शनिवार, 20 सितंबर 2025

विजयदशमी पर्व की प्रासंगिकता ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड

 

विजयदशमी पर्व की प्रासंगिकता 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड 

अच्छाई की विजय और राष्ट्र जागरण का पर्व-

भारतीय संस्कृति की भूमि अनादि काल से ही उत्सवों और पर्वों की भूमि रही है। यहाँ प्रत्येक पर्व केवल बाह्य अनुष्ठान या सामाजिक सामूहिकता का अवसर भर नहीं होता, बल्कि उसमें जीवन की गहन दार्शनिकता, मानव-चेतना का आत्मिक संवाद और राष्ट्रजीवन की अनवरत धड़कन निहित रहती है। इन्हीं पर्वों की श्रृंखला में विजयदशमी या दशहरा एक ऐसा महापर्व है, जो समय-काल की सीमाओं से परे होकर सतत प्रासंगिक बना हुआ है।

विजयदशमी के दिन जब आकाश में रावण का पुतला अग्नि में भस्म होता है, तो वह केवल कागज और लकड़ी का दहन नहीं होता, बल्कि वह प्रतीक होता है उन समस्त बुराइयों के नाश का, जो मनुष्य के अंतःकरण और समाज की चेतना को कलुषित करती हैं। जब दुर्गा की प्रतिमाएँ विसर्जित होती हैं, तो वे केवल मिट्टी की मूर्तियाँ नहीं होतीं, बल्कि उनमें निहित शक्ति, साहस और धर्म की चिरंतन चेतना हमारी आत्मा में प्रवाहित होती है।

आज के युग में, जब मनुष्य सुविधा-संपन्न होकर भी मूल्यहीनता और अराजकता से जूझ रहा है, विजयदशमी का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह पर्व हमें पुकारता है कि हम अपने भीतर और बाहर के रावणों का दहन करें, महिषासुर जैसी प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करें, और राष्ट्र व समाज के उत्थान के लिए आत्म-बलिदान का संकल्प लें।

1. ऐतिहासिक एवं पौराणिक प्रासंगिकता-

भारतीय सभ्यता की कथा यदि कही जाए, तो वह केवल घटनाओं का क्रम नहीं है, बल्कि वह धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य, न्याय और अन्याय के बीच निरंतर संघर्ष की गाथा है। विजयदशमी इसी संघर्ष का शाश्वत प्रतीक है।

रामायण की कथा में भगवान राम का रावण पर विजय प्राप्त करना केवल एक राजा का दूसरे राजा पर पराजय दिलाना नहीं था, बल्कि यह धर्म की अधर्म पर विजय का उद्घोष था। रावण केवल एक व्यक्ति नहीं था, वह अहंकार, काम, लोभ और अत्याचार की मूर्त अभिव्यक्ति था। राम ने उस अहंकार का दहन किया और यह संदेश दिया कि धर्म चाहे विलंब से ही क्यों न हो, अंततः विजय अवश्य प्राप्त करता है।

महिषासुर-मर्दिनी की कथा भी इसी सत्य को प्रतिपादित करती है। जब देवता भी असुर के अत्याचार से त्रस्त हो उठे, तब शक्ति स्वरूपा दुर्गा ने महिषासुर का वध कर धर्म की स्थापना की। यहाँ दुर्गा केवल एक देवी नहीं हैं, बल्कि वे स्त्री-शक्ति और दिव्य ऊर्जा की प्रतीक हैं, जो अन्याय और पाप का अंत करती हैं।

अतः विजयदशमी का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व यही है कि यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि असत्य की विजय क्षणिक है, किंतु सत्य की विजय शाश्वत और अवश्यंभावी है।

2. सांस्कृतिक प्रासंगिकता-

भारत की संस्कृति विविधता में एकता का अद्भुत उदाहरण है। विजयदशमी इस विविधता को अपनी संपूर्णता में समेटे हुए है। कहीं इसे रामलीला के रूप में मनाया जाता है, कहीं दुर्गा पूजा के रूप में, तो कहीं शस्त्र-पूजन और ग्राम्य उत्सव के रूप में।

