शनिवार, 1 मार्च 2025

सूचना (इंफोर्मेशन) और ज्ञान (नालेज) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी There is a huge difference between information and knowledge.

 सूचना (इंफोर्मेशन) और ज्ञान (नालेज) 

There is a huge difference between information and knowledge.

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एक प्रश्न के सही उत्तर को लिखने के लिए अगर केवल विकल्प हो तो उसी प्रकार के प्रश्नों से विद्यार्थी केवल परीक्षा उत्तीर्ण कर सकता है। उसके सीखने की चुनौती बनी रहेगी।


कम से कम प्रश्नों के उत्तर लिखने के लिए विश्लेषणात्मक एवं विवेचनात्मक प्रश्नों की आवश्यकता है। प्रश्नों के उत्तर लिखने से एक साथ विभिन्न चरणों में मूल्यांकन हो सकेगा। 

जैसे - 

व्याकरणिक अशुद्धियांँ 

लेखन कला 

सृजनात्मक शक्ति 

सृजनात्मक कवित्व गुण 

पद लालित्य 

वाक्य संयोजन 

कथेत्तर गद्य के अनुरूप लेखन शैली 

भाषा एवं शैली 

तुलनात्मक समीक्षा लेखन कला

शोध दृष्टि के समीक्षात्मक बिंदु।


कुल मिलाकर बहुविकल्पीय प्रश्नों ने विश्लेषणात्मक और तर्कशील प्रश्नों के उत्तरों का नाश कर दिया। विद्यार्थियों के खोजी व्यक्तित्व को रटंत बनाकर समीक्षात्मक एवं तुलनात्मक अध्ययन पद्धति की परीक्षा को मूल्यांकन विहीन कर दिया। जिससे छात्रों का बौद्धिक क्षितिज मात्र परीक्षा पास करने तक ही सीमित हो गया है। आज डिग्री प्राप्त युवा बहुविकल्पीय प्रश्नों की भांँति अत्यधिक विकल्पों के मध्य स्थाई विकल्प तलाशने में व्यस्त हैं।

सूचना (इंफोर्मेशन) और ज्ञान (नालेज) दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। 


©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

Fb-Chandra Tewari

शुक्रवार, 10 जनवरी 2025

स्वीकारोक्ति जीवन में आवश्यक है - ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

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स्वीकारोक्ति जीवन में आवश्यक है - (विश्व हिंदी दिवस पर -10 जनवरी) 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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जागरूकता, प्रचार-प्रसार, सरकारी कार्यालयों में भाषाई प्रयोग, व्यावहारिक जनजीवन में आत्मिक भाषाई प्रयोग और शिक्षण पद्धति के क्षेत्र में भाषाई अनुप्रयोग द्वारा हिंदी भाषा को वैश्विक शीर्ष पर स्थापित करते हुए, अपनी भाषा में संपादन, लेखन, प्रकाशन, शिक्षण, प्रशिक्षण, अनुसंधान, प्रबोधन, नीति, पाठ्यक्रम, संगठन और प्रत्येक राष्ट्र की भाषा के साथ समन्वित-समान आदर-भाव ही हिंदी भाषा को संवर्धित, पुष्पित, पल्लवित और लोक व्यवहारिक धरातल प्रदान करने में भारतीय और भारतीयता के स्वधर्म की रूपरेखा तैयार करेगा। जैसे बज़री, कंकड़, सीमेंट, लोहा, ईंट, पत्थर आदि में जल मिलाने से इमारत की दीवार और सुंदर घर बनाया जा सकता है। तो ठीक उसी तरह भिन्न-भिन्न भाषा एवं बोलियों के शब्दों द्वारा हिंदी भाषा का निर्माण संभव हो सकेगा और हिंदी भाषा का पद लालित्य एवं अनूठापन बना रहेगा। इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं यह सत्य है।


 प्रभात (संस्कृत भाषा), प्रणाम (संस्कृत भाषा), मंगलमय (हिंदी भाषा), अभिवादन (लैटिन भाषा) और हार्दिक शुभकामना (हिंदी भाषा) धन्यवाद (संस्कृत भाषा), बोतल (पुर्तगाली शब्द), रेल (अंग्रेजी शब्द) आदि भिन्न-भिन्न भाषाओं के शब्दों द्वारा नियमित लोक व्यवहार और कार्य क्या हिंदी भाषा का नियमित आधार स्थापित करेगा ? बिल्कुल करेगा। क्योंकि यह सभी शब्द नियमित लोक व्यवहार में प्रयुक्त हो रहे हैं और होते रहते हैं। हिंदी भाषा में कई शब्द हिंदी भाषा को गतिशील, समृद्ध और सामर्थ्यवान बनाए रखने में सहायक है। 


भूमंडलीकरण और बहुभाषी समाज के समक्ष, सभ्यता और संस्कृति की बदलती बयार के साथ सबकी अपनी-अपनी जिजिविषा है। अपने-अपने सपने हैं। महत्वाकांक्षाओं का क्षितिज व्यापक है। अपनी भाषा, अपनी संस्कृति, अपना समाज और एकांकी परिवार। यहांँ तक कि धर्म की आपसी गुटबाजी भी नव-परिवर्तित भविष्य को दिशा-निर्देश जारी किए हुए आगाह कर रही है। स्वराष्ट्र प्रगति की संकल्पना सर्वोपरि यथार्थ है। परंतु निज राष्ट्र और वैश्विक परिदृश्य के संदर्भ में भारतीयता का आदित्य रूपी ध्वज हमेशा वैश्विक स्तर पर फहराने के लिए स्व-भाषा, स्वधर्म, स्वचरित्र, स्व-कर्म और स्वराज बहुत जरूरी है।

स्वीकारोक्ति जीवन में आवश्यक है। धर्म, कर्म, लोक सेवा एवं भाषाई व्यवहार हेतु।

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असफलता और सफलता में मौन बने रहता है अद्वित्य

प्रखर-दीप्ति निशा-अमावस्य तपस्वी-सा हंसता आदित्य।

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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बुधवार, 8 जनवरी 2025

भाषा का उदय और विस्तार - ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 भाषा का उदय और विस्तार - ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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       जब समाज में विश्रृंखलता उत्पन्न होकर उसकी गति को अवरुद्ध कर देती है, चारों ओर अव्यवस्था का साम्राज्य छा जाता है, विरोध रूपी दानव का ताण्डव सर्वत्र दृष्टिगोचर होने लगता है, परिणामत: सामाजिक, धार्मिक,राजनैतिक,नैतिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों में शैथिल्य आ जाता है। उसी समय परिस्थितियाँ किसी एक ऐसी भाषा को जन्म देती हैं जो संपूर्ण विरोधी तत्वों एवं गतिरूद्धता के निमित्तों का परिष्कार करके उसमें पारस्परिक सहयोग, समानता, समंवयता, समायोजित, संकल्पित, समायोजन, संस्कार और सौंदर्य की सुनिर्मित स्वीकारोक्ति का सुगठित सानिध्य समाधान उत्पन्न करती है ।


