बुधवार, 11 सितंबर 2024
गुरुवार, 4 जुलाई 2024
भाषा की शक्ति और सामर्थ्य- ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
सृजनात्मक लेखन कला 👆👇
भाषा की शक्ति और सामर्थ्य-
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
किसी भी देश की शक्ति उसकी भाषा में निहित होती है। अपने देश की भाषा, स्वदेशी, क्षेत्रीय एवं आंचलिक अर्थात मातृभाषा बोलने वालों के क्रियाकलापों-गतिविधियों की सतत, संवेदनाओं में निहित होती हैं। जो देश अपनी भाषा का सम्मान करता है, वही देश अपनी भाषा की जीवंतता को भी वास्तविक स्तर पर आत्मसात करता है। वह राष्ट्र अपनी जड़ों से हमेशा जुड़ाव महसूस करते हुए अपने पैतृक स्थान से पलायन नहीं करता अपितु अपनी बोली के साथ-साथ अपने लोगों को भी प्रेम करता है। यह प्रेम अपनी मातृभाषा के प्रति समर्पण के भाव रखने का एकमात्र विकल्प दर्शाता है। वह राष्ट्र सर्वशक्तिमान होता है जो अपनी मिट्टी से गहराई से भावात्मक स्तर पर जुड़ा हुआ होता है। ऐसा राष्ट्र हमेशा मातृभूमि की लड़ाई अपनी मातृभाषा में लड़ने का सामर्थ्य रखता है। सच्चा मातृभाषी-राष्ट्रवादी-राष्ट्रभक्त- राष्ट्रसैनिक जब दुश्मन पर अपनी तलवार से प्रहार करता है तो वह पहला प्रहार मातृभूमि की रक्षा के लिए मातृभाषा द्वारा ही करता है। उसकी मातृभाषा द्वारा किया गया कार्य जोश एवं उत्साह से भरपूर शक्ति से संपन्न होता है। मातृभाषा द्वारा किया गया यह प्रहार और कर्तव्य-पाठ का पुनर्पाठ, स्वराष्ट्र की विजयश्री का जयघोष स्थापित करने वाला, शंखनाद की भांति कीर्तिश्री का विजय स्तंभ स्थापित करता है। मातृभाषा की शक्ति और सामर्थ्य अतुलनीय है। अपनी भाषा के प्रति प्रेम, सद्भाव, अपनत्व, सम्मान और समर्पण का भाव ऐसा हो कि जिस तरह जड़ों का मिट्टी से और हिमालय का नदियों से लगाव होता है। मातृभाषा के पुष्प का आदर और व्यावहारिक स्तर पर जीवंतता, शिक्षण स्तर पर प्रयोजनमूलकता एवं रोजगार के अवसर अन्य भाषा से अलगाव करके नहीं अपितु सद्भाव की भावना के साथ, अपनी मातृभाषा को विकसित और पल्लवित-पुष्पित करके प्राप्त किया जा सकता है।
गुरुवार, 14 मार्च 2024
फूलदेई - लोक पर्व के बहाने *उत्तराखंड की लोक संस्कृति का प्राकृतिक पर्व* ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत
फूलदेई - लोक पर्व के बहाने
*उत्तराखंड की लोक संस्कृति का प्राकृतिक पर्व*
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत
फूलदेई पर्व के दिन बच्चों की मित्र-मंडली थाली को सजाकर उसमें फूल, चावल, गुड़, मिठाई रखकर अपनी बिरादरी और आस-पास के घरों में या अपने क्षेत्र के पूरे गांव में, आसपास घरों में जाकर मुख्य दरवाजे की दहलीज़ पर फूलदेई खेलते हैं अर्थात देहली पर अक्षत और फूल फेंकते हैं और घरों की खुशहाली, शुभ मंगलमय की कामना करते हैं । इस पूरी रस्म के दौरान वे लोकगीत गाते हुए आनंद और खुशी से जितना दोगे उतना ही सही कथन वाक्य को दोहराते हैं। बड़ों को प्रणाम कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। आदर्श चरित्र की निर्माण प्रक्रिया में यह महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय पर्व है।
बच्चों की मित्र-मंडली को सभी लोग खुशी-खुशी चावल, मिठाई, फल, टॉफी और गुड़ के साथ भेंट में रुपये भी देते हैं। कहना ना होगा कि अब पहले के मुकाबले इस पर्व के प्रति बच्चों और बड़ों में अपनापन थोड़ा कम होता जा रहा है । लोग अपने लोक पर्वों को भूल रहे हैं या उन्हें अब यह पर्व महत्वहीन लग रहा है। जिस गांव में लोग पहले स्वयं अपने किशोरावस्था में खुशी-खुशी इस पर्व को खेलते थे, वहीं आज उन्हें समय के साथ-साथ महत्वहीन लगने लगा है।
बहुसंस्कृति और बढ़ती हुई भूमंडलीकरण की प्रतिस्पर्धा की दौड़ में लोग अपनी जड़ों से पलायन कर रहे हैं । अपने लोक पर्वों से पलायन कर रहे हैं । अपनी लोक संस्कृति से पलायन कर रहे हैं। अपने घर-गांव से पलायन कर रहे हैं। अपनी नैतिकता एवं आचरण की मूल्यपरकता से पलायन कर रहे हैं। स्थिति बहुत ठीक नहीं है ऐसा वह भी मानते हैं जों लोक पर्व को विस्मृत एवं भूल बैठे हैं या याद नहीं करना चाहते। हो सकता है इस कार्य के लिए उनके पास समय शेष ना बचा हो। व्यस्तता ने व्यक्ति की नैतिक मर्यादा, आत्मिक चेतना, स्वच्छंदता, हंसी-खुशी एवं अपनापन, सरलता एवं खुलापन, बोलने की कला व्यवहारिक जीवन कौशल, रिश्ते-नाते सभी में बदलाव कर दिया है। साहब यह भूमंडलीकरण की दौड़ है जहां प्रसन्नचित चेहरे के भीतर भी एक चेहरा छुपा हुआ है। जो न हंसता है, न बोलता है। केवल बिंम मात्र है। शीशे के भीतर प्रतिबिंबित दृश्य।
किसी जमाने में बच्चों को इस दिन का बेसब्री से इंतजार होता था। बच्चे स्कूल में भी एक दूसरे के ऊपर फूलों से खेल लिया करते थे। परंतु आधुनिकता और परंपरा के मध्य का सेतु थोथी नैतिकता की समाजिकता का शिकार बन गया और हमने लोक पर्व को ही नहीं खोया बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत का भी गहरा नुकसान कर दिया। आजकल के बच्चे मोबाइल में गेम खेलने या फिर अपनी पढ़ाई में इतने व्यस्त रहते हैं कि वे लोकपर्वों के महत्व से वंचित हो चुके हैं और ऐसे पर्वों को पिछड़ेपन के प्रतीक के रूप में देखने लगे हैं।
हालांकि बसंत ऋतु के आगमन पर फूलदेई का त्यौहार मनाया जाता है। फूलदेई के लिए बच्चे एक दिन पहले से ही रंग-बिरंगे फूल तोड़कर ले आते थे । उसे टोकरी या फिर थाली में चावल लेकर सभी के घरों में फूलदेई के लिए जाते थे । इसके बाद उन्हें चावल, गुड़, टॉफी या फल रुपये दिए जाते थे । बच्चे जब फूलदेई को आते थे, तो वह फूलदेई का गीत भी गाते थे,
जैसे -
‘फूलदेई छम्मा देई, दैणी द्वार भर भकार’।
'फूलदेई छम्मा देई, जतुक देय्ला उतुक सई'।
इस पर्व के प्रति बच्चों में काफी उत्साह देखने को मिलता था पर अब शायद....!!
मैं बचपन से ही फूलदेई मनाता रहा हूंँ । आज किसी बच्चे को अगर फूलदेई मनाते देखाता हूंँ तो स्वयं को पुरानी स्मृति से जोड़ पाता हूंँ। स्मृति पद-चिन्ह लौटते ज़रूर हैं।
इस दिन के आनंद का इंतजार एक वर्ष से करता रहा हूंँ । परंतु अब शायद लोगों के और अपने रिश्तेदारों के घरों में ना जाकर देवी-देवता के मंदिर में पुष्प अर्पित कर मन ही मन अभी भी कहता हूंँ कि.....👇
'फूलदेई छम्मा देई, दैणी द्वार भर भकार’।
'फूलदेई छम्मा देई, जतुक देय्ला उतुक सई'।
आत्म मंथन भी जरूरी है...👇
क्या हमें अपने लोक पर्व को बाजार की संस्कृति और लोगों के हृदय से नहीं जोड़ना चाहिए ?