उत्तर भारत में जब रावण-दहन के दृश्य प्रस्तुत होते हैं, तो पूरा समाज इस सांकेतिक घटना में सहभागी बनता है। यह रावण-दहन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक सामूहिक शपथ है कि हम समाज की बुराइयों को जड़ से मिटाएँगे। पूर्व भारत में दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन होता है। दुर्गा प्रतिमा की अलौकिक शोभा और उसकी प्रतिमाओं में दर्शाए गए पौराणिक प्रसंग केवल कला नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक संवाद है। पश्चिम भारत में इसे शक्ति-पूजन के साथ और दक्षिण भारत में नवरात्रि-उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

इस प्रकार, विजयदशमी पर्व भारतीय संस्कृति की सांस्कृतिक एकात्मता का भी प्रतीक है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि भारत की संस्कृति केवल धार्मिक अनुष्ठानों का संग्रह नहीं, बल्कि यह जीवन-मूल्यों की जीवंत अभिव्यक्ति है, जो हर क्षेत्र में अलग रूप में खिलकर भी एक ही संदेश देती है—अधर्म का अंत और धर्म की विजय।

3. सामाजिक प्रासंगिकता-

समाज केवल व्यक्ति-समूह का नाम नहीं है; यह उन मूल्यों का संगठित रूप है, जिनसे एक जीवन पद्धति बनती है। विजयदशमी पर्व समाज में नैतिकता और सामाजिक चेतना को पुष्ट करता है।

रामलीला का मंचन केवल नाट्य-प्रदर्शन नहीं होता, बल्कि यह समाज को आदर्श चरित्रों की झलक दिखाता है। बच्चे जब राम का आदर्श, सीता की पवित्रता और हनुमान की भक्ति को देखते हैं, तो उनके अंतर्मन में यह संस्कार अंकित हो जाता है कि हमें सत्य, भक्ति और बलिदान के मार्ग पर चलना चाहिए।

विजयदशमी के अवसर पर रावण-दहन का सामूहिक दृश्य समाज में एकजुटता का भाव पैदा करता है। उस क्षण किसी व्यक्ति, जाति, वर्ग या भाषा का भेद नहीं रह जाता; सब एक स्वर में कहते हैं—“सत्य की विजय हो।”

आज के युग में जब समाज में हिंसा, अहंकार, भ्रष्टाचार और असमानता बढ़ रही है, विजयदशमी हमें यह संदेश देती है कि यदि हम सब मिलकर अपने भीतर की बुराइयों का दहन करें, तो एक समरस, न्यायपूर्ण और मानवतावादी समाज की रचना संभव है।

4. धार्मिक-आध्यात्मिक प्रासंगिकता-

विजयदशमी का एक गहन आयाम धार्मिक और आध्यात्मिक चेतना है। यह पर्व केवल बाहरी विजय का प्रतीक नहीं, बल्कि यह आत्मा की भीतरी यात्रा का भी संकेतक है।

धर्म का वास्तविक अर्थ केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है। धर्म का अर्थ है—सत्य का पालन, न्याय की स्थापना, करुणा का संवर्धन और कर्तव्य का निर्वाह। जब राम ने रावण का वध किया, तब उन्होंने केवल लंका का उद्धार नहीं किया, बल्कि धर्म के लिए अपने जीवन को समर्पित किया।

इसी प्रकार दुर्गा का महिषासुर-वध केवल एक युद्ध नहीं था, बल्कि यह उस आध्यात्मिक सत्य का उद्घोष था कि दिव्य शक्ति सदैव अन्याय और अधर्म के नाश के लिए अवतरित होती है।

शस्त्र-पूजन की परंपरा भी इसी आध्यात्मिक भाव का प्रतीक है। यह हमें स्मरण कराता है कि शक्ति का प्रयोग केवल आक्रमण के लिए नहीं, बल्कि धर्म और सत्य की रक्षा के लिए होना चाहिए।

