दंडवत यात्रा ( कहानी )
(भाग 1)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
"ज़िंदगी जब उम्मीद से खाली हो जाती है,
तब इंसान अपनी आस्था को थाम लेता है।
जहाँ दवा जवाब दे देती है,
वहाँ दुआ अपनी ताक़त दिखाती है।"
देहरादून की सुबह थी। पहाड़ों से उतरती हवा शहर की गलियों में घूम रही थी। सूरज की पहली किरणें घण्टाघर की पुरानी घड़ी पर चमक रही थीं। लेकिन गणपत के जीवन में उस दिन कोई रोशनी नहीं थी। उसका घर गहरे अंधकार से भरा हुआ था।
उसकी माँ महीनों से बीमार थीं। तरह-तरह के डॉक्टरों, अस्पतालों और दवाइयों ने कोशिश की थी, पर हर रिपोर्ट एक ही बात कह रही थी – अब कोई उम्मीद नहीं बची। माँ बिस्तर पर पड़ी थीं, साँसें टूटती-सी, आँखों में निराशा। डॉक्टर ने पिछले दिन ही साफ कहा था, “तुम्हारी मां को अब कोई नहीं बचा सकता। जितना समय है, उनके साथ गुजार लो।”
वो वाक्य गणपत के कानों में बार-बार गूंज रहा था। उसकी आँखें लाल थीं, दिल रो रहा था। माँ उसकी दुनिया थीं। उन्होंने अकेले ही उसे पाला था, पिता बचपन में ही चले गए थे। माँ ही उसका घर थीं, उसका सहारा, उसकी पहचान। और अब वही धीरे-धीरे उससे छिन रही थीं।
रात भर गणपत उनकी खाट के पास बैठा रहा। बाहर से सब शांत था, पर भीतर एक तूफ़ान उठ रहा था। अचानक उसने अपने भीतर एक आवाज सुनी — “जब इंसान बेबस हो जाता है, तो एक ही राह बचती है — भगवान की राह।”
गणपत ने मन ही मन ठान लिया। “मैं बाबा केदारनाथ तक दंडवत यात्रा करूँगा। हर बार ज़मीन पर सिर रखूँगा, उठूँगा, फिर प्रणाम करूँगा। जब तक उनकी चौखट तक न पहुँच जाऊँ, रुकूँगा नहीं। अगर मेरी तपस्या सच्ची है तो बाबा माँ को ज़रूर बचाएँगे।”
सुबह की पहली किरण के साथ गणपत ने माँ के पैरों को छुआ। माँ की आँखों में आशीर्वाद था, लेकिन साथ ही चिंता भी। वह जानती थीं कि यह यात्रा आसान नहीं है। पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस इतना बोलीं – “बेटा, अगर विश्वास है तो रास्ता भी मिलेगा।”
गणपत घर से निकल पड़ा। सबसे पहले वह देहरादून के घण्टाघर पहुँचा। चारों ओर भीड़-भाड़ थी, पर वह वहीं ज़मीन पर लेट गया। उसका सीना, उसका माथा सड़क पर टिक गया। उसने पहला दंडवत प्रणाम किया। लोग ठहर गए। कोई हँसा, कोई बोला – “पागल है।” कोई बोला – “सच्चा भक्त है।” लेकिन गणपत ने किसी की परवाह नहीं की।
वह टपकेश्वर महादेव मंदिर की ओर बढ़ा। हर कुछ कदम पर दंडवत प्रणाम। गर्म सड़क की तपिश उसके शरीर को झुलसा रही थी। घुटनों से खून निकलने लगा। लेकिन भीतर से एक आवाज़ आती रही – “सहन कर, ये पीड़ा ही तेरी शक्ति है।”
घंटों तक चलता रहा। अंततः वह ऋषिकेश पहुँचा। गंगा के किनारे त्रिवेणी घाट पर आरती हो रही थी। दीपकों की रोशनी गंगा की लहरों पर तैर रही थी। गणपत वहाँ ज़मीन पर लेट गया। गंगा की धारा उसके माथे से बहते पसीने और आँसुओं के साथ मिल गई। उसने मन ही मन कहा –
“माँ की बीमारी मेरी असहायता है, और ये गंगा मेरा विश्वास। जब तक विश्वास बहता है, उम्मीद जीवित है।”
लक्ष्मण झूला पार करते हुए कई लोग उसके पास आए। कोई उसके पैर छूने लगा, कोई हाथ जोड़ने लगा, कोई उसकी तस्वीर खींचने लगा। कुछ ने कहा – “ये संत है, बाबा का दूत।” लेकिन गणपत का मन भीतर से कह रहा था – “मैं संत नहीं हूँ। मैं तो बस एक बेटा हूँ, अपनी माँ की ज़िंदगी के लिए प्रार्थना करता हुआ।”