क्या हमें ऐसे लोक पर्वों के दिन सांस्कृतिक उत्सव और मित्र-मंडली के साथ कुछ पल समय व्यतीत नहीं करना चाहिए ?
क्या हमें इस दिन छोटे बच्चों और किशोरावस्था के नवयुवकों को मिठाई और फल नहीं देना चाहिए ?
यह लोक पर्व रचनात्मकता एवं सृजनात्मकता का प्रतीक है।
लोक की संस्कृति और संस्कृति का लोक भविष्य का उज्ज्वल आलोक है।
भक्ति, श्रद्धा, अपनत्व एवं सहजता सभी सहृदयता के प्रतीक चिन्ह हैं।
नैसर्गिक प्रवृति के लिए कागज के पुष्पों की नहीं अपितु प्रकृति के प्रांगण के पुष्पों की आवश्यकता है।
ऐसे कई महत्वपूर्ण बिंदु हैं जिस पर विचार-मंथन की आवश्यकता है। निर्णय परिपक्वता से बनेगा तभी दीर्घ काल तक चलेगा.!
हम अगर अपने लोक पर्वों की रक्षा करेंगे तो लोक पर्व हमारी संस्कृति और धर्म की रक्षा करेंगे। हमारे लोगों की रक्षा करेंगे।
गुरुवार, 22 फ़रवरी 2024
(21 फरवरी)-अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस* के अवसर पर- (मांँ, मातृभूमि, मातृभाषा ) डॉ चंद्रकांत तिवारी
*(21 फरवरी)-अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस* के अवसर पर- (मांँ, मातृभूमि, मातृभाषा )
यूनेस्को मातृभाषा को विशेष स्थान देता है। यह 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस के रूप में मनाता है। (यूनेस्को) संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन प्रतिवर्ष 21 फरवरी को भाषाई सांस्कृतिक कार्यक्रम विविधता पूर्ण विषयों के साथ-साथ बहुभाषावाद संबंधी विषयों को भी बढ़ावा देने के साथ-साथ जागरूकता फैलाने का कार्य भी करता आ रहा है। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की घोषणा यूनेस्को द्वारा नवंबर 1999 में की गई थी। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के लिए वर्ष 2022 का विषय *'बहुभाषी शिक्षण के लिए तकनीकी का प्रयोग- चुनौतियां और अवसर'* रखा गया था। इस बात को कहने में अतिशयोक्ति न होगी कि संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2022 से 2032 के बीच की (10 वर्षों की) समयावधि को स्वदेशी भाषाओं के अंतर्राष्ट्रीय दशक के रूप में चिह्नित किया है।
अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 2020 का विषय *'सीमाओं के बिना भाषाएँ '* था। थीम सीमा पार भाषाओं पर केंद्रित है और स्वदेशी विरासत को संरक्षित करने में मदद करती है।
2021 की विषय *'शिक्षा और समाज में समावेश के लिए बहुभाषावाद को बढ़ावा देना'* था।
2022 की विषय *'बहुभाषी शिक्षा के लिए तकनीक का उपयोग: चुनौतियां और अवसर'* था जबकि ...
*"अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस वर्ष 2023 का थीम ' बहुभाषी शिक्षा - शिक्षा को बदलने की आवश्यकता' विषय पर केंद्रित है।"*
अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 2024 का विषय *'बहुभाषी शिक्षा - सीखने और अंतर-पीढ़ीगत शिक्षा का एक स्तंभ' है।* इस वर्ष इसका 25वां संस्करण आयोजित किया जा रहा है।
मातृभाषा की मदद से न केवल क्षेत्रीय भाषाओं के बारे में जानने-समझने में सहायता मिलती है, बल्कि एक-दूसरे से बातचीत करना भी आसान हो जाता है।
इस बात में कोई भी शक नहीं कि किसी भी देश की शक्ति उसकी भाषा में निहित होती है। अपने देश की भाषा, स्वदेशी, क्षेत्रीय एवं आंचलिक अर्थात मातृभाषा बोलने वालों के क्रियाकलापों-गतिविधियों की सतत, संवेदनाओं में निहित होती हैं। जो देश अपनी भाषा का सम्मान करता है, वही देश अपनी भाषा की जीवंतता को भी वास्तविक स्तर पर आत्मसात करता है। वह राष्ट्र अपनी जड़ों से हमेशा जुड़ाव महसूस करते हुए अपने पैतृक स्थान से पलायन नहीं करता अपितु अपनी बोली के साथ-साथ अपने लोगों को भी प्रेम करता है। यह प्रेम अपनी मातृभाषा के प्रति समर्पण के भाव रखने का एकमात्र विकल्प दर्शाता है। वह राष्ट्र सर्वशक्तिमान होता है जो अपनी मिट्टी से गहराई से भावात्मक स्तर पर जुड़ा हुआ होता है। ऐसा राष्ट्र हमेशा मातृभूमि की लड़ाई अपनी मातृभाषा में लड़ने का सामर्थ्य रखता है। सच्चा मातृभाषी-राष्ट्रवादी-राष्ट्रभक्त- राष्ट्रसैनिक जब दुश्मन पर अपनी तलवार से प्रहार करता है तो वह पहला प्रहार मातृभूमि की रक्षा के लिए मातृभाषा द्वारा ही करता है। उसकी मातृभाषा द्वारा किया गया कार्य जोश एवं उत्साह से भरपूर शक्ति से संपन्न होता है। मातृभाषा द्वारा किया गया यह प्रहार और कर्तव्य-पाठ का पुनर्पाठ, स्वराष्ट्र की विजयश्री का जयघोष स्थापित करने वाला, शंखनाद की भांति कीर्तिश्री का विजय स्तंभ स्थापित करता है। मातृभाषा की शक्ति और सामर्थ्य अतुलनीय है। अपनी भाषा के प्रति प्रेम, सद्भाव, अपनत्व, सम्मान और समर्पण का भाव ऐसा हो कि जिस तरह जड़ों का मिट्टी से और हिमालय का नदियों से लगाव होता है। मातृभाषा के पुष्प का आदर और व्यावहारिक स्तर पर जीवंतता, शिक्षण स्तर पर प्रयोजनमूलकता एवं रोजगार के अवसर अन्य भाषा से अलगाव करके नहीं अपितु सद्भाव की भावना के साथ, अपनी मातृभाषा को विकसित और पल्लवित-पुष्पित करके प्राप्त किया जा सकता है।
सादर 🙏
©डॉ चंद्रकांत तिवारी
उत्तराखंड प्रांत
सोमवार, 25 दिसंबर 2023
विरासत के आयाम- ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी-उत्तराखंड प्रांत
विरासत के आयाम-
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी-उत्तराखंड प्रांत
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भारत की सांस्कृतिक परंपरा की पृष्ठभूमि की नींव में भारतीयता विद्यमान है। भाषा, साहित्य और संस्कृति किसी भी राष्ट्र की आधारशिला होती है। यह राष्ट्र को नींव के पत्थर की तरह मजबूत आधार प्रदान करती है। भारत की सांस्कृतिक परंपरा प्रत्येक हृदय में राष्ट्रवादी भावनाओं को लेकर निर्मित होती रही है और होती रहेगी। यह संस्कृति हमें राष्ट्र की मिट्टी से जोड़ती है और जो समाज मिट्टी की सुगंध से निर्मित होता है वही अपने राष्ट्र से प्रेम करता है। उसकी संस्कृति वर्षों तक वैश्विक स्तर पर गूंजती है।
भारत विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक है। जिसकी विविधता और समृद्धि सांस्कृतिक विरासत में निहित है। इसके साथ ही यह अपने-आप को बदलते समय के साथ ढ़ालती भी आई है। आज़ादी पाने के बाद भारत ने बहुआयामी सामाजिक और आर्थिक प्रगति की है। भारत शिक्षा, चिकित्सा और कृषि में धीरे -धीरे आत्मनिर्भर बन रहा है।अब दुनिया के सबसे औद्योगीकृत देशों की श्रेणी में भी भारत की गिनती की जाती है।आज भारत शेष एशिया महाद्वीप से अलग दिखता है। जिसकी विशेषता पर्वत और समुद्र ने तय की है और ये इसे विशिष्ट भौगोलिक पहचान देते हैं। उत्तर में बृहत् पर्वत श्रृंखला हिमालयी संपदाओं से घिरा है। पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर तथा दक्षिण में हिन्द महासागर इसकी सीमा को निर्धारित करते हैं।