विजयदशमी हमें आत्म-संयम, भक्ति और तपस्या का भी संदेश देती है। यह पर्व कहता है कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका अहंकार और अवगुण हैं। यदि हम अपने भीतर के रावण को परास्त कर दें, तो हमारी आत्मा विजयी हो जाएगी।

5. शैक्षणिक / प्रेरणात्मक प्रासंगिकता-

शिक्षा केवल पुस्तकों का ज्ञान नहीं है, बल्कि वह प्रक्रिया है जो व्यक्ति के अंतःकरण को संस्कारित करती है। विजयदशमी का पर्व बच्चों, युवाओं और समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत है।

रामायण और दुर्गा-सप्तशती की कथाएँ केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि वे नैतिक शिक्षण के पाठशाला हैं। जब युवा राम के आदर्श को देखते हैं, तो उन्हें यह शिक्षा मिलती है कि कर्तव्यनिष्ठा, संयम और सत्यनिष्ठा जीवन का वास्तविक सौंदर्य है। जब वे दुर्गा को महिषासुर का वध करते देखते हैं, तो उनमें यह भाव उत्पन्न होता है कि अन्याय और अधर्म के विरुद्ध संघर्ष करना ही जीवन का कर्तव्य है।

विजयदशमी बच्चों के लिए नैतिक कहानियों के माध्यम से मूल्य-शिक्षा का पर्व है। यह पर्व उन्हें बताता है कि वास्तविक पराक्रम बाहुबल में नहीं, बल्कि सदाचार, आत्म-बल और सत्य के साथ खड़े होने के साहस में निहित है।

आधुनिक शिक्षा पद्धति अक्सर कौशल और रोजगार तक सीमित रह जाती है, किंतु विजयदशमी जैसे पर्व समाज को याद दिलाते हैं कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है—चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व का समग्र विकास।

6. समकालीन प्रासंगिकता-

समकालीन भारत और विश्व में, जहाँ विज्ञान और तकनीकी प्रगति की चमक है, वहीं दूसरी ओर हिंसा, भ्रष्टाचार, स्वार्थ और पर्यावरणीय संकट भी विद्यमान हैं। ऐसे समय में विजयदशमी का पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक पुनर्जागरण का संदेशवाहक है।

आज के युग का रावण किसी द्वीप में नहीं बैठा है, बल्कि वह हमारे समाज की कई परतों में छिपा हुआ है—भ्रष्टाचार के रूप में, सांप्रदायिकता के रूप में, अन्याय के रूप में और नैतिक पतन के रूप में। विजयदशमी का पर्व हमें पुकारता है कि हम इन अदृश्य रावणों को पहचानें और उनका दहन करें।

पर्यावरणीय संकट भी आधुनिक युग का महिषासुर है। जब हम प्रकृति का अंधाधुंध दोहन करते हैं, तो हम स्वयं अपनी जीवन-रेखा को काटते हैं। विजयदशमी का संदेश है कि हमें प्रकृति को माता के रूप में पूजना चाहिए और उसके साथ संतुलित आचरण करना चाहिए।

समकालीन युग में विजयदशमी का अर्थ है—

भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष।

हिंसा और आतंकवाद के स्थान पर शांति और सहयोग।

भौतिकता की अंधी दौड़ के स्थान पर मानव-मूल्यों का पुनर्जागरण।

7. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विजयदशमी पर्व-

(क) ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में विजयदशमी के दिन हुई। संघ ने इस पर्व को केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि संघटन, अनुशासन और राष्ट्रनिर्माण के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया। यह दिन संघ के लिए केवल संस्थापक दिवस ही नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा को पुनर्जीवित करने का भी संकल्प-दिवस है।

(ख) राष्ट्र गौरव का संदेश-

संघ के लिए विजयदशमी यह उद्घोष है कि राष्ट्र सर्वोपरि है। संघ इसे उस अवसर के रूप में देखता है, जब समाज अपने गौरवपूर्ण अतीत को स्मरण करके भविष्य के निर्माण का संकल्प ले। भारत की महान परंपराओं, ऋषियों के विचारों और महापुरुषों की गाथाओं को जन-जीवन से जोड़ना ही इसका उद्देश्य है।

