शुक्रवार, 19 सितंबर 2025

हरेला पर्व: प्रकृति और संस्कृति संरक्षण की परंपरा ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 

हरेला पर्व: प्रकृति और संस्कृति संरक्षण की परंपरा

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


1. हरेला: प्रकृति और संस्कृति का संगम-

(क) उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान

उत्तराखंड, जिसे देवभूमि कहा जाता है, केवल अपने मंदिरों और तीर्थस्थलों के लिए ही नहीं बल्कि अपनी विशिष्ट लोक संस्कृति, जीवनशैली और परंपराओं के लिए भी प्रसिद्ध है। यहाँ के पर्व और त्यौहार सामान्य धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं हैं, बल्कि समाज की आत्मा और जीवन दर्शन को प्रकट करने वाले अवसर हैं। उत्तराखंड की संस्कृति में प्रकृति और जीवन के बीच एक अनूठा संतुलन देखने को मिलता है। हर पर्व किसी न किसी रूप में मानव और प्रकृति के सहजीवन का संदेश देता है।

(ख) हरेला का विशिष्ट महत्व

इन्हीं पर्वों में से एक है हरेला पर्व, जिसका अर्थ ही है “हरियाली”। यह पर्व विशेष रूप से कुमाऊँ क्षेत्र में बहुत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। हरेला को केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसमें प्रकृति के संरक्षण, कृषि की समृद्धि, और सामाजिक एकता के गहरे संदेश निहित हैं। यह पर्व हमें यह याद दिलाता है कि धरती की हरियाली ही जीवन का आधार है और संस्कारों की समृद्धि ही संस्कृति की असली पहचान।

हरेला पर्व की प्रस्तावना हमें यह समझने का अवसर देती है कि किसी समाज की असली पहचान उसकी जीवन पद्धति और उसके त्योहारों में छिपी होती है। हरेला पर्व केवल एक रस्म नहीं, बल्कि जीवन को प्रकृति के साथ जोड़ने वाला उत्सव है।


2. प्रकृति और मानव का संबंध-

(क) जीवन का आधार – प्रकृति

प्रकृति और मानव का संबंध जन्मजात है। मानव जीवन की हर ज़रूरत – अन्न, जल, वायु, ऊर्जा – प्रकृति से ही पूरी होती है। यदि नदियाँ सूख जाएँ, जंगल कट जाएँ या धरती बंजर हो जाए, तो जीवन का अस्तित्व ही असंभव हो जाएगा। इसीलिए भारतीय संस्कृति में प्रकृति को माता का स्थान दिया गया है। “पृथ्वी माता, नदियाँ बहन और वृक्ष जीवनदाता” – यह भाव हमारे लोकगीतों और परंपराओं में भी झलकता है।

(ख) सहजीवन का संदेश

हरेला पर्व इसी संबंध का मूर्त रूप है। जब घर की महिलाएँ गेहूँ, जौ या धान के बीज टोकरियों में बोती हैं और दस दिन बाद उन्हें अंकुरित देखकर आशीर्वाद स्वरूप परिवारजनों को देती हैं, तो यह केवल कृषि प्रक्रिया नहीं होती। यह एक प्रतीक है कि जीवन का हरियापन प्रकृति से ही आता है।

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में प्रकृति का महत्व और भी बढ़ जाता है। यहाँ के लोग जानते हैं कि उनका जीवन सीधे-सीधे जंगलों, नदियों और खेतों पर निर्भर है। यही कारण है कि उन्होंने अपनी संस्कृति और पर्वों में प्रकृति के संरक्षण को सबसे ऊपर रखा है। हरेला पर्व इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है।