     मुट्ठी में आकाश को समेटे भाषा रेत की तरह है, जिसे मुट्ठी में संभालकर नहीं रखें तो फिसल जाऐगी। निस्संदेह भावों तथा विचारों का प्रकटीकरण ही भाषा है। भाषा सामाजिक वस्तु है। इसका प्रवाह अविच्छिन्न है। यह सर्व-व्यापक है। सम्प्रेक्षण का मौखिक साधन है । भाषा अर्जित वस्तु है,क्योंकि यह व्यवहार द्वारा अर्जित की जाती है । भाषा सहज और नैसर्गिक क्रिया है। सामाजिक दृष्टि से इसका स्तरीयकरण होता है। यह परिवर्तनशील है क्योंकि यह संयोगात्मकता से वियोगात्मकता की ओर उन्मुख होती है।भाषा स्थिरीकरण और मानकीकरण से प्रभावित होती है। यह पहले उच्चरित रूप में परिवर्तित होती है ।स्वतंत्र ढाॅचा लिए भौगोलिक रूप से स्थानीयकृत होती है। इतना सब होने के बावजूद भी भाषा में न जाने कितनी अर्थों की पर्तों का समागम होता है। न जाने कितने गूढ़ भावों का समंदर हिलोरें लेता रहता है। भाषा तो कवि हृदय की प्रेमिका का नयन बिंदु है। नायिका के अंग-अंग की उज्ज्वल आभा है। नेता का कलात्मक भाषण है तो अभिनेता का सचित्र रंगमंचीय मुद्राओं सहित नृत्य है। यह तो आलोचक की कलम से निकला मोती है, और पत्रकार की लेखनी का ज्वलंत मुद्दा है। कमोबेश सुनने को मिलता है कि यह भारतवर्ष के हिंदी विभाग द्वारा शिक्षित शोधार्थी बेरोजगार की मन की भड़ास है तो वहीं नये-नये यू-ट्यूबर्स की पत्रकारिता की मौलिक विचारोत्तेजना है। फिर भी भाषा शिक्षक के लिए यह उसके पुत्र के समान है। हिंदी भाषा के संदर्भ में यह जन-समूह के हृदय का विकास है। तो उसके शिक्षण पद्धति के संदर्भों में संपूर्ण धरती पर जैसे बीजारोपण के समान है।

*भाषा स्वचरित्र में घुलकर व्यक्ति के व्यवहार और आचरण को चरितार्थ कर चरित्रवान बनाती है।*


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मंगलवार, 12 नवंबर 2024

ईगास पर्व लोक की संस्कृति और संस्कृति के लोक का, सांस्कृतिक प्रतिष्ठा का महापर्व है - ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 ईगास पर्व लोक की संस्कृति और संस्कृति के लोक का, सांस्कृतिक प्रतिष्ठा का महापर्व है - 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी


(दीपावली के 11 दिन बाद मनाना जाने वाले ईगास पर्व पर समस्त उत्तराखंड प्रदेशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं)

ईगास उत्तराखंड की समृद्ध लोक सांस्कृतिक विरासत का महापर्व है।


श्रीराम चंद्र जी के लौटने की सूचना देरी से मिलने पर -

(मान्यता है कि श्रीराम के वनवास से अयोध्या लौटने पर लोकमानस ने कार्तिक कृष्ण अमावस्या को दीये जलाकर उनका स्वागत किया था। परंतु गढ़वाल-कुमाऊं क्षेत्र में श्री राम के लौटने की सूचना दीपावली के ग्यारह दिन बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी को मिली।)


लोक मान्यताएं एवं लोक विश्वास -(गढ़वाल-कुमाऊं क्षेत्र में)


1- क्षेत्रीय ग्रामीणों ने अपनी प्रसन्नता प्रकट करते हुए एकादशी को ईगास के रूप में दीपावली का उत्सव मनाया।

2- अन्य के अनुसार ठीक इसी वक्त गढ़वाली वीर माधो सिंह भंडारी के नेतृत्व में गढ़वाल की सेना ने दापाघाट, तिब्बत का युद्ध जीतकर विजय प्राप्त की थी। दीपावली के बाद ठीक ग्यारहवें दिन गढ़वाली सेना अपने घर पहुंची थी। युद्ध जीतने और सैनिकों की वापसी अर्थात घर पहुंँचने की प्रसन्नता में उस समय दीपावली का ज्योति पर्व ईगास के रूप में मनाया गया।

3 आज हरिबोधनी एकादशी भी है । आज ही ईगास पर्व के दिन श्रीहरि शयनावस्था से जागृत होते हैं। आज के ही दिन विष्णु पूजा का भी विधान है। 

4- एक अन्य दृष्टि कि उत्तराखंड में कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से ही दीप पर्व शुरू हो जाता है, जो कि कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी हरिबोधनी एकादशी तक चलता है। सभी देवी-देवताओं ने इस दौरान पालनहार भगवान विष्णु की पूजा की। क्योंकि आज विष्णु भगवान जागृत हुए इसीलिए ईगास पर्व को देवउठनी एकादशी भी कहा जाता है। 

5- वैसे इसे ही ईगास-बग्वाल भी कहा जाता है।

6- एक अन्य नाम लोकपर्व ईगास यानी बूढ़ी दीपावली भी कहा जाता है।


कार्यक्रम -

(सांस्कृतिक लोक दृष्टि)-

1- इस दिन भैलो खेल (आग का खेल) होता है । 

2- इस दिन गोवंश की पूजा-अर्चना करते हैं।

3- कार्यक्रम द्वारा लोक संस्कृति के संरक्षण और क्षेत्रीय एकता का संदेश दिया जाता है।

4- ईगास पर्व केदार-मानस की सांस्कृतिक पृष्टभूमि का लोक पर्व है ।

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

Fb-Chandra Tewari 



रविवार, 15 सितंबर 2024

Nationalism gives strength to conduct - Dr. Chandra Kant Tewari

Nationalism gives strength to conduct 

©Dr. Chandra Kant Tewari  (Assistant Professor) Govt P G COLLEGE THALISAIN  - PAURI GARHWAL - UTTARAKHAND 

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 The foundation of Indian culture and Indian knowledge tradition is nationalism, the feeling of dying for the nation, the feeling of sacrificing everything and becoming a world conqueror, the feeling of molding Indian culture, tradition and modernity in language, literature and cultural conduct and at the global level. But the feeling of making one's own stability can be seen as "Nation is the only option above all".


First of all, I am a common man from Bharat. I know how to repay the debt of my tradition and soil by giving place to the awakening song of India's cultural traditions in the heart temple. I am an ordinary person from Bharat and want to spread the sound of Hindutva in the whole world.


I am made of the soil of God's birthplace. I am made of the touch of every person of Bharat, the workers, the youth, the mother who gave birth, the sensitivities that provide unbreakable trust in relationships, the earth, fire, air, sky and the touch of Mother Ganga that provides salvation to life. . That is why I am an ordinary person of Bharat and am always ready to sacrifice for the nation while doing extraordinary work.


“Me for my country” is the only aim of my life. We have to move forward with the development journey of modern society, keeping our ancient culture intact. We have to recognize ourselves.


We should not forget who we were? Our past was glorious and rich. We were rich in character. Our country and countryside have always been rich in character. Many students are spreading knowledge and science in their countries by taking education from our country. India is a country of Guru tradition. Foot journeys have been undertaken here by saints like Guru Nanak Ji for the development of humanity.


We saw God in the stone and worshiped him. He kept Ganga in his head and gave her the status of mother. We worship the sun, moon and stars. This is our Bhartiya knowledge tradition. We have established all the principles and objectives of life on the formula “Atithi Devo Bhava”. Vedas, Upanishads and epics all present glimpses of Bhartiya knowledge tradition and national spirit. This is our nationality.


This is what gives us new energy and vibrancy with the inspiration of being Bhartiya. This is an ocean of sensations. Taking this ocean to heart, we will have to contribute our 100 percent towards the Indian nation, only then we will be able to establish justice towards the nation and every Bhartiya.


Bhartiya nationalist poets call for such heroes who sacrifice their lives for the service of the nation, who always remain in the front line for the service of the country by getting emotionally attached to the motherland. The call of such brave men is going to take the country on the path of progress and development. If the country has to develop, every person will have to contribute his 100 percent. We will have to move forward with the spirit of sacrificing everything for the motherland.


Calling upon us to have a self-motivated, self-disciplined and self-cultured spiritual consciousness which helps in the development journey of the organization while being disciplined by the mother, motherland and mother tongue, and to remain happy even in adverse circumstances and sacrifice everything for the nation. Work will have to be done taking the feelings into consideration.


