। तब जाकर एक मजबूत इमारत खड़ी होती है।

 ठीक उसी प्रकार मनुष्य भी है उसको भी वस्तुओं को सीखने में समय लगता है। जल्दबाजी में किया गया कार्य हमेशा गलत परिणाम ही देता है। क्रोध में मीठी बात भी बुरी लगती है महोदय। कार्य की सफलता उसके उद्देश्यों में ही निहित होती है।

            निश्चित अवधि के लिए सेना के द्वार नहीं खोले जा सकते। यहां इनकमिंग समर्पण, देश सेवा, राष्ट्रभक्ति, अनुशासन और भारत माता की जय से प्रारंभ होती है और जब एक सैनिक की आउटगोइंग होती है तो वह तिरंगे का दामन लपेट कर, परम विजयी होकर परमवीर चक्र विजेता कहलाता है।

            आज अनिवार्य मिलिट्री सेवा की जो बातें चल रही हैं इसमें सेना का विशेष हित नहीं दिखता। यह एक बिना उद्देश्य की योजना है। क्या पैसा बचाना उद्देश्य है? या एक कुशल सेना का गठन करना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए? यह सोचने की बात है महोदय हम देश की सुरक्षा व्यवस्था से कोई समझौता नहीं कर सकते सरकार जो 'टूर आफ ड्यूटी' के विकल्प के साथ 'अनिवार्य सैन्य सेवा' को लेकर प्रस्ताव रख रही है यह अकुशल लोगों को सेना में प्रवेश दिलाकर सेना को कमजोर करने वाली बात होगी।

            अनिवार्य मिलिट्री सेवा के नाम पर देश के युवाओं को मात्र 3 वर्ष सेना में प्रवेश दिला कर क्या हम एक मजबूत सेना का गठन कर पाएंगे?

            'टूर आफ ड्यूटी' के विकल्प को अपनाकर हम क्या पूर्ण रूप से प्रशिक्षित सेना का निर्माण कर पाएंगे?

            मैं यह स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूं कि भारतीय सेना कोई टूरिस्ट प्लेस नहीं है कि यहां तीन वर्ष आओ और जाओ..! सेना की रणनीति को समझने के लिए 3 वर्ष का समय ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।

यूनिट में आकर ऑफिसर्स और सेना के जवान को कई कोर्स करने होते हैं। जैसे 'यंग ऑफिसर्स कोर्स' समय-समय पर कराए जाते हैं। केवल अकादमी में ही ट्रेनिंग नहीं होती है। अकुशल व्यक्ति को सेना में कम समय के लिए रखना एकदम खतरे का काम है। अनिवार्य मिलिट्री सेवा से तो बेहतर यह होगा कि वर्तमान में जो अधिकारी हैं उनसे ही काम लिया जाए या फिर नए पदों को भरने के लिए अधिक से अधिक विज्ञप्तियां निकाली जाएं।  

वर्तमान सेना की संख्या बढ़ाने के लिए राज्य स्तर, जिला स्तर, तहसील स्तर, ब्लॉक स्तर, विश्वविद्यालय, महाविद्यालय या फिर विद्यालय स्तर पर भर्ती रैली का आयोजन किया जाए। साथ ही विद्यालयी शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय शिक्षा तक रक्षा- सुरक्षा, डिफ़ेंस स्टडीज एवं मेकैनिज्म अनिवार्य विषय को पाठ्यक्रम के केंद्र में लाया जाए। मानसिक और शारीरिक रूप से युवाओं को मजबूत बनाने के लिए योगाभ्यास को अनिवार्य किया जाए। NCC और NSS से सहयोग लिया जाए। शिक्षा, चिकित्सा और कृषि के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के भाव पैदा किए जाएं। राष्ट्र सेवा के लिए उपर्युक्त तीनों विषयों में कई क्षेत्र खुले हैं। युवाओं को बस दिशा देने की देर है। देश में NCC और NSS की इतनी शाखाएं हैं कि यहां काम करने वाले वॉलिंटियर्स को सेना की मुख्य धारा से जोड़ा जा सकता है। अगर देशभक्ति, राष्ट्रवाद, देश सेवा की बात है तो मात्र 3 वर्ष के लिए ही क्यों ? या कम समय के लिए ही क्यों ? कम से कम 10 वर्ष या उससे अधिक क्यों नहीं?