ऋषिकेश की गलियों से निकलते हुए उसे अहसास हुआ कि उसकी यात्रा अब और कठिन होगी। अब सामने पहाड़ थे, गहरी घाटियाँ थीं और अंतहीन रास्ते।
लेकिन उसके भीतर एक ही संकल्प था – “जब तक केदारनाथ की चौखट तक न पहुँच जाऊँ, रुकूँगा नहीं।”
दंडवत यात्रा (भाग 2)
ऋषिकेश छोड़ते ही पहाड़ों का असली रूप सामने आ गया। टेढ़ी-मेढ़ी सड़कें, एक ओर गहरी खाई, दूसरी ओर चट्टानें। गणपत हर बार ज़मीन पर लेटता, माथा धरती से लगाता, फिर उठकर एक कदम आगे बढ़ता। यह यात्रा अब सिर्फ शरीर की नहीं थी, यह उसकी आत्मा की परीक्षा थी।
गर्मियों की धूप सिर पर थी। सड़कें तप रही थीं। हर दंडवत में उसकी छाती जलती, घुटने छिलते, और माथा ज़मीन से टकराकर लाल हो जाता। लेकिन गणपत का मन कहता – “अगर यह कष्ट मुझे माँ की एक साँस लौटा सकता है, तो हर दर्द मीठा है।”
कई यात्री उसे देख ठहर जाते। कोई पानी पिला देता, कोई उसके पैर दबाने लगता। किसी ने कहा – “भाई, यह पागलपन है।” किसी ने कहा – “नहीं, यह सच्ची भक्ति है।” लेकिन गणपत चुप रहा। उसके लिए न दुनिया थी, न लोग। उसके लिए बस एक ही ध्येय था – बाबा केदारनाथ।
दिन ढलते-ढलते वह देवप्रयाग पहुँचा। वहाँ भागीरथी और अलकनंदा का संगम था। दो धाराएँ मिलकर गंगा बनती थीं। गणपत संगम किनारे बैठ गया। लहरें टकरा रही थीं, मानो आकाश और धरती की अनंत वार्ता हो रही हो।
उसने खुद से कहा –
“देख गणपत, जैसे ये दो नदियाँ मिलकर एक हो गईं, वैसे ही तेरी पीड़ा और तेरी आस्था भी अब एक हो गई है। पीड़ा के बिना आस्था अधूरी है, और आस्था के बिना पीड़ा अर्थहीन।”
उस क्षण उसे लगा कि वह अकेला नहीं है। हर लहर, हर पत्थर, हर पेड़ उसकी तपस्या का साक्षी है।
देवप्रयाग से आगे रास्ते और कठिन थे। पहाड़ ऊँचे होते जा रहे थे। हवा में नमी थी, लेकिन पैरों की थकान हड्डियों तक पहुँच चुकी थी। फिर भी वह हर बार प्रणाम करता, उठता, और आगे बढ़ता।
कभी-कभी उसके भीतर सवाल उठते – “क्या सचमुच बाबा मेरी माँ को बचाएँगे? या यह सब व्यर्थ है?” लेकिन उसी क्षण भीतर से आवाज आती – “विश्वास सवाल नहीं पूछता, वह सिर्फ चलता है।”
रात को वह एक ढाबे के पास रुक गया। लोग उसे देखकर हाथ जोड़ने लगे। कोई कह रहा था – “ये संत तो हमारे गाँव का आदर्श बन जाएगा।” किसी ने उसके पैरों को छू लिया। लेकिन गणपत की आँखें गीली थीं। उसने मन ही मन कहा –
“वे मुझे आदर्श समझते हैं, पर मैं तो भीतर से खाली हूँ। मैं तो बस अपनी माँ के लिए रोता हुआ बेटा हूँ।”
कई दिन की कठिन यात्रा के बाद वह रुद्रप्रयाग पहुँचा। यहाँ अलकनंदा और मंदाकिनी का संगम था। उसने उस संगम को देखा और सोचा –
“जैसे ये नदियाँ अलग-अलग होते हुए भी यहाँ मिल गईं, वैसे ही मनुष्य की राहें चाहे कितनी भी भिन्न हों, अंत में सब ईश्वर तक ही जाती हैं। मैं भी अपनी राह पर चल रहा हूँ।”
लेकिन रुद्रप्रयाग में उसका शरीर टूटने लगा। घुटनों से खून बह रहा था, हाथ काँप रहे थे। रात में जब वह ज़मीन पर लेटकर तारों को देखता, तो सोचता –
“अगर मैं यहीं मर गया, तो क्या होगा? माँ का क्या होगा? क्या मेरी तपस्या अधूरी रह जाएगी?”