भारत की राष्ट्रीयता की व्यापकता, एक आधार वाक्य है। जिसके कारण देश को मात्र एक राष्ट्र-राज्य के रूप में देखने के बजाए बड़ी विश्व सभ्यता की आधार शिला के रूप में देखा जाता है।
प्राचीन समय से ही, भारत की आध्यात्मिक भूमि ने संस्कृति धर्म, जाति, भाषा इत्यादि विविध आयामों को प्रदर्शित किया है। जाति, संस्कृति, धर्म इत्यादि की यह विभिन्नता अलग-अलग धर्मों और सम्प्रदायों, जातीय वर्गों, के अस्तित्व की गवाही देती है, जो यद्यपि एक राष्ट्र को नियंत्रित करती है। भारत की आंतरिक विभिन्न बोलियां, क्षेत्रीय सीमाएं, इन जातीय वर्गों, संस्कृतियों, परिवेश को उनकी अपनी सामाजिक व सांस्कृतिक पहचान के आधार पर भेद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
जीवन के यथार्थ दृश्यों को हम किस रूप में देखते हैं, किस रूप में महसूस करते हैं, महसूस करने के बाद क्या हम उन साक्षात दृश्यों/वस्तुओं से अपनेपन का लगाव रख पाते हैं? ऐसा लगाव जो हमें बार-बार अपनी ओर आकर्षित करता हो। हमारे मन की रिक्तता को पूर्ण करता हो। हमारे जीवन के अवकाश को इंद्रधनुषी रंगों से भर देता हो। हमारी विषम और कठिन बनती जा रही जीवनशैली को सरल और सहज बना देता हो। हमारी कम पड़ती श्वांसों के मध्य रक्त का संचार करता हुआ जीवन की लालिमा के नए दृश्यों को उभरता हो।
भारत विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों का संगम है। भारत की संस्कृति का मूल आधार विभिन्नता में एकता, सर्वधर्म समभाव की संस्कृति की परंपरा का द्योतक होना है। एक भाषा ने यहां सबको एक सूत्र में स्थापित किया है। वह है हिंदी जिसे बहुसंख्यक लोग बोलते हैं और उसे भारत की राष्ट्रभाषा मानते हैं। इस राष्ट्रभाषा ने भारतवासियों को सांस्कृतिक परंपरा और यहां के साहित्य से जोड़ कर रखा है। लेकिन हिंदी राजभाषा है तथा भारत के अधिकांश नगरों व शहरों में बोली जाती है। प्रत्येक भाषा अपने प्रांत, अपने राष्ट्र की, अपनी सांस्कृतिक विरासत की पहचान होती है। यही संस्कृति और परंपरा का सेतु भी।
हिमालय से हज़ार गंगा निकलती हैं। हिमालय के विशाल अमृत सागर से हजार धाराएं लोक मानस के कंठ को भिगोती हैं। दिव्य हिमालय सा सतगुरु का व्यक्तित्व होता है। विशाल हिमालय से असंख्य धाराएं जब निकलती हैं तो विद्यार्थी की तरह निर्मल समाजसेवी बनकर भावी समाजिक परिधि को गति प्रदान करने में सक्षम होती हैं।
गीता में कर्म योग का संदेश मनुष्य को भौतिक जगत में जीने की प्रेरणा देता है। आज संपूर्ण समाज के समक्ष अगर कोई व्यक्ति बुरी आत्माओं की परिधि में स्वयं कैद हो जाता है तो गीता का संदेश उसका मार्गदर्शन तय करता है। यह वही संदेश है जो अर्जुन जैसे गांडीवधारी वीर धुरंधर योद्धा को रणक्षेत्र में अग्निकुंड के समान वीर पुरुष बना देता है। यह भारतीय चिंतन परंपरा का ही ज्वलंत प्रमाण है कि व्यक्ति लक्ष्य विहीन होने के बावजूद भी सकारात्मक जीवन दृष्टि को धारण करते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सक्षम होता है। यह साधारण बात तो है परंतु इस साधारण बात के भीतर भारतीय चिंतन परंपरा की असाधारणता गहराई से अपनी जड़े जमाई हुई है।
शुक्रवार, 10 नवंबर 2023
शिक्षा में प्रकृति और स्थानीयता- ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
शिक्षा में प्रकृति और स्थानीयता-
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
An examination-free, practical and hands-on curriculum will have to be created which will make the students proficient and proficient in theoretical as well as professional skills. To make students self-confident and self-reliant. Their hands can work naturally. Can get speed. Get active. Can get experience and touch. Some work has to be done so that the student passing out of school can easily earn his living.👆
👇The developmental structure of experts, researchers, innovations and organizations will have to be identified in the country through special natural education study and teaching from primary level to higher education.👆
👆👆If we are not including nature education in educational institutions today then it does not bode well for our future. This will also be painful for our life.👆👆
प्राकृतिक शिक्षा का एक अन्य मुख्य आधार सामान्य जनमानस को पर्यावरणीय एवं प्राकृतिक शिक्षा देना भी है। क्योंकि कम ज्ञान के कारण सामान्य जनमानस द्वारा भी पर्यावरण को अधिकांश रूप से क्षति पहुंचाई जाती है। हमारा साधारण एवं स्थानीय जनमानस अगर पर्यावरण संरक्षण को समझेगा तो प्रकृति की धरोहर सुरक्षित एवं संवर्धित रह पाएगी। इस संबंध में सूचना एवं तकनीकी द्वारा, डिजिटल माध्यम द्वारा, इंटरनेट मीडिया द्वारा, ऑनलाइन शिक्षण द्वारा, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के द्वारा, टेलीकम्युनिकेशन द्वारा, सभी सूचना तकनीकिओं का इस्तेमाल करते हुए, स्थानीय भाषा में, लोक गीतों में, नुक्कड़ नाटकों द्वारा पोस्टरों द्वारा, चौपालों द्वारा, कठपुतलियों के खेलों द्वारा, सोशल यूटिलिटी प्रोडक्टिव वर्क के माध्यम से, आंगनवाड़ी द्वारा, ग्राम सभाओं द्वारा, ब्लॉक स्तर द्वारा, जिले स्तर पर डीएम द्वारा एवं स्थानीय वॉलिंटियर्स द्वारा जागरूकता बनाते हुए राज्य स्तरीय एवं केंद्र स्तरीय मूल्यांकन एवं आंकलन किया जा सकता है।
पर्यावरण शिक्षण एवं प्रकृति का अध्ययन नैतिक शिक्षा के केंद्र में होना चाहिए। इस बात में कोई शक नहीं रह जाता कि पर्यावरणीय अध्ययन का मूल्यांकन बहुत जरूरी है। यह मूल्यांकन तभी संभव होगा जब प्रकृति का पुनर्मूल्यांकन किया जा सकेगा। क्योंकि प्रकृति के प्रांगण में पर्यावरणीय क्षेत्र, जैव-विविधता, जीव-संरक्षण, जल, जीवन और जमीन निहित है। पर्यावरण की काल्पनिक चारदीवारी के भीतर संपूर्ण प्राणी जगत, प्राणी जगत के समकक्ष समाज और समाज के सापेक्ष परिवार और प्रत्येक परिवार मनुष्यों का एक समूह है। रिश्ते-नाते, भावनाओं का समुच्चय हैं। जो अपनी संपूर्ण गतिविधियों के लिए प्रकृति पर ही निर्भर रहता है।
हमें प्रकृति की विभिन्न शक्तियों को पहचानना होगा। इसलिए प्रकृति के विविध उपादानों का पुनर्मूल्यांकन बहुत जरूरी है। मानवता के इतिहास का, उसके उद्भव का, उसके विकास का पुनर्मूल्यांकन बहुत जरूरी है। उसके रहन-सहन का, उसके खानपान का, उसके तीज-त्योहारों का, उसके परस्पर संबंधों का, उसका जीव-जगत, पादप संपदाओं से, आत्मिक संबंधों का पुनर्मूल्यांकन बहुत जरूरी है। हमें प्रकृति को अपने मन के भीतर ढूंढना होगा और अपने मन को दूसरे के मन से मिलाने का भाव रखना होगा। हमें प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करते हुए अपनेपन का एहसास भावात्मक स्तर पर ढूंढना होगा। हमें प्रकृति से भावनात्मक रूप से जुड़ने की जरूरत है। परमार्थ के कल्याण के लिए यथार्थ से लड़ना होगा, वह भी बिना स्वार्थ के। क्या हम ऐसा कर पाएंगे ?