अगर हम इजराइल, रूस, उत्तर कोरिया, दक्षिण कोरिया, नार्वे, स्विजरलैंड, तुर्की, ग्रीस, ईरान या क्यूबा जैसे देशों से अगर हम अपनी तुलना करने की सोच रहे हैं तो अनिवार्य सेना के विकल्प वाली बात समझ से परे है। भारत एक विकसित राष्ट्र नहीं है। हमारा देश अभी विकास कर रहा है। हमारा सामाजिक, राजनीतिक और भौगोलिक परिवेश हमें इस बात की इजाज़त नहीं देता कि हम सैन्य संसाधनों एवं सुरक्षा चक्रों की गोपनीयता को समाज के समक्ष लाकर अनिवार्य सैन्य विकल्प को प्रस्तुत करते हुए रक्षा सूत्रों को सांझा कर दें।

आर्मी की सर्विस 3 साल देकर क्या हम युवाओं को प्राइवेट इंडस्ट्रीज के लिए छोड़ दें? यह तो प्राइवेटाइजेशन को बढ़ावा देने वाली बात हुई। कम से कम हमें सेना को प्राइवेटाइजेशन से दूर रखना चाहिए। एक परिपक्व युवा को प्रशिक्षित अधिकारी बनने में बहुत लंबा समय लगता है और फिर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी बहुत जरूरी है। क्या इन बातों से समझौता किया जा सकता है?   

            हम कैसे भूल गए कि हमने सन् 1962, सन् 1971, सन् 1999 और प्रत्येक दिन LOC/LAC पर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से युद्ध के माहौल से गुजर रहे हैं? क्या ऐसे में यह सही रहेगा कि हम कम प्रशिक्षित लोगों को सेना की मुख्यधारा से जोड़ दें?

            'अनिवार्य मिलिट्री सेवा' विकल्प के तहत इस फार्मूले को देश की आंतरिक व्यवस्था सुधारने के लिए कुछ क्षेत्र में अपनाया जा सकता है। जैसे भूस्खलन प्रभावित क्षेत्र, बाढ़ प्रभावित क्षेत्र, भारत के तटवर्ती क्षेत्रों में, आपदा प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण, केंद्र तथा राज्य स्तर की पुलिस फोर्स के अकादमिक तथा कार्यालयी कार्यों में, राज्य लोक सेवा आयोग से संबंधित क्षेत्रों में, देश की बहुचर्चित इमारतों, मंदिरों की सुरक्षा आदि क्षेत्रों में इस फार्मूले को अपनाकर प्रभावी बनाया जा सकता है। उपर्युक्त इन सभी क्षेत्रों में देश का युवा वर्ग अपनी शत-प्रतिशत सहभागिता निभाएगा।

आज हमें सेना में सूचना तकनीकी को और अधिक सक्रिय एवं मजबूत करने की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इस दिशा में कुछ वर्षों की शॉर्ट सर्विस या 'अनिवार्य सैन्य सेवा' फार्मूले को नहीं अपनाया जा सकता है। क्योंकि सूचना एवं तकनीकी तंत्र देश की सुरक्षा का मामला है यहां समझौता करना ठीक नहीं। सूचना और तकनीकी के क्षेत्र में सेना को तो स्थाई रूप से मजबूत बनाना समय की मांग है। हमें 'अनिवार्य सैन्य सेवा' फार्मूले को वर्तमान की 'प्रादेशिक सेना' के विकल्प के रूप में अपनाना चाहिए।