भीतर से उत्तर आता – “अगर तू अपनी अंतिम साँस तक बाबा का नाम लेता है, तो तेरी तपस्या अधूरी नहीं होगी। तपस्या का मूल्य परिणाम में नहीं, प्रयास में है।”
गणपत ने गहरी साँस ली और खुद से वादा किया – “चाहे शरीर टूट जाए, पर विश्वास नहीं टूटेगा।”
रुद्रप्रयाग से आगे का रास्ता और कठिन था, लेकिन गणपत अब भयमुक्त था। उसके लिए हर दर्द, हर घाव एक वरदान था।
दंडवत यात्रा (भाग 3)
रुद्रप्रयाग से आगे का रास्ता मानो पहाड़ों की परीक्षा थी। हवा में ठंडक थी, पर शरीर इतना टूटा हुआ था कि हर अंग चीत्कार कर रहा था। घुटनों पर पट्टियाँ बाँधने के बावजूद हर दंडवत के साथ खून रिस आता। लेकिन गणपत का मन और दृढ़ हो चुका था।
गुप्तकाशी की ओर बढ़ते हुए उसने चट्टानों को देखा, जहाँ कहीं-कहीं शिवलिंग जैसे आकार उभरते थे। एक साधु ने उससे कहा –
“यही वह भूमि है जहाँ पांडवों ने शिव को खोजा था। शिव उनसे छिपकर यहाँ बैल बने थे। इसलिए इसे गुप्तकाशी कहते हैं।”
गणपत चुपचाप सुनता रहा। उसके भीतर एक सवाल उठा – “क्या शिव मुझसे भी छिपे हुए हैं? या वे मेरी हर पीड़ा देख रहे हैं?”
