गुरुवार, 4 सितंबर 2025

अक्षरों की लड़ाई (कहानी) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 

अक्षरों की लड़ाई (कहानी)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

धरती पर बहुत लड़ाइयाँ हुईं—राम और रावण की, कौरव और पांडव की, यहाँ तक कि मोहल्ले के शर्मा जी और वर्मा जी की। लेकिन सबसे खतरनाक लड़ाई न तो महाभारत में हुई, न ही किसी संसद में। सबसे भयानक लड़ाई हुई थी अक्षरों के बीच। हाँ, वही मासूम से दिखने वाले अक्षर, जिनसे हम "आई लव यू" भी लिखते हैं और "राजीनामा" भी। जिनसे विवाह भी लिखते हैं और तलाक़ भी।

अक्षर जब पैदा हुए थे तो सब भाई-भाई थे। स्वर बड़े भाई, व्यंजन छोटे भाई, मात्राएँ बहनें, और विराम चिह्न पड़ोस के वो खड़ूस अंकल, जो हर वाक्य के अंत में आकर डाँटते—“बस, अब और नहीं।” पर समय बीता, भाई-भाई में झगड़े शुरू हो गए। स्वर बोले—“हम ही असली राजा हैं। हमारे बिना तुम व्यंजन कुछ भी नहीं।” व्यंजन तुनककर बोले—“तुम हवा हो, तुम्हारा वजूद ही हमारी पीठ पर टिका है। हम न हों तो तुम्हारी सांस बेमानी।”

अब स्वर और व्यंजन की इस बहस में मात्रा बहनें भी कूद पड़ीं। “देखो भाई,” मात्रा ने कहा, “तुम दोनों चाहे जितना भी शोर मचाओ, हमारी बिंदी और खड़ी मात्राओं के बिना कोई हमें पढ़ भी नहीं पाएगा। तुम सब बस खोखली हड्डियाँ हो, असली चमक तो हमारी वजह से है।” इतना सुनते ही स्वर और व्यंजन एक साथ बोले—“ओह मैडम, तुम्हें तो ट्यूशन फीस देने का शौक है क्या? बिना हम दोनों के तुम खड़ी रहोगी कहाँ?”

विराम चिह्न तो वैसे ही बैठे रहते थे, जैसे चौकीदार बिना काम का। मगर जब लड़ाई बढ़ी, तो उन्होंने भी अपनी मूँछें ऐंठीं। अल्पविराम बोला—“देखो भाई, मेरी अहमियत को कम मत आँकना। मैं न रहूँ तो लोग एक ही सांँस में हाँफ-हाँफकर गिर पड़ेंगे।” पूर्णविराम ने और अकड़ दिखाते हुए कहा—“और मैं! मेरे बिना तो वाक्य जीवनभर लटकता ही रहेगा। खत्म करने की ताकत सिर्फ मेरे पास है।” प्रश्नवाचक चिह्न ने तुरंता सवाल दाग दिया—“और बिना मेरे सोचोगे कैसे? मैं हूँ तो जिज्ञासा है, मैं नहीं तो दिमाग लकवाग्रस्त।” विस्मयादिबोधक ने ठहाका लगाया—“अरे, तुम सबके बिना जी सकते हैं लोग, मगर मेरे बिना जिंदगी में मज़ा कहाँ से लाएँगे!”

इधर आकाश गूँज रहा था अक्षरों की चीख-पुकार से। 'अ' ने लम्बा आलाप लिया—“आआआआ…”। 'क' ने उसकी टाँग खींच दी—“कट!” 'स' फुफकारा और 'श' ने मजाक उड़ाया—“स्स्स्स… चुप रह।” नक्षत्र हिलने लगे, तारामंडल डगमगाने लगे, यहाँ तक कि धरती पर बैठे मास्टर गंगाप्रसाद की नींद भी हराम हो गई।

गंगाप्रसाद कोई मामूली इंसान नहीं थे। पैंतीस बरस तक बच्चों को अक्षर पढ़ाए थे। सुबह की पहली चाय से लेकर रात की आखिरी डकार तक, उनका जीवन 'अ' से 'ज्ञ' तक फैला हुआ था। लेकिन अब अक्षरों की बगावत ने उन्हें चक्कर में डाल दिया। सपनों में अक्षर कक्षा में आ खड़े होते, और गंगाप्रसाद को कुर्सी पर बिठाकर कहते—“मास्टरजी, फैसला करो, हममें असली राजा कौन है?”

