रविवार, 14 सितंबर 2025

हिंदी भाषा शिक्षण में सॉफ्टवेयर आधारित शिक्षण: सरल, रोचक और स्थायी तरीका- ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

हिंदी भाषा शिक्षण में सॉफ्टवेयर आधारित शिक्षण: सरल, रोचक और स्थायी तरीका-

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

डिजिटल युग में हिंदी शिक्षण की आवश्यकता-

आज के डिजिटल युग में शिक्षा केवल पुस्तकों और कक्षा तक सीमित नहीं रही। तकनीकी विकास ने भाषा शिक्षण में भी क्रांतिकारी बदलाव लाए हैं। हिंदी, भारत की राजभाषा और विश्व की सबसे व्यापक रूप से बोली जाने वाली भाषाओं में से एक, सीखने में कभी-कभी कठिन प्रतीत हो सकती है। परंतु, विभिन्न शिक्षण सॉफ्टवेयर और डिजिटल टूल्स के माध्यम से हिंदी भाषा सीखना अब पहले से कहीं अधिक सरल, रोचक और स्थायी बन गया है।

हिंदी भाषा शिक्षण के उद्देश्य केवल व्याकरण और शब्दावली तक सीमित नहीं हैं। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों में सुनने, बोलने, पढ़ने और लिखने की क्षमता का विकास करना भी है। आधुनिक सॉफ्टवेयर इन चारों क्षेत्रों में सहज और प्रभावी तरीके से मदद कर सकते हैं। इस शोध आलेख में हम विस्तार से समझेंगे कि हिंदी भाषा शिक्षण में सॉफ्टवेयर का उपयोग कैसे किया जा सकता है और यह किस प्रकार से शिक्षण को रोचक और स्थायी बनाता है।

व्याकरण और शब्दावली सुधारने वाले सॉफ्टवेयर-

शब्दावली और व्याकरण किसी भी भाषा की नींव होते हैं। बिना मजबूत नींव के भाषा सीखना कठिन हो जाता है। आज कई डिजिटल टूल्स इस क्षेत्र में उत्कृष्ट समाधान प्रदान करते हैं।

Duolingo-

Duolingo एक गेम आधारित भाषा सीखने का प्लेटफ़ॉर्म है। इसमें शब्दावली, वाक्य रचना और संवाद का अभ्यास स्तरानुसार कराया जाता है। विद्यार्थी यहां छोटे-छोटे अभ्यासों के माध्यम से भाषा सीखते हैं, जिससे सीखने में रोचकता और उत्साह बना रहता है।

Memrise-

Memrise का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह Spaced Repetition Technique का उपयोग करता है। इसका अर्थ है कि कठिन शब्द और वाक्यांश समय-समय पर दोहराए जाते हैं, जिससे उन्हें लंबे समय तक याद रखा जा सकता है।

Shabdkosh और अन्य शब्दकोश ऐप्स-

Shabdkosh जैसी ऐप्स छात्रों को सही अर्थ, पर्यायवाची और वर्तनी सीखने में मदद करती हैं। इनके द्वारा विद्यार्थी केवल शब्द याद नहीं करते, बल्कि उनका सही प्रयोग भी सीखते हैं।

इस प्रकार, व्याकरण और शब्दावली सुधारने वाले सॉफ्टवेयर छात्रों को हिंदी की नींव मजबूत करने में सक्षम बनाते हैं।


सुनने और बोलने के कौशल के लिए डिजिटल टूल्स-

हिंदी भाषा का अभ्यास केवल पढ़ने और लिखने तक सीमित नहीं होना चाहिए। बोलने और सुनने के अभ्यास के बिना भाषा पर पूर्ण नियंत्रण संभव नहीं है।

Rosetta Stone-

Rosetta Stone एक इमर्सिव लर्निंग टूल है। यह उच्चारण सुधारने और संवाद की क्षमता बढ़ाने में मदद करता है। इसके ऑडियो-वीडियो आधारित पाठ शिक्षार्थियों को वास्तविक जीवन के संवाद के समान वातावरण प्रदान करते हैं।

Google Translate Audio Feature-

यह टूल विद्यार्थियों को शब्द और वाक्य के सही उच्चारण को सुनने और अभ्यास करने की सुविधा देता है। इसे सुनते हुए और बोलते हुए भाषा का अभ्यास करना सरल और प्रभावी होता है।

YouTube शैक्षिक चैनल्स-

YouTube पर हिंदी सीखने के लिए कई चैनल्स उपलब्ध हैं, जैसे “Learn Hindi with HindiPod101”। ये चैनल्स कहानियों, संवादों और गीतों के माध्यम से भाषा को जीवंत बनाते हैं।

सुनने और बोलने के अभ्यास से छात्रों में भाषा की समझ गहरी होती है और उन्हें आत्मविश्वास के साथ हिंदी बोलने में मदद मिलती है।

पढ़ने और लिखने के लिए डिजिटल सॉफ्टवेयर-

हिंदी पढ़ने और लिखने की क्षमता विकसित करना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके लिए कई सॉफ्टवेयर और टूल्स उपलब्ध हैं।

Anki (Flashcards)-

Anki एक फ्लैशकार्ड आधारित ऐप है। यह स्पेस्ड रिपीटिशन तकनीक का उपयोग करके शब्दावली और वाक्यांश याद करने में मदद करता है।

Hindi Typing Master / KeyBlaze Typing Tutor-

ये टूल्स विद्यार्थियों को हिंदी टाइपिंग और लेखन कौशल विकसित करने में सक्षम बनाते हैं। नियमित अभ्यास से टाइपिंग स्पीड और सटीकता बढ़ती है।

StoryWeaver / e-Pustakalaya-

डिजिटल पुस्तकालय जैसे StoryWeaver छात्रों को हिंदी में कहानियाँ पढ़ने और समझने का अवसर प्रदान करते हैं। यह भाषा सीखने में सहजता और रुचि बढ़ाता है।

पढ़ने और लिखने के अभ्यास से विद्यार्थी भाषा में दक्ष होते हैं और उनकी भाषा की पकड़ मजबूत होती है।

बहुभाषी और इंटरैक्टिव शिक्षण प्लेटफ़ॉर्म-

आज के डिजिटल युग में भाषा शिक्षण को इंटरैक्टिव बनाने के लिए कई बहुभाषी प्लेटफ़ॉर्म उपलब्ध हैं।

Kahoot! और Quizizz-

ये प्लेटफ़ॉर्म गेम आधारित क्विज़ के माध्यम से छात्रों की भागीदारी बढ़ाते हैं। छात्रों को सीखने में मज़ा आता है और वे अपने ज्ञान का त्वरित मूल्यांकन भी कर सकते हैं।

Nearpod और Padlet-

Nearpod और Padlet जैसे टूल्स डिजिटल बोर्ड, नोट्स और इंटरैक्टिव गतिविधियों के माध्यम से सहयोगी और संवादात्मक सीखने का अवसर प्रदान करते हैं।

इंटरैक्टिव शिक्षण विधियाँ छात्रों में सीखने की रुचि बढ़ाती हैं और भाषा सीखने की प्रक्रिया को स्मरणीय और प्रभावी बनाती हैं।

शिक्षण की रणनीतियाँ: सॉफ्टवेयर का प्रभावी उपयोग-

1. सक्रिय अभ्यास (Active Learning)-

सॉफ्टवेयर के माध्यम से विद्यार्थियों को केवल सामग्री पढ़ने के बजाय संवाद, अभ्यास और खेल के माध्यम से सीखना चाहिए। यह सीखने को प्रभावी और रोचक बनाता है।

2. दृश्य और श्रव्य सामग्री (Visual & Audio Aids)&

वीडियो, ऑडियो और इमेज का उपयोग सीखने की प्रक्रिया को अधिक यादगार और सहज बनाता है।

3. पुनरावृत्ति और निरंतर मूल्यांकन-

Flashcards और ऑनलाइन क्विज़ का नियमित उपयोग छात्रों को शब्दावली और वाक्यांश याद रखने में मदद करता है।

4. सहभागिता (Collaboration)-

समूह गतिविधियों और संवाद आधारित शिक्षण से छात्रों में सहभागिता और संवाद कौशल विकसित होता है।

सॉफ्टवेयर के माध्यम से सरल और स्थायी हिंदी शिक्षण-

डिजिटल टूल्स का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वे हिंदी सीखने की प्रक्रिया को सरल, रोचक और स्थायी बनाते हैं। शब्दावली, व्याकरण, सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना—सभी क्षेत्रों में ये टूल्स छात्रों को सहज और आत्मविश्वासी बनाते हैं।

उदाहरण के लिए, Duolingo और Memrise जैसे प्लेटफ़ॉर्म नियमित अभ्यास के माध्यम से सीखने को मज़ेदार बनाते हैं, जबकि Rosetta Stone और YouTube चैनल्स वास्तविक जीवन की संवाद शैली सिखाते हैं। Flashcards और StoryWeaver जैसे टूल्स सीखने को दृश्य और श्रव्य अनुभव के साथ मजबूत करते हैं।

निष्कर्ष : डिजिटल युग में हिंदी शिक्षण की क्रांति-

हिंदी भाषा शिक्षण अब केवल कक्षा और पुस्तकों तक सीमित नहीं है। सॉफ्टवेयर और डिजिटल टूल्स ने इसे सुलभ, रोचक और स्थायी बना दिया है। आधुनिक तकनीक के माध्यम से छात्र शब्दावली और व्याकरण सीखते हैं, संवाद में सुधार करते हैं और लेखन कौशल विकसित करते हैं।

यह स्पष्ट है कि हिंदी भाषा सीखना अब एक चुनौती नहीं बल्कि एक रोमांचक अनुभव बन गया है। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म न केवल सीखने की प्रक्रिया को मज़ेदार बनाते हैं, बल्कि छात्रों को आत्मविश्वास और स्वतंत्रता भी प्रदान करते हैं।

भविष्य में, तकनीकी विकास के साथ हिंदी भाषा शिक्षण और भी अधिक व्यक्तिगत, इंटरैक्टिव और परिणामोन्मुख होगा। यह न केवल भारतीय छात्रों के लिए, बल्कि विश्वभर में हिंदी सीखने वालों के लिए एक नई क्रांति का मार्ग प्रशस्त करेगा।

हिंदी भाषा शिक्षण में सॉफ्टवेयर का उपयोग केवल उपकरण नहीं है—यह एक शिक्षण क्रांति है, जो छात्रों को भाषा के सृजनात्मक और व्यावहारिक अनुभव से जोड़ता है।

रविवार, 7 सितंबर 2025

दंडवत यात्रा ( कहानी ) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी


दंडवत यात्रा ( कहानी ) 

 (भाग 1)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


"ज़िंदगी जब उम्मीद से खाली हो जाती है,

तब इंसान अपनी आस्था को थाम लेता है।

जहाँ दवा जवाब दे देती है,

वहाँ दुआ अपनी ताक़त दिखाती है।"

देहरादून की सुबह थी। पहाड़ों से उतरती हवा शहर की गलियों में घूम रही थी। सूरज की पहली किरणें घण्टाघर की पुरानी घड़ी पर चमक रही थीं। लेकिन गणपत के जीवन में उस दिन कोई रोशनी नहीं थी। उसका घर गहरे अंधकार से भरा हुआ था।

उसकी माँ महीनों से बीमार थीं। तरह-तरह के डॉक्टरों, अस्पतालों और दवाइयों ने कोशिश की थी, पर हर रिपोर्ट एक ही बात कह रही थी – अब कोई उम्मीद नहीं बची। माँ बिस्तर पर पड़ी थीं, साँसें टूटती-सी, आँखों में निराशा। डॉक्टर ने पिछले दिन ही साफ कहा था, “तुम्हारी मां को अब कोई नहीं बचा सकता। जितना समय है, उनके साथ गुजार लो।”

वो वाक्य गणपत के कानों में बार-बार गूंज रहा था। उसकी आँखें लाल थीं, दिल रो रहा था। माँ उसकी दुनिया थीं। उन्होंने अकेले ही उसे पाला था, पिता बचपन में ही चले गए थे। माँ ही उसका घर थीं, उसका सहारा, उसकी पहचान। और अब वही धीरे-धीरे उससे छिन रही थीं।

रात भर गणपत उनकी खाट के पास बैठा रहा। बाहर से सब शांत था, पर भीतर एक तूफ़ान उठ रहा था। अचानक उसने अपने भीतर एक आवाज सुनी — “जब इंसान बेबस हो जाता है, तो एक ही राह बचती है — भगवान की राह।”

गणपत ने मन ही मन ठान लिया। “मैं बाबा केदारनाथ तक दंडवत यात्रा करूँगा। हर बार ज़मीन पर सिर रखूँगा, उठूँगा, फिर प्रणाम करूँगा। जब तक उनकी चौखट तक न पहुँच जाऊँ, रुकूँगा नहीं। अगर मेरी तपस्या सच्ची है तो बाबा माँ को ज़रूर बचाएँगे।”

सुबह की पहली किरण के साथ गणपत ने माँ के पैरों को छुआ। माँ की आँखों में आशीर्वाद था, लेकिन साथ ही चिंता भी। वह जानती थीं कि यह यात्रा आसान नहीं है। पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस इतना बोलीं – “बेटा, अगर विश्वास है तो रास्ता भी मिलेगा।”

गणपत घर से निकल पड़ा। सबसे पहले वह देहरादून के घण्टाघर पहुँचा। चारों ओर भीड़-भाड़ थी, पर वह वहीं ज़मीन पर लेट गया। उसका सीना, उसका माथा सड़क पर टिक गया। उसने पहला दंडवत प्रणाम किया। लोग ठहर गए। कोई हँसा, कोई बोला – “पागल है।” कोई बोला – “सच्चा भक्त है।” लेकिन गणपत ने किसी की परवाह नहीं की।

वह टपकेश्वर महादेव मंदिर की ओर बढ़ा। हर कुछ कदम पर दंडवत प्रणाम। गर्म सड़क की तपिश उसके शरीर को झुलसा रही थी। घुटनों से खून निकलने लगा। लेकिन भीतर से एक आवाज़ आती रही – “सहन कर, ये पीड़ा ही तेरी शक्ति है।”

घंटों तक चलता रहा। अंततः वह ऋषिकेश पहुँचा। गंगा के किनारे त्रिवेणी घाट पर आरती हो रही थी। दीपकों की रोशनी गंगा की लहरों पर तैर रही थी। गणपत वहाँ ज़मीन पर लेट गया। गंगा की धारा उसके माथे से बहते पसीने और आँसुओं के साथ मिल गई। उसने मन ही मन कहा –

“माँ की बीमारी मेरी असहायता है, और ये गंगा मेरा विश्वास। जब तक विश्वास बहता है, उम्मीद जीवित है।”

लक्ष्मण झूला पार करते हुए कई लोग उसके पास आए। कोई उसके पैर छूने लगा, कोई हाथ जोड़ने लगा, कोई उसकी तस्वीर खींचने लगा। कुछ ने कहा – “ये संत है, बाबा का दूत।” लेकिन गणपत का मन भीतर से कह रहा था – “मैं संत नहीं हूँ। मैं तो बस एक बेटा हूँ, अपनी माँ की ज़िंदगी के लिए प्रार्थना करता हुआ।”

ऋषिकेश की गलियों से निकलते हुए उसे अहसास हुआ कि उसकी यात्रा अब और कठिन होगी। अब सामने पहाड़ थे, गहरी घाटियाँ थीं और अंतहीन रास्ते।

लेकिन उसके भीतर एक ही संकल्प था – “जब तक केदारनाथ की चौखट तक न पहुँच जाऊँ, रुकूँगा नहीं।”


दंडवत यात्रा (भाग 2)

ऋषिकेश छोड़ते ही पहाड़ों का असली रूप सामने आ गया। टेढ़ी-मेढ़ी सड़कें, एक ओर गहरी खाई, दूसरी ओर चट्टानें। गणपत हर बार ज़मीन पर लेटता, माथा धरती से लगाता, फिर उठकर एक कदम आगे बढ़ता। यह यात्रा अब सिर्फ शरीर की नहीं थी, यह उसकी आत्मा की परीक्षा थी।

गर्मियों की धूप सिर पर थी। सड़कें तप रही थीं। हर दंडवत में उसकी छाती जलती, घुटने छिलते, और माथा ज़मीन से टकराकर लाल हो जाता। लेकिन गणपत का मन कहता – “अगर यह कष्ट मुझे माँ की एक साँस लौटा सकता है, तो हर दर्द मीठा है।”

कई यात्री उसे देख ठहर जाते। कोई पानी पिला देता, कोई उसके पैर दबाने लगता। किसी ने कहा – “भाई, यह पागलपन है।” किसी ने कहा – “नहीं, यह सच्ची भक्ति है।” लेकिन गणपत चुप रहा। उसके लिए न दुनिया थी, न लोग। उसके लिए बस एक ही ध्येय था – बाबा केदारनाथ।

दिन ढलते-ढलते वह देवप्रयाग पहुँचा। वहाँ भागीरथी और अलकनंदा का संगम था। दो धाराएँ मिलकर गंगा बनती थीं। गणपत संगम किनारे बैठ गया। लहरें टकरा रही थीं, मानो आकाश और धरती की अनंत वार्ता हो रही हो।

उसने खुद से कहा –

“देख गणपत, जैसे ये दो नदियाँ मिलकर एक हो गईं, वैसे ही तेरी पीड़ा और तेरी आस्था भी अब एक हो गई है। पीड़ा के बिना आस्था अधूरी है, और आस्था के बिना पीड़ा अर्थहीन।”

उस क्षण उसे लगा कि वह अकेला नहीं है। हर लहर, हर पत्थर, हर पेड़ उसकी तपस्या का साक्षी है।

देवप्रयाग से आगे रास्ते और कठिन थे। पहाड़ ऊँचे होते जा रहे थे। हवा में नमी थी, लेकिन पैरों की थकान हड्डियों तक पहुँच चुकी थी। फिर भी वह हर बार प्रणाम करता, उठता, और आगे बढ़ता।

कभी-कभी उसके भीतर सवाल उठते – “क्या सचमुच बाबा मेरी माँ को बचाएँगे? या यह सब व्यर्थ है?” लेकिन उसी क्षण भीतर से आवाज आती – “विश्वास सवाल नहीं पूछता, वह सिर्फ चलता है।”

रात को वह एक ढाबे के पास रुक गया। लोग उसे देखकर हाथ जोड़ने लगे। कोई कह रहा था – “ये संत तो हमारे गाँव का आदर्श बन जाएगा।” किसी ने उसके पैरों को छू लिया। लेकिन गणपत की आँखें गीली थीं। उसने मन ही मन कहा –

“वे मुझे आदर्श समझते हैं, पर मैं तो भीतर से खाली हूँ। मैं तो बस अपनी माँ के लिए रोता हुआ बेटा हूँ।”

कई दिन की कठिन यात्रा के बाद वह रुद्रप्रयाग पहुँचा। यहाँ अलकनंदा और मंदाकिनी का संगम था। उसने उस संगम को देखा और सोचा –

“जैसे ये नदियाँ अलग-अलग होते हुए भी यहाँ मिल गईं, वैसे ही मनुष्य की राहें चाहे कितनी भी भिन्न हों, अंत में सब ईश्वर तक ही जाती हैं। मैं भी अपनी राह पर चल रहा हूँ।”

लेकिन रुद्रप्रयाग में उसका शरीर टूटने लगा। घुटनों से खून बह रहा था, हाथ काँप रहे थे। रात में जब वह ज़मीन पर लेटकर तारों को देखता, तो सोचता –

“अगर मैं यहीं मर गया, तो क्या होगा? माँ का क्या होगा? क्या मेरी तपस्या अधूरी रह जाएगी?”

भीतर से उत्तर आता – “अगर तू अपनी अंतिम साँस तक बाबा का नाम लेता है, तो तेरी तपस्या अधूरी नहीं होगी। तपस्या का मूल्य परिणाम में नहीं, प्रयास में है।”

गणपत ने गहरी साँस ली और खुद से वादा किया – “चाहे शरीर टूट जाए, पर विश्वास नहीं टूटेगा।”

रुद्रप्रयाग से आगे का रास्ता और कठिन था, लेकिन गणपत अब भयमुक्त था। उसके लिए हर दर्द, हर घाव एक वरदान था।


दंडवत यात्रा (भाग 3)

रुद्रप्रयाग से आगे का रास्ता मानो पहाड़ों की परीक्षा थी। हवा में ठंडक थी, पर शरीर इतना टूटा हुआ था कि हर अंग चीत्कार कर रहा था। घुटनों पर पट्टियाँ बाँधने के बावजूद हर दंडवत के साथ खून रिस आता। लेकिन गणपत का मन और दृढ़ हो चुका था।

गुप्तकाशी की ओर बढ़ते हुए उसने चट्टानों को देखा, जहाँ कहीं-कहीं शिवलिंग जैसे आकार उभरते थे। एक साधु ने उससे कहा –

“यही वह भूमि है जहाँ पांडवों ने शिव को खोजा था। शिव उनसे छिपकर यहाँ बैल बने थे। इसलिए इसे गुप्तकाशी कहते हैं।”

गणपत चुपचाप सुनता रहा। उसके भीतर एक सवाल उठा – “क्या शिव मुझसे भी छिपे हुए हैं? या वे मेरी हर पीड़ा देख रहे हैं?”