वैसे भी देश के युवाओं को अगर राष्ट्र सेवा करनी है तो अन्य बहुत सी ऐसी संस्थाएं हैं, अन्य बहुत से ऐसे कार्य हैं, कई क्षेत्र हैं जहां 3 वर्ष क्या उससे भी अधिक वर्षों तक सेवा दी जा सकती हैं। देश का युवा मस्तिष्क अन्य कई क्षेत्रों में जैसे शिक्षा, चिकित्सा, कृषि में प्रयोग में लाया जा सकता है। जिससे ब्रेन ड्रेन जैसी समस्या का निवारण भी हो जाएगा। परंतु क्या महज 3 वर्ष देश के युवा को अनिवार्य सैनिक सेवा दिलाकर हम अपनी ही राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक व्यवस्था को कमजोर न कर देंगे। कम समय के लिए आने वाले युवा वर्तमान सैन्य अधिकारियों से कैसा समायोजन रख पाएंगे यह भी अपने आप में विचारणीय प्रश्न है। इस प्रकार से तो हम एक कमजोर व्यवस्था बना रहे हैं। जो देखने में तो अच्छी होगी परंतु कार्यकुशलता और नेतृत्व में दीमक खाई हुई लकड़ी की तरह होगी। जो ना मजबूत आधार दे पाएगी और ना ही एक मजबूत सुरक्षा चक्र स्थापित कर पाएगी। हमें एक मजबूत राष्ट्रीय सुरक्षा चक्र स्थापित करना है तो हमें कम से कम 10 से 15 वर्ष तक 'अनिवार्य मिलिट्री सेवा' के लिए देश के युवाओं का चयन करना होगा और शारीरिक, मानसिक मापदंडों में कोई समझौता नहीं करना होगा।

हमारे सामने अतीत की कई कड़वी यादें हैं। हम अतीत और आज वर्तमान में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से आतंकवाद, नक्सलवाद से जूझ रहे हैं। क्या तीन वर्ष की सेवा लेकर इन युवाओं को प्राइवेट इंडस्ट्रीज के लिए छोड़ दें? क्या सुरक्षा चक्रों की गोपनीयता को साझा कर दें? क्या देश की सुरक्षा व्यवस्था के साथ यह उचित होगा?

क्या सरकार अपनी कलम से वीरों का भाग्य इस तरह लिखेगी? जिन वीर सैनिकों ने देश पर सर्वस्व लुटा दिया उनकी जगह अनुभवहीनों का चयन कहां तक न्याय संगत है? राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की यह पंक्तियां ऐसे ही वीर भारतीय सैनिकों की जय बोलेगी जिनकी बदौलत हम आज यहां हैं-

'जला अस्थियां बारी-बारी 

चिटकाई जिनमें चिंगारी 

जो चढ़ गए पुण्यवेदी पर 

लिए बिना गर्दन का मोल

कलम आज उनकी जय बोल।'

___________________

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

असिस्टेंट प्रोफेसर हिंदी- 

इंडियन मिलिट्री एकेडमी 

 ((वर्तमान  - राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय थलीसैंण, पौड़ी गढ़वाल- उत्तराखंड ))

देहरादून, उत्तराखंड, भारत

            


भारतीय चिंतन परंपरा एवं श्रीमद्भागवत गीता-- ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी


 भारतीय चिंतन परंपरा एवं श्रीमद्भागवत गीता-- 

© डॉ. चंद्रकांत तिवारी ( उत्तराखंड प्रांत)

मध्य हिमालय की उपत्यकाओं के मध्य, प्रकृति की परिधि के मध्य, मनुष्य की समाधि की परिधि की गहराइयों से, एकांत का केंद्रीयकृत नैसर्गिक आकर्षण, युगबोध की संस्कृति का अमर-जयघोष, जीवन संस्कृति के मूल्यांकन की गहराईयों की सभ्यताओं से निकला हुआ, अमृत मंथन के समान अमृत कलश भारतीय चिंतन परंपरा का स्वाभाविक विकास है। यह एकांत की संस्कृति का जयघोष है और प्रकृति का नाद् -मय सौंदर्य। एकांत के गर्भ से उपजा हुआ जीव मात्र की चिंतन धारा का स्वाभाविक विकास। यह किसी ग्रंथ का आधार नहीं अपितु संपूर्ण विश्व के आदि ग्रंथ इसी एकांत की संस्कृति के आधार ग्रंथ हैं। यही मानवता का सच्चा विकास है। यही अद्वैतवाद की संस्कृति का नाद् -मय सौंदर्य चित्रण भी है। यही भारतीय चिंतन परंपरा का स्वाभाविक विकास भी और यही भारतीय चिंतन की प्रक्रिया का मूल मंत्र भी।