गंगाप्रसाद बेचारे माथा पकड़ लेते। 'अ' और 'आ' आपस में गुत्थमगुत्था हो जाते। 'ऋ' बगल में खड़ा रोता—“किसी को मेरी याद क्यों नहीं आती?” व्यंजन तो खैर वैसे ही पंक्ति बना कर खड़े रहते, जैसे सेना का बटालियन। 'क' अपना डंडा घुमाता, 'ख' छाती फुलाता, 'ग' गुर्राता। 'ट' और 'ठ' तो मानो मोहल्ले के गुंडे—हर समय किसी को ठोकने के मूड में।

और यह लड़ाई सिर्फ सपनों तक सीमित नहीं रही। हकीकत में भी असर दिखने लगा। एक दिन एक बच्चा लिख रहा था—“राम बाजार गया।” अचानक अल्पविराम उछलकर बोला—“मास्टरजी! यहाँ मेरी जगह थी, मगर इसने मुझे घुसने ही नहीं दिया।” पूर्णविराम ने डफली बजाई—“हाँ! और जब तक मैं न आऊँ, यह वाक्य अधूरा है।” बच्चा झल्लाकर बोला—“क्या सब मेरी कॉपी में ही दफ़्तर खोलना है तुम्हें?” और पूरी कक्षा हँसी से फट पड़ी।

गंगाप्रसाद को समझ आने लगा कि अक्षरों की लड़ाई दरअसल मनुष्य के भीतर की लड़ाई है। स्वर और व्यंजन का झगड़ा वैसा ही है, जैसा घर में मियाँ-बीवी का झगड़ा। मात्रा बहनों की शिकायतें बिल्कुल वैसी ही हैं, जैसी पड़ोसन की—“हमें कोई पूछता ही नहीं।” और विराम चिह्न वही खड़ूस रिश्तेदार हैं, जो हर मौके पर टांग अड़ाने चले आते हैं।

लेकिन सबसे बड़ा धमाका तब हुआ, जब ‘मौन’ दरवाज़ा तोड़कर कक्षा में घुस आया। अब तक चुपचाप कोने में बैठा रहने वाला मौन धीरे-धीरे आगे बढ़ा। सारे अक्षर हक्के-बक्के देख रहे थे। मौन ने शांत स्वर में कहा—“तुम सब चाहे जितना लड़ लो, अंत में जीत मेरी ही होगी। जीवन के आखिरी पल में हर इंसान मेरे पास ही आता है।”

गंगाप्रसाद का दिल धक से रह गया। हाँ, यही तो सच है। जीवन भर इंसान अक्षरों में लड़ता रहता है—वाद-विवाद, परीक्षा, तर्क, बहस, प्रेमपत्र, इस्तीफा—सब अक्षरों की वजह से। मगर जब मौत आती है, तब सारे अक्षर धरे के धरे रह जाते हैं। बस मौन रह जाता है।

समय अपनी रफ्तार से भागा। गंगाप्रसाद बूढ़े हो गए। उनकी मोटी ऐनक से अब अक्षर धुंधले दिखते। बच्चों की कॉपी में ‘क’ और ‘ख’ का फर्क पकड़ना मुश्किल हो गया। मगर मन की गहराई में वे जानते थे—यह सब झगड़े, यह सब लड़ाइयाँ, सिर्फ उसी अनंत कहानी का हिस्सा हैं, जिसमें शुरुआत अक्षरों से होती है और अंत मौन में।

जब आखिरी घड़ी आई, गंगाप्रसाद बिस्तर पर लेटे थे। सारे अक्षर उनके चारों ओर आ खड़े हुए। स्वर उनके सिरहाने, व्यंजन पैरों के पास, मात्राएँ किनारे, विराम चिह्न चौखट पर पहरा दे रहे थे। ‘अ’ ने झुककर कहा—“मास्टरजी, हमें माफ़ कर दीजिए।” ‘क’ ने सिर झुका लिया। अल्पविराम रो पड़ा—“हमारी लड़ाई ने आपको बहुत परेशान किया।”

गंगाप्रसाद ने धीमे स्वर में मुस्कराकर कहा—

“बेटा, जीवन भी तो अक्षरों की लड़ाई ही है। कोई बड़ा, कोई छोटा, कोई ऊँचा, कोई नीचा। मगर सब मिलकर ही भाषा बनाते हैं। आज मैं मौन हो रहा हूँ… और यह मेरी सबसे बड़ी कविता होगी।”

इतना कहकर उन्होंने आँखें मूँद लीं।

मौन ने उन्हें अपने आँचल में समेट लिया।

मौन कोई साधारण विराम नहीं था—वह तो शून्य के समान था। ऐसा शून्य, जिसमें अनगिनत स्वर-व्यंजन समा जाते हैं, और फिर भी जगह बची रहती है। अक्षरों ने पहली बार समझा कि सबसे बड़ा अक्षर वही है, जो अक्षरों से परे है। मौन—एक ऐसा महासागर, जिसमें हर लहर अपने-अपने स्वर-व्यंजन की पहचान खो देती है और बस ध्वनि की स्मृति बचती है।

