"विद्यालयी समयसारिणी में परिवर्तन और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 : उत्तराखंड के पर्वतीय परिप्रेक्ष्य में चुनौतियाँ, संभावनाएँ और समाधान"-
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड
“जहाँ सूरज जल्दी ढलता है, वहाँ सपनों को देर तक जगाए रखने की जिम्मेदारी शिक्षा की है।”
“पर्वतों की कठिनाइयों के बीच शिक्षा ही वह पुल है, जो दुर्गम से सुगम तक पहुँचाती है।”
“पढ़ाई का अतिरिक्त आधा घंटा तभी सार्थक होगा जब वह पहाड़ के बच्चे की उड़ान को आसमान तक ले जाए।”
1. शिक्षा और समय की नई धुन-
शिक्षा जीवन का वह दीपक है जो अंधकार से आलोक की ओर ले जाता है। विद्यालय समयसारिणी उसी दीपक की बाती है, जो जितनी लंबी और सुव्यवस्थित होगी, उतनी देर तक ज्ञान का प्रकाश फैलाएगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अंतर्गत विद्यालयों की समयसारिणी में परिवर्तन—प्रतिदिन आधा घंटा अधिक अध्ययन और 220 की अपेक्षा 240 विद्यालय दिवस—इसी प्रकाश को दीर्घजीवी बनाने का प्रयास है।
किन्तु जब इस परिवर्तन को उत्तराखंड जैसे पर्वतीय प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में देखा जाता है, तो कई प्रश्न स्वतः उभरते हैं। क्या यह परिवर्तन मैदानों और पहाड़ों दोनों के लिए समान रूप से उपयोगी है? क्या यह व्यवस्था दुर्गम गाँवों में उतनी ही कारगर सिद्ध होगी जितनी हल्द्वानी या देहरादून जैसे सुगम शहरों में?
उत्तराखंड के बच्चे सुबह गाय-बकरियाँ चराने, घास काटने और परिवार की आजीविका में हाथ बंटाने के बाद विद्यालय पहुँचते हैं। यहाँ शिक्षा का अर्थ केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन की कठिनाइयों के बीच ज्ञान का दीप जलाए रखना है। ऐसे में अतिरिक्त आधे घंटे की पढ़ाई उनके लिए अवसर है या बोझ? यही इस शोध आलेख का मूल प्रश्न है।
2. समस्या का परिप्रेक्ष्य : अतीत और वर्तमान की खाई-
पर्वतीय विद्यालयों की कहानी मैदानों से भिन्न है। जहाँ मैदानों के विद्यालय संसाधनों और सुविधाओं से लैस हैं, वहीं पहाड़ों में कई विद्यालय एक-एक शिक्षक पर आश्रित हैं। पूर्व व्यवस्था में 220 दिन की पढ़ाई और सीमित समय में ही विद्यार्थियों को कठिन परिश्रम से ज्ञान अर्जित करना पड़ता था।
नई व्यवस्था ने इस कमी को दूर करने का प्रयास किया है। लेकिन पहाड़ों की भौगोलिक परिस्थितियाँ—सर्दियों की जल्दी शाम, दुर्गम रास्ते, बरसात में टूटी सड़कें और लगातार पलायन—नई समयसारिणी के प्रभाव को सीमित कर देती हैं।
3. नवीन प्रावधान : नीति की दृष्टि से शिक्षा का विस्तार-
नई समयसारिणी के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं—
प्रतिदिन 30 मिनट अतिरिक्त अध्ययन समय।
वार्षिक 240 दिवस की कक्षाएँ।
20 दिन परीक्षा एवं मूल्यांकन हेतु।
10 दिन सह-शैक्षणिक गतिविधियों और बस्ता रहित दिवसों हेतु।
इन प्रावधानों का उद्देश्य शिक्षा को अधिक गहन और विविध बनाना है। मैदानों में यह कदम निश्चित रूप से शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ा सकता है।
4. तुलनात्मक अध्ययन : सुगम बनाम दुर्गम-
(i) मैदान बनाम पहाड़-
मैदानों के विद्यालयों में परिवहन सुविधा, बिजली, डिजिटल उपकरण और पुस्तकालय सहज उपलब्ध हैं। वहीं पहाड़ों के विद्यालयों में अक्सर विद्यार्थी पैदल कई किलोमीटर चलकर विद्यालय पहुँचते हैं। सर्दियों में शाम जल्दी ढल जाने से अतिरिक्त आधे घंटे की पढ़ाई एक चुनौती बन जाती है।