प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक विशेष प्राकृतिक शिक्षा अध्ययन-अध्यापन द्वारा देश में विशेषज्ञों, शोधार्थियों, नवाचारों, संगठनों का विकासात्मक ढांँचा चिंहित करना होगा। छात्रों को अपने परिवेश एवं पर्यावरण का अध्ययन करवाते वक्त हमें अंतरसंबद्धता के सूत्र को पहचानते हुए पर्यावरण का अन्य विषयों से तुलनात्मक अध्ययन-अध्यापन करवाना होगा। कक्षा-कक्ष शिक्षण की पहली शर्त अंतरसंबद्धता के सिद्धांत और स्थानीय-परिवेशगत विविध आयामों पर आधारित होगी तो छात्र-छात्राओं को सीखने के लिए अधिक प्रेरित करेगी। भूगोल, इतिहास, कृषि, सामाजिक विज्ञान, विज्ञान, चिकित्साशास्त्र, साहित्य एवं मानवशास्त्र सभी के केंद्र में पर्यावरणीय नीतियों का समुच्चय है। भाषा तो एक ऐसा साधन है जो व्यक्ति को स्थानीय होने का मौका देती है। स्थानीय गतिविधियों से जोड़ती है। व्यक्ति के व्यक्तित्व को देहाती बना देती है और देहाती को शहरीकृत ढांँचे में ढाल देती है। स्थानीय विषयवस्तु से सांस्कारित हो जाती है और भावनात्मक संबंधों को सतत जोड़ती है। इस प्रकार अगर पर्यावरण का शिक्षण और अध्ययन सहज, सरल एवं प्रकृति की प्रवृत्ति के अनुरूप बनेगा तो मानवीय जनजीवन एवं मानवता का विकास उस विकास की प्रकृति के अनुरूप ही चलता रहेगा। प्रकृति संरक्षण और संवर्धन के संस्कार विद्यार्थी जीवन में विकसित करने होंगे।
एक ऐसा परीक्षाविहीन व्यावहारिक और प्रायोगिक पाठ्यक्रम निर्मित करना होगा जो विद्यार्थियों को सैद्धांतिक पक्ष के साथ-साथ व्यवसायिक कौशलों में भी कुशल एवं पारंगत बनाएं। छात्रों को आत्मविश्वासी , आत्मजीवी बना सकें। उनके हाथों को प्राकृतिक रूप से काम मिल सके। गति मिल सके। सक्रियता मिले। अनुभव एवं स्पर्श मिल सके। कुछ ऐसा कार्य करना होगा जिससे विद्यालय से उत्तीर्ण होकर निकलने वाला विद्यार्थी आसानी से अपना जीवन यापन कर सके। हमें अपने स्कूली पाठ्यक्रम में ढांचागत परिवर्तन करना होगा। कक्षा-कक्ष शिक्षण को स्थानीय संसाधनों से जोड़ना होगा।
प्रकृति के प्रांगण में ऐसे कई उद्योग हैं। कई कुटीर उद्योग और कई लघु उद्योग विद्यार्थियों को नवजीवन दे सकते हैं। इस बात को सरकार एवं प्रशासन को समझना होगा। पर्यावरण शिक्षा का केंद्र पाठ्यक्रम ही नहीं है। किताबी ज्ञान ही नहीं है। उससे बढ़कर भी बहुत कुछ है। परंतु हम पर्यावरण शिक्षा को मात्र पाठ्यक्रम तक ही समाहित करके चल रहे हैं। हम अपने छात्रों को पर्यावरण संबंधी ज्ञान तो रटा देते हैं परंतु व्यावहारिक एवं प्रायोगिक स्तर पर हम उन्हें प्रकृति के साथ जोड़ने में नाकाम रहे हैं। जब तक हम अपने छात्रों को प्रकृति के विभिन्न आयामों से नहीं जोड़ेंगे, कृषि एवं सहकारिता, पशुपालन, मौन पालन, मत्स्य पालन, मुर्गी पालन, भेड़ पालन इसी तरह के अन्य कई लघु एवं कुटीर उद्योग जिससे आजीविका और रहन-सहन सुचारू एवं सरल गति से चल सके यह सब विद्यालयी शिक्षा के केंद्र में होना चाहिए। अगर हम आज शैक्षणिक संस्थानों में प्राकृतिक शिक्षा को शामिल नहीं कर रहे हैं तो यह हमारे आने वाले भविष्य के लिए यह शुभ संकेत नहीं है। यह हमारे जीवन-जगत के लिए भी दुखदाई होगा।
क्रमशः सकारात्मक प्रयास अपेक्षित.....!
गुरुवार, 9 नवंबर 2023
ज़रूरतें युग सापेक्ष---* उत्तराखंड के विकास के लिए -डॉ. चंद्रकांत तिवारी -
*राज्य स्थापना दिवस 9 नवंबर- सभी को बधाई और शुभकामनाएं*
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*ज़रूरतें युग सापेक्ष---*
*उत्तराखंड के विकास के लिए -*
डॉ. चंद्रकांत तिवारी -
(उत्तराखंड प्रांत )
उत्तराखंड के विकास के लिए कई प्रमुख मुद्दों पर सरकार को गंभीरतापूर्वक कार्य करना होगा। जिनमें मुख्य रुप से शिक्षितों की बढ़ती बेरोजगारी, विद्यालय और उच्च शिक्षा में गुणवत्ता और सुधार, स्वास्थ्य और चिकित्सा के साथ-साथ महिलाओं की सुरक्षा, शहरी क्षेत्रों में प्रदूषण की गंभीर समस्या, कृषि एवं घरेलू उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए, कौशल विकास मिशन को बढ़ावा, साथ ही एक गंभीर समस्या जो उत्तराखंड की है वह पलायन को लेकर है। यहांँ पलायन कुछ इस कदर है कि गांँव के गांँव खाली हो चुके हैं। आज तक कोई भी सरकार इस दिशा में कोई गंभीर या ठोस प्रयास नहीं कर पायी है। अगर सरकार की ओर से कोई गंभीर प्रयास हो भी रहा है तो वह यथार्थ रूप से सामने नहीं दिखता। सरकार को शिक्षित बेरोजगारों को अपने ही क्षेत्र में रोजगार देकर, घरेलू उद्योगों को स्थापित एवं पुनर्जीवित करके, नए विद्यालय, विश्वविद्यालय बनवाकर, कॉन्ट्रैक्ट शिक्षक की जगह स्थाई नियुक्ति, निष्पक्ष योग्य अभ्यर्थियों का चयन करके, उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति के अनुरूप, नई-नई योजनाएं लाकर पर्वतीय प्रदेशवासियों को आत्मनिर्भर के साथ-साथ आत्मसम्मान से अपनी संस्कृति और परिवेश से जोड़कर रखना है। यही उत्तराखंड के विकास का मूल मंत्र है। कि वह अपनी जड़ों से भी जुड़े रहें और अपने ही क्षेत्र में रोजगार का सृजन भी करें। जिससे पलायन जैसी गंभीर समस्या का निदान हो सकेगा।
For the coming years, the government along with the teachers will have to continuously improve the standard of school education. For this, first of all, qualified teachers and continuous and active energetic teachers have to be selected in the education system. Such teachers who will have to dedicate their moral duty to the interest of the students and first of all the provision of material and educational resources to the school education & higher education system will have to be made 100% accessible by the administration.
In the technological age of ICT, teachers also have to be made proficient. For this, DIET, SCERT, NCERT at the district level for teacher training and in the field of higher education and school education, private institutions, NGOs, Teaching Learning Center can play an important role.