भीतर से एक उत्तर आया – “शिव छिपते नहीं, वे परखते हैं। जब तक मनुष्य का संकल्प पवित्र न हो, शिव सामने नहीं आते।”
उस रात गणपत गुप्तकाशी के एक मंदिर की चौखट पर लेट गया। आकाश में असंख्य तारे चमक रहे थे। उसने खुद से कहा –
“माँ, मैं थक गया हूँ। पर तेरे लिए चल रहा हूँ। अगर बाबा सचमुच हैं, तो वे मुझे गिरने नहीं देंगे।”
सुबह होते ही वह फिर यात्रा पर निकला। हर दंडवत में उसका माथा पत्थरों से टकराता, घुटने फटते, लेकिन उसकी आत्मा कहती – “सहन कर गणपत, यही तेरी तपस्या है।”
दिन ढलते-ढलते वह सोनप्रयाग पहुँचा। यहाँ से केदारनाथ की अंतिम यात्रा शुरू होती थी। सोनप्रयाग में तीर्थयात्रियों की भीड़ थी। लोग घोड़े, पालकी और डांडी से ऊपर जा रहे थे। लेकिन गणपत सबके बीच ज़मीन पर लेट-लेटककर प्रणाम करता हुआ आगे बढ़ रहा था।
लोग उसे देखकर विस्मित हो जाते। कोई उसके पैरों को छूता, कोई उसका माथा सहलाता। बच्चे उसे देखकर “बाबा, बाबा” कहने लगते।
किसी ने कहा – “यह तो अवतार है।”
किसी ने कहा – “यह तो हमारी पीढ़ी का संत है।”
लेकिन गणपत का मन भीतर से फुसफुसाता – “मैं संत नहीं हूँ। मैं तो रिक्त हूँ, खाली हूँ। मैं तो बस अपनी माँ की साँसों को बचाने के लिए यहाँ हूँ।”
सोनप्रयाग से आगे रास्ता और दुर्गम था। संकरी पगडंडियाँ, खाई के किनारे से गुजरते लोग, और ऊपर चढ़ती हुई पगडंडियाँ। गणपत हर दंडवत में खुद को ज़मीन पर फेंक देता। उसके हाथ काँपते, शरीर गिरने लगता, लेकिन फिर वह उठ खड़ा होता।
गौरीकुंड पहुँचना उसके लिए एक और परीक्षा थी। यहाँ से बाबा के दरबार की चढ़ाई शुरू होती थी। गौरीकुंड की पवित्र धारा को देखकर गणपत ने अपने घाव धोए। पानी बर्फ जैसा ठंडा था। घावों में आग-सी लगने लगी, लेकिन उसकी आत्मा को शांति मिली।
उसने खुद से कहा –
“जैसे पार्वती माँ ने यहाँ तपस्या की थी, वैसे ही मैं भी तपस्या कर रहा हूँ। मेरी तपस्या अधूरी नहीं जाएगी। माँ को मैं बाबा के दरबार में ले जाऊँगा, चाहे अपने विश्वास में ही सही।”
गौरीकुंड की रात सबसे कठिन थी। ठंड असहनीय थी, शरीर टूट चुका था। भूख और प्यास से वह काँप रहा था। उसने आँखें बंद कीं और आत्मा से संवाद किया –
“गणपत, अगर तू अभी हार गया, तो सब व्यर्थ है। तेरे माँ के लिए हर कदम, हर प्रणाम मायने रखता है। याद रख, तपस्या परिणाम से बड़ी होती है।”
आँखों में आँसू थे, शरीर थककर टूट रहा था, लेकिन आत्मा अब लोहे जैसी मज़बूत हो चुकी थी।
गणपत जानता था कि अब अंतिम चढ़ाई बाकी है। यही वह राह थी जहाँ से उसकी आस्था का शिखर दिखाई देगा।
दंडवत यात्रा (भाग 4 )
गौरीकुंड से आगे का रास्ता जीवन और मृत्यु के बीच की एक संकरी रेखा था। एक ओर बर्फ़ से ढकी चोटियाँ, दूसरी ओर गहरी खाई, और बीच में संकरी पगडंडी। ठंडी हवा उसके घावों पर चुभ रही थी, लेकिन गणपत का शरीर अब दर्द से परे जा चुका था। उसका हर अंग जल रहा था, पर मन एक ही मंत्र जप रहा था –
“हर-हर महादेव… हर-हर महादेव…”
हर दंडवत के साथ उसका माथा कठोर पत्थरों पर लगता। घुटनों से खून मिट्टी और धूल में मिल जाता। शरीर गिरने लगता, पर आत्मा कहती – “उठ गणपत, अभी नहीं रुकना।”
यात्रियों की भीड़ उसे देखकर ठहर जाती। कोई उसे सहारा देना चाहता, कोई रोकना चाहता, पर गणपत बस एक ही उत्तर देता –