Being Bhartiya, I inspire people to sacrifice everything for the country and appeal to the Bhartiya people to always remain dedicated to the unity, sovereignty and integrity of the country. This is the true national religion. Religion is supreme.



Language, literature, culture and religion continuously control, discipline, reconstruct and revive the society. It integrates the society into a single thread by combining cultural traditions and religious sentiments of spirituality. Establishes a distinction between moral and immoral. Constantly searching for the character of ideal humanity.


These are the four chapters of life society. We all find these four pillars within us. For the unity and nationalism of the nation, it is necessary to have the above mentioned four pillars. Life can be enriched only through language, literature, culture and religion. All elements merge in religion. Religion is the foundation of conduct. Conduct keeps religion alive for ages.


Religion is the inner language of life. Religion is a matter of philosophy, not of demonstration. If a determined person does not develop a sense of belonging towards the nation by taking a handful of soil, does not have goodwill for his nation, then it is useless to have such a person. Such a thinking man with limited limits is himself thoughtless. Whose borders are incapable of even protecting the country's borders.


Civility of conduct makes a person civilized. But before that a person has to revive his own thoughts through religious spirituality and cultural awareness. Culture can also be great only when religion remains action-oriented and moves on the steps of progress.

Religion is a natural quality of human nature. This is nature given. We can never turn away from religion. As long as we are living on this earth, we are performing Dharma directly and indirectly. Because religion is the true character of faith and belief. Religion provides strength to a person. True religion is inspired by national sentiments and has the dream of sacrificing everything for the nation. It makes an ordinary person extraordinary. To keep it revived, alive and vibrant, a person has to set high ideals and goals. It is sacred and vast like the Himalayas, a symbol of courage and juicy mysteries.

A person who is perfect in religious conduct achieves a vision of God also. The pain of the society and the concern of the society always remain in the heart of such a person. Ultimately the moral character of religion lies in service to the nation.


Nationalism inspired by national sentiment is also a combination of language, literature, culture and religion. This is the ideology of language. It is the written form of literature. Culture is a coordinated form of civilizations and traditional knowledge. The philosophy and integration of religion is an authentic document of human concerns driven by spiritual practice. Religion is paramount and spiritual images have a moral character. Because it is a coordinated form of emotion, action and knowledge.


Religion makes a person's personality a Yogi. The spiritual form of religion helps a person to behave decently. At the same time, the practical form of religion teaches us to remain connected to the world of life. Having God and having religion is the same thing, there is not much difference.


There is no certificate of nationalism. This is the result of service to the country and 100% work in the field. When a person controls his society by connecting with his environment and increases the prestige of his province, then religion is working in a positive direction.

Sanskar is the primary school of culture. Decides the direction and condition of life in small infants. It can be said that the primary basis of education flourishes and blossoms in values only. By giving direction to values in small newborn babies, we are completing the conduct of religion itself.

..©Dr.CK Tewari 


बुधवार, 11 सितंबर 2024

भाषा का सामाजिक व्यवहार - ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

भाषा का सामाजिक व्यवहार - 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत 

शब्दों का असर और प्रभाव सामाजिक व्यवस्था और साधारण जन-जीवन में लम्बे समय तक बना रहता है। शब्दों की ध्वनि प्रत्यक्षदर्शियों को परोक्षरूपेण प्रभावित करती रहती है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भाषा ही व्यक्ति के व्यक्तित्व को तेज और निस्तेज, आकर्षित और प्रतिकर्षित, कर्मवीर और कर्महीन बनाती है। व्यक्ति के कर्मों की ध्वनि शब्दों से ऊंची होती है। शब्द और व्यावहारिक आचरण ही व्यक्ति को कर्मवीर बनाता है। मनुष्य जीवन और भाषा का घर दीवारों और ईट गारे से ही निर्मित नहीं होता है। घर तो बनता है मन की समृद्धि से, अपनत्व के भाषिक संगठन से। घर की समृद्धि से कहीं अधिक मन की समृद्धि बहुत बड़ी चीज है। मन की समृद्धि के लिए दूसरे के सुख में अपने सुख को तलाश करना पड़ेगा और दूसरे के दुख में सहभागी बनना पड़ेगा। कुल मिलाकर समृद्धि का भाव तभी जागृत होगा जब सुख के साथ-साथ दुख का भी बराबर में हिस्सा हो। दूसरे के तवे में रोटी सेंकने का भाव त्यागना होगा तो वहीं बहती गंगा पर डुबकी मारने का विचार कर्तव्यबोध से विमुख बनाता है। हमें राजनीति के जंगल में घुसकर दंगल करने की आवश्यकता नहीं। राजनीति घने जंगल का रास्ता है जिसमें साधारण व्यक्ति अपने घर का मार्ग तलाश कर रहा होता है। जीवन एक फूल है और प्रेम उसकी सुगंध। हम जैसे फूल उगाएंगे हमें वैसी सुगंध मिलेगी। हम जिस दुनिया में रहते हैं वहां नागफनी के कांटे हैं तो गुलाब के फूल भी हैं। हमारे गुलाब में कांटे भी हैं परंतु यह कांटे गुलाब की रक्षा के लिए ही होते हैं। प्रकृति ने हर खूबसूरत वस्तु को नैसर्गिक सुरक्षा प्रदान की है। परंतु हमें काले और गोरे रंग का भेद नहीं करना चाहिए। प्रकृति में भी काली और गोरी नदियां बहते हुए संगम में एक साथ पुनः मिल जाती हैं। बड़े-बड़े महासागरों में गर्म और शीतल जलधारा आपस में मिलकर कई जीवों का निवास स्थान होती हैं। परंतु जीवन का एक सत्य यह भी है कि छोटी मछलियां बड़ी मछलियों का ही आहार बनती हैं। राजनीति भी समुद्र की उस मछली के समान है जिसको हजम करना इतना आसान नहीं है। देश को चलाना साधारण व्यक्ति का असाधारण कार्य होता है। असाधारण होने के बाद भी व्यक्ति साधारण बना रहे तो वही व्यक्ति देश का नेतृत्व और संपूर्ण विश्व में प्रेम और आदर्श स्थापित कर सकता है। यही भाषा का सामाजिक व्यवहार है। जिसका आधार मनोवैज्ञानिक है। भाषा के सकारात्मक बिंब व्यवहार में उतर जाएं तो व्यक्ति ईश्वरीय गुणों से संपन्न हो जाता है। वहीं भाषा के नकारात्मक बिंदुओं को अगर हृदय में निवास दिया तो सामाजिक आघात और निजी हृदयाघात दोनों ही सामाजिक व्यवस्था को क्षतिग्रस्त करेंगे। यह हमारी पात्रता होगी कि हम किसका चयन करें और किसका त्याग।

गुरुवार, 4 जुलाई 2024

भाषा की शक्ति और सामर्थ्य- ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 सृजनात्मक लेखन कला 👆👇