In the field of education, efforts should always be made for a better future at school, college and university level. With this hope and belief...
ग्रामीण क्षेत्रों को केंद्र बनाकर शिक्षा, चिकित्सा, कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों का विकास करके पलायन जैसी गंभीर समस्या को दूर किया जा सकता है।
जय हिन्द
वंदे मातरम्
🕉️🙏
शनिवार, 4 नवंबर 2023
राष्ट्रधर्म और आचरण की शक्ति ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
राष्ट्रधर्म और आचरण की शक्ति
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
भाषा, साहित्य, संस्कृति और धर्म समाज को निरंतर नियंत्रित, अनुशासित, पुनर्निर्मित एवं पुनर्जीवित करते रहते हैं। यह समाज को सांस्कृतिक परंपराओं एवं आध्यात्मिकता की धार्मिक भावनाओं से मिलाकर एकसूत्र में समन्वित करते हैं । नैतिक-अनैतिक में भेद स्थापित करते हैं । आदर्श मनुष्यता के चरित्र को निरंतर तलाश करते रहते हैं।
यह जीवन समाज के चार अध्याय हैं। हम सभी इन चारों आधार स्तंभ को अपने मध्य पाते हैं। राष्ट्र की एकता और राष्ट्रवाद के लिए उपर्युक्त चारों आधार स्तंभों का होना जरूरी है। भाषा, साहित्य, संस्कृति और धर्म द्वारा ही जीवन को समृद्ध किया जा सकता है। धर्म में सभी तत्वों का विलय हो जाता है। धर्म आचरण की आधारशिला है। आचरण धर्म को युगों-युगों तक जीवंत बनाए रखता है।
धर्म जीवन की आंतरिक भाषा है। धर्म तो दर्शन का विषय है, प्रदर्शन का नहीं है। मुट्ठीभर मिट्टी लेकर संकल्पवान अगर राष्ट्र के प्रति अपनेपन का एहसास पैदा नहीं करता, अपने राष्ट्र के लिए सद्भावना नहीं रखता, तो ऐसे व्यक्ति का होना व्यर्थ है। सीमित सीमाओं वाला ऐसा विचार पुरुष स्वयं विचारशून्य है। जिसकी सीमाएं देश की सीमाओं की रक्षा करने में भी असमर्थ हैं। आचरण की सभ्यता व्यक्ति को सभ्य बनाती है। किंतु उससे पहले व्यक्ति को स्वयं के विचारों को धार्मिक आध्यात्मिकता एवं सांस्कृतिक जागरण से पुनर्जीवित करना होता है। संस्कृति भी तभी महान हो सकती है जब धर्म कर्माभिमुख होकर प्रगति के सोपानों पर बढ़ता रहे।
संस्कार संस्कृति की प्राथमिक पाठशाला है। छोटे शिशुओं में जीवन की दिशा और दशा तय करती है। कह सकते हैं कि शिक्षा का प्राथमिक आधार संस्कारों में ही फलता और फूलता है। छोटे नवजात शिशुओं में संस्कारों को दिशा देते हुए हम धर्म का ही आचरण पूर्ण कर रहे होते हैं। धर्म मानवीय प्रवृत्ति का नैसर्गिक गुण है। यह प्रकृति प्रदत्त है। हम कभी भी धर्म से विमुख नहीं हो सकते हैं । जब तक हम इस धरती में जीवन यापन कर रहे होते हैं तब तक हम प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से धर्म का निर्वहन कर रहे होते हैं। क्योंकि धर्म आस्था और विश्वास का साक्षात चरित्र है। धर्म व्यक्ति को शक्ति प्रदान करता है। सच्चा धर्म राष्ट्रीय भावनाओं से प्रेरित होता है और राष्ट्र के लिए सर्वस्व निछावर करने का स्वप्न देखा है। यह साधारण व्यक्ति को असाधारण बनाता है। इसे पुनर्जीवित, जीवित और जीवंत बनाए रखने के लिए व्यक्ति को उच्च आदर्श एवं लक्ष्य स्थापित करने होते हैं। यह हिमालय की तरह पवित्र और विशाल, साहस और रसयुक्त रहस्यों का प्रतीक होता है।
धर्म आचरण से पूर्ण व्यक्ति ईश्वर से भी साक्षात्कार स्थापित कर लेता है। ऐसे व्यक्ति के हृदय में समाज की पीड़ा और समाज की चिंता हमेशा बनी रहती है। अंततः धर्म का नैतिक चरित्र राष्ट्र सेवा में निहित है।
राष्ट्रीय भावना से प्रेरित राष्ट्रवाद भी भाषा, साहित्य, संस्कृति और धर्म का ही गठजोड़ है। यह भाषा की विचारधारा है। साहित्य का लिखित रूप है। संस्कृति रूपी सभ्यताओं और परंपरागत ज्ञान का समन्वित रूप है। धर्म का दर्शन और एकीकरण साधना द्वारा संचालित मानवीय सरोकारों का प्रामाणिक दस्तावेज है। धर्म सर्वोपरि है और आध्यात्मिक बिंबों का नैतिक चरित्र है। क्योंकि यह भाव, क्रिया और ज्ञान का समन्वित रूप है। धर्म व्यक्ति के व्यक्तित्व को योगी बना देता है। धर्म का आध्यात्मिक रूप व्यक्ति को मर्यादित आचरण व्यतीत करने में सहायक है। वहीं धर्म का व्यवहारिक रूप जीवन जगत से जुड़े रहने की शिक्षा देता है। ईश्वर का होना और धर्म का होना एक ही बात है, ज्यादा अंतर नहीं है।
व्यक्ति से ही समाज का निर्माण होता है और समाज ही राष्ट्र की प्रगति एवं तरक्की का सूचक है। राष्ट्रधर्म सर्वोपरि है । राष्ट्र सर्वोपरि है । व्यक्ति का व्यक्तित्व और आचरण की शक्ति ही राष्ट्रधर्म का निर्माण करती है। राष्ट्र के लिए व्यक्ति को निजी रूप से भी शत-प्रतिशत परिश्रम और अपने स्थान पर रहकर निरंतर मेहनत करते रहना चाहिए। यही सच्चा राष्ट्र धर्म है। यही आचरण की शक्ति है।
राष्ट्रधर्म का कोई सर्टिफिकेट नहीं होता है। यह तो देशसेवा और शत-प्रतिशत कर्म-क्षेत्र का प्रतिफल है। जब व्यक्ति अपने परिवेश से जुड़कर अपने समाज को नियंत्रित करते हुए अपने प्रांत की प्रतिष्ठा में वृद्धि करता है तो धर्म अपना क्रमशः सकारात्मक दिशा में कार्य कर रहा होता है।
बुधवार, 18 अक्टूबर 2023
मांँ दुर्गा के नौ रूप - ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत
Maa Durga always blesses. Navratri is the day of praise and worship of Maa Durga. It is a traditional festival of Hinduism and Hindu religion. Which has cultural and historical importance as well as spiritual and emotional interrelationship.
Navratri is the festival of worship of nine forms of Mahishasura Mardini Goddess Durga Maa. These nine forms are respectively - Shailputri, Brahmacharini, Chandraghanta, Kushmanda, Skandamata, Katyayini, Kalaratri, Mahagauri and Siddhidatri. There are many dimensions in these nine forms of Maa Durga like power and spiritual glory, ascetic character, disciplined life, balanced life dimension, destroyer and creativity, human revival cycle, welfare of the entire universe and human civilization.