(ग) सांस्कृतिक चेतना का प्रसार-

विजयदशमी के दिन संघ द्वारा आयोजित पथ-संचलन, शस्त्र-पूजन और शाखाएँ केवल आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना के पुनरुद्धार के प्रतीक हैं। संघ का मानना है कि भारत का पुनर्निर्माण तभी संभव है, जब समाज अपने सांस्कृतिक आधार को पहचानकर उसे जीवन में उतारे।

(घ) संगठन और अनुशासन का आदर्श-

संघ ने विजयदशमी को अनुशासन और संगठन की पाठशाला बना दिया है। इस दिन शाखाओं में स्वयंसेवक यह संकल्प लेते हैं कि वे राष्ट्र और समाज की सेवा में निरंतर सक्रिय रहेंगे। यह अनुशासन केवल संघ का ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र का अनुशासन है, जो हमें एकजुट और सशक्त बनाता है।

8. राष्ट्र सर्वोपरि – धर्मार्थ, रक्षार्थ, सेवार्थ-

(क) राष्ट्र सर्वोपरि-

विजयदशमी का अंतिम और सबसे बड़ा संदेश यही है कि राष्ट्र ही परम लक्ष्य है। जब तक राष्ट्र सुरक्षित और सशक्त है, तभी तक व्यक्तिगत जीवन सार्थक है। व्यक्तिगत स्वार्थ और सुख का मूल्य तभी है, जब वह राष्ट्रहित में समाहित हो।

(ख) धर्मार्थ-

धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और कर्तव्यपालन है। विजयदशमी यह सिखाती है कि धर्म की स्थापना के लिए हमें सतत संघर्षरत रहना चाहिए। यह धर्म ही है, जो राष्ट्र की आत्मा को जीवित रखता है।

(ग) रक्षार्थ-

शस्त्र-पूजन की परंपरा यह स्मरण कराती है कि रक्षा केवल तलवारों और बंदूकों से नहीं होती, बल्कि नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक सीमाओं की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। राष्ट्र और संस्कृति की सुरक्षा प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।

(घ) सेवार्थ-

सेवा ही धर्म का सबसे ऊँचा स्वरूप है। विजयदशमी हमें यह संदेश देती है कि राष्ट्र और समाज की सेवा ही सच्ची आराधना है। जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति तक सुख और सुरक्षा नहीं पहुँचती, तब तक हमारी विजय अधूरी है।

 निष्कर्ष : विजयदशमी — राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक-

विजयदशमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन की शाश्वत शिक्षा है। यह हमें स्मरण कराता है कि सत्य की विजय अवश्यंभावी है और असत्य, चाहे कितना ही शक्तिशाली क्यों न प्रतीत हो, अंततः पराजित होता है।

आज के युग में जब समाज भौतिकता, हिंसा, स्वार्थ और अराजकता से जूझ रहा है, विजयदशमी का संदेश और भी प्रासंगिक है। यह हमें पुकारता है कि हम अपने भीतर और बाहर के रावणों का दहन करें, महिषासुर जैसी प्रवृत्तियों को समाप्त करें और दुर्गा तथा राम के आदर्शों से प्रेरित होकर राष्ट्र और समाज के पुनर्निर्माण में जुटें।

यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि राष्ट्र सर्वोपरि है। धर्म की रक्षा, समाज की सेवा और राष्ट्र की सुरक्षा ही सच्चा जीवन-सिद्धांत है। यदि हम विजयदशमी के इस संदेश को जीवन में उतार लें, तो न केवल हमारा व्यक्तिगत जीवन धन्य होगा, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र भी एक नई सांस्कृतिक चेतना से आलोकित होगा।

इस प्रकार, विजयदशमी पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह राष्ट्रजीवन का सांस्कृतिक घोषणापत्र है, जो हमें एकजुट होकर धर्म, सत्य और न्याय की स्थापना के लिए प्रेरित करता है। यही इसकी वास्तविक प्रासंगिकता है और यही इसका अनंत संदेश।

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