" गाय, गंगा, गीता और गांँव की आधार संस्कृति का यथार्थ भी।"

साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है। एक ऐसा विकास जो मनुष्य को मनुष्य बने रहने की शिक्षा देता है। यह मौखिक भी हो सकता है और लिखित भी। परंतु वास्तविकता यह है कि साहित्य का लिखित रूप मानव जीवन की संचित राशि का कोश है और ऋषि मुनियों की आजीवन तपस्या का सकारात्मक प्रतिफल भी है। जो मानव सभ्यता को प्रकृति के साथ मिलाकर रहने की भावना का विकास भी कराता आया है। अर्थात मानव और प्रकृति का तादात्म्य स्थापित करता है। प्रकृति की गोद में बैठकर ही भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों का चिंतन किया जा सकता है। जब से प्रकृति का निर्माण हुआ है, यह धरती ने अपना अस्तित्व इस समस्त आकाशगंगा के परिदृश्य में स्थापित किया है। तब से प्राणी जगत की उत्पत्ति और उसके विकास के कथा का चिंतन, जन्म मरण का चिंतन, यश और वैभव का चिंतन, वीर और कायर का चिंतन, अपने और पराये का चिंतन, मानव सभ्यता का चिंतन, सजीव और निर्जीव का चिंतन, प्राणी जगत की उत्पत्ति का चिंतन, और इस समस्त भूमंडल का चिंतन, एक छोटे सा कण जो उदासीन बनकर इस भूमंडलीय परिदृश्य पर विचरण करता है, उसका चिंतन उदासीन पड़े मानव जीवन की भांति ही उस सूक्ष्म कण का वैज्ञानिक एवं दार्शनिक रूप से चिंतन, यह सब बिंदु चिंतन परंपरा की उत्पत्ति एवं विकास की प्रक्रिया के सतत विकासात्मक गति की चिंतन प्रक्रिया के ही कई आयाम है। इन आयामों से गुजरते- गुजरते मानव सभ्यता भी कभी रामायण तो कभी महाभारत के दृश्य दिखाती है। कभी इस धरती पर अपने आराध्य देव को बुलाने पर मजबूर हो जाती हैं। स्थिति इस जग की कुछ ऐसी है। जब- जब मानव सभ्यता बुरी आत्माओं के वशीभूत होकर मानवों का ही विनाश करने पर हावी हो जाती है तो ईश्वर को स्वयं धरती पर अवतारी पुरुष के रूप में प्रकट होना पड़ता है।यह गीता का उपदेश है जो स्वार्थ पर परमार्थ का, यथार्थ पर निहितार्थ का, असत्य पर सत्य का, मरहम बन कर सामने आता है और शीतलता प्रदान करता है। यही मानव सभ्यता का इतिहास है। यही कुरुक्षेत्र की विभीषिका की विध्वंसलीला का प्रमाण भी है। यही धरती पर अपने आराध्य देव को बुलाकर समर्पण का भाव भी दर्शाता है। जब -जब इस धरती पर धर्म पर अधर्म हावी होता है, तब -तब प्रभु स्वयं धरती पर अवतरित होकर मानव के कल्याण के परमार्थ का कारण बनते हैं। 

