सोमवार, 29 जून 2026

ये दौर भी बीत जाएगा ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

ये दौर भी बीत जाएगा

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

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"आज का मनुष्य और विशेषकर विद्यार्थी ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ छोटी-सी असफलता भी कई बार उसके आत्मविश्वास को तोड़ देती है। प्रतिस्पर्धा, अपेक्षाओं का दबाव, तुलना और त्वरित सफलता की चाह अनेक लोगों को संघर्ष से पहले ही हार मान लेने के लिए विवश कर देती है। ऐसे समय में यह कविता जीवन का एक शाश्वत सत्य सामने रखती है कि प्रकृति का कोई भी सृजन बिना संघर्ष, धैर्य और प्रतीक्षा के पूर्ण नहीं होता। जिस प्रकार बीज अँधेरे में अंकुरित होता है, सोना तपकर निखरता है, नदी चट्टानों से टकराकर अपना मार्ग बनाती है, उसी प्रकार मनुष्य का व्यक्तित्व भी कठिनाइयों, असफलताओं और निरंतर प्रयासों से ही महान बनता है। इस कविता की मूल संवेदना मनुष्य के भीतर आशा, धैर्य, आत्मबल और कर्म में विश्वास जगाना है। इसका मूल संदेश यही है कि जीवन का कोई भी कठिन समय स्थायी नहीं होता; जो संघर्ष से भागता नहीं, वही अपने भविष्य का निर्माण करता है। इसलिए परिस्थितियों से नहीं, अपने साहस और धैर्य से पहचान बनाइए—क्योंकि समय बदलता है, और सचमुच यह दौर भी बीत जाता है।"

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ध्यान रखना—
रात कभी
अपनी ही परछाईं में
सुबह को कैद नहीं कर सकी।

कितनी ही सदियों से
अँधेरा
सूरज की राह में बैठा है,
पर हर भोर
क्षितिज के किसी अदृश्य द्वार से
एक सुनहरी चिड़िया
फिर उड़ आती है।

यह जो समय है—
यह भी नदी है;
पत्थर नहीं।
बहना इसकी नियति है,
ठहरना नहीं।

तुम्हारे भीतर
जो चुप्पी काँप रही है,
वही कल
बाँसुरी का पहला स्वर बनेगी।

देखो—
लोहे को
आग अपना शत्रु नहीं लगती;
वह जानता है,
लाल हुए बिना
हथौड़े की चोट
आकार नहीं देती।

पत्थर भी
छेनी से शिकायत नहीं करता;
वह जानता है,
हर प्रहार के भीतर
एक देवता छिपा बैठा है।