भाषा की शक्ति और सामर्थ्य-

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


किसी भी देश की शक्ति उसकी भाषा में निहित होती है। अपने देश की भाषा, स्वदेशी, क्षेत्रीय एवं आंचलिक अर्थात मातृभाषा बोलने वालों के क्रियाकलापों-गतिविधियों की सतत, संवेदनाओं में निहित होती हैं। जो देश अपनी भाषा का सम्मान करता है, वही देश अपनी भाषा की जीवंतता को भी वास्तविक स्तर पर आत्मसात करता है। वह राष्ट्र अपनी जड़ों से हमेशा जुड़ाव महसूस करते हुए अपने पैतृक स्थान से पलायन नहीं करता अपितु अपनी बोली के साथ-साथ अपने लोगों को भी प्रेम करता है। यह प्रेम अपनी मातृभाषा के प्रति समर्पण के भाव रखने का एकमात्र विकल्प दर्शाता है। वह राष्ट्र सर्वशक्तिमान होता है जो अपनी मिट्टी से गहराई से भावात्मक स्तर पर जुड़ा हुआ होता है। ऐसा राष्ट्र हमेशा मातृभूमि की लड़ाई अपनी मातृभाषा में लड़ने का सामर्थ्य रखता है। सच्चा मातृभाषी-राष्ट्रवादी-राष्ट्रभक्त- राष्ट्रसैनिक जब दुश्मन पर अपनी तलवार से प्रहार करता है तो वह पहला प्रहार मातृभूमि की रक्षा के लिए मातृभाषा द्वारा ही करता है। उसकी मातृभाषा द्वारा किया गया कार्य जोश एवं उत्साह से भरपूर शक्ति से संपन्न होता है। मातृभाषा द्वारा किया गया यह प्रहार और कर्तव्य-पाठ का पुनर्पाठ, स्वराष्ट्र की विजयश्री का जयघोष स्थापित करने वाला, शंखनाद की भांति कीर्तिश्री का विजय स्तंभ स्थापित करता है। मातृभाषा की शक्ति और सामर्थ्य अतुलनीय है। अपनी भाषा के प्रति प्रेम, सद्भाव, अपनत्व, सम्मान और समर्पण का भाव ऐसा हो कि जिस तरह जड़ों का मिट्टी से और हिमालय का नदियों से लगाव होता है। मातृभाषा के पुष्प का आदर और व्यावहारिक स्तर पर जीवंतता, शिक्षण स्तर पर प्रयोजनमूलकता एवं रोजगार के अवसर अन्य भाषा से अलगाव करके नहीं अपितु सद्भाव की भावना के साथ, अपनी मातृभाषा को विकसित और पल्लवित-पुष्पित करके प्राप्त किया जा सकता है।

गुरुवार, 14 मार्च 2024

फूलदेई - लोक पर्व के बहाने *उत्तराखंड की लोक संस्कृति का प्राकृतिक पर्व* ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

 

फूलदेई - लोक पर्व के बहाने 

*उत्तराखंड की लोक संस्कृति का प्राकृतिक पर्व* 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत 

फूलदेई पर्व के दिन बच्चों की मित्र-मंडली थाली को सजाकर उसमें फूल, चावल, गुड़, मिठाई रखकर अपनी बिरादरी और आस-पास के घरों में या अपने क्षेत्र के पूरे गांव में, आसपास घरों में जाकर मुख्य दरवाजे की दहलीज़ पर फूलदेई खेलते हैं अर्थात देहली पर अक्षत और फूल फेंकते हैं और घरों की खुशहाली, शुभ मंगलमय की कामना करते हैं । इस पूरी रस्म के दौरान वे लोकगीत गाते हुए आनंद और खुशी से जितना दोगे उतना ही सही कथन वाक्य को दोहराते हैं। बड़ों को प्रणाम कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। आदर्श चरित्र की निर्माण प्रक्रिया में यह महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय पर्व है।

बच्चों की मित्र-मंडली को सभी लोग खुशी-खुशी चावल, मिठाई, फल, टॉफी और गुड़ के साथ भेंट में रुपये भी देते हैं। कहना ना होगा कि अब पहले के मुकाबले इस पर्व के प्रति बच्चों और बड़ों में अपनापन थोड़ा कम होता जा रहा है । लोग अपने लोक पर्वों को भूल रहे हैं या उन्हें अब यह पर्व महत्वहीन लग रहा है। जिस गांव में लोग पहले स्वयं अपने किशोरावस्था में खुशी-खुशी इस पर्व को खेलते थे, वहीं आज उन्हें समय के साथ-साथ महत्वहीन लगने लगा है। 

बहुसंस्कृति और बढ़ती हुई भूमंडलीकरण की प्रतिस्पर्धा की दौड़ में लोग अपनी जड़ों से पलायन कर रहे हैं । अपने लोक पर्वों से पलायन कर रहे हैं । अपनी लोक संस्कृति से पलायन कर रहे हैं। अपने घर-गांव से पलायन कर रहे हैं। अपनी नैतिकता एवं आचरण की मूल्यपरकता से पलायन कर रहे हैं। स्थिति बहुत ठीक नहीं है ऐसा वह भी मानते हैं जों लोक पर्व को विस्मृत एवं भूल बैठे हैं या याद नहीं करना चाहते। हो सकता है इस कार्य के लिए उनके पास समय शेष ना बचा हो। व्यस्तता ने व्यक्ति की नैतिक मर्यादा, आत्मिक चेतना, स्वच्छंदता, हंसी-खुशी एवं अपनापन, सरलता एवं खुलापन, बोलने की कला व्यवहारिक जीवन कौशल, रिश्ते-नाते सभी में बदलाव कर दिया है। साहब यह भूमंडलीकरण की दौड़ है जहां प्रसन्नचित चेहरे के भीतर भी एक चेहरा छुपा हुआ है। जो न हंसता है, न बोलता है। केवल बिंम मात्र है। शीशे के भीतर प्रतिबिंबित दृश्य।

 किसी जमाने में बच्चों को इस दिन का बेसब्री से इंतजार होता था। बच्चे स्कूल में भी एक दूसरे के ऊपर फूलों से खेल लिया करते थे। परंतु आधुनिकता और परंपरा के मध्य का सेतु थोथी नैतिकता की समाजिकता का शिकार बन गया और हमने लोक पर्व को ही नहीं खोया बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत का भी गहरा नुकसान कर दिया। आजकल के बच्चे मोबाइल में गेम खेलने या फिर अपनी पढ़ाई में इतने व्यस्त रहते हैं कि वे लोकपर्वों के महत्व से वंचित हो चुके हैं और ऐसे पर्वों को पिछड़ेपन के प्रतीक के रूप में देखने लगे हैं।

हालांकि बसंत ऋतु के आगमन पर फूलदेई का त्यौहार मनाया जाता है। फूलदेई के लिए बच्चे एक दिन पहले से ही रंग-बिरंगे फूल तोड़कर ले आते थे । उसे टोकरी या फिर थाली में चावल लेकर सभी के घरों में फूलदेई के लिए जाते थे । इसके बाद उन्हें चावल, गुड़, टॉफी या फल रुपये दिए जाते थे । बच्चे जब फूलदेई को आते थे, तो वह फूलदेई का गीत भी गाते थे,  

जैसे - 

‘फूलदेई छम्मा देई, दैणी द्वार भर भकार’।

'फूलदेई छम्मा देई, जतुक देय्ला उतुक सई'।


इस पर्व के प्रति बच्चों में काफी उत्साह देखने को मिलता था पर अब शायद....!!

मैं बचपन से ही फूलदेई मनाता रहा हूंँ । आज किसी बच्चे को अगर फूलदेई मनाते देखाता हूंँ तो स्वयं को पुरानी स्मृति से जोड़ पाता हूंँ। स्मृति पद-चिन्ह लौटते ज़रूर हैं।

इस दिन के आनंद का इंतजार एक वर्ष से करता रहा हूंँ । परंतु अब शायद लोगों के और अपने रिश्तेदारों के घरों में ना जाकर देवी-देवता के मंदिर में पुष्प अर्पित कर मन ही मन अभी भी कहता हूंँ कि.....👇

'फूलदेई छम्मा देई, दैणी द्वार भर भकार’।

'फूलदेई छम्मा देई, जतुक देय्ला उतुक सई'।


आत्म मंथन भी जरूरी है...👇

क्या हमें अपने लोक पर्व को बाजार की संस्कृति और लोगों के हृदय से नहीं जोड़ना चाहिए ?

क्या हमें ऐसे लोक पर्वों के दिन सांस्कृतिक उत्सव और मित्र-मंडली के साथ कुछ पल समय व्यतीत नहीं करना चाहिए ?