गंगाप्रसाद के मौन हो जाने के बाद अक्षरों ने पहली बार एकता दिखाई। गाँव की चौपाल जैसी सभा बुलाई गई। ‘अ’ ने शोकप्रस्ताव रखा—“वे हमें जोड़ते थे, सिखाते थे कि साथ रहो। अब जब वे मौन हुए हैं तो हमें भी मौन रहना चाहिए।” मगर तभी ‘क’ खाँस पड़ा और बोला—“इतना मौन रहेंगे तो अखबार कौन छापेगा? राजनीति कैसे चलेगी?” अल्पविराम ने बीच में घुसकर आह भरी—“भाई, हमें भी थोड़ा जगह दो, हम भी दुखी हैं।” प्रश्नवाचक चिह्न अपनी आदत से मजबूर होकर पूछ बैठा—“क्या अब हम सबको मौन धारण करना पड़ेगा?” 

व्यंजन पंक्ति बनाकर खड़े थे, स्वर गले में रुलाई अटका कर सुबक रहे थे, और मात्राएँ अपनी बिंदियाँ पोंछ-पोंछकर आँखों का पानी सुखा रही थीं। पूर्णविराम ने आँसू बहाते हुए ऐलान किया—“अब यह वाक्य सचमुच समाप्त हुआ।” डैश ने लंबी साँस खींची और बोला—“मगर यह विराम अंत नहीं, एक विस्तार है।” अक्षरों को पहली बार अहसास हुआ कि गंगाप्रसाद तो मौन में समा गए, पर उनकी छोड़ी हुई भाषा, उनकी कक्षाओं की गूँज, और उनकी हँसी अब भी अक्षरों के भीतर धड़क रही है। समय के साथ-साथ शोकसभा धीरे-धीरे एक हँसी-सभा में बदल गई—जहाँ ग़म भी व्यंग्य की तरह मुस्कुरा रहा था।

लेकिन अक्षर मरते नहीं। वे तो आज भी ज़िंदा हैं। अखबारों में चीखते हैं, सोशल मीडिया पर गाली-गलौज करते हैं, कविताओं में झूमते हैं, और संसद में तो बाकायदा हाथापाई करवा देते हैं। फर्क बस इतना है कि पहले वे ब्लैकबोर्ड पर लड़ते थे, अब मोबाइल स्क्रीन पर दंगल करते हैं। अक्षरों की लड़ाई अब भी जारी है, बस गंगाप्रसाद जैसे लोग उसे समझाने और सुलझाने के लिए नहीं रहे—या यूँ कहें कि अब सुलझाने की हिम्मत किसी में बची ही नहीं।

और यही सबसे बड़ा व्यंग्य है। इंसान सोचता है कि वह अक्षरों का मालिक है—किताबें लिखकर, भाषण देकर, समझौते साइन कराकर—मानो पूरी दुनिया उसकी कलम से चल रही हो। लेकिन सच्चाई यह है कि अक्षर ही उसे नचाते हैं। कभी वे उसे प्रपोज करवाते हैं, तो कभी तलाक दिलवाते हैं। कभी अदालत में गवाही बनकर खड़े हो जाते हैं, तो कभी सियासत में झूठ का जुलूस निकाल देते हैं। आदमी सोचता है कि वह बोल रहा है, जबकि असल में अक्षर उसकी ज़बान पर कब्ज़ा जमाए हुए कठपुतली नचा रहे हैं।

और जब यह पूरा तमाशा खत्म हो जाता है—अखबार पुराना हो जाता है, सोशल मीडिया का पोस्ट डिलीट हो जाता है, कविताएँ बासी हो जाती हैं, संसद का शोर ठंडा पड़ जाता है—तब सिर्फ मौन बचता है। मौन, जो सबसे बड़ा अक्षर है, एक ऐसा अक्षर जो लिखा नहीं जा सकता, पर जिसमें सारे अक्षर समा सकते हैं। 'महाशून्य' के समान, वही मौन फिर ठहाका लगाता है—एक ऐसा ठहाका, जो आदमी की गंभीरता को खिल्ली बना देता है, और पूरी कायनात में गूंज उठता है।

जीवन दरअसल अक्षरों की लड़ाई है। मगर अंत में अक्षर बच जाते हैं और इंसान मिट जाता है। आदमी तो बस एक अस्थायी अक्षर है, एक चलती-फिरती किताब। मौत आते ही किताब का कवर फट जाता है, पन्ने बिखर जाते हैं, पर अक्षर उड़कर आकाश में तैरते रहते हैं—जैसे ब्रह्मांड का शाश्वत ध्वनि-संगीत, जो कभी खत्म नहीं होता।

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