बीज
धरती की अँधेरी कोख में
दफन होकर ही
हरियाली की पहली साँस लेता है।

सीप
रेत के एक छोटे-से घाव को
मोती में बदल देती है।

कोयला
धरती के धैर्य में
दबते-दबते
हीरा हो जाता है।

बादल
समुद्र से बिछुड़कर ही
बरसना सीखते हैं।

नदी
पहाड़ से टकराए बिना
मैदानों का गीत नहीं बनती।

झरना
चट्टानों के घावों से
अपनी हँसी निकालता है।

देवदार
आँधियों की पाठशाला में
ऊँचा होना सीखता है।

हिमालय
बर्फ का बोझ उठाकर भी
आकाश से आँख मिलाता है।

गुलाब
काँटों की गोद में ही
अपनी सुगंध का जन्मोत्सव मनाता है।

कमल
कीचड़ को
अपनी नियति नहीं,
अपनी सीढ़ी बना लेता है।

बाँस
बरसों तक
धरती के भीतर जड़ें बुनता है,
तभी एक दिन
आकाश को छू लेता है।

मिट्टी
कुम्हार के थपेड़ों को
अपमान नहीं समझती;
उसी से
घड़ा बनकर
प्यास बुझाती है।

कपास
धुनकी की मार सहकर
वस्त्र बनती है।

सूत
करघे के तनाव में
अपनी उपयोगिता पाता है।

दीया
जलने की पीड़ा से
रोशनी लिखता है।

मोमबत्ती
पिघलकर ही
अँधेरे का अर्थ बदलती है।

अगरबत्ती
राख होते-होते
सुगंध बन जाती है।

चंदन
घिसे बिना
महकता नहीं।

मेहँदी
पीसी जाए
तभी हथेलियों पर
उत्सव खिलता है।

गन्ना
चरखी में पिसकर
मिठास देता है।

धान
कुटाई के बाद ही
अन्न कहलाता है।

गेहूँ
चक्की में टूटकर
रोटी बनता है।

दूध
उबाल से गुजरकर
सुरक्षित होता है।

सोना
भट्ठी में तपकर
आभूषण बनता है।

काँच
भट्ठी की ज्वाला में
पारदर्शिता पाता है।

मधुमक्खी
हज़ार फूलों की यात्राएँ करके
एक बूँद शहद रचती है।

चींटी
अपने आकार से नहीं,
अपने धैर्य से
पहाड़ नापती है।

मकड़ी
हर टूटा हुआ जाल
फिर से बुन देती है।

झींगुर
रात की सबसे गहरी निस्तब्धता में भी
अपना संगीत नहीं छोड़ता।

जुगनू
अँधेरे से लड़ने के लिए
सूरज होने की प्रतीक्षा नहीं करता।

कोयल
बसंत से पहले भी
अपने गले में
गीत बचाकर रखती है।

प्रवासी पक्षी
दिशाएँ खोकर भी
आकाश पर विश्वास नहीं खोते।

साँप
केचुल छोड़कर ही
नया शरीर पाता है।

इल्ली
अपने ही बनाए खोल में
तितली का स्वप्न बुनती है।

समुद्र
हर ज्वार के बाद
भाटा स्वीकारता है।

चाँद
घटता है
तभी फिर पूर्णिमा बनता है।

सूर्य भी
हर संध्या
डूबने का अभिनय करता है,
ताकि अगली सुबह
उदय का अर्थ बचा रहे।

ऋतुएँ
किसी एक मौसम की
गुलाम नहीं होतीं।

पतझड़
पेड़ों का अंत नहीं,
नई पत्तियों का
गुप्त निमंत्रण है।

सूखी डालियाँ
अक्सर
सबसे हरे मौसम की
पूर्वपीठिका होती हैं।

काई जमी चट्टानों पर भी
जल अपना रास्ता खोज लेता है।

रेगिस्तान
एक ओस-बूँद को
पूरे ब्रह्मांड की तरह सँभालता है।

बिजली
बादलों के संघर्ष से जन्मती है।

इंद्रधनुष
धूप और वर्षा के
मतभेद का समझौता है।

और मनुष्य—

वह भी
टूटकर,
बिखरकर,
ठुकराकर,
हारकर,
रोकर,
जलकर,
घिसकर,
रुककर,
चलकर,
गिरकर,
उठकर—
अपने ही भीतर
एक नया मनुष्य गढ़ता है।

याद रखना—

बुरे लोग भी
कभी-कभी
जीवन के सबसे कठोर शिक्षक होते हैं;
वे बताते हैं
कि प्रकाश का मूल्य
अँधेरे से पूछा जाता है।

विश्वास
कभी बाज़ार में नहीं मिलता;
वह
असंख्य असफलताओं की राख से
उगने वाला वृक्ष है।

आशा
कोई फूल नहीं,
एक जिद्दी जड़ है—
जो चट्टानों के भीतर भी
पानी खोज लेती है।

और समय—

वह किसी का शत्रु नहीं,
किसी का मित्र नहीं;
वह केवल
परिवर्तन का दूसरा नाम है।

इसलिए
अपने भीतर का दीप
हवा से मत डराओ,
अपने भीतर की नदी
पत्थरों से मत रोकना,
अपने भीतर के बीज को
अँधेरे से मत घबराने देना।

क्योंकि—

हर राख में
एक अग्नि की स्मृति बची रहती है।

हर आँसू में
एक समुद्र का साहस।

हर घाव में
एक भविष्य की त्वचा।

हर पतझड़ में
एक अदृश्य वसंत।

हर रात में
एक अनलिखी सुबह।

और हर मनुष्य में—
उसके वर्तमान से
कहीं अधिक विशाल
उसका आने वाला कल।

विश्वास रखो—

यह दौर भी बीत जाएगा।
जैसे हर तूफ़ान बीतता है।
जैसे हर अँधेरा बीतता है।
जैसे हर सर्दी के बाद
धरती फिर हरी हो जाती है।

और तब—
तुम पीछे मुड़कर देखोगे,
तो समझोगे—

तुम्हें बचाया किसी चमत्कार ने नहीं,
तुम्हारे संघर्ष ने।
तुम्हें बनाया किसी भाग्य ने नहीं,
तुम्हारे धैर्य ने।
और तुम्हें आगे बढ़ाया किसी शॉर्टकट ने नहीं,
उस कठिन रास्ते ने,
जिसे पार करते हुए तुमने सीखा था—

"समय ठहरता नहीं...

इसलिए यह दौर भी बीत जाएगा।"

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