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति. चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति, महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।।
मांँ दुर्गा के नौ रूपों से हम क्रमशः इस प्रकार परिचित हैं-- पहली शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चंद्रघंटा, चौथी कूष्मांडा, पांचवी स्कंदमाता, छठी कात्यायिनी, सातवीं कालरात्रि, आठवीं महागौरी और नौवीं सिद्धिदात्री।
1- शैलपुत्री देवी माता --
हिमालय का एक नाम शैलेंद्र या शैल भी है। शैल का मतलब पहाड़ या चट्टान से है। देवी दुर्गा ने पार्वती के रूप में हिमालय के घर जन्म लिया। पार्वती की माता का नाम मैना था। इसीलिए देवी पार्वती का पहला नाम पड़ा शैलपुत्री अर्थात हिमालय की पुत्री। शैलपुत्री होने के नाते मांँ यह सिखाती है कि मानव समाज का चरित्र, कार्य और जीवनशैली पर्वत की तरह अडिग और विशाल होनी चाहिए। शैलपुत्री माता की पूजा अर्चना रोजगार, धन-धान्य और स्वास्थ्य में गुणात्मक वृद्धि करती है।
2- ब्रह्मचारिणी देवी माता --
ब्रह्मा के द्वारा बताए गए मार्ग पर चलाने वाली और ब्रह्मा की प्राप्ति एवं उनके जैसे आचरण को दिलाने वाली, जीवन में नियम, संयम और तत्परता से जीवन की सफलता के सैद्धांतिक सूत्रों को प्राप्त कराने वाली और अनुशासन एवं चरित्र की शक्तियों को संचित करते हुए अलौकिक शक्तियों की आराधना कर मानव कल्याण कराने वाली माता ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना इस दिन को महत्वपूर्ण बनती है। ब्रह्मचारिणी का अर्थ है, जो ब्रह्मा के द्वारा बताए गए सत्य आचरण पर चले। ब्रह्मचारिणी माता की पूजा से कई सिद्धियांँ प्राप्त होती हैं।
3- चंद्रघंटा देवी माता --
जिसके ललाट पर घंटे के आकार का चंँद्रमा सुशोभित है, ऐसी आत्मिक शांति, समृद्धि प्रदान करने वाली माता का नाम चंद्रघंटा है। यह संतुष्टि की देवी है। मनुष्य संतुष्ट होगा तो जीवन भी शांत होगा। अशांत व्यक्ति जीवन में अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाता है। जीवन की आत्मिक सुख शांति समृद्धि के लिए माता चंद्रघंटा की आराधना जरूरी हो जाती है।
4- कुष्मांडा देवी माता --
ऐसा माना जाता है कि कुष्मांडा देवी की मृदु-मधुरिमा मुस्कान से संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है । भय का नाश करने वाली, जीवन में सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने वाली, कुष्मांडा देवी का चौथा स्वरूप मानव जीवन के विकास की कथा कहता है। ब्रह्मांड की रचना करने के कारण ही इस देवी का नाम कूष्मांडा पड़ा है। सौहार्दपूर्ण जीवन के लिए कुष्मांडा देवी की पूजा अर्चना महत्वपूर्ण बन गई है।
5- स्कंदमाता --
कार्तिकेय शिव और पार्वती के पुत्र हैं । उनका एक अन्य नाम स्कंद है। कार्तिकेय यानी स्कंद की माता होने के कारण देवी के पांँचवें रूप का नाम स्कंदमाता है ।शक्तिदायक माता की पूजा अर्चना मानव कल्याण के लिए सकारात्मक प्रयास करती है।
6- कात्यायिनी माता --
मांँ कात्यायिनी ऋषि कात्यायन की पुत्री है। कात्यायन ऋषि ने घोर तप किया। तप करने के उपरांत माता दुर्गा ने ऋषि कात्यायन के घर पुत्री रूप में जन्म लिया। कात्यायन ऋषि की बेटी होने के कारण ही देवी का नाम कात्यायिनी पड़ा। देवी अपने भक्तों को रोग, शोक, संताप से मुक्त करती है। देवी की पूजा-अर्चना इस दिन को महत्वपूर्ण बनाती है।
7- कालरात्रि माता --
काल की देवी है मांँ कालरात्रि सभी ऋद्धियांँ और सिद्धियांँ, माता कालरात्रि की अलौकिक शक्तियों, तंत्र-मंत्र, पूजा-प्रतिष्ठा से पूर्ण होती हैं। यह सिद्धियांँ प्राप्त कराने वाली देवी है। काल की देवी जो काल से भी विजय प्राप्त कराने में सक्षम है । जीवन में निरंतर प्रगति पाने के लिए माता कालरात्रि देवी की पूजा अर्चना करनी चाहिए। देवी कालरात्रि की पूजा अर्चना का महत्व इस दिन को विशेष बनता है।
8- महागौरी माता --
माता पार्वती अपने सबसे उत्कृष्ट और अनुपम स्वरूप में महागौरी के रूप में प्रकट हुई हैं। देवी का आठवांँ स्वरूप महागौरी का है। गौरी पार्वती का प्रतीक है और महागौरी मांँ पार्वती का उज्ज्वल, श्वेत, निर्मल स्वरूप है। चरित्र की पवित्रता, निर्मलता और पावनता जीवन में सफलता और निष्कलंक चरित्र निर्माण के लिए माता महागौरी भक्तों को आशीर्वाद देती है। इस दिन माता का स्मरणोत्सव मानव चरित्र को निष्कलंक बनाता है। पापमुक्त , भयमुक्त करता है। जो सच्चे मन से मांँ का स्मरण एवं पूजा अर्चना करता है, माता उस पर अपनी कृपा करती है।
9- सिद्धिदात्री माता--
कैलाशपति, अर्द्धनारीश्वर भगवान शिव भी जिनकी शक्तियों एवं सिद्धियों की स्तुति एवं शक्ति प्राप्त करते हैं, ऐसी देवी मांँ संपूर्ण सिद्धियों की मूल हैं। सिद्धिदात्री माता मानव कल्याण के लिए अवतरित हुई हैं। जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए, लक्ष्य भेदने के लिए, नैतिक आचरण एवं जीवन चरित्र को निर्मित एवं सकारात्मक चरित्र निर्माण के लिए माता की आराधना एवं स्तुति वंदनीय है। शिव के अर्द्धनारीश्वर स्वरूप में जो आधी देवी हैं वह सिद्धिदात्री माता ही हैं।
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
उत्तराखंड प्रांत
हिमालय का आदर्श -- ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी -उत्तराखंड प्रांत
हिमालय का आदर्श --
(आंँखों पर हिमालय)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत
The development of overall personality is formed by the conduct, thoughts, imagination, intellectual environment and sociality as well as the sense of coordination of each person.
The greater the ideal of a particular person or institution, the more extensive and permanent will be the sociality of that person and institution.
“The Himalayas have seen totality in smallness and smallness in totality.”
It depends on us, how we are seeing the scenes visible or reflected in front of us.