भीतर से एक उत्तर आया – “शिव छिपते नहीं, वे परखते हैं। जब तक मनुष्य का संकल्प पवित्र न हो, शिव सामने नहीं आते।”

उस रात गणपत गुप्तकाशी के एक मंदिर की चौखट पर लेट गया। आकाश में असंख्य तारे चमक रहे थे। उसने खुद से कहा –

“माँ, मैं थक गया हूँ। पर तेरे लिए चल रहा हूँ। अगर बाबा सचमुच हैं, तो वे मुझे गिरने नहीं देंगे।”

सुबह होते ही वह फिर यात्रा पर निकला। हर दंडवत में उसका माथा पत्थरों से टकराता, घुटने फटते, लेकिन उसकी आत्मा कहती – “सहन कर गणपत, यही तेरी तपस्या है।”

दिन ढलते-ढलते वह सोनप्रयाग पहुँचा। यहाँ से केदारनाथ की अंतिम यात्रा शुरू होती थी। सोनप्रयाग में तीर्थयात्रियों की भीड़ थी। लोग घोड़े, पालकी और डांडी से ऊपर जा रहे थे। लेकिन गणपत सबके बीच ज़मीन पर लेट-लेटककर प्रणाम करता हुआ आगे बढ़ रहा था।

लोग उसे देखकर विस्मित हो जाते। कोई उसके पैरों को छूता, कोई उसका माथा सहलाता। बच्चे उसे देखकर “बाबा, बाबा” कहने लगते।

किसी ने कहा – “यह तो अवतार है।”

किसी ने कहा – “यह तो हमारी पीढ़ी का संत है।”

लेकिन गणपत का मन भीतर से फुसफुसाता – “मैं संत नहीं हूँ। मैं तो रिक्त हूँ, खाली हूँ। मैं तो बस अपनी माँ की साँसों को बचाने के लिए यहाँ हूँ।”

सोनप्रयाग से आगे रास्ता और दुर्गम था। संकरी पगडंडियाँ, खाई के किनारे से गुजरते लोग, और ऊपर चढ़ती हुई पगडंडियाँ। गणपत हर दंडवत में खुद को ज़मीन पर फेंक देता। उसके हाथ काँपते, शरीर गिरने लगता, लेकिन फिर वह उठ खड़ा होता।

गौरीकुंड पहुँचना उसके लिए एक और परीक्षा थी। यहाँ से बाबा के दरबार की चढ़ाई शुरू होती थी। गौरीकुंड की पवित्र धारा को देखकर गणपत ने अपने घाव धोए। पानी बर्फ जैसा ठंडा था। घावों में आग-सी लगने लगी, लेकिन उसकी आत्मा को शांति मिली।

उसने खुद से कहा –

“जैसे पार्वती माँ ने यहाँ तपस्या की थी, वैसे ही मैं भी तपस्या कर रहा हूँ। मेरी तपस्या अधूरी नहीं जाएगी। माँ को मैं बाबा के दरबार में ले जाऊँगा, चाहे अपने विश्वास में ही सही।”

गौरीकुंड की रात सबसे कठिन थी। ठंड असहनीय थी, शरीर टूट चुका था। भूख और प्यास से वह काँप रहा था। उसने आँखें बंद कीं और आत्मा से संवाद किया –

“गणपत, अगर तू अभी हार गया, तो सब व्यर्थ है। तेरे माँ के लिए हर कदम, हर प्रणाम मायने रखता है। याद रख, तपस्या परिणाम से बड़ी होती है।”

आँखों में आँसू थे, शरीर थककर टूट रहा था, लेकिन आत्मा अब लोहे जैसी मज़बूत हो चुकी थी।

गणपत जानता था कि अब अंतिम चढ़ाई बाकी है। यही वह राह थी जहाँ से उसकी आस्था का शिखर दिखाई देगा।

दंडवत यात्रा (भाग 4 )

गौरीकुंड से आगे का रास्ता जीवन और मृत्यु के बीच की एक संकरी रेखा था। एक ओर बर्फ़ से ढकी चोटियाँ, दूसरी ओर गहरी खाई, और बीच में संकरी पगडंडी। ठंडी हवा उसके घावों पर चुभ रही थी, लेकिन गणपत का शरीर अब दर्द से परे जा चुका था। उसका हर अंग जल रहा था, पर मन एक ही मंत्र जप रहा था –

“हर-हर महादेव… हर-हर महादेव…”

हर दंडवत के साथ उसका माथा कठोर पत्थरों पर लगता। घुटनों से खून मिट्टी और धूल में मिल जाता। शरीर गिरने लगता, पर आत्मा कहती – “उठ गणपत, अभी नहीं रुकना।”

यात्रियों की भीड़ उसे देखकर ठहर जाती। कोई उसे सहारा देना चाहता, कोई रोकना चाहता, पर गणपत बस एक ही उत्तर देता –

“मुझे न छुओ, यह तपस्या मेरे और बाबा के बीच है।”

धीरे-धीरे बर्फ़ीली हवा तेज़ होती गई। ऊँचाई बढ़ती गई। साँस लेना कठिन हो रहा था। गणपत कई बार गिरा, कई बार बेहोश-सा हुआ, पर हर बार उठ खड़ा हुआ।

रास्ते में उसे एक बुज़ुर्ग साधु मिले। उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा –

“बेटा, तू शरीर से नहीं, आत्मा से चल रहा है। यह मार्ग कठिन है, पर तेरा विश्वास ही तुझे केदार तक ले जाएगा।”

गणपत की आँखें नम हो गईं। उसने प्रणाम किया और आगे बढ़ा।

घंटों की कठिन चढ़ाई के बाद अचानक सामने सफ़ेद धुंध छंटने लगी। बर्फ़ से ढकी चोटियों के बीच, पत्थरों की घाटी में, बाबा केदारनाथ का मंदिर दिखने लगा। घंटियों की ध्वनि हवा में तैर रही थी। मंत्रोच्चार गूंज रहे थे।

गणपत वहीं ज़मीन पर गिर पड़ा। आँसू उसके गालों पर बह निकले। उसने खुद से कहा –

“माँ, देखो… मैं आ गया… तुम्हारे बेटे ने बाबा की चौखट पा ली।”

वह घुटनों के बल घिसटता हुआ मंदिर की ओर बढ़ा। हर कदम पर प्रणाम करता। लोग चारों ओर खड़े होकर उसे देख रहे थे। किसी की आँखों में आँसू थे, कोई मंत्र जप रहा था, कोई कह रहा था – “यह तो जीवित तपस्वी है।”

अंततः गणपत मंदिर के द्वार तक पहुँच गया। उसने अपनी पूरी देह को ज़मीन पर फैला दिया। उसके होंठ काँप रहे थे, पर आवाज़ साफ़ थी –

“भोलेनाथ… मेरी माँ को बचा लो। अगर मेरा जीवन चाहिए, तो ले लो। पर माँ की साँसें मत छीनो।”

उस क्षण उसे लगा कि पूरा पर्वत गूंज रहा है। हवा में घंटियों की ध्वनि मिल गई। उसके भीतर अचानक एक शांति उतर आई।

गणपत ने आँखें बंद कीं। उसके भीतर से आवाज़ आई –

“गणपत, तूने अपनी सीमा से परे चलकर विश्वास का मार्ग चुना है। तूने तपस्या का अर्थ समझा है। जान ले, जीवन और मृत्यु हमारे हाथ में नहीं, पर आस्था कभी व्यर्थ नहीं जाती। तेरी माँ का समय चाहे जैसा हो, पर तूने उन्हें अमर कर दिया है अपने विश्वास में। तू अब रिक्त नहीं है, तू स्वयं शिव का अंश बन चुका है।”

गणपत रो पड़ा। आँसू बर्फ़ पर गिरकर मोती जैसे चमकने लगे।

उसने शिवलिंग के सामने माथा टेक दिया। भीतर से एक अजीब शक्ति महसूस हुई। उसका हृदय शांत हो चुका था। वह जान गया कि माँ का जीवन अब ईश्वर के हाथों में है, और उसका संकल्प पूरा हो चुका है।

लोग उसे “गणपत बाबा” कहकर पुकारने लगे। कोई उसके चरण छूने लगा, कोई उसका आशीर्वाद माँगने लगा। लेकिन गणपत जानता था –

“मैं संत नहीं हूँ। मैं तो बस एक बेटा हूँ, जिसने अपनी माँ के लिए अपना सब कुछ अर्पण कर दिया। और यही अर्पण मुझे ईश्वर से जोड़ गया।”

बर्फ़ीले पहाड़ों के बीच, घंटियों की गूँज और मंत्रोच्चार के बीच गणपत का चेहरा दिव्यता से चमक रहा था। उसकी आँखों में अब डर नहीं था, सिर्फ़ शांति थी।

कहानी यहाँ समाप्त नहीं होती, क्योंकि गणपत की यात्रा सिर्फ़ उसकी माँ के लिए नहीं थी। उसकी दंडवत यात्रा अब हर उस इंसान की कहानी बन चुकी थी जो पीड़ा में भी 

विश्वास बनाए रखता है।


और यही सत्य था –

ईश्वर बाहर नहीं, भीतर है।

विश्वास बाहर नहीं, आत्मा के गहराई में है।

और वही विश्वास मनुष्य को अमर बना देता है।

शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

अक्षरों की लड़ाई (कहानी) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 

अक्षरों की लड़ाई (कहानी)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

धरती पर बहुत लड़ाइयाँ हुईं—राम और रावण की, कौरव और पांडव की, यहाँ तक कि मोहल्ले के शर्मा जी और वर्मा जी की। लेकिन सबसे खतरनाक लड़ाई न तो महाभारत में हुई, न ही किसी संसद में। सबसे भयानक लड़ाई हुई थी अक्षरों के बीच। हाँ, वही मासूम से दिखने वाले अक्षर, जिनसे हम "आई लव यू" भी लिखते हैं और "राजीनामा" भी। जिनसे विवाह भी लिखते हैं और तलाक़ भी।

अक्षर जब पैदा हुए थे तो सब भाई-भाई थे। स्वर बड़े भाई, व्यंजन छोटे भाई, मात्राएँ बहनें, और विराम चिह्न पड़ोस के वो खड़ूस अंकल, जो हर वाक्य के अंत में आकर डाँटते—“बस, अब और नहीं।” पर समय बीता, भाई-भाई में झगड़े शुरू हो गए। स्वर बोले—“हम ही असली राजा हैं। हमारे बिना तुम व्यंजन कुछ भी नहीं।” व्यंजन तुनककर बोले—“तुम हवा हो, तुम्हारा वजूद ही हमारी पीठ पर टिका है। हम न हों तो तुम्हारी सांस बेमानी।”

अब स्वर और व्यंजन की इस बहस में मात्रा बहनें भी कूद पड़ीं। “देखो भाई,” मात्रा ने कहा, “तुम दोनों चाहे जितना भी शोर मचाओ, हमारी बिंदी और खड़ी मात्राओं के बिना कोई हमें पढ़ भी नहीं पाएगा। तुम सब बस खोखली हड्डियाँ हो, असली चमक तो हमारी वजह से है।” इतना सुनते ही स्वर और व्यंजन एक साथ बोले—“ओह मैडम, तुम्हें तो ट्यूशन फीस देने का शौक है क्या? बिना हम दोनों के तुम खड़ी रहोगी कहाँ?”

विराम चिह्न तो वैसे ही बैठे रहते थे, जैसे चौकीदार बिना काम का। मगर जब लड़ाई बढ़ी, तो उन्होंने भी अपनी मूँछें ऐंठीं। अल्पविराम बोला—“देखो भाई, मेरी अहमियत को कम मत आँकना। मैं न रहूँ तो लोग एक ही सांँस में हाँफ-हाँफकर गिर पड़ेंगे।” पूर्णविराम ने और अकड़ दिखाते हुए कहा—“और मैं! मेरे बिना तो वाक्य जीवनभर लटकता ही रहेगा। खत्म करने की ताकत सिर्फ मेरे पास है।” प्रश्नवाचक चिह्न ने तुरंता सवाल दाग दिया—“और बिना मेरे सोचोगे कैसे? मैं हूँ तो जिज्ञासा है, मैं नहीं तो दिमाग लकवाग्रस्त।” विस्मयादिबोधक ने ठहाका लगाया—“अरे, तुम सबके बिना जी सकते हैं लोग, मगर मेरे बिना जिंदगी में मज़ा कहाँ से लाएँगे!”

इधर आकाश गूँज रहा था अक्षरों की चीख-पुकार से। 'अ' ने लम्बा आलाप लिया—“आआआआ…”। 'क' ने उसकी टाँग खींच दी—“कट!” 'स' फुफकारा और 'श' ने मजाक उड़ाया—“स्स्स्स… चुप रह।” नक्षत्र हिलने लगे, तारामंडल डगमगाने लगे, यहाँ तक कि धरती पर बैठे मास्टर गंगाप्रसाद की नींद भी हराम हो गई।

गंगाप्रसाद कोई मामूली इंसान नहीं थे। पैंतीस बरस तक बच्चों को अक्षर पढ़ाए थे। सुबह की पहली चाय से लेकर रात की आखिरी डकार तक, उनका जीवन 'अ' से 'ज्ञ' तक फैला हुआ था। लेकिन अब अक्षरों की बगावत ने उन्हें चक्कर में डाल दिया। सपनों में अक्षर कक्षा में आ खड़े होते, और गंगाप्रसाद को कुर्सी पर बिठाकर कहते—“मास्टरजी, फैसला करो, हममें असली राजा कौन है?”

गंगाप्रसाद बेचारे माथा पकड़ लेते। 'अ' और 'आ' आपस में गुत्थमगुत्था हो जाते। 'ऋ' बगल में खड़ा रोता—“किसी को मेरी याद क्यों नहीं आती?” व्यंजन तो खैर वैसे ही पंक्ति बना कर खड़े रहते, जैसे सेना का बटालियन। 'क' अपना डंडा घुमाता, 'ख' छाती फुलाता, 'ग' गुर्राता। 'ट' और 'ठ' तो मानो मोहल्ले के गुंडे—हर समय किसी को ठोकने के मूड में।

और यह लड़ाई सिर्फ सपनों तक सीमित नहीं रही। हकीकत में भी असर दिखने लगा। एक दिन एक बच्चा लिख रहा था—“राम बाजार गया।” अचानक अल्पविराम उछलकर बोला—“मास्टरजी! यहाँ मेरी जगह थी, मगर इसने मुझे घुसने ही नहीं दिया।” पूर्णविराम ने डफली बजाई—“हाँ! और जब तक मैं न आऊँ, यह वाक्य अधूरा है।” बच्चा झल्लाकर बोला—“क्या सब मेरी कॉपी में ही दफ़्तर खोलना है तुम्हें?” और पूरी कक्षा हँसी से फट पड़ी।

गंगाप्रसाद को समझ आने लगा कि अक्षरों की लड़ाई दरअसल मनुष्य के भीतर की लड़ाई है। स्वर और व्यंजन का झगड़ा वैसा ही है, जैसा घर में मियाँ-बीवी का झगड़ा। मात्रा बहनों की शिकायतें बिल्कुल वैसी ही हैं, जैसी पड़ोसन की—“हमें कोई पूछता ही नहीं।” और विराम चिह्न वही खड़ूस रिश्तेदार हैं, जो हर मौके पर टांग अड़ाने चले आते हैं।

लेकिन सबसे बड़ा धमाका तब हुआ, जब ‘मौन’ दरवाज़ा तोड़कर कक्षा में घुस आया। अब तक चुपचाप कोने में बैठा रहने वाला मौन धीरे-धीरे आगे बढ़ा। सारे अक्षर हक्के-बक्के देख रहे थे। मौन ने शांत स्वर में कहा—“तुम सब चाहे जितना लड़ लो, अंत में जीत मेरी ही होगी। जीवन के आखिरी पल में हर इंसान मेरे पास ही आता है।”

गंगाप्रसाद का दिल धक से रह गया। हाँ, यही तो सच है। जीवन भर इंसान अक्षरों में लड़ता रहता है—वाद-विवाद, परीक्षा, तर्क, बहस, प्रेमपत्र, इस्तीफा—सब अक्षरों की वजह से। मगर जब मौत आती है, तब सारे अक्षर धरे के धरे रह जाते हैं। बस मौन रह जाता है।

समय अपनी रफ्तार से भागा। गंगाप्रसाद बूढ़े हो गए। उनकी मोटी ऐनक से अब अक्षर धुंधले दिखते। बच्चों की कॉपी में ‘क’ और ‘ख’ का फर्क पकड़ना मुश्किल हो गया। मगर मन की गहराई में वे जानते थे—यह सब झगड़े, यह सब लड़ाइयाँ, सिर्फ उसी अनंत कहानी का हिस्सा हैं, जिसमें शुरुआत अक्षरों से होती है और अंत मौन में।

जब आखिरी घड़ी आई, गंगाप्रसाद बिस्तर पर लेटे थे। सारे अक्षर उनके चारों ओर आ खड़े हुए। स्वर उनके सिरहाने, व्यंजन पैरों के पास, मात्राएँ किनारे, विराम चिह्न चौखट पर पहरा दे रहे थे। ‘अ’ ने झुककर कहा—“मास्टरजी, हमें माफ़ कर दीजिए।” ‘क’ ने सिर झुका लिया। अल्पविराम रो पड़ा—“हमारी लड़ाई ने आपको बहुत परेशान किया।”

गंगाप्रसाद ने धीमे स्वर में मुस्कराकर कहा—

“बेटा, जीवन भी तो अक्षरों की लड़ाई ही है। कोई बड़ा, कोई छोटा, कोई ऊँचा, कोई नीचा। मगर सब मिलकर ही भाषा बनाते हैं। आज मैं मौन हो रहा हूँ… और यह मेरी सबसे बड़ी कविता होगी।”

इतना कहकर उन्होंने आँखें मूँद लीं।

मौन ने उन्हें अपने आँचल में समेट लिया।

मौन कोई साधारण विराम नहीं था—वह तो शून्य के समान था। ऐसा शून्य, जिसमें अनगिनत स्वर-व्यंजन समा जाते हैं, और फिर भी जगह बची रहती है। अक्षरों ने पहली बार समझा कि सबसे बड़ा अक्षर वही है, जो अक्षरों से परे है। मौन—एक ऐसा महासागर, जिसमें हर लहर अपने-अपने स्वर-व्यंजन की पहचान खो देती है और बस ध्वनि की स्मृति बचती है।

गंगाप्रसाद के मौन हो जाने के बाद अक्षरों ने पहली बार एकता दिखाई। गाँव की चौपाल जैसी सभा बुलाई गई। ‘अ’ ने शोकप्रस्ताव रखा—“वे हमें जोड़ते थे, सिखाते थे कि साथ रहो। अब जब वे मौन हुए हैं तो हमें भी मौन रहना चाहिए।” मगर तभी ‘क’ खाँस पड़ा और बोला—“इतना मौन रहेंगे तो अखबार कौन छापेगा? राजनीति कैसे चलेगी?” अल्पविराम ने बीच में घुसकर आह भरी—“भाई, हमें भी थोड़ा जगह दो, हम भी दुखी हैं।” प्रश्नवाचक चिह्न अपनी आदत से मजबूर होकर पूछ बैठा—“क्या अब हम सबको मौन धारण करना पड़ेगा?” 