क्या हमें इस दिन छोटे बच्चों और किशोरावस्था के नवयुवकों को मिठाई और फल नहीं देना चाहिए ?

यह लोक पर्व रचनात्मकता एवं सृजनात्मकता का प्रतीक है।

लोक की संस्कृति और संस्कृति का लोक भविष्य का उज्ज्वल आलोक है।

भक्ति, श्रद्धा, अपनत्व एवं सहजता सभी सहृदयता के प्रतीक चिन्ह हैं।

नैसर्गिक प्रवृति के लिए कागज के पुष्पों की नहीं अपितु प्रकृति के प्रांगण के पुष्पों की आवश्यकता है। 

ऐसे कई महत्वपूर्ण बिंदु हैं जिस पर विचार-मंथन की आवश्यकता है। निर्णय परिपक्वता से बनेगा तभी दीर्घ काल तक चलेगा.!

हम अगर अपने लोक पर्वों की रक्षा करेंगे तो लोक पर्व हमारी संस्कृति और धर्म की रक्षा करेंगे। हमारे लोगों की रक्षा करेंगे।


गुरुवार, 22 फ़रवरी 2024

(21 फरवरी)-अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस* के अवसर पर- (मांँ, मातृभूमि, मातृभाषा ) डॉ चंद्रकांत तिवारी

 *(21 फरवरी)-अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस* के अवसर पर- (मांँ, मातृभूमि, मातृभाषा )


यूनेस्को मातृभाषा को विशेष स्थान देता है। यह 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस के रूप में मनाता है। (यूनेस्को) संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन प्रतिवर्ष 21 फरवरी को भाषाई सांस्कृतिक कार्यक्रम विविधता पूर्ण विषयों के साथ-साथ बहुभाषावाद संबंधी विषयों को भी बढ़ावा देने के साथ-साथ जागरूकता फैलाने का कार्य भी करता आ रहा है। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की घोषणा यूनेस्को द्वारा नवंबर 1999 में की गई थी। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के लिए वर्ष 2022 का विषय *'बहुभाषी शिक्षण के लिए तकनीकी का प्रयोग- चुनौतियां और अवसर'* रखा गया था। इस बात को कहने में अतिशयोक्ति न होगी कि संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2022 से 2032 के बीच की (10 वर्षों की) समयावधि को स्वदेशी भाषाओं के अंतर्राष्ट्रीय दशक के रूप में चिह्नित किया है।


अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 2020 का विषय *'सीमाओं के बिना भाषाएँ '* था। थीम सीमा पार भाषाओं पर केंद्रित है और स्वदेशी विरासत को संरक्षित करने में मदद करती है।


2021 की विषय *'शिक्षा और समाज में समावेश के लिए बहुभाषावाद को बढ़ावा देना'* था।


2022 की विषय *'बहुभाषी शिक्षा के लिए तकनीक का उपयोग: चुनौतियां और अवसर'* था जबकि ...


*"अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस वर्ष 2023 का थीम ' बहुभाषी शिक्षा - शिक्षा को बदलने की आवश्यकता' विषय पर केंद्रित है।"*


अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 2024 का विषय *'बहुभाषी शिक्षा - सीखने और अंतर-पीढ़ीगत शिक्षा का एक स्तंभ' है।* इस वर्ष इसका 25वां संस्करण आयोजित किया जा रहा है। 


मातृभाषा की मदद से न केवल क्षेत्रीय भाषाओं के बारे में जानने-समझने में सहायता मिलती है, बल्कि एक-दूसरे से बातचीत करना भी आसान हो जाता है।

इस बात में कोई भी शक नहीं कि किसी भी देश की शक्ति उसकी भाषा में निहित होती है। अपने देश की भाषा, स्वदेशी, क्षेत्रीय एवं आंचलिक अर्थात मातृभाषा बोलने वालों के क्रियाकलापों-गतिविधियों की सतत, संवेदनाओं में निहित होती हैं। जो देश अपनी भाषा का सम्मान करता है, वही देश अपनी भाषा की जीवंतता को भी वास्तविक स्तर पर आत्मसात करता है। वह राष्ट्र अपनी जड़ों से हमेशा जुड़ाव महसूस करते हुए अपने पैतृक स्थान से पलायन नहीं करता अपितु अपनी बोली के साथ-साथ अपने लोगों को भी प्रेम करता है। यह प्रेम अपनी मातृभाषा के प्रति समर्पण के भाव रखने का एकमात्र विकल्प दर्शाता है। वह राष्ट्र सर्वशक्तिमान होता है जो अपनी मिट्टी से गहराई से भावात्मक स्तर पर जुड़ा हुआ होता है। ऐसा राष्ट्र हमेशा मातृभूमि की लड़ाई अपनी मातृभाषा में लड़ने का सामर्थ्य रखता है। सच्चा मातृभाषी-राष्ट्रवादी-राष्ट्रभक्त- राष्ट्रसैनिक जब दुश्मन पर अपनी तलवार से प्रहार करता है तो वह पहला प्रहार मातृभूमि की रक्षा के लिए मातृभाषा द्वारा ही करता है। उसकी मातृभाषा द्वारा किया गया कार्य जोश एवं उत्साह से भरपूर शक्ति से संपन्न होता है। मातृभाषा द्वारा किया गया यह प्रहार और कर्तव्य-पाठ का पुनर्पाठ, स्वराष्ट्र की विजयश्री का जयघोष स्थापित करने वाला, शंखनाद की भांति कीर्तिश्री का विजय स्तंभ स्थापित करता है। मातृभाषा की शक्ति और सामर्थ्य अतुलनीय है। अपनी भाषा के प्रति प्रेम, सद्भाव, अपनत्व, सम्मान और समर्पण का भाव ऐसा हो कि जिस तरह जड़ों का मिट्टी से और हिमालय का नदियों से लगाव होता है। मातृभाषा के पुष्प का आदर और व्यावहारिक स्तर पर जीवंतता, शिक्षण स्तर पर प्रयोजनमूलकता एवं रोजगार के अवसर अन्य भाषा से अलगाव करके नहीं अपितु सद्भाव की भावना के साथ, अपनी मातृभाषा को विकसित और पल्लवित-पुष्पित करके प्राप्त किया जा सकता है।


सादर 🙏

©डॉ चंद्रकांत तिवारी

उत्तराखंड प्रांत

सोमवार, 25 दिसंबर 2023

विरासत के आयाम- ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी-उत्तराखंड प्रांत

 विरासत के आयाम-

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी-उत्तराखंड प्रांत 

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भारत की सांस्कृतिक परंपरा की पृष्ठभूमि की नींव में भारतीयता विद्यमान है। भाषा, साहित्य और संस्कृति किसी भी राष्ट्र की आधारशिला होती है। यह राष्ट्र को नींव के पत्थर की तरह मजबूत आधार प्रदान करती है। भारत की सांस्कृतिक परंपरा प्रत्येक हृदय में राष्ट्रवादी भावनाओं को लेकर निर्मित होती रही है और होती रहेगी। यह संस्कृति हमें राष्ट्र की मिट्टी से जोड़ती है और जो समाज मिट्टी की सुगंध से निर्मित होता है वही अपने राष्ट्र से प्रेम करता है। उसकी संस्कृति वर्षों तक वैश्विक स्तर पर गूंजती है।