हिमालय को आत्म-प्रशंसा या प्रशंसा की आवश्यकता नहीं। व्यक्ति-विशेष या व्यक्तिगत भावनाओं को आत्म-प्रशंसा की आवश्यकता है। व्यक्ति आत्म-प्रशंसा से कब बाहर निकलेगा? कहना मुश्किल है, जबकि वह हिमालय के समक्ष एक सूक्ष्म बूंद या अंश मात्र है। हिमालय के अपार प्राकृतिक दृश्य और उसकी ज्ञान परंपराएं अतुलनीय हैं। यह व्यक्ति-विशेष की निजी क्षमता एवं दृष्टि पर निर्भर करता है कि वह कितना और कहांँ तक देख सकता है और कितनी सहजता से उसे आत्मसात कर सकता है।
हिमालय से हज़ार गंगा धाराएं निकलती हैं। हिमालय के विशाल अमृत सागर से हजार धाराएं लोक मानस के कंठ को भिगोती हैं। दिव्य हिमालय-सा सतगुरु ईश्वर का व्यक्तित्व और आदर्श मनुष्यता को अमृत की बूंदों का रसपान कराता है। विशाल हिमालय से असंख्य धाराएं जब निकलती हैं तो विद्यार्थी की तरह निर्मल समाजसेवी बनकर भावी समाजिक परिधि को गति प्रदान करने के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तन की संभावनाओं को भी सक्षम बनाती हैं।
विशाल हिमालय रूपी कविता के समक्ष कवि हृदय, सहृदय स्वयं में एक छंद है। विशाल गिरिवर के समक्ष कवि हृदय स्वयं एक छोटा सा अंश मात्र है। हिमालय का व्यक्तित्व कुछ इसी तरह प्रतीत होता है। हिमालय की गरिमा को लिए प्रत्येक कवि अपने मन के भीतर कई बार पिघलता हुआ स्वयं में अपनी कविता का मार्ग तय करता हुआ शांत होकर शीतल जल-धारा की तरह बहता रहता है। यह निरंतरता ही जीवन का सौभाग्य संगीत है। अनवरत यात्रा का गवाक्ष हिमालय-सा आदि पुरुष प्रत्यक्षदर्शियों और स्वप्नजीवियों के लिए सदियों से प्रेरणा का स्रोत बना है।
हिमालय का कौमार्य सदा ही प्रेरणा का अजस्र स्रोत रहा है। ना चाहते हुए भी सहृदय, कवि हृदय बन कविता को सहेजने की ओर प्रेरित हो जाता है। नैसर्गिक सौंदर्य कविता की जननी है। कविता की उत्पत्ति और विकास की संभावनाएं सब प्रकृति सौंदर्य में निहित हैं। कवि मात्र शब्दों का चयन करता है। रेखाचित्रों को शब्दचित्रों में पिरोने का कार्य कवि प्रकृति के बिम्बों को देखकर ही करता है। अतः जिस कविता में जितने सकारात्मक बिम्ब होंगे वह कविता उतनी सकारात्मकता के साथ सहृदय, कवि हृदय के साथ तादात्म्य स्थापित कर पाएगी।
तुम दिव्य-हिमालय मैं लघु सरिता
तुम शब्द हजार मैं छंद-कविता
तुम गिरिवर पाषाण-प्रचंड
मैं ओट तुम्हारी मानस-खंड ।
मौन रहकर भी बहुत कुछ कहा जा सकता है । शांत रहकर भी जीवन संगीत एवं उसकी गतिविधियों को संचालित करते हुए, प्रकृति-प्रांगण के सम्मुख बैठे व्यक्ति के अंतर्मन को पढ़ा जा सकता है। अपनी स्वच्छंद आंँखों से विद्यार्थी या जिज्ञासु साधक के अंतर्मन के दृश्य-पटलों को एवं उसकी विभिन्न गतिविधियों को समझते हुए, मरहम के रूप में अपनी बातों द्वारा सही दिशा संकेत देते हुए, पथ-प्रदर्शक की भांँति राह पर लाकर गंतव्य तक पहुंँचाना कुछ इस प्रकार का व्यक्तित्व प्रकृति बिम्बों का हिमालय प्रदेश में देखा जा सकता है। हिमालय बहुत कुछ सिखाता है।
हिम शिखरों का पर्वतीय सौंदर्य निर्विकार, अनादि, अनंत, स्वरूपानंद है। कल्पनाओं का विशाल श्वेत शिखर कब अपने सौंदर्य की राशि लुटाता है? यह अकथनीय है और अकल्पनीय भी।
कभी-कभी हिमालय के चेहरे पर हाव-भाव उभर आते हैं। एक स्वच्छंद बालक की हंसी दोनों विशाल गालों में पढ़ने वाली लंबी सी रेखाएं मुख मंडल की आभा को दो हिस्सों में विभाजित कर देती हैं। आंँखों के दो प्याले अतल गहराइयों में तरलता के भाव लिए अंतस की परिधि के प्रकोष्ठों द्वारा स्वयं से आत्म साक्षात्कार करते हुए हृदय की गहराइयों में असंख्य जज्बातों के समंदर को लेकर कभी श्रृंग कभी गर्त की भांँति प्रकृति-प्रांगण के सम्मुख बैठे व्यक्ति या कवि हृदय के अंतर्मन पर समतल-सा मार्ग तय करते हैं।
मैं जब भी विशाल प्रांगण के सम्मुख जाता हूंँ एक बात हमेशा मुझे ध्यान आकर्षित करती है कि जब भी कभी मैं उपत्यका की तलहटी में बैठता हूंँ तो इसका विशाल फलक आकर्षित किए बिना नहीं रहता। सम्मोहन इसके परिवेश में रचा-बसा है। जीवन की मोक्षस्थली का केंद्र यहीं है। सभी शक्तियों का समुचित केंद्र भी।
हिमालय का व्यक्तित्व महान है। हिमालय की सरलता और तरलता व्यक्ति को समाजिक सौहार्द बनाए रखने में मदद करती है। व्यक्ति विशेष और साधारण को अतिसाधारण बनाती हैं। पास बैठे व्यक्ति को सामर्थ्यवान बनाते हुए प्रेम-सौंदर्य की अतल सीमाओं में स्वच्छंद गति से उड़ने की शक्ति और अंतर्मन में पड़ने वाले विभिन्न आयामों पर नैतिक चरित्र के अपार दृश्य को अवतरित करती है। मुख मंडल पर श्वेत शिखर की पवित्र लालिमा हमेशा ही आकर्षक मुस्कान और हृदय में प्रेम की अपार राशि, सम्मुख प्रकृति-प्रांगण में बैठे व्यक्ति पर आशीर्वाद के लिए सदा विनम्र बने रहना सिखाती है। साधारण व्यक्ति के जीवन में असाधारण सौंदर्य रूप राशि से भर देती है।
समग्र व्यक्तित्व का विकास प्रत्येक व्यक्ति के आचरण, विचार, कल्पना, बौद्धिक परिवेश और सामाजिकता के साथ-साथ समन्वय की भावना से बनता है। जिस व्यक्ति विशेष या संस्था का आदर्श जितना बड़ा होगा उस व्यक्ति एवं संस्था की सामाजिकता भी उतनी ही विस्तृत और स्थायी होगी।
"हिमालय ने लघुता में समग्रता को और समग्रता में लघुता को देखा है।" यह हम पर निर्भर करता है, कि हम हमारे सामने दिखने वाले या प्रतिबिंबित होने वाले दृश्यों को किस रूप में देख रहे होते हैं। सहजता और संवेदना, स्वीकारोक्ति और आत्मीयता, परिपक्वता और परिपूर्णता आत्मिक संवेदनाएं हैं। यह सब श्रृद्धा का विषय है। जिन पत्थरों को साधारण व्यक्ति मात्र देखा करता है, उन पत्थरों को ही साधारण श्रृद्धावान पूजते हैं।
हिमालय जीवन का यथार्थ वैभव है। यह वर्तमान से कहीं अधिक अतीत की स्मृतियों का तेजस पुंज है। एक-एक पवित्र बूंदों का समुच्चय है। एक वैभवशाली इतिहास का मेरुदंड है। कई सभ्यताओं और संस्कृतियों का एकमात्र साधक एवं यथार्थजीवी। यह तपस्वी ज्ञान परंपरा की पुण्य स्थली भी।
जीवन के यथार्थ दृश्यों को हम किस रूप में देखते हैं, किस रूप में महसूस करते हैं, महसूस करने के बाद क्या हम उन साक्षात दृश्यों/वस्तुओं से अपनेपन का लगाव रख पाते हैं? ऐसा लगाव जो हमें बार-बार अपनी ओर आकर्षित करता हो। हमारे मन की रिक्तता को पूर्ण करता हो। हमारे जीवन के अवकाश को इंद्रधनुषी रंगों से भर देता हो। हमारी विषम और कठिन बनती जा रही जीवनशैली को सरल और सहज बना देता हो। हमारी कम पड़ती श्वांसों के मध्य रक्त का संचार करता हुआ जीवन की लालिमा के नए दृश्यों को उभरता हो। यह संभव है कि हम अंतिम स्पंदन तक स्वयं से ही संघर्ष कर रहे होते हैं परंतु जो प्रकृति सौंदर्य हमने अपने लिए निर्मित की है वह एक ऐसी दुनिया है जो दो सगे-संबंधियों के अकेलेपन से भरी हुई है। जैसे जीवन का संगीत रिक्त हो गया है जीवन की तलाश में भटकता हुआ कवि हृदय शून्य की परिधि पर घूम रहा हो। स्वयं के प्रश्नों में ही उत्तर को तलाश कर रहा हो। कवि हृदय कई सौ हृदयों का समुच्चय है। उसकी अभिव्यंजना और अभिव्यक्ति से पहले उसकी देखने की शक्ति, स्पर्श और गंध के अनुभवों का साक्षात् बिंम होती है। हवाओं में तैरता हुआ संगीत कवि की सांसों में घुलमिल कर साकार हो जाता है। यह सब एकांत की वीणा से निकला हुआ नादमय संगीत है। जीवन का वास्तविक जयघोष है। यही गुरु परंपरा की लोक संस्कृति का उत्थान मंच है। यही गुरुत्व शक्तियों की गतिविधियों का आत्मिक दर्शन जो व्यष्टि से समष्टि और समष्टि से व्यष्टि एवं मानवता की जन्मभूमि की विकास यात्रा का अंतिम और प्रारंभिक प्रस्थान बिंदु है। हिमालय इन सब बातों का एकमात्र गवाह है। हिमालय से कुछ छिपा नहीं है। हिमालय प्राकृतिक सौंदर्य का उपहार है। प्रकृति का अनुपम आभूषण है हिमालय।
प्रकृति स्वयं में ईश्वर है। ईश्वर कहीं और नहीं। हमारे परिवेश और मिट्टी के कण-कण में ईश्वर है।
मंगलवार, 10 अक्टूबर 2023
"प्रेरणा का प्रतिफल, जीवन का सकारात्मक बिंब है"- © डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत
"प्रेरणा का प्रतिफल, जीवन का सकारात्मक बिंब है"-
© डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत
"Motivation teaches social students to live psychologically. There is a lot in life that can be achieved with the help of inspiration. Inspiration gives direction and vision like a guru. And like a mother, she also gives direction and love. A little inspiration makes an ordinary person extraordinary."