व्यंजन पंक्ति बनाकर खड़े थे, स्वर गले में रुलाई अटका कर सुबक रहे थे, और मात्राएँ अपनी बिंदियाँ पोंछ-पोंछकर आँखों का पानी सुखा रही थीं। पूर्णविराम ने आँसू बहाते हुए ऐलान किया—“अब यह वाक्य सचमुच समाप्त हुआ।” डैश ने लंबी साँस खींची और बोला—“मगर यह विराम अंत नहीं, एक विस्तार है।” अक्षरों को पहली बार अहसास हुआ कि गंगाप्रसाद तो मौन में समा गए, पर उनकी छोड़ी हुई भाषा, उनकी कक्षाओं की गूँज, और उनकी हँसी अब भी अक्षरों के भीतर धड़क रही है। समय के साथ-साथ शोकसभा धीरे-धीरे एक हँसी-सभा में बदल गई—जहाँ ग़म भी व्यंग्य की तरह मुस्कुरा रहा था।

लेकिन अक्षर मरते नहीं। वे तो आज भी ज़िंदा हैं। अखबारों में चीखते हैं, सोशल मीडिया पर गाली-गलौज करते हैं, कविताओं में झूमते हैं, और संसद में तो बाकायदा हाथापाई करवा देते हैं। फर्क बस इतना है कि पहले वे ब्लैकबोर्ड पर लड़ते थे, अब मोबाइल स्क्रीन पर दंगल करते हैं। अक्षरों की लड़ाई अब भी जारी है, बस गंगाप्रसाद जैसे लोग उसे समझाने और सुलझाने के लिए नहीं रहे—या यूँ कहें कि अब सुलझाने की हिम्मत किसी में बची ही नहीं।

और यही सबसे बड़ा व्यंग्य है। इंसान सोचता है कि वह अक्षरों का मालिक है—किताबें लिखकर, भाषण देकर, समझौते साइन कराकर—मानो पूरी दुनिया उसकी कलम से चल रही हो। लेकिन सच्चाई यह है कि अक्षर ही उसे नचाते हैं। कभी वे उसे प्रपोज करवाते हैं, तो कभी तलाक दिलवाते हैं। कभी अदालत में गवाही बनकर खड़े हो जाते हैं, तो कभी सियासत में झूठ का जुलूस निकाल देते हैं। आदमी सोचता है कि वह बोल रहा है, जबकि असल में अक्षर उसकी ज़बान पर कब्ज़ा जमाए हुए कठपुतली नचा रहे हैं।

और जब यह पूरा तमाशा खत्म हो जाता है—अखबार पुराना हो जाता है, सोशल मीडिया का पोस्ट डिलीट हो जाता है, कविताएँ बासी हो जाती हैं, संसद का शोर ठंडा पड़ जाता है—तब सिर्फ मौन बचता है। मौन, जो सबसे बड़ा अक्षर है, एक ऐसा अक्षर जो लिखा नहीं जा सकता, पर जिसमें सारे अक्षर समा सकते हैं। 'महाशून्य' के समान, वही मौन फिर ठहाका लगाता है—एक ऐसा ठहाका, जो आदमी की गंभीरता को खिल्ली बना देता है, और पूरी कायनात में गूंज उठता है।

जीवन दरअसल अक्षरों की लड़ाई है। मगर अंत में अक्षर बच जाते हैं और इंसान मिट जाता है। आदमी तो बस एक अस्थायी अक्षर है, एक चलती-फिरती किताब। मौत आते ही किताब का कवर फट जाता है, पन्ने बिखर जाते हैं, पर अक्षर उड़कर आकाश में तैरते रहते हैं—जैसे ब्रह्मांड का शाश्वत ध्वनि-संगीत, जो कभी खत्म नहीं होता।

गुरुवार, 4 सितंबर 2025

21वीं सदी का युवा : भारतीय धार्मिक एवं सांस्कृतिक मूल्य- ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 


21वीं सदी का युवा : भारतीय धार्मिक एवं सांस्कृतिक मूल्य-

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

21वीं सदी का आगमन केवल एक नए कालखण्ड का आरंभ नहीं है, बल्कि यह विश्व इतिहास के परिवर्तनशील स्वरूप का प्रतीक है। तकनीकी क्रांति, वैश्वीकरण, उदारीकरण और सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने युवाओं की सोच और जीवन पद्धति को गहराई से प्रभावित किया है। इस दौर का युवा न केवल भारत का भविष्य है, बल्कि वैश्विक समाज का भी सक्रिय घटक है। ऐसे समय में जब पूरी दुनिया एक "ग्लोबल विलेज" बन चुकी है, तब भारत का युवा अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को किस प्रकार अपनाता है, यह प्रश्न शोध की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भारत की पहचान उसकी प्राचीन सभ्यता, धार्मिकता और संस्कृति से है। हजारों वर्षों से यह भूमि मानवता को आध्यात्मिकता, नैतिकता और सहअस्तित्व का संदेश देती आई है। यहांँ धर्म केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को दिशा देने वाला मार्गदर्शन रहा है। "धर्मो रक्षति रक्षितः" का सिद्धांत यही बताता है कि धर्म मनुष्य की रक्षा करता है, यदि मनुष्य धर्म का पालन करता है। यही सिद्धांत भारतीय युवाओं के जीवन को दिशा दे सकता है।

आज का युवा वैश्विक संस्कृति के आकर्षण में है। उपभोक्तावाद, प्रतिस्पर्धा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और भौतिक सफलता के नाम पर उसे नई जीवनशैली दिखाई देती है। चमक-दमक, आधुनिक जीवन की सुविधा और आकर्षण उसे लुभाते हैं। परंतु यह भी सत्य है कि यह आकर्षण क्षणिक है। पश्चिमी संस्कृति की बाहरी चमक उसकी आँखों को भले चकाचौंध कर दे, परंतु भीतर से वह रिक्तता और असंतुलन का अनुभव कराता है। भारतीय संस्कृति और धार्मिक मूल्य ही उसे स्थायी शांति, संतुलन और आत्मिक शक्ति प्रदान कर सकते हैं।

21वीं सदी का युवा जिस वैश्विक आंँधी से प्रभावित है, उसमें पहचान का संकट उत्पन्न होना स्वाभाविक है। जब उपभोक्तावाद और व्यक्तिगत सुख सर्वोपरि हो जाए, तब समाज, परिवार और संस्कृति के मूल्य गौण हो जाते हैं। लेकिन भारतीय संस्कृति की शक्ति यही है कि वह बाहरी प्रभावों के बीच भी अपनी जड़ों से जुड़ी रहती है। युवाओं को यह समझना होगा कि भारतीयता केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन का आदर्श है, जो आधुनिकता को दिशा दे सकती है।

भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा योगदान है—"सर्वे भवन्तु सुखिनः" की भावना। यह केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि जीवन का सिद्धांत है। यदि युवा इसे आत्मसात करते हैं, तो वे केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज और संपूर्ण मानवता के लिए कार्य करेंगे। आधुनिक वैश्विक समाज में जहां राष्ट्र हित और स्वार्थ की राजनीति प्रबल है, वहां भारतीय युवाओं के पास यह अवसर है कि वे विश्व को "वसुधैव कुटुम्बकम्" का आदर्श प्रस्तुत करें।

समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखा जाए, तो युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती है—सांस्कृतिक असंतुलन। एक ओर वे अपने पारंपरिक धार्मिक-सांस्कृतिक ज्ञान को लेकर आगे बढ़ना चाहते हैं, तो दूसरी ओर वैश्वीकरण का दबाव उन्हें पश्चिमी जीवनशैली अपनाने को प्रेरित करता है। यह द्वंद्व उनकी पहचान को धुंधला कर देता है। समाधान यही है कि वे अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए आधुनिकता को आत्मसात करें। उदाहरण के लिए, तकनीकी प्रगति का उपयोग केवल मनोरंजन या उपभोग के लिए न करके शिक्षा, समाज सेवा और शोध के लिए करना युवाओं को सही दिशा देगा।

21वीं सदी का युवा केवल "फॉलोअर" नहीं, बल्कि "क्रिएटर" भी है। डिजिटल युग ने उसे सृजन की अनंत संभावनाएँ दी हैं। सोशल मीडिया, स्टार्टअप और तकनीकी नवाचार उसके हाथों में शक्तिशाली औजार हैं। यदि इनका उपयोग भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रसार और संरक्षण के लिए किया जाए, तो यह युवाओं को वैश्विक स्तर पर नेतृत्व प्रदान करेगा। आज यदि युवा भारतीय योग, ध्यान, आयुर्वेद और साहित्य को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रसारित करें, तो यह न केवल भारत की पहचान मजबूत करेगा, बल्कि विश्व मानवता को भी लाभान्वित करेगा।

धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण केवल औपचारिक अनुष्ठानों से नहीं होगा, बल्कि उनके अर्थ और सार को समझने से होगा। उदाहरण के लिए, गीता केवल युद्धभूमि का उपदेश नहीं है, बल्कि कर्मयोग, आत्मसंयम और कर्तव्यपरायणता का शाश्वत संदेश है। यदि युवा गीता के कर्मयोग को अपने जीवन में अपनाएँ, तो वे व्यक्तिगत सफलता और सामाजिक सेवा दोनों में संतुलन बना सकते हैं।

युवाओं के सामने दूसरी बड़ी चुनौती है—नैतिकता और आध्यात्मिकता की कमी। जब जीवन केवल भौतिक उपलब्धियों पर केंद्रित हो जाता है, तो तनाव, अकेलापन और असंतोष बढ़ता है। भारतीय धार्मिक मूल्य—जैसे सत्य, अहिंसा, करुणा, सेवा और आत्मसंयम—इन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं। ध्यान और योग जैसे अभ्यास न केवल शरीर और मन को स्वस्थ बनाते हैं, बल्कि आत्मिक शांति भी प्रदान करते हैं। इसलिए युवाओं को इन परंपराओं को अपनाना चाहिए, ताकि वे मानसिक संतुलन बनाए रख सकें।

आर्थिक दृष्टि से भारत आज उभरती हुई शक्ति है। इसमें सबसे बड़ी भूमिका युवाओं की है। लेकिन आर्थिक विकास का उद्देश्य केवल भौतिक संपन्नता नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज का समग्र कल्याण होना चाहिए। भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि यही सिखाती है कि समृद्धि तभी सार्थक है, जब वह सबके बीच बाँटी जाए। यदि युवा उद्यमी और व्यवसायी इस दृष्टि से काम करें, तो भारत न केवल आर्थिक महाशक्ति बनेगा, बल्कि सांस्कृतिक महाशक्ति भी बनेगा।

भारत की विविधता उसकी पहचान है। यहां विभिन्न धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ सहअस्तित्व में हैं। यह सहअस्तित्व ही भारतीय एकता का सूत्र है। युवाओं को यह समझना होगा कि धार्मिक और सांस्कृतिक सद्भाव भारत की सबसे बड़ी शक्ति है। आज जब दुनिया धार्मिक संघर्षों और सांप्रदायिक हिंसा से जूझ रही है, तब भारतीय युवा वैश्विक समाज को यह संदेश दे सकते हैं कि विविधता में एकता ही वास्तविक प्रगति का मार्ग है।

आज के युवा के सामने रोजगार, करियर और भविष्य की चिंताएँ बड़ी हैं। लेकिन यदि शिक्षा केवल नौकरी तक सीमित हो जाए और जीवन मूल्यों को न दे, तो उसका लाभ अधूरा रह जाएगा। शिक्षा का उद्देश्य केवल कौशल देना नहीं, बल्कि व्यक्ति को पूर्ण मानव बनाना भी है। भारतीय परंपरा की "गुरुकुल" पद्धति यही सिखाती थी कि शिक्षा आत्मविकास और चरित्र निर्माण का माध्यम है। आधुनिक शिक्षा में भी यदि युवा इस दृष्टि को अपनाएँ, तो वे अधिक संतुलित और सफल हो सकते हैं।

शोध की दृष्टि से यह स्पष्ट है कि भारतीय युवाओं में परंपरा और आधुनिकता का द्वंद्व गहरा है, परंतु समाधान भी उन्हीं के हाथ में है। युवाओं को यह स्वीकार करना होगा कि धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्य स्थायी हैं, जबकि आधुनिकता परिवर्तनशील है। यदि वे स्थायी आधार पर परिवर्तनशीलता को दिशा देंगे, तो समाज में संतुलन बना रहेगा।

21वीं सदी का युवा केवल भारत तक सीमित नहीं है। उसकी सोच और कार्यप्रणाली वैश्विक स्तर पर प्रभाव डालती है। सूचना क्रांति ने उसे विश्व नागरिक बना दिया है। ऐसे में वह चाहे तो भारतीय संस्कृति और मूल्यों को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत कर सकता है। उदाहरण के लिए, आज योग और ध्यान पूरी दुनिया में लोकप्रिय हैं। यह भारतीय युवाओं के लिए अवसर है कि वे इन्हें आधुनिक भाषा और विज्ञान के साथ प्रस्तुत करके विश्व को भारत की आध्यात्मिक धरोहर से जोड़ें।

अंततः समाधान यही है कि युवा अपने जीवन में तीन सिद्धांत अपनाएँ—पहला, आत्मज्ञान और आध्यात्मिकता को प्राथमिकता दें; दूसरा, समाज और मानवता के कल्याण को जीवन का उद्देश्य मानें; और तीसरा, आधुनिकता को विवेकपूर्ण ढंग से अपनाएँ। यदि यह संतुलन स्थापित हो जाए, तो भारत न केवल अपनी संस्कृति को सुरक्षित रखेगा, बल्कि विश्व का मार्गदर्शक भी बनेगा।

21वीं सदी का युवा भारतीय संस्कृति और धर्म का ज्ञान रखता है, परंतु वैश्विक आंँधी उसकी आँखों की चमक-दमक को बहलाकर भ्रमित करती है। उसे यह समझना होगा कि स्थायी शांति और शक्ति केवल भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों में है। जब वह धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान पर गंभीर चर्चा करेगा, तभी संस्कृति का संरक्षण संभव होगा। भारतीय एकता का सूत्र तभी गुणात्मक बनेगा जब धार्मिक और सांस्कृतिक सद्भाव युवाओं के जीवन का केंद्र बनेगा। यही सकारात्मक दृष्टिकोण भविष्य का निर्माण करेगा।

निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदुओं में इस बात को और भी आसानी, सहजता और सरलता से समझा जा सकता है- 

1. 21वीं सदी और भारतीय युवाओं की भूमिका

2. वैश्वीकरण और पहचान का संकट

3. भारतीय धार्मिक मूल्यों की प्रासंगिकता

4. आधुनिकता बनाम परंपरा का संतुलन

5. गीता का कर्मयोग और युवा जीवन

6. आध्यात्मिकता और मानसिक संतुलन

7. वैश्विक आंँधी और सांस्कृतिक चुनौतियाँ

8. भारतीय संस्कृति की सार्वभौमिकता

9. योग और ध्यान का वैश्विक महत्व

10. शिक्षा में संस्कार और मूल्य

11. उद्यमिता और समाज कल्याण

12. परिवार और समाज का योगदान

13. विविधता में एकता का आदर्श

14. उपभोक्तावाद और युवाओं की जिम्मेदारी

15. धार्मिक सहअस्तित्व और सद्भाव

16. भारतीयता का वैश्विक संदेश

17. तकनीकी क्रांति और सांस्कृतिक संरक्षण

18. युवा शक्ति और नेतृत्व क्षमता

19. आत्मज्ञान, समाजसेवा और आधुनिकता

20. भारत का भविष्य और विश्व गुरु बनने का मार्ग

रविवार, 31 अगस्त 2025

100 वर्ष की संघ यात्रा: नये क्षितिज ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड

 

100 वर्ष की संघ यात्रा: नये क्षितिज

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अपनी स्थापना से लेकर आज तक भारतीय समाज और राष्ट्र के मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में गहरी छाप छोड़ी है। इसकी यात्रा एक सदी को पार करते हुए जब आज के मोड़ पर खड़ी होती है, तो यह केवल एक संगठन की यात्रा नहीं लगती, बल्कि एक ऐसे विचार, भाव और संकल्प का प्रतीक प्रतीत होती है, जिसने भारत की राष्ट्रीय अस्मिता को नई ऊर्जा दी है। “100 वर्ष की संघ यात्रा” न केवल एक ऐतिहासिक मूल्यांकन का अवसर है, बल्कि आने वाले भविष्य के नये क्षितिज को पहचानने और संकल्पित करने का भी समय है।

संघ की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी। उस समय का भारत विदेशी शासन के दमन और अपमान से पीड़ित था। समाज विभाजित था, जातीय और सांप्रदायिक भेदभाव व्यापक था, और राष्ट्रीय चेतना बिखरी हुई प्रतीत होती थी। ऐसे समय में संघ की स्थापना का मूल उद्देश्य भारतीय समाज को एकात्म करना, उसे संगठित शक्ति के रूप में खड़ा करना और राष्ट्रवाद को व्यावहारिक धरातल पर स्थापित करना था। संघ ने राजनीतिक संघर्ष के बजाय सामाजिक संगठन और अनुशासन को अपना साधन बनाया। यह दृष्टिकोण उसे अन्य आंदोलनों से भिन्न बनाता है।

संघ की विचारधारा में राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक सत्ता प्राप्ति का साधन नहीं था, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भारतीय संस्कृति की चेतना को पुनः स्थापित करने का संकल्प था। इस दृष्टिकोण का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि यह भारतीय मानस की गहरी जड़ों को छूता है। भारत की जनता केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की आकांक्षी नहीं थी, वह सांस्कृतिक स्वराज्य भी चाहती थी। संघ ने इसी भाव को आत्मसात किया और राष्ट्रवाद को एक आंतरिक शक्ति के रूप में देखा।

संघ की कार्यपद्धति पर विचार करें तो पाते हैं कि इसने व्यक्ति-निर्माण पर बल दिया। शाखा इसका मुख्य माध्यम बनी। नियमित शाखा के माध्यम से अनुशासन, संगठन, शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण, और राष्ट्र के प्रति निष्ठा विकसित की गई। यह केवल औपचारिक सभा नहीं थी, बल्कि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह सामूहिक अवचेतन को आकार देने की प्रयोगशाला थी। सामूहिक खेल, व्यायाम, प्रार्थना और विचार-विनिमय के माध्यम से व्यक्तित्व को राष्ट्रोन्मुख बनाने का सतत प्रयास संघ ने किया।

संघ का यह दृष्टिकोण कि “व्यक्ति के निर्माण से समाज का निर्माण और समाज के निर्माण से राष्ट्र का निर्माण” होता है, भारतीय समाजशास्त्र और मनोविज्ञान दोनों के अनुकूल प्रतीत होता है। व्यक्ति को यदि अनुशासन, मूल्य और आदर्श मिलें तो वह समाज में सकारात्मक योगदान देता है। संघ ने यही कार्य किया और राष्ट्रवाद को केवल नारेबाजी से अलग एक जीवंत आचरण का रूप दिया।

देशभक्ति और राष्ट्रवाद संघ के लिए केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं रहे। यह व्यवहार और कार्य में अभिव्यक्त होते रहे। 1947 में स्वतंत्रता के उपरांत, जब भारत विभाजन के त्रासद दौर से गुज़र रहा था, लाखों शरणार्थियों की सेवा संघ स्वयंसेवकों ने की। यह सेवा कार्य केवल मानवीय संवेदना का परिचायक नहीं था, बल्कि यह उस राष्ट्रवादी दृष्टि का विस्तार था जो हर भारतीय को परिवार का सदस्य मानती थी। यही दृष्टिकोण बाद में विभिन्न आपदाओं में संघ के स्वयंसेवकों की सक्रिय उपस्थिति के रूप में दिखता है—चाहे वह प्राकृतिक आपदाएँ हों, युद्धकाल की परिस्थितियाँ हों या सामाजिक सुधार के अभियान।

संघ के कार्यों को यदि सामाजिक मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि संघ ने भारतीय समाज में आत्मविश्वास जगाया। शताब्दियों की दासता और उपनिवेशवाद ने भारतीय मानस में हीनभावना भर दी थी। संघ की शाखाओं ने उस हीनता को तोड़ा और व्यक्तियों को यह विश्वास दिलाया कि वे राष्ट्र की रीढ़ हैं। यह आत्मविश्वास सामाजिक परिवर्तन का आधार बना। यही कारण है कि संघ से प्रेरित अनेक संगठनों और आंदोलनों ने शिक्षा, सेवा, आदिवासी कल्याण, ग्रामीण विकास और राष्ट्रीय एकता के क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान किया।

लोगों की संघ के प्रति आस्था का एक बड़ा कारण यह भी है कि संघ ने केवल विचार प्रस्तुत नहीं किए, बल्कि स्वयंसेवकों के माध्यम से उन्हें जीवन में उतारा। “सेवा ही संगठन” का भाव केवल नारा नहीं रहा, बल्कि लाखों स्वयंसेवकों की दिनचर्या का हिस्सा बना। संघ ने एक अनुशासित और नैतिक बल का निर्माण किया, जिसने राष्ट्रवाद को ठोस सामाजिक रूप दिया। यही कारण है कि संघ आज केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक जनआंदोलन जैसा प्रतीत होता है।