यह जीवन एक ऐसा रण क्षेत्र है जहां हर कुशल योद्धा निहत्था रह जाता है और उसकी नियति निहत्था बनकर युद्ध करने की रह जाती है। प्रभु स्वयं अपनी अमर वाणी से मानव सभ्यता का कल्याण करते हैं। यह जीवन एक कुरुक्षेत्र का रणक्षेत्र है। इस रणक्षेत्र में अपने आप में सक्षम होने के बावजूद भी अर्जुन जैसा योद्धा भी श्रीकृष्ण की दिव्य वाणी से अपने आप को ताजा महसूस करता है और गांडीव लेकर युद्ध करने को तत्पर होता है। बिना गुरु के ज्ञान संभव नहीं। स्वयं प्रभु श्रीकृष्ण जो मानव धर्म के प्रजा पालक हैं, लोक कल्याणकारी हैं, संपूर्ण जगत में धर्म की स्थापना करने के लिए अवतरित हुए हैं और कुरुक्षेत्र के रण क्षेत्र में महाभारत के नायक अर्जुन को कर्म की शिक्षा देते हैं। स्वयं उसका सारथी बनकर रणक्षेत्र में गीता के ज्ञान की अपार राशि लुटाते हैं। यह एक ऐसा गहरा चिंतन है जिसके मूल में ऋषि-मुनियों की तपस्या का फल प्रतिबिंबित होता है। यही भारतीय चिंतन की परंपरा का प्रतिफल है और मानव जीवन के कल्याण का सकारात्मक प्रयत्न भी। यह एक ऐसा पद है जिस पर सरलता एवं सहजता से मानव सभ्यता का इतिहास अपने स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। भारतीय चिंतन की परंपरा में सनातन धर्म पद्धति सबके कल्याण की भावना और वसुधैव कुटुंबकम् का मंत्र समाहित होते हुए, अतिथि देवो भव का भाव भी प्रतिबिंबित होता है। भारतवर्ष का इतिहास यहां का रहन-सहन यहां की सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक स्थितियों के साथ-साथ राजनीतिक एवं भौतिक परिवेश भी उपर्युक्त कई बिंदुओं को प्रभावित करने वाले कारक के रूप में प्रकट होता है। यह भारतीय चिंतन की परंपरा का आदि स्रोत है और भारतीय चिंतन की वैश्विक स्तर पर ख्याति का आधार स्तंभ भी है। एक ऐसी परंपरा जिसे जानने के लिए इतिहास के प्राचीन स्रोतों को चिंतन एवं मनन के स्तर पर समझने एवं समझाने की आज वर्तमान समय में महत्वपूर्ण आवश्यकता है। 

सिंधु घाटी सभ्यता के इतिहास के काल खंडों को लेकर आज वर्तमान समय तक इतिहास एवं साहित्य के काल खंडों के अतीत का अध्ययन करते हुए उसका दार्शनिक मूल्यांकन एवं आंकलन किया जाए तो सब के मूल में संपूर्ण भारतीय संस्कृति, समाज, भाषा, सभ्यताएं अपना नवीन मार्ग तय कर रही हैं। यही भारतीय संस्कृति की चिंतन परंपरा का आदि स्रोत है। भारतीय चिंतन परंपरा का वैश्विक आधार भी इन्हीं प्रमुख बिंदुओं में प्रकट होता है। हमारा साहित्य हमें वैश्विक स्तर पर चिंतन के विभिन्न आयामों को स्थापित करने की शक्ति एवं बल देता है। चारों वेद ग्रंथ, वेदांग, उपनिषद, धर्म-ग्रंथ और भारत के आदि विश्वविद्यालय, भारतीय संस्कृति, समाज, सभ्यता एवं भाषाओं के साथ-साथ क्षेत्रीय बोलियां भी हमारी सभ्यता एवं संस्कृति का जयघोष स्थापित करती हैं। सब के मूल में भारतीय चिंतन परंपरा का विकास है। यह साधारण बात नहीं स्वयं में असाधारण विषय है। इसीलिए कहा गया है कि साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है। संचित राशि का आदि कोष है। भारतीय चिंतन परंपरा का विकास है। यह भारतीय चिंतन परंपरा किसी एक व्यक्ति की निजी भावना नहीं अपितु संपूर्ण मानवीय सभ्यता की चिंतन धाराओं एवं सभ्यताओं का परंपरागत, नैतिक, अमूल्य, अनवरत, अनगिनत, अगणित, अव्याप्त, अतुलनीय, अनुपम, असंख्य आकर्षणों की चेतनाओं का चिंतन विकास है। अतीत के गर्भ से निकलने वाले अमृत कलश की बूंदों से नवयुग की लालिमा का विकास है। समुंद्र मंथन से निकलने वाले अमृत की बूंदों के मध्य विष को पीने वाले शिव अर्थात विष को भी सरलता एवं सहजता से प्राप्त करने वाले आदि पुरुष की चिंतन परंपरा है। 