3. पर्वतीय संस्कृति और लोगों की जीवनशैली-

(क) कठिनाइयों में भी उल्लास

पर्वतीय जीवन भौगोलिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण है। ऊँचे-नीचे पहाड़, संकरे रास्ते, सीमित संसाधन और कठिन जलवायु – यह सब मिलकर जीवन को कठिन बनाते हैं। फिर भी यहाँ के लोग अपनी सादगी, मेहनतकश स्वभाव और परंपराओं के प्रति आस्था से जीवन को उल्लासपूर्ण बनाते हैं।
त्योहार यहाँ केवल धार्मिक मान्यताओं का पालन नहीं, बल्कि जीवन में नई ऊर्जा और उमंग भरने का माध्यम हैं।

(ख) लोकगीत और सामूहिकता

हरेला पर्व पर लोकगीतों और नृत्यों की परंपरा बहुत प्राचीन है। महिलाएँ समूह में बैठकर गीत गाती हैं जिनमें ऋतुओं का वर्णन, फसल की कामना और देवताओं की स्तुति होती है। बच्चे झूला झूलते हैं और युवक-युवतियाँ मेलजोल में भाग लेते हैं। इन गतिविधियों से समाज में आपसी प्रेम और भाईचारा बढ़ता है।

हरेला पर्व केवल धार्मिक आस्था का नहीं, बल्कि सामाजिक मेलजोल का भी प्रतीक है। इस पर्व पर परिवार एकत्रित होता है, लोग एक-दूसरे से मिलते हैं और पूरे गाँव में उत्सव का वातावरण बनता है। यही सामूहिकता पर्वतीय संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत है।

4. हरेला पर्व का महत्व और परंपराएँ-

(क) बीज बोने की परंपरा

हरेला पर्व की सबसे अनूठी और प्रमुख परंपरा है बीज बोना। श्रावण संक्रांति से दस दिन पहले घर की महिलाएँ गेहूँ, जौ, धान, मक्का या सरसों जैसे अन्न के बीज छोटे बर्तनों या टोकरियों में बोती हैं। इन बीजों को प्रतिदिन पानी दिया जाता है। धीरे-धीरे जब ये बीज अंकुरित होते हैं तो घर में एक विशेष उत्साह का माहौल बनता है। ये हरे अंकुर ही “हरेला” कहलाते हैं।

(ख) आशीर्वाद और सांस्कृतिक गतिविधियाँ

दसवें दिन इन अंकुरों को काटकर मंदिर में अर्पित किया जाता है। पूजा के बाद परिवार के बड़े-बुजुर्ग इन हरेले को बच्चों और परिवारजनों के कानों के पीछे रखकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं। इसका अर्थ है कि उनके जीवन में हमेशा हरियाली, समृद्धि और खुशहाली बनी रहे।

हरेला पर्व केवल धार्मिक रस्मों तक सीमित नहीं है। इस दिन लोकगीत गाने, झूला झूलने और मेलजोल करने की परंपरा भी है। यह पर्व लोगों को उनकी जड़ों से जोड़ता है और उन्हें याद दिलाता है कि फसल और जीवन की शुरुआत प्रकृति की गोद से होती है।


5. हरेला और प्रकृति संरक्षण-

(क) हरियाली का प्रतीक

हरेला पर्व का सबसे बड़ा संदेश है – धरती की हरियाली का महत्व। जब परिवारजन छोटे-छोटे अंकुरित पौधों को देखते हैं, तो वे समझते हैं कि जीवन की असली ताकत धरती की उर्वरता और हरियाली में है। बीज बोना और उनका अंकुरित होना, प्रकृति के पुनर्जन्म और निरंतरता का प्रतीक है।

(ख) पर्यावरणीय शिक्षा

आज जब पूरी दुनिया वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण जैसी समस्याओं से जूझ रही है, हरेला पर्व हमें पर्यावरणीय चेतना देता है। यह पर्व केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह शिक्षा देने का माध्यम है कि पेड़-पौधे और पर्यावरण की रक्षा किए बिना मानव जीवन सुरक्षित नहीं रह सकता।

हरेला पर्व में जब छोटे-छोटे पौधों को पूजा में अर्पित किया जाता है, तो यह हमें यह याद दिलाता है कि प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। यही कारण है कि आज कई विद्यालय और सामाजिक संस्थाएँ हरेला पर्व पर वृक्षारोपण अभियान भी चलाती हैं।

6. सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व-

(क) परिवार और समाज की एकजुटता

हरेला पर्व का एक और महत्वपूर्ण पहलू है – समाज और परिवार को जोड़ना। इस दिन पूरा परिवार एकत्र होता है, बच्चे, बूढ़े, महिलाएँ और पुरुष सभी मिलकर इस पर्व में भाग लेते हैं। बड़े-बुजुर्ग जब बच्चों को हरेला देकर आशीर्वाद देते हैं, तो यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक संबंध को मजबूत करने का अवसर होता है।

(ख) लोकगीत, झूला और मेलजोल

हरेला पर्व लोककला और संगीत से भी जुड़ा है। महिलाएँ पारंपरिक गीत गाती हैं, जिनमें देवताओं की स्तुति, ऋतु परिवर्तन और प्रकृति की महिमा का उल्लेख होता है। बच्चे और युवा झूले झूलकर वर्षा ऋतु के आनंद का अनुभव करते हैं। यह सब मिलकर पर्व को केवल धार्मिक न बनाकर लोक-उत्सव बना देते हैं।

इसके अतिरिक्त, उत्तराखंड सरकार ने भी इस पर्व की महत्ता को मान्यता देते हुए इसे राजकीय अवकाश घोषित किया है। यह दर्शाता है कि हरेला केवल ग्रामीण जीवन तक सीमित पर्व नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की पहचान और आत्मसम्मान का प्रतीक बन चुका है।


7. हरेला पर्व से सीख-

(क) प्रकृति और संस्कृति का संतुलन

हरेला पर्व हमें यह सिखाता है कि जीवन तभी सुरक्षित और सुखी रहेगा, जब प्रकृति और संस्कृति के बीच संतुलन होगा। यदि हम केवल आधुनिकता और भौतिकता के पीछे भागेंगे और प्रकृति को भूल जाएँगे, तो जीवन असंतुलित हो जाएगा।

(ख) परंपराओं की प्रासंगिकता

कई लोग मानते हैं कि लोक पर्व केवल पुराने जमाने की परंपराएँ हैं, लेकिन हरेला इस सोच को गलत साबित करता है। यह पर्व आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सैकड़ों साल पहले था। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यह हमें हमारी जड़ों और पर्यावरणीय जिम्मेदारियों की याद दिलाता है।

हरेला पर्व से हमें यह भी सीख मिलती है कि पर्व केवल आनंद का साधन नहीं होते, बल्कि वे जीवन की दिशा और दर्शन भी बताते हैं।

8. निष्कर्ष-

(क) उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर

हरेला पर्व उत्तराखंड की लोक संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता, पारिवारिक प्रेम और प्रकृति के संरक्षण का भी संदेश देता है। यही कारण है कि इसे उत्तराखंड की शान और आत्मसम्मान का पर्व कहा जाता है।

(ख) जीवन का दर्शन

हरेला पर्व हमें यह याद दिलाता है कि हरियाली ही जीवन है और संस्कृति ही समाज की पहचान। यह केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन जीने का दर्शन है। जब हम प्रकृति का सम्मान करेंगे, उसकी रक्षा करेंगे और अपने संस्कारों को संजोएँगे, तभी हमारा भविष्य सुरक्षित होगा।

अतः निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि हरेला पर्व हमें दो सबसे बड़ी सीख देता है – प्रकृति का संरक्षण और संस्कृति का सम्मान। यही दो स्तंभ किसी भी समाज को स्थायी और समृद्ध बनाते हैं।


"हरेला: पर्वतीय संस्कृति और हरियाली का उत्सव
धरती की हरियाली, जीवन की शक्ति है,
संस्कृति हमारी पहचान, हमारे संस्कारों की गाथा है,
हरेला हमें जोड़ता है प्रकृति और जीवन से।"

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