100 वर्षों की इस यात्रा में संघ ने अनेक आलोचनाएँ भी झेली हैं। उसे सांप्रदायिक कहकर आरोपित किया गया, राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित कहा गया और कभी-कभी उसे समाज को विभाजित करने का दोष भी दिया गया। किंतु इन आलोचनाओं के बीच भी संघ का कार्य सतत जारी रहा और समाज में उसका प्रभाव बढ़ता गया। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि आलोचनाओं ने संघ को और अधिक दृढ़ बनाया। इसके स्वयंसेवकों ने इन्हें चुनौती के रूप में लिया और अपने कार्यों को अधिक निष्ठा से जारी रखा।

संघ की शताब्दी यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि इसने समाज में संगठन और एकता की भावना पैदा की। आज जब भारतीय समाज वैश्विकरण, उपभोक्तावाद और सांस्कृतिक आक्रमण के दौर से गुजर रहा है, संघ की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यह केवल परंपरागत मूल्यों की रक्षा का कार्य नहीं कर रहा, बल्कि नये क्षितिज की ओर भी अग्रसर है। तकनीक, शिक्षा और आधुनिकता को आत्मसात करते हुए भी संघ भारतीय संस्कृति की जड़ों को सुदृढ़ करने का कार्य कर रहा है।

भविष्य के परिप्रेक्ष्य में संघ की भूमिका और भी व्यापक दिखाई देती है। “नये क्षितिज” का अर्थ है—भारतीयता को वैश्विक संदर्भ में प्रस्तुत करना, समाज में समरसता और समानता की स्थापना करना, और राष्ट्रवाद को संकीर्ण परिभाषा से निकालकर मानवता के व्यापक हित में खड़ा करना। संघ का यह दृष्टिकोण कि “विश्व को परिवार” के रूप में देखा जाए, नये युग का मार्गदर्शन कर सकता है।

संघ की शताब्दी यात्रा पर गहराई से विचार करते हुए यह कहना समीचीन होगा कि यह केवल संगठन की यात्रा नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज की आत्मा की यात्रा है। यह उस चेतना की यात्रा है जिसने गुलामी से मुक्ति पाई, आत्मविश्वास प्राप्त किया और अब विश्व पटल पर अपने अस्तित्व को नई ऊर्जा के साथ प्रस्तुत कर रही है।

संघ ने राष्ट्रवाद और देशभक्ति को केवल नारों तक सीमित नहीं रखा। इसे जीवन का आचरण बनाया, सेवा का रूप दिया और संगठन के माध्यम से समाज में उतारा। लोगों की आस्था और विश्वास इसी कारण संघ से जुड़ा है, क्योंकि यह केवल विचार नहीं, बल्कि आचरण और सेवा का प्रतीक है।

आज 100 वर्ष की इस यात्रा के बाद जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो एक विराट परिदृश्य सामने आता है—लाखों स्वयंसेवक, हजारों शाखाएँ, सैकड़ों सेवा परियोजनाएँ और करोड़ों लोगों का विश्वास। यह उपलब्धि केवल किसी संगठन की नहीं है, बल्कि यह उस राष्ट्र की है जिसने अपनी चेतना को पुनः जगाया है।

भविष्य की ओर दृष्टिपात करते हुए यह अपेक्षा की जा सकती है कि संघ आने वाले समय में और अधिक व्यापक सामाजिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक कार्यों को आगे बढ़ाएगा। यह नये क्षितिज पर भारत को एक आत्मनिर्भर, आत्मगौरवशाली और विश्वगुरु के रूप में स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त करेगा।

संघ की 100 वर्ष की यात्रा हमें यह सिखाती है कि राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि यह सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक चेतना है। यह चेतना ही लोगों के जीवन में विश्वास, ऊर्जा और दिशा देती है। संघ ने इस चेतना को समाज के जीवन में रोपा और उसे पल्लवित किया। यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

इस प्रकार “100 वर्ष की संघ यात्रा” केवल अतीत की स्मृति नहीं है, बल्कि भविष्य का संकल्प भी है। यह यात्रा हमें यह विश्वास दिलाती है कि जब समाज संगठित होता है, जब राष्ट्र की चेतना जागती है और जब सेवा को सर्वोपरि रखा जाता है, तभी नये क्षितिज निर्मित होते हैं। संघ ने यह कार्य किया है और आगे भी करता रहेगा।

इस प्रकार “100 वर्ष की संघ यात्रा” का निष्कर्ष निकाला जाए तो निम्नलिखित बिंदुओं में इसे सूक्ष्म रूप में समझा जा सकता है -

1. संघ की शताब्दी यात्रा : केवल संगठन नहीं, चेतना की यात्रा।

2. 1925 में स्थापना : विभाजित समाज में एकात्मता का संकल्प।

3. राष्ट्रवाद की व्यापक अवधारणा : राजनीति से परे सांस्कृतिक स्वराज्य।

4. शाखा पद्धति : व्यक्ति-निर्माण से राष्ट्र-निर्माण तक

5. सेवा कार्य : शरणार्थियों से आपदाओं तक मानवीय संवेदना का विस्तार।

6. आलोचनाओं के बीच दृढ़ता : चुनौतियों को अवसर में बदलने की क्षमता।

7. सामाजिक-मनौवैज्ञानिक योगदान : आत्मविश्वास और संगठन का निर्माण।

8. वैश्वीकरण और सांस्कृतिक आक्रमण के दौर में संघ की प्रासंगिकता।

9. नये क्षितिज : विश्व को परिवार मानने की दृष्टि।

10. भविष्य का संकल्प : आत्मनिर्भर और विश्वगुरु भारत की ओर।

बुधवार, 27 अगस्त 2025

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और युवा शक्ति: 21वीं सदी की चुनौतियाँ ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और युवा शक्ति: 21वीं सदी की चुनौतियाँ

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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भारत माता की संतानो, जब हम आज के भारत की तस्वीर पर दृष्टि डालते हैं तो सबसे पहले हमारी दृष्टि इस देश की युवा शक्ति पर ठहरती है। यही युवा इस राष्ट्र की धड़कन हैं, इसकी ऊर्जा हैं और भविष्य की दिशा भी। विश्व की सबसे बड़ी युवा जनसंख्या भारत के पास है और यही हमारे लिए सबसे बड़ा वरदान है। यदि यह विराट ऊर्जा सही दिशा में प्रवाहित हो तो भारत पुनः विश्वगुरु के सिंहासन पर प्रतिष्ठित हो सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने आरंभ से ही इस सत्य को पहचाना और अपना मूलमंत्र बनाया—“राष्ट्र प्रथम”। संघ जानता है कि यदि युवा जागता है तो राष्ट्र जागता है, और यदि युवा शिथिल हो जाता है तो राष्ट्र भी जर्जर हो जाता है।

संघ की शाखाओं में खिलखिलाते बाल स्वयंसेवकों का अनुशासनबद्ध खेल, प्रार्थना और समरसता यह प्रमाणित करते हैं कि राष्ट्रनिर्माण कोई पुस्तक का अध्याय नहीं बल्कि जीवन का साधना-पथ है। संघ ने हमेशा युवाओं को केवल दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय साधक बनाया है। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था—“मुझे केवल सौ ऊर्जावान, पवित्र और निःस्वार्थ युवा मिल जाएँ तो मैं भारत का कायाकल्प कर दूँ।” यह वचन आज भी संघ की शाखाओं में गूंजता है और युवाओं को यह स्मरण कराता है कि उनकी ऊर्जा केवल व्यक्तिगत सफलता के लिए नहीं, अपितु राष्ट्र के उत्कर्ष के लिए है।

इतिहास साक्षी है कि जब-जब युवाओं ने अपने आत्मबल को राष्ट्र के लिए समर्पित किया, भारत ने नई दिशा पाई। छत्रपति शिवाजी महाराज ने युवावस्था में ही संकल्प लिया था कि भारत की धरती पर विदेशी सत्ता को स्वीकार नहीं करेंगे। छत्रपति शिवाजी महाराज का स्वराज्य केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं था, बल्कि भारतीय समाज के आत्मविश्वास, स्वतंत्रता और न्याय की अनवरत यात्रा की शुरुआत थी। छत्रपति शिवाजी महाराज का स्वराज्य केवल सत्ता या राजसिंहासन पाने का सपना नहीं था, बल्कि यह था जनता के हक़ और आत्मसम्मान का आंदोलन। उनके लिए राज्य का अर्थ था—जनकल्याण, धर्म-सहिष्णुता, न्याय और सुरक्षा। राजनीतिक दृष्टि से उनका स्वराज्य आज भी प्रेरणा है। उन्होंने सत्ता को वंश परंपरा की जागीर नहीं, बल्कि जनता की जिम्मेदारी माना। उनकी शपथ थी कि—“यह स्वराज्य दैवप्रदत्त नहीं, बल्कि परिश्रम, साहस और त्याग से अर्जित करना है।” यही आत्मगौरव आज के युवाओं में भी जागृत होना चाहिए। (RSS) संघ इस चेतना को जगाता है कि भारतीयता केवल शब्द नहीं, बल्कि आत्मा का घोष है।

21वीं सदी के युवाओं के सामने चुनौतियाँ भी कम नहीं। बेरोजगारी, कौशल की कमी, नशाखोरी, मानसिक तनाव और पश्चिमी उपभोक्तावादी संस्कृति ने युवाओं के मार्ग में अनेक अवरोध खड़े किए हैं। सोशल मीडिया का मायाजाल उन्हें आभासी जगत में खींच लेता है, जहाँ वास्तविक जीवन की कठोर साधना के स्थान पर त्वरित सुख और दिखावे की प्रवृत्ति पनपती है। ऐसे समय में संघ का अनुशासन युवाओं को दिशा देता है। डॉ. हेडगेवार जी ने कहा था—“हमारा लक्ष्य ऐसा राष्ट्र निर्माण है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपने को हिंदू संस्कृति का प्रहरी समझे।” यही प्रहरी बनने के लिए युवा शक्ति को आत्मानुशासन और राष्ट्रभावना से सुसज्जित करना अनिवार्य है।

संघ के जीवन में खेल, प्रार्थना और सेवा केवल औपचारिकताएँ नहीं, बल्कि जीवन के प्रशिक्षण मंत्र हैं। गुरुजी गोलवलकर जी ने स्पष्ट कहा था—“व्यक्ति बनता है तो राष्ट्र बनता है। व्यक्ति गिरता है तो राष्ट्र भी गिरता है।” अतः संघ पहले व्यक्ति का निर्माण करता है, उसके चरित्र को दृढ़ करता है और फिर उसी व्यक्ति से राष्ट्र की सेवा का बीज बोता है। जब लाखों स्वयंसेवक प्रतिदिन शाखाओं में खेलते, सीखते और सेवा का संकल्प लेते हैं तो वे केवल स्वयं को नहीं गढ़ते, वे भारत के भविष्य को गढ़ते हैं।

शिक्षा और कौशल विकास में भी संघ की दृष्टि अत्यंत व्यापक रही है। शिक्षण संस्थानों, गुरुकुलों और विभिन्न वैचारिक मंचों के माध्यम से युवाओं को केवल पाठ्यपुस्तक नहीं, बल्कि जीवन-पुस्तक पढ़ाई जाती है। यह शिक्षा उन्हें स्वावलंबन की राह दिखाती है। यही कारण है कि संघ-प्रेरित अनेक संगठन ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं को रोजगार और उद्यमिता की ओर अग्रसर कर रहे हैं।

21वीं सदी के भारत में सामाजिक चुनौतियाँ भी गंभीर हैं। जातिवाद, संप्रदायवाद और असमानता की दीवारें अभी भी समाज में विद्यमान हैं। लेकिन संघ का प्रयास इन्हें तोड़कर एक अखंड भारत की रचना करना है। संघ महिलाओं को समाज की आधी शक्ति मानता है और उनके सशक्तिकरण को आवश्यक मानता है। आपदाओं के समय संघ-प्रेरित स्वयंसेवकों का सेवाकार्य विश्व ने देखा है—चाहे भूकंप हो, बाढ़ हो या महामारी, संघ के कार्यकर्ता प्रथम पंक्ति में खड़े मिलते हैं। यह सेवा केवल राहत का कार्य नहीं, बल्कि “समाज मेरा परिवार है”, 'मैं मेरे राष्ट्र के लिए ' होने का एक जीवंत भावात्मक उदाहरण है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दृष्टि अद्वितीय है। आज प्रवासी भारतीय युवा दुनिया के कोने-कोने में भारतीय संस्कृति का गौरवपूर्ण ध्वज फहरा रहे हैं। “वसुधैव कुटुंबकम्” का आदर्श केवल ग्रंथों तक सीमित न रहकर व्यवहार में भी जीवन बन जाए—संघ इसी दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है। वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने स्पष्ट कहा है—“युवा अपने जीवन का उद्देश्य केवल स्वयं के लिए न खोजें, बल्कि राष्ट्र के लिए तय करें, तभी जीवन सार्थक और प्रेरक होगा।” यही संदेश आज की पीढ़ी के लिए सबसे प्रासंगिक और प्रेरक है।

निस्संदेह, संघ पर समय-समय पर आलोचनाएँ भी होती रही हैं। उसकी राजनीति से निकटता या वैचारिक दृष्टिकोण पर प्रश्न उठते हैं। किंतु सत्य यह है कि संघ का मूल कार्यक्षेत्र राजनीति नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण है। संघ जानता है कि यदि समाज सुदृढ़ और सशक्त होगा, तो राजनीति स्वतः ही राष्ट्रहित में संचालित होगी। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने कहा था—“राष्ट्रवाद कोई संकुचित अवधारणा नहीं, यह तो प्राणों में बसने वाला भाव है।” यही भाव संघ के कार्यकर्ता को प्रेरित करता है कि वह हर परिस्थिति में राष्ट्र के लिए समर्पित रहे, स्वयं परिश्रम करे, पूरी ईमानदारी और मेहनत से राष्ट्र के विकास में योगदान दे। जब व्यक्ति अपने कर्तव्यों और परिश्रम को अपने जीवन का आधार बनाएगा, तभी राष्ट्र के लिए सच्चा समर्पण संभव होगा और यही भाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सबसे बड़ी शक्ति है।

आज का भारत अवसरों का देश है। विज्ञान, तकनीक और नवाचार के क्षेत्र में हमारी युवा पीढ़ी वैश्विक मानचित्र पर अपनी विशिष्ट पहचान बना रही है। किंतु यदि यह अद्भुत प्रतिभा राष्ट्र से कटकर केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित रह गई, तो उसका वास्तविक मूल्य समाप्त हो जाएगा। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था—“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” यह लक्ष्य केवल व्यक्तिगत सफलता का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के उत्थान और सामूहिक गौरव का होना चाहिए।

संघ की शाखाओं में साधारण दिखने वाले स्वयंसेवक ही इस अदृश्य, अटूट शक्ति के प्रतीक हैं। उनका जीवन न किसी पुरस्कार की आकांक्षा में बंधा है, न प्रसिद्धि की लालसा में लिप्त, बल्कि पूरी तरह राष्ट्र की सेवा में निःस्वार्थ रूप से समर्पित है। यही जीवनशैली, यही अडिग आत्मानुशासन, और यही प्रखर राष्ट्रप्रेम आज के युवा के लिए प्रकाशस्तंभ है—जो उन्हें सिर्फ मार्ग दिखाता नहीं, बल्कि उनके हृदय में जागरूकता और साहस की अग्नि प्रज्ज्वलित करता है।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि 21वीं सदी भारत के लिए अवसरों और चुनौतियों का युग है। यदि हमारी युवा शक्ति राष्ट्र के प्रति सजग, कर्तव्यनिष्ठ और समर्पित हो जाए, तो न केवल भारत पुनः विश्वगुरु बन सकता है, बल्कि वह समग्र मानवता के लिए मार्गदर्शक भी बन सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल एक संगठन नहीं, बल्कि युवाओं का प्रेरक, मार्गदर्शक और संस्कारयुक्त साधक है। छत्रपति शिवाजी महाराज जी की अद्भुत वीरता, स्वामी विवेकानंद जी का प्रखर साहस, आदरणीय डॉ. हेडगेवार जी का दूरदर्शी दृष्टिकोण, गुरुजी गोलवलकर जी का चरित्र निर्माण और आदरणीय मोहन भागवत जी का आह्वान—इन सभी का अद्भुत संगम ही संघ की पहचान है और यही शक्ति युवाओं को राष्ट्र के प्रति उत्साहित करती है।

आज भारत की युवा शक्ति से यही आह्वान है—भारत माता की सेवा ही परम धर्म है, और राष्ट्र का उत्थान ही जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य। यदि हर युवा अपने कर्तव्य का निर्वहन उत्तरदायित्व और निष्ठा के साथ करे, सतत परिश्रम, नैतिक चरित्र और मानवीय मूल्यों को अपना आधार बनाए, जन सरोकार और पर्यावरण जैसे जीवनदायिनी मुद्दों के प्रति आस्था प्रकट करे और शिक्षा, ज्ञान, चिकित्सा, कृषि तथा विज्ञान–तकनीक के विविध क्षेत्रों में ईमानदारीपूर्वक राष्ट्रहित में कार्य करे—तो निश्चित ही भारत वैश्विक स्तर पर एक अद्वितीय पहचान स्थापित करेगा। तब आने वाली पीढ़ियाँ श्रद्धा से कहेंगी—“भारत पुनः जगतगुरु बना, और समस्त मानवता ने यहाँ आकर सत्य, ज्ञान और जीवन का मार्ग पाया।”


शनिवार, 23 अगस्त 2025

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) धर्म, संस्कृति और मानवता : राष्ट्रवाद के विशेष संदर्भ - ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) धर्म, संस्कृति और मानवता : राष्ट्रवाद के विशेष संदर्भ -

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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भारतभूमि की आत्मा उसके प्राणतत्व में निहित है, और वह प्राणतत्व है—सनातन धर्म। युगों से यह भूमि न केवल ऋषियों-मुनियों का तपोवन रही है, बल्कि धर्म, संस्कृति और मानवता का अखंड स्रोत भी रही है। जब-जब विश्व ने अंधकार और असंतुलन का सामना किया, तब-तब इस धरती से यह उद्घोष गूँजा—“आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।” यही उद्घोष मानवता की रक्षा, संस्कृति की रक्षा और राष्ट्रवाद की सशक्त घोषणा है। इसी भाव को नवजागरण की धारा प्रदान करता है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिसके स्वर से गूँजता है हिंदुत्व का शंखनाद और सनातन संस्कृति का विजयगान।

मानव जीवन की परिभाषा मात्र भौतिक उपलब्धियों और सांसारिक सुखों तक सीमित नहीं है। जब तक जीवन में धर्म की आधारशिला, संस्कृति की छवि और मानवता की सुवास न हो, तब तक मनुष्य पूर्ण नहीं माना जा सकता। यही दृष्टि भारत की आत्मा है और यही भावनाएँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरक धारा के रूप में प्रवाहित होती रही हैं।

सनातन धर्म कोई एक पंथ या संप्रदाय का नाम नहीं, यह तो वह शाश्वत सत्य है जो अनादि से प्रवाहित है। यह केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन का पूर्ण दर्शन है। संघ इसी सत्य का प्रतिपादन करता है कि धर्म तभी जीवित है जब वह आचरण में उतरे। व्यक्ति, समाज और राष्ट्र तभी सशक्त होंगे जब उनका चरित्र धर्म और संस्कृति से ओत-प्रोत होगा। यही धर्म का मर्म है और यही राष्ट्रवाद की आत्मा है—जहाँ प्रत्येक नागरिक स्वयं को राष्ट्र की आत्मा से अभिन्न मानता है।

आज का युग उपभोक्तावाद और भौतिकता की अंधी दौड़ का है। मनुष्य ने अपने अस्तित्व को केवल सुख-सुविधाओं में बाँध लिया है। किंतु संघ स्मरण कराता है कि भारतीयता का मापदंड केवल भौतिक भोग नहीं, बल्कि त्याग, संयम, सेवा और आत्मानुशासन है। स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था—“उठो, जागो और अपने लक्ष्य की प्राप्ति तक रुको मत।” यह आह्वान केवल आत्मोत्थान का नहीं था, बल्कि राष्ट्रोत्थान का भी था। विवेकानंद का राष्ट्रवाद इसी में निहित था कि प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर की शक्ति को पहचानकर राष्ट्र के लिए समर्पित हो। संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक इसी विचार का संवाहक है।

संघ के कार्यों में हम देखते हैं कि धर्म और संस्कृति कोई संग्रहालय की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन का प्रवाहमान स्वरूप हैं। शाखाओं में साधारण स्वयंसेवक जब गीत गाता है, प्रार्थना करता है, दंड उठाता है, तो वह केवल व्यायाम नहीं करता—वह राष्ट्रवाद का संस्कार अपने भीतर भरता है। यह परंपरा केवल अनुशासन की नहीं, बल्कि आत्मगौरव और राष्ट्रीय अस्मिता की यात्रा है।