भारत विश्‍व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक है। जिसकी विविधता और समृद्धि सांस्‍कृतिक विरासत में निहित है। इसके साथ ही यह अपने-आप को बदलते समय के साथ ढ़ालती भी आई है। आज़ादी पाने के बाद भारत ने बहुआयामी सामाजिक और आर्थिक प्रगति की है। भारत शिक्षा, चिकित्सा और कृषि में धीरे -धीरे आत्‍मनिर्भर बन रहा है।अब दुनिया के सबसे औद्योगीकृत देशों की श्रेणी में भी भारत की गिनती की जाती है।आज भारत शेष एशिया महाद्वीप से अलग दिखता है। जिसकी विशेषता पर्वत और समुद्र ने तय की है और ये इसे विशिष्‍ट भौगोलिक पहचान देते हैं। उत्तर में बृहत् पर्वत श्रृंखला हिमालयी संपदाओं से घिरा है। पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर तथा दक्षिण में हिन्‍द महासागर इसकी सीमा को निर्धारित करते हैं।


भारत की राष्‍ट्रीयता की व्‍यापकता, एक आधार वाक्‍य है। जिसके कारण देश को मात्र एक राष्‍ट्र-राज्‍य के रूप में देखने के बजाए बड़ी विश्‍व सभ्‍यता की आधार शिला के रूप में देखा जाता है।


प्राचीन समय से ही, भारत की आध्‍यात्मिक भूमि ने संस्‍कृति धर्म, जाति, भाषा इत्‍यादि विविध आयामों को प्रदर्शित किया है। जाति, संस्‍कृति, धर्म इत्‍यादि की यह विभिन्‍नता अलग-अलग धर्मों और सम्प्रदायों, जातीय वर्गों, के अस्तित्‍व की गवाही देती है, जो यद्यपि एक राष्‍ट्र को नियंत्रित करती है। भारत की आंतरिक विभिन्न बोलियां, क्षेत्रीय सीमाएं, इन जातीय वर्गों, संस्कृतियों, परिवेश को उनकी अपनी सामाजिक व सांस्‍कृतिक पहचान के आधार पर भेद करने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाती है।


जीवन के यथार्थ दृश्यों को हम किस रूप में देखते हैं, किस रूप में महसूस करते हैं, महसूस करने के बाद क्या हम उन साक्षात दृश्यों/वस्तुओं से अपनेपन का लगाव रख पाते हैं? ऐसा लगाव जो हमें बार-बार अपनी ओर आकर्षित करता हो। हमारे मन की रिक्तता को पूर्ण करता हो। हमारे जीवन के अवकाश को इंद्रधनुषी रंगों से भर देता हो। हमारी विषम और कठिन बनती जा रही जीवनशैली को सरल और सहज बना देता हो। हमारी कम पड़ती श्वांसों के मध्य रक्त का संचार करता हुआ जीवन की लालिमा के नए दृश्यों को उभरता हो।


भारत विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों का संगम है। भारत की संस्कृति का मूल आधार विभिन्नता में एकता, सर्वधर्म समभाव की संस्कृति की परंपरा का द्योतक होना है। एक भाषा ने यहां सबको एक सूत्र में स्थापित किया है। वह है हिंदी जिसे बहुसंख्यक लोग बोलते हैं और उसे भारत की राष्ट्रभाषा मानते हैं। इस राष्ट्रभाषा ने भारतवासियों को सांस्कृतिक परंपरा और यहां के साहित्य से जोड़ कर रखा है। लेकिन हिंदी राजभाषा है तथा भारत के अधिकांश नगरों व शहरों में बोली जाती है। प्रत्येक भाषा अपने प्रांत, अपने राष्ट्र की, अपनी सांस्कृतिक विरासत की पहचान होती है। यही संस्कृति और परंपरा का सेतु भी।


हिमालय से हज़ार गंगा निकलती हैं। हिमालय के विशाल अमृत सागर से हजार धाराएं लोक मानस के कंठ को भिगोती हैं। दिव्य हिमालय सा सतगुरु का व्यक्तित्व होता है। विशाल हिमालय से असंख्य धाराएं जब निकलती हैं तो विद्यार्थी की तरह निर्मल समाजसेवी बनकर भावी समाजिक परिधि को गति प्रदान करने में सक्षम होती हैं।


गीता में कर्म योग का संदेश मनुष्य को भौतिक जगत में जीने की प्रेरणा देता है। आज संपूर्ण समाज के समक्ष अगर कोई व्यक्ति बुरी आत्माओं की परिधि में स्वयं कैद हो जाता है तो गीता का संदेश उसका मार्गदर्शन तय करता है। यह वही संदेश है जो अर्जुन जैसे गांडीवधारी वीर धुरंधर योद्धा को रणक्षेत्र में अग्निकुंड के समान वीर पुरुष बना देता है। यह भारतीय चिंतन परंपरा का ही ज्वलंत प्रमाण है कि व्यक्ति लक्ष्य विहीन होने के बावजूद भी सकारात्मक जीवन दृष्टि को धारण करते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सक्षम होता है। यह साधारण बात तो है परंतु इस साधारण बात के भीतर भारतीय चिंतन परंपरा की असाधारणता गहराई से अपनी जड़े जमाई हुई है।

शुक्रवार, 10 नवंबर 2023

शिक्षा में प्रकृति और स्थानीयता- ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 शिक्षा में प्रकृति और स्थानीयता-

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

 An examination-free, practical and hands-on curriculum will have to be created which will make the students proficient and proficient in theoretical as well as professional skills. To make students self-confident and self-reliant. Their hands can work naturally. Can get speed. Get active. Can get experience and touch. Some work has to be done so that the student passing out of school can easily earn his living.👆


👇The developmental structure of experts, researchers, innovations and organizations will have to be identified in the country through special natural education study and teaching from primary level to higher education.👆


👆👆If we are not including nature education in educational institutions today then it does not bode well for our future. This will also be painful for our life.👆👆


प्राकृतिक शिक्षा का एक अन्य मुख्य आधार सामान्य जनमानस को पर्यावरणीय एवं प्राकृतिक शिक्षा देना भी है। क्योंकि कम ज्ञान के कारण सामान्य जनमानस द्वारा भी पर्यावरण को अधिकांश रूप से क्षति पहुंचाई जाती है। हमारा साधारण एवं स्थानीय जनमानस अगर पर्यावरण संरक्षण को समझेगा तो प्रकृति की धरोहर सुरक्षित एवं संवर्धित रह पाएगी। इस संबंध में सूचना एवं तकनीकी द्वारा, डिजिटल माध्यम द्वारा, इंटरनेट मीडिया द्वारा, ऑनलाइन शिक्षण द्वारा, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के द्वारा, टेलीकम्युनिकेशन द्वारा, सभी सूचना तकनीकिओं का इस्तेमाल करते हुए, स्थानीय भाषा में, लोक गीतों में, नुक्कड़ नाटकों द्वारा पोस्टरों द्वारा, चौपालों द्वारा, कठपुतलियों के खेलों द्वारा, सोशल यूटिलिटी प्रोडक्टिव वर्क के माध्यम से, आंगनवाड़ी द्वारा, ग्राम सभाओं द्वारा, ब्लॉक स्तर द्वारा, जिले स्तर पर डीएम द्वारा एवं स्थानीय वॉलिंटियर्स द्वारा जागरूकता बनाते हुए राज्य स्तरीय एवं केंद्र स्तरीय मूल्यांकन एवं आंकलन किया जा सकता है। 


पर्यावरण शिक्षण एवं प्रकृति का अध्ययन नैतिक शिक्षा के केंद्र में होना चाहिए। इस बात में कोई शक नहीं रह जाता कि पर्यावरणीय अध्ययन का मूल्यांकन बहुत जरूरी है। यह मूल्यांकन तभी संभव होगा जब प्रकृति का पुनर्मूल्यांकन किया जा सकेगा। क्योंकि प्रकृति के प्रांगण में पर्यावरणीय क्षेत्र, जैव-विविधता, जीव-संरक्षण, जल, जीवन और जमीन निहित है। पर्यावरण की काल्पनिक चारदीवारी के भीतर संपूर्ण प्राणी जगत, प्राणी जगत के समकक्ष समाज और समाज के सापेक्ष परिवार और प्रत्येक परिवार मनुष्यों का एक समूह है। रिश्ते-नाते, भावनाओं का समुच्चय हैं। जो अपनी संपूर्ण गतिविधियों के लिए प्रकृति पर ही निर्भर रहता है। 


