सोमवार, 1 जून 2026

श्री राम अब भी लौटते हैं..! (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

श्री राम अब भी लौटते हैं..!  (कविता)


©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


कभी

अयोध्या केवल एक नगर नहीं थी,

वह मनुष्य के भीतर जलता हुआ

विश्वास का पहला दीपक थी।


और श्री राम—

केवल एक राजकुमार नहीं थे,

वे उस दीपक की लौ थे

जो आँधियों में झुकती थी, पर बुझती नहीं थी।


आज भी

जब जीवन की सड़कों पर

स्वार्थ के विज्ञापन चमकते हैं,

श्री राम चुपचाप वन की ओर निकल पड़ते हैं।


प्रिय बंधु!

श्री राम का वनवास चौदह वर्षों का नहीं था,

वह हर उस क्षण का वनवास था

जब सत्य अकेला खड़ा था।

जब सिंहासन सामने था,

और पिता का वचन भी,

श्री राम ने राजमुकुट नहीं चुना,

उन्होंने मनुष्य होने का गौरव चुना।


आज

हम सुविधा के लिए संबंध छोड़ देते हैं,

श्री राम ने संबंधों के लिए

संपूर्ण साम्राज्य छोड़ दिया था।


शहरों में

बहुत से लोग सफल दिखते हैं,

पर श्री राम ने सिखाया—

सफलता से पहले सज्जनता आवश्यक है।

संबंध आवश्यक है..!


वन की पगडंडियाँ

उनके चरणों से नहीं,

उनकी करुणा से प्रकाशित थीं,

जैसे अंधकार स्वयं दीप बन गया हो।


जहाँ-जहाँ वे गए,

वहाँ-वहाँ पेड़ों ने छाया नहीं दी,

मानो प्रकृति स्वयं

मर्यादा के चरण धो रही हो।


शबरी की झोपड़ी में

कोई राजसी वैभव नहीं था,

फिर भी वहाँ प्रेम का वह सिंहासन था

जिस पर स्वयं ईश्वर बैठ गए।


श्री राम ने कभी

भक्ति की जाति नहीं पूछी,

उन्होंने केवल हृदय का स्वाद चखा,

और प्रेम को प्रसाद बना दिया।


आज

लोग चेहरे पढ़ते हैं,

श्री राम ने मन पढ़ा था,

इसीलिए वे सबके अपने हो गए।


केवट की नाव में

केवल नदी पार नहीं हुई थी,

वहाँ मनुष्य और ईश्वर के बीच

एक अनन्त विश्वास पार हुआ था।


हनुमान की आँखों में

श्री राम कोई राजा नहीं थे,

वे वह नाम थे

जिसे स्मरण करते ही भय टूट जाता था।


समुद्र के सामने

जब पूरी सेना रुक गई थी,

श्री राम ने क्रोध से पहले

संवाद का मार्ग चुना था।


यही कारण है कि

उनके धनुष की टंकार से अधिक,

उनके धैर्य की प्रतिध्वनि

युगों तक सुनाई देती है।


रावण केवल लंका में नहीं था,

वह अहंकार बनकर

हर युग के भीतर

अपना स्वर्ण-महल बनाता रहा।


और श्री राम—

हर बार तीर लेकर नहीं आते,

कभी वे विवेक बनकर आते हैं,

कभी वे करुणा बनकर आते हैं।


कभी माँ की सीख में,

कभी पिता की आँखों में,

कभी गुरु के वचनों में,

कभी किसी निर्धन की प्रार्थना में।


आज

मोबाइल की रोशनी बहुत है,

पर मन के भीतर

अंधेरे भी कम नहीं हैं।


जानकारी का समुद्र है,

पर शांति की एक बूँद नहीं,

ऐसे समय में

श्री राम एक प्रार्थना की तरह याद आते हैं।


जब रिश्ते

जायदाद के कागज़ों में बँट जाते हैं,

भरत का त्याग

फिर से आँखों में उतर आता है।


जब भाई भाई से दूर होता है,

तब नंदिग्राम की मिट्टी

धीरे से कहती है—

"प्रेम ही सबसे बड़ा राज्य है।"


जब स्त्री का सम्मान

समाज के शोर में दब जाता है,

तब सीता का धैर्य

आकाश की तरह खड़ा दिखाई देता है।


जब अन्याय शक्तिशाली हो जाता है,

तब श्री राम का धनुष

किसी अस्त्र की तरह नहीं,

न्याय की चेतना की तरह चमकता है।


श्री राम ने

केवल राक्षसों का वध नहीं किया,

उन्होंने मनुष्य के भीतर छिपे

असंख्य अंधकारों को चुनौती दी।


उनका जीवन

एक महाकाव्य कम,

एक खुली हुई दिशा अधिक है,

जिसमें मनुष्य स्वयं को खोज सकता है।


पहाड़ों की नदियों की तरह

वे आज भी बह रहे हैं,

बस हमारे कान

शोर में उलझ गए हैं।


वे आज भी

किसी शबरी की प्रतीक्षा में हैं,

किसी केवट की सरलता में हैं,

किसी हनुमान की निष्ठा में हैं।


वे मंदिरों में हैं,

पर केवल मंदिरों में नहीं हैं,

वे उस आँसू में भी हैं

जो किसी और के दुःख पर गिरता है।


वे आरती में हैं,

पर केवल आरती में नहीं हैं,

वे उस हाथ में भी हैं

जो बिना स्वार्थ किसी को थाम लेता है।


श्री राम कहीं बाहर नहीं हैं,

वे मनुष्य के भीतर बची हुई

आख़िरी करुणा का नाम हैं,

आख़िरी मर्यादा का नाम हैं।


और जब भी

समय का अंधकार

आत्मा पर छाने लगता है,


जब भी

भीड़ के बीच

मनुष्य स्वयं को खोने लगता है,


जब भी

स्वार्थ का रावण

अंदर सिर उठाने लगता है,


तब

मन के किसी शांत कोने से

एक धीमी, स्निग्ध और करुण आवाज़ आती है—


“श्री राम अब भी वन से लौट रहे हैं,

बस उन्हें पहचानने वाली आँखें चाहिए।”


और तब लगता है—

अयोध्या कहीं बाहर नहीं,

वह आज भी

हमारी करुणा,

हमारी सत्यनिष्ठा,

हमारी विनम्रता,

हमारी सहिष्णुता,

और हमारे बचे हुए मनुष्यत्व में

धीरे-धीरे दीपक की तरह जल रही है।


वह दीपक ही श्री राम हैं।

वह प्रकाश ही श्री राम हैं।

वह पथ ही श्री राम हैं।

वह विश्वास ही श्री राम हैं।


जब संसार थक जाता है,

तब जो आशा शेष रहती है,

जब मनुष्य टूट जाता है,

तब जो करुणा शेष रहती है—


वही श्री राम हैं।

वही मर्यादा हैं।

वही जीवन का संगीत हैं।

वही मनुष्य होने का परम सौन्दर्य हैं। 




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