हिंदू धर्म की विशालता यह है कि वह किसी को पराया नहीं मानता। उसका उद्घोष है—“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।” यही सार्वभौमिक दृष्टि भारत को विश्वगुरु बनाती है। संघ इसी दृष्टि को व्यवहार में उतारने का प्रयत्न करता है। हिंदू राष्ट्र का विचार किसी संकीर्णता का नाम नहीं, बल्कि इस विराट दृष्टि की परिणति है। हिंदू राष्ट्र का अर्थ है वह राष्ट्र जो धर्म, संस्कृति और मानवता के मूल्यों पर आधारित हो। यही राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप है।

भारतीय इतिहास गवाह है कि यहाँ की संस्कृति ने सदैव मानवता का संरक्षण किया। जब रोमन साम्राज्य का वैभव समाप्त हो रहा था, तब नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों से ज्ञान की गंगा प्रवाहित हो रही थी। जब यूरोप अंधकार युग में डूबा था, तब भारत के उपनिषद मानवता के लिए प्रकाश बनकर जगमगा रहे थे। गुरु गोविंद सिंह ने अपने जीवन से यह सिखाया कि राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए बलिदान ही सच्चा आभूषण है। उनके जीवन का प्रत्येक क्षण इस बात का प्रमाण है कि धर्म और राष्ट्रवाद एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं।

भाषा संस्कृति की आत्मा है। संघ का आग्रह है कि मातृभाषा का संरक्षण हो। अंग्रेज़ी या अन्य भाषाएँ ज्ञान अर्जन का साधन हो सकती हैं, लेकिन आत्मा की अभिव्यक्ति मातृभाषा में ही संभव है। रामकृष्ण परमहंस जी ने कहा था—“धर्म को अनुभव करो, केवल चर्चा मत करो।” यह अनुभव तभी संभव है जब भाषा में आत्मीयता हो। मातृभाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि संस्कृति और राष्ट्रवाद का वाहक है।

संघ की सेवा-परंपरा में मानवीय सरोकारों का अद्वितीय रूप दिखाई देता है। बाढ़, भूकंप, महामारी या किसी भी संकट की घड़ी हो, संघ का स्वयंसेवक बिना भेदभाव के सहायता करता है। यह सेवा केवल परोपकार नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद का जीता-जागता उदाहरण है। छत्रपति शिवाजी महाराज जी ने भी अपने जीवन से यह दिखाया कि राष्ट्र की सेवा ही धर्म की सर्वोच्च साधना है। छत्रपति शिवाजी महाराज जी ने अपने पराक्रम से हिंदवी स्वराज्य की स्थापना कर यह संदेश दिया कि राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक अवधारणा नहीं, बल्कि संस्कृति और धर्म की रक्षा का संकल्प है।

भारतीय संस्कृति का आदर्श है—“परहित सरिस धर्म नहीं भाई।” जब हम परहित को धर्म मानते हैं, तभी संवेदनाएँ जागृत होती हैं। संघ का उद्देश्य ऐसा समाज गढ़ना है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्रहित में अपने जीवन को समर्पित करे। यही वह राष्ट्रवाद है जहाँ व्यक्तिगत स्वार्थ मिटकर समाज और राष्ट्र के लिए जीवन खिला देता है।

हिंदुत्व का शंखनाद केवल धार्मिक उद्घोष नहीं, यह राष्ट्रीय आत्मगौरव का उद्घोष है। यह स्मरण दिलाता है कि हम सनातन परंपरा के उत्तराधिकारी हैं। हिंदुत्व का अर्थ संकीर्णता में बंधना नहीं, बल्कि सार्वभौमिकता में विस्तार पाना है। यही शंखनाद जब समाज में गूँजता है तो प्रत्येक नागरिक के भीतर राष्ट्रवाद का दीपक प्रज्ज्वलित होता है।

आज आवश्यकता है कि हम इन आदर्शों को जीवन में उतारें। यदि धर्म केवल ग्रंथों में रहेगा तो वह मृत हो जाएगा, यदि संस्कृति केवल उत्सवों में सिमट जाएगी तो उसका जीवंत स्वरूप समाप्त हो जाएगा। संघ हमें प्रेरित करता है कि धर्म को आचरण में, संस्कृति को व्यवहार में और राष्ट्रवाद को आत्मगौरव में उतारें। यही जीवन की सच्ची साधना है।

संघ के शताब्दी की ओर अग्रसर कार्यकाल ने सिद्ध कर दिया है कि राष्ट्र-निर्माण केवल राजनीति से संभव नहीं। सत्ता बदल सकती है, लेकिन समाज का चरित्र यदि जाग्रत हो जाए तो राष्ट्र स्थायी रूप से सशक्त हो जाता है। यही राष्ट्रवाद का वास्तविक स्वरूप है—चरित्र, संस्कृति और सेवा का समन्वय।

सनातन संस्कृति हमें यह सिखाती है कि जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल भोग नहीं, बल्कि मोक्ष है। भौतिकता की चमक में जब मनुष्य अपना पथ भूल जाता है, तब संघ स्मरण कराता है कि तुम्हारा लक्ष्य केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि राष्ट्र की सेवा और मानवता की उन्नति है। यही राष्ट्रवाद है जहाँ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा राष्ट्रहित में बदल जाती है।

अंततः यही कहा जा सकता है कि धर्म, संस्कृति और मानवता—ये तीनों एक ही सूत्र में गुँथे हुए हैं। धर्म हमें आचरण की दिशा देता है, संस्कृति हमें गौरव और पहचान देती है, और मानवता हमें सेवा और करुणा की प्रेरणा देती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इन तीनों का संगम है। उसका प्रत्येक स्वर, प्रत्येक कार्य, प्रत्येक संदेश यही उद्घोष करता है कि हिंदुत्व का जागरण ही सच्चा राष्ट्रवाद है और यही राष्ट्रवाद संपूर्ण मानवता का उत्थान है। जब यह जागरण होगा तभी विश्व में शांति, करुणा और सद्भाव की स्थापना होगी। यही वह विजयघोष है जो आने वाले युगों में ध्वनित होता रहेगा।

बुधवार, 20 अगस्त 2025

महादेव का डमरू (कहानी) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

महादेव का डमरू (कहानी) 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत 


कैलाश की श्वेत शिखर-मालाएँ रात के अंधेरे में स्वर्णाभ चमक रही थीं। चंद्रमा का दूधिया प्रकाश जब बर्फ की परतों पर बिखरता, तो ऐसा लगता मानो स्वयं चंद्रशेखर अपनी जटाओं से अमृत झर रहे हों। देवदार और चीड़ के वृक्षों पर ठहरी बर्फ की शांति वैसी ही थी जैसी स्थाणु की अचलता—जो काल और परिस्थिति के पार खड़ी रहती है। हवा शाखाओं से टकराकर गूँजती तो लगता मानो किसी अदृश्य स्वर में महाकाल का उद्घोष हो रहा हो, और झरनों की कल-कल लय, शिलाओं की निस्तब्धता के साथ मिलकर आदियोगी का शाश्वत संगीत रच रही हो।

आकाश के तारे हिमालय की धवल शिखाओं पर बिखरे स्वर्ण कण जैसे चमकते, मानो त्रिलोचन की तीसरी आँख से झरते दिव्य नक्षत्र हों। बर्फ की ढलानों पर चाँदनी की आभा ऐसी प्रतीत होती जैसे शशिभूषण का मस्तक धरती पर अपनी आभा बिखेर रहा हो। हिमगुफाओं से उठती श्वेत धुंध में ऐसा लगता जैसे महेश्वर की श्वासें ब्रह्मांड में विलीन होकर आकाश से संवाद कर रही हों। मंद-मंद बहती बयार में देवदार की सुगंध घुलकर ऐसा आभास देती मानो गंगाधर की धारा हवा के साथ झर रही हो। दूर हिमशिखरों से दूध जैसी धाराएँ बहतीं, तो प्रतीत होता जैसे स्वयं शम्भु करुणामयी अंचल खोलकर जगत को आशीष दे रहे हों।

पूरा दृश्य केवल सौंदर्य का नहीं, बल्कि संकेत का चित्र था—मानो प्रकृति स्वयं कह रही हो कि कोई अदृश्य शक्ति अपने विराट आगमन की तैयारी कर रही है। हर बर्फ का कण भूतनाथ का स्तवन कर रहा था, हर तारा महेश्वर की झलक बन चमक रहा था, और हर हवा की लहर महाकालेश्वर के नाद में बदल रही थी। यह समूची वसुंधरा, यह आकाश, यह निस्तब्धता—सब मिलकर पर्दा उठा रहे थे उस अनन्त नाटक का, जिसमें प्रवेश करने वाले थे स्वयं नटराज। और तभी वातावरण में पहली बार गूँजी वह थाप, जो न केवल समय को चीरती थी बल्कि अनन्तता का उद्घोष करती थी—“ॐ नमः शिवाय।”

महादेव इस विराट निस्तब्धता के केंद्र में अविचल ध्यानमग्न बैठे थे। उनके आगमन से मानो सम्पूर्ण प्रकृति अपनी श्वास रोककर खड़ी हो गई हो। उनके विशाल कंधों पर बर्फ के शिखरों की उज्ज्वल आभा विराजमान थी और उनकी जटाओं से झरते गंगाजल की बूँदें धरती को ऐसे सींच रही थीं जैसे ब्रह्मांड का अमृत टपक रहा हो। हिमालय की चोटियाँ उनकी पीठ के पीछे प्रहरी की तरह खड़ी थीं, और आकाश उनके ललाट का तिलक बन गया था।

वातावरण में अचानक एक भयंकर गंभीरता उतर आई। पहाड़ों की दरारों से गर्जन की ध्वनियाँ निकलने लगीं, मानो शिलाएँ स्वयं अपने भीतर छिपे रहस्यों को उद्घाटित करने लगी हों। आकाश में घूमते बादल बिजली की तलवारें चमकाने लगे और ऐसा प्रतीत हुआ मानो सृष्टि स्वयं किसी अदृश्य युद्ध की तैयारी कर रही हो। देवदार के वृक्ष हवा से काँप उठे, उनकी शाखाएँ किसी अज्ञात भय में करुण स्वर निकालने लगीं। दूर के झरनों की गर्जना भी एकाएक तीव्र हो गई, जैसे उनके भीतर की धाराएँ महादेव के स्वरूप को प्रणाम कर रही हों।

उनकी आँखों में शून्य की गहराई और अग्नि की दहकन साथ-साथ दिखाई देती थी। उनके चरणों के पास बैठा नंदी अचल पर्वत जैसा स्थिर था, पर उसकी आँखों में गर्व और श्रद्धा की ज्वाला नृत्य कर रही थी। उनके कंठ से निकलती मंद ध्वनि में समुद्र की गरज, अग्नि की चटकन और आकाश की गूँज समाहित थी।

और फिर—उनके हाथों में वह डमरू था, जिसकी एक थाप सृष्टि को हिला देने की सामर्थ्य रखती है। जब उन्होंने उसे उठाया, तो ऐसा लगा मानो समय अपनी धड़कन भूल गया हो। पर्वत हिल उठे, नदियाँ ठिठक गईं, हवाएँ सन्नाटे में बदल गईं, और वृक्षों ने अपनी शाखाएँ फैला दीं—मानो समस्त सृष्टि इस दिव्य ध्वनि के आलाप में सम्मिलित होने के लिए उतावली हो उठी हो।

स्वर्गलोक में जैसे ही डमरूकेश्वर महादेव की ध्वनि पहुँची, इन्द्रसभा की चकाचौंध अचानक काँच के महल की तरह दरकने लगी। सोने की दीवारें तड़ककर अपनी आभा खो बैठीं, इन्द्रासन हिल उठा मानो उसके नीचे की नींव ही खोखली हो गई हो। देवगण, जो अपने पद और अधिकारों की मखमली चादर में लिपटे हुए बैठे थे, अचानक ऐसे तिलमिला उठे जैसे किसी ने उनकी असलियत का नकाब नोच लिया हो।

अप्सराओं का नृत्य बीच आकाश में ही थम गया। उनके पाँव की पायलें बेसुरी होकर ऐसे झंकारने लगीं जैसे टूटे हुए वाद्ययंत्र। गीतों की तान अचानक बेमानी लगने लगी—मानो मधुरता का आवरण उतरते ही नग्न शोर बचा रह गया हो। स्वर्ण-मोती की चमक उस ध्वनि के आगे ऐसे लगने लगी जैसे मिट्टी में फेंके हुए काँच के टुकड़े।

इन्द्र का मुकुट डगमगाने लगा, और उसकी आँखों में पहली बार वह भय उतर आया जिसे वह सामान्यतः केवल मनुष्यों पर फेंकता था। देवता आपस में फुसफुसाकर पूछने लगे—“यह कैसी ध्वनि है जो हमें भीतर से खाली कर रही है? यह क्यों हमें हमारे ही वैभव पर संदेह करा रही है?” उनकी बेचैनी इस बात का प्रमाण थी कि डमरू की थाप ने उनके मनोमंदिर की दीवारें हिला दी थीं।

वह ध्वनि एक व्यंग्य बनकर उनके कानों में गूँजी—
“हे इन्द्र! तुम्हारा स्वर्ग केवल सजे हुए मंच का दृश्य है, वास्तविकता नहीं। तुम्हारा गर्व उसी तरह क्षणभंगुर है जैसे बादलों में बिजली की चमक, जो पल भर में बुझ जाती है। तुम्हारे रत्न, तुम्हारी आभा, तुम्हारी सत्ता—सब एक नाटक है, और यह नाटक डमरू की पहली थाप में ही धराशायी हो सकता है।”

स्वर्ग की दीवारों पर यह व्यंग्यात्मक प्रतिध्वनि ऐसे गूँज रही थी मानो ब्रह्मांड स्वयं आईना पकड़कर कह रहा हो—
“जिस वैभव को तुम अनंत समझते हो, वह महज सजावट है; असली स्वर्ग वहाँ है जहाँ नदी की धारा करुणा बनकर बहती है, जहाँ वनों की हरियाली जीवन की साँसें सँभालती है, और जहाँ बर्फ की श्वेतता में निस्पृहता की पवित्रता चमकती है।”

इन्द्रसभा में बैठे देवता पहली बार समझ रहे थे कि उनका भय वास्तव में सिंहासन खोने का नहीं, बल्कि अपने भीतर के शून्य से सामना करने का है।

मानव लोक में डमरूकेश्वर महादेव की थाप पहुँची तो वह किसी साधारण ध्वनि की तरह नहीं थी, बल्कि जैसे ब्रह्मांड ने एकाएक “फायर अलार्म” बजा दिया हो। शहरों की नीऑन लाइटें, जो रात को कृत्रिम दिन में बदल देती थीं, उस ध्वनि के सामने ऐसे बुझीं जैसे परीक्षा में नकल करते पकड़े गए छात्र अचानक बेंच पर झुक जाते हैं। गाड़ियों के हॉर्न, इंजन और ब्रेक की चीख उस गूँज में ऐसे थरथराने लगे मानो सारा यातायात खुद अपने पापों का चार्ट बनाकर ब्लैकबोर्ड पर टाँग दिया हो।

फैक्ट्रियों की चिमनियाँ, जो हर पल धुआँ उगलती थीं, डमरू की थाप पर खाँसते-खाँसते हाँफने लगीं। ऐसा लगा मानो खुद मशीनें यह स्वीकार कर रही हों कि वे सिर्फ प्रगति के नाम पर प्रदूषण की पर्ची बाँट रही थीं। नदियाँ, जिन्हें बाँधों की जंजीरों में जकड़ा गया था, अचानक बिफरकर गरज उठीं—“तुमने हमें कैद किया है, पर हर बूँद में विद्रोह है। हम वह विद्यार्थी हैं जिसे दबाया गया है, पर एक दिन यही बगावत पूरी कक्षा को हिला देगी।” जंगलों के ठूँठ, जो मौन गवाही देते खड़े थे, वे इस नाद में बोल उठे—“हमारी जड़ों को काटकर तुमने जो सभ्यता गढ़ी है, वही तुम्हारा प्रश्नपत्र बनेगी, और इस परीक्षा में तुम्हारे पास कोई उत्तर नहीं होगा।”

राजनीति की सभाओं में भूचाल आ गया। नेता अपने खोखले भाषणों से जनता को बहलाने लगे, पर डमरू की तान ने उनके वक्तव्यों को ऐसे उड़ा दिया जैसे किसी छात्र की कॉपी पर लाल स्याही से लिख दिया गया हो—“फेल।” उनकी नीतियाँ बर्फ पर लिखी घोषणाओं की तरह दिखने लगीं, जो धूप आते ही गायब हो जाती हैं।

मीडिया के पन्ने और स्क्रीन इस नाद के व्यंग्य में हँसने लगे। अखबारों की सुर्खियाँ अपने ही अक्षरों पर तंज कसने लगीं—“सत्य को दबाकर छापा नहीं जा सकता, जैसे गणित का गलत हल सौ बार लिखकर भी सही नहीं होता।” टीवी की बहसें, जिनमें एंकर शोर को ज्ञान समझकर परोसते थे, डमरू की गूँज में ऐसे लगने लगीं जैसे माइक से उल्टा करंट गुजर गया हो।

छात्र, जो इस सारे दृश्य को देखते हुए पीढ़ियों के भविष्य का गणित हल करने की कोशिश कर रहे थे, भीतर से काँप उठे। डमरू का हर नाद उन्हें यह समझा रहा था कि यह सभ्यता किसी प्रयोगशाला का असफल प्रयोग है—जहाँ मशीनें तो बनीं, पर मनुष्यता का “डेटा” खो गया। यह गूँज छात्रों को ऐसे सावधान कर रही थी जैसे परीक्षा हॉल में घंटी बजने से पहले चेतावनी दी जाती है—“समय कम है, उत्तर खोज लो, वरना कॉपी अधूरी रह जाएगी।”

महादेव का डमरू यहाँ महज़ वाद्य नहीं था, बल्कि एक क्वांटम चेतावनी था। उसने मानवलोक को दिखा दिया कि उनके सारे षड्यंत्र, चालाकियाँ और तकनीकी चमत्कार उस गूँज के आगे खिलौने हैं। यह नाद भयावह भी था और करुण भी—जैसे कोई शिक्षक आखिरी बार छात्र से कह रहा हो—
“पढ़ लो बेटा, वरना यह सृष्टि तुम्हारे नालायकी के लिए शून्य अंक लिख देगी।”

पाताल लोक में अंधकार पसरा था। यह अंधकार कोई साधारण अँधेरा नहीं था, बल्कि जैसे किसी “ब्लैक-हैट हैकर” का सर्वर रूम हो जहाँ षड्यंत्र डेटा पैकेट्स बनकर घूम रहे हों। नाग और असुर गुफाओं की दरारों में अपने योजनाओं की कोडिंग कर रहे थे—किस तरह तीनों लोकों के सिस्टम में घुसपैठ की जाए, कैसे “ट्रोजन” डालकर सत्ता को हैंग कर दिया जाए। उनकी फुसफुसाहटें वैसी थीं जैसे इंटरनेट के अंधेरे कोनों में गूँजती हुई डार्क वेब की गुप्त चैट।

तभी महादेव के डमरू की थाप वहाँ पहुँची।
वह कोई साधारण आवाज़ नहीं थी, बल्कि जैसे कॉस्मिक साउंड वेव ने फायरवॉल तोड़कर सीधा हैकिंग रूम में एंट्री मार दी हो।

अंधकार चीरकर वह ध्वनि गुफाओं में टकराई तो नागों के फन काँप उठे। उनकी आँखें वैसी फड़फड़ाईं जैसे किसी साइबर अपराधी की स्क्रीन अचानक “एरर 404” दिखाने लगे।

एक नाग ने काँपते हुए कहा—
“यह ध्वनि हमें चुभ रही है।”
दूसरे नाग ने उत्तर दिया—
“क्योंकि यह व्यंग्य है। यह हमें बता रही है कि हमारी चालाकियाँ उतनी ही क्षणिक हैं जितनी मोबाइल स्क्रीन पर टिक-टॉक वीडियो—कुछ सेकंड की चमक, फिर शून्य। और याद रखो, यह कोई सामान्य ध्वनि नहीं है—यह तो हमारे आराध्य डमरूकेश्वर महादेव का ही डमरू है, जो हमें सावधान कर रहा है कि अंधकार की सीमा यहीं समाप्त होती है।”