(ii) शहरी बनाम ग्रामीण-
शहरी विद्यालयों में बच्चों के लिए सह-शैक्षणिक गतिविधियाँ, प्रयोगशालाएँ और कोचिंग सेंटर उपलब्ध हैं। ग्रामीण विद्यालयों के बच्चों को स्कूल जाने से पहले घर का काम करना पड़ता है। उनके लिए यह अतिरिक्त समय “अवसर” नहीं बल्कि “त्याग” बन जाता है।
(iii) सरकारी बनाम निजी विद्यालय-
निजी विद्यालयों में अतिरिक्त समय का सदुपयोग संसाधनों और योग्य शिक्षकों के बल पर किया जा सकता है। जबकि सरकारी विद्यालयों में शिक्षक-छात्र अनुपात असंतुलित है। ऐसे में अतिरिक्त समय की प्रभावशीलता संदिग्ध हो जाती है।
5. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण : बच्चे और अतिरिक्त समय का भार-
शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तित्व निर्माण का माध्यम भी है।
पहाड़ी बच्चों की दिनचर्या : सुबह घर के काम, पशुपालन और खेत-खलिहान का दायित्व, फिर विद्यालय। ऐसे में विद्यालय में अतिरिक्त आधा घंटा कभी-कभी बोझिल प्रतीत हो सकता है।
मानसिक दबाव : प्रतियोगी परीक्षाओं में पिछड़ने का डर, शहरों के बच्चों से तुलना और संसाधनों की कमी उन्हें आत्मग्लानि में धकेल सकती है।
समाधान : अतिरिक्त समय को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रखकर खेल, संगीत, योग और स्थानीय कला-संस्कृति में भी लगाना चाहिए। इससे बच्चे ऊर्जावान रहेंगे और मानसिक संतुलन बना रहेगा।
6. चुनौतियाँ : पहाड़ की शिक्षा की कठिन राह-
शिक्षकों की कमी : कई विद्यालयों में विज्ञान, गणित या अंग्रेज़ी का शिक्षक नहीं।
दुर्गम भूगोल : लंबी चढ़ाई, बरसाती नाले, बर्फबारी और टूटी सड़कें।
आर्थिक संकट : कई परिवारों के बच्चे मजदूरी करते हैं।
संसाधनों का अभाव : ICT, प्रयोगशालाएँ और पुस्तकालय दूर की बात हैं।
पलायन का प्रभाव : गाँव खाली हो रहे हैं, विद्यालयों में विद्यार्थी घट रहे हैं।
7. संभावित समाधान : शिक्षा की राह को सुगम बनाना-
क्षेत्रीय लचीलापन : पर्वतीय क्षेत्रों के लिए अलग समयसारिणी बनानी चाहिए।
शिक्षक संख्या और प्रशिक्षण : पर्वतीय विद्यालयों में विशेष प्रशिक्षित शिक्षक नियुक्त हों।
डिजिटल कक्षाएँ : ऑनलाइन शिक्षा और स्मार्ट क्लास तकनीक।
स्थानीय पाठ्यचर्या : पर्वतीय जीवन से जुड़े विषय—जैसे जैव विविधता, पारंपरिक शिल्प—को पढ़ाई में शामिल करना।
सामुदायिक सहयोग : अभिभावक और ग्राम पंचायत शिक्षा के सहायक बनें।
8. छात्र-छात्राओं का विकास : पर्वत से शिखर तक-
पहाड़ का बच्चा मैदान के बच्चे से कमज़ोर नहीं, केवल संसाधनों में पिछड़ा हुआ है। यदि उसे सही मार्गदर्शन, संसाधन और अवसर मिले तो वह अपनी प्रतिभा से भारत ही नहीं, विश्व में पहचान बना सकता है।
प्रतिस्पर्धा से निपटना : पहाड़ का बच्चा हल्द्वानी और देहरादून के छात्र से तभी प्रतिस्पर्धा कर सकेगा जब उसे ICT, अंग्रेज़ी और कौशल शिक्षा से जोड़ा जाए।
व्यक्तित्व निर्माण : अतिरिक्त समय में उन्हें आत्मविश्वास, संचार कौशल और नेतृत्व गुणों का प्रशिक्षण मिलना चाहिए।
मनोवैज्ञानिक सहयोग : काउंसलिंग सेवाएँ शुरू हों, ताकि वे दबाव और आत्मग्लानि से बच सकें।
9. शिक्षक की भूमिका : पहाड़ का दीपक-
पर्वतीय शिक्षक केवल पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि बच्चों के जीवन का मार्गदर्शक है।
