मंगलवार, 2 जून 2026

पर्दा-ए-अदब ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

पर्दा-ए-अदब..

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी ..

इतना भी होशियार न बनिए जनाब,

हम वाक़िफ़-ए-हक़ीक़त होकर भी नादान बने हैं।

आपकी हर चाल, हर इशारा समझते हैं,

मगर अदब में लबों को ख़ामोश किए हैं।


आपको गुमाँ है कि राज़ छिपा लिया आपने,

हम तो परत-दर-परत दास्ताँ पढ़े बैठे हैं।

हम फ़रेब का चेहरा पहचानते हैं मगर,

तअल्लुक़ की ख़ातिर अनजान बने बैठे हैं।


निगाहों की ज़ुबाँ भी समझते हैं हम,

दिल के हर एहसास से वाक़िफ़ बने हैं।

इतना भी होशियार न बनिए हुज़ूर,

हम जानकर भी अंजान बने हैं।


आपकी सियासत का इल्म भी है हमें,

आपकी नीयत का भी अंदाज़ा है।

मगर आपकी रुसवाई न हो महफ़िल में,

इसलिए ख़ुद को बेख़बर दिखाया है।



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