पाताल की दीवारें डमरू की गूँज से हिलने लगीं। गुफाओं में फैले षड्यंत्र कोड, हैकिंग प्लान और विषैले डेटा ऐसे राख हो गए मानो किसी ने “डिलीट ऑल” का बटन दबा दिया हो। असुरों की सेनाएँ, जो अपनी योजनाओं को बुलेटप्रूफ मान रही थीं, उस ध्वनि में ऐसे बिखर गईं जैसे गलत पासवर्ड डालने पर अकाउंट स्थायी रूप से ब्लॉक हो जाए।

पाताल लोक के प्राणी समझ गए कि उनका अंधकार कितना भी गाढ़ा क्यों न हो, प्रकाश का यह व्यंग्य हमेशा अपडेटेड सॉफ़्टवेयर की तरह होगा—पुराने वायरस को तुरंत ध्वस्त कर देगा।

अब गुफाओं की निस्तब्धता में वही गूँज बची थी जो चेतावनी बनकर कह रही थी—
“काला नेटवर्क चाहे जितना भी गहरा क्यों न हो, सत्य का नाद उसमें घुसकर सब फ़ाइलें करप्ट कर देगा।”

और फिर वह ध्वनि पहुँची जुगाड़लोक में—एक ऐसा लोक जिसे मनुष्य ने आधुनिक युग की अपनी सुविधा और अजीब मानसिकता से गढ़ा था। यहाँ हर समस्या का समाधान जुगाड़ से निकाला जाता था। मेहनत को तरकीब से रिप्लेस कर दिया गया था, ईमानदारी को “नेटवर्किंग” और “अप्रोच” से, और सत्य को “पीआर पैकेज” से ढँक दिया गया था। धर्म भी यहाँ विज्ञापन की स्क्रिप्ट बन चुका था—पोस्टर, बैनर और सेल्फी के फ्रेम में सजाकर। इस लोक के निवासी गर्व से कहते—“हम हर समस्या का हल निकाल लेंगे, बस एक नया जुगाड़ चाहिए।”

डमरू की थाप इस लोक में पहुँची तो सब कुछ उलट-पुलट हो गया। लोग अपनी मीटिंग्स, कॉन्फ्रेंस कॉल्स और भाषणों में व्यस्त थे। हर कोई पॉवरपॉइंट प्रेज़ेंटेशन में “सॉल्यूशन” दिखा रहा था। पर अचानक हवा में यह आवाज फैल गई कि उनके सारे जुगाड़ उतने ही खोखले हैं जितनी “कॉपी-पेस्ट की गई” रिपोर्ट। किसी ने कहा—“जलवायु परिवर्तन? प्रोजेक्ट प्रपोज़ल बना दो, फंडिंग आ जाएगी, भाषण दे दो, फोटो खिंचवा लो, सब ठीक हो जाएगा।” किसी और ने कहा—“नदी सूख रही है? सोशल मीडिया पर हैशटैग ट्रेंड करा दो, जनता को दिखाओ कि हम काम कर रहे हैं।” लेकिन डमरू की ध्वनि ने व्यंग्य करते हुए कहा—“तुम्हारी तरकीबें उतनी ही क्षणभंगुर हैं जितनी हवा में उठी धूल। सत्य को ढकने वाले सारे पर्दे डमरू की थाप में फट जाते हैं।”

जुगाड़लोक की चमचमाती इमारतें काँप उठीं, मशीनों की गूँज बौनी हो गई और तरकीबों के नकली परदे गिर गए। यहाँ तक कि वे लोग भी जो अपनी नौकरी जुगाड़ से पाई थी, जो प्रमोशन “नेटवर्किंग” से हासिल करते थे, और जो नेतागिरी प्रलोभनों के पैकेज बाँटकर करते थे—उनके सारे “फिट किए गए जुगाड़” ऐसे ढह गए जैसे नकली सर्टिफिकेट का सर्वर क्रैश हो जाए। वहाँ के निवासी अपनी ही हँसी में फँस गए। उनके सारे उपाय, सारे आविष्कार और सारे दिखावे उस व्यंग्यात्मक ध्वनि के सामने ऐसे खोखले प्रतीत हुए जैसे टूटा हुआ माइक किसी बड़े भाषण को बेसुरा कर दे।

महादेव की आँखें अब भी गंभीर थीं। उनमें करुणा की नमी थी, पर एक लोहे जैसी कठोरता भी। डमरू की हर थाप केवल ध्वनि नहीं, बल्कि एक ब्रह्मांडीय नोटिफिकेशन थी—सृष्टि को भेजा गया एक अनिवार्य अपडेट। उसने स्वर्गलोक को स्मरण कराया कि उनका वैभव केवल ट्रायल वर्ज़न है, जो कभी भी एक्सपायर हो सकता है। उसने मानव लोक को दिखाया कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना ऐसे है जैसे हार्डडिस्क को फॉर्मेट करके भी यह सोचना कि डेटा सुरक्षित रहेगा। उसने पाताल लोक को चेताया कि अंधकार में रचे गए षड्यंत्र उतने ही व्यर्थ हैं जितनी “स्पैम मेल्स”—जिन्हें अंततः डिलीट होना ही है। और उसने जुगाड़लोक को आईना दिखाया कि उनका हर जुगाड़ केवल शॉर्टकट की है—जो असली प्रोग्राम को कभी नहीं चला सकती।

प्रकृति का हर अंश इस संदेश में बोल उठा। नदी की धाराएँ करुणा बनकर बह रही थीं, जैसे जीवन की नाड़ियों में धड़कन। पहाड़ व्यंग्य के प्रहरी की भाँति खड़े थे, मानो यह कह रहे हों कि जो झूठ पर टिका है वह भूकंप की पहली थरथराहट में ढह जाएगा। वृक्ष अपनी शाखाओं से कह रहे थे—“हम गिरे तो भी हमारी जड़ें जीवित रहेंगी, और फिर से हरियाली लौट आएगी।” आकाश तारों से भरकर यह फुसफुसा रहा था कि अनंतता के सामने मनुष्य की सारी चालाकियाँ उतनी ही क्षणभंगुर हैं जितनी हवा में उठी धूल।

जब अंतिम थाप पड़ी, तो सम्पूर्ण सृष्टि मौन हो गई। नदी का कलकल थम गया, वृक्ष अपनी साँस रोककर खड़े हो गए, हवा की गति मानो समय से भी पीछे ठहर गई। पूरा ब्रह्मांड एक क्षण के लिए ठहरकर सुनने लगा। केवल प्रतिध्वनि गूँज रही थी—उसमें करुणा थी, व्यंग्य था, चेतावनी थी और एक गहरा आह्वान भी। महादेव ने डमरू को थाम लिया, पर उसकी गूँज अब भी हर लोक में बह रही थी। वह हर प्राणी से कह रही थी—“प्रकृति केवल दृश्य नहीं, चेतना है। उसे अनसुना करोगे तो उसका व्यंग्य तुम्हारे अहंकार को चूर कर देगा। सच्चा स्वर्ग, सच्चा धर्म और सच्चा जीवन उसी लय में है जिसमें मेरा डमरू बजता है।”

और तभी वह प्रतिध्वनि धीरे-धीरे एक अनंत स्वर में बदल गई—“ॐ…”। यह स्वर न आरंभ था, न अंत, वह बस अस्तित्व की धड़कन था। उसने नदियों को फिर से बहाया, वृक्षों को फिर से साँस दी, और आकाश में तारों को नई चमक। यह ध्वनि पर्वतों की चुप्पी में भी गूँज रही थी और मनुष्य के हृदय की गहराइयों में भी। पूरी सृष्टि उसी गूँज में डूब गई—मानो जगत की हर धड़कन अब उस एक स्वर में विलीन होकर कह रही हो कि यही अनादि-अनंत सत्य है।

सोमवार, 18 अगस्त 2025

कॉन्ट्रैक्ट टीचर (कहानी) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

 कॉन्ट्रैक्ट टीचर (कहानी)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत 

बरसात के बाद का पहाड़ी इलाका हमेशा एक नई किताब की तरह खुलता है। धुले हुए आकाश में पहाड़ों की चोटियाँ साफ झलकती हैं, कहीं-कहीं बादल ऐसे टिके रहते हैं जैसे पहाड़ पर सफेद ओढ़नी डाल दी हो। गाँव की पगडंडियों पर छोटे-छोटे पोखर बन गए हैं जिनमें बच्चे छपाछप करते हुए कागज़ की नाव तैरा रहे हैं। झरनों की ध्वनि दूर से किसी अनसुनी बांसुरी जैसी लगती है। खेतों के किनारे बैठे बगुले, तालाब में तैरती मछलियाँ और गाँव के मंदिर से आती भजन की हल्की गूँज मिलकर एक विचित्र सांगीतिक दृश्य रचते हैं।

दोपहर के समय स्कूल के आँगन से मिड-डे मील की खुशबू उड़ रही है। कहीं दाल का उबाल, कहीं खिचड़ी की सोंधी गंध, और बच्चों के कानों में टीचर की आवाज़ के साथ-साथ थाली-गिलास की खनक भी घुली हुई है। यह पहाड़ है—जहाँ जीवन कठिन है पर रंगों से भरा हुआ भी।

इसी जीवन के केंद्र में है नितांत काम चलाऊ शिक्षक—कभी कॉन्ट्रैक्ट टीचर, कभी अतिथि शिक्षक, कभी संविदा शिक्षक कहलाने वाला वह पात्र, जो पूरे तंत्र की आत्मा भी है और उसकी सबसे कमजोर कड़ी भी।

बरसाती दोपहर में भीगी हुई पगडंडी से मास्टर जगत सिंह आ रहे थे। उनकी छतरी टेढ़ी थी—मानो व्यवस्था की रीढ़ की तरह झुकी हुई। जूतों पर चिपका कीचड़ किसी सरकारी फाइल की धूल जैसा था—जो न धुलता है, न हटता है।

आँगन में पहुँचते ही बच्चे एक स्वर में बोले—

“गुड मॉर्निंग सर!”

जगत सिंह मुस्कराए—

“गुड मॉर्निंग… और गुड लक भी, क्योंकि आज बिजली नहीं है, तो टेस्ट हाथ से लिखवाना पड़ेगा। यह भी एक तरह का प्रायोगिक पाठ है—कि अंधेरे में भी लिखना सीखो।”

पास ही रसोई से खिचड़ी की खुशबू उठ रही थी। मिड-डे मील बाँटती रसोइया बोली—

“मास्साब, आज ज़रा जल्दी करा दीजिए, बरसात में बच्चे भूखे जल्दी हो जाते हैं।”

जगत सिंह ने हल्की हँसी में गहरी व्यथा छिपाते हुए कहा—

“भूख तो हमें भी जल्दी लग जाती है बहन जी… फर्क बस इतना है कि आपकी खिचड़ी वक्त पर पक जाती है, पर हमारी तनख्वाह हमेशा अधपकी रह जाती है।”

बच्चों की खिलखिलाहट, रसोइया की व्यस्तता और मास्टर की ठिठोली—तीनों मिलकर उस शिक्षा-तंत्र की सजीव तस्वीर रच रहे थे, जहाँ व्यंग्य ही अब जीवन की सबसे सच्ची भाषा बन चुकी है।

कक्षा में बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते वे खुद से बुदबुदा रहे थे—“इतनी बारिश में अगर सड़क बह जाए, तो अगली तनख्वाह भी किसी झरने में गुम हो जाएगी।”

बच्चे हँस पड़े। वे समझ नहीं पाए कि यह मज़ाक था या कटाक्ष।

पहाड़ी कस्बे के एक महाविद्यालय में कॉन्ट्रैक्ट लेक्चरर सुधा मैम किताबों का पुलिंदा सँभालती हुई क्लास में दाखिल हुईं। विषय था— हिंदी साहित्य में व्यंग्य परंपरा। उन्होंने मुस्कराकर शुरुआत की—

“हर व्यंग्य किसी न किसी सच्चाई की छाती पर रखा हुआ आईना है।”

कक्षा में बैठे छात्र खिलखिलाकर हँस पड़े।

एक छात्र ने शरारत से पूछा—

“मैम, तो क्या आपका जीवन भी व्यंग्य है?”

सुधा ने क्षणभर रुककर देखा, फिर धीमे स्वर में मुस्कराईं—

“नहीं, मेरा जीवन उस व्यंग्य का फुटनोट है, जिसे सरकार ने लिखा है। असली व्यंग्य तो यही है कि जिस समाज को हम आईना दिखाते हैं, वही समाज हमें धुँधला काँच समझकर किनारे रख देता है।”

कक्षा में एक अजीब-सी चुप्पी उतर आई।

स्टाफरूम में लौटकर, चाय की भाप और पुरानी अलमारी की गंध के बीच, सुधा मैम ने अपने सहकर्मियों से कहा—

“जब तक रिज़ल्ट बनाना है, टाइम-टेबल सँभालना है, या विश्वविद्यालय का निरीक्षण पास कराना है—तब हम स्थायी जैसे हैं। लेकिन जब तनख्वाह बढ़ाने या हक की बात करनी हो, तब हम अचानक अस्थायी हो जाते हैं। यह भी एक किस्म का साहित्य है—नौकरी का निराला छंद। जिसमें तुक मिलती है, पर अर्थ बार-बार टूटा हुआ लगता है।”

स्टाफरूम ठहाकों से गूँज उठा। पर वह हँसी भीतर ही भीतर खुरदरे पत्थरों से टकराकर लौट आई—जैसे बरसात की नमी में भी न सूखने वाला दीवार का सीलन।

यहाँ धर्मेंद्र यादव नाम के नितांत काम चलाऊ प्राध्यापक इतिहास पढ़ा रहे थे।

वह बड़े आत्मविश्वास से कह रहे थे—

“इतिहास हमें सिखाता है कि साम्राज्य स्थायी नहीं होते। मौर्य गए, गुप्त गए, मुगल गए, अंग्रेज भी गए…”

इतना कहते ही पीछे से एक छात्र मुस्कराते हुए बोला—

“सर, अगर साम्राज्य स्थायी नहीं होते, तो फिर आपकी नौकरी क्यों स्थायी नहीं हो पाती?”

कक्षा ठहाकों से गूँज उठी।

धर्मेंद्र जी ने क्षणभर के लिए चुप्पी साधी, फिर हल्की मुस्कान के साथ बोले—

“बेटा, सही कहा। इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि कुछ साम्राज्य तो ढह जाते हैं, और कुछ राजाओं की तरह हम भी हर साल नवीनीकरण की याचना लेकर दरबार में खड़े रहते हैं। फर्क बस इतना है कि साम्राज्य किताबों में अमर हो जाते हैं, और हम आवेदन पत्रों में अस्थायी बने रहते हैं।”

लेकिन विश्वविद्यालय की कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

कभी-कभी अचानक आदेश आता है—

“अब स्थायी नियुक्ति हो गई है, नितांत काम चलाऊ शिक्षकों को कार्यमुक्त किया जाए।”

बस यह एक वाक्य, और मानो पूरा पहाड़ ढह पड़ता है उस शिक्षक पर।

जैसे पुराना किला, वर्षों तक अपनी ईंटों में इतिहास सँभाले खड़ा रहता है, और एक दिन बुलडोज़र की गड़गड़ाहट में मलबे में बदल जाता है।

जिस ब्लैकबोर्ड पर उसने सपनों की आकृतियाँ बनाईं, जिस कक्षा में उसने अपने ही बचपन की गूंज सुनी, वहाँ अचानक वह अजनबी घोषित कर दिया जाता है।

उस दिन उसकी चाल में अजीब-सी सुस्ती होती है। किताबें बाँधते हुए उसकी उंगलियाँ काँपती हैं, जैसे कोई माँ परदेश जाते बेटे का सामान बाँध रही हो। छात्र दौड़कर कहते हैं—“सर, आप हमें छोड़कर जा रहे हैं?”

वह मुस्कराकर उत्तर देता है—“नहीं बेटा, मैं तो यहीं हूँ… तुम्हारी आँखों की चमक और यादों में।”

लेकिन भीतर ही भीतर वह जानता है कि यह आखिरी क्लास उसके जीवन की सबसे कठिन परीक्षा है—जहाँ प्रश्न सिर्फ एक है, और उत्तर हर हाल में मौन है।

फिर परमानेंट शिक्षक आता है, और उसी कुर्सी पर बैठ जाता है। चाय की महक वही रहती है, ब्लैकबोर्ड पर वही खड़िया चलती है, पर नितांत काम चलाऊ शिक्षक के लिए यह सब उस घर जैसा है जहाँ दीपक जलाने वाला व्यक्ति ही बाहर कर दिया गया हो।

मन में यही टीस उठती है—“मैंने अपने जीवन के सबसे उजले साल यहाँ जलाकर रख दिए, और बदले में मेरी जगह सिर्फ एक आदेश-पत्र ने ले ली।”

उसकी संवेदना किसी उखड़े हुए पौधे जैसी होती है, जिसे जड़ों समेत बाहर निकालकर सड़क किनारे रख दिया गया हो। वह पौधा जानता है—उसके पत्ते कुछ दिन और हरे रहेंगे, पर मिट्टी की गंध और पानी का स्पर्श उसके लिए अब बीते हुए कल की स्मृति बन चुका है।

गाँव, कस्बा और विश्वविद्यालय—तीनों जगह तस्वीर मानो एक-सी खिंची हो। नदी, तालाब और झरनों की तरह ही यह शिक्षा-तंत्र भी बहता है, पर हर मोड़ पर कोई न कोई बाँध खड़ा कर दिया गया है। कहीं बजट का बाँध, कहीं नीति का, कहीं भर्ती की अधिसूचना का। सरकार इन नितांत काम चलाऊ शिक्षकों के लिए नित नए नाम गढ़ती रहती है—अतिथि, संविदा, शिक्षा मित्र, शिक्षा बंधु। जैसे जादूगर अपनी टोपी से हर बार नया खरगोश निकालकर दिखाता है, वैसे ही नाम बदलते हैं, पर हालात की जादुई थाली खाली की खाली रहती है।

पूरा तंत्र ही “काम चलाऊ” है। यह वैसा है जैसे टूटी हुई छतरी, जो बरसात में कुछ बूंदें रोककर मन को दिलासा देती है, पर भीतर का कपड़ा पहले से ही टपक रहा होता है। ये शिक्षक उस छतरी जैसे हैं—झड़ी के बीच बच्चों को भिगोने से बचाए रखते हैं। पर जैसे ही सूरज निकलता है और मौसम साफ होता है, वही छतरी बेदर्दी से कोने में फेंक दी जाती है। यह व्यवस्था मानो मिट्टी का दिया है—अंधेरे में रोशनी के लिए जलाया जाता है, पर भोर होते ही बुझाकर फेंक दिया जाता है।

उसने झरने की ओर देखा—झरना निरंतर बह रहा था, बिना थके, बिना रुके। उसकी छलकती धारा में उसे अपना ही जीवन दिखाई दिया। कभी उसे शिक्षा मित्र कहा गया, कभी शिक्षक बंधु, कभी अतिथि, कभी संविदा, कभी नितांत काम चलाऊ और कभी महज़ ठेके पर रखा गया प्राणी। नाम बदलते रहे, पर धारा कभी नहीं थमी। वह सोचने लगा—झरने की यही सबसे बड़ी ताक़त है कि वह चट्टानों से टकराकर भी गीत गाता है, पत्तों पर गिरकर भी संगीत रचता है और घाटियों में उतरकर भी जीवन बाँटता है। उसका अस्तित्व किसी स्थायी पद की मोहर से नहीं, बल्कि उस धारा से है, जो बच्चों की आँखों की चमक, उनके भविष्य की प्यास और उनके सपनों की मिट्टी को सींचती रहती है। शायद यही उसकी नियति है—नदी की तरह बहना, बादल की तरह बरसना और दीपक की तरह जलना, चाहे कोई उसका नाम याद रखे या न रखे।

यही धारा धर्मेंद्र यादव जी में दिखती है, जो इतिहास पढ़ाते हुए हर साल खुद अपने ही अनुबंध का इतिहास लिखते हैं; सुधा मैम में, जो व्यंग्य पढ़ाते हुए जानती हैं कि असली व्यंग्य तो उनकी तनख़्वाह है; और जगत सिंह में, जो बच्चों की भूख के बीच अपनी जेब की ख़ाली थाली देखकर भी मुस्कराते हैं। ये अलग-अलग चेहरे दरअसल उसी शिक्षा-तंत्र की सामूहिक गूँज हैं—जहाँ अध्यापक किसी पाठ्यपुस्तक की तरह हैं, जिन्हें साल-दर-साल पलटा जाता है, रटा जाता है और फिर नया संस्करण आने पर फेंक दिया जाता है। असल में, यह पूरा तंत्र ही “नितांत काम चलाऊ” है—क्योंकि शिक्षक अब भी झरनों की तरह बह रहे हैं, पर व्यवस्था पोखर की तरह सड़ चुकी है।