भारतीय चिंतन परंपरा को ढूंढने के लिए किसी पद एवं प्रतिष्ठा की कोई अभिलाषा नहीं होनी चाहिए। अगर उस चिंतन परंपरा को यथार्थ के धरातल पर ढूंढना है तो व्यक्ति एवं मानव सभ्यता को स्वयं के भीतर अपने ईश्वर को तलाश करना होगा। वह किसी रण क्षेत्र में नहीं मिलेगा और नहीं देवालय में मिलेगा। मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर में नहीं मिलेगा। यह कोई वेद ग्रंथ या कुरान बाइबल या गुरु ग्रंथ साहब, अगर वह चिंतन परंपरा हम सबको प्राप्त होगी तो हमारी स्वयं की आत्मा एवं हमारे मन के भीतरी आवरण चित्र में दिखाई देगा। कहा भी गया है कि ईश्वर कण कण में विराजमान है। हिंदी साहित्य का भक्ति काल और संतों की आदि परंपरा जिसमें निर्गुण और सगुण दोनों ने ही अपने-अपने स्तर से अपने आराध्य देव को अपने स्वयं के भीतर ढूंढने का प्रयास किया। यही भारतीय चिंतन परंपरा का मूल है। जिससे अनपढ़ और बड़ा ज्ञानी व्यक्ति कबीर घट- घट में प्राप्त करता है। बंद आंखों से जिसे सूरदास जैसी कविता बाल लीलाओं का वर्णन करती है। प्रेम की पीर में मग्न कवि मलिक मोहम्मद जायसी जिसके मूल के अर्थों में ही स्वयं को पाता है और लौकिक-अलौकिक की जिज्ञासाओं को समझने का प्रयास करता है। स्वयं अपने को दास भाव से समर्पित पूजा अर्चन करने वाला कवि तुलसीदास प्रभु श्री राम के दिव्य अलौकिक रूप को रामचरित्र मानस में साकार करता है। यह सब भारतीय परंपरा का चिंतनीय विकास ही तो है। जिसे आधुनिक काल में कवि जयशंकर प्रसाद चिंता से आनंद लोक की अमर यात्रा का वर्णन करते हुए अपनी चिंतन परंपरा को समझने एवं समझाने का प्रयत्न कर रहे हैं। संपूर्ण हिंदी साहित्य भी अतीत एवं वर्तमान के काल खंडों से होते हुए सतत विकासात्मक नदी की तरह भारतीय चिंतन परंपरा के कई विविध आयामों को रेखांकित करता हुआ बढ़ रहा है।

गीता में कर्म योग का संदेश मनुष्य को भौतिक जगत में जीने की प्रेरणा देता है। आज संपूर्ण समाज के समक्ष अगर कोई व्यक्ति बुरी आत्माओं की परिधि में स्वयं कैद हो जाता है तो गीता का संदेश उसका मार्गदर्शन तय करता है। यह वही संदेश है जो अर्जुन जैसे गांडीवधारी वीर धुरंधर योद्धा को रणक्षेत्र में अग्निकुंड के समान वीर पुरुष बना देता है। यह भारतीय चिंतन परंपरा का ही ज्वलंत प्रमाण है कि व्यक्ति लक्ष्य विहीन होने के बावजूद भी सकारात्मक जीवन दृष्टि को धारण करते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सक्षम होता है। यह साधारण बात तो है परंतु इस साधारण बात के भीतर भारतीय चिंतन परंपरा की असाधारणता गहराई से अपनी जड़े जमाई हुई है।

