अपनी भाषा के गीत मधुर
©डॉ. चंद्रकांत तिवारीअपनी भाषा के गीत
किसी कंठ से नहीं,
पीढ़ियों की धड़कनों से जन्म लेते हैं।
उनमें माँ की उँगलियों पर लगी
आटे और हल्दी की गंध है,
खेतों पर झुकते हुए आकाश की नमी है।
जब कोई अपनी भाषा में मुस्कराता है,
धरती अपने भीतर
एक और ऋतु बचा लेती है।
शब्द तब
सिर्फ़ बोले नहीं जाते—
वे जड़ों में उतरकर
मनुष्य को वृक्ष बना देते हैं।
राष्ट्र
सीमाओं से पहले
अपनी भाषा की स्मृति में बसता है।
और कर्म—
जब अपनी मिट्टी की सुगंध से जुड़ते हैं,
तभी इतिहास
भविष्य की ओर चलना सीखता है।
बहुत सुंदर रचना
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