रविवार, 17 अगस्त 2025

चाय की चुस्की - (कहानी) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

 चाय की चुस्की - (कहानी)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत 

सुबह का वक्त था। पहाड़ों पर हल्की-हल्की धुंध ऐसे पसरी थी मानो किसी ऋषि ने अपने जटाजूट से सफेद रेशमी बादल झटक दिए हों। घाटी में उतरते बादल इस अंदाज़ से लहराते थे जैसे कोई बरात ढोल-दमामे के संग चढ़ाई-उतराई कर रही हो। चीड़ और देवदार की ऊँची-ऊँची कतारें ओस से नहाई दुल्हनों-सी खड़ी थीं, और उनकी शाखों पर बैठी चिड़ियाँ सामूहिक रागिनी गा रही थीं। कहीं दूर से ग्वाले की बांसुरी की धीमी तान सुनाई देती थी, मानो किसी लोकगीत की आत्मा हवा में तैर रही हो।

ढलानों पर चरती बकरियों की टनटनाहट उस प्राकृतिक संगीत में ताल भर रही थी। खेतों की मेड़ों पर झुकी औरतें कंधे पर घास और लकड़ी के गट्ठर रखे घरों की ओर तेज़ कदमों से बढ़ रही थीं। गली-कूचों में भोर की ठंडी धूप ऐसे उतर रही थी जैसे किसी चित्रकार ने सुनहरी रंगों से कैनवास भर दिया हो। पास की नदी कल-कल करती हुई मानो सारा राज़ सुना देना चाहती थी कि प्रकृति ही असली कवयित्री है।

सड़क किनारे, इसी रमणीय दृश्य के बीच, लकड़ी और टीन की टपकती छत से बनी एक पुरानी सी दुकान थी, जिसे गाँव भर में मज़ाक-मजाक में “लोकसभा टी स्टॉल” कहा जाता था। दुकान का मालिक था मंगू, या सबकी जुबान पर ‘मंगूदा’ — जिसकी चाय की खुशबू इतनी दूर तक जाती कि राहगीर भी प्यासे-से ठिठक जाते।

आज भी सुबह-सुबह दुकान पर वही बौद्धिक दरबार सजने लगा। सबसे पहले पधारे ग्राम प्रधान जी। खादी का कुर्ता, पैरों में घिसी-सी सैंडल, आँखों में सदा रहने वाली आधी-सी मुस्कान और जेब में गुटखे का पाउच—यह उनकी पहचान थी। दुकान में घुसते ही उन्होंने अपनी ऐनक को नाक पर चढ़ाया और ऊँची आवाज़ में बोले—

“अरे मंगू! ज़रा जल्दी से चाय बना। आज तो बड़ा दिन है। अभी-अभी मुख्यालय से फोन आया है। हमारी पंचायत को पचास लाख की योजना मिली है। अब देखना, गाँव की तस्वीर बदल जाएगी।”

कोने में बैठा राम सिंह धामी, जो रोज मज़दूरी करता था और जिसके हाथों की दरारों में मेहनत का इतिहास लिखा हुआ था, मुस्कराकर बोला—

“हाँ प्रधान जी, पिछली बार भी तस्वीर बदली थी। फर्क इतना ही था कि फोटो अखबार में आपका था और पैसा ठेकेदार का।”

इतना कहते ही दुकान का माहौल गूँज उठा। हँसी के ठहाके ऐसे फूटे मानो किसी ने लंबे सूखे के बाद अचानक बाँध का दरवाज़ा खोल दिया हो। मंगूदा भी चाय छानते-छानते हँस पड़ा और बोला—

“सच कह रहा है धामी। पिछली बार तो पंचायत भवन की छत बनाने का ठेका था, छत बनी नहीं, लेकिन प्रधान जी की नई जीप गाँव में जरूर आ गई।”

प्रधान जी ने मुस्कान तो बनाए रखी, लेकिन गुटखे का पाउच जल्दी से मुँह में खिसका लिया, ताकि बोलने की बजाय चबाने का बहाना मिल सके। उनकी आँखों में क्षणभर को जो खीज चमकी, वह भी चाय की भाप में खो गई।

उधर से धीमी चाल में सेवानिवृत्त प्रिंसिपल साहब भी आ पहुँचे। रिटायरमेंट के बाद से यही उनकी स्थायी यूनिवर्सिटी थी—बिना हाजिरी, बिना टाइम-टेबल और बिना परिणाम की। आते ही उन्होंने अपनी खाँसती हुई आवाज़ को सँभालते हुए लंबी साँस भरी और बोले—

“आजकल के युवाओं का तो कोई भविष्य ही नहीं रहा। पढ़ाई-लिखाई का कोई महत्व ही नहीं बचा। जब मैं पढ़ाता था, तब बच्चे शेर बनकर निकलते थे।”

यह सुनकर सामने बैठे छोटू मास्टर ने, जो खुद अस्थायी नियुक्ति पर पिछले दस साल से गाँव की प्राथमिक पाठशाला में टिका था, हल्की मुस्कान के साथ जवाब जड़ा—

“प्रिंसिपल साहब, जब आप बच्चों को शेर बना रहे थे, उसी समय हमारे गाँव के आधे युवा दिल्ली के कॉल सेंटरों में टेलीफोन पर भौंकने लग गए, और बाकी शहरों में रिक्शा खींचने लगे। अब जरा बताइए, ये शेर किस चिड़ियाघर में रखे गए हैं?”

दुकान में ऐसा ठहाका फूटा कि मंगूदा की चाय छलककर चूल्हे पर टपक पड़ी और खटर-खटर की आवाज़ करने लगी। बगल में बैठे दूध सप्लाई करने वाले नंदू ने ठहाका मारते हुए कहा—

“अरे मास्टरजी, सही कहा आपने! अब तो हालत ये है कि जिनके दाँत में कीड़ा लगा है, वो भी खुद को शेर समझते हैं। शेर वाली दहाड़ तो दूर, गाँव का कुत्ता भी उनके आगे भौंक जाए तो ये भाग खड़े होते हैं।”

प्रिंसिपल साहब ने खाँसी का पुराना बहाना अपनाया। गले पर हाथ रखते हुए धीरे से बोले—

“हाँ-हाँ, मौसम ही ऐसा है… गले में खराश रहती है।”

मगर सब समझ रहे थे कि खराश गले में नहीं, बल्कि आत्मसम्मान में हो रही है।

तभी अचानक धूल उड़ाती एक जीप दुकान के सामने आकर अटक गई। इतनी तेज़ ब्रेक मारी कि पास खड़ा बकरा भी डर के मारे मिमियाने लगा। गाड़ी से नेता जी उतरे—सिर पर चमचमाता हुआ सफेद नेहरू टोप, आँखों पर काला चश्मा और हाथ में हवा में लहराता रुमाल, मानो चुनावी सभा के मंच पर ही खड़े हों। पीछे-पीछे उनका वफ़ादार चमचा कल्लू भाई ऐसे भागता आया जैसे खुद गाड़ी को धक्का देकर लाया हो।

नेता जी ने आते ही सीना फुलाकर दुकान को मंच मान लिया और गूँजती आवाज़ में बोले—

“दोस्तों! इस बार हमारी पार्टी सत्ता में आई, तो हम इस पहाड़ को स्विट्ज़रलैंड बना देंगे। बर्फ़, फूल और पर्यटक—सब यहाँ उमड़ पड़ेंगे। तब तुम सबको नौकरी के लिए दिल्ली भागने की ज़रूरत नहीं रहेगी।”

इतना सुनते ही कल्लू भाई ताली बजाकर चिल्लाए—

“वाह नेताजी, ज़िंदाबाद! आप तो हिमालय से भी ऊँचे हैं।”

कोने में बैठे राम सिंह धामी ने अपनी फटी हुई बनियान को खींचते हुए ठंडी हँसी में कहा—

“नेताजी, पहले हमारी टूटी सड़क बनवा दो। स्विट्ज़रलैंड तो बाद में भी बन जाएगा। रोज़ हम खच्चरों की तरह गड्ढों में उछल-उछल कर बाज़ार जाते हैं। कभी हमारे हड्डी-पसली भी सलामत रखवा दो।”

नेता जी ने तुरंत गंभीर मुद्रा ओढ़ ली, मानो वे पहाड़ पर नहीं, संसद में बैठे हों। भारी आवाज़ में बोले—

“रामदा, तुम्हें दूरदृष्टि रखनी चाहिए। सड़क जैसी मामूली बातों में मत उलझो। नेता वही है जो बड़े सपने दिखाए। सड़क तो कल भी बन सकती है, पर स्विट्ज़रलैंड बनने का सपना आज से देखना चाहिए।”

यह सुनते ही दुकान पर बैठे सबने एक-दूसरे को देखा और हँसी रोकते-रोकते पेट में बल पड़ गए।

उसी वक्त घास की भारी-भरकम गाठें सिर पर ढोती हुई कुछ औरतें दुकान के पास से गुज़रीं। उनमें से एक ने ठिठोली करते हुए कहा—

“अरे देखो तो, सारे बड़े मर्द यहीं बैठे हैं। चाय पी-पीकर देश बचाने का ठेका इन्हीं के पास है। अगर घर की आधी चिंता भी कर लें तो ये पहाड़ सचमुच स्वर्ग बन जाए।”

औरत की बात सुनकर पूरा दरबार खिलखिलाकर हँस पड़ा। मंगूदा चायवाले ने भी गिलास धोते-धोते चुटकी ली—

“बात तो पक्की है। नेताजी हों या प्रधान जी—सब मुफ्त की चाय और बड़ी-बड़ी बातें करने यहाँ आते हैं। अगर मैंने सचमुच पैसे वसूलने शुरू कर दिए, तो तुम्हारा स्विट्ज़रलैंड यहीं चाय की केतली में डूब जाएगा।”

यह सुनते ही नेताजी के चश्मे के पीछे से पसीना छलक पड़ा। कल्लू भाई ने जल्दी से ताली बजाकर माहौल सँभालने की कोशिश की—

“वाह मंगू भाई! आपकी चाय ही तो इस गाँव की असली संसद है।”

इतने में बबलू दाज्यू पत्रकार अपनी फटी डायरी और कैमरे के उस प्राचीन ढांचे के साथ दुकान पर आ धमके, जो देखने में कैमरा कम और ढोलक का बक्सा ज़्यादा लगता था। आते ही सांस सँभालते हुए घोषणा की—

“दोस्तों! कल अख़बार में छपा है कि सरकार हमारे गाँव को मॉडल गाँव बनाने जा रही है।”

बात इतनी ही थी, पर उसका असर बारूद की चिंगारी जैसा हुआ। रामदा ने हँसते-हँसते पेट पकड़ लिया और बोला—

“हाँ, मॉडल तो बन ही गया है। बस अब सिलाई मशीन और मेकअप किट आ जाएँ, तो गाँव की लड़कियाँ फैशन वीक में भाग ले लें।”

भीड़ एक बार फिर ठहाकों से गूंज उठी। बबलू दाज्यू का चेहरा लाल पड़ गया। दरअसल, अभी कल ही तो उसने नेताजी से चुनावी विज्ञापन छापने के नाम पर दो हज़ार ऐंठे थे। सो, उसके शब्द भी गले की हड्डी बनकर अटक गए। वह चुपचाप कोने में बैठ गया, जैसे अख़बार की स्याही भी उसकी जेब की तरह फीकी पड़ गई हो।

इसी बीच तहसीलदार का चपरासी पन्ना लाल दुकान में घुस आया। उसके कदमों में ऐसी अकड़ थी मानो खुद कलेक्टर साहब उसकी जेब में रखे हों। ऊँची आवाज़ में बोला—

“सुन लो सब! साहब कह रहे थे कि इस बार की योजना का पैसा ठीक से लगे, वरना ऊपर तक रिपोर्ट जाएगी।”

प्रधान जी ने पान की पीक थूकते हुए मुस्कुराकर जवाब दिया—

“अरे पन्ना लाल, तू चिंता न कर। तेरा हिस्सा तो पहले से ही बजट में फिक्स है। बस अंगूठा लगाने की मेहनत करनी पड़ेगी।”

भीड़ में हल्की फुसफुसाहट हुई और सब एक-दूसरे की ओर देख कर मुस्कुरा दिए। दुकान का वातावरण उस समय टेंडर मीटिंग की तरह लग रहा था—जहाँ कॉन्ट्रैक्ट से ज़्यादा कॉन्टैक्ट पर जोर दिया जाता है।

तभी दूर से गाय-भैंस चरा कर किशनुवा और उसका साथी आ पहुँचे। उनके चेहरे धूप में तपे हुए थे और माथे से पसीने की बूँदें टपक रही थीं। किशनुवा ने पास आते ही हँसकर कहा—

“अरे वाह, बड़ा दरबार सजा है। सब देश बदल रहे हैं चाय की प्याली में डूबकर। इधर हमारे जानवर पानी के बिना हाँफ रहे हैं।”

यह सुनकर प्रिंसिपल साहब, जिनकी उम्र अब अकादमिक उपदेशों में ही अटक चुकी थी, तुरंत बोले—

“बेटा, ये छोटी बातें हैं। तुम्हें देश की बड़ी नीतियाँ समझनी चाहिए। विकास योजनाएँ, पंचवर्षीय कार्यक्रम, मॉडल गाँव, डिजिटल इंडिया—यही असली मुद्दे हैं।”

किशनुवा ने व्यंग्य से हँसते हुए कहा—

“नीति से हमें भूसा मिलेगा कि पानी? हमारी भैंस तो रोज़ सूखी घास चबाकर गटक रही है। शायद डिजिटल इंडिया से मोबाइल चार्ज करके प्यास बुझा लेगी।”

यह सुनते ही दुकान में बैठे लोग हँसी से फट पड़े। हँसी में कड़वाहट भी थी और ताजगी भी।

नेता जी का चेहरा अचानक कसैला हो गया। चश्मे को ठीक करते हुए वे बोले—

“तुम ग्रामीण लोग कभी बड़े सपने नहीं देखते। यही कारण है कि पिछड़े रह जाते हो। बड़ा सोचो—पहाड़ को स्विट्ज़रलैंड बनाओ, पर्यटन लाओ, उद्योग लगाओ।”

किशनुवा ने आँखें तरेरकर सीधा जवाब दिया—

“सपना तो रोज़ देखता हूँ नेताजी। सपना ये कि आज मेरी भैंस पानी पी सके। पर वो सपना कभी पूरा नहीं होता। आप स्विट्ज़रलैंड का सपना दिखाते रहिए, मैं कल भी अपनी सूखी भैंस का सपना देखूँगा।”

पूरा दरबार सन्नाटे में डूब गया। उस क्षण पहाड़ी धूप की तपिश और भी चुभने लगी। मानो किशनुवा ने अनजाने ही इस व्यंग्य दरबार को आईना दिखा दिया हो—जहाँ सपनों की ऊँचाई और पेट की भूख हमेशा दो विपरीत दिशाओं में खड़ी रहती है।

अब तक बहस का तापमान जून की दोपहरी की तरह चढ़ चुका था।

प्रधान जी सरकारी योजनाओं का ऐसा बखान कर रहे थे मानो योजना आयोग उन्हीं की दुकान पर बैठा हो।

प्रिंसिपल साहब शिक्षा की दुहाई दे रहे थे, लेकिन उनकी बातें इतनी किताबनुमा थीं कि कोई सुनते-सुनते खुद को “एमए फेल” महसूस करने लगे।

नेता जी अब भी पहाड़ को स्विट्ज़रलैंड बनाने की शपथ ले रहे थे, और पत्रकार बबलू दाज्यू अपनी डायरी में वही पुराने शब्दों की मालाएँ गढ़ रहा था—“दूरदर्शी नेता, विकास के शिल्पी, जनता का मसीहा”।

दूसरी ओर, मजदूर-ग्वाले ताने पर ताने कस रहे थे। उनका हर वाक्य किसी अदृश्य हथौड़े की तरह इन तथाकथित बुद्धिजीवियों पर गिर रहा था।

माहौल ऐसा था जैसे लाइव टेलीकास्ट हो रहा हो—बस फर्क इतना कि यहाँ लाल बत्ती गाड़ी नहीं, बल्कि लाल पीक चमक रही थी।

दुकान सचमुच किसी संसद से कम नहीं लग रही थी—जहाँ सवाल तो गूँजते हैं, पर जवाब चाय की भाप में उड़ जाते हैं।

इसी उबाल के बीच अचानक मंगूदा ने ऊँची आवाज़ में पूछा—

“भाइयों! ज़रा ध्यान दो, चाय का हिसाब कौन देगा?”

सवाल साधारण था, पर असर असाधारण। जैसे ही यह वाक्य गूंजा, बहस की आग पलभर में राख हो गई। सब एक-दूसरे की तरफ ऐसे देखने लगे जैसे संसद में कटौती प्रस्ताव रख दिया गया हो।

नेता जी ने जेब में हाथ डाला, पर तभी फोन बजने का नाटक रचकर बाहर निकल गए। उनकी आवाज़ गली तक गूँजी—“हाँ जी, अभी मुख्यमंत्री जी से बात कर रहा हूँ…”

प्रिंसिपल साहब ने खाँसते हुए कहा—

“अरे भाई, मेरे पास छुट्टा नहीं है। कल लाइब्रेरी से किताब लौटाकर देता हूँ।”

पत्रकार ने तुरंत तिलमिलाकर ऐलान किया—

“मैं तो समाज की सेवा कर रहा हूँ। मुझसे चाय का पैसा माँगना पत्रकारिता की हत्या है। मैं तो रिपोर्ट में लिख दूँगा कि यह चाय जनकल्याणकारी थी।”

सन्नाटा फिर गाढ़ा हो गया। तभी रामदा धीरे से उठा, जैसे सदियों की थकान उसके कंधों पर रखी हो। बोला—

“ठीक है मंगूदा, आज भी मजदूर ही सबका बिल चुकाएगा। क्योंकि मजदूर ही असली देशभक्त है।

बाकी सब लोग तो चाय की चुस्की से क्रांति लाने निकले हैं।”

उसके शब्द सुनते ही माहौल ठहाके और खामोशी के बीच झूल गया। यह ठहाका मजाक का कम, आत्मग्लानि का ज़्यादा था।

बाहर सूरज ढल चुका था। पहाड़ की चोटियों पर लालिमा ऐसे बिखरी थी जैसे दिन ने भी बहस में अपना खून झोंक दिया हो।

औरतें अब भी ढलती रोशनी में घास काट रही थीं, बच्चे सड़क किनारे प्लास्टिक की गेंद से क्रिकेट खेल रहे थे, और चाय की दुकान पर बैठे तथाकथित विद्वान एक और चुस्की लेकर बहस की नई पारी में उतर रहे थे।

मानो यह देश आगे नहीं बढ़ रहा, बस चाय की प्यालियों में ही चक्कर काट रहा हो।


कहानी का अगला हिस्सा - भाग 2


दूसरी सुबह भी दुकान पर वही पुराना मंजर था। चाय की भाप उठते ही बहस का धुआँ भी उड़ने लगा। मंगू अब इस आदत का आदी हो चुका था। वह हँसकर कहता—

“भाइयों, संसद भवन दिल्ली में सिर्फ़ दिखावे के लिए है, असली कैबिनेट तो यहीं बैठती है। फर्क इतना है कि वहाँ भत्ते और वेतन मिलते हैं, और यहाँ उधार की चाय।”

सब हँसते, पर भीतर से जानते थे कि यह हँसी ही सबसे कड़वा सच है।

प्रधान जी फिर उसी पुरानी रिकॉर्डिंग पर आ गए—

“भाइयों, इस बार जो पचास लाख की योजना आई है न, उससे गाँव में सीमेंट की सड़क बनेगी, नाली बनेगी, और सामुदायिक भवन भी खड़ा होगा। अब देखना, गाँव किसी शहर से कम नहीं रहेगा।”

रामदा ने अपने पैरों की तरफ देखा, जिन पर अब भी पुराने फटे जूते थे, फिर हँसते हुए बोला—

“हाँ, पिछली बार भी नाली बनी थी, लेकिन उसमें पानी से ज्यादा बीयर और देशी शराब की बोतलें तैर रही थीं। सामुदायिक भवन की छत तो पहली बरसात में ऐसे उड़ गई थी जैसे सरकारी नौकरी का वादा उड़ जाता है। अब गाँव वाले कहते हैं कि भवन नहीं, भूत बंगला बना है—रात में गाय भी वहाँ से गुज़रने से डरती है।”

सुनते ही सब ठहाकों से लोटपोट हो गए।

प्रधान जी ने हँसी के पीछे गुस्सा दबा लिया और बोले—

“रामदा, तू मजदूर आदमी है, राजनीति की बड़ी-बड़ी बातें तुझे क्या समझ आएँगी? यह सब बड़े स्तर की योजनाएँ हैं, गाँव-देहात की सोच से ऊपर की।”

