अभी आकाश शेष है
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
(कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी भूल यह नहीं होती कि हम हार गए, बल्कि यह होती है कि हम एक हार को ही अपना पूरा जीवन मान बैठते हैं। यह कविता उन सभी लोगों के लिए है जिन्होंने किसी स्वप्न को टूटते देखा है, किसी अपने को खोया है, किसी मंज़िल तक पहुँचने की पूरी कोशिश की है और फिर भी खाली हाथ लौटे हैं। यह कविता कहती है कि अतीत सम्मान के योग्य है, निवास के योग्य नहीं; कि हर बंद दरवाज़ा अंत नहीं, किसी नई दिशा का संकेत भी हो सकता है। यदि आपके भीतर अभी भी संघर्ष करने की एक चिंगारी शेष है, यदि आप गिरकर फिर उठने की कला सीखना चाहते हैं, यदि आप अपने कल की राख से अपने आने वाले कल का सूरज गढ़ना चाहते हैं—तो यह कविता शायद आपके लिए ही लिखी गई है। इसे पढ़िए, अपने जीवन से जोड़िए, और देखिए कि आपके भीतर अभी कितना आकाश शेष है।)
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अभी आकाश शेष है (कविता)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
मत ठहर
उन उजड़े चौराहों पर
जहाँ प्रतीक्षा के वृक्ष
बरसों पहले पत्तियाँ खो चुके हैं।
समय कोई स्मारक नहीं
कि उस पर बैठकर
मनुष्य अपनी पराजयों को
बार-बार पुष्पांजलि देता रहे।
वह तो हिमालय से उतरती नदी है—
एक ही जल को
दूसरी बार छूने का अवसर नहीं देती।
जो बीत गया,
उसे अपनी आत्मा का स्थायी निवास मत बना।
स्मृतियाँ आवश्यक हैं,
पर वे घर नहीं होतीं;
वे केवल दिशा-सूचक दीप हैं,
जिनकी लौ से
आगे का पथ देखा जाता है।
तू उस दरवाज़े का शोक क्यों करता है
जो कभी खुला ही नहीं?
कभी-कभी बंद किवाड़
भाग्य का निषेध नहीं,
दिशा का संकेत होते हैं।
वन में देख—
एक आँधी
सैकड़ों टहनियाँ तोड़ देती है,
किन्तु वसंत
अगले ही मौसम
उसी वृक्ष के भीतर
नई हरियाली का गुप्त समझौता लिख देता है।
समुद्र भी
हर लौटती हुई लहर के लिए नहीं रोता,
उसे ज्ञात है—
वापसी का अर्थ अंत नहीं,
अगले ज्वार की तैयारी है।
जो नहीं मिला
उसे अभिशाप मत कह।
संभव है
वह तेरे जीवन की पुस्तक का
वह अध्याय रहा हो
जिसे पढ़ना आवश्यक था,
जीना नहीं।
हर असफलता
धरती के भीतर दबे बीज जैसी है—
ऊपर से अंधकार,
भीतर से अंकुरण।
जिसे लोग हार कहते हैं,
अक्सर वही
चरित्र का प्रथम प्रारूप होती है।
सुन—
पर्वत की ऊँचाई
उसकी चोटी से नहीं बनती,
उस असंख्य टूटन से बनती है
जिसे वह शताब्दियों तक
अपने भीतर सहता है।
नदी की गहराई
उसकी चौड़ाई से नहीं मापी जाती,
उस साहस से मापी जाती है
जिससे वह चट्टानों के विरुद्ध
अपना मार्ग गढ़ती है।
और मनुष्य?
मनुष्य का मूल्य
उसकी सफलताओं में नहीं,
उसकी पुनः आरम्भ करने की क्षमता में छिपा होता है।
इसलिए
अपने कल की राख में
उँगलियाँ फेरते मत रहो।
राख में इतिहास मिलता है,
भविष्य नहीं।
क्षितिज की ओर देखो।
सूरज प्रतिदिन डूबता है,
फिर भी अगली सुबह
उदय होने की तैयारी छोड़ता नहीं।
चाँद हर महीने क्षीण होता है,
फिर भी अपनी पूर्णिमा पर
संदेह नहीं करता।
वन के बीज
अंधकार से डरते तो
धरती कभी हरी न होती।
तुम भी
अपने भीतर के अँधेरों से मत डरो।
उन्हीं की कोख में
तुम्हारी अगली रोशनी पल रही है।
यदि एक स्वप्न टूट गया,
तो आकाश खाली नहीं हो जाता।
यदि एक दिशा बंद हो गई,
तो पृथ्वी घूमना नहीं छोड़ती।
यदि एक नाव डूब गई,
तो समुद्र यात्रा का विरोधी नहीं बन जाता।
हजारों तट हैं,
हजारों नावें हैं,
हजारों हवाएँ हैं
जो अभी तुम्हारे पक्ष में चलनी शेष हैं।
बस इतना ध्यान रखना—
सत्य तुम्हारी रीढ़ हो,
परिश्रम तुम्हारी प्रार्थना,
ईमानदारी तुम्हारा एकांत,
और धैर्य तुम्हारा सबसे विश्वसनीय साथी।
फिर देखना—
आज जो रिक्तता
तुम्हें एक निर्जन मरुभूमि लगती है,
वही कल
तुम्हारे श्रम की वर्षा से
स्वर्णिम अन्नक्षेत्र बन जाएगी।
उठो।
अभी तुम्हारे भीतर
कई नदियाँ जन्म लेना चाहती हैं।
कई पर्वत
अपनी ऊँचाई तुम्हारे साहस में खोज रहे हैं।
कई आकाश
तुम्हारी उड़ान की प्रतीक्षा में हैं।
और जीवन—
जीवन अभी समाप्त नहीं हुआ है,
जीवन तो अभी
तुम्हारे निर्णय की देहरी पर खड़ा
तुम्हारा नाम पुकार रहा है।
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