हमारी भाषा एवं बोलियों में, संस्कृति एवं समाज में, तीज़ एवं त्योहारों में, तीर्थ स्थानों में, रहन-सहन, खान-पान, भाईचारे आदि बिंदुओं में भारतीय चिंतन परंपरा का विकास झलकता है। पर्वतीय प्रदेशों की सरलता एवं सहजता में, तराई क्षेत्र की जीवन शैली में, संपूर्ण जगत की चराचर सभ्यताओं में, भारतीय चिंतन परंपरा का स्थाई विकास अनवरत रूप से गतिमान है। हमारे देश में गाय, गंगा और गीता की पवित्रता में चिंतन धारा का सतत विकास अपना अजस्र स्रोत लिए हुए बह रहा है और संपूर्ण मानव जगत को कर्म योग की शिक्षा दे रहा है।


Fb- chandra Tewari 

थलीसैंण - डॉ चंद्रकांत तिवारी-पौड़ी गढ़वाल

"थलीसैंण" - स्वरचित कविता - डॉ. चंद्रकांत तिवारी - स्वरचित कविता -

fb-Chandra Tewari 

पौड़ी - गढ़वाल-उत्तराखंड प्रांत 


 सुबह हो गई भोर तिलक-सा

प्रखर-रश्मियां स्वेत वसन-सा

मस्तक उज्ज्वल यश गाता है

विश्व मुकुट-सा हिमसागर सेमल

हिम-देवालय हेमल चमकाता है।


सिंधु धरा-सा दक्षिण सागर 

उत्तर विश्व हिमालय सागर

मध्य हिमालय का रचना खंड

दिव्य भाल-सा उत्तराखंड।


बहती नदियों की जल धारा

करती कल-कल गंगा धारा

मानस -केदार की मीठी बोली 

निर्झर-सी बहती दूधातोली।


दिव्य शिलाओं की चोटी से सूरज की किरणें अभिसार हुई

थलीसैंण के प्रांगण में मां सरस्वती की तान हुई

गूंँज उठी देवभूमि की धरती

पावन किरणें मनुहार हुई

ऊंँची पावन शीला पर दीबा देवी मंदिर की जयकार हुई ।


उर्मि रश्मियां धीरे-धीरे चौरीखाल से आती हैं 

शांत तिमिर-घाटी थलीसैंण को 

पलभर में चमकाती हैं

ऊंँचे-अडिग चीड़ों के वैभव 

देवदार की हरियाली

प्रहरी भूतल - गवाक्ष खड़े

निज प्रतिनिधि बीजों से बढ़े 

श्वेत हिम शिखरों की लाली

वसुधा बहती-पूर्वी न्यार

लहराती हरियाली खेतों में बाली

कंठ-शीतल कल-कल मृदु-मनुहार

क्षितिज परिधि थलीसैंण साकार

अपनी गंगा -पूर्वी न्यार ।


ऊंँचे पर्वत गांँव- गंगा की धार

हिमालय के गांँव ईगास-बग्वाल

थलीसैंण की घाटी-पौड़ी गढ़वाल 

दूधातोली पर्वत की सांँझ निराली

बाघों के जंगल बांँझ-वृक्ष हरियाली 

सड़कें छोटी सर्पीली - बर्फीली धार

पुण्य मिले यहांँ दीवा देवी बारंबार ।


हंसेश्वर-बिंदेश्वर शिव प्रदेश परिधि में मिलता 

थलीसैंण की घाटी में किरण सूर्य-सा खिलता 

दिव्य हिमालय की यह गाथा 

ज्ञान मनोहर की अभिलाषा

कंकड़ कंकड़ यश गाता है

पर्वत का मानस पुत्र यहांँ

श्रम कण का बरसाता है 

हे दिव्य हिमालय तेरी धरती 

निज कोना-कोना गाता है 

थलीसैंण की घाटी में 

सूर्य-कमल दल खिलता है 

चौरीखाल के जंगल में 

बाघों का डेरा मिलता है

असंख्य खग कुल का वैभव यहांँ 

निज दिव्य हिमालय ढलता है

सेमल-सा हेमलता हिम शिखरों का जल

जब धरा वसन मुख भरता है ।


है प्रखर ज्योति की उज्ज्वल आभा 

नदियों की कलकल धारा 

यह दुधातोली की पर्वतमाला

झरने का कलरव गाता है

थलीसैंण की घाटी-पौड़ी में 

किरण सूर्य-दल खिलता है।


पावन रज किरणों का रथ

जब धीरे-धीरे आता है

थलीसैंण का दिव्य भाल

धीरे-धीरे चमकाता है।


वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की यश गाथा है

मध्य हिमालय का भूखंड थलीसैंण कहलाता है।

