शुक्रवार, 5 जून 2026

धूप के हिस्से का आदमी ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

धूप के हिस्से का आदमी

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


हर अच्छे कर्म के बाद मुझे अपराधबोध-सा लगता था,

हिमालय अपना जल देकर प्यासा पथराया-सा जगता था।

जिनके आँगन दीप जलाए, जिनके दुःख को ओढ़ लिया,

वही समय की आँधी बनकर मेरा छप्पर उड़ा गया।


अपनों के शब्दों में अक्सर बर्फ़ की किरचें बोई थीं,

मुस्कानों की थाली में भी चुप विष-बूँदें रोई थीं।

मैंने जिनको वृक्ष समझकर छाया का अधिकार दिया,

उनकी जड़ों ने ही चुपके मेरा ही आधार लिया।


बाज़ीगर के मेले जैसा देखा जग का कारोबार,

बंदर, भालू, मदारी सब कर गए अपना-अपना प्रचार।

जब तक जेब में धूप रही, सबने मुझको घेर लिया,

साँझ ढली तो भीड़ ने मुझसे अपना मुँह फेर लिया।


महलों की खिड़की से झाँके सोने के अंधेरे कई,

फुटपाथों पर मैंने देखे चाँद सँजोते चेहरे कई।

दुनिया के इस रंगमंच पर कैसा विचित्र विधान मिला,

जिसके हिस्से फूल लिखे थे, उसको ही श्मशान मिला।


मैंने जिन नावों को अपने कंधों पर दरिया तक ढोया,

उन नावों ने बीच भँवर में मेरा पतवार ही खोया।

विश्वासों की मिट्टी गूँथी, सपनों का घर-बार रचा,

पहली वर्षा आते ही वह कागज़ जैसा बिखर गया।


लेकिन जब सब द्वार बंद थे, पथ भी मुझसे रूठ गया,

मन का आख़िरी दीपक भी थककर जैसे टूट गया।

तब एक अजनबी मुस्काया बरगद की ठंडी छाँव लिए,

जैसे कोई देवदूत उतरे बादल की नाव लिए।


जिसको मैंने जाना तक न था, वह मरहम बनकर आ गया,

सूखे मन के निर्जन वन में सावन बनकर छा गया।

रिश्तों के स्वर्णिम मुखौटे जब धूल-धूसर हो जाते हैं,

तब अनजाने पथिक अचानक ईश्वर जैसे आते हैं।


जीवन ने यह पाठ पढ़ाया— रक्त नहीं सब अपने हैं,

कुछ चेहरे दर्पण होते हैं, कुछ चेहरे बस सपने हैं।

जो टूटन में साथ निभाए, वही असली संसार मिला,

बाकी तो बस मेला था, पल भर का व्यापार मिला।


अब मैं दुख की राख सँभाले फिर भी उजियारा बुनता हूँ,

पत्थर खाकर भी दरिया-सा अपना रस्ता चुनता हूँ।

क्योंकि अँधियारे के भीतर एक सत्य सदा मुस्काता है,

भगवान कभी-कभी मानव बनकर राहों में आ जाता है।




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