हमें प्रकृति की विभिन्न शक्तियों को पहचानना होगा। इसलिए प्रकृति के विविध उपादानों का पुनर्मूल्यांकन बहुत जरूरी है। मानवता के इतिहास का, उसके उद्भव का, उसके विकास का पुनर्मूल्यांकन बहुत जरूरी है। उसके रहन-सहन का, उसके खानपान का, उसके तीज-त्योहारों का, उसके परस्पर संबंधों का, उसका जीव-जगत, पादप संपदाओं से, आत्मिक संबंधों का पुनर्मूल्यांकन बहुत जरूरी है। हमें प्रकृति को अपने मन के भीतर ढूंढना होगा और अपने मन को दूसरे के मन से मिलाने का भाव रखना होगा। हमें प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करते हुए अपनेपन का एहसास भावात्मक स्तर पर ढूंढना होगा। हमें प्रकृति से भावनात्मक रूप से जुड़ने की जरूरत है। परमार्थ के कल्याण के लिए यथार्थ से लड़ना होगा, वह भी बिना स्वार्थ के। क्या हम ऐसा कर पाएंगे ?


प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक विशेष प्राकृतिक शिक्षा अध्ययन-अध्यापन द्वारा देश में विशेषज्ञों, शोधार्थियों, नवाचारों, संगठनों का विकासात्मक ढांँचा चिंहित करना होगा। छात्रों को अपने परिवेश एवं पर्यावरण का अध्ययन करवाते वक्त हमें अंतरसंबद्धता के सूत्र को पहचानते हुए पर्यावरण का अन्य विषयों से तुलनात्मक अध्ययन-अध्यापन करवाना होगा। कक्षा-कक्ष शिक्षण की पहली शर्त अंतरसंबद्धता के सिद्धांत और स्थानीय-परिवेशगत विविध आयामों पर आधारित होगी तो छात्र-छात्राओं को सीखने के लिए अधिक प्रेरित करेगी। भूगोल, इतिहास, कृषि, सामाजिक विज्ञान, विज्ञान, चिकित्साशास्त्र, साहित्य एवं मानवशास्त्र सभी के केंद्र में पर्यावरणीय नीतियों का समुच्चय है। भाषा तो एक ऐसा साधन है जो व्यक्ति को स्थानीय होने का मौका देती है। स्थानीय गतिविधियों से जोड़ती है। व्यक्ति के व्यक्तित्व को देहाती बना देती है और देहाती को शहरीकृत ढांँचे में ढाल देती है। स्थानीय विषयवस्तु से सांस्कारित हो जाती है और भावनात्मक संबंधों को सतत जोड़ती है। इस प्रकार अगर पर्यावरण का शिक्षण और अध्ययन सहज, सरल एवं प्रकृति की प्रवृत्ति के अनुरूप बनेगा तो मानवीय जनजीवन एवं मानवता का विकास उस विकास की प्रकृति के अनुरूप ही चलता रहेगा। प्रकृति संरक्षण और संवर्धन के संस्कार विद्यार्थी जीवन में विकसित करने होंगे।


एक ऐसा परीक्षाविहीन व्यावहारिक और प्रायोगिक पाठ्यक्रम निर्मित करना होगा जो विद्यार्थियों को सैद्धांतिक पक्ष के साथ-साथ व्यवसायिक कौशलों में भी कुशल एवं पारंगत बनाएं। छात्रों को आत्मविश्वासी , आत्मजीवी बना सकें। उनके हाथों को प्राकृतिक रूप से काम मिल सके। गति मिल सके। सक्रियता मिले। अनुभव एवं स्पर्श मिल सके। कुछ ऐसा कार्य करना होगा जिससे विद्यालय से उत्तीर्ण होकर निकलने वाला विद्यार्थी आसानी से अपना जीवन यापन कर सके। हमें अपने स्कूली पाठ्यक्रम में ढांचागत परिवर्तन करना होगा। कक्षा-कक्ष शिक्षण को स्थानीय संसाधनों से जोड़ना होगा। 


प्रकृति के प्रांगण में ऐसे कई उद्योग हैं। कई कुटीर उद्योग और कई लघु उद्योग विद्यार्थियों को नवजीवन दे सकते हैं। इस बात को सरकार एवं प्रशासन को समझना होगा। पर्यावरण शिक्षा का केंद्र पाठ्यक्रम ही नहीं है। किताबी ज्ञान ही नहीं है। उससे बढ़कर भी बहुत कुछ है। परंतु हम पर्यावरण शिक्षा को मात्र पाठ्यक्रम तक ही समाहित करके चल रहे हैं। हम अपने छात्रों को पर्यावरण संबंधी ज्ञान तो रटा देते हैं परंतु व्यावहारिक एवं प्रायोगिक स्तर पर हम उन्हें प्रकृति के साथ जोड़ने में नाकाम रहे हैं। जब तक हम अपने छात्रों को प्रकृति के विभिन्न आयामों से नहीं जोड़ेंगे, कृषि एवं सहकारिता, पशुपालन, मौन पालन, मत्स्य पालन, मुर्गी पालन, भेड़ पालन इसी तरह के अन्य कई लघु एवं कुटीर उद्योग जिससे आजीविका और रहन-सहन सुचारू एवं सरल गति से चल सके यह सब विद्यालयी शिक्षा के केंद्र में होना चाहिए। अगर हम आज शैक्षणिक संस्थानों में प्राकृतिक शिक्षा को शामिल नहीं कर रहे हैं तो यह हमारे आने वाले भविष्य के लिए यह शुभ संकेत नहीं है। यह हमारे जीवन-जगत के लिए भी दुखदाई होगा।


क्रमशः सकारात्मक प्रयास अपेक्षित.....!

गुरुवार, 9 नवंबर 2023

ज़रूरतें युग सापेक्ष---* उत्तराखंड के विकास के लिए -डॉ. चंद्रकांत तिवारी -

 *राज्य स्थापना दिवस 9 नवंबर- सभी को बधाई और शुभकामनाएं*

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*ज़रूरतें युग सापेक्ष---*

 *उत्तराखंड के विकास के लिए -* 


 डॉ. चंद्रकांत तिवारी - 

(उत्तराखंड प्रांत )


उत्तराखंड के विकास के लिए कई प्रमुख मुद्दों पर सरकार को गंभीरतापूर्वक कार्य करना होगा। जिनमें मुख्य रुप से शिक्षितों की बढ़ती बेरोजगारी, विद्यालय और उच्च शिक्षा में गुणवत्ता और सुधार, स्वास्थ्य और चिकित्सा के साथ-साथ महिलाओं की सुरक्षा, शहरी क्षेत्रों में प्रदूषण की गंभीर समस्या, कृषि एवं घरेलू उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए, कौशल विकास मिशन को बढ़ावा, साथ ही एक गंभीर समस्या जो उत्तराखंड की है वह पलायन को लेकर है। यहांँ पलायन कुछ इस कदर है कि गांँव के गांँव खाली हो चुके हैं। आज तक कोई भी सरकार इस दिशा में कोई गंभीर या ठोस प्रयास नहीं कर पायी है। अगर सरकार की ओर से कोई गंभीर प्रयास हो भी रहा है तो वह यथार्थ रूप से सामने नहीं दिखता। सरकार को शिक्षित बेरोजगारों को अपने ही क्षेत्र में रोजगार देकर, घरेलू उद्योगों को स्थापित एवं पुनर्जीवित करके, नए विद्यालय, विश्वविद्यालय बनवाकर, कॉन्ट्रैक्ट शिक्षक की जगह स्थाई नियुक्ति, निष्पक्ष योग्य अभ्यर्थियों का चयन करके, उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति के अनुरूप, नई-नई योजनाएं लाकर पर्वतीय प्रदेशवासियों को आत्मनिर्भर के साथ-साथ आत्मसम्मान से अपनी संस्कृति और परिवेश से जोड़कर रखना है। यही उत्तराखंड के विकास का मूल मंत्र है। कि वह अपनी जड़ों से भी जुड़े रहें और अपने ही क्षेत्र में रोजगार का सृजन भी करें। जिससे पलायन जैसी गंभीर समस्या का निदान हो सकेगा।


For the coming years, the government along with the teachers will have to continuously improve the standard of school education. For this, first of all, qualified teachers and continuous and active energetic teachers have to be selected in the education system. Such teachers who will have to dedicate their moral duty to the interest of the students and first of all the provision of material and educational resources to the school education & higher education system will have to be made 100% accessible by the administration.