इतने में सामने से रघुवीर मिस्त्री आया। हाथ में औज़ार, चेहरे पर धूल और आँखों में नींद की जगह ईंटों का बोझ। बैठते ही बोला—

“भैया, एक चाय पिला दो। सुबह से ईंट ढो रहा हूँ। पर एक बात बताऊँ, इन योजनाओं का फायदा हमें मजदूरों को तो मिलता ही नहीं। ठेकेदार लोग आधा पैसा गाड़ी और बंगले में खा जाते हैं, और बाकी आधा सीमेंट-रेत में मिल जाता है। सड़क की मोटाई उतनी ही होती है जितनी मोबाइल में डेटा बैलेंस बचा हो।”

मंगू ने तुरंत जोड़ा—

“सही कहा! अब तो गड्ढे सड़क में कम, और सरकारी फाइलों में ज़्यादा मिलते हैं।”

पत्रकार बबलू दाज्यू, जो अब तक सब नोट कर रहे थे, मुस्कराते हुए बोले—

“अरे रघुवीर, यही तो लोकतंत्र की खूबसूरती है। एक तरफ ठेकेदारों की तिजोरी भरती है, दूसरी तरफ तुम्हारे औज़ार टूटते हैं। और इस बीच हम पत्रकार लोग हेडलाइन बनाते हैं—

‘गाँव विकास की राह पर अग्रसर’।”

सुनते ही रामदा फिर हँस पड़ा—

“हाँ दाज्यू, और अगली हेडलाइन यह भी लिख देना—

‘गाँव वालों की जेब खाली, पर भाषण भारी।’”

अबकी बार हँसी में तल्ख़ी भी थी।

बाहर धूप तेज़ हो चुकी थी, पर भीतर बहस की तपिश और ज्यादा थी। चाय की दुकान अब सिर्फ़ दुकान नहीं, एक लाइव न्यूज़ चैनल थी—जहाँ हर कोई एंकर भी था, पैनलिस्ट भी और दर्शक भी।

प्रिंसिपल साहब ने अपनी ऐनक को थोड़ा और नाक पर चढ़ाते हुए विद्वतापूर्ण लहज़े में कहा –

“रघुवीर, यह सब समाज की विसंगतियाँ हैं। जब तक शिक्षा का प्रकाश नहीं फैलेगा, तब तक अंधकार रहेगा। देखना, जिस दिन गाँव का हर बच्चा पढ़-लिख जाएगा, उसी दिन भ्रष्टाचार अपने आप ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।”

रघुवीर ने हथौड़ा जमीन पर पटका और मुस्कुराते हुए बोला –

“प्रिंसिपल साहब, आपके ज़माने में तो आधा गाँव हाई स्कूल तक पहुँच ही नहीं पाया। अब आप शिक्षा का मशाल उठा रहे हैं! वैसे एक बात बताइए, बच्चों को अभी भूख मिटाने के लिए रोज़गार चाहिए या पेट में दर्शन-शास्त्र की थ्योरी? क्योंकि खाली पेट गांधीगीरी नहीं, रोटीगिरी चाहिए।”

यह सुनते ही दुकान में ठहाकों की सुनामी उठ गई। प्रिंसिपल साहब ने खिसियाकर चाय की प्याली उठाई, एक लंबी चुस्की ली, और अखबार की तरह तह होकर चुप्पी साध ली।

इसी बीच नेता जी, जो पिछले आधे घंटे से मोबाइल पर किसी “बड़े साहब” से ऊँची-ऊँची आवाज़ में बात कर रहे थे, अचानक कॉल काटकर मंचनुमा अंदाज़ में खड़े हो गए। दोनों हाथ हवा में लहराते हुए बोले –

“भाइयों! अभी-अभी मेरी सीधी बात बड़े साहब से हुई है। बहुत जल्द इस पहाड़ पर एक बड़ी परियोजना शुरू होने वाली है। हजारों नौजवानों को रोज़गार मिलेगा। अब गाँव में बेरोजगारी का नामोनिशान मिट जाएगा। आने वाले समय में यह गाँव ‘मिनी दुबई’ कहलाएगा।”

सुनते ही बबलू दाज्यू, जो हर मौके पर “लाइव टेलीग्राफ़” बन जाते थे, तुरंत अपनी पुरानी डायरी में लिखने लगे –

“नेता जी ने किया बड़ा ऐलान।”

कल के अख़बार की हेडिंग उसी वक्त तैयार हो गई।

रामदा ने खैनी मलते हुए ताना मारा –

“नेता जी, पिछली बार भी आपने कहा था कि हमारे पहाड़ पर एयरपोर्ट बनेगा। नतीजा? बस खेतों में सर्वे के खंभे गड़े और फिर गाय-बकरियों ने उन्हें तोड़ डाला, लोगों ने लकड़ी की तरह जला डाला। गाँव वाले अब कहते हैं—‘नेता जी के वादे खंभों जैसे हैं, खड़े भी नहीं रहते और टिकते भी नहीं।’”

भीड़ ठहाकों से गूँज उठी। मंगू ने भी चुटकी लेते हुए जोड़ा -  

“नेता जी, अगली बार जब भी योजना का ऐलान करें न, तो एक रिटर्न पॉलिसी भी जोड़ दें—अगर काम न हो तो वादा वापस।”

रघुवीर ने हँसते हुए तंज कसा –

“हाँ, बिल्कुल, जैसे मोबाइल में कैशबैक ऑफ़र आता है। यहाँ भी होना चाहिए—‘परियोजना असफल तो जनता को कैशबैक।’”

दुकान में बैठे लोग पेट पकड़कर हँसने लगे, और नेता जी का चेहरा वैसे ही उतर गया जैसे बिना नेटवर्क का मोबाइल।

किशनुवा ने ज़ोर का ठहाका लगाया –

“हाँ रे भाई, नेताजी तो कहते थे कि हमारी बकरियाँ स्विस गाय बन जाएँगी, और दूध सीधा पैकेजिंग प्लांट से निकलेगा। लेकिन हकीकत ये है कि मैं आज भी नौले से पानी भरकर ला रहा हूँ। फर्क बस इतना हुआ है कि पहले तांँबे की गगरी लाता था, अब प्लास्टिक की बोतल और डब्बे भर रहा हूँ।”

दुकान ठहाकों से गूँज उठी।

इतनी देर में घड़े रखे कुछ और औरतें भी आ बैठीं। उनमें से एक ने सिर पर दुपट्टा ठीक करते हुए तंज कसा –

“हमारे मर्द तो बस देश-समाज सुधारने में लगे रहते हैं। सुबह से शाम तक चाय की चुस्की, फेसबुकिया चर्चा और व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से डिग्री। लेकिन घर का राशन कौन लाएगा, ये सवाल कभी किसी बहस का हिस्सा नहीं होता।”

मंगूदा ने हँसते-हँसते कहा –

“आमा, घर का राशन छोड़ो, ये तो मेरी दुकान का हिसाब भी नहीं देते। बस उधारी की डायरी देखकर ऐसे हँसते हैं जैसे संसद में मुफ़्त का वाई-फाई मिल गया हो।”

सभी जोर से हँसने लगे, लेकिन नेताजी और प्रिंसिपल का चेहरा वैसा ही उतर गया जैसे नेटवर्क बीच कॉल में कट जाए।

तभी पन्ना लाल चपरासी, जो हमेशा ‘अंदर की ख़बर’ रखने का दावा करता था, आगे झुककर बोला –

“साहब कह रहे थे कि इस बार रिपोर्ट बहुत सख़्त जाएगी। ऊपर तक सबकी निगरानी हो रही है। कोई बच नहीं पाएगा।”

रामदा ने बीड़ी सुलगाते हुए तुरंत तीर छोड़ा –

“हाँ-हाँ, निगरानी तो होती है, लेकिन सिर्फ़ चाय पीने की। बाकी पैसा तो सीधा ऊपर चला जाता है। ये निगरानी का कैमरा भी नेताजी की जेब में फिट है। तस्वीर जनता की खींची जाती है, लेकिन फोटो गैलरी में सेव सिर्फ़ ‘ऊपरवालों’ की मुस्कान होती है।”

भीड़ खिलखिला पड़ी।

रघुवीर ने और जोड़ दिया –

“अरे, ये निगरानी सिस्टम भी क्या कमाल का है! CCTV कैमरे सड़क पर लगे हैं, लेकिन रिकॉर्डिंग प्राइवेट पार्टी के घर की चल रही है। गाँव वाले तो बस कैमरे के सामने हाथ हिलाते रह जाते हैं।

महिलाओं में से एक बोली –

“हमारे घर का गैस सिलेंडर तीन महीने से खाली है। लेकिन नेताजी कह रहे थे स्मार्ट गाँव बन जाएगा। अरे, पहले हमारे चूल्हे में आग तो स्मार्ट कर दो!”

इस पर मंगूदा ने आखिरी तंज कसा –

“भाई, स्मार्ट गाँव तो तभी बनेगा जब नेता जी का वादा रीचार्ज पैक की तरह हो—समय पूरा होने पर अपने आप बंद।”

दुकान पर बैठी भीड़ फिर से पेट पकड़कर हँसने लगी, और नेताजी का चेहरा बिल्कुल वैसा हो गया जैसे चुनाव में हारने के बाद वोटिंग मशीन की स्क्रीन।

किशनुवा बोला –

“हाँ, और जब तवा गरम होता है तो सब अपनी-अपनी रोटी सेंकने में लग जाते हैं। जनता चाहे जले या भूखी रह जाए, नेताजी की थाली में तो मलाई पराठा हमेशा पहुँच ही जाता है।”

मंगूदा चायवाले ने अपनी कड़छी झाड़ते हुए जोड़ा –

“मुझे तो लगता है कि ये चाय की दुकान ही असली संसद है। यहाँ सरकार हर रोज़ बनती है, गिरती है और मुफ्त में चलती है। फर्क बस इतना है कि यहाँ स्पीकर मैं हूँ और माइक के बिना भी सब चीखते रहते हैं।”

भीड़ में बैठे लोग ठहाका मारकर हँस पड़े।

थोड़ी देर में चर्चा राष्ट्रीय राजनीति पर घूम गई। नेता जी मंच जैसी मुद्रा में गला साफ़ करते हुए बोले –

“देश बदल रहा है भाइयों! अब विकास की आँधी आ चुकी है। निश्चिंत रहिए…!”

रामदा ने बीड़ी का धुआँ उड़ाते हुए काटा –

“हाँ, आँधी तो है, लेकिन उसमें सिर्फ गरीबों की झोपड़ी उड़ रही है। अमीरों के बंगले और फार्महाउस पर तो एक खरोंच भी नहीं आती। आँधी भी अब VIP पास देखकर चलती है।”

सभी हँसते-हँसते ताली पीटने लगे।

प्रिंसिपल साहब ने चश्मा ठीक करते हुए गंभीरता ओढ़ी –

“भाई, राजनीति तो चलती रहेगी। असली संकट है हमारी संस्कृति का। आज के बच्चे मोबाइल और रील्स में खोए रहते हैं। न लोकगीत जानते हैं, न लोककथाएँ और न ही लोक-संस्कृति। सब कुछ बर्बाद हो रहा है।”

किशनुवा ने मुस्कुराकर तीर मारा –

“प्रिंसिपल साहब, बच्चा मोबाइल में खोए तो आपको संस्कृति का संकट दिखता है। लेकिन जब बच्चा आपकी क्लास में सो जाता था तो आप कहते थे – ‘विद्यार्थी ध्यानमग्न है’। अब ध्यान ऑनलाइन बदल गया है तो आपको लगे कि संस्कृति डूब रही है।”

भीड़ फिर ठहाकों से गूँज उठी।

रघुवीर ने भी जोड़ दिया –

“साहब, संस्कृति की चिंता छोड़ो। अब तो हमारी सभ्यता भी डेटा पैक पर चल रही है। जब तक रीचार्ज है, तब तक भारतीयता चमक रही है। जैसे ही नेट खत्म, वैसे ही संस्कृति ऑफ़लाइन।”

तभी औरतों में से एक बोली –

“हमारे घर के बच्चे तो लोकगीत तभी गाते हैं जब नेटवर्क डाउन हो जाए। वरना तो दिन-भर ट्रेंडिंग गाने पर नाचते रहते हैं। अब हमें समझ नहीं आता, किसको बचाएँ – संस्कृति को या मोबाइल की बैटरी को।”

मंगूदा ने आखिरी वार किया –

“भाई, संस्कृति हो या राजनीति, दोनों ही क्लाउड सर्वर पर अपलोड हो गई हैं। गाँव वाले तो अभी तक पेंड्राइव खोज रहे हैं और नेताजी अनलिमिटेड डेटा प्लान में मौज कर रहे हैं।”

दुकान एक बार फिर जोरदार हँसी और ठहाकों से गूँज उठी, और नेताजी का चेहरा ऐसा लग रहा था जैसे ईवीएम में उनकी सीट शून्य वोट दिखा दे।

इसी बीच बबलू दाज्यू पत्रकार धीरे-धीरे खिसककर नेता जी के पास बैठ गया और फुसफुसाते हुए बोला –

“नेताजी, अगर आप चाहें तो मैं कल अख़बार में आपकी योजना वाली खबर पहले पन्ने पर छाप दूँगा। बस थोड़ा-सा सहयोग चाहिए। खबर को मैं ऐसा रंग दूँगा कि जनता पढ़कर रो पड़े और आप वोट पक्के कर लें।”

नेता जी ने मुस्कराकर आँख दबाई और जेब से नोट ऐसे सरका दिए जैसे विज्ञापन पैकेज हो। नोट बबलू की डायरी में ऐसे घुसे जैसे एडिटोरियल पॉलिसी में ‘स्पॉन्सर्ड कंटेंट’।

रामदा यह सब देख चुका था। उसने ऊँची आवाज़ में तीर छोड़ा –

“वाह, पत्रकारिता भी अब चाय की तरह हो गई। पैसा डालो और मनपसंद खबर निकालो। फर्क बस इतना है कि यहाँ शक्कर की जगह नोट डलते हैं और स्वाद उसी हिसाब से बदल जाता है।”

भीड़ ठहाके मारने लगी। बबलू सकपका गया। सबकी नज़रें उसकी डायरी पर टिक गईं, मानो उसमें खबर नहीं, बल्कि शेयर मार्केट का गुप्त सौदा लिखा हो। लेकिन बबलू पत्रकार था, बच निकलने का हुनर जानता था। तुरंत विषय बदलकर बोला –

“देश बदल रहा है भाइयों। मीडिया जनता की आवाज़ बन रहा है। अब तो हर न्यूज़ चैनल सच दिखाता है।”

रामदा हँस पड़ा –

“हाँ, बिल्कुल। सच दिखाता है… लेकिन TRP वाले सच। वही सच, जिसमें स्टूडियो की रोशनी ज्यादा चमकती है और जनता की अंधियारी गली कभी कैमरे में नहीं आती।”

चर्चा गहराने लगी। कोई सरकार को कोस रहा था, कोई जनता को निकम्मा बता रहा था, कोई शिक्षा का रोना रो रहा था, तो कोई संस्कृति का विलाप कर रहा था। सब अपने-अपने को विद्वान मानकर बोल रहे थे, जैसे चाय की दुकान विचारों का विश्वविद्यालय हो और हर ग्राहक यहाँ मानद प्रोफेसर। वैसे ये सभी अपने हिसाब से पढ़े-लिखे थे। चाय की चुस्ती लेते-लेते इन्होंने देश-विदेश का ज्ञान प्राप्त कर लिया था।

शाम ढल रही थी। पहाड़ की चोटियों पर लालिमा फैल चुकी थी। लेकिन चाय की दुकान अब भी गूँज रही थी।

तभी मंगूदा ने याद दिलाया –

“भाइयों, हिसाब तो कर दो। चाय मुफ्त की नहीं है।”

नेता जी ने कुर्सी पीछे सरकाते हुए कहा –

“मेरी गाड़ी में पेट्रोल खत्म हो रहा है, कल आऊँगा तो हिसाब कर दूँगा। वैसे भी नेताओं के हिसाब हमेशा अगले चुनाव तक टलते हैं।”

प्रिंसिपल साहब ने फिर वही बहाना दुहराया –

“मेरे पास छुट्टा नहीं है। शिक्षा व्यवस्था की तरह मेरी जेब भी हमेशा कैश क्रंच में रहती है।”

बबलू पत्रकार ने कॉलर ठीक करते हुए कहा –

“मैं तो समाज के लिए लिख रहा हूँ। मुझसे पैसा लेना पत्रकारिता का अपमान होगा।”

भीड़ खिलखिलाई।

अंत में रामदा फिर खड़ा हुआ और तंज़ कसते हुए बोला –

“ठीक है, मजदूर ही सबका बिल चुकाएगा। वैसे भी इस देश में असली विकास मजदूर के कंधों पर ही टिका है। बाकी सब लोग तो सिर्फ चाय की चुस्की और भाषण की फ्री रील्स से क्रांति लाने आते हैं। असल पसीना वही बहाता है, और मज़ा बाकी सब उड़ाते हैं।”


इतना कहकर उसने जेब से सिक्के निकाले और मंगूदा को थमा दिए। दुकान में एक अजीब-सी खामोशी छा गई। सबकी हँसी जैसे कहीं भीतर अटक गई हो।

दूर पहाड़ पर ढलते सूरज की आखिरी किरणें खप्पर वाले घरों पर पड़ रही थीं – मानो कह रही हों कि यहाँ असली रोशनी अब भी सिर्फ मजदूर के चूल्हे की आग से आती है, बाकी तो सब इलेक्शन मैनिफेस्टो का उजाला है।

बाहर अंँधेरा गहराने लगा था। पहाड़ की चोटियों पर तारे ऐसे टिमटिमाने लगे मानो आसमान भी नीचे बैठी बहस सुनकर मुस्करा रहा हो। औरतें अब भी घास की गाठें पीठ पर लादे लौट रही थीं—कदम थके हुए, लेकिन चेहरे पर वही मजबूरी की शांति। बच्चे अंधेरे में भी खेलते रहे, जैसे उनके हिस्से की बचपन की रोशनी बिजली कटौती के बावजूद बुझने से इनकार कर रही हो।

चाय की दुकान के भीतर तथाकथित विद्वान अपनी आखिरी चुस्की लेकर लंबी साँस छोड़ने लगे। कुछ ने अगली सुबह फिर मिलने का वादा किया, जैसे यह चाय की दुकान संसद हो और अगला सत्र कल ही शुरू होना हो।

देश वहीं का वहीं था। योजनाएँ वहीं की वहीं थीं। सड़कें अब भी टूटी-फूटी थीं, अस्पतालों की दीवारों पर अब भी सीलन थी, स्कूलों की खिड़कियों से अब भी सर्द हवा बच्चों को कंपकँपाती थी। टॉयलेट और बाथरूम के नाम पर बिना दरवाज़े का एक कोना था। मगर चर्चा इतनी ऊँची थी मानो अगले ही दिन पहाड़ स्विट्ज़रलैंड बनने वाला हो या मिनी दुबई ।

रामदा ने बाहर झाँककर देखा। अँधेरे में घास लादे औरतें धीरे-धीरे गाँव की ओर उतर रही थीं। उसने एक गहरी साँस भरी और बुदबुदाया –

“ये पहाड़ स्विट्ज़रलैंड नहीं बनेगा भाइयों, क्योंकि यहाँ औरत की पीठ पर घास और मजदूर की जेब में खालीपन ही लोकतंत्र की असली तस्वीर है। बाकी सब चर्चा बस चाय की भाप है—ठंडी पड़ते ही गायब।”

किसी ने उसकी बात पर ठहाका नहीं लगाया। सबके चेहरे पर एक अजीब-सी चुप्पी फैल गई। यह वही चुप्पी थी जो पहाड़ के जंगलों में रात ढलते उतर आती है—गहरी, भारी और सच का बोझ उठाए।

मंगूदा ने बर्तनों को धोते हुए धीमे स्वर में कहा –

“दाज्यू, चाय तो कल भी बनेगी… लेकिन काश, इन पहाड़ों की किस्मत भी कभी बदल जाती।”

उसकी आवाज़ में उम्मीद कम और बेबसी ज्यादा थी।

तभी पहाड़ों पर ठंडी हवा का झोंका आया। तारे और तेज़ चमकने लगे, जैसे आसमान ने सुन लिया हो। लेकिन धरती पर वही अंधेरा पसरा रहा।

बहस खत्म हो चुकी थी, पर असल सवाल अब भी अनसुलझा था।

चाय की चुस्की ख़त्म हो चुकी थी, मगर देश का हिसाब अब भी बाकी था।