प्रेरणा व्यक्ति को कार्य के प्रति सकारात्मक रूप से जोड़ते हुए, जीवन जीने की नई दिशा की ओर, शत प्रतिशत ईमानदारीपूर्वक, कर्तव्यनिष्ठ और जुझारू व्यक्तित्व की दिशा की ओर लेकर जाती है। कहने का मतलब है कि प्रेरणा व्यक्ति को उसके लक्ष्य की ओर तीव्र गति से पहुंचाने में अपूर्ण योगदान को पूर्ण करती है।
जीवन में हम अपनी दैनिक / दिनचर्या में काम करते-करते कभी ना कभी निष्क्रिय से होने लगते हैं। परंतु एक छोटी-सी प्रेरणा हमें कार्य के प्रति गुणात्मक और सकारात्मक दिशा-दृष्टि प्रदान करती हैं।
अध्यापक का विद्यार्थी के प्रति प्रेरणा देना, माता-पिता का अपने पुत्र को प्रेरणा देना, मित्र का अपने समकक्ष मित्र को प्रेरणा देना, पति-पत्नी एवं साथ जीवन यापन करने के साथ-साथ सहयात्री और सहपाठी, सहमित्र सभी कहीं ना कहीं आपस में एक दूसरे को सकारात्मक रूप से प्रेरणा प्रदान करते रहते हैं। जिससे आपसी रिश्ते मधुर एवं रसमय बन जाते हैं और उनमें नई स्फूर्ति एवं ताजगी निराशा को समाप्त कर देती है। जीवन जीने की एक नई कला व्यक्ति के मन के भीतर सकारात्मक प्रेरणा का सृजन करती है। मांँ अपने पुत्र को जीवन भर आशीर्वाद के रूप में प्रेरणा प्रदान करती रहती है। पिता अपने बच्चों के प्रति अपने दैनिक कार्यों में संलग्न रहकर जो कमाई करता है एवं पसीना बहाता है वह प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अपने ही बच्चों को प्रेरणा प्रदान कर रहा होता है।
यह जीवन की कथा है। इस कथा में सूत्रधार और सभा में उपस्थित सभी जनसमुदाय आपसी संवेदनाओं से जुड़े रहते हैं । वही संवेदना एक दूसरे को भावात्मक रूप से प्रेरणा प्रदान करती रहती है । जीवन में प्रेरणा बहुत जरूरी है । ऐसी प्रेरणा जो साधारण व्यक्ति को साधारण बना देती है । निठल्ले और कामचोर व्यक्ति को परिश्रमी और ईमानदार बना देती है । छोटे व्यक्ति को बड़ा कद प्रदान करती है और बड़े व्यक्ति को छोटे व्यक्ति के साथ सामंजस्यपूर्ण व्यवहार स्थापित करने की शक्ति प्रदान करती है। हालांकि बड़ा व्यक्ति वह है जो छोटे व्यक्ति को छोटेपन का एहसास न होने दे , परंतु प्रेरणा सर्वोपरि है। व्यक्ति की आंँखों के भीतर एक ऐसी चमक पैदा कर देती है जिसकी चमक रूपी ईंधन से व्यक्ति जीवन के प्रति सकारात्मक भावों से भर जाता है। व्यक्ति अपने सम्मुख बैठे व्यक्तित्व के साथ मित्र भाव से जीवन जीने की कला सीखना और सिखाता है। हालांकि सीखना और सिखाना एक सतत प्रक्रिया है । परंतु फिर भी इस सतत प्रक्रिया में प्रेरणा अति आवश्यक है। शिक्षक की हैसियत से प्रेरणा विद्यार्थियों के लिए अमृत की बूंदों के समान है।
जीवन एक सकारात्मक नदी की भांँति अपने गंतव्य की दिशा में सतत और अनवरत रूप से बहती रहती है। राह में पढ़ने वाले पत्थर, कंकड़, धूल, मिट्टी, हलचल पैदा करती लहरें, उठती गिरती लहरें, अनुशासन भरी लहरें यह सभी कहीं ना कहीं आगे बढ़ाने की प्रेरणा और निरंतर गति प्रदान करती हैं। यह निरंतरता और सततता , क्रियाशील रहना ही नदी को नई दिशा और जीवन देता है। राह में बाधा पहुंँचाने वाली विपरीत परिस्थितियां , स्थायी मनोबल एवं आत्मबोध को जागृत करते हुए, निरंतर प्रेरणा प्रदान करती हैं। समाज का विस्तार बहुत बड़ा है। समाज प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से व्यक्ति को प्रेरणा प्रदान करता है। सामाजिक प्रेरणा व्यक्ति को समाज में घुलने-मिलने के बाद स्वत: ही मिल जाती है। विषम परिस्थितियों में भी सामाजिक प्रेरणा व्यक्ति को एक सकारात्मक व्यक्तित्व प्रदान करती है और लक्ष्य की ओर सीमित उद्देश्यों को प्राप्त करते हुए, विजयश्री का शंखनाद फूंकती है। आत्मविश्वास का जयघोष स्थापित करती है। नि:संदेह सब जीवन में प्रेरणा का प्रतिफल है। प्रेरणा अत्यावश्यक है।
प्रशंसा करना और प्रेरणा देना दोनों में बहुत बड़ा अंतर है । प्रशंसा का क्षेत्र सीमित और व्यवहार जनित है। प्रेरणा ईश्वरीय गुण है और प्रशंसा मानवीय प्रवृत्ति का नैसर्गिक चरित्र । प्रशंसा के पीछे स्वार्थ निहित रह सकता है। परंतु प्रेरणा व्यक्ति को सद्चरित्र और निःस्वार्थ भाव से भर देती है। प्रेरणा व्यक्ति के सम्मुख एक आदर्श पाठ स्थापित करती है। व्यक्ति के भीतर अगर आत्मबल और आत्मबोध निहित हो तो वह नकारात्मकता से भी सकारात्मक प्रेरणा ग्रहण कर सकता है। कभी-कभी प्रेरणा प्रदान करने वाला व्यक्ति ईश्वर के रूप में प्रतीत होता है। प्रेरणा का प्रतिफल, जीवन का सकारात्मक बिंब है। जीवन में प्रेरणा प्रदान करते रहें यह समाज और राष्ट्र के हितार्थ होगा। प्रेरणा प्राप्त करने वाले से अधिक देने वाले को महान बनाती।
बुधवार, 4 अक्टूबर 2023
Have we ever felt the nature around us? ©Dr. C K Tewari
Have we ever felt the nature around us?
Dr. C K Tewari
*Once make a small effort to see the nature around you within your mind, then see with your open eyes what do you see around you?*
There are so many things around us, but we are able to have a sense of familiarity and ease with only a few things.
Do we ever gaze at the beauty of nature for long?
Nature surrounds us, imprisons us in its periphery and gives freedom to live life.
Maybe we haven't seen nature properly yet! Because as much as we see nature, it always seems new, attractive and full of entertainment to us in different forms, in different dimensions.
In this way it can be said that….
"Nature is as old as the world and as new as each moment."
Always be devoted to your nature, your country, your soil, your people, your nation and your motherland.🇮🇳🙏
मंगलवार, 3 अक्टूबर 2023
Nationalism gives strength to conduct - ©Dr. Chandra Kant Tewari
Nationalism gives strength to conduct -
©Dr. Chandra Kant Tewari