“मुझे न छुओ, यह तपस्या मेरे और बाबा के बीच है।”
धीरे-धीरे बर्फ़ीली हवा तेज़ होती गई। ऊँचाई बढ़ती गई। साँस लेना कठिन हो रहा था। गणपत कई बार गिरा, कई बार बेहोश-सा हुआ, पर हर बार उठ खड़ा हुआ।
रास्ते में उसे एक बुज़ुर्ग साधु मिले। उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा –
“बेटा, तू शरीर से नहीं, आत्मा से चल रहा है। यह मार्ग कठिन है, पर तेरा विश्वास ही तुझे केदार तक ले जाएगा।”
गणपत की आँखें नम हो गईं। उसने प्रणाम किया और आगे बढ़ा।
घंटों की कठिन चढ़ाई के बाद अचानक सामने सफ़ेद धुंध छंटने लगी। बर्फ़ से ढकी चोटियों के बीच, पत्थरों की घाटी में, बाबा केदारनाथ का मंदिर दिखने लगा। घंटियों की ध्वनि हवा में तैर रही थी। मंत्रोच्चार गूंज रहे थे।
गणपत वहीं ज़मीन पर गिर पड़ा। आँसू उसके गालों पर बह निकले। उसने खुद से कहा –
“माँ, देखो… मैं आ गया… तुम्हारे बेटे ने बाबा की चौखट पा ली।”
वह घुटनों के बल घिसटता हुआ मंदिर की ओर बढ़ा। हर कदम पर प्रणाम करता। लोग चारों ओर खड़े होकर उसे देख रहे थे। किसी की आँखों में आँसू थे, कोई मंत्र जप रहा था, कोई कह रहा था – “यह तो जीवित तपस्वी है।”
अंततः गणपत मंदिर के द्वार तक पहुँच गया। उसने अपनी पूरी देह को ज़मीन पर फैला दिया। उसके होंठ काँप रहे थे, पर आवाज़ साफ़ थी –
“भोलेनाथ… मेरी माँ को बचा लो। अगर मेरा जीवन चाहिए, तो ले लो। पर माँ की साँसें मत छीनो।”
उस क्षण उसे लगा कि पूरा पर्वत गूंज रहा है। हवा में घंटियों की ध्वनि मिल गई। उसके भीतर अचानक एक शांति उतर आई।
गणपत ने आँखें बंद कीं। उसके भीतर से आवाज़ आई –
“गणपत, तूने अपनी सीमा से परे चलकर विश्वास का मार्ग चुना है। तूने तपस्या का अर्थ समझा है। जान ले, जीवन और मृत्यु हमारे हाथ में नहीं, पर आस्था कभी व्यर्थ नहीं जाती। तेरी माँ का समय चाहे जैसा हो, पर तूने उन्हें अमर कर दिया है अपने विश्वास में। तू अब रिक्त नहीं है, तू स्वयं शिव का अंश बन चुका है।”
गणपत रो पड़ा। आँसू बर्फ़ पर गिरकर मोती जैसे चमकने लगे।
उसने शिवलिंग के सामने माथा टेक दिया। भीतर से एक अजीब शक्ति महसूस हुई। उसका हृदय शांत हो चुका था। वह जान गया कि माँ का जीवन अब ईश्वर के हाथों में है, और उसका संकल्प पूरा हो चुका है।
लोग उसे “गणपत बाबा” कहकर पुकारने लगे। कोई उसके चरण छूने लगा, कोई उसका आशीर्वाद माँगने लगा। लेकिन गणपत जानता था –
“मैं संत नहीं हूँ। मैं तो बस एक बेटा हूँ, जिसने अपनी माँ के लिए अपना सब कुछ अर्पण कर दिया। और यही अर्पण मुझे ईश्वर से जोड़ गया।”
बर्फ़ीले पहाड़ों के बीच, घंटियों की गूँज और मंत्रोच्चार के बीच गणपत का चेहरा दिव्यता से चमक रहा था। उसकी आँखों में अब डर नहीं था, सिर्फ़ शांति थी।
कहानी यहाँ समाप्त नहीं होती, क्योंकि गणपत की यात्रा सिर्फ़ उसकी माँ के लिए नहीं थी। उसकी दंडवत यात्रा अब हर उस इंसान की कहानी बन चुकी थी जो पीड़ा में भी
विश्वास बनाए रखता है।
और यही सत्य था –
ईश्वर बाहर नहीं, भीतर है।
विश्वास बाहर नहीं, आत्मा के गहराई में है।
और वही विश्वास मनुष्य को अमर बना देता है।
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