ऊंँचे ऊंँचे शैल खंड वीरों का मस्तक ऊंँचा करते

कलकल बहती नदियांँ तन शीतल मन हरते।


मातृभूमि-पुण्यभूमि तेरी जय हो 

थलीसैंण यश गायेगा

विवेक-ज्ञान, यश-वैभव का 

सूर्य हिमालय लायेगा।

उत्तराखंड के विकास के लिए - डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

 उत्तराखंड के विकास के लिए -  डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत 

उत्तराखंड के विकास के लिए कई प्रमुख मुद्दों पर सरकार को कार्य करना चाहिए। जिनमें मुख्य रुप से शिक्षितों की बढ़ती बेरोजगारी, विद्यालय और उच्च शिक्षा में गुणवत्ता और सुधार, स्वास्थ्य और चिकित्सा के साथ-साथ महिलाओं की सुरक्षा, शहरी क्षेत्रों में प्रदूषण की गंभीर समस्या, कृषि एवं घरेलू उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए, साथ ही एक गंभीर समस्या जो उत्तराखंड की है वह पलायन को लेकर है। यहां पलायन कुछ इस कदर है कि गांव के गांव खाली हो चुके हैं। आज तक कोई भी सरकार इस दिशा में कोई गंभीर प्रयास नहीं कर पायी है। अगर सरकार की ओर से कोई गंभीर प्रयास हो भी रहा है तो वह यथार्थ रूप से सामने नहीं दिखता। सरकार को शिक्षित बेरोजगारों को अपने ही क्षेत्र में रोजगार देकर, घरेलू उद्योगों को स्थापित एवं पुनर्जीवित करके, नए विद्यालय, विश्वविद्यालय बनवाकर, निष्पक्ष योग्य अभ्यर्थियों का चयन करके, उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति के अनुरूप, नई-नई योजनाएं लाकर पर्वतीय प्रदेशवासियों को आत्मनिर्भर के साथ-साथ आत्म सम्मान से अपनी संस्कृति और परिवेश से जोड़कर रखना है। यही उत्तराखंड के विकास का मूल मंत्र है। कि वह अपनी जड़ों से भी जुड़े रहें और अपने ही क्षेत्र में रोजगार भी करें। जिससे पलायन जैसी गंभीर समस्या का निदान हो सकेगा।

For the coming years, the government along with the teachers will have to continuously improve the standard of school education. For this, first of all, qualified teachers and continuous and active energetic teachers have to be selected in the education system. Such teachers who will have to dedicate their moral duty to the interest of the students and first of all the provision of material and educational resources to the school education system will have to be made 100% accessible by the administration.

In the technological age of ICT, teachers also have to be made proficient. For this, DIET, SCERT, NCERT at the district level for teacher training and in the field of higher education and school education, private institutions, NGOs, Teaching Learning Center can play an important role.

In the field of education, efforts should always be made for a better future at school, college and university level. With this hope and belief...

ग्रामीण क्षेत्रों को केंद्र बनाकर शिक्षा, चिकित्सा, कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों का विकास करके पलायन जैसी गंभीर समस्या को दूर किया जा सकता है।