उसे बच्चे की परिस्थितियों को समझते हुए पढ़ाना होगा।
अध्यापन में नवीनता लानी होगी, ताकि सीमित संसाधनों में भी शिक्षा प्रभावी हो सके।
शिक्षक ही वह दीपक है जो पहाड़ की कठिन रातों में बच्चों के सपनों को उजाला दे सकता है।
10. शिक्षक और प्रशासनिक जिम्मेदारी : शिक्षा का नैतिक दायित्व-
पर्वतीय विद्यालयों में एक और गंभीर समस्या यह देखी जाती है कि कई स्थानों पर शिक्षक और प्रभारी प्रधानाचार्य समय पर विद्यालय नहीं पहुँचते। कई बार वे देर से आते हैं और जल्दी चले जाते हैं। यह स्थिति विशेष रूप से दुर्गम क्षेत्रों में देखने को मिलती है, जहाँ बच्चों की शिक्षा पहले से ही अनेक कठिनाइयों से घिरी हुई है।
शिक्षक केवल नौकरी करने वाला कर्मचारी नहीं, बल्कि समाज का वह दीपक है, जिसके आलोक से भविष्य की पीढ़ियाँ दिशा पाती हैं। यदि यह दीपक ही समय पर न जले तो अंधकार गहराना स्वाभाविक है।
इस समस्या के समाधान हेतु आवश्यक है कि—
सरकार ऐसे शिक्षकों और प्रधानाचार्यों को भावनात्मक रूप से जागरूक करे कि वे केवल नौकरी नहीं, बल्कि समाज और भविष्य की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
शिक्षा व्यवस्था के नियमों के अनुरूप उत्तरदायित्व और अनुशासन को सख्ती से लागू किया जाए।
साथ ही, यह भी समझाया जाए कि शिक्षक स्वयं भी इसी पहाड़ की संतान हैं और जब वे निष्ठा से कार्य करेंगे, तभी पहाड़ का भविष्य मजबूत होगा।
एक जिम्मेदार शिक्षक और प्रधानाचार्य ही वह सेतु है, जो दुर्गम पहाड़ को सुगम भविष्य से जोड़ सकता है।
11. नई पाठ्यचर्या का पाँच भागीय स्वरूप : शिक्षा का समग्र दृष्टिकोण-
1. विद्यालयी शिक्षा के उद्देश्य, मूल्य, दक्षता और ज्ञान।
2. मूल्य आधारित शिक्षा, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और शैक्षणिक प्रौद्योगिकी।
3. विषयवार मानक और मूल्यांकन दिशा-निर्देश।
4. विद्यालयी संस्कृति और सामाजिक मूल्य।
5. शिक्षा तंत्र, सेवा शर्तें, भौतिक ढाँचा और सामुदायिक भूमिका।
12. प्रदेशीय परिदृश्य : आँकड़ों की झलक-
प्राथमिक विद्यालय – 13,756
उच्च प्राथमिक विद्यालय – 5,483
माध्यमिक विद्यालय – 3,930
इन सभी विद्यालयों में नई व्यवस्था लागू होगी, किंतु पर्वतीय और मैदानी विद्यालयों की चुनौतियाँ और संभावनाएँ भिन्न होंगी।
13. निष्कर्ष : शिक्षा की नई सुबह या पहाड़ों की लंबी संध्या?
विद्यालय समयसारिणी में आधे घंटे की वृद्धि और 240 कार्यदिवस का प्रावधान शिक्षा सुधार का स्वागत योग्य कदम है। किंतु उत्तराखंड जैसे पर्वतीय प्रदेश में इसका प्रभाव तभी सकारात्मक होगा जब नीति में लचीलापन, शिक्षक संख्या में वृद्धि और संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी।
यह परिवर्तन मैदानों के लिए जहाँ अवसर है, वहीं पहाड़ों के लिए चुनौती भी है। किंतु यदि चुनौतियों को अवसर में बदला जाए तो यही अतिरिक्त आधा घंटा पहाड़ के बच्चे को मैदान से आगे ले जा सकता है।
पर्वत के बच्चे में साहस, परिश्रम और धैर्य पहले से ही है। बस आवश्यकता है कि शिक्षा उन्हें उड़ान दे। तभी उत्तराखंड के बच्चे केवल घास काटने और पशुपालन तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि अपने ज्ञान से पूरे भारत के शिखर पर स्थान बनाएँगे।




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