In the technological age of ICT, teachers also have to be made proficient. For this, DIET, SCERT, NCERT at the district level for teacher training and in the field of higher education and school education, private institutions, NGOs, Teaching Learning Center can play an important role.


In the field of education, efforts should always be made for a better future at school, college and university level. With this hope and belief...

ग्रामीण क्षेत्रों को केंद्र बनाकर शिक्षा, चिकित्सा, कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों का विकास करके पलायन जैसी गंभीर समस्या को दूर किया जा सकता है।



जय हिन्द

वंदे मातरम्

🕉️🙏

शनिवार, 4 नवंबर 2023

राष्ट्रधर्म और आचरण की शक्ति ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 राष्ट्रधर्म और आचरण की शक्ति 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

भाषा, साहित्य, संस्कृति और धर्म समाज को निरंतर नियंत्रित, अनुशासित, पुनर्निर्मित एवं पुनर्जीवित करते रहते हैं। यह समाज को सांस्कृतिक परंपराओं एवं आध्यात्मिकता की धार्मिक भावनाओं से मिलाकर एकसूत्र में समन्वित करते हैं । नैतिक-अनैतिक में भेद स्थापित करते हैं । आदर्श मनुष्यता के चरित्र को निरंतर तलाश करते रहते हैं।


यह जीवन समाज के चार अध्याय हैं। हम सभी इन चारों आधार स्तंभ को अपने मध्य पाते हैं। राष्ट्र की एकता और राष्ट्रवाद के लिए उपर्युक्त चारों आधार स्तंभों का होना जरूरी है। भाषा, साहित्य, संस्कृति और धर्म द्वारा ही जीवन को समृद्ध किया जा सकता है। धर्म में सभी तत्वों का विलय हो जाता है। धर्म आचरण की आधारशिला है। आचरण धर्म को युगों-युगों तक जीवंत बनाए रखता है।


धर्म जीवन की आंतरिक भाषा है। धर्म तो दर्शन का विषय है, प्रदर्शन का नहीं है। मुट्ठीभर मिट्टी लेकर संकल्पवान अगर राष्ट्र के प्रति अपनेपन का एहसास पैदा नहीं करता, अपने राष्ट्र के लिए सद्भावना नहीं रखता, तो ऐसे व्यक्ति का होना व्यर्थ है। सीमित सीमाओं वाला ऐसा विचार पुरुष स्वयं विचारशून्य है। जिसकी सीमाएं देश की सीमाओं की रक्षा करने में भी असमर्थ हैं। आचरण की सभ्यता व्यक्ति को सभ्य बनाती है। किंतु उससे पहले व्यक्ति को स्वयं के विचारों को धार्मिक आध्यात्मिकता एवं सांस्कृतिक जागरण से पुनर्जीवित करना होता है। संस्कृति भी तभी महान हो सकती है जब धर्म कर्माभिमुख होकर प्रगति के सोपानों पर बढ़ता रहे। 


संस्कार संस्कृति की प्राथमिक पाठशाला है। छोटे शिशुओं में जीवन की दिशा और दशा तय करती है। कह सकते हैं कि शिक्षा का प्राथमिक आधार संस्कारों में ही फलता और फूलता है। छोटे नवजात शिशुओं में संस्कारों को दिशा देते हुए हम धर्म का ही आचरण पूर्ण कर रहे होते हैं। धर्म मानवीय प्रवृत्ति का नैसर्गिक गुण है। यह प्रकृति प्रदत्त है। हम कभी भी धर्म से विमुख नहीं हो सकते हैं । जब तक हम इस धरती में जीवन यापन कर रहे होते हैं तब तक हम प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से धर्म का निर्वहन कर रहे होते हैं। क्योंकि धर्म आस्था और विश्वास का साक्षात चरित्र है। धर्म व्यक्ति को शक्ति प्रदान करता है। सच्चा धर्म राष्ट्रीय भावनाओं से प्रेरित होता है और राष्ट्र के लिए सर्वस्व निछावर करने का स्वप्न देखा है। यह साधारण व्यक्ति को असाधारण बनाता है। इसे पुनर्जीवित, जीवित और जीवंत बनाए रखने के लिए व्यक्ति को उच्च आदर्श एवं लक्ष्य स्थापित करने होते हैं। यह हिमालय की तरह पवित्र और विशाल, साहस और रसयुक्त रहस्यों का प्रतीक होता है।


धर्म आचरण से पूर्ण व्यक्ति ईश्वर से भी साक्षात्कार स्थापित कर लेता है। ऐसे व्यक्ति के हृदय में समाज की पीड़ा और समाज की चिंता हमेशा बनी रहती है। अंततः धर्म का नैतिक चरित्र राष्ट्र सेवा में निहित है।


राष्ट्रीय भावना से प्रेरित राष्ट्रवाद भी भाषा, साहित्य, संस्कृति और धर्म का ही गठजोड़ है। यह भाषा की विचारधारा है। साहित्य का लिखित रूप है। संस्कृति रूपी सभ्यताओं और परंपरागत ज्ञान का समन्वित रूप है। धर्म का दर्शन और एकीकरण साधना द्वारा संचालित मानवीय सरोकारों का प्रामाणिक दस्तावेज है। धर्म सर्वोपरि है और आध्यात्मिक बिंबों का नैतिक चरित्र है। क्योंकि यह भाव, क्रिया और ज्ञान का समन्वित रूप है। धर्म व्यक्ति के व्यक्तित्व को योगी बना देता है। धर्म का आध्यात्मिक रूप व्यक्ति को मर्यादित आचरण व्यतीत करने में सहायक है। वहीं धर्म का व्यवहारिक रूप जीवन जगत से जुड़े रहने की शिक्षा देता है। ईश्वर का होना और धर्म का होना एक ही बात है, ज्यादा अंतर नहीं है।


व्यक्ति से ही समाज का निर्माण होता है और समाज ही राष्ट्र की प्रगति एवं तरक्की का सूचक है। राष्ट्रधर्म सर्वोपरि है । राष्ट्र सर्वोपरि है । व्यक्ति का व्यक्तित्व और आचरण की शक्ति ही राष्ट्रधर्म का निर्माण करती है। राष्ट्र के लिए व्यक्ति को निजी रूप से भी शत-प्रतिशत परिश्रम और अपने स्थान पर रहकर निरंतर मेहनत करते रहना चाहिए। यही सच्चा राष्ट्र धर्म है। यही आचरण की शक्ति है।


राष्ट्रधर्म का कोई सर्टिफिकेट नहीं होता है। यह तो देशसेवा और शत-प्रतिशत कर्म-क्षेत्र का प्रतिफल है। जब व्यक्ति अपने परिवेश से जुड़कर अपने समाज को नियंत्रित करते हुए अपने प्रांत की प्रतिष्ठा में वृद्धि करता है तो धर्म अपना क्रमशः सकारात्मक दिशा में कार्य कर रहा होता है।